Friday, October 3, 2008

धरती का दुर्ग बचाएं... नवरात्र का संकल्प हो

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पर्यावरण ही पृथ्वी का दुर्ग है. इस दुर्ग की अधिष्ठात्री होने से ही देवी को दुर्गा कहा गया  हैं. सोचें, महिषासुर की भूमिका में कौन है? 

भ्यता के विकासक्रम में मनुश्य के भीतर परालौकिक शक्ति में आस्था भी बलवती होती चली गई । प्रकृति की समस्त गतिविधियों का कोई ऊर्जा केंद्र अवश्य है, यह विश्वास मनुश्य के उस बोध का नतीजा था जो सूर्य , वायु , अग्नि, जल आदि प्राकृतिक शक्तियों के अनुभव से हुआ। मनुश्य ने इन्हें देव कहा जो शक्ति के प्रतीक थे। कालांतर में मनीषियों ने शक्ति के दिव्य नारीरूप का भी चिंतन किया जो विभिन्न देवियों के रूप में अभिव्यक्त हुआ।
पृथ्वी है देवी-
यूं तो पुराणों में देवियों के हजारों नाम हैं मगर मूल रूप से सभी शक्ति की प्रतीक हैं और इनमें भी दुर्गा का रूप सर्वाधिक प्रिय है। दरअसल मातृस्वरूपा प्रकृति ही दुर्गा है जिसमें अजस्र ऊर्जा और अमोघ शक्तियां निहित हैं। पृथ्वी का एक नाम भद्रा है और दुर्गा को भी भद्रा कहते हैं। जो सबकी भाग्य विधाता और संकटमोचक तो हैं मगर दुर्लभ भी हैं। उन्हें आसानी से नहीं पाया जा सकता।
शक्तिकेंद्र हैं शिखर-
हां शक्ति के प्रतीक रूप से अभिप्राय है। दुर्गा संस्कृत का शब्द है जिसकी व्युत्पत्ति हुई है दुर+गः या दुर+गम् से । दुर् एक प्रसिद्ध उपसर्ग है जिससे संस्कृत-हिन्दी के दर्जनों शब्द बने हैं। इसमें मुख्यतः कठिनाई, कष्ट और अलभ्य या अप्राप्ति का भाव है। गम् का अर्थ होता है जाना या पाना । अर्थात जिसे आसानी से न पाया जा सके। या जहां जाने में कठिनाई हो। गौर करें कि समतल सतह की तुलना में पहाड़ों पर चलना हमेशा कठिन होता है । इसी लिए उन्हें दुर्गम कहा जाता है। प्राचीनकाल से ही पहाड़ शक्तिकेंद्र माने जाते रहे हैं। मनुश्य ने भी पहाड़ो में शरण ले कर खुद को सुरक्षित समझा। पर्वतों में ही पवनवेग को थामनेवाली और सूर्य के ताप को ओट देनेवाली शक्ति स्थापित हुई है। मनुश्य ने किलों के रूप में अपने शक्तिकेंद्र भी पहाड़ों पर ही स्थापित किए । इसीलिए किलों को दुर्ग कहा जाता है अर्थात जहां जाना अथवा जिन्हें पाना कठिन हो। दुर्गा इसीलिए शिखरवासिनी हैं क्योंकि वह सर्वोच्च है। शक्ति हमेशा शिखर में केन्द्रित रहती है।
महिषासुर है मानव !
 प्रायः सभी दुर्गों की एक अधिष्ठात्री देवी होती हैं जो दुर्गा का ही रूप होती है। प्रकृति [पर्यावरण] ही पृथ्वी का दुर्ग है। देवी स्वयं पृथ्वी का प्रतीक हैं इसीलिए उन्हें भद्रा भी कहते हैं।  इस दुर्ग की अधिष्ठात्री होने से ही उन्हें दुर्गा कहा गया  हैं।  वे दुर्गवासिनी हैं , दर्गम हैं इसीलिए दुर्गा हैं । अपने विविध रूपों में दुर्गा कहीं  शिव की पत्नी हैं तो कहीं कृष्ण की बहन। गौर करें शिव की पत्नी उमा को पार्वती या शैलपुत्री जैसे नाम पर्वत में निहित शक्तियों के प्रतीक स्वरूप ही मिले हैं। यूं भी दुर्गा को अगम, दुर्गम कहा ही इसलिए गया है कि उसकी शक्तियों की थाह कोई न पा सके मगर जो सबको सुरक्षा दे, सबको दुर्भाग्य और दुर्गति से बचाए। प्रकृति का सर्वोत्तम रूप हैं पहाड़ क्योंकि वहां जल, वायु, भूमि, वन और प्राणी सभी कुछ है। इसीलिए वहां देवी का निवास होता है । इसीलिए देवी को पहाड़ांवाली भी कहा जाता है। दुर्गा का एक नाम विन्ध्यवासिनी भी विन्ध्य पर्वत की वजह से ही पड़ा है। दुर्गा अपने अनिष्टनाशक रूप में ही सबको प्रिय हैं मगर विडंबना यह है कि मनुश्य ने देवी के दुर्ग यानी प्रकृति से छेड़छाड़ कर उन्हें रुष्ट कर दिया हैं। मानव अनजाने में कहीं महिषासुर तो नहीं बन गया है ?

...दुर्गा के कुछ अप्रचलित नाम-सिंहस्था, शर्वाणी, रुद्राणी, कौशिकी, ईशानी, अपर्णा, आर्या, अनंता....

कोमल और विकराल-

वैसे शिव की शक्ति के रूप में देवी के दो रूप है कोमल और भयंकर मगर दूसरे रूप में ही देवी अधिक पूजित है जो दुर्गा रूप है। कोमल रूप में दुर्गा के हेमवती, उमा, गौरी, पार्वती , जगन्माता, भवानी आदि नाम हैं तो भयंकर रूप में काली, दुर्गा, भैरवी, चंडिका, श्यामा आदि नाम भी पूजित हैं। दुर्गा से जुड़ी अनेक कथाएं पुराणों में वर्णित है जिनके आधार पर उन्हें महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है। चंड और मुंड जैसे दानवों का नाश करने की वजह से उन्हें चामुंडा का संबोधन मिला। देवी दुर्गा मातृरूपिणी शक्तिस्वरूपा हैं इसीलिए उनकी आठ, दस , बारह या अठारह भुजाएं होती हैं जिनमें विभिन्न शस्त्रास्त्र है। महामाया उनकी शक्ति का अलग रूप है। वे सिंहवाहिनी हैं । देवी उपासकों का एक अलग सम्प्रदाय है जो देवी को ही ब्रह्म मानता है । उनका मानना है कि जब ईश्वर कर्म के नियमों से बाधित नहीं है तो स्वाभाविक है कि उनकी अर्धांगिनी में ही सारी शक्ति केंद्रित होगी इसलिए शक्ति के रूप में वे अधिक पूज्य हैं। दुर्गा के कुछ अप्रचलित नाम इस प्रकार हैं- मुक्तकेशी, तारा, अवरा, अनंता, नित्या, आर्या, राजसी, सती, दक्षिणा, कोटरी, सिंहस्था, शर्वाणी, रुद्राणी, कौशिकी, ईशानी, अपर्णा और कात्यायनी आदि।

[ देवी प्रसंग को वर्तमान संदर्भ में देखने की कोशिश की है]

11 कमेंट्स:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

जय जय दुर्गे दुर्गम्या दुर्गदारिणी
बहुत सुँदर आलेख बना है अजित भाई !
मेरे सुझाव को मान्यता देने का बहुत अभार
काश मनुष्य पर्यावरण और पृथ्वी माता का
उचित खयाल रख सके तब वह "महिषासुर" नहीँ
"पृथ्वी वल्लभ " कहलायेगा ~~
- लावण्या

दिनेशराय द्विवेदी said...

सुंदर आलेख है, आप की परंपरा से कुछ हट कर। लेकिन यह दुर्गा से सम्बद्ध शब्दों की व्याख्या करते हुए। यह अंदाज पसंद आया।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सुंदर विश्लेषण ...कल कुली वाली पोस्ट आपकी आज के अमर उजाला के ब्लॉग कोना में आई है .

अजित वडनेरकर said...

@लावण्या जी-सुझाव के लिए हम आपका धन्यवाद करते हैं लावण्याजी। उसके अनुरूप बन पाया है तो ही सार्थकता है।
@रंजना जी- बहुत बहुत शुक्रिया रंजनाजी, अमरउजाला का लिंक भेज सकती हैं क्या ?
@दिनेश जी-आप जैसे सुबुद्ध पाठकों से ही शब्दों का सफर चल पा रहा है दिनेश जी। उत्साह बढ़ाने का जो जज्बा आपमें है वह जबर्दस्त है। आभार

Gyandutt Pandey said...

यह बिल्कुल सही लगा - प्रकृति ही दुर्ग है। इस दुर्ग का क्षरण करता मानव देवी की आराधना का छद्म रच रहा है - यही दुखद: है।

Radhika Budhkar said...

वह दादा,बहुत ही अच्छा आलेख हैं . मैं हमेशा सोचती थी की देवी हमेशा पहाड़ पर इतनी ऊँची जगह जाकर क्यों रहती हैं ?आज समझ में आया की पहाड़ शक्ति का केन्द्र होते हैं और वे दुर्गा होती हैं इसलिए .बहुत बहुत धन्यवाद इस अच्छे से आलेख के लिए

रंजना said...

श्रेष्ठ विवेचना के साथ अति सुंदर आलेख है.आभार.

महेन said...

बहुत दिनों बाद इधर आ पाया हूँ और देखता क्या हूँ कि कितना कुछ आपने पढ़ने के लिये लिख छोड़ा है। धीरे-धीरे सब कवर करना पड़ेगा।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

धन्यवाद अजित जी,
इस नव-चिंतन के लिए.
चीजें जब समय की आँच में तपकर
बोलती-बतियाती हैं तब उनकी
अपील बढ़ जाती है....आपने
शक्ति के सन्दर्भ को समय के
साँचे में ढालकर मनुष्य के
उपेक्षापूर्ण व्यवहार को रेखांकित किया है.
मैंने एक मेल में भी आपसे नवरात्रि पर
कुछ नया कहने का अनुरोध किया था.
आज यह पोस्ट पढ़कर प्रसन्नता हुई.
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आभार
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

गरिमा said...

बडे़ भईया, अत्यंत सुन्दर आलेख... आपके नजर से पढ़ने का मजा ही कुछ और है :)

Anonymous said...

वाह ! बहुत ही सुंदर विश्लेषण है। ये एकदम सही लगा कि प्रकृति ही धरती का दुर्ग है....
अनिता ताटके

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