Wednesday, February 9, 2011

नर्मदा-तवा का संगम यानी बान्द्राभान

bandrabhan 122सा थियों, अत्यावश्यक यात्रा पर अभी निकल रहा हूँ। क़रीब दस दिनों का फेरा है और उसके बाद इस यात्रा का हैंगओवर चलेगा। उसके बाद फिर यात्रा और फिर फिर हैंगोवर। यह क्रम कुछ महिनों चलेगा। इस सफ़र मजाज़ी का पक्का असर सफ़र हक़ीक़ी पर न पड़े, इसकी पूरी पूरी कोशिश रहेगी और शब्दों के सफ़र पर हम बीच बीच में मिलते रहेंगे। मौका मिला तो शब्दों की बातें होंगी, वर्ना शब्दों के इर्दगिर्द जो दुनिया है, उसकी ख़बर ली जाएगी। तो शुरु आज से ही करते हैं। कुछ दिनों पहले अपने परिवार के साथ, दफ्तर के बड़े परिवार में शरीक़ हुआ और हम सब मिलकर चार बसों में बैठे और निकल पड़े पुण्यसलिला नर्मदा तट की ओर।
DSC_8940DSC_9026DSCF4596DSCF4605नमामिदेवी नर्मदे
र्मदा किनारे बान्द्राभान एक सुरम्य पर्यटन स्थल है। यह तवा और नर्मदा का संगम है और होशंगाबाद जिले में है। भोपाल से होशंगाबाद की दूरी क़रीब सत्तर किलोमीटर है और वहाँ से संगम-तट दस किलोमीटर। बान्द्राभान यात्रा एक अद्भुत अनुभव है। मैने अपने जीवन में कभी किसी नदी का ऐसा मायावी तट नहीं देखा। इलाहाबाद का संगम भी देखा और गोवा का समुद्रतट भी। पर इस तट की बात निराली है। प्रकृति के क़रीब दो नदियों का मिलन, पानी में उभरे रेतीले टापू, चट्टाने और कहीं तेज तो कहीं मंथर गति से बहती दो नदियां। दोनों धाराओं का अलग अलग चरित्र। भोपाल से होशंगाबाद की ओर बढ़ते ही विन्ध्याचल पर्वतश्रेणी शुरू हो जाती है। होशंगाबाद से कुछ ही आगे चलकर सतपुड़ा की प्रसिद्ध पर्वत शृंखला शुरू होती है। तवा सतपुड़ा को छूती हुई आती है, नर्मदा का सफ़र इन दोनों विशाल मगर सजग, शान्त प्रहरियों की निगहबानी में चलता रहता है। तवा के पानी की धार मंथर है तो नर्मदा की तेज। नर्मदा का पानी निर्मल, कंचन है तो तवा के पानी में कुछ शैवाल, कुछ रेतकण और नन्हीं मछलियाँ साफ़ नज़र आती हैं।
बान्द्राभान के इस पवित्र तट पर वर्षाकाल के बाद कार्तिक सुदी पूर्णिमा पर बड़ा मेला लगता है। मेला बहुत प्राचीन है। यह संगम तट सिद्धभूमि और तपोभूमि रहा है और लोकांचलों में इसे पावन तीर्थ का दर्जा मिला है। पारम्परिक तीर्थों से हटकर बान्द्राभान के दोनों किनारों पर मंदिरों-मठों का जमघट नहीं है। यहाँ सिर्फ रेतीले तट हैं और कल कल निनादिनी दो सदानीरा धाराएं हैं। अफ़सोसनाक बात सिर्फ़ यह कि कार्तिक मेला इस पवित्र तट पर पॉलीथिन का कचरा फैला जाता है। आसपास के ग्रामीणजन चाहें तो स्वयंसेवा से इसे साफ कर सकते हैं, पर कौन करे? भाजपा के अनिल माधव दवे भी नर्मदा नर्मदा तो खूब जपते हैं मगर उन्हें भी इस तट की पावनता की वैसी फिक्र नहीं होती जैसी नर्मदा से जुड़े खुद की छवि चमकाने वाले अपने अभियानों की कामयाबियों की होती है। खैर, फ़िलहाल यहाँ पेश हैं कुछ तस्वीरें। आप भी बान्द्राभान तट का आनंद लें।

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5 कमेंट्स:

Rahul Singh said...

निर्मल और पुण्‍यदायी.

प्रवीण पाण्डेय said...

नर्मदाय नमः, मन मेरा भी उलाछें भरने लगा, डुबकी लगाने के लिये।

निर्मला कपिला said...

लगता है इस पावन पवित्र नर्मदा के दर्शन करने ही पडेंगे। सुन्दर तस्वीरों के साथ वर्णन अच्छा लगा। धन्यवाद।

ali said...

यात्रा शुभ हो ! फोटो बढ़िया आईं हैं , खास कर तीसरे नंबर वाली जिसमे आप साथियों को 'आसन' सिखा रहे हैं :)

वृक्षारोपण : एक कदम प्रकृति की ओर said...
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