Saturday, July 21, 2007

गीत- मिलना हाथ पसारे

हिन्दी के यशस्वी कवि यश मालवीय का यह गीत मुझे प्रिय है। यश जी अद्भुत गीतकार हैं। बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल और भाव प्रवणता इनकी खासियत है। यह गीत करीब दस बरस पहले मैने एक दैनिक में बच्चों का कोना के अन्तर्गत छपा देखा। गर्दिश के दिन थे। दो-ढाई बरस के बेटे को अपने माता-पिता के पास छोड़कर मैं किसी और शहर में था और टीवी स्टेशन के न्यूज रूम में मजूरी कर रहा था। हर हफ्ते बेटे से मिलने जाना होता था। ऐसी ही एक यात्रा में यह गीत पढ़ा। इतने बरसों से इस गीत को जिस डायरी में संभाले रखा वह आज अचानक हाथ लगी। आप भी लीजिये इस गीत का आनंद।

हिलते रहे हरे पत्तों से
नन्हे हाथ तुम्हारे
दफ्तर जाना ही था
पापा क्या करते बेचारे !

दफ्तर , जो अपने सपनों की
खातिर बहुत ज़रूरी
खाली जेब कहां से होगी
जिदें तुम्हारी पूरी ?
उड़ जाएंगे आसमान में
गैस भरे गुब्बारे।

तुम्हें चूमना चाहा भी तो
घड़ी सामने आई
कल की खुली अधूरी फाइल
पड़ी सामने आई
बेटे , मुझे माफ कर देना
मिलना बांह पसारे।

बजते रहे कान रस्ते भर
सुना तुम्हारा रोना
और पास ही रहा बोलता
चाबी भरा खिलौना
राह धूप में दिखी अंधेरी
ओ घर के उजियारे।

शाम पहुंचकर दफ्तर से घर
तुमको बहला लूंगा
गर्म चुम्बनों से गुलाब सा
चेहरा नहला दूंगा।
किलकारी में खो जाएंगे
सारे आंसू खारे


-यश मालवीय

2 कमेंट्स:

जोगलिखी संजय पटेल की said...

अजीत भाई;
यश जी की कविता ने मेरे अपने पिता और मेरे बच्चों के साथ मेरी विवशता के सारे दृष्य मन-मानस में उकेर दिये .अभी कल ही मेरे एक मिठाई विक्रेता मित्र अपने संस्थान पर नियमित क्रम से कुछ देरी से पहुँचे,मैने कारण पूछा तो बोले पोते के साथ खेल रहा था; उनकी बात में एक मौन अभिप्राय मुझे ये सुनाई दिया कि जब बेटा छोटा था तब वक़्त ही कहाँ मिला उसके साथ खेलने का.काम-काज और अनाज की चिताएँ,कारोबारी प्रतिबध्दताएं और सामाजिक व्यस्तताएँ कितनी कुछ क़ीमत माँगती हैं जिसे बाद में क़ीमत चुका कर भी नहीं वापस लाया जा सकता जिसमें से एक बहुत प्यारी चीऴै बचपन.

सौरभ बुधकर said...

यश मालवीय की कविता सुंदर है साथ ही आपकी भूमिका भी कुछ खास है.....ईमानदारी से ..बढ़िया लगी।

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