Sunday, January 6, 2008

दोपहर की पहरेदारी और प्रहार

हिन्दी शब्द प्रहार का अर्थ होता है आघात करना,चोट पहुंचाना,वार करना, घायल करना आदि जबकि पहरेदार का मतलब होता है निगरानी करने वाला,रक्षा करने वाला आदि। एक अन्य शब्द है पहर जिसका मतलब होता है तीन घंटे की अवधि। मोटे तौर पर इन तीनों ही शब्दों में इसके अलावा कोई समानता नज़र नहीं आती कि इनमें वर्ण समान रूप से विद्यमान हैं। मगर इनमें न सिर्फ गहरी रिश्तेदारी है बल्कि ये एक ही मूल से जन्में भी हैं।
गौरतलब है कि संस्कृत में पहर को प्रहरः कहा जाता है। पहर यानी दिन का आठवां भाग अर्थात तीन घंटे का समय । गौरतलब है कि प्राचीनकाल में चौबीस घंटों को तीन-तीन घंटों के हिसाब से आठ हिस्सों में बांटकर कालगणना की जाती थी। इस हिसाब से चार पहर का दिन और चार पहर की रात। प्रत्येक तीन घंटे की सूचना राज्यसत्ता की ओर से घंटे को बजाकर दी जाती थी जो प्रायः नगर के मुख्य स्थान पर होता था। इस घंटे पर जोरदार आघात अर्थात प्रहार करने से जो ध्वनि होती थी उसे ही प्रहरः यानी पहर कहा जाता था। गौर करें कि सूर्योदय के दो पहर बीत चुके समय तक छह घंटे व्यतीत हो चुके होते हैं इसीलिए बारह बजे के आसपास के समय को दोपहर कहा जाता है जो इससे ही बना है। बाद में अलग अलग बोलियों में दुपहरिया, दोपहरी जैसे शब्द रूप भी बन गए। चूंकि आठों पहरों की सूचना के लिए लगातार , दिन-रात एक ही व्यक्ति घंटा नहीं बजा सकता थी, इसलिए अलग-अलग व्यक्ति एक-एक या दो-दो पहर के लिए बारी बारी से घंटा बजाने का काम करते थे। इसी वजह से उन्हें प्रहरिन् कहा जाता था। इसी प्रहरिन् का हिन्दी रूप हुआ प्रहरी । अर्से बाद प्रहरिन के बजाए घंटे की घनघोर गूंज में खुद प्रहरी इस क़दर गुम हुआ कि उसकी जगह आ गया पहरी , जिसने फिर कभी घंटा नहीं बजाया और सिर्फ चौकसी ही करता रहा कि कोई आ न जाए, या ग़ायब न हो जाए-प्रहरिन की तरह। इस शब्द के साथ कालांतर में निगरानी का भाव भी जुड़ गया सो पहरी का अर्थ हुआ सुरक्षाकर्मी । बाद में इससे ही बना पहरा शब्द जो उर्दू-फारसी में भी गया। पहरे के साथ प्रमुखता से सुरक्षा का भाव चस्पा हो गया। इसमें फारसी का दार प्रत्यय लग जाने से बना पहरेदार। अर्थात् रक्षक, चौकीदार, रखवाला आदि।

आपकी चिट्ठी

सफर की पिछली कड़ी अफीमची और पोस्ती पर कई हमराहियों की टिप्पणियां मिलीं जिनमें है लावण्याजी, संजीत त्रिपाठी, ज्ञानदा, सागरचंद नाहर, मीनाक्षी,पद्मनाभ मिश्र और ममताजी। आप सबका आभार ।

9 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी said...

रात्रि का अंतिम प्रहर है, ब्रह्ममुहुर्त है। नित्य मेरा शब्द सामर्थ्य बढ़ाने के लिए धन्यवाद।

Sanjay said...

हम आए थे दोपहर को, तब ये पहरेदार यहां नहीं पहंचे थे. अब ब्रह्म मुहूर्त में पुन: पधारे हैं तो इनसे मुलाकात हो गई. सुबह-सुबह ज्ञानवर्द्धन से अच्‍छा कोई काम नहीं. छुटपन में जब सुबह पढ़ने के लिए जल्‍दी उठने में कोताही करता था, तो पिताजी अक्‍सर पोस्‍ती कह कर ही डांट लगाते थे. आज आपने उन दिनों की बरबस याद दिला दी अजित भाई.

Aflatoon said...

१.दरजा आठ में जयशंकर प्रसाद के 'चन्द्रगुप्त' में मुझे नन्द का किरदार मिला था।" प्रतिहारी , इसकी शिखा पकड़ कर बाहर कर दो !" प्रतिहारी नामक पड़ाव भी रहा होगा इस शब्द के सफ़र में ?
२. लफ़्ज़ का बहुवचन अल्फ़ाज़ रहने दें, लफ़्ज़ों न करें ।
अफ़लातून.

मीनाक्षी said...

सुबह के पहर में आपकी पोस्ट पढ़ रहे है लेकिन दोनों बेटे प्रहरी बन खड़े हैं कि एक या दो पोस्ट के बाद सैर को जाइए. दूसरे पहर में पढ़ने फिर लौटेगे.

Rajesh Roshan said...

अजित जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद. मुझे तीन छेजो के बारे में जानना है. काल, रस और श्रिंगार

अजित वडनेरकर said...

अफलातूनजी
को नमस्कारम
अच्छा लगा आपकी चिट्ठी पढ़कर । यकीनन प्रतिहारी शब्द भी इसी कड़ी का ही हिस्सा है। याद दिलाने का शुक्रिया।इसे मैं शामिल कर लूंगा। शब्द ऐसे कई बाद में याद आते हैं जिन्हें उस कड़ी में जुड़ना था, मगर तब तक हम आगे बढ़ चुके होते हैं।
एक संशय मेरे मन में रहता है। आप एकदम दुरुस्त हैं कि अल्फाज ही बहुवचन है और बोलचाल में मै भी अल्फाज़ का ही सावधानी से प्रयोग करता हूं। मगर एक ग्रंथि पाले बैठा हूं कि शब्दों के सफर में जहां मैं सिर्फ शब्द की बात कर रहा हूं अगर शब्दों को के पर्याय के तौर पर प्रयोग करूं तो कहीं लोग उसका अभिप्राय वाक्य से तो नहीं लगा लेंगे । इसलिए लफ्जों लिखा। यू विदेशी शब्दो के साथ हिन्दी में अपना व्याकरण बरतने की भी छूट पत्रकारीय हिन्दी ने ले ली है। डाक्टर्स की जगह डाक्टरों । टीचर्स की जगह टीचरों। वैसे ये सुविधाजनक भी है , बजाए अलग अलग शब्दरूप चलें। वैसे शुद्धता का भी अपना आनंद है।

Anonymous said...

कमेंट जाता नहीं ,कहे बिना रहा जाता नहीं।बहुत भला काम कर रहे हो अजित भाई ,नये साल पर शुभम -बधाई ।
सिद्धेश्वर

mamta said...

हम तो रात के आख़िरी पहर मे पढ़ रहे है।

वैसे जब छोटे थे और गर्मी मे बाहर खेलने जाते थे तो अक्सर घर मे कहा जाता कहाँ भरी दुपहरिया मे खेलने जा रही हो।

Mired Mirage said...

बहुत बढ़िया !
घुघूती बासूती

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