Thursday, January 3, 2008

अफीमची और पोस्ती


फीम शब्द मूलत: यूनानी भाषा का शब्द है न कि एशियाई। इसका मूल अर्थ है एक खास किस्म के पौधे पौपी का रस। पौपी को हिन्दी उर्दू में पोस्त के नाम से जाना जाता है। यूनानी भाषा में इसे opion कहा जाता है। पोस्ते के रस से अफीम का निर्माण संभवत: सबसे पहले यूनान से ही शुरू हुआ हो। यूनान से निकला ये शब्द आज दुनियाभर में रोज इस्तेमाल होता है। यूनान से यह पहुंचा लैटिन में और इसका रूप हो गया ओपिअम। लैटिन से ही जर्मन , फ्रैंच, अंग्रेजी, आदि कई भाषाओं में थोड़े बहुत परिवर्तन केसाथ ये यूरोप में फैल गया। यूनान से ही इस शब्द ने एशिया की यात्रा की और सबसे पहले अरब पहुंचा afyun यानी अप्यून के रूप में। वहां से ये ईरान होते हुए भारत पहंचा। यही शब्द हिन्दी में अफीम, गुजराती व मराठी में अफीण, मालवी में आफू आदि रूपों में इस्तेमाल किया जा रहा है। अफगानिस्तान से सिल्क रूट के जरिये ये शब्द चीन भी गया और इसने चीनी रूप ग्रहण कर लिया अ-फू-युंग जो मूलत: अरबी रूप अफ्यून का ही रूपांतर है।
बात पोस्त और पोस्ट की
संस्कृत में अफीम के लिए अहिफेन नाम मिलता है। अहि का मतलब होता है सांप, अजगर आदि। फेन का मतलब हुआ झाग अर्थात सांप के मुंह से निकला फेन। फारसी में अफीम के आदी के लिए अफीमची शब्द खूब चलता है और इसे हिन्दी - उर्दू में भी बोला जाता है। फारसी में अफीम को पोस्तः कहते हैं। मज़ेदार बात ये कि इस ज़बान में अग्रेजी का पोस्ट शब्द हो जाता है पोस्तः यानी पोस्ता। अब कई बार यह ग़लतफहमी हुई है कि कह ये जाता रहा कि पोस्ती है अर्थात अफीमची है और सुना ये जाता रहा कि चिट्ठी आई है। पोस्त से बना पोस्ती यानी अफीमची या मदकची। हिन्दी की प्रसिद्ध कहावत नौदिन चले अढ़ाई कोस को अगर आप पूरा सुनें तो यही पोस्त नुमायां होता है। पूरी कहावत है-पोस्ती ने पी पोस्त, नौ दिन चला अढ़ाई कोस।
गौरतलब है कि चीनी लोग अफीम के इतने लती रहे कि चीन पर कब्जा करने के बाद अंग्रेजों ने लंबे समय तक अफीम के जरिये राजनीति की। यही नहीं अफीम का जन्मदाता चाहे यूनान हो मगर दुनिया में सबसे ज्यादा अफीम की पैदावार उससे हजारों किलोमीटर दूर अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत और चीन जैसे एशियाई इलाकों में होती है।

चित्र-लेख के बीच में दिया गया चित्र ट्यूनिशिया के चित्रकार अली बिन सालेम की प्रसिद्ध कृति ओपियम का है।
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आपकी चिट्ठी

सफर की पिछली धारावाही कड़ियों छैला-छबीला और छमक छल्लो पर सर्वश्री संजय , दिनेशराय द्विवेदी, हरिराम, महर्षि, काकेश , रवीन्द्र प्रभात, संजीत त्रिपाठी डा अजीत की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार ।

8 कमेंट्स:

Lavanyam - Antarman said...

अफीण / या / अफीम पे ये आलेख पसँद आया -
२००८ मेँ और भी अच्छा लेखन करेँ
ये शुभ कामना है
-- स स्नेह, सादर,
-- लावण्या

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

संस्कृत में अफीम के लिए अहिफेन नाम मिलता है।
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अफीम के पौधों के पास सांप भी होते हैं क्या? लगता तो नहीं। भगवान शिव का भी कोई एसोशियेशन है अफीम से? भांग/धतूरे से तो है।

पद्मनाभ मिश्र said...

मेरे धाम मे आपका आना मुझे बहुत अच्छा लगा. एम. ए. मे आपको विद्यापति अच्छा लगा इसके लिए मै और भी आभारी हूँ. बहुत कम मैथिल हैं जिनको विद्यापति रास आता है. गैर मैथिल को विद्यापति अच्छा लगा जानकर अभीभूत हो गया.

हम आपके धाम मे और आप मेरे धाम मे आते रहेँगे तो बहुत बातों का पता चलेगा जो आपको और मुझको दोनो अच्छा लगता है. और बताया जाता है कि यदि यह एहसास हो तो दोनो मे नेचुरल दोस्ती की शुरुआत माना जाय.

मेरे धाम मे आने के लिए पुनः धन्यवाद

mamta said...

आपकी पोस्ट से काफी दिलचस्प जानकारियाँ मिलती है।

Sanjeet Tripathi said...

चलो जी अब कोई नौ दिन में हमारे अढ़ाई कोस चलने पर मजाक बनाएगा तो पूरी कहावत सुनाकर विरोध तो कर सकेंगे!
शुक्रिया
वैसे "मदकची" या "मदक्की" भी कोई शब्द है क्या।

मीनाक्षी said...

पोस्त पर पोस्ट पढ़कर और उस पर यह
"पोस्ती ने पी पोस्त, नौ दिन चला अढ़ाई कोस।" कहावत पढ़ कर अच्छी जानकारी मिली. धन्यवाद

सागर नाहर said...

पोस्ती... नौ दिन.. यह पूरी कहावत आज आपके चिट्ठे से ही पता चली।
बहुत बढ़िया जानकारियाँ है आपके इस चिट्ठे पर, धन्यवाद।

Mala Telang said...

वाह वाह ,मजा आया ये पोस्त की पोस्ट पढ़ कर, इसमें काफी ऐसा था जो कुछ पहली बार ही पढा सुना था खासकर ये कहावत.. पोस्ती ने पी पोस्त नौ दिन चल्ा अढाई कोस ।थोडा असमंजस में हूँ, मराठी में इसे खसखस कहते हैं ,ये कहाँ से आया?

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