Wednesday, February 2, 2011

कंगाल की ठठरी, ग़रीब का पिंजर[आश्रय-31]

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हते हैं कंगाली में आटा गीला या ग़रीबी में आटा गीला अर्थात मुसीबत के वक्त में और विपत्तियों का आना। इस मुहावरे में कंगाल और ग़रीब शब्द एक दूसरे के पर्याय हैं। कंगाल जहाँ हिन्दी का तद्भव शब्द है वहीं ग़रीब सेमिटिक मूल से आया अरबी शब्द है। यह जानना दिलचस्प है कि निर्धन और विपन्न जैसे अर्थों में प्रयोग होने वाले इस शब्द का मूल अर्थ कुछ और था। अपने सेमिटिक मूल में ग़-र-ब gh-r-b धातु में अस्त होने, वंचित होने का भाव था। इसकी पुष्टि होती है इसके प्राचीन हिब्रू रूप गर्ब Gh-Rb से जिसमें मूलतः अंधकार, कालापन, पश्चिम का व्यक्ति या शाम का भाव है। गौर करें ढलते सूरज में अपनी प्रखरता से वंचित होने का भाव है। इसका अर्थ है शाम का समय। चाहें तो साहित्यिक भाव में सूर्य को हम ग़रीब मान सकते हैं। gh-r-b में निहित अजनबी, दूरागत अथवा परदेसी के भाव पर गौर करें। प्राचीनकाल में यात्राएं पैदल चलकर तय होती थी और बेहद कष्टप्रद होती थीं। राहगीर चोर-उचक्कों और बटमारों की ज्यादती का शिकार भी होते थे। परदेश से आया यात्री आमतौर पर थका हारा, फटेहाल और पस्त होता था। गरीब शब्द की अर्थवत्ता विपन्न और वंचित के अर्थ में यहाँ समझी जा सकती है।
र्थान्तर की कुछ इसी क्रिया से बना है कंगाल शब्द जिसका मूल रूप है संस्कृत कङ्कालः या कङ्कालम् जिसका अर्थ है जरावस्था या बीमारी क्षीण शरीर, हड्डियों का ढाँचा, अस्थिपंजर। कंकाल के बारे में अमरकोश में लिखा है-कं शिरः कालयति क्षिपति। यह बना है कम् + कल् + णिच् + अच् के मेल से। मूलतः इसमें ठठरी या ढाँचे का भाव है जो शरीर का आधार है। कङ्कालय का अर्थ होता है शरीर। यूँ देखा जाए तो कंकाल के होने से शरीर है मगर प्रचलित अर्थों में शरीर के न रहने से या शरीर के दुर्बल होने से कंकाल बचता है। यही हीन भाव कंगाल शब्द के पीछे महत्वपूर्ण है। ग़रीब में निहित वंचित-विपन्न वाली बात यहाँ भी है। कंगाल वही है जो अपनी सुख समृद्धि खो चुका है। जो दीन, हीन और बहुत दरिद्र है। भाव स्पष्ट है कि विपन्नता के चलते जिसकी अवस्था कंकालमात्र रह गई हो, वही कंगाल है।
कंकाल के ही अर्थ में हिन्दी का पंजर, पिंजर शब्द भी प्रचलित हैं। अस्थिपंजर में यह भाव एकदम स्पष्ट हो जाता है। संस्कृत की पिंज् धातु से बना है पिंजर जिसमें सजाना, रंगभरना, स्पर्श देना, रहना-बसना जैसे भावों के साथ चोट पहुँचाना, क्षति पहुँचाना जैसे भाव भी हैं। पिंज धातु में मूलतः आश्रय या निर्माण के भाव है जिनका खुलासा इससे बने हिन्दी शब्दों की अर्थवत्ता से होता है। पिंजर का अर्थ है हड्डियों का ढाँचा, अस्थिपंजर, कंकाल आदि। वह जालीदार कक्ष जिसमें पंछियों का बसेरा होता है, पिंजरा कहलाता है। पिंजरा भी पिंज् से ही बना है ( पिञ्जरकः) और उसमें वास-निवास का भाव उजागर हो रहा है। इसी तरह पिंजर भी एक तरह का पिंजरा यानी आश्रय ही है। कबीर दार्शनिक भाव से कहते हैं- दस द्वारे का पिंजरा, तामे पंछी का कौन। जिस तरह अस्थियों का ढाँचा पूरे शरीर को संभालता है, उसी तरह का ढाँचा किसी भी आश्रय के निर्माण का स्थायी आधार होता है। पिंज् धातु में निहित सजाने या स्पर्श देने का भाव उभरता है पिंजारा शब्द में जो रुई धुनकनेवाली जाति है। मालवा में यह शब्द आमतौर पर प्रचलित है। दरअसल संस्कृत में पिंञ्जन ( पिंजन ) क्रिया का अर्थ धुनना है। धुनने में स्पर्श देने का भाव भी है। स्पर्श की तीव्रता से ही चोट पहुँचाना और क्षति पहुँचाने के नतीजे सामने आते हैं। पिंजारा जब रुई धुनकता है तो उसमें ये सारी क्रियाएँ शामिल रहती हैं। पिंजारे को धुनिया भी कहते हैं। इस शब्द से जुड़े कुछ मुहावरे हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे खूब श्रम करने से उत्पन्न थकान के संदर्भ में अंजर-पंजर ( इंजर-पिंजर ) ढीले होना कहा जाता है जिसमें शरीर के जोड़ों के शिथिल होने का भाव है। बंदी को पिंजरे का पंछी कहा जाता है।
पिंजर के अर्थ में ही ठठरी शब्द भी हिन्दी में चलता है। ठठरी के मूल में स्थातृ शब्द है जो संस्कृत की स्थ् धातु से बना है। स्थ् में खड़े रहना, स्थिर होना, किसी जगह पर उपस्थिति होना, डटे रहना, विद्यमान होना, किसी आधार पर टिकना आदि भाव हैं। यह भारोपीय भाषा की धातु है और इस परिवार की सर्वाधिक व्यापक अर्थवत्ता वाली धातुओं में इसका शुमार है जिससे निकले शब्द दुनियाभर की कई भाषाओ में हैं। भाषाविज्ञानियों ने स्थ् से मिलती जुलती स्त् (sta) की कल्पना की है । अंगरेजी के स्टे stay यानी स्थिर होना, टिकना, स्टैंड यानी खड़े होना, स्टूल यानी मूढ़ा अथवा स्टेट यानी राज्य जैसे अनेक शब्दों के मूल में यही धातु है। स्थातृ से बना है ठठरी ( ठाट्ठरी > ठठरी > ठटरी ) जिसका अर्थ होता है कंकाल, ढांचा या पंजर। गौर करें कि मनुष्य का शरीर अस्थियों के ढांचे पर ही है। अस्थिपंजर के रूप में किसी भी जीव की देह को ठठरी कहा जाता है। स्थातृ का देशज रूप ही ठाठ बना। ठाठ का असली अर्थ है घास-फूस या बांस के जरिये बनाया गया कोई ढांचा जिसे सब तरफ से ढक कर कोई आश्रय या निर्माण किया जाए। ठाट्ठरी से इसका रूप ठट्ठर हुआ और फिर टट्टर जिसका अर्थ ओट या रक्षा के लिए बांस की फट्टियां जोड़ कर बनाया गया ढांचा। नज़ीर की प्रसिद्ध पंक्ति- सब ठाठ धरा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा में जो ठाठ है, उसका तात्पर्य बंजारों के अस्थाई डेरों यानी झोपड़ियों वाले ठाठ-ठट्टर से ही है।
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5 कमेंट्स:

Asha said...

सार्थक जानकारी |बधाई
आशा

प्रवीण पाण्डेय said...

कंगाल अन्ततः कंकाल हो ही जाता है।

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी जानकारी है। रुई का धुनना या पिंजना तो सुना था अर्थ आज जाना। धन्यवाद।

दीप्ति शर्मा said...

bahut achhi jankari di h
aapne aabhar

JALES MEERUT said...

बड़ी दिलचस्प जानकारी दी है| हम तो समझते थे हम बड़े ठाठ से रह रहे हैं |घास फूस की झोपड़ी ही ठाठ है तो बड़े को भी नसीब हो|

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