Sunday, January 27, 2008

सकल जग माँ ही...[ अम्मा में समायी दुनिया -2]

माँ की महिमा को समर्पित यह आलेख प्रियवर बोधिसत्व जी ने लगातार आग्रह कर लिखवा लिया है। बोधिभाई माँ के विषद, व्यापक रूप पर एक विशिष्ट प्रकाशन की योजना में इन दिनों लगे हुए हैं। मुझे दीवाली पर इस तथ्य की जानकारी मिली। इससे पूर्व माँ पर सफर का एक पड़ाव आ चुका था। बहरहाल, यह आलेख बोधिभाई के मापदण्ड पर कितना खरा उतरता है , इसका अंदाज़ा नहीं। शायद वैसा न बन पाया हो , जैसा वे चाहते हों । उनके काम के लिए शुभकामनाओं के साथ पेश है माँ की महिमा की यह दूसरी कड़ी।

माँ की महिमा समूची भाषा-संस्कृति में न्यारी है। सृष्टि में अगर जीवनदायिनी शक्ति कोई है तो वह सिर्फ माँ है। इसीलिए सीधे-सीधे माता के अर्थवाले संबोधनकारी शब्दों के अलावा भी ऐसे कई शब्द हैं जिनका मूलभाव निर्माण, पालन पोषण,विकास, श्रद्धा आदि से जुड़ता है उन्हें भी माँ के समकक्ष या पर्यायवाची शब्द के रूप में रुतबा
मिल गया । यूं सृष्टि और प्रकृति का अर्थ भी माँ ही होता है। अम्मा और माता शब्द की महिमा के बारे में हम सफर के पिछले पड़ाव अम्मा में समायी दुनिया में देख चुके हैं। भाषाविज्ञानी इसे ‘म’ वर्ण से निकला हुआ नर्सरी शब्द मानते हैं जो ध्वनि-अनुकरण प्रभाव के चलते एक ही आधार से उठकर भारतीय–यूरोपीय भाषा परिवार में फैलता चला गया। गौर करें कि शिशु जिन मूल ध्वनियों को अनायास निकालता है उनमें सर्वाधिक ‘म’ वर्ण वाली ही होती हैं यथा अम् , मम् , हुम्म् आदि। यह माना जाता है कि ये ध्वनियां स्तनपान के समय भी शिशु के मुँह से निकलती हैं। शिशु के मुँह से जब मम्-मम् जैसी ध्वनियां निकलती है तो हम इसे उसके भूखे होने का संकेत ही मानते हैं। इस ध्वनिसंकेत की महिमा देखिये कि समूचे जीवजगत में स्तनपायियों के लिए अंग्रेजी में मैमल शब्द प्रयोग किया जाता है जो बना है लेटिन कि मैम्मा से जिसका मतलब ही है स्तन अथवा पोषणग्रंथि। जो स्तनपान कराए, पालन करे वह माँ । इसलिए अंग्रेजी में माँ के लिए मम्मा, मम्मी जैसे शब्द है। थलचर स्तनपायियों में ज्ञात सबसे विशाल मगर अब विलुप्त हाथी की प्रजाति के लिए भी मैमथ शब्द इसी मूल का है। यही नहीं मातृत्व से जुड़ा मैटरनिटी और मातृकुल को इंगित करनेवाले मैटरनल जैसे शब्द भी इसी मूल से उपजे हैं।
अम्मा की व्यापकता हिन्दी के साथ साथ तमाम उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी है। अम्मा की छाया इतनी गहरी है कि दक्षिणी भाषाओं में तो ज्यादातर रिश्ते ही इस शब्द में समा गए हैं। तेलुगू में माँ के रूप में तो अम्मा है ही नानी के लिए अम्मय्, अम्मसी और अम्माअत्ता जैसे रूप भी हैं। तेलुगू में दादी के लिए अम्माम्मी, मामी के लिए अन्मंति,अम्मे यानि पिता , अम्मी यानी छोटी बहन जैसे शब्द यही साबित करते हैं। इसी तर्ज पर हिन्दी में माँ के भाई के लिए मामा व मामा की पत्नी के लिए मामी जैसे शब्द भी माँ की महत्ता को ही सिद्ध करते हैं । संस्कृत में मामा के लिए मातुल व मातुलानी शब्द भी हैं। दक्षिण की भाषाओं में अम्मा के अलावा अक्का (बड़ी बहन के लिए भी प्रचलित ), अत्ता, अत्तिका, अन्ना, अन्नी ( गौर करें नानी , अंग्रेजी के नैनी या ग्रेनी जैसे शब्दों पर ) के अलावा उर्दू में अम्मी, हिन्दी में मैयां ,महतारी, माई, मातृका जैसे अनेक पर्यायवाची शब्द हैं जो माँ की महिमा का बखान करते हैं। मराठी में पिता की बहन अर्थात बुआ को अत्या , आत्या कहते हैं जो दक्षिणी प्रभाव (संभवतः कन्नड़)है।
अगले पड़ाव पर भी जारी

आपकी चिट्ठी


सफर के पिछले पड़ाव रगड़-रगड़ हथेली...नुक्ताचीं है ग़मे-दिल पर सर्वश्री यूनुस , पारुल, विमल वर्मा, संजय करीर और संजय बैगाणी जी की प्रतिक्रियाएं मिलीं।
यूनुस भाई , आपकी बात सही है। मैने भी यही कहा है कि कम से कम मीडिया वालों को (रेडियो , टीवी )तो उच्चारण की शुद्धता बरतनी ही चाहिए। अखबारों ने अपनी स्टाइल शीट बनाई हुई है, वे उसके हिसाब से चलें। छपे हुए का अभिप्राय समझदार व्यक्ति लगा ही लेता है।
विमल भाई, मराठी के उच्चारण कुछ अलग चलते हैं। जैसे हम नुक्ते को अरबी, फारसी मानते हुए हिन्दी पर लिखने में न थोपने की बात करते हैं वैसे ही मराठीवाले अंग्रेजी शब्दों में झ का प्रयोग ज्यादा करते हैं। इसके अलावा उनकी मात्राएं मराठी व्याकरण के हिसाब से सही होती हैं। हम हिन्दी वाले उसे गलत देखते हैं। मराठी यूं तो आर्यभाषा परिवार की है मगर उसका व्याकरण कन्नड़ पर आधारित है( यह तथ्य हमे प्रख्यात कवि, लेखक, भाषाविद् प्रभाकर माचवे ने बताया था )।
संजयद्वय की बातों से भी सहमत हूं। की बोर्ड की समस्या के चलते सभी जगह नुक्ता ही लिखा गया है। जो आपने लिखा है वह सही है। हमारे नुक्ता का अभिप्राय भी ( अगर हमने गलत लिखा फिर भी ) आपने विषयवस्तु के मद्देनजर उर्दू नुक्ता से ही लगाया न कि मृत्युभोज से जुड़े नुक्ता से:)

4 कमेंट्स:

vijayshankar said...

अजित भाई, मुसलसल वार्तालाप के बावजूद बोधि भाई ने यह राज़ मुझ पर कभी नहीं खोला कि वह माँ के विषद व्यापक स्वरूप पर किसी विशिष्ट प्रकाशन की योजना बनाए हुए हैं. उन्हें उनके इस प्रयास पर अग्रिम बधाई!

आपके द्वारा इस्तेमाल किए एक शब्द ने मेरा ध्यान खींचा है. वह शब्द है- 'प्रियवर!'

लोगों का ख़याल है कि यह शब्द गीतकार इन्दीवर का लोकप्रिय किया हुआ है.

मेरी जानकारी के अनुसार उनसे कई वर्ष पहले जनकवि 'शील' ने इस शब्द का ऐसा उपयोग किया था जो हिन्दी समाज की धरोहर बन चुका है. इसकी तस्दीक अन्य हिन्दीप्रेमी भी करेंगे.

शील जी ने लिखा था-
'भेज रहे हैं नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हे बुलाने को
हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को'

अब आपके सामने भी सब साफ हो गया होगा..

यह कहाँ, कब और किन हालात में लिखा था वह कभी बाद में. अच्छा काम ज़ारी रखिये. आपसे सबको स्नेह है. बधाइयां!

Sanjay said...

चलिए नुक्‍ते की नुक्‍ताचीनी तो समाप्‍त हई. आज की पोस्‍ट शानदार है. मां के बारे में जानकारी पढ़कर बहुत संतोष मिला. खूब सोचा पर कमबख्‍त याद नहीं कर पाया... कहीं पढ़ा था कि इस एक शब्‍द के दुनिया की विभिन्‍न भाषाओं में सबसे अधिक (संख्‍या ही तो याद नहीं आ रही)समानार्थी शब्‍द मौजूद हैं. सबसे रोचक तथ्‍य यह है कि लगभग सभी में ध्‍वन्‍यातमक तथा शाब्दिक (शायद शाब्दिक कहना ठीक है)समानता भी है. इस बेहतरीन जानकारी देने वाली पोस्‍ट के लिए धन्‍यवाद.

बोधिसत्व said...

अजित भाई
आपने मेरा आग्रह माना यही बहुत है...मेरा काम बना दिया है आपने अहली कड़ी की राह देख रहा हूँ...
मैं सोच रहा हूँ कि अपनी योजना पर एक पोस्ट ही लिख दूँ...
विजय भाई
मैंने आपसे जिक्र किया था...फिर कर रहा हूँ कि मैं माँ से जुड़ी कविता और अन्य रचनाओं का एक संकलन संपादित कर रहा हूँ...यदि आपने कुछ लिखा हो तो हमें दें...
मैं सभी ब्लॉग वंधुओं से अपील कर रहा हूँ कि वे ऐसी रचनाएँ मुझ तक भेजें...

विनय said...

मराठी के 'आई' से मकार का लोप रुचिकर है. 'आई' के उद्गम पर कुछ प्रकाश डालेंगे?

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