Monday, October 20, 2008

नाचीज़ हूं...जौहर क्या दिखाऊंगा ?

lotus flower
फर का पिछला पड़ाव तिल श्रंखला की तीसरी कड़ी पहली मिस यूनिवर्स थी। इस पर कात्यायन जी की प्रतिक्रिया मिली। कानपुर निवासी कात्यायन जी भाषा, संस्कृति और इतिहास के अध्येता है। मुझे यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि उनके निजी संग्रह में चार हजार से भी अधिक पुस्तकें हैं। यथासंभव मेरा प्रयास भी रहता है कि पुस्तकों को अपना संगी-साथी बनाऊं सो आलमारियों में मेरी भी कुछ सहेलियां हैं। बीच बीच में किसी टिप्पणी को आधार बना कर दीगर बातें कहने की कोशिश भी करता हूं। इस बार कात्यायन जी की प्रतिक्रिया का उत्तर इसका माध्यम बना है।
म्मान्य कात्यायन जी, बहुत दिनों बाद आपका आना हुआ। आपकी टिप्पणी महत्वपूर्ण है हमेशा की तरह। शब्दों के सफर में ज़रूर हूं मगर हड़बड़ी में नहीं। सफर के लिए रात के चार घंटे तय हैं। उतनी अवधि में संतोषप्रद काम हो जाए तो ठीक वर्ना उसे मुल्तवी कर देता हूं। जल्दबाजी में कोई पोस्ट नहीं लगाता। इस खाते में सिर्फ वर्तनी की गलतियां कभी कभी नज़र आती जिन्हें दुरुस्त किया जा सकता है। शोध के स्तर पर भरसक प्रयास करता हूं कि कोई कमी न रहे। गलतियां होती आई हैं, होती रहेंगी। सावधान , सचेत रहना ज़रूरी है।

  कात्यायनजी की चिट्ठी

Blue-Sky अजित जी,शब्दों के सन्धान का सफर नित्य लिखनें के पराक्रम के चलते पटरी से उतरता प्रतीत हो रहाss tilottama001 है।ब्रह्मा विश्वकर्मा अप्सरा तिलोत्तमा सुंद एवं असुंद वैदिक पारिभाषिक शब्द हैं जिनके तात्विक अर्थ हैं।पुराणकारों का कार्य वेदों मे वर्णित विशिष्ट ज्ञान को जन सामान्य की भाषा में रूपांतरित एवं प्रचारित प्रसारित करना था किन्तु उनकी व्यंजनात्मक शैली नें कार्य और कठिन कर दिया। आप तो शब्दविद हैं अतः विशेष दायित्व बनता है। प्रथम विश्व सुन्दरी जैसी हेड़िग समीचीन नहीं है।
अलबत्ता आपकी प्रतिक्रिया हमेशा की तरह मार्गदर्शन करती नज़र आई मगर कहीं कहीं अस्पष्ट संकेत मिले। उन्हें जितना समझ पाया उसने यह पोस्ट लिखवा ली।
वैदिक पारिभाषिक शब्दों वाली बात भी सत्य है और पुराणकारों का अनुपम सृजन भी। वैदिक शब्दों की अर्थवत्ता और उनकी प्रतीकात्मकता की व्याख्या करना मेरे कार्यक्षेत्र में नहीं है। वह एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण काम है जिसे करने की योग्यता मुझमें नहीं है। पुराणकारों ने वैदिक कथनों के जो भी भाष्य रचे हों, अपने कथातत्व और रंजकता की वजह से वे महत्वपूर्ण हो गए हैं। जनसामान्य से लेकर विद्वान तक उन्हें ही याद रखे हुए है। आश्चर्य तो तब होता है जब इन्हीं कथाओं के आधार पर रचे गए कर्मकांडों, व्रत-त्योहारों में हिस्सेदारी करते नज़र आते हैं। गहराई से देखें तो कर्मकांड की नींव तो वैदिक यज्ञों में ही नज़र आती है। अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए प्रिय वस्तुओं को भेंट देने के प्रतीक कालांतर में पशुबलि और मानवबलि की भूमिका नहीं बन गए ? कहां जौ, चावल, तिल आदि पदार्थों की हवि और कहां बलि ? कुछ लोग यज्ञों की व्याख्या प्रकृति के शुद्धिकरण से करते हैं । हजारों वर्ष पहले तो प्रकृति वैसे ही शुद्ध थी उसे शुद्ध करने के लिए किसी यज्ञ की कहां आवश्यकता थी ? वैदिक युग में सब कुछ वैज्ञानिक, तार्किक और सुचिंतित था ऐसा मैं नहीं मानता। विभिन्न विद्वान इस बारे में लिख चुके हैं। इसीलिए यह मानना कि वेदों में सब कुछ सांकेतिक भाषा में , प्रतीकों में लिख दिया गया था और पुराणकार उसे डीकोड नहीं कर पाए, सही नहीं लगता।
प्राचीन काल के मनुष्य ने साहित्य, शिल्प, परंपरा आदि में जो भी प्रमाण छोड़े हैं , वह अपने समय का उत्कृष्ट संचित ज्ञान ही था। मगर उसे कालजयी सत्य नहीं कहा जा सकता। अलबत्ता पुराणों को रचे जाने का उद्देश्य चाहे जो रहा हो , वे भी अपने समय का उत्कृष्ट साहित्य हैं और इस रूप मं भरपूर ज्ञानवर्धन और मनोरंजन भी करते हैं जो साहित्य की महत्वपूर्ण कसौटियां हैं। मिस यूनिवर्स तो संदर्भ है, उससे परहेज़ कैसा ? इससे एक दायरा बना कर चलूंगा तो सामान्य पाठक भी यहां नहीं आएगा। इस शीर्षक को पढ़कर कुछ ऐसे लोग भी यहां आए होंगे जो अन्यथा नहीं आते। प्राप्ति तो सकारात्मक ही उन्हें हुई होगी।मगर सोचता हूं कि अगर इसकी जगह कोई और शीर्षक होता तो भी कोई दिक्कत नहीं थी।

 Blue-Sky प्रणाम गुरुदेव

शब्दों का सफर शुरू करने के वक्त से ही मेरी यह SKVARMA इच्छा थी  कि मेरा काम प्रो वर्मा की निगाह से भी गुजरे। अपने कॉलेज जीवन में भाषा विज्ञान के ख्यात विद्वान प्रो. सुरेश वर्मा से इस विषय में ज्ञान प्राप्त करने का सुयोग बना । हाल ही में अचानक उन्होंने मुझे फोन किया। 1983 मध्यप्रदेश के राजगढ़ से में एमए करने के बाद से मेरा उनसे सम्पर्क नहीं था। सफर को सभी ने पसंद किया , मगर मन में यही बात थी कि डॉ वर्मा की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। अगर उन्हें यह पसंद आया तो समझूंगा कि सफर सही दिशा में चल रहा है। उनसे अचानक संवाद होना सुखद आश्चर्य था। उससे भी महत्वपूर्ण यह कि उन्होने फोन पर शब्दों का सफर पर ही बात की और इसे सराहा। डॉक्टर साहब को ब्लॉग न सिर्फ पसंद आया बल्कि उन्होने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। प्रो वर्मा की अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें भाषाविज्ञान पर लिखी पुस्तकें शामिल हैं। दो नाटक- दिशाहीन और निम्नमार्गी, एक कहानी संग्रह –जंग के बारजे पर प्रकाशित हो चुकी हैं। पैंग्विन से शीघ्र ही मुमताज़महल के जीवन पर आधारित एक उपन्यास भी प्रकाशित होने वाला है।
आपके जैसे अन्य गंभीर पाठकों को भी यह बात खटकी होगी। इस पर आगे और विचार करूंगा। आप जैसे लोग यहां आते हैं इससे सफर की दिशा के बारे में पता चलता है, काम की गंभीरता का बोध होता है। अलबत्ता आपको अगर ऐसा लगता है कि रोज़ एक शब्द के बारे में लिखना मेरी बाध्यता है जिसकी वजह से संभवतः अब मैं बेगार टाल रहा हूं तो ऐसा सोचना सही नहीं है। रोज़ लिखना मेरे अनुशासन का हिस्सा है।  मगर रोज़ नई पोस्ट ही डालूं ये ज़रूरी नहीं है। मिसाल के तौर पर जिस पोस्ट के आधार पर आप सफर को पटरी से उतरा हुआ बता रहे हैं वो तो साल भर पुरानी श्रंखला का हिस्सा है जिसमें कुछ संशोधन किए हैं। मैं न तो कोई कीर्तिमान बना रहा हूं और न ही पराक्रम कर रहा हूं। मैं बहुत झिझक के साथ सबके बीच आया हूं। मेरे कार्य के संदर्भ में इस किस्म की शब्दावली मुझे हतोत्साहित करने के लिए काफी है। 
खुद को दुरुस्त करने के लिए हमेशा तत्पर हूं। सफर का उद्देश्य वहीं है जो लिखा है - शब्दों की व्युत्पत्ति के बारे में सहजता से सामान्य लोगों के समझ आने लायक भाषा में बात कह सकूं। आप लोग मेरे कर्म को अध्येतावृत्ति समझ रहे हैं मगर मैं सिर्फ पत्रकार दृष्टि से ही काम कर रहा हूं। मैं साधारण शिक्षित हूं । पत्रकार के रूप में भी उल्लेखनीय नहीं। अपनी सीमाओं का ज्ञान है । भूमिका में मैने इसे स्पष्ट कहा भी है कि बोलचाल के शब्दों की व्युत्पत्ति के प्रति अपनी जिज्ञासा और उससे हुई प्राप्ति मैं आपसे साझा कर रहा हूं। उम्मीद है इसी तरह सफर में बने रहेगे।
साभार....अजित

17 कमेंट्स:

Vivek Gupta said...

आपके शब्दों का सफर सदैव रोमांच से भरपूर रहा है | हर बार कुछ नया पड़ने को मिलाता है | कृपया आप "पोस्ट" शब्द के बारे में भी बताइए | इस शब्द का उपयोग कई ज़गह मिलता है |

Gyandutt Pandey said...

अरे अजित जी, आलोचना जरूर व्यथित करती है। पर जो भी है - आगे मनन और मडल थ्रू तो ब्लॉगर को ही करना है न!
आप बहुत बढ़िया लिखते हैं। बहुत ही बढ़िया।

जीवन सफ़र संगीता said...

आलोचना व्यथित जरुर करती है,पर चुनौती भी देती है/निरन्तर आगे
जाने के लिये/आपकी सहज लेख्ननी हमेशा प्रभावित करती है/

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

हमेँ तो आपका श्रम साफ दीख रहा है
-प्राचीन वाङ्मय से अनेकानेक अर्थ निकलते रहे हैँ - उन्हेँ बार बार समझना उचित है -
कुब्जा की कथा काफी रोचक है
- लावण्या

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आलोचना से उत्साहित होना चाहिए, हतोत्साहित तो बिलकुल नहीं। आप ने शीर्षक गलत नहीं दिया था। लेकिन हर पाठक की अपेक्षाएँ अलग होती हैं। जरूरी नहीं कि हर वक्त व्यक्ति सब की आकांक्षाओं पर खरा उतरे।
आप बस लिखते रहिए।

अनूप शुक्ल said...

कात्यायनजी विद्वान व्यक्ति हैं। उनका आभार मानता हूं कि उनकी टिप्पणी के बहाने अजित जी के गुरू के बारे में पता चला। कात्यायनजी से पिछले माह मुलाकात होते-होते रह गयी। अजितजी ने उनकी टिप्पणी का संतुलित जबाब दिया। कात्यायनजी की टिप्पणी का इंतजार है कि क्या वे अजितजी की बात से संतुष्ट हैं!

राजीव जैन Rajeev Jain said...

सर आपका ब्लॉग हम लोगों को प्रेरणा देता है, आप रोज चार घंटे महनत करते हैं
आपका आभार

Udan Tashtari said...

ज्ञान जी की बात को मेरी बात मानें, उनकी टिप्पणी को भूलकर उसे मेरी ही मान लें..

सतीश सक्सेना said...

आप का कार्य सराहनीय है, विनम्रता तो हमेशा ही अद्वितीय रही है ! इतने समय से एक नीरस कार्य लगातार करना सिर्फ़ हिन्दी के प्रति आपका लगाव प्रर्दशित करता है ! मगर कुछ हिन्दी विद्वान् सहयोग न देकर गलतियाँ ढूँढने का ही कार्य करते हैं, ताकि लोगों को अपना परिचय भली भांति दे सकें ! इन्हे इससे कुछ लेना देना नही कि वे अपनी विद्वता प्रदर्शन से एक अच्छे कार्य को हतोत्साहित कर रहे हो, एक संवेदनशील व्यक्ति का दिल दुखा रहे हो !
गलतिया बताना एक सही और अच्छा कदम है और इससे भाषा और लेख में और निखार आएगा मगर सलाह देते समय भाषा संयत व उद्देश साफ़ होना चाहिए ! भाषा से उद्देश्य साफ़ पता चल जाता है !

अभिषेक ओझा said...

ऐसी टिपण्णीयाँ भी जरूरी ही हैं. वैसे तो आप लाजवाब लिखते हैं लेकिन अगर किसी को कुछ आपत्ति हो तो सुधार की संभावना तो हमेशा रहती है. सतीशजी की बात तो ठीक है पर ये कार्य नीरस है... मुझे तो नहीं लगता !

अजित वडनेरकर said...

@विवेक गुप्ता।।ज्ञानदत्त पांडेय।।प्रभा।।लावण्या शाह।।राजीव जैन।।दिनेशराय द्विवेदी।।अनूप शुक्ल।।समीर लाल।।सतीश सक्सेना।।अभिषेक ओझा।।
आप सभी का शुक्रिया ...मुझे कात्यायन जी से कोई शिकायत नहीं है। उनके लिखे में मार्गदर्शन और सुझाव ही था...अस्पष्टता ज़रूर थी। पहले भी उनकी महत्वपूर्ण टिप्पणियां मिलती रही हैं। मैने सिर्फ एक शब्द पर ही आपत्ति जताई है अन्यथा आलोचनाओं का हमेशा स्वागत है।

sameer yadav said...

अजित जी, वेद पर आपके विचारों से मैं भी सहमत हूँ, विशेषकर कुछ तथ्यों के मानक तो आज पर्यन्त तय नहीं जा सके हैं तो फ़िर उनको आधार बनाकर पटरी से उतरने की बात समालोचना से इतर कदाचित रुष्ट आलोचना है. ब्लॉग जगत में कुछ आवश्यक बुराईयाँ हैं, जिन्हें लेकर हमें चलना ही है. लेकिन कात्यायन जी भी सोद्येश्यपूर्ण है और आप तो लिख ही रहे हैं एक सार्थक उद्येश्य को लेकर ....इसलिए सब शिरोधार्य के भाव से सफर बदस्तूर जारी रहे.

एस. बी. सिंह said...

यदि वेदों में वर्णित तात्विक ज्ञान को सामान्य जन की भाषा में समझाने का पुराणों का प्रयास स्तुत्य है तो अजित जी भी हम सामान्य जनों के लिए यही वन्दनीय प्रयास कर रहे है. हम इनके इस प्रयास से एक बार फ़िर अपनी संस्कृति से आमने सामने हो रहे हैं. साधुवाद

अविनाश वाचस्पति said...

एक बिल्‍कुल सामान्‍य और जिससे सब परिचित भी हैं, ऐसा मैं मानता हूं। एक चित्रकार के चित्र पर गलतियां तलाशने के लिए अनुरोध किया गया था तो जो भी वहां आया उसने गलतियां चिन्हित कर दीं। उस पर गलतियों के निशां ही बाकी रह गए। पर इससे उस चित्रकार ने अपने चित्र बनाना बंद नहीं किया।

इसी प्रकार आप, हम या जो भी लिख रहे हैं, वो आपकी, हमारी या लिखने वालों की अपनी सोच है और यह मानकर कभी नहीं चलना चाहिए और न चला ही जा सकता है कि सब कुछ सभी को पसंद आएगा।
हम सबको अपने कार्य को पूरी संजीदगी और साफनीयती से लेकर करते रहना चाहिए और वो जज्‍बा आपके शब्‍दों के सफर में बिल्‍कुल साफ दिखलाई दे रहा है।

अगर सब कुछ सबको पसंद आ जाए तो दुनिया के सारे मायने ही बदल जायेंगे। इसी प्रकार सब कुछ सभी को नापसंद भी नहीं आ सकता। इसलिए आप अपने नाम के अनुरूप जुटे रहिए। आप अजित हैं और शब्‍दों के सफर के विजित हैं और हम सब विजिटर हैं।
सभी आगंतुक न कभी खुश हुए हैं, कभी होंगे। इसी प्रकार सभी आगंतुक न कभी दुखी हुए हैं, न कभी होंगे परन्‍तु अगर आपने सफर बंद करने के बारे में सोचा भी तो ये प्रतिमान बदल भी सकते हैं अर्थात फिर दुखी सब होंगे।
आलोचना करने वाले इसलिए क्‍योंकि अब उन्‍हें एक नए को तलाशना होगा जिसके कार्य की वे आलोचना करके अपना आलोचना धर्म निबाह सके। उनको टिके रहने के लिए जरूरी है कि आलोचना जारी रहे।

वैसे भी आलोचना (आलू और चना) तो सदाबहार हैं। इनसे कभी नुकसान नहीं होता है और न हो ही सकता है। आप तो बस शब्‍दों की दैनिक फसल को पूरे मनोयोग से उगाते रहिए। जिस दिन नई न उगायें उस दिन पुरानी पर ही घुमाते रहिये। हमें किंचित भी न शिकायत होगी , न गिला, शिकवा यानी न गीला और न सूखा।
पर कामना यही है कि सफर यह जारी रहे। गंगा के पानी की तरह बहता रहे।

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

अजित जी,कल की मेरी टिप्पड़ी पर आप का प्रत्युत्तरात्मक आलेख एवं ब्लागर्स/टिप्पड़ीकारों की टिप्पड़ी से निश्चयेन अधिकांशतः सहमत हूँ।आप को निरुत्साहित करनें का हेतु तो कदापि नहीं है,स्वप्न में भी नहीं।
संकेत मात्र इतना था कि वैदिक शब्दावलि के साथ विगत २-३सौ वर्षों में अत्यधिक दुर्व्यवहार हुआ है।परिणामतः परंपरा से प्राप्त ज्ञान विकृत रुप में ही हमारे सम्मुख प्रस्तुत हो पाया है।दोष जहाँ परंपरा को जाननें वालों का था वहीं पी०एच०डी० उपाधिधारी आधुनिकों का भी था जिन्होंनें प्राचीनों से जाननें का प्रयत्न ही नहीं किया।
वेदों में निहित ज्ञान का फलक न केवल अति विशाल है वरन्‌ विशिष्ट भी है।वेद एवं विज्ञान का जो सम्बन्ध है उसके लिए परिभाषा है-‘एकं ज्ञानं ज्ञानम्‌ बहुलं ज्ञानं विज्ञानं’-उस एक(ब्रह्म)तत्व से यह स्रष्टि या स्रष्ट हुआ जगत कैसे बना इसको जानना ज्ञान है और यह स्रष्ट हुआ जगत अन्ततः एक कैसे है इसको जाननें कि विधा को विज्ञान कहते हैं। ऋषियों नें अपनें ज्ञान विज्ञान से जो जाना उसको एक सूत्र में निबद्ध किया और कहा-‘यद पिंण्डे तद्‌ ब्रह्माण्डे’अर्थतःजो इस शरीर में है वही ब्रह्माण्ड में है-स्थूल सूक्ष्म एवं कारण या आधिभौतिक आधिदैविक एवं आध्यात्मिक।पुनः आधिदैविक के लिए एक सूत्र दिया-‘परोक्षेण परोक्ष प्रिया इव हि देवाः’इसी को शंकराचार्य जी ने अपनें प्रकरण ग्रन्थ ‘अपरोक्षानुभूति’ में संकेतित किया है।
देवता अर्थात द्युतिमान कांतिमान विद्युत स्वरुपी देव तत्व अतितम सूक्ष्म है और चर्म चक्षुओं से उन्हें नहीं जाना जा सकता।आदि आदि। जहाँ तक यज्ञों द्वारा प्रकृति को शुद्ध करनें की बात है वह यज्ञों का मूल उद्देश्य नहीं रहा है।यज्ञ जिसको विकार भाव से हम आज हवन कहते हैं को थोड़ा ध्यान से देखें तो दो बातें ध्यान में आती हैं-हवन की वेदी और उसमें प्रज्जवलित अग्नि से उत्पन्न प्रकाश और(अधिकांश को) न समझ में आनें वाले मन्त्रों की ध्वनियाँ।अर्थात और कुछ समझ आयॆ या न आयॆ यज्ञवेदि में हवन से प्रकाश और ध्वनि निकलती है इतना तो समझ आता है आना ही चाहिये। अर्थ यह कि हुआ कि ऊर्जा के दो रुप प्रकाश और ध्वनि के रुप में हमारे सम्मुख प्रस्तुत होते हैं।चारो वेद ऊर्जा की अभ्यर्थना से ही प्रारम्भ होते हैं-अग्नि मीळे पुरोहितम-ईषे त्वा उर्जे त्वा आदि। अन्ततः यह ध्वनि भी प्रकाश में परिवर्तित हो जाती है।आधुनिक विज्ञान भी इसकी पुष्टि कर रहा है।
सामान्यता ‘माया’ का अर्थ ‘नहीं है जो’ किया जाता हैकिन्तु ‘मा’मानी प्रकाश भी होता है। यथा अमा(अमावस्या) अर्थात नहीं है प्रकाश जिस दिन या पूर्णिमा(पूर्णमासी) अर्थात पूर्ण है प्रकाश जिस दिन।‘प्र’ उपसर्ग प्रकष्ट अर्थात जो पहले से है अर्थात ‘ब्रह्म’को जो काशित प्रकाशित द्योतित करे उसे प्रकाश कहा गया है।तात्पर्य यह कि स्रष्ट हुआ जगत ब्रह्म का प्रकाश है।यदि यह प्रकाश अर्थात जगत न हो तो उसके रचनाकार ब्रह्म के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाये।शंकराचार्य जी जब जगन्मिथ्या कहते है तो उसका अर्थ इतना ही है कि यह स्रष्ट हुआ जगत सापेक्षतया मरणधर्मा है।
ब्रह्म एवं उसके प्रकाश को वेदों में रस और बल,शैवों एवं शाक्तों नें शिव और शक्ति सांख्यों नें पुरुष और प्रकृति,याज्ञिकों नें योषा-वृषा और यत एवं जू(यज्जु) कहा है।यज्ञ से योग(दो तत्वों के मेल से तीसरे पदार्थ की उत्पत्ति) और याग से अपूर्व(मौलिक तत्व) की स्रष्टि होती है यह वैदिक सिद्धान्त है।इसीलिए प्रकृति में जो यज्ञ देवताओं द्वारा(यज्ञेन यज्ञ यजन्त देवा) हो रहा है वैसे ही हम(ऋषिगण) भी करें-‘यद्वै देवा अकुर्वंस्तत्‌ करवाणि(कृष्ण यजुर्वेद)।
वेद के बहुचर्चित नासदीय सूक्त में जिस सलिल का संकेत किया गया है वह स्रष्टि क्रम में जब अम्भ,अभ्व और आपः रुप में परिणत होता है तब उसी ‘अप्सरस’रुपी(अप्सरा) तत्व में मित्र(आग्नेय प्राण) एवं वारुण(सौम्य प्राण) वीर्याधान करते हैं।यह कथानक मिलता है।यह प्राचीन ऋषियों की श्लेषात्मक शैली है जिसे ‘ड़िकोड’ करे बिना वेदों का रहस्य प्रकट नहीं हो सकता।
इसी क्रम में उर्वशी मेंनका तिलोत्तमा आदि अप्सरसःतत्वों का गुण स्थान कार्य आदि के कारण भिन्न भिन्न नामकरण किये गये हैं। प्रत्येक तिल में तेल हो यह आवश्यक नहीं है।जिस तिल में तेल है उस तेल में दो गुण अवश्य होंगे-एक तो वह स्निग्ध(सौम्य प्राण) होगा एवं दूसरा उसमें ऊर्जा(आग्नेय प्राण) होगी,तिल का वाह्य कवच अप(अप्सरा) रुपी आधार पात्र है।
वैदिक शब्दावलि को जाननें के लिए प्रातिशाख्य ग्रन्थों एवं प्राचीन कोषों यथा शौनक कृत बृहद्‌ देवता,हलायुध कोष,अभिधान चिन्तामणि,अमरकोष,भगवद्द्त कृत वैदिक कोष आदि अधिक उपयोगी प्रतीत होते हैं। पाणिनीय व्याकरण एवं प्रो०आप्टे का कोष भी सहायक होता है।
अजित जी आप शब्दों के सन्धान में श्रम ही नहीं कर रहे हैं पाठकों का संस्कार भी कर रहे हैं इसीलिए आप से अधिक की आशा रखता हूँ।पुनः कहूँगा कि आप या आपके पाठक वृन्द के हृदय को आहत या निरुत्साहित करनें का विचार न था न है न होगा।हाँ अपनीं सामान्य बुद्धि से जो समझा हृदय से आपके सम्मुख रख दिया।भाई अभय तिवारी जी के निर्देश एवं सहयोग से ब्लाग का प्रारम्भ हो गया। अभी गोवा प्रवास पर हूँ फिर भी प्रयास करुँगा कि वैदिक विषयों पर कुछ लिखूँ॥शुभस्तु पन्थानं॥

अजित वडनेरकर said...

कात्यायनजी,
आभारी हूं। वैदिक ग्रंथों का अनुशीलन करने की मुझमें क्षमता नहीं है। जितना सहज बुद्धि से पढ़ा-जाना उससे वैदिक ज्ञान के प्रति सम्मान का भाव तो है मगर कालपात्र में बंद किन्ही अज्ञात रहस्यों का उद्घाटन वेदों के जरिये नहीं होना है। तत्कालीन उपलब्ध ज्ञान और चिंतन की पराकाष्ठा उनमें है। आप बुरा न मानें, बहुत सी क्रियाओं को चिंतकों नें बाद में तार्किक जामा पहनाया है। वैदिक संस्कृति के प्रशंसक उसके दिव्य स्वरूप को ही देखते हैं। क्रमिक विकास पर ध्यान अगर दें तो उन्हें पूर्ववैदिक सभ्यता की कल्पना भी करनी होगी। आप क्यों भूलते हैं कि जेम्सवाट का इंजन 1850 के आसपास ग्रामीण भारतीयो के लिए कालभैरव से कम नहीं था।
पूर्ववैदिक जनों के लिए अग्नि का महत्व वह नहीं था जो वैदिक जनों का हुआ । अग्नि से जुड़े अनुष्ठान वैदिक जनों के पुरखों के लिए कुछ और थे और वैदिकजनों नें अपने पुरखों की मान्यताओं का कहीं रूढ़ अनुसरण किया और कहीं उसमें नया जोड़ा।
विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े जी ने इस विषय पर आज से एक सदी पहले ही महत्वपूर्ण शोध किए थे। वेद विज्ञानी और व्याख्याकार जिस तरह की बातें कहते हैं उसका एक उदाहरण आपने ही दिया है-
"अप्सरस’रुपी(अप्सरा) तत्व में मित्र(आग्नेय प्राण) एवं वारुण(सौम्य प्राण) वीर्याधान करते हैं"
इसका क्या अर्थ है ? व्यावहारिकता क्या है ? सौम्य प्राण क्या है ? ये कैसा वीर्याधान है ? ये कैसे तत्व हैं ? कौन समझाएगा इन्हें ? मेरी नजर में ये कोरे शब्द हैं। कबीर ने आम जन को निर्गुण राम भी समझा दिए और सगुण राम भी । वेदों के इस विशिष्ट ज्ञान को या तो वैसे समझाया जाए अन्यथा इस तरह की व्याख्याएं तो समझ से परे हैं। कई बार इन्हें पढ़ चुका हूं। समझने का प्रयास भी कर चुका हूं। विशिष्ट तत्व, योग, वीर्य, वीर्याधान, कई तरह के प्राण आदि। नाथपंथ में भी कुंडलिनीचक्र जैसी बहुत सी बातें समझ में नहीं आती। नाड़ी, सुषुम्ना, सहस्रार चक्र, पद्मकमल । अभी समझदारी के उस दायरे से बाहर हूं जहां से ये सब आत्मसात कर सकूं।
आपने जिन ग्रंथों का उल्लेख किया है उनमें से कुछ का लाभ ले रहा हूं , कुछ जल्दी ही जुटाऊंगा।
आप अपने ब्लाग पर जो कुछ कहेंगे उसे श्रद्धा के साथ पढ़ने आया करूंगा।
सादर,
अजित

विष्णु बैरागी said...

सुना और पढा था कि वास्‍तविक आलोचना वही है जो सृजन के लिए प्रेरित करे । यह विमर्श उस 'सुनी-सुनाई और पढी-पढाई' को साकार करता अनुभव हो रहा है ।
दृष्टि भेद तो हर बिन्‍दु पर मिलेगा ही । भाषाविद और भाषा अध्‍येता की दृष्टि समान हो, यह आवश्‍यक नहीं । लेकिन ऐसा 'भेद' भी सकारात्‍मकता लिए हुए, एक ही गन्‍तव्‍य का यात्री होता है । कात्‍यायनजी और आप, एक ही गन्‍तव्‍य हेतु भिन्‍न-पथ पर पर चल रहे यायावर अनुभव हो रहे हैं ।
इस विमर्श का यह सौभाग्‍य ही है कि आलोचना समारात्‍मक और पे्ररक है । अन्‍यथा हर कोई जानता है कि आलोचकों के स्‍मारक नहीं होते ।
आपके परिश्रम और विनम्रता को अभिनन्‍दन ।

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