Wednesday, April 30, 2008

और शिवजी उतर आए ब्लागगीरी पर [बकलमखुद -24]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश और मीनाक्षी धन्वन्तरि को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं कोलकाता के शिवकुमार मिश्र से । शिवजी अपने निराले ब्लाग पर जो कुछ लिखते हैं वो अक्सर ब्लागजगत की सुर्खियों में आ जाता है। आइये मिलते हैं बकलमखुद के इस छठे पड़ाव और चौबीसवें सोपान पर मिसिरजी से।

बुद्धि है पर गहरा नाता नहीं

ब्लॉग-गीरी शुरू करने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है. साल २००७ के फरवरी महीने में ज्ञान भैया को ब्लॉग-कीड़े ने काट लिया. जब इस बात की खोज हुई कि ये ब्लॉग-कीड़ा मिला कहाँ तो पता चला भैया रतलामी सेव नामक व्यंजन बनाने की विधि की खोज में निकले थे. रतलामी सेव बनाने की विधि मिली या नहीं लेकिन उनकी मुलाक़ात रवि रतलामी जी के हिन्दी ब्लॉग से हो गई. रवि रतलामी जी के हिन्दी ब्लॉग में भैया के लिए शायद कोड वर्ड में संदेश लिखा था, "अब यहाँ आ गए हैं, तो एक काम कीजिये, आप भी ब्लॉग-समाज की सदस्यता ले लीजिये." बस फिर क्या था. भैया ने लिखना शुरू किया और इस बात की सूचना मुझे दी. मैं उनका लिखा हुआ पढ़ता और रोमनागरी (रोम नगरी न समझा जाय. वहाँ के पुरूष बहुत बुद्धिमान और महिलाएं बुद्धिमती होती हैं. और मेरा बुद्धि से नाता गहरा नहीं है.) में टिपण्णी लिख देता था. टिपण्णी क्या, कभी-कभी टिपण्णी के रूप में पोस्ट लिख डालता. मेरी लिखी हुई टिप्पणियों को पढ़कर भैया ने बताया कि मेरे अन्दर एक ब्लॉगर छिपा बैठा है. उन्होंने मुझे सलाह दी कि अन्दर बैठे हुए ब्लॉगर को बाहर निकालने की कोशिश करनी चाहिए. बस इसी कोशिश की वजह से ब्लॉग-गीरी पर उतर आए.

औकात भर खुराफातें जारी रहीं...

ऐसा नहीं है कि पहले मैं नहीं लिखता था. पहले भी लिखता था लेकिन मेरा लिखा हुआ पढ़कर झेलने का काम हमारे नीरज भैया करते थे. मैं नीरज भैया को लगभग रोज चिट्ठी लिखता. नीरज भैया पढ़ते और उसका जवाब भी देते. क्या करते, उन्हें लगता होगा कि जवाब नहीं दिया तो ये आदमी कहीं घर छोड़कर भाग नहीं जाए. नीरज भैया को लिखी गई चिट्ठियां बड़ी दिलचस्प होती थीं. कभी कविता के ऊपर कुछ भी तो कभी सिनेमा के ऊपर, कभी बम्बैया भाषा में चिट्ठी तो कभी नीरज भैया की नई गजल की 'आलू-चना'. जितनी खुराफात करने की औकात थी, उतनी करता. पूरे हंड्रेड परसेंट कैपेसिटी यूटीलाईजेशन के साथ. बाद में जब ब्लॉग-गीरी पर उतरे तो नीरज भैया तो बच गए, लेकिन और बहुत सारे लोगों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. बेचारे अभी तक भुगत रहे हैं. मुझे याद है, जब पहली पोस्ट लिखी और पब्लिश की तो बार-बार देखता, किसी ने पढ़ा या नहीं. एक टिपण्णी मिली, वो भी मेरी लिखी गई बात के ख़िलाफ़. पढ़कर दिल बैठ गया. मुझे लगा इसका मतलब ज्ञान भैया मेरा मन रखने के लिए कहते थे कि मेरे अन्दर एक ब्लॉगर छिप कर बैठा हुआ है. खैर, उसके बाद मैंने एक और पोस्ट लिखी. इस पोस्ट पर एक भी टिपण्णी नहीं आई. अब टिपण्णी का भूखा मैं देखता ही रह गया. मन में बहुत लाऊडली बोला; "कोई एक टिपण्णी दिला दो भैया." लेकिन किसी ने मेरे मन की इस लाऊड बात को नहीं सुना. नतीजा ये हुआ कि अगले दो महीने में केवल तीन पोस्ट लिख पाया.

वयंग्य से पहली बार साक्षात्कार..

बाद में मैंने मन बना लिया; "आ गए हैं हम यहाँ तो गीत गाकर ही उठेंगे" टाइप, और निश्चित किया कि सप्ताह में कम से कम तीन पोस्ट जरूर लिखूंगा. मेरे भाग्य से मुझे देवनागरी लिखने का साफ्टवेयर मिल गया. अब पोस्ट लिखने में विशेष परेशानी नहीं होती थी. साफ़्टवेयर के अलावा बहुत से ब्लॉगर मित्रों ने हौसला भी बढाया. ये कहकर कि लिखते रहना, छोड़ना मत. बस, तभी से लिखे जा रहे हैं. आलोक पुराणिक ने एक दिन कहा; "कसम खाओ कि व्यंग लिखोगे, व्यंग के सिवा और कुछ नहीं लिखोगे" टाइप. उन्होंने अपनी एक टिपण्णी में लिखा; "ज्ञान जी की संगत में बिगड़ मत जाईयेगा. केवल और केवल व्यंग लिखियेगा." उनकी बात गाँठ बाँध ली. वो गाँठ अभी तक बंधी है. लिख रहा हूँ, जो भी मन में आता है. ब्लॉगर मित्र भी हैं कि झेले जा रहे हैं. व्यंग से पहली बार साक्षातकार हुआ १९८६ में. धर्मयुग के दीवाली अंक में अशोक चक्रधर जी की कविता 'राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव' छपी. कविता पढ़कर बहुत अच्छा लगा. दूसरी बार पढ़ी तो आधी कविता याद हो गई. तीसरी बार पढ़ने से पूरी कविता याद हो गई. अभी तक याद है. उसके बार अशोक चक्रधर जी की कवितायें खूब पढता. होली के शुभ अवसर पर दूरदर्शन पर कवि सम्मेलन दिखाया जाता. उसमें अशोक जी जो भी कवितायें सुनाते, उसे मैं याद कर लेता था. बाद में सं १९८७ में परसाई जी के निबंधों का संकलन 'विकलांग श्रद्धा का दौर' पढा. पढ़कर लगा, कोई ऐसा भी लिख सकता है. उसके बाद परसाई रचनावली के साथ-साथ के पी सक्सेना की मूंछ-मूंछ की बात नामक किताब पढ़ी. इसके साथ शरद जोशी के लिखे गए व्यंग पढ़कर लगा कि 'भइया हमारा समाज और काल ऐसा है कि इसके ऊपर व्यंग ही खूब जमता है.' व्यंग के साथ ऐसा अटूट रिश्ता जुड़ा कि ये रिश्ता देखकर 'धरम-वीर' भी शरमा जाएँ.

बातें ब्लाग समाज की...

व्यंग पढने और लिखने के अलावा बहुत सारे विषयों पर पढने और जानकारी लेने का धुन सवार रहता है. कुछ विषय तो मेरे मित्रों को बड़े अटपटे लगते हैं. जैसे मैंने उड़न तस्तरी (समीर भाई, ध्यान दें) और दूसरी दुनियाँ में जीवों की संभावित उपस्थिति पर खूब पढ़ाई की है. मेरे मित्र इसे पागलपन कहते हैं लेकिन अब क्या करें, है तो है. इसके साथ-साथ विश्व अर्थव्यवस्था और विश्व की भौगोलिक स्तिथि के बारे में पढ़ना बड़ा दिलचस्प लगता है. कविता में रूचि बचपन से थी, इसलिए आगे चलकर इस रूचि का विकास ही हुआ. दिनकर जी का लिखा हुआ पढने के बाद तो जीवन जैसे बदल सा गया.

अब बात करते हैं ब्लॉग-समाज की. पहली बार जब ब्लॉग पढ़ा तो लगा कि; 'भइया, ब्लॉग पर लिखनेवाले जिस स्तर का लिखते हैं, हम तो कभी ऐसा नहीं लिख सकेंगे. और अगर इस स्तर का नहीं लिख सकेंगे तो फिर इस अंतर्जाल-महाजाल पर लिखने की जरूरत नहीं है.' मेरा लेखन तो मुहल्ले के सरस्वती पूजा के शुभ अवसर पर छपने वाली पत्रिका में जाने लायक तो है लेकिन ब्लॉग पर? कभी नहीं. विषय इतने गंभीर और व्यापक कि मैं तो क्या मेरा साया भी घबड़ा कर बैकगीयर लगा ले और दूसरी दिशा को कृतार्थ करे. फिर मेरा ख़ुद का 'मौलिक विचार' मन में आया; "बालक, विश्व में छ सौ पचास करोड़ लोग रहते हैं. सभी अगर एक ही स्तर और सोच के हो जाएँ, तब तो कोई समस्या नहीं रहेगी." और ये दुनिया बगैर समस्या के चल नहीं सकती. इसलिए अपनी इस सोच को त्यागकर, जो मन में आता है, लिख.
बस फिर क्या था, लिखना शुरू किया. मजे की बात ये कि पहली बार अभय तिवारी जी के ब्लॉग पर गए, और उनसे झमेला कर आए. जैसा कि मैंने कहा; "बुद्धि से नाता दूर का है." अभय जी ने कॉर्पोरेशन के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे. मुझे लगा उनके दिए गए विचार किसी भी देश के कम्पनीज एक्ट में लिखे हुए हैं. बस, भैया मैंने अभय जी के ब्लॉग पर रोमनागरी में टिपण्णी दे डाली. उन्होंने मेरी टिपण्णी का जवाब दिया और मैंने उनकी टिपण्णी का. बाद में लगा कि ये तो गलती हो गई. इस तरह की टिपण्णी लिखने का कोई तुक नहीं था. लेकिन अब गलती हो गई थी तो हो गई थी. वो है न, हाँ, तीर कमान से और बात जुबान से वाली बात. वही बात यहाँ भी हो गई. खैर, ये बात आई-गई हो गई.

[ अगली कड़ी में समाप्त ] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, April 29, 2008

और शिवजी ने बनाई कम्पनी.. .[बकलमखुद-23]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है।
ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश और मीनाक्षी धन्वन्तरि को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं कोलकाता के शिवकुमार मिश्र से । शिवजी अपने निराले ब्लाग पर जो कुछ लिखते हैं वो अक्सर ब्लागजगत की सुर्खियों में आ जाता है। आइये मिलते हैं बकलमखुद के इस छठे पड़ाव और तेइसवें सोपान पर मिसिरजी से।

नौकरी से उचाट, खुद काम शुरु

शादी के बाद मैंने एक ही नौकरी की. नौकरी के दौरान शुरू के तीन-चार साल अपने काम के प्रति उत्साह रहा. स्वाभाविक बात है, 'नया धोबी साबुन जरा ज्यादा लगाता है.' लेकिन बाद में उत्साह कम होता गया. दिन भर में सारी चिंता केवल आफिस के बारे में रहती. काम का प्रेशर इतना रहता कि अपने बारे में सोचने का मौका मिलता ही नहीं था.ऊपर से मेरे कंधे पर मेरे डायरेक्टर साहब बैठ चुके थे. ठीक वैसे ही जैसे सिंदबाद जहाजी के कंधे पर एक बूढा बैठ गया था.साल २००१ में मैंने और मेरे मित्र सुदर्शन ने साथ में काम करने का प्लान बनाया. लेकिन आफिस की जिम्मेदारियां इतनी बढ़ गईं थीं कि वहाँ से निकलने का मौका ही नहीं मिलता था. करीब आठ साल नौकरी करने के बाद साल २००४ के अंत में नौकरी से तौबा कर ली. नवम्बर महीने के शुरू में मैंने नौकरी छोड़ दी. आफिस जाना पहले बंद किया और इस्तीफा बाद में दिया. जनवरी २००५ से कुछ मित्रों के साथ मिलकर एक कम्पनी बनाई.

सुदर्शन, विक्रम और रोशन

चूंकि साथ काम करने वाले मित्रों के विचार मिलते हैं, लिहाजा जीवन ठीक-ठाक चल रहा है. इन सालों में मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया मेरे बिजनेस पार्टनर विक्रम ने. विक्रम एस राजन ने. मुझसे करीब दस साल छोटा है विक्रम लेकिन उसका ज्ञान और किसी भी बात को अनलाईज करने की उसकी क्षमता गजब की है. सीए बनने के बाद वो हमारे साथ ही काम करता है. अभी तक बहुत कुछ सीखा विक्रम से. आगे भी बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. विक्रम आज की तारीख में मेरा साबसे बड़ा प्रेरणास्रोत है. मेरा दूसरा बिजनेस पार्टनर सुदर्शन है. हमदोनो ने एक ही सीए फर्म से अर्टिकिलशिप की थी. पूरे पन्द्रह सालों का साथ है हमारा. सुदर्शन सीए के विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ाता है. बहुत नाम है उसका अपने क्षेत्र में. सुदर्शन के लिए उसके स्टूडेंट्स ने ऑरकुट पर करीब पन्द्रह कम्यूनिटी बना रखी हैं. गजब का व्यक्तित्व है सुदर्शन का. जीवन में हर चीज के लिए एक मध्यमान तय कर लेना सुदर्शन को बहुत अच्छी तरह से आता है.हमारा तीसरा पार्टनर है रोशन. जब भी रोशन साथ रहता है तो जीवन में बड़ा चैन रहता है. उससे मिलकर मैं हमेशा खुश हो जाता हूँ. वैसे रोशन समझता है कि मैं मजाक कर रहा हूँ, लेकिन मैं जब भी रोशन को देखता हूँ, मेरे मुंह से बरबस ही निकल आता है; "आ गए राम." और ये बात मैं दिल से कहता हूँ. रोशन ऐसा है ही. विक्रम और रोशन एक साथ पढ़ते थे और सुदर्शन के स्टूडेंट्स थे. जब कभी मैं और सुदर्शन एक साथ होते हैं तो इस बात की चर्चा जरूर करते हैं कि हमलोग कभी विक्रम और रोशन के जैसे बन सकेंगे? शाम को आफिस से हमलोग अक्सर साथ ही घर जाते हैं. किसी भी बात पर चर्चा शुरू होती है तो उसमें हास्य की मिलावट का काम अपने आप शुरू हो जाता है. चूंकि हमलोग स्टॉक मार्केट ऑपरेशन्स से जुड़े हैं तो हर बात में स्टॉक मार्केट का उदाहरण अपने आप आ जाता है. हमलोग साथ रहते हैं तो जीवन से तनाव एकदम दूर रहता है.

दफ्तर से घर के बीच क्रिकेट

मारे लिए हर जगह हास्य पैदा कर लेने का काम बड़ा सरल हो गया है. कई बार ऐसा होता है कि हम सब आफिस से जल्दी निकल गए और घर जाते समय जैसे ही विक्टोरिया मेमोरियल के सामने वाले मैदान के पास पहुँचते हैं तो कार रोककर कार की डिक्की से बैट, बाल और स्टंप निकालकर एक-डेढ़ घंटा क्रिकेट खेल लेते हैं. सर्दियों में लगभग हर रविवार को क्रिकेट खेलते हैं. कार की डिक्की में बैट, बाल, स्टंप, पैड वगैरह का रहना आवश्यक है. क्रिकेट खेलते समय हम एक-दूसरे के ख़िलाफ़ 'स्लेजिंग' भी करते हैं. अगर सुदर्शन बालिंग कर रहा हो और मैं उसका कोई बाल नहीं खेल सकूं तो मेरे सामने तक आकर कहता है; "घर जाइये, टीवी पर क्रिकेट देखिये. देखने में ठीक लगता है, खेलने में नहीं." मेरे साथ सुदर्शन का बड़ा झमेला चलता रहता है. हमलोग अक्सर बहस करते हैं कि सचिन तेंदुलकर के बाद भारत का सबसे अच्छा बैट्समैन कौन है? मामला दो नामों पर जाकर रुकता है. शिव कुमार मिश्र और सुदर्शन अग्रवाल. फिर इस बात पर समझौता हो जाता है कि एक दिन इस समस्या के समाधान के लिए सचिन के पास जायेंगे. मैंने अभी तक सचिन के इतने बड़े-बड़े फैन देखे हैं लेकिन सुदर्शन से बड़ा नहीं देखा. अगर किसी मैच में सचिन सेंचुरी बना दें तो उस दिन सुदर्शन बाकायदा अपने स्टूडेंट्स को पार्टी देता है. उसकी ये 'फैनगीरी' वाली बात उसके स्टूडेंट्स को भी मालूम है. लिहाजा वे पार्टी की डिमांड कर डालते हैं.

हंसी मजाक और नई नई खुराफातें

जीवन में हास्य और व्यंग खोजने की जरूरत ही नहीं पड़ती. हास्य का 'उत्पादन' कैसे किया जाता है, ये बात हमारे आफिस या घर में आकर कोई भी देख सकता है. कल की ही बात लीजिये. घर में बैठे-बैठे टीवी पर समाचार देख रहे थे. न्यूज़ एंकर ने कहा; "हरभजन सिंह और श्रीसंत के इस झगड़े के बारे में आपको और जानकारी देंगे, एक छोटे से ब्रेक के बाद. आप कहीं मत जाईयेगा." मुंह से बरबस ही निकल आया; "कहाँ जायेंगे? बाहर बहुत गरमी है. आप निश्चिंत होकर जाइये, हम यहीं मिलेंगे." मेरी बात सुनकर पमिला हंसने लगी. हमलोग सबसे ज्यादा नक़ल करते हैं अमिताभ बच्चन साहब की. खासकर उनकी हर बात में वे जिस तरह से हिन्दी बोलते हैं और उनके बाबूजी का जिक्र आता है; "पूज्यनीय बाबूजी कहा करते थे", उसका खूब उपयोग होता है. जैसे अगर हम स्टॉक मार्केट के गिरने को लेकर बात कर रहे होते हैं तो अमिताभ बच्चन साहब की स्टाइल और आवाज में शुरू हो जाते हैं; "देखिये, प्रतिभूति में निवेश के बारे में हमें कोई ख़ास अनुभव तो है नहीं. वैसे भी पूज्यनीय बाबूजी कहा करते थे कि जिस बात की समझ नहीं हो, उसके बारे में किसी से सलाह ले लेनी चाहिए. अब हमें आजतक कोई सलाहकार तो मिला नहीं इसलिए हम अमर सिंह जी और अनिल अम्बानी जी से ही सलाह लेते रहते हैं." इस तरह की खुराफात लगातार होती रहती है.

कवि सम्मेलन, मुशायरा बजरिये वीडियो सीडी

नोरंजन का एक और साधन है कविता, और उर्दू के शेर. कुछ नीरज भइया की वजह से और कुछ हमारी अपनी 'करतूतों' की वजह से, हमलोगों के पास कवि सम्मेलनों और मुशायरों के ढेर सारी वीडियो सीडी है. इनमें से बहुत सारी हमारे लैपटॉप और कम्प्यूटर्स में है. जब कभी भी समय मिलता है तो मैं और सुदर्शन कवि सम्मेलनों और मुशायरों की सीडी देखते हैं. बहुत आनंद आता है. आनंद शायद इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि हमदोनों साथ रहते हैं. अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

पतनशील होना लाज़िमी है...


देवनागरी के वर्ण में निहित वायु के अर्थ में मूलतः गति का भाव ही प्रमुख है। इसीलिए इससे पवन शब्द बना। से बने पतः या पत् में एक तरफ जहां उड़ना, जाना , उंचाई पर पहुंचना जैसे अर्थ हैं वहीं दूसरी तरफ गिरना, नीचे आना, उतरना, निकट आना जैसे भाव भी इसमें निहित हैं। गौर करें कि उड़ान भरना और फिर नीचे उतरना दोनों ही गतिवाचक क्रियाएं हैं इसलिए में मूल रूप से गति या प्रवाह का भाव ही महत्वपूर्ण नज़र आता है।
आमतौर पर चारित्रिक अधोगति के अर्थ में हिन्दी में पतन, पतनशील, पतित, पतिता जैसे शब्द खूब इस्तेमाल होते हैं। ये सब शब्द पत् में समाए नीचे उतरने , गिरने आदि भावों के आधार पर बने हैं। पत् से ही बना पत्र यानी पत्ता भी हवा में गति करता है फिर गिरता है। यानी पत्ते में उड़ने, उठने,गति करने और गिरने की सब क्रियाएं शामिल हैं। जाहिर सी बात है कि हिन्दी में प्रचलित हवा में उड़ना, ऊंचे उड़ना जैसे मुहावरे कहीं न कहीं चेतावनी या व्यंग्य के रूप में ही इस्तेमाल किए जाते हैं जिनमें शायद यह भाव भी छुपा है कि ऊंचे उड़ने के बाद गिरने की भी आशंका होती है अर्थात पतन हो सकता है।
पत् से बने पत्र में जहां फूल की पत्ती , वृक्ष की पत्ती का अर्थ है वहीं इसमें चिट्ठी अथवा खत वाले पत्र का भाव भी शामिल हो गया । पत्र या यानी दस्तावेज, पांडुलिपि आदि। आमतौर पर कह दिया जाता है कि पुराने ज़माने में लिखने का काम काग़ज़ की जगह पत्तों पर किया जाता था । मगर शायद ही कहीं ऐसा किया जाता हो । अलबत्ता प्राचीनकाल में वृक्षों की बहुत पतली छाल पर ज़रूर लिखा जाता था और उसे ही पत्र कहा जाता था जैसे ताड़पत्र , भोजपत्र आदि। यह नामकरण इसलिए नहीं हुआ क्योंकि वे पत्ते थे बल्कि उनमें पत्तों जैसा गुण था अर्थात सचमुच सामान्य वृक्षों की छाल जैसी रुक्षता और मोटापन उनमें नहीं था। जो पत्ते की तरह से पतले थे। अब पतला शब्द की व्युत्पत्ति के पीछे भी इस पत्र को तलाशा जा सकता है। धातु की पतली चादर के लिए भी पतरा शब्द इसी मूल का है।
विवाह आदि में सहभोज के दौरान हिन्दुस्तान में आज भी दोना-पत्तल पर खाने का रिवाज़ है । थालीनुमा आकृति की पत्तल के लिए यह शब्द पत्र से ही बना है क्योंकि दोना और पत्तल दोनो हीं पत्तों से बनाए जाते हैं। इनका शुद्ध रूप हुआ पत्र+अवलि=पत्रावलि । इससे ही बना पत्तल। दोना बना है संस्कृत के द्रोणिः शब्द से जिसका मतलब होता है पानी का डोल, चिलमची, कुप्पी आदि। दो पहाड़ों के बीच की भूमि जहां पानी एकत्रित हो जाता है द्रोणिका ही कहलाती है। इससे जाहिर होता है कि किसी ज़माने में द्रोण यानी दोने में दाल या सब्जी नहीं बल्कि पानी भर कर दिया जाता था। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, April 28, 2008

शिवजी की ससुराल तो ऊटी में !!! [बकलमखुद-22]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है।
ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश और मीनाक्षी धन्वन्तरि को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं कोलकाता के शिवकुमार मिश्र से । शिवजी अपने निराले ब्लाग पर जो कुछ लिखते हैं वो अक्सर ब्लागजगत की सुर्खियों में आ जाता है। आइये मिलते हैं बकलमखुद के इस छठे पड़ाव और बाइसवें सोपान पर मिसिरजी से।

परिश्रम के अलावा कोई और रास्ता नहीं

लकत्ते आने के बाद पढ़ाई ठीक-ठाक की. पिताजी जिस कालेज में पढाते थे, उसी कालेज में दाखिला लिया. शुरू के कुछ महीने बड़े कठिन गुजरे. कठिन इसलिए कि मुझे इतने अनुशासन में न तो रहने की आदत थी और न ही पढने की. लेकिन और कोई रास्ता नहीं था.
कलकत्ते आने के बाद तीन-चार महीने मुझे उत्तर प्रदेश में ट्रकों के ऊपर पढे गए नारे की याद खूब आई. नारा था "परिश्रम के अलावा और कोई रास्ता नहीं." जब भी याद आती, लगता मेरे लिए ही लिखा गया है. हायर सेकेंडरी की पढाई के दौरान नए-नए मित्र मिले. बड़ा बदला-बदला माहौल था. बदले हुए माहौल की कल्पना आप गाँव में रहते हुए मेरे दोस्तों के नाम और कलकत्ते आने के बाद मिले दोस्तों के नाम से ही लगा सकते हैं. जहाँ गाँव में रहते हुए मेरे दोस्तों में मुन्ना पाण्डेय, मैना सिंह, मुन्ना सिंह, बिरेंदर सिंह, प्रेम बहादुर सिंह प्रमुख थे, वहीं कलकत्ते आने के बाद मुझे प्रकाश पटोदिया, आनंद जोशी, पंकज राठी, गौरव चतुर्वेदी, संजीव माहेश्वरी और विकास माहेश्वरी जैसे दोस्त मिले. इन लोगों का नाम सुनकर ही लगता है कि बहुत पढ़वैये टाइप बच्चे थे. और गाँव के दोस्तों के नाम से आप ख़ुद अंदाजा लगा लीजिये कि उनके नाम सुनकर मन में क्या भाव आते हैं. मेरे दोस्तों में लगभग सब के साथ अभी तक संवाद बना हुआ है. सबसे प्रमुख हैं, तारकेश्वर मिश्रा. तारकेश्वर मिश्रा बड़े सरल और उसके साथ बुद्धिमान और बलवान भी है. हम दोनों की दोस्ती बहुत गहरी है. उनकी बलवानी के किस्से बहुत से हैं. मुझे याद है, तारकेश्वर जब हायर सेकेंडरी में पढता था उस समय उसका वजन ८३ किलो था. लम्बाई छ फुट से ज्यादा. चलता था तो देख कर यकीन नहीं होता था कि कोई विद्यार्थी है. हमेशा आभास होता जैसे कोई पहलवान चला आ रहा है. किसी को अगर ये बता देते कि ये विद्यार्थी है तो शायद जवाब ये मिलता कि 'पहलवानी का विद्यार्थी होगा.'

मैनर नहीं जानता, चला आता है यूपी-बिहार से!

लकत्ते आने के बाद भाषा की वजह से बड़ी समस्या होती. सबसे ख़राब तब लगता जब यहाँ के 'प्रबुद्ध' लोगों को ये लगता कि बाहर से आया है और हिन्दी बोलता है, मतलब 'खतम' ही होगा. मुझे याद है, एक बार मैं और तारकेश्वर कलकत्ते से हावड़ा आ रहे थे. जब तारकेश्वर साथ में रहता था तो कोई चिंता नहीं रहती. एक तो वो बांग्ला बोल सकता था और दूसरे काया ऐसी थी कि साथ वाला हमेशा 'सिक्योर्ड' फील करता. एक बार हम दोनों बस में चढ़े. चूंकि हावड़ा ब्रिज पार करके स्टेशन तक जाना था, और हम लोग एकदम लास्ट वाले स्तापेज पर चढ़े थे लिहाजा बस में बहुत भीड़ थी. बस में चढ़ते ही तारकेश्वर तो अन्दर चला गया लेकिन मैं दरवाजे पर ही खड़ा था. हमने ये सोचा कि और कोई नहीं बस पर शायद नहीं चढ़े. लेकिन ठीक उसी समय एक साहब ब्रीफकेस लिए बस पर चढ़े. वे चाहते थे कि मैं बस में अन्दर चला जाऊं. तारकेश्वर अन्दर जा चुका था. लेकिन जगह नहीं होने की वजह से मैं अन्दर नहीं जा सका. ये साहब जो ब्रीफकेस लिए चढ़े थे, उन्होंने बहुत भला-बुरा कहना शुरू किया. मुझे सबसे बुरा तब लगा जब उन्होंने कहा; "मैनर नहीं जानता है. चला आता है यूपी-बिहार से. बुद्धि कुछ है कि नहीं?" मैंने उनसे कहा कि ये सब बोलकर वे थोड़ा रिस्क ले रहे हैं. उन्हें गाली नहीं देनी चाहिए. खैर, किसी तरह हावड़ा स्टेशन पहुंचे. और जैसे ही बस रुकी, तारकेश्वर जी अपना पूरा शरीर लेकर बस से बाहर आए. नजारा ठीक वैसा था जैसे हिन्दी फिल्मों में विलेन के ताली बजाने से बड़ा भयंकर किस्म का साढ़े छ फुट का असिस्टेंट गुंडा सामने आता है. तारकेश्वर महाराज बाहर आए और तुरंत सवाल किया; "कौन था जो गाली दे रहा था?" तारकेश्वर को देखते ही उन महाशय की सिट्टी-पिट्टी गुम. अभी कुछ सोचते, उससे पहले ही तारकेश्वर जी ने उन्हें दो तमाचा लगा दिया.

गणित में फिसड्डी

मैं विज्ञान का विद्यार्थी था. लेकिन गणित से हमेशा भागता था. लिहाजा गणित में हमेशा कम नंबर मिलते. बारहवीं पास करने के बाद स्कॉटिश चर्च कालेज से बायलाजी और केमिस्ट्री में बी एससी किया. पढ़ाई में समय कम देता था. इसलिए घरवालों को हमेशा चिंता रहती. मुझे याद है, जिस दिन रिजल्ट आया था, मैं घर देर से पहुंचा. घर वाले परेशान थे. उन्हें लगा, शायद मैं फेल हो गया इसलिए घर वापस नहीं आना चाहता था. लेकिन शाम को घर पहुँच कर बताया कि मैं ओ अच्छे नंबरों से पास हो गया. तब सबने राहत की साँस ली. उसके बाद मैंने सीए में प्रवेश लिया.

पेट्रिक स्वेज,डेमी मूर और माशूक का भाई!

सीए में अर्टिकिलशिप के दौरान मेरी मुलाकात पामिला से हुई. जी हाँ, मेरी पत्नी, पामिला. उनका परिवार तमिलनाडु से हैं. हमदोनों एक ही फर्म में अर्टिकिलशिप कर रहे थे. अब इनके साथ भी कई किस्से ऐसे हैं जो हमेशा याद आ जाते हैं. आफिस में मिलने के बाद हमदोनों एक बार मूवी देखने गए. पैट्रिक स्वेज और डेमी मूर की बड़ी हिट फ़िल्म आई थी, द घोस्ट. हम दोनों सिनेमा हाल पहुंचे. अभी पहुंचे ही थे कि देखा कि टिकेट विंडो पर किसी को देखकर पामिला ठिठक गई. एक लड़का बहुत लंबा और बड़ा कठोर सा दिखने वाला. मजे की बात ये कि देखने में पामिला से चेहरा मिलता था. मैं समझ गया कि ये पामिला के भइया हैं. लेकिन अब कुछ कर नहीं सकता था. एक बार के लिए लगा कि आज धुनाई न भी हुई तो शायद कल हो जाए. लेकिन मेरे भाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ. [ असल में ये तस्वीर साल २००६ में दीवाली के दिन की है. मेरा छोटा भाई, बब्लू आया था उन दिनों. बब्लू न्यूकैसल में रहता है. डॉक्टर है. तस्वीर में मेरे अलावा, मेरी पत्नी पमिला, जाह्नवी (बब्लू की बेटी), अम्मा और बब्लू की पत्नी रीना है. हमारी अपनी कोई संतान नहीं लिहाजा, मेरे बड़े भैया के दो बेटे और बब्लू की दो बेटियाँ ही हमारे लिए सबकुछ हैं.]


हम तो मुहब्बत करेगा, दुनिया से नही डरेगा...


मैने पामिला से १९९६ में शादी कर ली. घर वालों की तरफ़ से शादी की मुखालिफत हुई. सामान्य बात थी. इसके पहले हमारे परिवार में किसी ने भी अंतर्जातीय विवाह नहीं किया था, लिहाजा विरोध होना स्वाभाविक बात थी. पिताजी और अम्मा के साथ-साथ मेरे चाचा, चचेरे भाई वगैरह, सभी नाराज थे. शादी के करीब डेढ़ साल बाद तक मैं घर नहीं गया. इस दौरान मेरी मुलाक़ात मेरे छोटे भाई, बबलू से होती रहती थी. बबलू कालेज के हॉस्टल में रहकर डाक्टरी की पढ़ाई करता था. मैं उससे मिलता रहता. फिर एक दिन पिताजी और अम्मा घर पर आए. उसके बाद सबकुछ सामान्य हो गया. ऊटी में मेरी ससुराल है. पामिला के घर वाले ऊटी के ही हैं. उनदिनों हिन्दी फिल्मों की शूटिंग स्विटजरलैंड में कम ही होती थी. इसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ता. जब कोई फ़िल्म देख रहा होता तो श्रीमती जी ठीक गाइड की तरह शुरू हो जातीं; 'और ये देखो, ये जो जगह है वो ऊटी का बोटेनिकल गार्डन हैं. यहाँ बहुत शूटिंग होती है. और हाँ, ये जो जगह है, ये वहाँ की एक झील है.' मैंने एक बार सोचा कि श्रीमती जी को इस गाईड वाले मोड से निकालने का एक ही रास्ता है कि मैं एक बार ख़ुद ही ससुराल चला जाऊं. एक बार वहाँ जाकर आया तबसे ये गाईड वाला एपिसोड फ़िल्म देखने के आड़े नहीं आया. [जारी] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, April 27, 2008

आर्कमिडीज और शिवकुमार मिश्र ! [बकलमखुद-21]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है।
ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश और मीनाक्षी धन्वन्तरि को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं कोलकाता के शिवकुमार मिश्र से । शिवजी अपने निराले ब्लाग पर जो कुछ लिखते हैं वो अक्सर ब्लागजगत की सुर्खियों में आ जाता है। आइये मिलते हैं बकलमखुद के इस छठे पड़ाव और इक्कीसवें सोपान पर मिसिरजी से।

लड़कीवालों ने लिया टेस्ट

सातवीं में पढता था तब पहली बार मेरे लिए रिश्ता आया. आप सुनकर ये मत सोचियेगा कि मैं मजाक कर रहा हूँ. जी हाँ, ये बिल्कुल सही बात है. एक लड़की के पिता को उसकी लड़की के व्याह की चिंता सताए जा रही थी. वो मुझे देखने आए. उनके साथ तीन-चार और भी लोग थे. उनमें से एक ने मेरा टेस्ट लिया. बोले; "आर्कमिडीज की परिकल्पना के बारे में बताओ?"
मैंने उन्हें सुना दिया; "कोई वस्तु किसी द्रव में पूरी या आंशिक रूप से डुबाई जाती है तो वस्तु पर लगने वाला उत्प्लावन बल, वस्तु द्वारा हटाये गए द्रव के भार के बराबर होता है." मेरा जवाब सुनकर वे खुश हो लिए और लड़की के पिता को कन्फर्म कर दिया किया; "लड़का तो पढ़ने में तेज है." आप ख़ुद ही अंदाजा लगाईये, हमारे उत्तर प्रदेश में आर्कमिडीज की वजह से कितने बच्चों की शादी हुई होगी. वैसे सुनाने की बात पर मैं कबीर और रहीम के दोहों की रटी-रटाई व्याख्या भी सुना सकता था, लेकिन तब शायद मैं पढाई में तेज न माना जाता.

शादी के दस रिश्ते आए !!!

मैंने दादाजी से शिकायत की; "आप ऐसे लोगों को क्यों आने देते हैं जो एक सातवीं क्लास में पढ़ने वाले लड़के की शादी करने पर आमादा हैं?" दादाजी ने बताया; "मैं क्या कर सकता हूँ. मैं किसी को आने से तो रोक नहीं सकता. ये तो हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम तुम्हारी शादी करना चाहते हैं कि नहीं या फिर तुम अपनी शादी करना चाहते हो या नहीं." मजे की बात ये होती कि स्कूल में क्लास चल रहा होता और घर से कोई आ जाता कि थोडी देर के लिए चलो, कुछ लोग मिलने आए हैं. जब मैं इनलोगों से 'मिलकर' वापस आता तो हमारे शिक्षक श्री हरिशंकर सिंह जी पूछते; "लड़कीवाले आए थे न?" मैं हाँ कह देता. वे दस मिनट तक सामाजिक व्यवस्था को गालियाँ सुनाते. एक दिन ख़ुद वे मेरे घर पहुँच गए थे. दादाजी से कहा; "अगली बार अगर कोई देखने आए तो उसे मेरे पास भेज दीजियेगा. आज से मैं ही शिव का अभिभावक हूँ. जो मैं चाहूँगा, वही होगा." सातवीं से दसवीं क्लास तक पढने के बीच कम से दस रिश्ते आए होंगे. आज याद करता हूँ तो बहुत हंसीं आती है.

धाकड़ों का साथ, पुलिस को तलाश

मिडिल स्कूल की पढाई करने के बाद हाई स्कूल में भर्ती हुई. कुल ग्यारह किलोमीटर साईकिल चलाकर कालेज जाता था. हाई स्कूल में समस्याएं शुरू हुईं. उम्र ऐसी थी कि उस समय यही लगता था कि जो कुछ भी सोचता हूँ और करता हूँ सबकुछ ठीक है. तब तक समझ ऐसी नहीं थी कि गलती कहाँ हो रही थी, उसके बारे में सोचूँ. अपने से बड़े 'छात्रों' के साथ क्लास बंक करके घूमना, क़स्बे के स्टेशन पर बैठे रहना, कालेज की तथाकथित राजनीति में हिस्सा लेना और पढाई न करके क़स्बे के टीन के छप्पर वाले छोटे से सिनेमाघर में सिनेमा देखना, ये सारे काम शुरू हो चुके थे. लिहाजा पढ़ाई बैकसीट पर चली गई. लोकल राजनीति में दिलचस्पी लेना शुरू हो चुका था. स्थानीय स्कूल और कालेज में पास वाले गांवों के 'धाकड़' छात्रों के बर्चस्व की लड़ाई देखना और समय-समय पर किसी ग्रुप के साथ दिखना, ये सारा कुछ जीवन में प्रवेश कर चुका था. ऐसे ग्रुप में कुछ छात्र तो इतने प्रतिभावान थे कि उन्हें बराबर पुलिस तलाश करती रहती. मैं ऐसे छात्रों के साथ भी अक्सर रहता.

बंदूक की गोली से आम की तुड़ाई!

न दिनों घर के सदस्य मुझसे परेशान रहने लगे थे. दादाजी से रोज डांट मिलती. मुझे याद है एक बार मैं बंदूक से गोली चलाकर आम तोड़ रहा था. उसदिन दादाजी से बहुत डांटा था. अब बात याद आती है तो ख़ुद को बहुत कोसता हूँ. अब मन में आता है कि 'चौदह साल की उम्र में अगर कोई पोता अपने दादाजी के सामने दोनाली बंदूक दागकर आम तोड़े तो ऐसे पोते की धुनाई उसी बंदूक के बट से की जानी चाहिए.' पिताजी जब छुट्टियों में गाँव जाते तो दादाजी मेरी वाजिब शिकायत उनसे करते. और शिकायत करने के बाद ये बात जोड़ देते; "अब तुम्ही संभालो इसे. मेरी बातें तो ये सुनता ही नहीं." नतीजा ये हुआ कि सन १९८५ में हाई स्कूल पास करने के बाद पिताजी मुझे कलकत्ते ले आए । [जारी]

आपकी चिट्ठियां

सफर की पिछली तीन कड़ियों पर सर्वश्री-अनूप शुक्ल , काकेश , हर्षवर्धन, विजयशंकर चतुर्वेदी, ज्ञानदत्त पांडे, दिनेशराय द्विवेदी, प्रमोदसिंह, जेपी नारायण, प्रणव प्रियदर्शी, यूनुस, डॉ चंन्द्रकुमार जैन, अरूण, बोधिसत्व , संजीत त्रिपाठी, संजय बैंगाणी, पंकज अवधिया, अनिताकुमार ,आभा, घोस्ट बस्टर, कीर्तीश भट्ट, विमल वर्मा,इरफान, नीरज बधवार, दीपा पाठक , मीनाक्षी, संजय पटेल, ममता, लावण्या शाह, अरविंद मिश्र, नीरज रोहिल्ला और अभिषेक ओझा की प्रतिक्रियाएं मिलीं। सफर में साथ बने रहने के लिए आप सबका शुक्रिया।

@दिनेशराय द्विवेदी-धोती के संदर्भ में अधोवस्त्र और धौत् दोनों के बारे में भाषाशास्त्रियों का मत मैने रखा है। मेरा अपना मानना है कि अधोवस्त्र से ही धोती की व्युत्पत्ति अधिक सही है। आज भी आदिवासी अंचलों में महिलाएं जिस तरह से इसे पहनती हैं उससे इसकी शुरुआत अधोवस्त्र के रूप में ही हुई ज्यादा तार्किक लगती है। जहां तक साड़ी का सवाल है , इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि यह यूनान की देन है। इतिहास में भी इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, April 26, 2008

शिवकुमार मिश्र की डायरी का पहला पन्ना ...[बकलमखुद-20]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है।
ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश और मीनाक्षी धन्वन्तरि को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं कोलकाता के शिवकुमार मिश्र से । शिवजी अपने निराले ब्लाग पर जो कुछ लिखते हैं वो अक्सर ब्लागजगत की सुर्खियों में आ जाता है। आइये मिलते हैं बकलमखुद के इस छठे पड़ाव और बीसवें सोपान पर मिसिरजी से।

गडोरावाले मिसिर जी...

नारस जिले में एक गाँव था गडौरा. गाँव था, ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ कि अब यही गाँव भदोही जिले में है. वैसे भदोही का नाम भी बदल चुका है. अच्छी बात है. सामजिक और आर्थिक बदलाव न भी आए तो क्या हुआ, हम नाम बदलकर संतोष कर लेते हैं. बदलाव का भ्रम बना रहता है. इसी गाँव में मेरा जन्म हुआ था. २२ फरवरी, सन् १९७०. गाँव को उस समय जैसा होना चाहिए, वैसा ही था. अभी भी वैसा ही है.

भरा भरा सा परिवार...


हुत बड़ा परिवार है हमारा. बहुत सारे चचेरे भाई और बहनें, बुआ, चाचा वगैरह. पिताजी कलकत्ते के एक कालेज में अध्यापक थे. भूगोल और अंग्रेजी पढाते थे. गाँव में अम्मा के साथ रहता था. बड़े भाई थे. बचपन में जो कुछ सीखा, अम्मा ने सिखाया. साफ सुथरा कैसे रहना है से लेकर लोगों से बात कैसे करनी है तक. किसको कैसे संबोधित करना है. बडों को इज्जत देना चाहिए. ये सारी बातें अम्मा ने सिखाई. कोई नई बात नहीं है. सबकी अम्मा ऐसी ही होती हैं.
बचपन से ही कविता सुनाने का शौक है मुझे. बात तब की है, जब मुझे वर्णमाला का ज्ञान नहीं था. उन दिनों घर में साप्ताहिक हिन्दुस्तान और धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं आती थीं. मेरे चाचाजी उन पत्रिकाओं में छपी बाल-कवितायें पढ़कर सुना दिया करते और वो कवितायें मुझे याद हो जाती थीं. लगभग सभी कवितायें अभी तक याद हैं. उस समय मेरी उम्र तीन साल थी. कवितायें याद रखने का एक कारण और भी था.

कविता सुनाऊ प्रतिभा

न्ही दिनों मैं अम्मा के साथ कलकत्ते आ गया था. पिताजी के मित्रों के बीच मेरी 'कविता सुनाऊ प्रतिभा' का काफ़ी प्रचार हो चुका था. उन दिनों जो भी घर पर आता और मुझसे कविता सुनाने को कहता तो मैं फट से उनसे कविता सुनाने के बदले रसगुल्ला खाने की फरमाईस कर डालता. लघु स्तर पर 'साहित्यिक ब्लैकमेलिंग' का एक उदाहरण. मुझे लगा 'ये तो बड़ा सरल है. बस कुछ कवितायें याद रखनी हैं, रसगुल्ले आते रहेंगे.' ऐसा ही होता भी था. इतने रसगुल्ले खाए कि दांत सड़ गए. कविता में मिठास होती ही है लेकिन कविताओं की वजह से मुंह में मिठास और दांतों में सडन आती गई.

पढ़ाई में तेज समझा जाना

कलकत्ते में दो साल रहने के बाद सन् १९७५ में मैं वापस गाँव लौट गया. गाँव जाने के बाद वहाँ के प्राईमरी स्कूल में मेरी भर्ती हो गई. वही से मैंने अपनी पढाई शुरू की. गाँव में स्कूल के अध्यापक मुझे 'तेज' समझते थे. उनका कहना था कि मुझे सबकुछ याद हो जाता है. और ये 'तेज' होने की निशानी थी. शायद हौसला बढ़ाने का उनका तरीका था. मेरे 'तेज' होने का असर भी दिखा. मुझे कक्षा दो के बाद तरक्की मिल गई और कक्षा चार में पहुँच गया. कक्षा तीन की पढाई नहीं करनी पडी. जिस साल मैंने कक्षा पाँच पास किया ठीक उसी साल मेरे गाँव में एक मिडिल स्कूल खुला. इस स्कूल की स्थापना कैसे हुई, उसके बारे में मैंने एक पोस्ट लिखी थी. उसके पहले गाँव के बच्चों को करीब तीन किलोमीटर पैदल जाकर मिडिल स्कूल की पढाई करनी पड़ती थी.

क्रिकेटीय गुण का विकास

न दिनों मन में तमाम तरह की बातें आतीं. कभी सोचता; 'मुझे डॉक्टर बनना है. कभी सोचता, नहीं, मुझे इंजिनियर बनना है.' जैसा कि इस उम्र के बच्चों के साथ होता है, ख़याल आते और चले जाते. कभी परुली की तरह नहीं सोचा कि मुझे तो डॉक्टर बनना ही है. इनदिनों मेरे अन्दर 'क्रिकेटीय गुण' का विकास हुआ और मैं क्रिकेट बहुत अच्छा खेलने लगा था. आस-पास के गाँव और स्कूल-कालेज में ये बात फ़ैल चुकी थी कि मैं क्रिकेट अच्छा खेलता हूँ. यही कारण था कि मैं अपने से चार-पाँच साल के सीनियर लोगों के साथ क्रिकेट खेलता था. कई बार सोचता; 'अगर कलकत्ते चला जाऊं तो मैं बंगाल की टीम के लिए खेल सकता हूँ.' ऐसा सोचने के पीछे कारण ये था कि मेरे बहुत ही फेवरिट स्पिनर दिलीप दोषी उन दिनों क्रिकेट छोड़ने वाले थे. मुझे लगता था कि वे अगर क्रिकेट छोड़ देंगे तो बंगाल की टीम में स्पिनर के रूप में मुझे जगह मिल सकती है. बालक का छोटा मन. कुछ भी सोचने के लिए स्वतंत्र है।

अम्मा ने की तबीयत से धुनाई...

स क्रिकेट की दीवानगी ऐसी थी कि खाने की सुध नहीं रहती. क्रिकेट खेलने की वजह से बहुत बार अम्मा से पिटा. स्कूल में लंच ब्रेक होने के बाद कई बार घर नहीं पहुंचता. ब्रेक में क्रिकेट खेलता. गरमी के महीनों में, जब तापमान चालीस डिग्री से ज्यादा होता है और लू चलती रहती है, उस समय क्रिकेट खेलता. एक बार मई के महीने में क्रिकेट खेलकर पाँच बजे शाम को घर पहुँचा. सामान्य बात होती अगर मैं तुरंत पिट गया होता. लेकिन उस दिन घर पहुँचने के बाद अम्मा ने बहुत अच्छी तरह से बैठाया. ठंडाई बनाकर पिलाया. मैं जब मुतमईन हो चुका था, ये सोचते हुए; 'आज मार नहीं पड़ेगी', तब अम्मा ने पूरी तन्मयता के साथ मेरी धुनाई शुरू की. [जारी]

आपकी चिट्ठियों का हाल अगली कड़ी में अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, April 25, 2008

धोती खुल गई भैया !!

धोती एक बहुत आम भारतीय पहनावा है जो स्त्री और पुरुष दोनो ही धारण करते हैं फर्क सिर्फ इतना है की धोती जब स्त्री पहनती है तो यह उसके समूचे शरीर को ढकने वाली पोशाक बन जाती है जबकि पुरुष इसे सिर्फ अधोवस्त्र के रूप में ही धारण करते हैं। धोती चूंकि एक परिधान है इसलिए इसके उतारे जाने के भाव से जुड़े मुहावरे भी चल पड़े हैं जैसे सीधे-सादे या स्त्रैण के अर्थ में किसी व्यक्ति को धोती छाप कहना अथवा छक्के छूटने या भयभीत हो जाने के अर्थ मे धोती खुलना या धोती छूटना आदि।

रअसल कुछ विद्वान अधोवस्त्र से ही धोती का जन्म मानते हैं। धोती की व्युत्पत्ति पर भाषाशास्त्री एकमत नहीं हैं । अगर इसे कमर से नीचे के हिस्से को ढकने वाले परिधान के तौर पर देखा जाए तब तो यह व्युत्पत्ति सही नज़र आती है। संस्कृत के अधोवस्त्रिका > अधोतिका > धोतिका > धोती के विकासक्रम पर अगर गौर करें तो धोती की व्युत्पत्ति एकदम सही है। मगर ध्यान दें कि धोती भारतीय महिलाएं भी धारण करती हैं । साड़ी के वैकल्पिक शब्द के रूप में नारी परिधान के तौर पर ही धोती का इस्तेमाल ज्यादा होता है। धोती अपने आप में महिलाओं के लिए पूरी देह के आवरण का काम करती है इसलिए अधोवस्त्रिका के रूप में इस शब्द की व्युत्पत्ति को कुछ भाषाशास्त्री सही नहीं मानते हैं।

संस्कृत के एक अन्य शब्द धौत में भी धोती का जन्म तलाशा जाता है। धौत का अर्थ होता है धोया हुआ , चमकाया हुआ, उज्जवल, चमकदार, सफेद आदि। गौर करें कि आमतौर पर धोती शुभ्र-धवल ही होती है । खासतौर पर पुरुषों के अधोवस्त्र के रूप में तो धोती हमेशा ही सफेद रंग की होती है । महिलाओं की धोती कई रंगों और रूपों में होती है। भारतीय समाज में धोती को आमतौर पर धार्मिक अवसरों पर ही धारण करने की परिपाटी रही है। इसके आनुष्ठानिक महत्व पर ध्यान दें तो धुलाई, उज्जवल, धवल आदि शब्दों में छिपे पवित्रता और निर्मलता के भाव स्पष्ट ही धौत से धोती की उत्त्पत्ति सिद्ध करते हैं। धौत शब्द बना है संस्कृत धातु धाव् से । मूलतः यह गति वाचक धातु है । इसका मतलब है दौड़ना, भागना।

प्राचीन काल से ही जल भी गति का प्रमुख प्रतीक रहा है इसलिए धाव् में बहना, प्रवाहित होना, टकराना आदि सभी अर्थ भी निहित हैं। अब पुराने ज़माने से ही धुलाई की क्रिया जलस्रोतों पर ही की जाती थी जहां पानी का प्रवाह वस्त्रों को निर्मल करने में सहायक होता था। कपड़ों को पत्थर पर पछीटने का भाव भी इसमें शामिल है। धाव् से ही बने धावकः शब्द से ही बना है हिन्दी का धोबी शब्द जिसका अर्थ होता है कपड़ों की धुलाई करनेवाला । कालांतर में इस शब्द जातिसूचक अर्थ भी ग्रहण कर लिया। धाव् शब्द मराठी शब्द धाव में जस का तस दौड़ने , भागने के अर्थ में नज़र आता है। धाव् के धा में शामिल धारा वाला प्रवाही अभिप्राय तो स्वतः स्पष्ट है।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, April 24, 2008

अर्जुन और जरीना...फिर अर्जेंटीना !

तासीर चांदी की चमक की
हाभारत के प्रसिद्ध पात्र अर्जुन और दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना में भला क्या संबंध हो सकता है ? कहां अर्जुन पांच हजार साल पहले के द्वापर युग का महान योद्धा और कहां अर्जेंटीना जिसकी खोज सिर्फ पांच सौ वर्ष पहले कोलंबस ने की। दोनो में कोई रिश्ता या समानता नजर नहीं आती। पर ऐसा नहीं है। दोनों में बड़ा गहरा रिश्ता है जिसमें रजत यानी चांदी की चमक नजर आती है। भारतीय यूरोपीय भाषा परिवार का रजत शब्द से गहरा नाता है। इस परिवार की सबसे महत्वपूर्ण भाषा संस्कृत में चांदी के लिए रजत शब्द है। प्राचीन ईरानी यानी अवेस्ता में इसे अर्जत कहा गया है।
गौरतलब है कि चांदी एक सफेद , धवल चमकदार धातु है। इस परिवार की यूरोपीय भाषाओं में जो शब्द हैं उनका मतलब भी सफेद और चमकीला ही है। यूरोपीय भाषाओं में इसके लिए जो मूल शब्द है वह है अर्ज। ग्रीक में इसके लिए अर्जोस , अर्जुरोस और अर्जुरोन जैसे शब्द हैं जिनका मतलब सफेद या चांदी होता है। संस्कृत में अर्जुन का अर्थ भी यही है -सफेद, चमकीला , उज्जवल। अर्जुन को महाभारत में यह नाम अपने पवित्र और उज्जवल कमों के लिए दिया गया। इसी तरह लैटिन में अर्जेन्टम लफ्ज है जिसका सीधा मतलब चांदी या रजत ही होता है। इसी से अंग्रेजी में बना अर्जेंट जिसका अर्थ होता है रजत। पंद्रहवी सदी के आसपास दक्षिण अमेरिका में जब चांदी की खोज शुरू हुई तो एक विशाल क्षेत्र को नए राष्ट्र के रूप में पहचान मिली। नामकरण हुआ अर्जेंटीना

ब बात जरी की। हिन्दी-उर्दू मे प्रचलित लफ्ज जरी के मायने होते हैं सोना अथवा सोने का मुलम्मा चढ़ा हुआ धागा या तार। इसीलिए पुराने जमाने में रईसों के लिए जरी से कपड़े बुने जाते थे। इससे सिले हुए वस्त्र उत्सवों-आयोजनों की पहचान थे क्योकि ये कीमती होते थे । जरी शब्द बना है फारसी के जर से जिसका अर्थ है धन-दौलत-सम्पत्ति अथवा स्वर्ण, कांचन या सोना। प्राचीन इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का एक शब्द है अर्ज यानी चमक और सफेदी। इसी तरह संस्कृत में भी एक धातु है अर्ज् जिसका मतलब भी चमकीला, श्वेत आदि है। इसी से बना है अर्जुन। गौरतलब है कि श्वेत और चमकीलापन, पवित्रता का प्रतीक भी हैं इसीलिए अर्जुन को यह नाम मिला। इससे मिलते-जुलते मायनों वाले कई शब्द न सिर्फ हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में बल्कि यूरोपीय भाषाओं में भी प्रचलित हैं। ये सभी शब्द अर्ज् से ही बने हैं। संस्कृत हिन्दी में चांदी को रजत ही कहते हैं। अवेस्ता में यह अर्जता के रूप में है तो फारसी में जर बनकर विद्यमान है। ग्रीक में यह अर्जुरोस के रूप में प्रचलित है । चांदी के लिए रासायनिक नाम ag इसी से बना है।

र यानी फारसी में धन-सम्पत्ति। खासबात ये कि अर्ज में निहित चमक और कांति वाले भावों ने इसे जहां संस्कृत में चांदी का अर्थ प्रदान किया वहीं फारसी में सोने के मायने दिए। बाद में इसे सर्वाधिक मूल्यवान धातु के तौर पर धन का पर्याय ही मान लिया गया। जर से बने कई शब्दो से हम बखूबी परिचित हैं मसलन जरीना यानी सुनहरी , जरखरीद यानी जिसे मूल्य देकर खरीदा गया हो,(जाहिर है यहां जर का मतलब मुद्रा से ही है) जरदोजी यानी जरी का काम। यही नहीं पीले रंग के लिए फारसी उर्दू में जर्द शब्द है जाहिर है यह भी सोने के पीले रंग की बदौलत ही बना है। इससे ही अंडे के भीतर के पीले पदार्थ के लिए जर्दी शब्द चला। तम्बाकू के लिए ज़र्दा शब्द भी इसी ज़र की देन है। मजेदार बात यह कि फारसी में चाहे अर्ज् से बने जर के मायने सोना है मगर चांदी के लिए वहा भी इसी का सहारा लेकर एक शब्द बनाया गया है जरे-सफेद यानी सफेद सोना। इसे श्वेत-सम्पदा के रूप में भी देखा जा सकता है। [संशोधित पुनर्प्रस्तुति] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, April 23, 2008

साधु-साधु साहूकार...

न साधु का फेर ,न साहूकार का चक्कर

भारतीय परंपरा में अक्सर प्रशंसा के अर्थ में साधु-साधु शब्द पढ़ने को मिलता है। अब तो प्रशंसा के प्रसंग को अतिनाटकीय बनाने के लिए ही यह शब्द युग्म इस्तेमाल किया जाता है । साधुवाद शब्द भी इससे ही बना है जिसमें शाबाश का भाव , धन्य की ध्वनि उजागर होती है। ब्लागजगत में भी समीर लाल ने साधुवाद का दौर चलाए रखा।
साधु शब्द बना है साध् से जिसमें किसी काम को पूरा करने , समाप्त करने , जीतने , सिद्ध करने का भाव शामिल है। उपलब्ध करना , हासिल करना आदि अर्थ भी इसमें समाहित हैं। अब कार्य को करने के लिए किसी यंत्र या उपकरण की भी ज़रूरत होती है सो साधन शब्द का अभिप्राय भी समझ में आ रहा है। स्पष्ट है कि किसी कार्य की पूर्णता पर होनी वाली सराहना के लिए साधु शब्द भी चल पड़ा। यूं साधु शब्द का सबसे प्रमुख अर्थ हिन्दी में संत-ऋषि-मुनि ही माना जाता है। साध् शब्द में निहित सकारात्मक कर्मों के भाव ही साधु में समा गए हैं जिससे साधु शब्द का अर्थ हुआ भले कर्म करने वाला, दयालु, कृपालु, उत्तम, श्रेष्ठ , गुणी , पुण्यात्मा आदि।
गर साधु का एक अन्य अर्थ भी शब्दकोश बताते हैं – वह है महाजन, सूदखोर अथवा सौदागर। साधारणतः विपरीतार्थी समझे जाने वाले इस शब्द के मूल में देखें तो प्राचीनकाल में कुलीनों-धनिकों को भी दयालु, कृपालु , श्रेष्ठ जैसे संबोधन ही मिले हुए थे। श्रेष्ठ से ही सेठ जैसा शब्द भी बना है । तब साधु शब्द से ही अगर साहू शब्द भी चल पड़ा हो तो कोई आश्चर्य नहीं। भाषाविज्ञानी तो साहूकार शब्द के मूल में साधु शब्द ही देखते हैं। भारतीय समाज में यूं तो साहूकार शब्द का नकारात्मक प्रभाव है मगर अपने मूल अर्थ में यह साधु+कार्य से प्रेरित है। साधुता के कार्य करने वाला कुलीन ।
से यूं समझें कि प्रायः सभी नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र धनी-कुलीनों के जो लक्षण बताते हैं उनमें परोपकार, दयालुता और उदारता जैसे गुण ही प्रमुख रहे हैं। यही कुलीनों के साधुकार्य रहे हैं। कालांतर में कलयुगी लक्षणों के साथ मूल साधु कर्म पीछे छूट गए और साहूकार का असली चेहरा उभरा जिसमें न तो दया नज़र आती है न ही परोपकार। साहूकार के चक्कर में पड़े व्यक्ति के मुंह से साधु-साधु नहीं बल्कि त्राहिमाम् त्राहिमाम् ही निकलता है। वैसे देखा जाए तो आज के दौर में तो न साधु का फेर सही न साहूकार का चक्कर। साह शब्द भी इससे ही जन्मा है और साहू भी। मूलतः ये सभी शब्द व्यापार, व्यवसाय और मुद्रा से जुड़े हुए हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में साहू और साह व्यापारी जातियों के उपनामों के रूप में भी प्रचलित हैं।

आपकी चिट्ठियां

सफर की पिछली चार कड़ियों पर सर्वश्रीसंजय, दिनेशराय द्विवेदी, ज्ञानदत्त पांडेय, डॉ अमर कुमार, संजीत त्रिपाठी, बिल्ला, मीनाक्षी, डॉ चंद्रकुमार जैन,अनिताकुमार, लावण्या शाह, ममता, घोस्टबस्टर, अरविंद मिश्रा, आशा जोगलेकर ,अरुण आदित्य, अल्पना वर्मा, काकेश , अशोक पांडे, समीर लाल, कंचनसिंह चौहान, अतुल, अनूप शुक्ल, मनीष , डॉ भावना, अखिल मित्तल, देबप्रकाश चौधरी, माला तैलंग, मुनीष , जोशिम, यूनुस, अफलातून,विजयशंकर, विमल वर्मा, उन्मुक्त, पारुल और पंकज अवधिया की टिप्पणियां हमें मिलीं। आप सबका आभार । बकलमखुद भी जारी रहेगा और शब्दों का सफर भी।

@अफ़लातून-
बहुत-बहुत शुक्रिया साहेब। एकदम सही कहा आपने नीड् भी डीन् श्रंखला का ही शब्द है। इसे शामिल करना भूल गया था। नि में आश्रय या निवास का भाव शामिल है और डीन् में ऊंचाई, उड़ान का । सो अर्थ हुआ पक्षी का घोंसला।

@दिनेशराय द्विवेदी-
हड़ौती में प्रचलित डियां शब्द का उल्लेख आपने आंखों के अर्थ में किया है । हालांकि इसमें उड़ने-उड़ाने से संबद्ध धातु डीन् तो नहीं है मगर यदि आंखड़ियां को देखें और आदि स्वर-वर्ण लोप की कल्पना करें तो डियां ही बचता है। दूसरी कल्पना यह आती है कि दृष्टि के दिट्ठी, दीठ, दीठी जैसे रूप प्रचलित हैं। आंख के रूप में डियां भी इसी क्रम में बना हो !

@लावण्या, अनिताकुमार, मीनाक्षी
आप तीनों का शुक्रिया कि मुझे बकलमखुद के लिए न्योता दिया। मैं ज़रूर शब्दों के सफर की इस मुहिम में शामिल होऊंगा । मगर फिलहाल तो कारवा यूं ही आगे बढ़ने देते हैं। अभी कई साथी हैं । हो सकता है मैं बीच में ही प्रकट हो जाऊं वर्ना सबसे आखिर में तो तय है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, April 22, 2008

अर्बुदा ने धकेला इस मायालोक में... [बकलमखुद-19]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला की पंद्रह कड़ियों में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह और काकेश को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं दुबई में निवासी मीनाक्षी धन्वन्तरि से । मीनाक्षी जी प्रेम ही सत्य है नाम का ब्लाग चलाती हैं और चिट्ठाजगत का एक जाना पहचाना नाम है। हिन्दी के परिवेश से दूर रहते हुए भी वे कविताएं लिखती हैं खासतौर पर उनके हाइकू बहुत सुंदर होते हैं जिन्हें उन्होने त्रिपदम् जैसा मौलिक नाम दिया है। तो शुरू करतें बकलमखुद का पांचवां चरण और उन्नीसवीं कड़ी जिसमें मीनाक्षी जी ने ब्लागजगत की आभासी दुनिया को मधुशाला बताया है और इसमें धकेलने के लिए अर्बुदा को जिम्मेदार माना है-

ब्लॉग जगत की मधुशाला
न 1999 जुलाई अगस्त में पहली बार याहू और हॉट मेल की आइडी बनाई. हमने ही नहीं बल्कि पूरे परिवार ने निश्चय किया कि अब से फोन करने की बजाय एक दूसरे को मेल करेंगें. यह आईडिया डैडी का था जो फोन पर पैसा खर्च करने के बजाय मेल से और फिर चैट और वैबकैम के ज़रिए विदेश में बैठे अपने बच्चों से बात करना चाहते थे और देखना भी चाहते. फैमिली से चैट करते करते हम पूरी दुनिया से चैट करने के आदी हो गए. कीबोर्ड पर जब तक उंगलियाँ कुछ देर थिरक न लें , हमें चैन न आता. कुछ समय बाद अंर्तजाल पर अभिव्यक्ति और अनुभूति जाल पत्रिकाएँ मिलीं. पहली बार अनुभूति में अपनी कविताएँ भेजीं. पूर्णिमा जी की मदद से सुषा में हिन्दी लिखना सीखा. उसी जाल पत्रिका में किशोरों के लिए किशोर कोना बनाया लेकिन दुख है कि अब तक बच्चों को उस कोने से जोड़ न पाए. कोशिश अब भी कर रहें हैं. [ऊपर की तस्वीर में हमारे साथ दाएँ से बाईं ओर पूर्णिमा जी, बेजी, अर्बुदा और स्वाति हैं और नीचे की तस्वीर में अनिता जी और आशीष महर्षि हैं]

उसने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी!

च कहें तो अगस्त 2007 से पहले तक बिल्कुल पता नहीं था कि हिन्दी में भी ब्लॉगिंग होती है. एक दिन बातों ही बातों में, अर्बुदा जो ब्लॉग़र ही नहीं मेरी प्यारी दोस्त भी है, ने इस बारे में चर्चा की और अपना ब्लॉग मेरे हैं सिर्फ पंख दिखाया और समझाया कि कैसे हम भी अपना एक ब्लॉग बनाएँ. फिर क्या था हमें ब्लॉग जगत की मधुशाला में ढकेल दिया. खुद तो फुर्र से उड़ गईं और हमें उन गलियों में छोड़ दिया. हम ऐसे बहके कि फिर बाहर आने का रास्ता ही भूल गए. पुराने दिनों को याद करके अर्बुदा को लगता है कि उसने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है. पहले हम पूरे होशोहवास में मस्ती करते थे और अब हम वहाँ अर्बुदा के साथ हैं तो ध्यान हमारा यहाँ है.

संजीत मिले सबसे पहले...


भासी दुनिया के मित्रों में सबसे पहले संजीत जी से मुलाकात हुई जीटॉक पर, मशीन के इस पार से उस पार के अपनेपन ने ब्लॉग जगत से अच्छा परिचय करवा दिया. अर्बुदा ने चिट्ठाजगत(मयखाने) में पहुँचाया तो संजीत जी ने ब्लॉगवाणी में. आज हम इन्हीं दो मित्रों की बदौलत यहाँ दिखाई दे रहे हैं. फिर बेजी मिलीं जिनसे दुबई में एक मुलाकात हुई तो फिर सिलसिला ही बन गया. हरी मिर्च के जोशी जी जाने माने ब्लॉगर हैं लेकिन उनकी पत्नी मोना हमारी अच्छी फोन-दोस्त बन गई हैं. अपने देश में मिले हमें ब्लॉग जगत के दो धुरन्धर ब्लॉगर. अनिता दी और आशीष महर्षि. दोनो से मिलकर ऐसा लगा कि जैसे बरसों से जानते हैं. मुम्बई के बाकि धुरन्दर ब्लॉगर्ज़ से मिलने की तमन्ना दिल में रह गई. हर ब्लॉग अपने आप में अपनी ही खासियत लिए हुए दिखता है. एक ब्लॉग से दूसरे ब्लॉग पर जाने का ऐसा नशा हुआ कि जहाँ न जाने की ताकीद होती है, वहाँ भी चुपके से चले जाते हैं. कुछ चिट्ठों पर हम रोज़ ही ताँक-झाँक करते हैं. ज्ञान जी की मानसिक हलचल मन में उठते कई प्रश्नों को शांत करती है. पंकज अवधिया जी की कविता हो या जड़ी बूटी से जुड़ा लेख... पढ़ना नहीं भूलते... अनिल रघुराज हिन्दुस्तानी की डायरी के नए नए पन्ने हमारे सामने खोल देते हैं. समीर जी की उड़न तश्तरी कहाँ कहाँ की सैर नहीं कराती. अभय जी की एक पोस्ट 'रसोई और रिश्तों का रस' ने हमें बहुत प्रभावित किया था.

और ये है आभासी दुनिया के साथी...

ब्दों का सफर मे अजित जी शब्दवीर से लगते हैं जिनके पीछे पीछे हम इस सफर में चलते हुए ज्ञान और आनन्द दोनो पाते हैं. अध्यापन के दिनों में हिन्दी पढ़ाते हुए शब्द विचार पढ़ाते थे, नए नए शब्दों की उत्पत्ति और रचना की व्याख्या की जाती थी. प्रकृति से प्यार करते हुए अपने पर्यावरण को किस तरह बचाया जाए, इस बात को समझाने के लिए बच्चों को क्लास-रूम से बाहर खुले आकाश के नीचे मैदान में ले जाकर पढ़ाती तो बच्चे हरी घास पर अपने आप ही जूते उतार देते. पर्यावरण दिवस पर आयोजित प्रतियोगिता में हमारी कक्षा हमेशा प्रथम स्थान लेती. पर्यानाद हमें पुरानी यादों से जोड़े रखता था लेकिन आजकल वहाँ खामोशी सी है.
त्तीसगढ़ का गौरव संजीव तिवारी आरम्भ करते हैं तो आवारा बंजारा बन संजीत जी हमें भी वहीं ले जाते हैं. जोगलिखी के संजय पटेल के कई लेख व्यवहार कुशलता की याद दिलाते हैं. उन्मुक्त जी की बेटी की पाती जब भी पढ़ते हैं तो बेटी पाने की लालसा जाग जाती है. बोधि जी की विनय पत्रिका में आठ दिन से जलते दिए की पोस्ट याद आए तो भानी बिटिया की याद आना भी स्वाभाविक हो जाता है. लावण्या जी का भोला अंतर्मन और रंजू की भावुक कलम से लिखा पढ़ना अच्छा लगता है, खासकर अमृता प्रीतम पर लिखा हुआ. घुघुती बासुती जी की 'तिनकानामा' और अनिता जी की 'खुली वसीयत' बहुत अच्छी कविता लगी.
अज़दक की दुनिया में जाते हैं या उनके बनाए कार्टून देखते हैं या आलोक जी की अगड़म बगड़म समझने की कोशिश करते हैं तो अपने लिए बस एक ही कहावत याद आती है, बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद और बस मुँह लटकाए लौट आते हैं. इसी स्वाद को पाने के लिए बेजी और प्रत्यक्षा के ब्लॉग पर जाते हैं.
ब कुछ समझ नहीं आता तो राजेन्द्र त्यागी जी का ओशो चिंतन और दीपक भारतदीप जी के ब्लॉग पढ़ते हैं और मन को शांत करते हैं. काकेश जी की परुली और आशीष की परुनिसा उनके ब्लॉग पर खींच ले जाती है. रवीन्द्र प्रभात जी और नीरज जी की गज़लें भी बड़ी गहरी होती हैं, गज़ल सीखने का मन हो तो पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर चले जाते हैं.
नुराधा जी का अंर्तमन में संस्मरण कहने की शैली प्रभावित करती है. अपने घर की आभा और कंचन का ह्रदय गवाक्ष भी मन को मोह लेता है. सुनिता के ब्लॉग मन पखेरु उड़ चला में 'है कौन जिसे प्यास नहीं' कविता पसन्द आई. संगीत का नशा चाहिए तो इरफ़ान की टूटी बिखरी, रेडियोनामा , सुखनसाज़ , गीतों की महफिल , मनीष , मीत और पारुल के ब्लॉग पर पहुँच जाते हैं. .. तकनीकी ज्ञान के लिए हम रवि रतलामी जी, देवाशीष जी और जीतू जी का पन्ना खोलते हैं. सागर जी के ब्लॉग पर दस्तक देते हैं. कानून की जानकारी के लिए द्विवेदी जी का ब्लॉग तीसरा खम्बा देख आते हैं. शास्त्री जी सारथी के रूप में राह दिखाते ही रहते हैं.
फुरसतिया में माँ जी के मधुर गीत ने मोहित कर लिया था. हमें तो एक भी लोक गीत ज़ुबानी याद नहीं. पूर्णिमा जी का ब्लॉग चोंच में आकाश पढ़ते हुए अनुभूति और अभिव्यक्ति पर न जाओ, यह सम्भव नहीं. महेश परिमल के लेख तो संवेदनाओं को पंख लगा देते हैं. हर्ष जी का बतंगड़, रंगकर्मी, स्वप्नदर्शी, स्वप्नरंजिता और जोशिम जी की हरी मिर्च की अपनी ही खासियत है. हिन्दयुग्म एक ऐसा महल है जिसे सुन्दर और मज़बूत बनाने में कई नींव की ईंट की तरह काम कर रहे हैं.
ब्लॉग जगत की विशेषता यह है कि बेरोक टोक हम बिना इजाज़त किसी भी ब्लॉग पर जा सकते हैं. चाहे वह रचना का ब्लॉग हो , सुजाता का नोटपैड हो, नीलिमा का लिंकित मन हो या मनीषा की बेदखल की डायरी हो. चोखेरबाली का तेजस्वी रूप देख कर खुश होते हैं तो नारी ब्लॉग भी वैसा ही दिखाई देता है.
क बात तो निश्चित रूप से कही जा सकती है कि ब्लॉग जगत अपना घर परिवार सा ही लगता है. सबके नज़रिए अलग अलग हो सकते हैं लेकिन दिशा सबकी एक ही ओर जाती है, विकास का भागीदार बनना.
अजित जी, शब्दों के सफर में हमारे नाम का पड़ाव डालने का पूरा श्रेय आपको जाता है. कुछ वक्त के लिए कुछ हमसफ़र इस पड़ाव पर रुके, सबका तहे दिल से शुक्रिया. [समाप्त]

[साथियों, मीनाक्षी जी का ब्लागयायावरी का दायरा बहुत व्यापक है। हम चाहते हुए भी उनकी पसंद के ब्लागों के हाईपरलिंक नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि ये बहुत वक्तखपाऊ काम है। इसे अन्यथा न लें ] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, April 16, 2008

डैनों में छिपा उड़ान का तिलिस्म

उड़ने-उड़ाने की बातें

वाबाजी के लिए उड़ना, उड़ाना या उड़ान जैसे शब्द हिन्दी में बहुत आम हैं बल्कि यूं कहें कि बोलचाल की हिन्दी में मनुश्य या पक्षी के हवा में गति करने वाली अवस्था के लिए उड़ान शब्द के अलावा वैकल्पिक शब्द ही बहुत कम हैं और सहजता से जो शब्द दिमाग़ में आता है वह उड़ने-उड़ाने के इर्द-गिर्द ही होते हैं।

इंडो यूरोपीय भाषाओं में शब्द वायु और जल दोनों से संबंधित है और इससे कई शब्द बने हैं जिससे प्रवाह, गति जैसे अर्थ उजागर होते हैं। संस्कृत में वः का अर्थ होता है वायु। हवाबाजी मे शामिल हवा शब्द इससे ही जन्मा है ( अलबत्ता वः यानी वह के हवा बनने में वर्णविपर्यय का सिद्धांत लागू हो रहा है)। मूलतः यह फारसी का शब्द है जो बरास्ता उर्दू हिन्दी में भी दाखिल हो गया । हवा में फारसी के प्रत्यय लगने से बने कई शब्द आज हिन्दी में भी प्रचलित हैं मसलन हवाई, हवाबाजी, हवाबाज, हवाखोर, हवाखोरी, हवादार , हवाई जहाज आदि।
हरहाल बात उड़ने-उड़ाने की हो रही थी।उड़ने – उड़ाने की शब्दावली ने कई मुहावरों को भी जन्म दिया है जैसे ऊंचे उड़ना यानी बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी होना। हवा से बातें करने के अर्थ में उड़ चलना भी एक मुहावरा है। इसी तरह चंपत होने के लिए उड़न-छू होना , अफ़वाह के लिए उड़ती ख़बर, किसी के खात्मे के लिए उड़ाना या उड़ा देना, या हाथ साफ़ करने के अर्थ में उड़ाना जैसे शब्द-युग्म मुहावरों के तौर पर प्रचलित हैं।
ड़ने-उड़ाने से जुड़े शब्दों के मूल मे दरअसल संस्कृत की डी धातु छुपी हुई है जिसके मायने होते हैं हवा से होकर गुज़रना, ऊपर उठना, उड़ना आदि। इससे बने डीन शब्द का मतलब होता है पक्षी की उड़ान। प्राचीन भारतीय मनीषियों की हवाबाजी के कौशल में कितनी दिलचस्पी थी यह इस तथ्य से पता चलता है कि उन्होने पक्षियों की आसमानी कलाबाजियों का अध्ययन कर 101 तरह की उड़ानों का उल्लेख किया है जैसे अवडीनम् , उड्डीनम् , प्रडीनम् , विडीनम् आदि। डीन यानी उड़ना या उड़ा हुआ से अब साफ है कि पंख के लिए डैना शब्द भी इसी डी की देन है। ओरछा में जन्मे प्रसिद्ध रीतिकालीन कवि केशवदास का यह दोहा तो उक्ति की तरह प्रसिद्ध है –

सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केसवदास।
अबके कवि खद्योत सम, जहं-तहं करहिं प्रकास॥


स दोहे में जो उडुगन (उडुगण) शब्द आया है उसका मतलब है नक्षत्र, तारे आदि। यह बना है उडु+गण से । स्पष्ट है कि उडु शब्द भी डी से ही बना है जिसमें हवा में गति की बजाय अंतरिक्ष में स्थिति की बात प्रमुख हो गई है।
हवाबाजी के सरकारी महकमें अर्थात सिविल एविएशन मिनिस्ट्री को आज हम दो नामों से जानते पहला है नागर विमानन मंत्रालय । दूसरा ज़रा कठिन है नागरिक उड्डयन मंत्रालय । मगर डी का रहस्य खुलने के बाद उड्डयन जैसा शब्द उतना कठिन नहीं रह गया होगा। जाहिर है कि उड़ान का संबंध उड्डयन से , उडुगण से और उड़ने – उड़ाने से यूं ही नहीं है।

[आपकी चिट्ठियों का हाल अगले पड़ाव पर ] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, April 15, 2008

दुबई में दिल्ली की बेरुखी, मुंबई की तेजी [बकलमखुद-18]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला की पंद्रह कड़ियों में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह और काकेश को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं दुबई में निवासी मीनाक्षी धन्वन्तरि से । मीनाक्षी जी प्रेम ही सत्य है नाम का ब्लाग चलाती हैं और चिट्ठाजगत का एक जाना पहचाना नाम है। हिन्दी के परिवेश से दूर रहते हुए भी वे कविताएं लिखती हैं खासतौर पर उनके हाइकू बहुत सुंदर होते हैं जिन्हें उन्होने त्रिपदम् जैसा मौलिक नाम दिया है। तो शुरू करतें बकलमखुद का पांचवां चरण और अठारहवीं कड़ी -


हर बसेरे की अपनी खासियत

तीन साल से दुबई में हैं. खुले माहौल में रहने का अलग ही मज़ा है. यहाँ बुरका नहीं पहनना पड़ता. मतुए का डर नहीं है. अकेले कहीं भी आ जा सकते हैं और चाहें तो लम्बी ड्राइव के लिए निकल जाएँ. यहाँ के अरब लोग अपने आप से मतलब रखते हैं. अलग अलग देशों के कुछ लोग एक दूसरे से दोस्ती करके एक दूसरे के बारे में जानने की कोशिश करते हैं. मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च हैं तो दूसरी तरफ सिनेमा, डिस्को, नाइट क्लब हैं. अपनी इच्छा से किसी भी रास्ते पर जाने की पूरी आज़ादी है. फिर भी साउदी अरब की सुकून वाली ज़िन्दगी याद आती है. जहाँ विकैंड का इंतज़ार रहता था जब 3-4 दोस्तों के परिवार मिल-जुल कर बैठते, बतियाते, खाते-पीते और पूरे हफ्ते की थकान दूर करते.
दुबई में मुम्बई की भाग-दौड़ वाली ज़िन्दगी और दिल्ली की बेरुखी है. सब भाग रहे हैं अपने अपने चक्रव्यूह को तोड़ने में लगे हैं. फिर भी बहुत से लोग हैं जो अपनी भाग-दौड़ की ज़िन्दगी से कुछ वक्त चुरा कर मस्ती भी करते हैं.

आह ! रेतीले धोरों पर वो मस्ती का आलम...

दो दिन पहले हम भी रियाद के मित्रों के साथ डैज़र्ट सफ़ारी के लिए गए. पहला अनुभव था लेकिन बेहद दिलचस्प. लैण्ड क्रूज़र घर से पिक करती है, रेगिस्तान में जाने से पहले गाड़ी के पहियों की कुछ हवा निकाल दी जाती है. फिर बड़े बड़े रेत के टीलों पर ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर गाड़ियाँ दौड़ाई जाती हैं. बीच बीच में लगता है कि गाड़ी उलट ही जाएगी. उसके बाद रेगिस्तान के बीच एक कैम्प में सभी गाड़ियाँ पहुँचती हैं. जहाँ सैंडयून बग्गी, कैमल राइड और सैंड स्कींग होती है. खाने-पीने और बैठने का बढिया इंतज़ाम होता है. औरते और बच्चे हिना लगवाते हैं. कुछ लोग हुक्का पीते हैं. अरबी संगीत चलता रहता है. सूरज डूबते ही बैली डाँसर बीच में बने प्लेटफॉर्म पर आकर अपने अनूठे डांस से सबको चमत्कृत कर देती है. रियाद में अरबी दोस्तों की छोटी छोटी बच्चियों को बैली डांस करते देखते तो तारीफ किए बिना रह न पाते.

दोस्तों के साथ मस्ती सबसे बड़ा शौक है

हाँ अधिकतर लोगों की दोस्ती होती अपनी ज़ुबान बोलने वाले भारत, पाकिस्तान, बंगला देश, श्री लंका आदि के लोगों से. हमें दूसरे देश के लोगों से दोस्ती करने ज़रा देर न लगती. इजिपशियन और फिलिस्तीनी लोग जल्दी दोस्ती कर लेते हैं लेकिन सीरियन और लेबनानी थोड़ा वक्त लेते हैं. एक दूसरे के रहन-सहन, खान-पान और संस्कृति को जानने की उत्सुकता सभी मे होती है. कितने ही साउदी, लेबनानी, सीरियन , इजिपशियन और ईरानी बॉलीवुड के दीवाने हैं. अधिकतर साउदी लोग अंर्तमुखी होते हैं. बहुत कम लोग दोस्ती कर पाते हैं. स्त्री और के ड्राइंगरूम अलग अलग होते हैं. भाषा की समस्या भी किसी हद तक जिम्मेदार होती है. जिन्हें अंग्रेज़ी आती है, वे अच्छी दोस्त बन जाती हैं.

ईरान जैसे दूसरा घर !

रान के दोस्त तो परिवार के हिस्सा ही हो गए हैं. विजय इंजीनियर और अली आग़ा आर्किटैक्ट सो उनकी दोस्ती आगे बढ़ी तो परिवार एक हो गए. पहली बार ईरानी मित्रों की भारत देखने की इच्छा पूरी की गई. एक महीने के दौरान ही परिवार जैसा स्नेह हो गया. हम साउदी अरब वापिस लौटे और वे ईरान के लिए रवाना हुए तो आँखों मे आँसू लेकर. कुछ महीनों बाद ईरान आने का न्यौता मिला.
पहली बार हम और बच्चे ईरान गए तो सभी हैरान परेशान कि कैसे हम उस देश मे अकेले जा सकते हैं बिना किसी डर के, हमेशा विजय बाद मे पहुँचते. 6 बार ईरान जा चुके हैं लेकिन एक बार भी कोई बुरा अनुभव नहीं हुआ. नाता और भी मज़बूत होता गया. वहाँ से लौटते हुए मित्र परिवार ही नहीं उनके मित्र और अन्य परिवार भी आँसू न रोक पाते. ठीक अपने देश के किसी गाँव का दृश्य होता, जहाँ बेटी की विदाई पर रोना धोना होता है.

और हमें सीता कहने लगे ईरानी

र यात्रा का अलग अलग अनुभव याद आ रहे हैं. पहली यात्रा के दौरान हम ईरान के जिस जिस शहर गए, लोगों ने खूब प्यार दिया. हमें पता चला कि उन दिनों वहाँ एक टी.वी. सीरियल "मुसाफिर ए हिन्द" बहुत मशहूर था और लोग बड़े चाव से देखते थे. हमारी बिन्दिया देखकर सीता पुकारने लगते. कई अंजाने लोग तो पहले फारसी में ही बात करने लगते. बच्चों में अमू विजय और खाला मीनू तो बड़ों मे आग़ा विजय और मीनू खानूम पुकारे जाते. करीबी लोग नाम के साथ जान लगाते हुए अपना प्यार दिखाते तो बहुत अच्छा लगता. उन दिनों हमने फारसी सीखने का मन बनाया कि अगली बार यहाँ आकर सबको चौंका देंगे. एक साल तक हमने बोलने और समझने लायक फारसी सीख ही ली. हमारी लिखावट पर भी हमें 20 में से 20 नम्बर मिलते तो बच्चों की तरह खुश होते.

आंखों के तारे हैं वरुण और विद्युत

रुण ने जब से बोलना शुरु किया तब से आज तक सवाल ही सवाल पूछता आया. बचपन में स्कूल में उसे अभिमन्यु कहा जाता. दार्शनिक बातें और उनसे जुड़े सवाल. अपने आप ही किताबों में डूब कर अपने सवालों का जवाब पाने की कोशिश अब आदत सी हो गई है. कविता और कहानी लिखना, संगीत बजाना , बनाना और सुनना शौक हैं.
वरुण दुबई बिटस (पिलानी) से इलैक्ट्रोनिक्स एण्ड इंस्ट्रयूमेंटेशन कर रहा है. कॉलेज का आखिरी समेस्टर है जिसमें थीसिस का विषय है – ब्रेन कम्पयूटर इंटरफेस. अपनी एक प्रयोगशाला खोलना वरुण का जुनून है. छोटा बेटा विद्युत अलग ही तबियत का बच्चा है. अपने बड़े भाई का सेवक और सबसे अच्छा दोस्त. कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती और सेवा में हाज़िर हो जाता है. बचपन से ही कला में रुझान. खाली समय में पुराने कपड़े काट काट कर और उस पर स्प्रे पेण्ट करके नए
डिज़ाइन बनाने का शौक अब नए रूप में दिखाई देता है. रेड बुल के कैन आर्ट में सिलेक्ट हुआ. प्रदशर्नी में कैन से बनाया मास्क रखा गया. टैटू , चित्र , फोटोग्राफी का ही शौक नहीं बल्कि संगीत का इसे भी बहुत शौक है.
संगीत पूरे परिवार का शौक है इसलिए घर कभी कभी संगीतशाला लगता है. ड्रम, गिटार, वायलिन और तम्बोला तो है अब दोनो भाई पियानो खरीदने के लिए मिन्नत कर रहे हैं. जारी अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, April 14, 2008

उधार लो, उद्धार करो...

ज के दौर में अगर दुनिया चल रही है तो सिर्फ एक शब्द यानी उधार के दम पर उधार एक ऐसी व्यवस्था है जिसे पुराने ज़माने में चाहे बोझ माना जाता हो मगर आज तो विश्व की अर्थव्यवस्था सिर्फ और सिर्फ इसी उधार नाम के बंदोबस्त पर टिकी है। उधार में ही सबका उद्धार छुपा है। चार्वाक की 'ऋणं कृत्वा , घृतं पिवेत्' जैसी प्रसिद्ध उक्ति में भी यही सिद्ध होता है कि उधार लो , उद्धार करो [ किसका ?]। ये अलग बात है कि उद्धार के रूप अलग अलग होते हैं। समझदारी से चुकारा करते जाने पर उधार सचमुच लेने वाले का उद्धार कर देता है मगर उधार न चुकाया जाए तो कई बार लेने वाले के साथ साथ देने वाले का भी ‘उद्धार’ हो जाता है। उधार की वसूली न होने से ही बैंक दिवालिया होते हैं । उधार न चुकाने से ही सरकारें कमज़ोर होती हैं, लोग खुदकुशी करते हैं ।
धार के मूल में जितनी अधोगति छुपी है, उसके मूल उद्धेश्य और अर्थ में दरअसल सचमुच सद्गति और उद्धार का भाव ही था। अंग्रेजी के लोन, संस्कृत के ऋण या उर्दू के कर्ज़ जैसे शब्दों के हिन्दी पर्याय उधार का जन्म सचमुच संस्कृत के उद्धार शब्द से ही हुआ है। उद्धार का अर्थ होता है उठाना, ऊपर करना, मुक्ति, बचाव, छुटकारा। उद्धार बना है संस्कृत धातु उद् से । उद् धातु एक प्रसिद्ध उपसर्ग है जो नाम, पद या शक्ति की दृष्टि से श्रेष्ठता , उच्च या अतिशय ऊंचाई वाले भाव प्रकट करने के लिए शब्दो से पहले लगाया जाता है । जैसे उद् + सह् के मेल से बना उत्साह जिसका मतलब हुआ शक्ति, प्रयत्न , ऊर्जा आदि। उद्धार के धन-सम्पत्ति से जुड़े अर्थों में पैतृक सम्पत्ति का वह हिस्सा जो सबसे बड़े पुत्र को मिलता है। अथवा युद्ध या लूट का छठा हिस्सा भी उद्धार कहलाता था जिसका हकदार राजा होता था। इसी तरह ऋण और खोई सम्पत्ति का फिर मिलना भी इसमें शामिल हैं। गौर करे कि बड़े पुत्र का हिस्सा और राजा का अंश भी किसी न किसी रूप में उच्चता, वरिष्ठता या शक्ति की ओर ही इशारा कर रहे हैं।
द्धार उद्+हृ के मेल से बना है । हृ धातु मे भी ऊपर उठाना, ले जाना, बचाना , मुक्त करना जैसे भाव शामिल हैं। स्पष्ट है कि धन की कमी से मनुश्य का जीवनस्तर गिरता है । सो ऋण ही इस अवस्था से उबारने का एक महत्वपूर्ण जरिया अनादि काल से रहा है। इसीलिए आर्थिक संकट से उबारने की व्यवस्था के रूप में उद्धार शब्द का चलन हुआ जो पाकृत में उधार के रूप में ढल गया ।
माज के विकास के साथ शब्दों के अर्थ भी बदलते है जिनमें अर्थ की उन्नति भी होती है तो अवनति भी । उद्धार शब्द के साथ भी यही हुआ है । बोलचाल की हिन्दी में उद्धार शब्द की अवनति हुई है । आज कोई काम अगर बिगड़ जाए तो कहा जाता है – इसका उद्धार कर दिया । किसी नालायक के सिपुर्द अगर कोई महत्वपूर्ण कार्य सौंपा जाने वाला हो तो सावधान करने के लिए भी यही कहा जाता है कि वह तो उसका उद्धार कर देगा यानी बर्बाद कर देगा। कुल मिलाकर उद्धार शब्द की भी हिन्दी हो चुकी है। इस शब्द की अवनति के पीछे शायद एक बड़ी वजह यह भी रही है कि उद्धार करने वालों ने अक्सर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन सही ढंग से नहीं किया इसलिए उबारने के प्यारे से भाव वाले इस शब्द का उद्धार हो गया । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, April 12, 2008

अरब के रंग-ढंग और अपना ये हाल ! [बकलमखुद - 17]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला की पंद्रह कड़ियों में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह और काकेश को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं दुबई में निवासी मीनाक्षी धन्वन्तरि से । मीनाक्षी जी प्रेम ही सत्य है नाम का ब्लाग चलाती हैं और चिट्ठाजगत का एक जाना पहचाना नाम है। हिन्दी के परिवेश से दूर रहते हुए भी वे कविताएं लिखती हैं खासतौर पर उनके हाइकू बहुत सुंदर होते हैं जिन्हें उन्होने त्रिपदम् जैसा मौलिक नाम दिया है। तो शुरू करतें बकलमखुद का पांचवां चरण और सत्रहवी कड़ी -

चिट्ठी आई है , वतन से...

सी बीच परिवार में एक और नया सदस्य आ गया बेटे विद्युत के रूप में. समय बीतता गया और हम धीरे धीरे साउदी कानून समझने लगे. काले बुरके के साथ काला दुपट्टा पहनना कभी न भूलते. जानते थे कि अगर कभी मतुए ने पकड़ लिया तो सबसे पहले पति का इक़ामा(परिचय-पत्र) नम्बर नोट कर लिया जाएगा. तीन बार नम्बर नोट हुआ तो देश से बाहर. जहाँ फैमिली एलाउड होती वहीं जाते चाहे वह बाज़ार हो , रेस्तराँ हो या पार्क हो. कभी कभी कार में बैठे रहते और विजय वीडियो लाइब्रेरी से कैसेटस ले आते क्योंकि औरतें दुकान के अन्दर नहीं जा सकतीं. कुछ बाज़ार हैं जो सिर्फ औरतों के लिए हैं. पति और ड्राइवर बाहर बैंचों पर ही बैठे रहते हैं. कुछ बाज़ार सुबह औरतों के लिए और शाम को फैमिलीज़ के लिए हैं. बैचलर्ज़ के लिए शुक्रवार का दिन होता. भिनभिनाती मक्खियों से दूर दूर तक फैले हुए आदमी दिखाई देते. एक-दूसरे से मिलते. देश जाने वाले लोगों को पैसे और सौगात भेजते, आने वालों से चिट्ठी-पत्री और और घर से आई सौगात लेते. अपने अपने परिवारों का हाल-चाल पूछते. घर की नहीं, पूरे गाँव की खबर सुनते और बस इसी में ही सन्तोष पा जाते.

इस शहर में जी का लगाना कैसा !

साउदी अरब एक ऐसा देश है जहाँ नमाज़ के वक्त सारे काम बन्द हो जाते हैं.फज़र की नमाज़ तो सुबह सवेरे चार बजे के करीब होती. उसके बाद की चार नमाज़ों की अज़ान होते ही शटर डाउन. मतुओं की बड़ी बड़ी ज़ी एम सी गाड़ियाँ घूम घूम कर कामकाज बन्द कर के नमाज़ पढ़ने की हिदायत देती हुई दिखाई देतीं. एक और खास बात कि साउदी अरब एक ऐसा देश है जहाँ स्टेडियम में हज़ारों पुरुष खेल देखने के लिए एक साथ बैठते. यह बात गिनिज़ बुक में भी दर्ज़ है.
अन्य धर्मों के पूजा स्थल नहीं और न ही मनोरंजन के लिए सिनेमा हॉल. वीकैण्ड्स पर कुछ दोस्त एक-दूसरे के यहाँ मिलते और बारबीक्यू करते. बस यही एक मनोरंजन का साधन होता. कभी कभी शहर से दूर इस्तराहा (एक विला जिसमें कुछ कमरे स्विमिंग पूल और खेलने का छोटा सा स्थान) बुक कराके 8-10 परिवार जन्मदिन और शादी की सालगिरह भी मना
लेते.

कुछ खट्टा , कुछ कड़वा, कुछ तीता

जीवन नई नई कहानियों के साथ पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ता गया. वहाँ रिश्तेदारों को वीज़ा मिलना मुश्किल है सो दोस्त ही रिश्तेदारों की भी भूमिका निभाते हैं. एक दूसरे के दुख सुख में काम आते लेकिन वह भी पति के भरोसे, जो काम से लौट कर ही कहीँ मिलने मिलाने ले जा पाते. दिल को खुश रखने के लिए सोचा करते कि हम बेगम से कम नहीं. पति शौहर ही नहीं शौफ़र भी हैं जो चौबीस घंटे डयूटी बजाते हैं.
कभी कभी जीवन में ऐसा कुछ घट जाता है कि अन्दर ही अन्दर तोड़ देता है लेकिन इस बदलाव को सहज रूप से लेना सीख लें तो जीना आसान हो जाता है. काली घटाओं में कड़कती बिजली को हम किसी दूसरे ही रूप में देखते और तस्वीर में उतारने की कोशिश करने लगते हैं. सुरमई बादलों के बीच में चाँदी सी रेखा जब चमकती तो लगता जैसे साँवली सलोनी ने चाँदी का हार पहन लिया हो. वैसे भी ज़िन्दगी में सिर्फ मीठा ही नहीं, कुछ खट्टा है, कुछ कड़वा है, कुछ नमकीन भी है. जीने का मज़ा भी उसी में है.

रियाद के स्कूल में बच्चों के बीच...

हिन्दी पढ़ाने के लिए इंडियन एम्बैसी के स्कूल में एप्लाई किया तो फट से नौकरी मिल गई. एक साल लड़कियों को पढ़ाने के बाद जब लड़कों को पढ़ाने को कहा गया तो रात भर नींद नहीं आई थी. प्रिंसीपल साहब ने कहा कि दो बेटों के साथ एक ही स्कूल में लड़कों को पढाना ज़्यादा सही निर्णय होगा. जैसे तैसे हिम्मत करके दसवीं क्लास में पहला कदम रखा तो फिर लगातार दस साल तक पैर वहीं जमे रहे. इतने साल लड़कों को पढाने के अनुभव से जाना कि लड़के व्यवहार में सरल और सहज होते हैं. उतना ही लड़कियों को पढ़ाना पेचीदा लगता. अक्सर लड़कियाँ जिक्र कर देतीं कि हमें लड़के ज़्यादा अच्छे लगते हैं या लड़कियाँ. लड़के कभी सवाल न करते लेकिन लड़कियाँ सवाल का जवाब पाने को बेताब. हम कैसे कहें कि लड़के अच्छे या लड़कियाँ. उदाहरण देते कि हमारे लिए लड़कियाँ नदी की बलखाती धारा सी हैं और लड़के चट्टानों से टकराता समुन्दर. हमें तो दोनो प्यारे लगते हैं. साउदी अरब के कानून को देखते हुए वहाँ पढ़ने वाले सभी बच्चे कुछ ज़्यादा ही प्यारे थे.

बशीर बद्र और मंज़र भोपाली के साथ मंच पर पढ़ी कविता...

पनी उम्र के बच्चों से आपस में मिलने जुलने का कम ही अवसर मिलता. एक स्कूल ही ऐसी जगह थी, जहाँ बच्चे एक दूसरे से मिल कर खुश होते. हम कोशिश करते बच्चों को वह खुशी मिल सके. अपना साथी मानकर दोनों स्कूलों के बच्चे आज भी हमें अपने मन की बात करते हैं तो उनकी खुशहाली की दुआ करते हैं. स्कूल के वार्षिक उत्सव पर कविता, पैरोडी, कव्वाली और नाटक करते हुए खूब मज़ा आता. स्कूल की मैगज़ीन में एडीटर के रूप में अपनी मन-पसन्द काम करने में घंटों बिता देते. उसी दौरान रियाद में हुए शाम ए अवध में और शायर बशीर बद्र और मज़र भोपाली के साथ अपनी कविता पाठ करने का सुखद अवसर मिला. हालात कुछ ऐसे बने कि स्कूल से इस्तीफा देना पड़ा. दिल्ली रहने का विचार किया तो दुबई पहुँच गए

दिल्ली जा बसने का इरादा, पर...

बेटे ने बाहरवीं पास कर ली थी सो दिल्ली जाकर रहने का निश्चय किया. छोटे बेटे को गोएंका स्कूल में डाला. बड़े बेटे को दो कॉलेज में एडमिशन होने पर भी वहाँ का माहौल कुछ जँचा नहीं तो दुबई बिटस में एडमिशन लेकर होस्टल रहने का निश्चय किया. अभी छह महीने भी न बीते थे कि हम भी छोटे बेटे के साथ दुबई शिफ्ट हो गए. रियाद में कई साल रहने के कारण एक बार भी मन शंकित नहीं हुआ कि हम दोनों बेटों के साथ अकेले कैसे रहेंगें. दुबई में आते ही 15 दिन में बेटे को हॉस्टल से घर ले आए. छोटे बेटे को डी.पी.एस. दुबई में डाला तो हमारा लम्बा अध्यापन का अनुभव देखकर हमें भी मिन्नत करके पढ़ाने का न्यौता दे दिया. चाहते हुए भी इंकार न कर सके. दुबई के स्कूल में 18 महीने पढ़ाने का अनुभव भी अपने आप में यादगार बन गया. रियाद के बच्चे तो दोस्त थे ही अब दुबई के बच्चे भी दोस्त बन गए.
(डी पी एस दुबई के अध्यापन के दौरान आबू धाबी में भारतीय राजदूत श्री चन्द्र मोहन भण्डारी जी की अध्यक्षता में प्रथम मध्यपूर्व क्षेत्रीय हिन्दी सम्मेलन में भाग लिया, जिसमें यू.ए.ई के शिक्षा मंत्री नाह्यान भी थे)


आपकी चिट्ठियां
सफर की पिछली तीन कड़ियों [ चतुर चालों के माहिर, उस लड़की ने मजनूं की नाक तोड़ दी और शोरगुल के साथ खारापन ] पर घोस्टबस्टर, मीनाक्षी , दिनेशराय द्विवेदी, डॉ चंद्रकुमार जैन, जोशिम, नीरज रोहिल्ला , ज्ञानदत्त पांडे, काकेश , बेजी, स्वप्नदर्शी, अर्बुदा, संजीत त्रिपाठी, प्रमोदसिंह, सिद्धेश्वर, अजित,अरुण, नीलिमा सुखीजा अरोड़ा, मीनाक्षी, पारुल, अनूप शुक्ल, कंचनसिहं चौहान, हर्षवर्धन, नीरज गोस्वामी और यूनूस जैसे लाजवाब साथियों की प्रतिक्रियाएं मिलीं । आप सबका शुक्रिया...

@नीरज गोस्वामी-

भाई, बहुत बहुत शुक्रिया कि आपने शोरगुल वाली पोस्ट को पसंद किया । मगर एक बात ज़रूर कहना चाहेंगे कि हम
ज्ञानी-वानी नहीं हैं । अपने शौक मे आप सबको साथ लिए चल रहे हैं बस्स । बहुत कुछ बिखरा पड़ा है ज़मानेभर में सो बांच रहे हैं, जांच रहे हैं । समेट रहे हैं, सहेज रहे हैं और सबसे साझा भी कर रहे हैं । ज्ञानी कह कर शर्मिंदा न करें, यही गुजारिश है :) अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, April 11, 2008

शोरगुल के साथ खारापन ....


फारसी के शोर-गुल शब्द का आमतौर पर कोलाहल के अर्थ में हिन्दी में भी खूब इस्तेमाल होता है। यह बड़ा अनोखा शब्द है। यह शोर+गुल से मिलकर बना है। इन दोनों ही शब्दों का अर्थ समान है यानी कोलाहल, चीख-पुकार वगैरह।
शोर शब्द बना है संस्कृत के क्षार से । क्षार रासायनिक पदार्थ होते हैं और आयर्वेद में इनका उपयोग है। कुछ क्षार जड़ी-बूटयों को जलाकर बनाए जाते हैं। इसी तरह कुछ क्षार खनिज के तौर पर प्राकृतिक रूप में भी मिलते हैं जैसे बारूद बनाने के काम आने वाला श्वेतक्षार या सफेद क्षार। फारसी में इसे कहा गया शोर:। इसका यह रूप बना क्षार से ही मगर अर्थ हो गया तेज आवाज करनेवाला। जाहिर सी बात है कि बारूद की भीषण आवाज की वजह से ही शोरे को यह अर्थ मिला। बाद में शोर: का मतलब ही हो गया चिल्लाहट या तेज आवाज। नमक के लिए भी क्षार शब्द है इसीलिए नमकीन के अर्थ में खारा शब्द ज्यादा चलता है। राख शब्द भी क्षार से ही बना है। इस तरह क्षार से शोर: और फिर शोर शब्द बन गए। इससे ही शोरगर यानी पटाखे बनाने वाला और शोर-शराबा जैसे शब्द बने।
अब आते हैं गुल पर। फारसी में गुल का अर्थ भी कोलाहल, शोर या चीख-पुकार ही है। फारसी का गुल शब्द भी संस्कृत के कल से ही बना है जिसका अर्थ होता है शब्द करना, आवाज करना। पंजाबी के की गल्ल ऐ वाली गल में भी यही कल गूंज रहा है। इससे हिन्दी में कई शब्द बने हैं जैसे कोलाहल, कलरव या कलकल यानी मन्द गति से पानी बहना। गौरतलब है कि फारसी में भी कलकल शब्द का पर्याय है गुलूलअभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, April 9, 2008

उस लड़की ने मजनूं की नाक तोड़ दी....[बकलमखुद- 16]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला की पंद्रह कड़ियों में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह और काकेश को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं दुबई में निवासी मीनाक्षी धन्वन्तरि से । मीनाक्षी जी प्रेम ही सत्य है नाम का ब्लाग चलाती हैं और चिट्ठाजगत का एक जाना पहचाना नाम है। हिन्दी के परिवेश से दूर रहते हुए भी वे कविताएं लिखती हैं खासतौर पर उनके हाइकू बहुत सुंदर होते हैं जिन्हें उन्होने त्रिपदम् जैसा मौलिक नाम दिया है। तो शुरू करतें बकलमखुद का पांचवां चरण और सोलहवी कड़ी -

शुरू से शुरू करते हैं

अजित जी का मेल मिला कि शब्दों के सफर में हमसफर एक-दूसरे को जाने-पहचाने, इसलिए अपना आत्मकथ्य लिख भेजिए. एक पल के लिए हम झिझके लेकिन दीदी सम्बोधन ने हमें बाँध लिया. निश्चय कर लिया कि किसी भी तरह से अपने जीवन का एक सरल रेखाचित्र तो ज़रूर भेजेंगे. चार-पाँच बार लिखने बैठे, लिखने की बहुत कोशिश की लेकिन उंगलियाँ कीबोर्ड पर आते ही सन्न सी हो जाएँ. क्या लिखें कहाँ से शुरु करें......
[ मैं ये कहना चाहूंगा कि मीनाक्षीदी और अनितादी को ही सबसे पहले हमने अपने बकलमखुद के बारे में सबसे पहले बताया था और उनसे लिखने का आग्रह किया था ]

बचपन के मस्ती भरे दिन...

न्म से ही शुरु करते हैं. दिल्ली में पैदा हुए. मम्मी बताया करती हैं, जब हम जन्मे तो
अपने देश की रीत के अनुसार दादी रोईं थी लेकिन डैडी ने विपरीत किया, झट से हमें मीठी मधु कह कर गोद में ले लिया था. पाँच साल के बाद छोटी बहन आ गई. दोनों को अपने बाज़ू कह कर डैडी दोनों बाँहों में हम दोनों बहनों को उठा लेते. फिर आया नन्हा-मुन्ना भाई और राखी बाँधने की हमारी चाहत पूरी हुई.
हमकितने भी बड़े हो जाएँ लेकिन बचपन नहीं भूलता, उसकी यादें साँसें बनी दिल में धड़कती रहती हैं. अप्रैल 7 को 48 साल के हो गए लेकिन फिर भी लगता जैसे बचपन छूटा नहीं. पल पल महसूस होता है कि परिपक्व होने में कसर रह गई है. अभी बहुत कुछ सीखना है, बहुत कुछ जानना समझना है. इसी सीखने की राह पर चलते चलते कभी दो पल रुक कर पीछे मुड़कर देखने को जी चाहता है. रुकते हैं, पीछे छूटे पलों को हसरत भरी निगाहों से देखते हैं और सपनों में खो जाते हैं. बार बार पीछे मुड़ मुड़ कर बचपन को हसरत भरी नज़रों से देखते ही रहते हैं.
बचपन के मस्ती भरे दिन नानी के घर बीते. जहाँ गौ मूत्र और गोबर की महिमा जानी. गेहूँ चुनकर, धो-सुखाकर चक्की पर पीसने का आनन्द अभी भी ताज़ा है. चाँदनी रात में खुले गगन के अनगिनत तारों के नीचे छत पर सोते समय नानी के मधुर स्वर में गीता का पाठ सुनना कानों में मिश्री सी घोल देता था. गर्मी की छुट्टियों में कुल्लू मनाली मौसी के घर पहाड़ों पर सपनों के बादल छूने की होड़ लगती तो हम सबसे आगे होते

बस, नाक पर बैठा गुस्सा भन्ना उठा...

तितली बन उड़ निकले थे अकेले दिल्ली से कश्मीर की वादियों में. प्रकृति की सुन्दरता ने मन को ऐसा मोह लिया कि मैदान वापिस जाने से पहले ही हमने सपनों की अपनी एक दुनिया बना ली. बस तो फिर क्या था, उन्हीं सपनों में खोए कॉलेज खत्म किया. सपनों की दुनिया में आकर अगर कोई छेड़खानी करता तो आग-बबूला हो जाते. कई बार चाचू को साथ लेकर उन सभी लड़कों को तमाचे लगाए जो अपने आप को मजनू के वंशज समझते थे. एक दिन डैडी जूडो कराटे के क्लब में ले गए. बोले कब तक दूसरे के कन्धे पर बन्दूक रखकर चलाओगी. खुद सामना करना सीखो. इसी से जुड़ी घटना याद आ गई. एक बार हम जूडो-करांटे के कम्पीटशन के लिए ट्रेन से कलकता जा रहे थे. सफर के दौरान देखा कि अपने ग्रुप की एक लड़की के साथ कुछ लड़के छेड़खानी करने लगे. बस फिर क्या था नाक पर बैठा गुस्सा भन्ना उठा. आव देखा न ताव लड़के के नाक पर हाथ पड़ा तो लगा कि उसका नाक ही टूट गया. उसी पल अपने ग्रुप के लड़के भी आ गए जिन्हें देखकर छेड़खानी करने वाले लड़के नज़र नीची करके दूर जा बैठे

और जा पहुंचे धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के मानतलाई आश्रम

र तक बात पहुँची तो गुस्सा शांत करने के लिए योगा करने के लिए धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के आश्रम मानतलाई भेज दिया गया. हमने भी ईमानदारी से गुस्से को मारने की कोशिश की लेकिन थोड़े बेईमान हो गए और उसे दिल में गहरे बहुत गहरे दबा दिया. मानतलाई आश्रम की बनावट , उसकी सुन्दरता हमारे लिए अद्भुत थी. आश्रम बहुत बड़े इलाके में था. चीड़ के पेड़ , हरी भरी घास और चारों ओर रंग-बिरंगे फूल जिनमें बैठकर ध्यान लगाने का एक अलग ही आनन्द था. सन्ध्या के समय जब शिव के मन्दिर में बैठ कर ध्यान लगाते तो आकाश में टिमटिमाते तारे और दूर कुद शहर के पहाड़ों के घरों की टिमटिमाती बत्तियों में कोई फर्क न दिखाई देता. धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जी जहाँ रहते थे, वहाँ जाने की मनाही थी लेकिन जहाँ वे समाधि में लीन होते , वह गुफा दिखाई गई. हमारा और लड़को का होस्टल कुछ दूरी पर ...शुद्ध देसी घी में शाकाहारी खाना बनता था . सुना था कि गाय, शाक भाजी फल और वनस्पति भी आश्रम की सम्पत्ति थे. योग पर अलग अलग पुस्तकों की लाइब्रेरी जिसमें घंटों बैठकर थ्योरी पेपर की परीक्षा के लिए हम नोटस तैयार करते.
सुबह षटकर्मा की क्रिया करके कुछ देर के अंतराल में नाश्ता करते. उसके बाद योग और आसन के लिए जाते, फिर कुछ घंटे क्लास में थ्योरी पढ़ने जाते. दोपहर आराम करके शाम फिर योग और आसन करते. उसके बाद ही ध्यान और समाधि लगाने की प्रक्रिया में सभी सभी अपने अपने पसन्दीदा स्थान पर एकांत भाव से ध्यान में मग्न हो जाते या होने का प्रयास करते.

बिजनेसवुमैन बनने का शौक...

वापस लौटने पर बिजनेसवुमैन बनने का अनुभव लेने के लिए मौसेरे भाई भाभी के ऑफिस जाकर बैठने लगे. हिन्दी भाषा को सपनों की भाषा समझते थे सो पत्राचार से हिन्दी मे एम.ए किया. मम्मी बार बार पैरों पर खड़ा होने की नसीहत देतीं तो दूसरी तरफ हमारी मस्ती देखकर डैडी बस मुस्कुरा कर रह जाते. मम्मी मनाती रह गईं कि बी.एड कर लेते तो टीचर बन जाते, जितना वह कहतीं उतना हम उस विषय को बदलने की कोशिश करते. मशरूम उगाने का बिजनेस करने का भूत जो सवार था सो भइया के ऑफिस में काम करते हुए सपना देखते कि एक दिन हम भी बिजनेस की दुनिया में नाम कमाएँगें.

सपनों की दुनिया से निकल कर बसना परदेश में ...

भाग्य में कुछ और कहानी लिखी थी. साउदी अरब से एक इंजीनियर लड़का आया. बँध गए एक नए बँधन में. शादी हुई...अपना देश छोड़ा और साउदी अरब के होकर रह गए. 1986 में नन्हें वरुण रेगिस्तान में स्वाति नक्षत्र की स्वाति बूँद बन कर आए . विजय अक्सर पति का पद छोड़कर दोस्त बन जाते और शांत भाव से हमारा जीना आसान कर देते. 'love it or leave it' का महामंत्र हमे बहुत आसानी से सिखा दिया. कभी कभी विचारों में टकराव होता है जो स्वाभाविक है, ऐसा होना भी चाहिए. कम बोलना और खाना देख कर कभी कभी हैरानी होती है क्योंकि हम बिल्कुल विपरीत स्वभाव के हैं. उनके शौक हैं संगीत और सर्फिंग के साथ साथ ऑनलाइन दोस्ती करना. मेहमान नवाज़ी में उनका कोई जवाब नहीं. जारी अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Blog Widget by LinkWithin