Sunday, July 29, 2007

लिबास, निवास और हमारा बजाज



गर ये कहा जाए कि मनुष्य मकान में भी रहता है और कपड़ों में भी तो कुछ गलत न होगा। दरअसल संस्कृत की वस् धातु से ही वासः यानी मकान और वस्त्रम् यानी कपड़े का जन्म हुआ है।
वस् धातु का अर्थ होता है ढकना, रहना , डटे रहना आदि। वस् से बने वासः से ही हिन्दी में निवास और आवास जैसे शब्द भी बने । यही नहीं, गांव देहात में आज भी घरों के संकुल या मौहल्ले के लिए बास या बासा (गिरधर जी का बासा) शब्द काफी प्रचलित है।
वस्त्रम् या वसन् शब्द ने प्राकृत में वस्सन या वस्स रूप लिया। कालांतर में कई इलाकों में इसका बज्ज रूप भी प्रजलित हुआ। हिन्दी में आकर इसने बजाज का रूप ले लिया। इस बजाज शब्द का रिश्ता भी कपड़े से जुड़ता है। बजाज यानी कपड़ों का धंधा करने वाला। वणिक समाज में कपड़ों के कारोबार से जुडे समूह का तो बजाज उपनाम ही प्रचलित हो गया है। गांधीवादी बजाज परिवार ने अपने स्कूटर को बजाज नाम देकर हमारा बजाज को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। वस्स शब्द का जब पश्चिम में प्रसार हुआ तो अरबी में इसके साथ पहले लि प्रत्यय जुड़ गया और एक नया शब्द बन गया लिबास, मगर अर्थ वही रहा। पोशाक या वस्त्र।
चर्बी या चिकनाई के लिए वसा शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। वसा का अर्थ मज्जा, मेद या मोटी खाल ही होता है। जाहिर सी बात है कि चर्बी और खाल भी शरीर पर चढ़ी रहती है इसीलिए इसके लिए भी वसा शब्द का प्रयोग होता है। अंग्रेजी के उद्गम यानी पोस्ट जर्मेनिक में वस्त्र के लिए वज्नन शब्द का प्रयोग होता है। संस्कृत धातु वस् का जब पश्चिम में और ज्यादा प्रसार हुआ तो कई यूरोपीय भाषाओं में पहनने –ओढ़ने के अर्थ में इसने प्रवेश पाया। अंग्रेजी का विअर wear यानी पहनना शब्द भी इससे ही निकला है।

3 कमेंट्स:

अभय तिवारी said...

प्यारी बात.. कभी धातुओं कैसे अस्तित्व में आई.. उनका विकास कैसे हुआ.. इस पर प्रकाश डालिए.. वहाँ बड़ा अँधेरा है..

Gyandutt Pandey said...

ये अभय से आपकी जमेगी/जमती होगी. भाषा को लेकर व्युत्पत्ति और नियम खोजना आप दोनो का प्लस प्वाइण्ट है. मुझसे तो शायद आपको एलर्जी हो जाये! मेरा शब्द भण्डार कम है और शब्द न मिले तो क्वाइन करने में पक्का यकीन है! :)

जोगलिखी संजय पटेल की said...

अजित भाई ..थोड़े में कितना कुछ कह जाते हैं आप.आपके ब्लाँग का नियमित पारायण कर रहा हूं और शब्दों की दुनिया से नया राब्ता बन रहा है मेरा.वास,बास और बजाज से ही ध्यान आया पाक़ीज़ा के बहुश्रुत गीत इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा...जिसके एक अंतरे में आता है..हमरी ना माने बजजिया से पूछो.ऐसे ही अजित भाई बोलियों मे आए शब्दों पर भी शोध-परक काम शुरू होना चाहिये क्योंकि बोली का फ़लक कहीं कहीं ज़्यादा विस्तृत हो गया है बनिस्बत भाषा के...जैसे नंगे पैर के लिये मालवी में है अवराणे पग ..यही अवराणे मराठी में अनवाणी हो जाता है.मालवी कसुमल पाग...राजस्थानी में केसरिया पाग हो गई है...आप भाषा के लिये बड़ा काम कर रहे हैं..मेरे असीम साधुवाद.

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