Friday, April 30, 2010

[नामपुराण-10] वाजपेयीजी की गति, जोश और शक्ति

पिछली कड़ियां-1.नाम में क्या रखा है 2.सिन्धु से इंडिया और वेस्ट इंडीज़ तक 3.हरिद्वार, दिल्लीगेट और हाथीपोल 4. एक घटिया सी शब्द-चर्चा 5.सावधानी हटी, दुर्घटना घटी 6.नेहरू, झुमरीतलैया, कोतवाल, नैनीताल 7.दुबे-चौबे, ओझा-बैगा और त्रिपाठी-तिवारी 8.यजमान का जश्न और याज्ञिक.9.2पुरोहित का रुतबा, जादूगर की माया

ब्राह्मणों के चिर-परिचित उपनामों या कुल गोत्रों में एक वाजपेयी भी है। इसे बाजपेई , बाजपायी भी लिखा जाता है किन्तु सही रूप वाजपेयी ही है। वाजपेयी उपनाम भी ज्ञान परम्परा से जुड़ा है और इसका रिश्ता वैदिक संस्कृति के एक प्रमुख अनुष्ठान वाजपेय यज्ञ से है जो पूर्ववैदिक काल की कृषि संस्कृति की देन है। ब्राह्मण ग्रंथों के मुताबिक वाजपेय अनुष्ठान कराने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्णों को ही था। यह तो स्पष्ट है कि आर्यों में यज्ञ की परिपाटी जनमंगल और जनकल्याण की भावना से थी, बाद में इसने रूढ़ अनुष्ठानों का रूप लिया। पुरोहित और ब्राह्मण वर्ग के लगातार ताकतवर होते जाने और महत्वाकांक्षा बढ़ने के परिणामस्वरूप इस वर्ग में भी कई वर्ग उपवर्ग पैदा हो गए जो अपने स्तर पर वैदिक संहिताओं और संचित ज्ञान की व्याख्या करने लगे। उद्धेश्य सामंत और श्रेष्ठी वर्ग में अपना वर्चस्व कायम करना था। पुराणोपनिषद काल में यह झमेला शुरू हुआ और फिर इतना बढ़ा कि उसकी प्रतिक्रियास्वरूप हिन्दुत्व के भीतर से ही बौद्धधर्म जन्मा जो मूलतः ब्राह्मणवाद के विरुद्ध था।
तपथ ब्राह्मण में वाजपेय यज्ञ के बारे में विस्तार से विवरण मिलता है। इस यज्ञ का महत्व राजसूय यज्ञ से भी अधिक था। इस यज्ञ का एक खास हिस्सा रथदौड़ था। रथदौड़ का विजेता विजय भोज प्राप्त करता था। हालांकि प्रतीत होता है कि प्रभावशाली वर्ग का रथ पहले ही सबसे आगे रहता था और अंत में उसे ही विजयी घोषित किया जाता था। प्राचीनकाल में यह मान्यता थी कि राज्य का अधिकारी वही व्यक्ति हो सकता था जिसने राजसूय यज्ञ किया हो अर्थात राज्याभिषेक के लिए राजसूय यज्ञ आवश्यक था और सम्राट बनने के लिए वाजपेय यज्ञ जरूरी था। पौराणिक संदर्भों के अनुसार इन्द्र वाजपेय यज्ञ करने के कारण सम्राट कहलाते हैं जबकि वरुण राजसूय यज्ञ करने के कारण राजा कहलाते हैं। वाजपेय यज्ञ को स्वर्गाधिपत्य के बराबर बताया गया है। हालांकि यह अतिशयोक्ति है और पुरोहितों द्वारा अपना प्रभाव बढ़ाने और राजाओं को खुश करने के लिए ऐसी बातें प्रचारित हुई होंगी। वाज शब्द के अन्य अर्थ है- युद्ध, मुकाबला, झड़प, लूट का माल, समृद्धि, धन-दौलत आदि। डॉ पाण्डुरंग वामन काणे धर्मशास्त्र का

... ब्राह्मण ग्रंथों के मुताबिक वाजपेय अनुष्ठान कराने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्णों को ही था। यह तो स्पष्ट है कि आर्यों में यज्ञ की परिपाटी जनमंगल और जनकल्याण की भावना से थी। बाद में इसने रूढ़ अनुष्ठानों का रूप लिया...havan

इतिहास (खण्ड एक) में वाजपेय के बारे में लिखते हैं-“भोजन एवं पेय या शक्ति का पीना या भोजन का पीना या दौड़ का पीना। यह भी एक प्रकार का सोमयज्ञ है, अर्थात् इसमें भी सोमरस का पान होता है, अतः इस इस यज्ञ के सम्पादन से भोजन (अन्न), शक्ति आदि की प्राप्ति होती है। ” ऋग्वैदिक काल में सात तरह के सोमयज्ञ प्रचलित थे जिनमें एक वाजपेय भी था। यहां गौरतलब है कि सोम के विषय में आज तक कुछ भी ठोस और प्रामाणिक जानकारी नहीं है, अलबत्ता कल्पना की उड़ानें खूब भरी गई हैं। सोम से संबंधित परम्पराएं पूर्व वैदिक काल से चली आ रही हैं जिनसे इतना ही पता चलता है कि इसे  एक पवित्र पौधा माना जाता था। इसके रस का पान करना आनुष्ठानिक कर्म माना जाता था और इसका संबंध शक्ति और अन्न समृद्धि से था। इस पौधे में चंद्रमा का प्रतीक जोड़ा गया।
मूलतः वाजपेय यज्ञ कृषि संस्कृति से उपजा एक लोकोत्सव था। सबसे पहले देखते हैं कि वाज् शब्द क्या है। संस्कृत में वाज शब्द की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है किन्तु अंततः इससे उपजने वाले सभी अर्थ पूर्ववैदिक काल की जन और ग्राम संस्कृति से उभरे हुए नजर आते हैं। वाज का अर्थ है खाद्य, उपज, अनाज, भोजन आदि। जब यह शब्द यज्ञ की परिधि में आया तो इसका अर्थ समिधा भी हो गया। वाज (पेय) में समृ्द्धि का जो भाव है वह उपज, अनाज से ही आ रहा है। अन्न से ही शरीर को स्वास्थ्य समृद्धि मिलती है। कृषि उपज के रूप में इससे भौतिक समृद्धि आती है। वाज का अर्थ क्षमता, उत्साह, जोश, गति, वेग भी है। डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल मेघदूत मीमांसा में वाज की दार्शनिक व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि वाज जीवन रस है। वाज के अर्थ अन्न-वीर्य आदि हैं। वर्षाकाल में वनस्पतियां ओषधियां वीर्यवती होती हैं। यहां तात्पर्य उनके प्रभावी होने, क्षमतावान होने से है। वाज को शरीर में ही पचा लेने या आत्मवीर्य को शरीर के कोशों में सम्भृत करने का नाम ही वाजपेय है। जिसने इस वाज को विज्ञानपूर्वक खुद में समों लिया है वही भरद्वाज (भरद्+वाज) है। तात्पर्य यही कि अन्न से प्राप्त शक्ति अथवा जीवनरस का सशक्त संकेत वाज में निहित है। जिस तरह से वर्षा ऋतु में प्रकृति को वाज प्राप्त होता है ताकि प्राणि जगत को शक्ति मिले उसी तरह अन्न के रूप में मनुष्य को भी वाज अर्थात शक्ति प्राप्त होती है जिसका उपयोग वह जनकल्याण के लिए कर सके। गौरतलब है कि वैदिक साहित्य में यजुर्वेद में ही विभिन्न अनुष्ठानों, विधानों का उल्लेख है। प्रकृति के भीतर सभी ऋतुएं वाजवती हैं। अग्नि, सूर्य, वायु सभी पूर्ण वाजपेयी हैं अर्थात ये अपने भीतर के तेज से ही शक्तिवान हैं। -जारी

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Wednesday, April 28, 2010

[नामपुराण-9] पुरोहित का रुतबा, जादूगर की माया

p309-full पिछली कड़ियां-1.नाम में क्या रखा है 2.सिन्धु से इंडिया और वेस्ट इंडीज़ तक 3.हरिद्वार, दिल्लीगेट और हाथीपोल 4. एक घटिया सी शब्द-चर्चा 5.सावधानी हटी, दुर्घटना घटी 6.नेहरू, झुमरीतलैया, कोतवाल, नैनीताल 7.दुबे-चौबे, ओझा-बैगा और त्रिपाठी-तिवारी 8.यजमान का जश्न और याज्ञिक

पु कौटिल्य ने राज्य प्रशासन में अमात्य के बाद पुरोहित को ही सबसे महत्वपूर्ण बताया है। ऐतरेय ब्राह्मण में पुरोहित को राष्ट्रगोपः कहा गया है। याद रहे गोपः शब्द का अर्थ होता है राजा या पालनकर्ता। गोपाल शब्द इसी मूल से आया है। गो अर्थात पृथ्वी और पाल यानी पालनकर्ता अर्थात जो भूपति है, राजा है, सबका पालनकर्ता है, वही गोपाल है। राष्ट्रगोपः का अर्थ हुआ सबका स्वामी। शुक्रनीति में भी पुरोहित को पूरे देश का पालनकर्ता कहा गया है। पुरोहित के परिचय में कहा गया है- “जो मंत्र और अनुष्ठानों में कुशल, तीनों वेदों का ज्ञाता, कर्म में तत्पर, जितेन्द्रिय, जित-क्रोध, लोभ-मोह रहित, षडांगों का ज्ञाता, धनुर्विद्या में निष्णात और धर्मरत है। जिसके कुपित हो जाने के भय से राजा धार्मिक जीवन व्यतीत करता है। जिसे नीतिशास्त्र और आयुधों का ज्ञान है। जो शाप और अनुग्रह में समर्थ है, वही पुरोहित, आचार्य है।” सुश्रुत संहिता में पुरोहित को वैद्य से श्रेष्ठ कहा गया है क्योंकि वैद्य वेदों के उपांग आयुर्वेद का अध्येता होता है जबकि पुरोहित वेदों को पढ़ाता है इसलिए अच्छे वैद्य को चाहिए कि हमेशा पुरोहित से परामर्श कर अपने ज्ञान का परिमार्जन करता रहे।
पुरोहित हिन्दू संस्कृति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवयवों में एक है। ऋग्वेद में पुरोहित शब्द का उल्लेख अनेक बार हुआ है। भारतीय समाज में कर्मकांड व धार्मिक आचार सम्पन्न करानेवाला पुरोहित कहलाता है। मोनियर विलियम्स के मुताबिक पुरोहित शब्द बना है पुरस् +हित से। मैक्डोनल और कीथ के वैदिक इंडेक्स के मुताबिक यह पुरो+हित से आ रहा है। अन्य लोग इसे पुरः+ हित से बताते हैं। पुरस् शब्द पूर्व से आ रहा है जिसका अर्थ है पहले से, सामने की ओर, सम्मुख आदि। हित में कल्याण का भाव है। इस तरह पुरोहित का अर्थ हुआ सामने खड़ा रहनेवाला या नियुक्त। भाव है अपने हितार्थ, कल्याणार्थ नियुक्त व्यक्ति। पुरोहित में दूत का भी भाव है। वामन शिवराम आप्टे के अनुसार पुरोहित का अर्थ है कार्यभार सम्भालने वाला, अभिकर्ता या दूत। मूलतः पुरोहित शब्द की अर्थवत्ता धार्मिक कर्मकांड, विधि-विधान का संचालन करने वाले व्यक्ति के रूप में ही स्थापित होती है। आर्यों की घुमक्कड़ी के दौर में विभिन्न जत्थे लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर आप्रवासन करते थे। पुरोहित की भूमिका अग्रदूत की थी जो समूह के नेता की ओर से निर्दिष्ट गंतव्य तक जाकर वहां की व्यवस्था देखता था ताकि उसके पीछे निर्विघ्न समूह के अन्य लोग आ सकें। पुरोहित ही उस स्थान के बारे में अधिक जानकारी रखता था अतः वही लोगों को उस स्थान के भूगोल भोजन, पानी, रिहाइश से संबंधित जानकारियां और दिशा-निर्देश देता था। अग्रदूत से अपने कर्तव्यों की शुरुआत करनेवाला पुरोहित कालांतर में अमात्य, प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्य संरक्षक की भूमिका निभाता नजर आता है।
गौरतलब है कि ऋग्वेदकाल में पुरोहित का कार्य किसी जाति विशेष से जुड़ा हुआ न था। वैदिक युग में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था Hindu Priest on the Ganges at Diwali नहीं थी। गौरवर्ण आर्यों में खुद को कृष्णवर्ण अनार्यों से श्रेष्ठ देखने, फर्क करने की प्रवृत्ति / ग्रंथि जरूर थी। संभवतः चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के बाद यही ग्रंथि समाज में रसौली बनकर उभरी। समूह का पुरोहित परम्परा, तेजस्विता अथवा वरिष्ठता के आधार पर चुना जाता था। वेदों में कहा गया है-तीक्ष्णीयांसः परशोरग्नेस्तीक्ष्णतरा उत। इन्द्रस्य वज्रात् तीक्ष्णीयांसो येषामस्मि पुरोहितः ।। यानी जिस प्रकार के शिक्षक होंगे, वैसे ही शिष्य होंगे। यदि शिक्षक हीनवीर्य्य, हतोत्साह होंगे तो राष्ट्र में उत्साह-बलादि का अभाव रहेगा। विद्वानों के मुताबिक ब्राह्मण धर्मग्रंथों में ऋषियों के कुलनामों की जो सूचियां मिलती हैं, उनमें बहुत घालमेल हुआ। यह सच है कि पुरोहित व्यवस्था के अंतर्गत ही चातुर्वर्ण्य व्यवस्था अस्तित्व में आई। जिसके तहत पुरोहितों ने खुद को ब्राह्मण वर्ण में रखा। यह जरूरी भी था। भवभूति का एक उद्धरण महत्वपूर्ण है-“ विद्वान ब्राह्मण जिस राष्ट्र का रक्षक पुरोहित होता है वह राष्ट्र न तो व्यथित होता है न जीर्ण और न आपत्ति से आक्रान्त होता है।” स्पष्ट है कि इससे पूर्व पुरोहित पद किसी जाति की बपौती नहीं था किन्तु कुल वंश परम्परा के आधार पर ही पुरोहित पद चलने का प्रचलन था। इतना महत्व द्विजश्रेष्ठ को ही मिलना चाहिए इसीलिए पुरोहित अर्थात यज्ञादि धार्मिक कर्मकांड करानेवाले वाले वर्ग को ब्राह्मण वर्ग में रखा गया।
विद्वानों के मुताबिक अथर्ववेद आर्यों के अथर्वन् समूह की संहिता रही होगी। अथर्वन् का अर्थ है अग्निपूजक पुरोहित। अवेस्ता में भी इसी अर्थ में इसका प्रयोग हुआ है। अग्निपूजक मागियों का रिश्ता मग पुरोहितों से है। अथर्ववेद के मंत्रों से स्पष्ट है कि पुरोहित देवताओं का आह्वान करते थे। मंत्रों में प्राकृतिक शक्तियों के लिए जो सहज संबोधन था, कालांतर में उनमें चमत्कारिक प्रभाव समझा जाने लगा। यहीं से तंत्र-मंत्र, टोने-टोटके की शुरुआत हुई। उत्तम शक्तियों अर्थात देवताओं का आह्वान करनेवाले पुरोहितों का वर्ग अलग हुआ और निम्न शक्तियों मसलन भूत-प्रेत का आह्वान करनेवाले पुरोहित हीन श्रेणी के माने जाने लगे जिनमें ओझाई करनेवाले भी हैं और श्राद्धकर्म या मृत्यसंस्कार करानेवाले ब्राह्मण भी हैं। मग से ही मागी बना और फिर इससे मैजिक शब्द बना। मशीन शब्द भी इसी कड़ी का हिस्सा है और माया भी। अथर्ववेद से जुड़े जादू-टोने के तार मंत्र-शक्ति की काल्पनिक सर्वव्यापी छवि दिखाते हैं। यह भी समझ में आता है कि अग्नि को ही मनुष्य ने आदिमकाल से परम चमत्कारिक शक्ति माना। इसके ताप, दीप्ति और विनाशक प्रभाव में चमत्कार रचने के सारे अवयव मौजूद हैं। अग्निपूजा से जुड़े भव्य और नाटकीय मंत्रोक्त अनुष्ठानों ने समाज में मंत्रशक्तियों के अलौकिक प्रभाव और भ्रम को रचने में भारी योगदान किया। मगों को इसीलिए पश्चिम में जादूगर के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। ग्रीक उद्धरणों में उनके लिए मगास शब्द का प्रयोग हुआ है। याद रहे, जादूगर जब तक मुंह से आग न निकाल दे अथवा अस्फुट उच्चारों के जरिये शून्य से अग्नि पैदा न कर दे, उसका प्रभाव नहीं जमता।

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[नाम पुराण-8] यजमान का जश्न और याज्ञिक

vedas[55] पिछली कड़ियां-1.नाम में क्या रखा है 2.सिन्धु से इंडिया और वेस्ट इंडीज़ तक 3.हरिद्वार, दिल्लीगेट और हाथीपोल 4. एक घटिया सी शब्द-चर्चा 5.सावधानी हटी, दुर्घटना घटी 6.नेहरू, झुमरीतलैया, कोतवाल, नैनीताल 7.दुबे-चौबे, ओझा-बैगा और त्रिपाठी-तिवारी

प्रा चीनकाल में ज्ञान परम्परा से जुड़ी बातें धर्म के दायरे में आ जाती थीं। अधिकांशतः यह होता रहा कि धर्म-कर्म की जानकारियां ही किसी व्यक्ति के ज्ञान का पैमाना होती थीं। प्राकृतिक शक्तियों को ही मनुष्य ने विकास के प्रारम्भिक चरण से आजतक सर्वोपरि माना। दिन-रात की घटना से मनुष्य अचम्भित रहा। इसका रिश्ता उसने सूर्य चंद्र से जोड़ा। फिर सूर्य, चंद्र, जल, अग्नि, आकाश जैसे तत्वों से अनुभूत स्थूल जानकारियां ज्ञानघट में समानी शुरू हुईं। इसके बाद अंतरिक्ष, सौर चक्र, ग्रह-नक्षत्रों की गतियों और ऋतुक्रम के बारे में उसके अध्ययन का दायरा बढ़ा। आगे चलकर प्राकृतिक शक्तियों को विलक्षण मानते हुए उनमें देवत्व की प्रतिष्ठा हुई। ग्रह-गतियों और मौसम के अनुरूप एक जीवन पद्धति विकसित हुई जिसमें नई रीतियां, परम्पराएं, अनुष्ठान आदि जुड़ते गए। मनुष्य के नैतिक कर्तव्यों की स्थापना इसका अगला चरण थी। इस तरह एक संस्कृति विकसित होते हुए सभ्यता में बदली। स्थूल रूप में धर्म का यही आरम्भिक स्वरूप रहा होगा। यह पूर्ववैदिक युग था। वैदिक युग में चिंतन का गहन रूप देखने को मिलता है।

पनिषद काल में दर्शन का विकास उच्चतम स्तर पर दिखता है। धर्म संबंधी धारणाएं इसी दौर में स्थिर हुईं। इतना सब होने के बावजूद संचित ज्ञान की यह थाती एक वर्ग तक सीमित रही। परम्परागत रूप से ये लोग पुरोहित, याज्ञिक, विज्ञ, ज्ञानी और पंडित कहलाए।मूलतः ये सब उपाधियां थीं जो कालांतर में ब्राह्मणों के उपनाम बन गए। इस संदर्भ में राजपुरोहित, शास्त्री, वैद्य, वाजपेयी, अग्निहोत्री, पुण्डरीक-पौण्ड्रिक, पुराणिक, देवपुजारी, धर्माधिकारी, दीक्षित, जोशी, आचार्य, याज्ञिक (याग्निक), पण्डित, पुरोहित, पाण्डे, देशपाण्डे, पुजारी, ऋषि, महर्षि जैसी अनेक उपाधियों का उल्लेख किया जा सकता है। आर्य संस्कृति यज्ञ प्रधान थी। मोटे तौर पर यह प्रकृति की उपासना थी। यज्ञकर्म के जरिये पूर्ववैदिक काल के लोग जन मंगल और जन कल्याण की कामना करते थे। कालांतर में धार्मिक विधिविधानों का स्वरूप निश्चित होने के बाद प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान के रूप में यज्ञ की महत्ता और बढ़ गई। हिन्दी उर्दू में एक शब्द है जश्न या जशन। इसका अर्थ है उत्सव, समारोह या जलसा। अपने मूल रूप में तो यह शब्द फारसी का है। पुरानी फारसी यानी अवेस्ता में यह
शास्त्रों में दो तरह के प्रमुख यज्ञ बताए गए हैं 1) श्रौत यज्ञ 2) पञ्चमहायज्ञ। दोनों प्रकार के यज्ञों में अंतर पुरोहित का है। श्रौतयज्ञ में जहां पुरोहित ही प्रमुख होता है और ग्रहस्थ की भूमिका गौण होती है वहीं पञ्चमहायज्ञ को ग्रहस्थ बिना किसी पुरोहित के सम्पन्न कर सकता है। dsc-38911
यश्नरूप में मौजूद है। संस्कृत का यज्ञ ही फारसी का यश्न है। दरअसल भारतीय आर्यो और ईरानियों का उद्गम आर्यों के एक ही कुटुम्ब से हुआ जिसकी बाद में दो शाखाएं हो गई। गौरतलब है कि प्राचीन ईरानी या फारसवासी अग्निपूजक थे। पारसी आज भी अग्निपूजा करते है । पारसी शब्द भी अग्निपूजकों के एक समूह के फारस से पलायन कर भारत आ जाने के कारण चलन में आया। यज्ञ की परंपरा भारतीय और ईरानी दोनों ही दोनों ही आर्य शाखाओं में थी। वैदिक अग्निस्टोम एवं पारसियों के होम में बहुत समानता है। पारसी आनुष्ठानिक शब्दावली संस्कृत की यज्ञ संबंधी शब्दावली से बहुत मिलती जुलती है मसलन-अथर्वन, यज्ञ, सोम, सवन, स्टोम, होतृ, आहुति, मन्त्र आदि शब्द अवेस्ता, ईरानी और पारसी में भी किंचित रूपांतरों के साथ हैं। फारसी और हिन्दी भी एक ही भाषा परिवार से संबंधित हैं। फारसी का प्राचीन रूप अवेस्ता में जिसे यश्न कहा गया है और हिन्दी के प्राचीन रूप संस्कृत में जो यज्ञ के रूप में विद्यमान है। उत्तर पश्चिमी भारत में कई लोग इसे यजन भी कहते हैं। यह माना जा सकता है कि इरान में इस्लाम के आगमन के बाद यज्ञ ने अपने असली मायने खो दिए और यह केवल जलसे और उत्सव के अर्थ में प्रचलित हो गया । जबकि भारत में न सिर्फ यज्ञ की पवित्रता बरकरार रही बल्कि यज्ञ न करने वालों के लिए एक मौका जश्न का भी आ गया।
संस्कृत और फारसी के यज्ञ/यश्न शब्द की मूल धातु है यज् जिसका मतलब होता है अनुष्ठान, पूजा अथवा आहुति देना। ये सभी शब्द कहीं न कहीं समूह की उपस्थिति, उत्सव-परंपरा के पालन अथवा सामूहिक कर्म का बोध भी कराते हैं । जाहिर है ये सारे भाव जश्न में शामिल हैं जो अंततः यज्ञ के फारसी अर्थ में रूढ़ हो गए। गुजराती ब्राह्मणों का एक उपनाम है याज्ञिक जिसका याग्निक रूप भी प्रचलित है। याज्ञिक वह व्यक्ति होता है जो यज्ञ कराता है। यज्ञ के जरिये पुण्यकामना का इच्छुक व्यक्ति यजमान कहलाता है और यजमान की ओर से प्रतिकात्मक रूप से आहुति देता है। किसी वक्त यजमान की ओर से याजकर्म करानेवाले ब्राह्मणवर्ग को हीन समझा जाता था, मगर बाद में इनका रुतबा बढ़िता चला गया। है। यज् धातु से ही बना है इससे ही बन गया यजमानः जिसके सही मायने हैं जो नियमित यज्ञ करे। वह व्यक्ति जो यज्ञ के निमित्त पुरोहितों को चुनता है और व्यय वहन करता है। दानकर्म आदि करता है। इसी तरह यज्ञकर्मी ब्राह्मण के शिष्य को भी यजमान कहा जाता है। हिन्दी में इसके जजमान, जिजमान, जजमानी वगैरह जैसे कई रूप प्रचलित हैं। समाज के धनी, कुलीन, आतिथेयी अथवा प्रमुख पुरूष को भी यजमान कहने का चलन उत्तर भारत में रहा है। चार वेदों में प्रमुख यजुर्वेद को यह नाम भी यज् धातु के चलते ही मिला है क्यों कि ज्ञान का यह भंडार यज्ञ संबंधी पवित्र पाठों का संग्रह है। इसकी दो प्रमुख शाखाएं है कृष्णयजुर्वेद और शुक्लयजुर्वेद। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक पीपल, खैर, पलाश आदि अनेक वृक्षों को भी याज्ञिक की संज्ञा दी जाती
शास्त्रों में दो तरह के प्रमुख यज्ञ बताए गए हैं 1) श्रौत यज्ञ 2) पञ्चमहायज्ञ। दोनों प्रकार के यज्ञों में अंतर पुरोहित का है। श्रौतयज्ञ में जहां पुरोहित ही प्रमुख होता है और ग्रहस्थ की भूमिका गौण होती है वहीं पञ्चमहायज्ञ को ग्रहस्थ बिना किसी पुरोहित के सम्पन्न कर सकता है। धर्मशास्त्र का इतिहास में महामहोपाध्याय पाण्डुरंग वामन काणे लिखते हैं कि श्रौत यज्ञ ही मूलतः वैदिक यज्ञ कहे जाते हैं। पञ्चमहायज्ञ उसके बाद के हैं हालांकि इनकी व्यवस्था भी वैदिक काल से ही मिलती है। याद रहे यज्ञ के विधि विधान ऋग्वेद की ऋचाओं के प्रणयन के साथ साथ विकसित होते रहे। ऋग्वैदिक काल में प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकाल की अग्नियों को आहूति देने अर्थात यज्ञ करने की परिपाटी चल चुकी थी। पञ्चमहायज्ञों हैं -1) भूतयज्ञ 2) मनुष्य यज्ञ 3) पितृयज्ञ 4) देवयज्ञ और 5) ब्रह्मयज्ञ। जब सिर्फ अग्नि में समिधा दी जाए तो वह देवयज्ञ है। पितरों को तर्पण करना पितृयज्ञ है। जीवों को ग्रास या पिण्ड दिया जाता है तब वह भूतयज्ञ है। जब ब्राह्मणों या अतिथियों को भोजन दिया जाता है तो वह मनुष्य यज्ञ कहलाता है और जब स्वाध्याय किया जाता है, चाहे एक वैदिक ऋचा या वैदिक सूक्त का पाठ हो तो वह ब्रह्मयज्ञ कहलाता है।

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Tuesday, April 27, 2010

रासलीला और रहस का रहस्य

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प्रा चीन संस्कृति में प्रेम की उदात्त अभिव्यक्ति होती थी। कृष्ण की रासलीला इसका प्रतीक है। भक्तिकाव्य में रासलीला शब्द का खूब प्रयोग हुआ है। दरअसल रास एक कलाविधा है। प्रेम और आनंद की उत्कट अभिव्यक्ति के लिए कृष्ण की उदात्त प्रेमलीलाओं का भावाभिनय ही रासलीला कहलाता है। मूलतः यह एक नृत्य है जिसमें कृष्ण को केंद्र में रख गोपियां उनकी परिधि में मुरली की धुन पर थिरकती हैं। अष्टछाप के भक्तकवियों नें प्रेमाभिव्यक्ति करनेवाले अनेक रासगीतों की रचना की है। रास में आध्यात्मिकता भी है जिसमें गोपियों का कृष्ण के प्रति अनुराग व्यक्त होता है। वे वृत्ताकार मंडल में प्रेमाभिव्यक्ति करती हैं। इसमें जीव के आत्मा से मिलन का निहितार्थ भी ढूंढा जाता रहा है। रासलीला अब प्रसिद्ध लोकनाट्य शैली है और देश के विभिन्न प्रान्तों में krishna-raasयह प्रचलित है। मध्यकाल में इसमें जो आध्यात्मिकता थी वह धीरे धीरे गायब होती गई और विशुद्ध मनोरंजन शैलियों वाली गिरावट इस भक्ति और अध्यात्म को अभिव्यक्त करनेवाली विशिष्ट विधा में भी समा गई। वैसे आज भी बृज की रास मण्डलियां प्रसिद्ध हैं। कथक से भी रास को जोड़ा जाता है  किन्तु कथक की पहचान जहां एकल प्रस्तुति में मुखर होती है वहीं रास सामूहिक प्रस्तुति है। अलबत्ता रास शैली का प्रयोग कथक और मणिपुरी जैसी शास्त्रीय नृत्यशैलियों में हुआ है। इसके अलावा गुजरात का जग प्रसिद्ध  डांडिया नृत्य रास के नाम से ही जाना जाता है। रास का मुहावरेदार प्रयोग भी बोलचाल की भाषा में खूब होता है। रास रचाना यानी स्त्री-पुरुष में आपसी मेल-जोल बढ़ना। रास-रंग यानी ऐश्वर्य और आमोद-प्रमोद में लीन रहना।

रास शब्द रास् धातु से आ रहा है जिसमें किलकना, किलोल, शोरगुल का भाव है। इससे बना है रासः जिसमें होहल्ला, किलोल सहित एक ऐसे मण्डलाकार नृत्य का भाव है जिसे कृष्ण और गोपियां करते थे। इससे ही बना है रासकम् शब्द जिसका अर्थ नृत्यनाटिका है। कुछ कोशों में इसका अर्थ हास्यनाटक भी कहा गया है। दरअसल रासलीला जब कला विधा में विकसित हो गई तो वह सिर्फ नृत्य न रहकर नृत्यनाटिका के रूप में सामने आई। नाटक के तत्वों में हास्य भी प्रमुख है। रासलीला में हंसोड़पात्र भी आते हैं जो प्रायः रासधारी गोप होते हैं। इसलिए रासकम् को सिर्फ हास्यनाटक कहना उचित नहीं है। मूलतः रास् से बने रासकम् का ही रूप मध्यकालीन साहित्य की एक विधा रासक के रूप में सामने आया। रासक को एकतरह से जीवन चरित कहना उचित होगा जैसे पृथ्वीराज रासो या बीसलदेवरासो आदि जो वीरगाथा साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ हैं। विद्वानों का मानना है कि रास शब्द का रिश्ता संस्कृत के लास्य से भी है जिसमें भी नृत्याभिनय और क्रीड़ा का भाव है। एक ही वर्णक्रम में आते हैं। लास्य का ही प्राकृत रूप रास्स होता है।
संत ऋतु में बुंदेलखण्ड में एक प्रसिद्ध मेला रहस लगता है जिसका संबंध भी रास से जोड़ा जाता है। कुछ विद्वानों ने  रासो की व्युत्पत्ति रहस्' शब्द के रहस से जोड़ी है। रामनारायण दूगड लिखते हैं- रास या रासो शब्द रहस या रहस्य का प्राकृत रुप मालूम पड़ता है। इसका अर्थ गुप्त बात या भेद है। जैसे कि शिव रहस्य, देवी रहस्य आदि ग्रन्थों के नाम हैं, वैसे शुद्ध नाम पृथ्वीराज रहस्य है जोकि प्राकृत में पृथ्वीराज रास, रासा या रासो हो गया। डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल और 19July06कविराज श्यामदास के अनुसार रहस्य पद का प्राकृत रुप रहस्सो बनता है, जिसका कालान्तर में उच्चारण भेद से बिगड़ता हुआ रुपान्तर रासो बन गया है। रहस्य> रहस्सो> रअस्सो >रासो इसका विकास क्रम है। बुंदेलखण्ड में सागर के पास गढ़ाकोटा के प्रसिद्ध रहस मेला के संदर्भ में भी इसी रहस्य शब्द का हवाला दिया जाता है। बताते हैं कि अंग्रेजो के खिलाफ बुदेलों की क्रांति की योजनाएं इसी मेले में बनती थीं यानी मेले की आड़ में यह काम किया जाता था। मान्यता है कि मेला लगना ही इसलिए शुरू हुआ था। गोपनीयता के अर्थ में इस आयोजन से रहस शब्द जुड़ा और फिर इसका तद्भव रूप रहस् सामने आया। मगर यह बात प्रामाणिक नहीं लगती। मेले में गोपनीय सूचनाओं का आदान-प्रदान संभव है किन्तु इसी उद्धेश्य से यह आयोजन शुरू हुआ है यह बात अविश्सनीय और अव्यावहारिक लगती है।
संस्कृत का रहस शब्द बना है रहस् धातु से। इसकी अर्थवत्ता व्यापक है। मूलतः इसमें एकान्त, निर्जनता, एकाकीपन, एकान्तवास, सूनसान स्थान, गुप्तवार्ता, भेद की बात जैसे अर्थ समाहित हैं। इसका एक अन्य अर्थ केलि, किलोल, क्रीड़ा, कामक्रिया भी है। समझा जा सकता है कि प्राचीनकाल की जनपदीय संस्कृति में युवक-युवतियों के मिलने-जुलने से जुड़े ऐसे आयोजन आम थे। ये आयोजन स्वतःस्फूर्त होते थे। कुलीनों के वसंतोत्सव से हटकर इनकी सामाजिक संरचना बस्तर के घोटुल के जरिये समझी जा सकती है। भाव यही है कि युवक-युवतियों का आपसे में मिलना गोपनीय व्यवहार है। इस संदर्भ में गुप्त बात, भेद, गूढ़ता, आचरण की विचित्रता जैसे लक्षणों को ही रहस्य के अंतर्गत समझना चाहिए न की जासूसी या गुप्तचरी वाले भाव इसमें जोड़ने चाहिए। हालाँकि इसका विकास फ़ारसी के राज़ में नज़र आता है जहाँ इन्हीं अर्थों में इसका प्रयोग होता है ।  निश्चित ऋतु और निश्चित स्थान पर तरुण-तरुणियों का ऐसा आचरण जब आम हो गया तब इस स्वतः स्फूर्त आयोजन ने रहस् मेले का रूप लिया। यहां समझें कि समूह में भी कोई जोड़ा अपनी निजता और गोपनीयता के साथ ही खुद में लीन होता है।
विद्वानों और आलोचकों में रास शब्द पर बड़ा विवाद है। अवध, बुंदेलखण्ड और छत्तीसगढ़ की लोककला विधा रहस से भी इस रास का रिश्ता जोड़ा जाता है। वैसे रास के छह रूपांतर हिन्दी की शैलियों में देखने को मिलते हैं जैसे- रास, रासा, रासो, रासौ, रायसा, रायसौ। इसी तरह इसकी व्युत्पत्ति के आधार स्वरूप भी छह शब्दों को वक्तन फ वक्तन सामने रखा जाता रहा है मसलन-रहस्य, रसायण, राजादेश, राजयश, रास और रासक। यह तय है कि रास शब्द की व्युत्पत्ति न तो रहस से हुई है और न ही रहस शब्द का जन्म रास से हुआ है। इसी तरह फिरंगियों के विरुद्ध गोपनीय सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए ये आयोजन शुरू हुए यह कहना भी गलत है। अलबत्ता रहस का रहस्य से रिश्ता है और दो प्रेमी हृदयों के आपसी मिलन के भेद में ही रहस का रहस्य निहित है। अब मेलों-ठेलों की गहमा-गहमी में चोर पुलिस का खेल भी होता है और षड्यंत्रों को अंजाम भी दिया जाता है। यह उसके उद्धेश्य नहीं बल्कि लाभ हैं। विद्वानों नें रास का रिश्ता राजादेश, राजसूय, रसायण और राजयश जैसे विभिन्न शब्दों से जोड़ा है जो साहित्यिक कल्पनाशीलता के उत्कृष्ट नमूनें हैं, मगर प्रामाणिक नहीं।
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Sunday, April 25, 2010

झांकिए इस एलबम में

पिछली कड़ी- बालकनी और बालाखाना में बाले-बाले से आगे

"एलबम  बना है लैटिन के एल्बस elbus से जिसमें शुभ्रता का भाव है। एल्ब का एक अर्थ चर्च में पहना जाने वाला सफेद चोगा भी होता है। एल्बस से बने लैटिन के एलबम का अर्थ था सफेद या शुभ्र।.
अंग्रेजी के रास्ते हिन्दी में अपनी खास जगह बना चुके शब्दों में एलबम का शुमार है जिसका कोई प्राकृत, आसान या मौलिक विकल्प हिन्दी में नहीं है। ऐसी जिल्द या पोथी जिसमें तस्वीरों को बेहतर ढंग से प्रदर्शित किया गया हो, एलबम कहते हैं। म्युजिक रिकार्ड के लिए भी बीते कुछ दशकों से म्युजिक एलबम शब्द प्रचलित हो चुका है। एलबम शब्द भी भारोपीय भाषा परिवार का है और इसकी रिश्तेदारी हिन्दी, उर्दू, फारसी, हिब्रू समेत कई यूरोपीय शब्दों से है जिनके मूल में ऊंचाई, प्रकाश, चमक, भव्यता और शुभ्रता का भाव दर्शानेवाला शब्द बाल bal (baal) है। मिलते जुलते भाव व्यक्त करनेवाली एक से अधिक धातुओं में  निकट संबंध भी होता है। प्राचीन भारोपीय धातु *alb- पर गौर करें ( कुछ लोग इसे गैर भारोपीय धातु भी मानते हैं)। अगर इसके वर्णों का क्रम बदल दिया जाए तो इसका एक रूप bal भी बनता है। एल्ब *alb- का अर्थ है श्वेत, सफेद, धवल, पहाड़, पर्वत। इससे मिलती जुलती प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार की एक धातु है *albho-जिसमें भी यही भाव है और माना जाता है कि इसका विकास *alb-से हुआ है।
मुझे लगता है अगर भाव और अर्थ की समानता देखें तो bal का alb में रूपांतर शुद्धतः वर्णविपर्यय का मामला है। चमक, द्युति, प्रकाश में ऊंचाई के साथ शुभ्र, सफेद या धवल का भाव भी है। पूर्व से पश्चिम तक फैली यूरोप की प्रसिद्ध पर्वत शृंखला का नाम एल्प्स है। यह नाम इसी मूल से आ रहा है। ध्यान रहे आल्प्स के न सिर्फ उच्च शिखरों पर हमेशा बर्फ जमी रहती है बल्कि साल के कुछ महीनों में इसके पठारी हिस्से भी सफेद चादर से ढके रहते हैं। alps में alb धातु साफ दिखाई पड़ रही है। एल्ब का अर्थ ऊंचाई और शुभ्रता या सफेदी का भाव आल्प्स alps पर्वत में स्पष्ट हो रहा है। पर्वतीय  या पहाड़ी के अर्थ में एल्पाईन शब्द भी इसी मूल से आ रहा है। दक्षिण यूरोपीय देशों को बाल्कन देश कहा जाता है जिसमें मुख्यरूप से अल्बानिया, बोस्निया-हर्जेगोविना, बुल्गारिया, ग्रीस, कोसोवो, मेसीडोनिया और मोन्टेनीग्रो शामिल हैं। यह बाल्कन balkan शब्द भी इसी शब्द शृंखला का हिस्सा है। दक्षिण यूरोप के जिस क्षेत्र में ये देश हैं वह बाल्कन पर्वत शृंखला कहलाती है। बाल्कन एक तुर्की शब्द है जिसका अर्थ है वृक्षाच्छादित पर्वतीय क्षेत्र। बाल्कन का तुर्की रूप बालगन भी होता है। जाहिर है यह बाल शब्द यहां भी पर्वत, ऊंचाई और आश्रय के अर्थ में ही आ रहा है और तुर्की में इसकी व्याप्ति इंडो-ईरानी भाषा समूह से हुई होगी। इन देशों के लिए बाल्कन शब्द का प्रयोग तब से शुरू हुआ जब इस क्षेत्र पर तुर्की का प्रभुत्व हुआ। युगोस्लाविया के विभाजन के बाद बाल्कन शब्द अब यहां नकारात्मक विशेषण माना जाता है और यूरोप का आम आदमी इसे सदर्न यूरोप कहना ज्यादा पसंद करता है। यूरोप का सर्वाधिक मुस्लिम बहुल क्षेत्र भी यही है। अल्बानिया के मूल में यही एल्ब alb है। बालकन शृंखला दरअसल एल्प्स का ही एक हिस्सा है। अल्बानिया एक पहाड़ी देश है और एल्ब में निहित उच्चता का भाव इसे पहाड़ी राज्य के रूप में सार्थक कर रहा है। अल्बानिया का प्राचीन नाम शिपरिया है जिसका अर्थ है बाज का देश। यहां भी बाज की ऊंची उड़ान देखिए!!!
114561-050-C3AC3C4Eही बात एलबम में भी है जो बना है लैटिन के एल्बस elbus से जो इसी मूल से निकला है और जिसमें शुभ्रता का भाव है। एल्ब का एक अर्थ चर्च में पहना जाने वाला सफेद चोगा भी होता है। एल्बस से बने लैटिन के एलबम का अर्थ था सफेद या शुभ्र। यहां शुभ्रता में खालीपन या कोरापन भी समाया है। ठीक उसी तरह जैसे कोरा के अर्थ में हम साफ शब्द का प्रयोग करते हैं। स्वच्छता के लिए साफ-सफाई का इस्तेमाल करते हैं। भाव कोरेपन का ही रहता है। दाग-धब्बे रहित जो है, वह धवल है, शुभ्र है। बाद में एलबम का अर्थ हुआ सफेद, कोरे कागज पर बनाई जानेवाली सूचियां अथवा सार्वजनिक स्थलों पर लगाए जानेवाले राजकीय इश्तहार या अन्य सूचनाएं। मध्यकाल में एलबम शब्द का प्रयोग चित्रों की पोथी के रूप में शुरू हुआ। एल्ब धातु से एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द बना है एल्बीनो जो एक तरह का चर्म रोग होता है। भारत में इस रोग से ग्रस्त लोगों को सूरजमुखी या भूरा कहते हैं। ब्रिटेन और स्कॉटलैंड के क्षेत्र को किसी जमाने में एल्बिओन कहा जाता था क्योंकि यह समूचा इलाका सफेद चट्टानोंवाला है। अंडे की सफेदी के लिए एल्बुमिन नाम भी इसी मूल से जुड़ा है। [समाप्त]

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बालकनी और बालाखाना में बाले-बाले

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हि न्दी में दुछत्ती या छज्जे के लिए अंग्रेजी से आयातित बालकनी शब्द आम है और हिन्दी की विभिन्न शैलियों सहित भारत की ज्यादातर भाषाओं में इस्तेमाल होता है। बालकनी का बाल शब्द बहुत महत्वपूर्ण है और इसकी अर्थवत्ता बहुत व्यापक है जिसमें शीर्षस्थ, प्रकाशमान, ऊपरी, बड़ा, परमशक्तिमान, भव्य, देवता अथवा स्वामी जैसे भाव समाए हैं। बालकनी भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और इसका रिश्ता बहुत गहराई से न सिर्फ इंडो-ईरानी भाषा परिवार से जुड़ता है बल्कि इसकी अर्थछायाएं पश्चिम एशियाई सांस्कृतिक आधार वाली भाषाओं यानी सुमेरी ( मेसोपोटेमियाई), बाबुली (बेबिलोनियन) और इब्रानी (हिब्रू) में भी नजर आती है। सुमेरी यानी मेसोपोटेमियाई भाषा में यह शब्द बेल है और हिब्रू में बाल Baal के रूप में मिलता है। हिन्दी, उर्दू व फारसी में भी यह प्रचलित है। लोगों को रत्ती भर खबर हुए बिना अंजाम दी गई कारगुजारी को बाले बाले (बाला बाला) कहते हैं। यहां ऊपर ऊपर मामले को निपटाने का भाव ही प्रमुख है। पुराने ज़माने में मकान की ऊपरी मंजिल को बालाखाना कहते थे। बाला यानी ऊपर और खाना यानी स्थान या कोष्ठ। अग्रेजी की बालकनी में भी ऊंचाई का ही भाव है।
प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की ध्वनि फारसी, ईरानी समेत सेमिटिक भाषाओं में जाकर में बदलती रही है। संस्कृत के भर्ग में भी ऊंचाई का भाव है। इसका फारसी रूप बुर्ज होता है जिसका अर्थ मीनार या ऊंचा गुम्बद है। बुर्ज का  huangshan ही यूरोपीय भाषाओं में बर्ग, बरो में रूपांतर होता है। कई स्थान नामों में यह जुड़ा नजर आता है। प्राचीन मनुष्य की शब्दावली और उसकी अर्थवत्ता का विकास प्रकृति के अध्ययन से ही हुआ था। प्रायः ऊंचाई को इंगित करनेवाले शब्दों का मूलार्थ रोशनी, चमक, दीप्ति था। प्रकाशमान वस्तु के रूप में मनुष्य ने आसमान में चमकते खगोलीय पिण्डों को ही देखा था। पूर्व वैदिक भाषाओं में भा ध्वनि में इसीलिए ऊंचाई के साथ चमक, कांति का भाव भी निहित है। संस्कृत के भर्गस् में एक साथ चमक, प्रकाश, भव्यता का भाव निहित है। The Nostratic macrofamily: a study in distant linguistic relationship पुस्तक में एलन बोम्हार्ड, जॉन सी कर्न्स  ने विभिन्न भाषा परिवारों में प्रकाश और ऊंचाई संबंधी समानता दर्शानेवाले कई शब्द एक साथ रखे हैं। प्रोटो एफ्रोएशियाटिक भाषा परिवार की धातुओं bal और bel का अर्थ भी यही है और प्रोटो सेमिटिक के bala / bale में भी यही भाव है। स्पष्ट है कि प्राचीन भारोपीय ध्वनि भा यहां बा में बदल रहा है। गहराई से देखें तो भा ध्वनि में निहित चमक का भाव विभा, विभाकर, भास्कर जैसे शब्दों में साफ है। तमिल-तेलुगू के pala pala में भी कांति, दीप्ति, चमक का भाव है।  भा के बा में बदलने की मिसाल वजन के अर्थ में हिन्दी के भार और फारसी के बर या बार (बारदान, बारदाना, बोरी) से भी स्पष्ट है। ध्यान दें, बहुत महीन अर्थ में यहां भी ऊंचाई का भाव है। जिसे ऊपर उठाया जाए, वही भार है। अंग्रेजी के बर्डन में यही बार छुपा हुआ है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं।
श्रय से जुड़े शब्दों के निर्माण की प्रणाली मूलतः एक जैसी ही रही है। बालकनी भी एक आश्रय है। बालकनी की संरचना पर गौर करें। यह स्तम्भ या खम्भे पर टिकी होती है। इसकी मूल प्रोटो इंडो यूरोपीय धातु है *bhelg- जिसका अर्थ है स्तम्भ या आधार। स्तम्भ, मीनार, ऊंचाई, पर्वत शृंखला, पहाड़ी आदि अर्थों में विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में इससे अनेक शब्द बने हैं जैसे ओल्ड स्लोवानी में balko, ओल्ड हाई जर्मन में balcho, लिथुआनी में balziena और ओल्ड इंग्लिश में balca आदि। इसका इतालवी रूप हुआ balcone. प्रोटो इंडो यूरोपीय धातु *bhelg- से प्राचीन जर्मनिक में *balkan- धातु विकसित हुई जिसके ये तमाम रूप थे और अंग्रेजी का बालकनी शब्द इससे ही विकसित हुआ है। विद्वानों का यह भी मानना है कि छज्जे के अर्थ में बालकनी का विकास इसी शब्द शृंखला में आनेवाले तुर्की-ईरानी bālkāneh से हुआ है। इसका एक रूप pālkāneh भी है। फारसी के बालाखाना से इनकी सादृश्यता गौरतलब है जिसका अर्थ ऊपरी मंजिल होता है। बाला यानी ऊपर और खाना यानी कक्ष। अंग्रेजी का बालकनी इसी का रूपांतर लगता है।
डॉ भगवत शरण उपाध्याय, भारतीय संस्कृति के स्रोत पुस्तक में लिखते हैं कि यह शब्द सुमेरी मूल से उठकर बाद में बेल या बाल के रूप में संस्कृत में समा गया। सुमेरी संस्कृति में इसका मतलब होता है -सर्वोच्च, शीर्षस्थ या सबसे ऊपरवाला। हिब्रू में इसका मतलब होता है परम शक्तिमान, देवता अथवा स्वामी। हिन्दी के बालम, बलमा जैसे शब्द यहीं से आ रहे हैं। पति या भर्तार के अर्थ में बलमा, बालम में भी स्वामी का ही भाव है। गौरतलब है कि लेबनान की बेक्का घाटी में बाल देवता का मंदिर है। जानकारों के मुताबिक सुमेरियों के बाल देवता का रूपांतरण ही बाद में रोमन जुपिटर के रूप में हुआ। गौर करें की दूध के ऊपर जो क्रीम जमती है उसे हिन्दी में मलाई कहते हैं। मलाई को उर्दू, फारसी और अरबी में बालाई कहते हैं क्योंकि इसमें भी ऊपरवाला भाव ही प्रमुख है। जो दूध के ऊपर हो वही बालाई। हिन्दी में इसका प्रवेश विदेशज की तरह हुआ फिर मलाई बनकर यह हिन्दी का ही हो गया। की जगह ने ले ली। गौरतलब हैं कि ये दोनों ही अक्षर एक ही वर्णक्रम में आते हैं और अक्सर इनमें अदल-बदल होती है। रोम या केश को बाल इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वे शरीर के ऊपर या सिर जो सर्वोच्च है, के ऊपर होते हैं। रूस की बोल्शेविक क्रांति दुनिया में प्रसिद्ध है। बोल्शेविक का शाब्दिक अर्थ हुआ बहुसंख्यक। मगर इसमें भी बाल यानी सर्वशक्तिमान की महिमा नजर आ रही है। -जारी

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Saturday, April 24, 2010

आंच पर खदबदाती ज़िंदगी [बकलमखुद-135]

पार्टी का मैं एक सामान्य कार्यकर्ता था और बहस के ऊंचे मंचों से मेरी कोई वाकफियत नहीं थी। लेकिन मन में यह आग जरूर थी कि जिंदगी अगर एक सपने के लिए होम की जा रही है तो वह कोई घटिया सपना नहीं होना चाहिए।
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 133 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का तेरहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या chandu_thumb[8]शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
लं बी पंजाब यात्रा के बाद दिल्ली वापस लौटा तो 40, मीनाबाग का व्यवस्था पक्ष देखने वाले पार्टी के एक होलटाइमर तिवारी जी ने बताया कि आपके भाई आए थे एक आदमी के साथ, फोन नंबर देकर गए हैं। फोन किया तो पता चला तीन-चार दिन पहले ही दिल्ली पहुंचे हैं, बिड़ला मिल घंटाघर के पास अपने एक पुराने परिचित के साथ रह रहे हैं। 1983 में बहन की मौत और मंझले भाई की खुदकुशी के बाद से बड़े भाई गांव में ही रह रहे थे। खेती से खाने भर को अनाज निकाल लेते थे और कुछ पूजा-पाठ से थोड़ी-बहुत नकदी का इंतजाम कर लेते थे। पिता जी की स्थिति अब कुछ कमाने की रह नहीं गई थी और उनकी मुख्य भूमिका पोते-पोतियों का मनोरंजन करने की ही रह गई थी। इन आठ सालों में भाई दिल्ली का अपना जीवन लगभग भूल ही गए थे। मुलाकात हुई तो घड़े में रखी हुई सी मुचड़ी-खुचड़ी पैंट-शर्ट और दोनों पैरों में बिना मोजे के दो अलग-अलग आकार वाले लाल रंग के जूते पहने हुए थे। पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले ही इन्हें लाल किले के पीछे वाले कबाड़ी बाजार से खरीदा गया है। बोले, मेरे पास कोई पेन नहीं है, एक पेन खरीद दो, और क्या इधर-उधर आने-जाने भर को कुछ पैसों का इंतजाम हो सकता है। मैंने दीपंकर जी से 100 रुपये लेकर उन्हें दिए और नीचे आकर उन्हें बस स्टॉप तक छोड़ने के क्रम में एक पेन भी खरीद दिया। अपने से 13 साल बड़े और 1976 के एम.ए. पास अपने भाई को इस रूप में देखना अजीब था।
हत्वाकांक्षी लोग सपनों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। मुझे किशोरावस्था का जो अपना सबसे महत्वाकांक्षी सपना याद है, उसमें मैंने अपने बड़े भाई को हाथ में घड़ी बांधे, नई साइकिल पर पान चबाते हुए बाजार से घर की तरफ आते देखा था। वह सपना हकीकत कभी नहीं बन सका। घड़ी और साइकिल लंबे समय तक हमारे लिए सपना ही बनी रही और फिर जेहन से ऐसे उतर गई, जैसे ऐसी चीजें दुनिया में होती ही न हों। और अब उन्हीं भाई को मैं दोनों पांवों में दो अलग-अलग साइज के लाल जूते पहने देख रहा था- आठ साल गांव में खेती-किसानी करते गुजार देने के बाद, साल-साल भर के अंतर से पैदा हुए चार बच्चों का बाप बन जाने के बाद दिल्ली में एक बार फिर अपनी रोजी-रोटी का सिलसिला शुरू करने का मन बनाते हुए। उनकी कोई मदद मुझसे नहीं हो पाई, सिवाय एक बार पटना में उनके लिए कुछ काम खोजने के मामूली से प्रयास के। मेरे दोस्त राजीव के पापा उसके मौसा जी के साथ मिल कर बेगूसराय में आम और लीची का पल्प और सॉफ्ट ड्रिंक बनाने का कारखाना खोलने का मन बना रहे थे। भाई को मैंने उनसे मिलवाया और उन्होंने  पूर्वी उत्तर प्रदेश में मार्केट पोटेंशियल का पता लगाने की जिम्मेदारी भाई को सौंपी। पंद्रह-बीस दिन यह कसरत उन्होंने की भी लेकिन वह कारखाना ही जमीन पर नहीं उतर सका।
भाई के गांव प्रवास के इन आठ सालों में सात मेरी होलटाइमरी के थे और इस बीच कुल तीन या चार बार मेरी उनसे मुलाकात हो picपाई थी। कभी किसी संयोग से घर चला जाता था तो वह जगह बिल्कुल मेरी पहचान में नहीं आती थी। वह अब भाभी और उनके बच्चों का घर था, जो मुझे लगभग किसी अजनबी की तरह ही देखते थे। गांव के दोस्त-मित्र ज्यादातर नौकरी-चाकरी में चले गए थे। जो बचे थे, वे यह जानकर हैरान रह जाते थे कि इतना पढ़-लिख कर भी मैं नौकरी-चाकरी कुछ नहीं करता। इसके बावजूद भाई गांव में मेरे लिए यह माहौल बनाए रखते थे कि मैं बहुत बड़ा पत्रकार हूं और पैसे भले न कमाऊं लेकिन मेरा लिखा बंबई तक पढ़ा जाता है। मैं नहीं जानता कि उस दिन 40, मीनाबाग में मिले 100 रुपये भाई के कितने काम आए, लेकिन दिल्ली में धीरे-धीरे करके अपना धंधा उन्होंने जमा ही लिया। इसके पांच-छह साल बाद जब दिल्ली में मुझे रोजी-रोटी की फिक्र करनी पड़ी तो उनकी हैसियत हर मामले में मेरे बड़े भाई जैसी हो चुकी थी। एक बार कमरे का किराया देने के लिए मैंने उनसे एक महीने के लिए एक हजार रुपया उधार भी लिया, लेकिन सिर्फ एक बार ही, क्योंकि ऐसी किसी मदद के एवज में अपनी होलटाइमरी और लेफ्टिस्ट पागलपंथी पर उनकी एक हजार बातें सुनने की हिम्मत मैं दोबारा नहीं जुटा सकता था।
1990 के माहौल पर वापस लौटें तो देश के व्यापक राजनीतिक परिवेश से हमारे केंद्रीय नेतृत्व का कटाव इस बात से समझा जा सकता है कि जब दिल्ली में मंडल और मंदिर की रूपरेखा तैयार हो रही थी तब दिल्ली में हम लोग मार्क्सवाद के सैद्धांतिक पक्ष को लेकर एक पार्टी प्लेनम में जुटे हुए थे। इस विसंगति के बावजूद विचारधारा को लेकर यह मेरे जीवन की सबसे सघन एक्सरसाइज थी। रूस के भीतर येल्त्सिन फिनोमेना की शुरुआत हो गई थी और गोर्बाचेव का आभामंडल तक तक क्षीण होने लगा था, लेकिन दुनिया के समाजवादी हलकों में उनके विचारों की ऊष्मा अब भी बनी हुई थी। सीपीआई-एमएल को उनके बारे में कोई स्थिर राय बनानी थी और दिल्ली पार्टी प्लेनम का मुख्य उद्देश्य यही था। यह कहना किसी को शायद मेरा बड़बोलापन लगे लेकिन इस प्लेनम और 1992 की कोलकाता पार्टी कांग्रेस में विचारधारा को लेकर सबसे ज्यादा बहसें मैंने ही कीं।
पार्टी का मैं एक सामान्य कार्यकर्ता था और बहस के ऊंचे मंचों से मेरी कोई वाकफियत नहीं थी। लेकिन मन में यह आग जरूर थी कि जिंदगी अगर एक सपने के लिए होम की जा रही है तो वह कोई घटिया सपना नहीं होना चाहिए। भारत में कम्युनिज्म को रूसी और चीनी सीमाओं के साथ अमल में लाने की बात को मैं बिल्कुल पचा नहीं पाता था। भला यह कैसा सिस्टम है, जिसमें सत्य, न्याय और स्वतंत्रता कोई मूल्य नहीं है। एक दिन पटना में रूसी क्रांति के युवा नेता बुखारिन पर एक खोजी रिपोर्ट पढ़ने के बाद मैंने अपने नेता वीएम को घेर लिया- कॉमरेड, स्तालिन का रूस आखिर कैसा समाज था, जिसमें सत्य कोई मूल्य ही नहीं था, जिसमें क्रांति के चौदह साल बाद लगभग सारे क्रांतिकारी नेताओं को क्रांति विरोधी करार देकर मार दिया गया। वीएम ने बहुत सोचने के बाद एक लाइन का जवाब दिया-  ट्रुथ इज नॉट समथिंग टु बी फाउंड ऑन सर्फेस, ट्रुथ इज समथिंग टु बी सीक्ड आउट (व्याकरण के अनुसार शायद यह सॉट आउट हो, लेकिन वीएम ने कहा यही था)। मैं उनकी इस बात से तो सहमत था कि रूस की सच्चाइयां जानने के लिए हमें इंतजार करना चाहिए, लेकिन खुद को पेटी बुर्जुआ बता दिए जाने के डर से अपने सवालों को ठंडे बस्ते में डालzad देने के लिए कतई तैयार नहीं था।
म सर्वहारा के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन अपने लिए भी तो लड़ रहे हैं। हमारी लड़ाई जमीन और नौकरी के लिए नहीं, मनुष्य को उसकी सभी आजादियों के साथ देखने के लिए है- उसके लिए है, जिसे मार्क्स क्रांति कहा करते थे और जिसका वादा लेनिन और माओ ने भी अपने समाज से कर रखा था। 1990 में मुझे लगता था कि गोर्बाचेव की डेमोक्रेटिक सोशलिज्म की अवधारणा ही हमारे सपनों के समाज के सबसे ज्यादा करीब है। डेमोक्रेटिक सोशलिज्म और सोशल डेमोक्रेसी में बुनियादी फर्क विशेषण और विशेष्य का है, जिसके बारे में यहां विस्तार में जाने की जगह नहीं है। सोशल डेमोक्रेसी की सबसे अच्छी मिसालें नॉर्वे और स्वीडन को माना जाता है लेकिन ये देश भी एकाधिकारवादी पूंजी की बुराइयों से मुक्त नहीं हैं- खासकर स्वीडन की बोफोर्स तोप को लेकर उस समय चल रही कुछ ज्यादा ही सघन चर्चा यह साफ करने के लिए काफी थी। मुझे गोर्बाचेव की राजनीति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, रूसी समाज में उनकी राजनीतिक हैसियत के बारे में भी मुझे खास पता नहीं था। लेकिन उनकी पेरेस्त्रोइका मैंने ठीक से पढ़ी थी। यह कोई दिलचस्प किताब नहीं थी। रूस की गैर साहित्यिक किताबें वैसे भी काफी बोर हुआ करती हैं और यह तो बाकायदा एक राष्ट्रपति की लिखी हुई किताब ही थी। लेकिन इसकी कई बातों में दम था इसलिए कई सिटिंग में जैसे-तैसे करके मैं इसे पढ़ ही गया था। पार्टी की राय 1990 प्लेनम में गोर्बाचेव को खारिज करने की थी, लेकिन मैंने मंच से कई-कई बार उनके बारे में इंतजार करने की दलीलें दीं। यहां तक कहा कि गोर्बाचेव रहें या भाड़ में जाएं, लेकिन सोशलिज्म विद डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन फेस वाली उनकी बात को कतई छोड़ा न जाए।
न गंभीर बहसों से परे हमारे राजनीतिक गढ़ बिहार में एक नया ही खेल शुरू हो गया था। बिहार में एक अजीब राजनीतिक बीजगणित के जरिए सत्ता में आए लालू यादव ने अपनी डगमगाती सत्ता के लिए दो बड़े मजबूत पाए खोज लिए थे। मंडल आयोग की अनुशंसाओं के जरिए अपने इर्द-गिर्द पिछड़ा गोलबंदी बनाने के साथ ही उन्होंने बिहार पहुंची राम रथयात्रा के अगुआ लाल कृष्ण आडवाणी की सांकेतिक गिरफ्तारी करके राज्य के मुसलमानों को भी अपना भक्त बना लिया था। बिहार की राजनीति अभी तक कांग्रेस के पक्ष या विपक्ष के दो ध्रुवों के बीच ही घूमती आई थी, जिसमें हमारे लिए अच्छी-खासी जगह बन गई थी। लेकिन अक्टूबर 1990 के सिर्फ एक महीने में इस विशाल राज्य में कांग्रेस की जड़ ही खत्म हो गई। राजनीति में इतना बड़ा बदलाव इतने कम समय में शायद ही कभी आया हो। हमें इसका पता नहीं चला तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। बिहारी राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी जगन्नाथ मिश्रा भी यही मानते थे कि लालू यादव एक साल से ज्यादा बिहार की गद्दी पर नहीं रह पाएंगे। लेकिन हमें इसका अंदाजा नहीं था कांग्रेस की तरह हमें भी अपनी इस नासमझी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। हालत यह हुई कि चंद्रशेखर की सरकार गिरने के बाद अप्रैल-मई 1991 में जब नए आम चुनाव के लिए मैं दिल्ली से आरा पहुंचा तो लोगों के बीच घूमते हुए लगता ही नहीं था कि यह वही जगह है जहां मात्र सवा साल पहले हमने इतनी अच्छी जीत हासिल की थी।

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Friday, April 23, 2010

पहले आडम्बर फिर विडम्बना…

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सामान्य तौर पर अपने बर्ताव में दिखावा या ढोंग करने वाले को पाखंडी कहा जाता है। अपने हावभाव, रहनसहन और चरित्र में दिखावा करनेवाले नकली लोगों का चरित्र अक्सर एक कृत्रिम आवरण avaran में लिपटा रहता है जिसके जरिये वे जैसे होते है, उससे अलहदा दिखने की कोशिश करते हैं ऐसे लोगों को मुहावरेदार भाषा में लिफाफेबाज भी कहा जाता है। यह व्यवहार आडम्बर और दिखावा की श्रेणी में आता है। ढकोसला dhakosla और आडम्बर adambara भी इसी श्रेणी के शब्द हैं और बोलचाल की हिन्दी में खूब प्रयुक्त होते हैं। ढकोसला दरअसल पहेली, मुहावरा या लोकोक्ति जैसी ही वाग्विलास की एक विधा का नाम भी है।
कोसला में मूलतः दूसरों को धोखा देकर अपना मंतव्य सिद्ध करने का भाव है। कपटपूर्ण व्यवहार इसके मूल में है। सामान्य बोलचाल में निष्प्रयोजनीय मगर विशिष्ट व्यवहार के संदर्भ में भी ढकोसला शब्द का इस्तेमाल होता है हालांकि भ्रम का संजाल रचना, मिथ्या-माया की रचना करना ताकि किसी विशेष प्रयोजन से कार्यसिद्धि हो सके वाला भाव ही इसमें खास है। हिन्दी शब्दसागर और बृहत प्रामाणिक हिन्दीकोश में ढकोसला की व्युत्पत्ति ढंग-कौशल शब्दयुग्म से बताई गई है। दरअसल यह शब्द, संधि का नहीं बल्कि समास का उदाहरण है। प्रपंच-पाखंड के संदर्भ में ढंग-कौशल शब्दयुग्म का प्रयोग ही ढकोसला शब्द के मूल में है। ढंग-कौशल > ढंकोशल > ढकोसल > ढकोसला के क्रम में ढकोसला का विकास हुआ, ऐसा ज्यादातर विद्वानों का मानना है। ढकोसला एक प्रकार की काव्यविधा भी है जिसमें वैचित्र्यपूर्ण ढंग से कई असंगत-अनमेल बातें एक साथ कही जाती हैं जिनका होना लगभग a-sad- असंभव होता है जैसे खुसरो की यह बात-भादों, पक्की, पीपली, झड़-झड़ पड़े कपास। बी मेहतरानी दाल पकाओगी या नहा ही सो रहूं। या फिर हाथी चढ़ल पहाड़ पर बिनि बिनि महुआ खाई। चीटी भरलसि बघ के, उलुटा पैर उठाई।। कृष्णदेव उपाध्याय लोकसंस्कृति की रूपरेखा पुस्तक में लिखते हैं कि ढकोसले पहेलियों से भिन्न होते हैं। पहेलियों मे प्रश्न और उनके उत्तर सार्थक होते हैं परन्तु ढकोसला में सभी बातें ऊटपटांग, असंभव तथा निरर्थक होती हैं। इनका उद्धेश्य एक मात्र मनोरंजन करना तथा हास्य रस की सृष्टि करना है। संस्कृत नाटको में, प्राचीन काल में ही ऐसे ढकोसले पाए जाते थे जिनका अर्थ नहीं बल्कि अर्थहीनता में ही सुसंगति होती थी।
ब आते हैं आडम्बर पर। आडम्बर यानी ढकोसला, पाखण्ड, दिखावा आदि। आपटे कोश के मुताबिक आडम्बर का मतलब घमंड, हेकड़ी, दिखावा, बाहरी ठाटबाट होता है। संस्कृत में डम्बर शब्द में भी घमंड, अहंकार आदि का भाव है। आडम्बर बना है डम्ब धातु में उपसर्ग लगने से। डम्ब का अर्थ है उपहास करना, हंसी उड़ाना, खिल्ली उड़ाना, ठगना-धोखा देना आदि। इस तरह आडम्बर शब्द में दिखावा का भाव स्थिर हुआ। आडम्बर का एक भाव नकल करना, सादृष्यता स्थापित करना, नकल करना जैसे भाव है। हिन्दी में भाग्य, काल या परिस्थिति के व्यंग्यपूर्ण प्रभाव को अभिव्यक्त करने के लिए विडम्बना शब्द का इस्तेमाल होता है जो इसी मूल से आ रहा है और डम्ब् धातु में वि उपसर्ग लगने से बना है। विडम्बना का सही अर्थ हंसी, उपहास, किसी को चिढ़ाने के लिए की जानेवाली उसकी नकल होता है। जब यह उपहास समय या भाग्य के जरिये जीवन पर प्रकट होता है वही परिस्थिति की वडम्बना होती है।

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कबूतर, कबूतरबाजी और उल्लू

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भी परिंदे यूं तो चंचल और मासूम होते हैं मगर कबूतर चंचल कम और मासूम ज्यादा होता है। ऐतिहासिक इमारतें और ऊंचे स्मारक इसे बहुत पसंद है सुस्ताने के लिए। कबूतरों को दाना खिलाना लोगों को बेहद पसंद है मगर इसकी बीट से भी लोग उतने ही परेशान रहते हैं। मान्यता है कि यह पत्नी भक्त यानी अपने जीवनसाथी के प्रति बहुत ईमानदार होता है इसे शान्ति का प्रतीक भी माना जाता है। मेघों को हरकारा बनाने की सूझ ने तो कालिदास से मेघदूत जैसी कालजयी काव्यकृति लिखवा ली। मगर कबूतरों को हरकारा बनाने की परम्परा तो कालिदास से भी बहुत प्राचीन है। चंद्रगुप्त मौर्य के वक्त यानी ईसा पूर्व तीसरी - चौथी सदी में कबूतर खास हरकारे थे। कबूतर एकबार देखा हुआ रास्ता कभी नहीं भूलता। इसी गुण के चलते उन्हें संदेशवाहक बनाया गया। लोकगीतों में जितना गुणगान हरकारों, डाकियों का हुआ है उनमें कबूतरों का जिक्र भी काबिले-गौर है।
बूतर भारोपीय भाषा परिवार की हिन्दी-ईरानी शाखा का शब्द है और हिन्दी में शब्द फारसी से आया। फारसी में इसका रूप कबोतर बना है। पहलवी में इसका रूप कबूद या कबोद kabood या kabud है। अधिकांश लोगों का pigeons मानना है कि फारसी का कबूतर दरअसल संस्कृत के कपोतः kapotah का ही रूपांतर है। दरअसल कपोत शब्द कः+पोतः से मिलकर बना है। संस्कृत में कः के अनेकार्थ है जिनमें एक अर्थ है वायु अर्थात हवा। इसी तरह पोतः के भी कई मायने होते हैं मगर सर्वाधिक प्रचलित अर्थ है जहाज, बेड़ा, नौका आदि। संस्कृत में कपोतः की व्युत्पत्ति संबंधी एक उक्ति है- को वातः पोतः इव प्रस्य। अर्थात जो वायु में पोत के समान उड़ता है। यहां कबूतर के उड़ने की क्षमता और विशिष्ट शैली जिसमें उसकी तेज गति भी शामिल है, की वजह से उसे पोत कहा गया है।
बूतर जब मुदित होता है तो इसके कण्ठ से गुटरगूं की आवाज निकलती है वरना कहा जाता है कि यह लगभग अबोला प्राणि है और इसे कोई तकलीफ पहुंचाए तो भी कोई आवाज़ नहीं करता। इसकी गुटरगूं के पीछे संस्कृत की घुः या घू धातु है जिसमें विशिष्ट ध्वनि का भाव है और गुटुरगूं ध्वनि इसी घुः से उपजी है। घूकः का अर्थ होता है ध्वनि करनेवाला पक्षी। अब कमोबेश ध्वनि तो सभी पक्षी करते हैं। यह कपोत भी हो सकता है, कौवा भी और तोता भी। मगर घुः का रिश्ता गुटरगूं की वजह से या तो कबूतर से जुड़ता है या फिर उल्लू से क्योंकि घुः से बने घूकः से ही आ रहा है घुग्घू शब्द जिसका अर्थ भी उल्लू ही होता है। हिन्दी में जड़बुद्धि के व्यक्ति को घुग्घू कहा जाता है और भोंदू की तरह बैठे रहनेवाले की मुद्रा को घुग्घू की तरह ताकना कहा जाता है। घुग्घू शब्द उर्दू में भी इस्तेमाल होता है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक कबूतर को कई उपाधियां मिली हुई हैं जैसे- गिरहबाज, गोला, लोटन, लक्का, शीराजी, बुगदादी इत्यादि। दरअसल ये इसकी विशिष्ट नस्लें भी हैं। इनमें गिरहबाज कबूतर को हरकारा कबूतर भी कहते हैं जो पत्रवाहक का का करते रहे हैं। कबूतर उड़ाना और कबूतरबाजी जैसे मुहावरे भी हिन्दी में प्रचलित हैं। कबूतरबाज दरअसल कबूतर पालनेवाले को कहते हैं और कबूतरबाजी का मतलब होता है कबूतरपालना यानी ऐशआराम करना। वैसे आजकल कमीशन खाकर बेरोजगारों को अवैध तरीके से विदेश पहुंचाने के संदर्भ में कबूतरबाजी शब्द का मुहावरेदार प्रयोग ज्यादा होता है।
तेज और ऊंची उड़ान की वजह से ही कबूतर प्राचीनकाल से ही डाकिये का काम भी करता रहा है। इंटरनेट पर खुलनेवाली नई नई ईमेल सेवाओं और आईटी कंपनियों के ज़माने में यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि करीब ढाई सदी पहले जब वाटरलू की लड़ाई लड़ी जा रही थी, तब ब्रिटिश सरकार लगातार मित्र राष्टों को परवाने पहुंचाने का काम कबूतरों के जरिये करवाती थी। ब्रिटेन में एक ग्रेट बैरियर पिजनग्राम कंपनी थी जिसने पैसठ मील की कबूतर संदेश सेवा स्थापित की थी। बाद में इसे आयरलैंड तक विस्तारित कर दिया गया था। बिना किसी वैज्ञानिक खोज हुए, यह निकट भूतकाल का एक आश्चर्य है। भारत में कई राज्यों में कबूतर डाक सेवा थी। उड़ीसा पुलिस ने सन् 1946 में कटक मुख्यालय में कबूतर-सेवा शुरू की थी। इसमें चालीस कबूतर थे।

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Wednesday, April 21, 2010

बुर्जुआ वर्ग का बुर्ज

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बु र्जुआ वर्ग का जिक्र अक्सर जनवादी, समाजवादी, साम्यवादी बहसों के दौरान होता है। पूंजीवाद के संदर्भ में बुर्जुआ का अर्थ है उस मध्यवर्ग से है जिसका झुकाव पूंजी निर्माण की ओर होता है। जिसके जरिये पूंजीपतियों के हित साधे जाते हैं। भारोपीय मूल का बुर्जुआ शब्द पूरी तरह से हिन्दी का हो चुका है। अपने मूल रूप में यह फ्रैंच भाषा का है और इसका उच्चारण बूर्ज्वा bourgeois होता है। विविध संदर्भों में बूर्ज्वा शब्द का अर्थ अलग अलग है। मूलतः यह समूहवाची शब्द है। कभी यह साधारण मध्यवर्ग है तो कभी पूंजीपतियों का हितसाधक समुदाय। बूर्ज्वा वंचितों और अमीरों के बीच की कड़ी है जिसका मूल चरित्र सुविधाभोगी है और जो वंचितों के निशाने पर भी है। राजनीति और पूंजीवाद हमेशा बूर्ज्वा का पोषण करते हैं क्योंकि इन दोनों के हित साधनेवाला वर्ग है यह। साम्यवादी दर्शन पर फैशनेबल बहस के शौकीनों का एक धड़ा बूर्ज्वा का प्रयोग शोषित वंचित के रूप में करता नजर  आता है तो दूसरा धड़ा इसका इस्तेमाल सुविधाजीवी मध्यवर्ग के रूप में करता है। यह जानना दिलचस्प है कि इस बूर्ज्वा का रिश्ता मीनार के अर्थवाले हिन्दी फारसी के बुर्ज से है तो बस्ती, नगर के अर्थवाले अंग्रेजी के बर्ग से भी है।
बुर्ज का विस्तार और इसकी अर्थ-छाया भारोपीय परिवार की कई भाषाओं में देखने को मिलती है और इसके विभिन्न रूप कई शब्दों में साफ नजर आते हैं। प्रचलित अर्थ में बुर्ज का अर्थ होता है मीनार, टॉवर या गुंबद। बुर्ज की रिश्तेदारी संस्कृत धातु बृह् (brih) या बर्ह (barh) से है जिसमें ऊंचाई, वृद्धि, खुरचना, बड़ा करना जैसे भाव हैं।

12 ... हिन्दी-उर्दू में बुर्जुआ उच्चारण दरअसल बूर्ज्वा के उज्बेकी रूप से आ रहा है जहां इसे burjua कहा जाता है...

वैदिक संस्कृत में इसका एक रूप vrih भी है। वृद्धि इसी से निकला है। बृहस्पति शब्द इसी मूल का है जिसमें गुरुता और विशालता दोनों हैं। इसी क्रम में आती है प्राचीन भारोपीय धातु bhergh जिसका अर्थ है किला या ऊंचाई पर स्थित आश्रय। वैदिक संस्कृत में इसी अर्थ में बर्हयति शब्द है जिसमें वृद्धि, विशाल, ऊंचाई, बारिश जैसे भाव हैं। मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में बर्हण् और बर्हिस्थ जैसे शब्द हैं जिनमें ऊंचाई, बुलंदी, पहाड़ जैसे भाव हैं। अवेस्ता में इसका रूप है बर्जन्त जो फारसी में बुर्ज हो गया। तुर्की में बर्ह (barh) का रूप बदल कर बोरा bora हो जाता है। अफगानिस्तान के प्रसिद्ध पहाड़ी क्षेत्र का नाम तोराबोरा torabora में यही झांक रहा है। कुल मिलाकर बर्ह् में व्याप्त ऊंचाई का भाव बुर्ज में मीनार के तौर पर स्थिर हुआ। बाद में बुर्ज नगरकोट और किलों की पहचान बन गए। यूरोपीय भाषाओं में इसके विभिन्न रूप नगर, किला या बस्ती के अर्थ में प्रचलित हैं।
पने मूल रूप में बूर्ज्वा शब्द बहुत सामान्य आधार से उठा है। जिस तरह नगर का निवासी नागरिक है वही भाव बूर्ज्वा में है। सुरक्षित आश्रय के लिए ऊंचाई का महत्व मनुष्य ने शुरु से ही जान लिया था। इसीलिए विकास के शुरुआती दौर में वह ऊंचे स्थानों पर रहता रहा। बाद में खुद के लिए ऊंची अट्टालिकाएं बनवाईं, ऊंची दीवारों वाले किले बनवाए। इसी कड़ी में आता है अरबी-फारसी का बुर्ज शब्द जो मूलतः इंडो-ईरानी भाषा परिवार का है।  बुर्ज से आ रहा है बूर्ज्वा जिसमें आश्रय का भाव है और जिसका रिश्ता कई बसाहटों से है। बुर्ज की रिश्तेदारी अंग्रेजी के बर्ग से है। इसका ही एक अन्य रूप बरो borough भी है। मटियाबुर्ज अगर एक इलाका है तो एडिनबरा एक नगरीय  बसाहट का नाम। संस्कृत में इसका रूप है बर्ह् barh जिसमें ऊंचाई का भाव है। इससे ही बना है संस्कृत का भर्ग work.26211जिसका रिश्ता भी ऊंचाई से है जो बर्ग और बुर्ज के मीनार या किला जैसे अर्थों को व्यक्त करता है। बूर्ज्वा शब्द बना है फ्रैंच के बूर्ज्वाज़ी bourgeoisie से जिसका अर्थ है शहरी मध्यवर्ग। यह बना है फ्रैंच के बोर्जी से जिसका अर्थ है मकान, बसाहट। इसका रिश्ता प्राचीन फ्रैंक के burg से है जिसका अर्थ है मकान, निवास, आवास आदि। कुल मिलाकर नगर से नागर यानी निवासी का भाव ही बर्ग से बने बूर्ज्वा में है। हिन्दी-उर्दू में बुर्जुआ उच्चारण दरअसल बूर्ज्वा के उज्बेकी रूप से आ रहा है जहां इसे burjua कहा जाता है।
यूरोपीय भाषाओं में बुर्ज की व्याप्ति जबर्दस्त है। जर्मन में इसका रूप बर्ग burg है और अंग्रेजी में Berg अर्थ वही है, घिरा हुआ स्थान, महल या किलेनुमा इमारत। बर्ग नाम वाले कई किले और कस्बे उन तमाम इलाकों में भरे पड़े हैं जहां जहां यूरोपीय पहुंचे जैसे स्ट्रॉसबर्ग, पिट्सबर्ग, ओल्डेनबर्ग। अंग्रेजी में इसका एक रूप borough (बरो या बरा) भी है जैसे एडिनबरा। स्कॉटिश में यह बर्घ है। ध्यान रहे बाद में बर्ग, बरो और बर्घ में आवासीय बस्ती का भाव समाहित हुआ। इसी कड़ी में आता है पुर्ग या पर्ग (purg) जो जर्मन और ग्रीक में अपेक्षाकृत कम प्रचलित शब्द है मगर इसमें भाव वहीं है। तुर्की के अनातोलिया प्रांत की भाषा है लीसियन जिसमें इसके प्रिज prije या प्रुवा pruwa जैसे रूप मिलते हैं।
र्मीनियाई भाषा में यह burgn है, इसका एक रूप बुरगाना भी है जिसका मतलब पहाड़ी किला होता है। संभव है ताजिकिस्तान के एक पहाड़ी राज्य फरगाना के पीछे भी यह भर्ग, बुर्ज या बर्ग हो। भारत में मुगल वंश का संस्थापक बाबर फरगाना से ही भारत आया था। भारोपीय bhergh से ही जन्मा है अंग्रेजी का फोर्ट fort शब्द जिसका अर्थ है किला, कोट या दुर्ग। फोर्ट आया है लैटिन के फोर्टिस से। गौर करें इन तमाम शब्दों में प वर्णक्रम की ध्वनियां आपस में बदल रही हैं। उत्तरी ईरान के एक पर्वत शिखर का नाम एल्बुर्ज है जो करीब साढ़े पाच हजार मीटर ऊंचा है। इसमें बुर्ज शब्द साफ पहचाना जा सकता है। नाक के लिए भी इसी मूल से उपजे शब्द हैं जैसे रूसी में बुरुन burun और पर्शियन में बुर्ज़ burz. नाक मैं ऊंचाई का भाव अंतर्निहित है और इसीलिए नाक ऊंची रखना एक मुहावरा भी है और इन्सानी सिफ़त भी। यूरोप में बर्ग उपनाम भी होता है। यह पदवी की तरह भी लगाया जाता है। जर्मन में इसका उच्चारण बोर्ग है।

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अकविता / शब्दार्थ-4 - तलाश

clean_sweep वि ने लिखे

कुछ शब्द

जो छिटके हुए थे अर्थ से

भाव भी था लापता

लेखक की लिखावट

में नुमांया थे शब्द

नही थी व्याख्या।

 

नोरम था

कथावाचक का

कथा बांचना

पर उसमें सार नहीं

इतिवृत्त था खुद का।

ब्द को ब्रह्म मान

पूजते रहे उसे

ईश्वर को

तलाशा नहीं गया

अर्थ में।

देखें-अकविता/ शब्दार्थ –1 अकविता/ शब्दार्थ –2 अकविता/ शब्दार्थ –3

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Tuesday, April 20, 2010

पलंगतोड़ के बहाने पालकी का सफर


मतौर पर आलसी और काहिल आदमी को पलंगतोड़ कहते हैं। जानते हैं पलंग के बारे में जिसने हिन्दी को पलंग तोड़ना जैसा शानदार मुहावरा दिया। पलंग शब्द भी उन कई शब्दों में शामिल है जो भारत में पैदा होकर  कई मुल्कों भाषाओं के चक्कर लगा कर एक अलग ही रूप में फिर देश लौट आए। अंग्रेजी का एक शब्द है पैलनकीन (palankeen) जिसका मतलब है एक ऐसा खटोला जिसे चार या उससे अधिक लोग कंधों पर उठाएं। हिन्दी मे इसके लिए पालकी या डोली शब्द है। फारसी में इसे फीनस कहते हैं। पालकी या डोली आमतौर पर चार लोग मिलकर उठाते हैं जिन्हें कहार कहते हैं।  आज के दौर में न पालकी रही , न डोली मगर गीत-संगीत के जरिये ये शब्द आज भी जिंदा हैं। ये पंक्तियां बहुतों ने अपने बचपन में सुनी होंगी और इससे संबंधित खेल भी खेला होगा-

हाथी, घोड़ा , पालकी ।
जय कन्हैयालाल की ।।


संस्कृत धातु दुल् से बना है डोर शब्द। दुल में हिलाना, घुमाना जैसे भाव शामिल है। इससे बना है दोलः जिसका अर्थ होता है झूलना, हिलना, दोलन करना, एक जगह से दूसरी जगह जाना, घट-बढ़ होना। हिंडोलाशब्द इससे ही बना है जिसका संक्षिप्त रूप डोलाया डोली होता है। इसके लिए शिविका या पालकी शब्द भी प्रचलित है। दोलन से बनी डोली में डोलने की क्रिया साफ नजर आ रही है। डोलने की क्रिया से ही रस्सी के अर्थ में डोर शब्द का निर्माण हुआ है। झूलने के भाव से साफ है कि किसी जमाने में डोर उसी सूत्र को कहते रहे होंगे जिसे ऊपर से नीचे की ओर लटकाया जाए।

गौरतलब है कि पालकी और पैलनकीन का  न सिफ अर्थ एक है बल्कि ये जन्में भी एक ही उद्गम से हैं और वह है संस्कृत शब्द पर्यंक: जिसका मतलब होता है शायिका।  इसके अलावा इसका अर्थ समाधि मुद्रा या एक यौगिक क्रिया भी है जिसे वीरासन कहते हैं। संस्कृत में पर्यंक: का ही एक और रूप मिलता है पल्यंक:। खास बात ये कि हिन्दी का पलंग शब्द इसी पर्यंक: से निकला है और संस्कृत मे भी इसका अर्थ चारपाई, शायिका या खाट ही है। संस्कृत से पालि भाषा मे आकर पर्यंक: ने जो रूप धारण किया वह था पल्लको। यही शब्द पलंगडी़ के रूप में भी बोला जाता है। पलंग चूंकि शरीर को आराम देने के काम आता है और आराम का आधिक्य मनुश्य को आलसी बना देता है लिहाज़ा हिन्दी में आलस से संबंधित कुछ मुहावरों के जन्म में भी इस शब्द का योगदान रहा जैसे पलंग तोड़ना यानी किसी व्यक्ति का काहिलों की तरह पड़े रहना, कामधाम न करना, निष्क्रिय रहना आदि। ऐसे लोगों को पलंगतोड़ भी कहते हैं।

खास बात ये कि पूर्वी एशिया में बौद्धधर्म का प्रचार-प्रसार हुआ तो वहां पालि भाषा के शब्दो का चलन भी शुरू हुआ। इंडोनेशिया  के जावा सुमात्रा द्वीपो में आज भी पालकी के लिए पलंगकी  शब्द चलता है जो पालि भाषा की देन है। जावा सुमात्रा पर पुर्तगाली शासन के दौरान यह शब्द पुर्तगाली जबान में भी पैलनकीन (palangquin) बनकर शामिल हुआ और इसके जरिये योरप जा पहुंचा। अंग्रेजी में इसने जो रूप लिया वह था पैलनकीन। उर्दू फारसी में पलंग शब्द तो है मगर इसका अर्थ चारपाई न होकर तेंदुआ है।


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