Thursday, October 2, 2008

कुली के कुल की पहचान

 

calcutta06
gandhisouthafrica
भारत में आमतौर पर बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का सामान ढोने वाले के लिए कुली शब्द का प्रयोग किया जाता है। किसी जमाने में ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीति का सबसे घिनौना पहलू इसी शब्द के जरिये उजागर हुआ था । सभी ब्रिटिश और फ्रैच उपनिवेशों के मूल निवासियों के लिए अंग्रेज लोग कुली शब्द इस्तेमाल करने लगे थे। अंग्रेजी, पुर्तगाली के अलावा यह शब्द तुर्की,चीनी, विएतनामी बर्मी, आदि भाषाओं में भी बोला जाता है।
हिन्दी को कुली शब्द यूरोपवासियों की देन है पर यह भारतीय मूल का ही शब्द है। हालांकि आर्य भाषा परिवार का न होकर इसका रिश्ता द्रविड़ भाषा परिवार से जुड़ता है। हिन्दी का कुली दरअसल तमिल मूल का शब्द है और कन्नड़ में भी बोला जाता है। इन दोनों भाषाओं में इसका उच्चारण कूलि के रूप में होता है जिसका मतलब हुआ मजदूर अर्थात ऐसा दास जो मेहनत के बदले में पैसा पाए। वैसे गुजरात के तटवर्ती इलाके की एक आदिम जनजाति का भी यही नाम है।
गौरतलब है कि करीब पांच हजार साल पहले तक द्रविड़ भाषाओं का विस्तार सुदूर उत्तर-पश्चिमी भारत तक था और आपसी संपर्क के जरिये इसका प्रवेश तुर्की भाषा में भी हो गया जहां इसका रूप बना कुल् यानी दास। और इसी से उर्दू-फारसी में भी कुली के रूप में इसकी पैठ हो गई। अंग्रेजों से भी पहले सोलहवीं सदी के आसपास पुर्तगालियों ने जब भारत के दक्षिणी तट पर पैर पसारने शुरू किए तो वे इस शब्द के संपर्क में आए। पुर्तगालियों के बाद फ्रांसीसी
नस्लवाद अतीत की बात नहीं बल्कि आज भी अपनी घिनौनी हकीकत के साथ आतंकवाद के रूप में  मौजूद है।
इस शब्द से जुड़े। सत्रहवीं सदी तक यूरोप के लोग इससे परिचित हो चुके थे। एक अन्य मान्यता के अनुसार कुली शब्द चीनी भाषा के कू-लि से बना है जिसका मतलब था कड़ी मेहनत, परिश्रम । जब चीन में यूरोपीयों का आगमन हुआ तो इस शब्द में निहित श्रम की गरिमा का अपमान होना शुरू हुआ। आत्मसम्मान के साथ कड़े परिश्रम का  इसमें जो भाव था वह गुलामी के बोझ तले अपनी चमक खो बैठा। धीरे धीरे यह शब्द समूचे दक्षिण एशियाई देशों के उन मेहनतकशों के लिए प्रयोग होने लगा जिन्हें मजबूरी में विदेशियों के लिए अपना पसीना बहाना पड़ता था। जो भी हो पुर्तगालियों के जरिये अंग्रेज भी इस शब्द के संपर्क में आए और फिर तो ब्रिटिश उपनिवेशों जैसे चीन, बर्मा, विएतनाम, ताइवान, दक्षिण अफ्रीका आदि में इस शब्द का चलन आम हो गया।
पनी नस्लवादी सोच केचलते अहंकारी अंग्रेजों ने गुलाम मुल्कों की रियाया के लिए कुली शब्द का खुला प्रयोग शुरू कर दिया। अठारहवी सदी की शुरूआत में जब अंग्रेजों ने भारत समेत तमाम पूर्वी उपनिवेशों से सस्ती मजदूरी पर हजारों लोगों को मारीशस, अमेरिका , कनाडा आदि जगह भेजना शुरू किया तो इस शब्द का विस्तार भी करीब करीब पूरी दुनिया में हो गया। बाद के दौर में एशियाई अल्प आय वर्ग के लोग भी इस शब्द के दायरे में आ गए थे। आमतौर पर दक्षिण अफ्रीका , गुयाना, फिजी, मारीशस और ट्रिनीडाड जैसे उपनिवेशों में भारतीय चाहे श्रमिक हों या अन्य कर्मचारी अथवा व्यापारी कुली शब्द ही उसके लिए हिकारत भरी पहचान थी। गौरतलब है कि महात्मा गांधी को प्रिटोरिया, जोहांसबर्ग में कुली बैरिस्टर कहा जाता था। जाहिर है यह बात उनके अकेले के लिए नहीं थी। ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीय जब दीवाली, मुहर्रम या ईद मनाते थे तो उनके उत्सवों को कुली कार्निवाल कहा जाता था। मगर यह तो सिर्फ भाषिक मामला है। नस्लवाद अतीत की बात नहीं बल्कि आज भी अपनी घिनौनी हकीकत के साथ आतंकवाद के रूप में आज भी मौजूद है।
संशोधित पुनर्प्रस्तुति

8 कमेंट्स:

आशा जोगळेकर said...

वाह कुली तामिल और कन्नड भाषा या चीनी भाषा से आया है । कितनी मेहनत लगती होगी पूरा शोध कार्य है यह तो ।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप वाकई बहुत श्रम करते हैं।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

कुली बुरा और कुलिन श्रेष्ठ !
" सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैँ "
ये गाना याद आ गया :)
गुजरात मेँ १८ वीँ सदी के अँत मेँ
और १९ वीँ मेँ स्त्री भी कुली का काम करतीँ थीँ
खास तौर से रेल्वे प्लेटफोर्म पर
ऐसा सुना है ..
अच्छा शब्द विन्यास ..
- लावण्या

vijay gaur/विजय गौड़ said...

भाषा पर बात करते हुए भी सामाजिक मूल्यों के प्रति आपकी सजगता हमेशा भाती है - "मगर यह तो सिर्फ भाषिक मामला है। नस्लवाद अतीत की बात नहीं बल्कि आज भी अपनी घिनौनी हकीकत के साथ आतंकवाद के रूप में आज भी मौजूद है।"
अच्छा काम हो रहा है भाषा पर। बधाई स्वीकारें।

सतीश सक्सेना said...

सतत मेहनत पर आपको नमस्कार ! ईद और नव दुर्गा मुबारक हो अजीत भाई !

Dr. Chandra Kumar Jain said...

रोजमर्रे में प्रयुक्त होने वाले
शब्दों की दास्तान पढ़कर
आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता होती है.
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आभार
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत मेहनत करते हैं आप अजित ही सच में ..रोचक है यह

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

एक और शब्द की नींव तक पहुँचाने का आभार।

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