Saturday, July 28, 2007

प्रेम गली से खाला के घर तक


दुनियाभर के संत और धर्मग्रन्थ एक बात खास तौर पर कहते आए हैं कि प्रेम से बड़ी कोई नीति नहीं मगर लोभ-लालसा छोड़कर ही प्रेममार्गी हुआ जा सकता है। यानी लालच और प्रेम साथ-साथ नहीं चल सकते। कबीरदास भी एक साखी में कहते हैं-
प्रेमगली अति सांकरी,
या में दुई न समाय।

एक अन्य दोहे में वे कहते हैं-
कबीर यहु घर प्रेम का
खाला का घर नाहीं।

हिन्दी के मशहूर कवि गीतकार कुंवर बेचैन भी अपने एक दोहे में यही कहते नज़र आते हैं कि प्रेम लोभ का साथ नहीं-
जहाँ काम है, लोभ है, और मोह की मार
वहाँ भला कैसे रहे, निर्मल पावन प्यार.

यह तो रही धर्म और नीतिशास्त्र की बात लेकिन भाषाशास्त्र के चौड़े रास्ते पर जब शब्दों का सफर शुरू होता है तो प्रेम यानी अंग्रेजी के love और संस्कृत-हिन्दी के लोभ, लालच, लालसा और लोलुपता जैसे विपरीतार्थी लफ्ज हेल-मेल
करते नजर आते है। भाषाविज्ञानियों के मुताबिक संस्कृत के मूल शब्द लुभ् में ही अंग्रेजी के लव के जन्म का आधार छुपा है। लुभ् यानी यानी रिझाना, बहलाना, आकृष्ट करना, ललचाना,लालायित होना आदि। जाहिर है कि प्रेम में ये तमाम क्रियाएं शामिल हैं। मगर साथ ही इससे बने लो शब्द में लोलुपता, लालसा, लालच, तृष्णा, इच्छा जैसे अर्थ नज़र आते है। लुभ् का ही एक रूप नजर आता है इंडो-यूरोपीय शब्द लुभ् यानी leubh में जिसका मतलब भी ललचाना, रिझाना, चाहना था। प्राचीन जर्मन भाषा ने इससे जो शब्द बनाया वह था lieb. प्राचीन अंग्रेजी में इससे बना lufu. बाद में इसने luba का रूप ले लिया।
लैटिन में भी यह libere बनकर विराजमान है। बाद में आधुनिक अंग्रेजी में इसने love के रूप में अपनी जगह बनाई और प्रेम, स्नेह लगाव और मैत्रीभाव जैसे व्यापक अर्थ ग्रहण किए। यही नहीं, अंग्रेजी में बिलीफ और बिलीव जैसे शब्द भी इसी लुभ् की देन हैं जिनका लगातार अर्थ विस्तार होता चला गया। जाहिर है भाषा विज्ञान के आईने में कबीर की संकरी सी प्रेमगली ऐसा हाईवे नजर आता है जो सीधे खाला के घर तक जाता है।

2 कमेंट्स:

अनूप शुक्ल said...

अच्छी जानकारी है!

तपन शर्मा said...

बहुत अच्छे अजित जी..अभी हाल ही में मैंने आपका ब्लॉग पढ़ना शुरू किया है.. और मैं आश्चर्य चकित भी हूँ और खुश भी.. इतने उम्दा तरीके से आपने कितने ही शब्दों को समझाया है.. मजा आ गया... अथाह सागर है हमारा शब्द्कोष.. पहले मैं संस्कृत को केवल भारतीय भाषाओं को जननी मानता था। हाँ ये अवश्य मानता था कि अंग्रेज़ी में कुछ हिस्सा संस्कृत का भी है.. पर इस तरह से ऐसे ऐसे शब्द पता चलेंगे ये सपने में भी नहीं सोचा है.. आप ये काम जारी रखें..मेरे जैसे लाखों हिंदी प्रेमियों को इससे फ़ायेदा होगा..और हिंदी के विस्तार में मदद मिलेगी
धन्यवाद
तपन शर्मा

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