दो जुदा शब्दों की रिश्तेदारी
भाषा की दुनिया रहस्यों और आश्चर्यों
से भरी है। पहली नज़र में, 'मुहावरा', जो हमारी रोज़मर्रा की बातचीत और साहित्यिक अभिव्यक्ति का एक अभिन्न
अंग है, और 'हूर', जो पारलौकिक सौंदर्य और धार्मिक कल्पनाओं से जुड़ा एक शब्द है, के बीच कोई भी संबंध खोजना असंभव सा
लगता है। एक का संबंध भाषा की विशिष्ट शैली से है, तो दूसरे का संबंध स्वर्ग की अलौकिक परिकल्पना से। लेकिन दोनों का डीएनए एक है यानी एक तीन अक्षरों
वाला क्रियापद ह-व-र यानी अरबी में हा-वाव-रा / ح -و-ر । अरबी क्रियापद ह-व-र के बुनियादे मायने हैं 'लौटना', 'मुड़ना', 'चक्कर लगाना' या 'वापस
आना'। इससे ही आगे
और भी अर्थ विकसित हुए। इस धातु का केंद्रीय भाव 'वापस आने' या 'लौटने' की क्रिया से जुड़ा है।
ध्यान रहे, ह-व-र गतिवाची क्रिया है जिसमें किसी बिंदु से शुरू होकर वापस उसी बिंदु पर लौटने की बात है। जैसे एक वृत्ताकार परिपथ पर चलते हुए फिर से उसी बिंदु पर लौटना या सतत गतिशील रहना। आसानी के लिए हम कह सकते हैं कि किसी विचार विमर्श में अथवा बातचीत के कई दौरों के मूल विषय की बात है। चर्चा या संवाद में बार बार मूल मुद्दे पर लौटना होता है। एक शब्द है राऊंड टेबल कान्फ्रेंस। इसमें न सिर्फ़ किसी गोल टेबल के इर्द-गिर्द बैठ कर मन्त्रणा करने का भाव है बल्कि उस विषय पर कई दौर (राऊंड) की चर्चा का आशय भी निहित है। ध्यान रहे, दौर, दौरान शब्द भी किसी निश्चित कालअवधि की बात करते हैं। जैसे एक घंटे की चर्चा। एक वर्ष की घटनाएँ। एक दशक के प्रयास अथवा एक सदी का आंदोलन।
'संवाद' या मुद्दे की बात
धातु ह व र ح-و-ر से विकसित प्रमुख आशय मानवीय संवाद
और भाषा से है। यहाँ 'लौटने' या 'मुड़ने' की भौतिक क्रिया एक शक्तिशाली रूपक
में बदल जाती है। जब दो या दो से अधिक लोग बात करते हैं, तो विचारों का,
भाषा का, शब्दों का, व्यंजना का आदान-प्रदान होता है। यह भाषा और विचार का मुड़ना और
लौटना है। इसी वैचारिक आदान-प्रदान ने
ह-व-र क्रियापद से हावर शब्द
बना जिसमें 'किसी से बात
करना' या 'संवाद करना' जैसे आशय थे। इसी क्रिया से मुहावरा जैसी संज्ञा बनी, जिसका सीधा अर्थ है 'संवाद', 'वार्तालाप' या 'बहस' । क़ुरान में भी संवाद के लिए इसी
जड़ से बने शब्दों का प्रयोग हुआ है, जैसे तहावुर
(तहव्वुर) जिसका अर्थ 'बहस' या 'संवाद' है और
युहाविर जिसका अर्थ है 'संवाद करना'।
'आम बोलचाल' से 'विशिष्ट प्रयोग' तक
हिन्दी में 'मुहावरा' शब्द फ़ारसी भाषा के माध्यम से आया, जिसने इसके अर्थ में एक नया आयाम जोड़ा। फ़ारसी ने अरबी के मुहावरा को तो
अपनाया मगर फ़ारसी की भाषिक संस्कृति में मुहावरे का अर्थ विस्तार हो गया और इसमें
वाक्-व्यवहार, आम बोलचाल, अथवा व्यंजनापूर्ण शैली का आशय समाने लगा जो आगे चलकर आज
वाले मुहावरे के तौर पर रूढ़ हो गया। इसमें शैली भी है, प्रयोग भी है, आदत या
अभ्यास भी है, रफ़अत भी है, व्यंजना भी है और इडिअम वाली बात भी है। यह एक स्वाभाविक विकास था। जैसे हम कहें कि आजकल हिन्दी में अरबी-फ़ारसी
का मुहावरा छूट रहा है। यहाँ सिर्फ़ यही आशय है कि हिन्दी में अरबी-फ़ारसी शब्द कम
बरते जा रहे हैं, न कि 'idiom' का प्रयोग कम होने की बात है।
लाक्षणिक अर्थ की पराकाष्ठा
आज हम 'मुहावरा' को एक ऐसे वाक्यांश के रूप में जानते हैं जिसका अर्थ उसके शब्दों के
शाब्दिक अर्थ से भिन्न, यानी लाक्षणिक होता है। उदाहरण के लिए, 'लाठी खाना' का अर्थ लाठी को भोजन के रूप में ग्रहण करना नहीं, बल्कि 'लाठी का प्रहार सहना' है । इसी तरह 'गुल खिलाना'
का अर्थ फूल उगाना नहीं,
बल्कि 'कोई उपद्रव करना' है। ध्यान से देखें तो, इन सभी प्रयोगों में शब्द अपने शाब्दिक अर्थ से 'मुड़ गए' हैं या 'हट गए' हैं। इस प्रकार, 'मुहावरा' शब्द का मूल अर्थ ('मुड़ना' या 'लौटना') उसके आधुनिक पारिभाषिक अर्थ की सटीक
व्याख्या करता है। यह भाषा के विकास का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसी तरह किसी लेखक
की भाषा या शब्द प्रयोग की शैली भी मुहावरेदारी कहलाती है। तो मुहावरा शब्द का
अर्थक्षेत्र व्यापक है, मगर हिन्दी में अब इसका आशय सिर्फ़ व्यंजना अथवा इडिअम ही
रह गया है।
पवित्रता: सफ़ेदी से सौंदर्य तक
अब हम ح-و-ر (ह-व-र) धातु से निकली दूसरी शाखा की ओर
बढ़ते हैं, जो संवाद और
भाषा से बिल्कुल अलग, पवित्रता और सौंदर्य की दुनिया में ले जाती है। यह वैचारिक छलांग
जितनी अप्रत्याशित है, उतनी ही तर्कसंगत भी है। 'लौटने' की अवधारणा को जब कपड़ों की धुलाई पर लागू किया जाए, तो इसका अर्थ हुआ उन्हें उनकी मूल
स्वच्छ अवस्था में 'वापस लाना'। इस प्रक्रिया के कारण ह-व-र में 'स्वच्छता',
'पवित्रता' और परिणामस्वरूप 'श्वेत' या 'धवल' वाले भाव भी समा गए । तो स्वच्छता, पवित्रता का विस्तार आगे चलकर
अध्यात्म और अंततः सौंदर्य की अवधारणा तक पहुँचा।
'हूर' की वैश्विक यात्रा
स्वच्छता और सफ़ेदी की इसी अवधारणा को जब मानवीय सौंदर्य पर लागू किया गया, तो 'हूर' (حُور) शब्द का जन्म हुआ। 'हूर' शब्द का विशेष संबंध आँखों के सौंदर्य से है। अरबी में इसका अर्थ है "ऐसी आँखें जिनमें सफ़ेद भाग की अत्यधिक सफ़ेदी और पुतली के गहरे काले रंग के बीच एक तीव्र और आकर्षक कंट्रास्ट हो"। क़ुरान ने इस शब्द को चुना और इसे पारलौकिक सौंदर्य का प्रतीक बना दिया। इस प्रयोग ने 'हूर' शब्द के अर्थ को इस्लामी परिकल्पना में स्वर्ग की सुंदर साथियों के रूप में स्थापित कर दिया। 'हूर' शब्द की यात्रा अरब और इस्लाम की दुनिया तक ही सीमित नहीं रही। फ़ारसी भाषा के माध्यम से यह फ्रैंच ज़बान में 'हुरी'बन गया। 18वीं शताब्दी में यह अंग्रेजी में 'houri' के रूप में जा पहुँचा । पश्चिमी समाज में 'हूर' ने अपना विशिष्ट धार्मिक संदर्भ कुछ हद तक खो दिया और इसका प्रयोग अक्सर पूर्व की किसी भी अत्यंत सुंदर और आकर्षक महिला के लिए किया जाने लगा।
'हवारी' और निष्ठा का नाता
इस शब्द के 'पवित्रता' वाली शाखा का एक और महत्वपूर्ण विस्तार 'हवारी' है, जिसका अर्थ है 'शिष्य', 'समर्पित अनुयायी' या 'प्रेरित'। इस शब्द का मूल भाव भी 'शुद्ध' या 'स्वच्छ' साथी से है । क़ुरान में इस शब्द का प्रयोग विशेष रूप से ईसा मसीह के शिष्यों के लिए किया गया है। जहाँ 'हूर' शब्द
बाहरी और शारीरिक पवित्रता (सौंदर्य, सफ़ेदी) का प्रतीक है, वहीं 'हवारी' शब्द आंतरिक और आध्यात्मिक पवित्रता (निष्ठा,
विश्वास, समर्पण) का प्रतीक है। ये दोनों शब्द एक ही जड़ से निकले दो पूरक विचार हैं। एक सौंदर्य की पवित्रता का और
दूसरा आस्था की पवित्रता का। 'लौटने' या 'घूमने' की एक साधारण क्रिया ने दो विशाल और
भिन्न अर्थ-क्षेत्रों को जन्म दिया। एक ओर, इसने संवाद, आम बोलचाल, और अंततः भाषा की उस विशिष्ट शैली को परिभाषित किया जहाँ अर्थ अपने
मूल रूप से 'मुड़' जाते हैं। दूसरी ओर, इसी जड़ ने स्वच्छता, पवित्रता, और उस अलौकिक सौंदर्य को जन्म दिया।









































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