Monday, March 5, 2012

मुसद्दी की तलाश…


"किन्हीं सन्दर्भों में मुत्सद्दी को क्लर्क से कम हैसियत का कर्मचारी बताया गया है । दरअसल मुत्सद्दी का यह पतन कम्पनी राज के दौरान हुआ होगा ।."

क थे मुसद्दीलाल...बचपन में हमने कुछ किस्सों की शुरुआत यहाँ से होती देखी थी । सेठ किरोड़ीमल की तरह मुसद्दीलाल भी ढाई  चार दशक पहले के हिन्दुस्तानी समाज का हिस्सा थे । गली मोहल्लों की हवेलियों में रहते सेठ मुसद्दीलाल हों या नुक्कड़ का खोमचे वाला मुसद्दी, शहर की व्यायामशाला वाले मुसद्दी पहलवान हों या दीवान जी की हवेली वाले लाला मुसद्दीमल हों... इन सब किरदारों के दर्शन चालीस साल पहले के कथानकों के ज़रिये फिल्मों या उपन्यासों में हो जाते थे । पर अब न मुसद्दीलाल रहे न किरोड़ीमल । आमतौर पर मुसद्दी की छवि काँइया की है...धूर्त, चालाक, अवसरवादी । किस्सों-कहानियों का मुसद्दी अक्सर राजाओं-ज़मींदारों के दलाल के रूप में नज़र आता है या खुद रईस की भूमिका में दिखता है जो अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकता है । विलासिता की खातिर धनसंग्रह के लिए लक्ष्मीपूजा के अलावा और कोई धार्मिक- नैतिक बन्धन जिसे स्वीकार नहीं । ऐसा था मुसद्दी । जानते हैं मुसद्दी की कहानी ।

मुसद्दी का शुद्ध रूप है मुतसद्दी या मुत्सद्दी । वैसे फ़ारसी में मुतसद्दी शब्द ही सही है । मुग़लकाल में मुत्सद्दी एक सरकारी पद होता था । वज़ीर, दीवान, कानूनगो, एहदी, सर्राफ़, मुंशी जैसे महत्वपूर्ण पदों जैसा ही एक और पद । मुतसद्दी भी दीवान, राजपुरोहितों की तरह दरबारे-खास में जाने का अधिकारी था । कुल मिलाकर मुग़लकाल में नौकरशाही की जो अमलदारी पनपी उनमें मुत्सद्दी-मुसाहब जैसे सरकारी अफ़सरों की काफ़ी तादाद थी । मूलतः ये लोग सरकारी खजाने में मालमत्ता लाकर देते थे । चुस्त प्रशासन की जिम्मेदारी इन पर थी ताकि भरपूर राजस्व वसूली हो सके । ज्यादा राजस्व वसूली यानी बादशाहों, राजाओं की विलासिता के लिए ज्यादा सरंजाम की गुंजाइश । ज्यादा राजस्व वसूली यानी रियाया पर ज्यादा बोझ, ज्यादा अत्याचार । इन दोनों के बीच होता था मुत्सद्दी वर्ग जिसकी दोनों तरहफ़ चांदी थी । मुत्सद्दी आमतौर पर हिन्दू कायस्थ, वणिक और ब्राह्मण वर्ग के लोग होते थे । ये लोग ज्यादा बेहतर ढंग से कर वसूली करते थे । सीधी उंगली से घी न निकले तो कैसे और कितना टेढ़ा करना है, ये तमाम तरकीबें ये जानते थे । राज्य के अन्य पदवीधारी मूलतः दूरदराज़ की जमींदारी देखते थे या फिर फौज सम्बन्धी इंतजामात देखते थे इसलिए उनकी तुलना में मुत्सद्दियों-मुसाहबों को राजा के नज़दीक रहने का मौका मिलता था ।

राठी में मुत्सद्दी शब्द का खूब चलन है । मुत्सद्दी यहाँ उपनाम भी होता है । कई सन्दर्भों में मुत्सद्दी को कर वसूली अधिकारी बताया गया है । चुंगी-कर अधिकारी भी मुत्सद्दी कहलाता था और राजा का दीवान भी मुत्सद्दी । मुत्सद्दी बना है अरबी के सद्द में मुत् उपसर्ग लगने से । मद्दाह के कोश के मुताबिक सद्द का अर्थ है रोक , आड़, रुकावट या बाधा । जॉन प्लैट्स के कोश में इसका अर्थ है बैरियर जिसमें चुंगी चौकी, वसूली नाका आदि का भाव है जहाँ अवरोध खड़े कर वाहनों या अन्य काफिलों से कर वसूली की जाती है । राज्यभर में जगह-जगह ये चुंगी चौकियाँ होती थीं और इसका जिम्मेदार अदिकारी होता था मुत्सद्दी । उर्दू में कहा जाता है सद्द ऐ राह यानी रास्ते की रुकावट या चुंगी चौकी । यह मुतसद्दी का शुरुआती भाव था । बाद में राजनीति-प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखने, राजा को सलाह देने, राजस्ववृद्धि और वसूली के नए नए तरीके ढूँढने, पड़ोसी राज्यों से राजनयिक रिश्तों और विरासत तथा उत्तराधिकार जैसे मसलों पर भी मुसद्दियों की राय महत्वपूर्ण होती थी । मुग़लकाल में मराठी भाषा में भी फ़ारसी का चलन बढ़ा । मराठी में राजनय के लिए आज भी मुत्सद्देगिरी शब्द प्रचलित है । इसे हम कूटनीति या डिप्लोमैसी कहते हैं । इसका फ़ारसी शुद्ध रूप है मुतसद्दीगरी । माधव त्र्यंबक पटवर्धन के मराठी – फ़ारसी कोश के मुताबिक मुत्सद्दी का अर्थ है विदेश नीति में निपुण अफ़सर, चतुर व्यक्ति, कारस्तानी आदि ।
अंग्रेजी राज में भी मुसद्दियों की खूब पूछ-परख रही । किन्हीं सन्दर्भों में मुत्सद्दी को क्लर्क से कम हैसियत का कर्मचारी बताया गया है । दरअसल मुत्सद्दी का यह पतन कम्पनी राज के दौरान हुआ होगा । करीब डेढ़ सदी पहले अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों का दर्जा अचानक समाज में ऊंचा हो गया क्योंकि वे आंग्ल-प्रभुओं की भाषा सीख गए थे। जाहिर है लाट साहबों और लपटन साहबों के बीच उठने-बैठनेवाला भारतीय इससे बाबू का सम्मान तो पा ही सकता था जो अन्यथा ज़मींदार, मुखिया, नेता अथवा पालक को ही मिला करता था । दरअसल भारत में अपने तरीके का बेहतर निज़ाम स्थापित करने के लिए मैकाले ने भारतीयों को शिक्षित करने का दृष्टिकोण रखा। ब्रिटिश सरकार ने उसे मंजूरी दी और प्रशासनिक सेवा में अंग्रेजी तौर-तरीके जाननेवाले और पढ़े-लिखे भारतीयों को लाया गया, ब्रिटिश काल में इंडियन सिविल सर्विस की आजमाईश 1810 के आसपास शुरू हो गई थी । 1832 के करीब इसके लिए बाकायदा ब्रिटेन में परीक्षा होने लगी थी जिसमें भारतीयों का रास्ता भी खुला मगर पहला भारतीय आईसीएस होने का गौरव मिला सत्येन्द्र नाथ टैगोर को जो 1863 में चुने गए ।
कोलकाता में कम्पनीराज के दौरान ब्रिटिश व्यापारियों और भारतीय एजेंटों का हिसाब-किताब देखने वाले किरानियों को सम्मान से बाबू कहा जाने लगा । बाद में अकाऊँटेंट को भी मुत्सद्दी जाने लगा । पढ़े-लिखे आईसीएस अफ़सर अब अंग्रेजों के असली मुत्सद्दी-मुसाहब थे । फ़र्क़ सिर्फ़ ये था कि यह नाम अपना रुतबा खो चुका था । अलबत्ता बड़े लोगों के पदनामों को अपनाकर किंचित सुखानुभूति करने वाले सन्तोषी समाज ने जिस भावना से नवाबसिंह , राजकुमारसिंह , राजकुमारी , राजाबाबू , फिरंगी बेग़म , करनैलसिंह , सरदारीलाल , तहसीलदासिंह , जरनैलसिंह जैसे नाम अपनाए उसी समाज में मुत्सद्दी नाम भी खूब प्रचलित हुआ । फ़र्क़ इतना था कि जहाँ ग़रीब परिवार ने भी अपनी सन्तान के लिए राजाबाबू जैसा नाम अपनाया वहीं काँइया चरित्र की वजह से निम्नवर्ग नेवमुसद्दी नाम नहीं अपनाया । एक सदी पहले तक मुसद्दी नाम धनी-प्रभावी वर्ग में ही रखा जाता था । जब तक मुत्सद्दी पद रहा , उसकी शान रही तब तक ही मुत्सद्दी नाम भी रहा । वैसे हमारे आसपास मुसद्दियों की कमी न हो, मगर असली मुसद्दी का ज़माना बीत गया ।
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9 कमेंट्स:

घनश्याम मौर्य said...

खूब पीछा किया है आपने मुसद्दीलाल का।

प्रवीण पाण्डेय said...

अब तो मुसद्दीलाल ऑफिस ऑफिस घूम रहे हैं..

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अभी तो मुसद्दी का मतलब ऐसे व्यक्ति से हो गया है जो अपना शोषण कराने हेतु बना है.

विष्णु बैरागी said...

मैं तो मुसद्दी को मात्र एक नाम ही मान रहा था। लेकिन आपने तो सारे मायने ही बदल दिए।
मेरे कस्‍बे में बिजली कम्‍पनी के अधिकारी अपना कुल नाम (सरनेम) 'कानूगो' लिखते और जब भी हम लोग उन्‍हें 'कानूनगो' कहते, वे हमें सुधारते थे।

अजित वडनेरकर said...

@ विष्णु बैरागी
मज़े की बात यह कि यही "काननूनगो > कानूगो" आगे चल कर मराठी में
और बदला । पंचवर्णी "काननूगो" अब ढाई आखर वाला "कान्गो" है ।

Mansoor Ali said...

# इस 'होली' पे 'मुसद्दीलाल' चंदा ले गए,
चंदा कम लगा तो थोड़ी 'गाली' दे गए !

# 'सफ़र' में 'फ़ारसी' के 'मुत्सद्दी' भी मिले,
गए जो 'गोरे' उसको अपने साथ ले गए !
http://aatm-manthan.com

आशा जोगळेकर said...

मुत्सद्दी को वाक्पटु, बातचीत में चतुर अर्थ में ही जानते थे पर मुसद्दीलाल जो बेचारा मुसीबत का मारा किसीसे अपनी बात नही मनवा पाता ुनके नाम का बी संबंध इस मुत्सद्दी से !!!!!

आशा जोगळेकर said...

मुत्सद्दी को वाक्पटु, बातचीत में चतुर अर्थ में ही जानते थे पर मुसद्दीलाल जो बेचारा मुसीबत का मारा किसीसे अपनी बात नही मनवा पाता ुनके नाम का बी संबंध इस मुत्सद्दी से !!!!!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अपना गुप्ता भी पूरा मुत्सद्दी था। हमने साहित्यिक संस्था बनाई। उसे कैशियर बना दिया। उस ने पहली बात पूछी कि सदस्यों से सदस्यता शुल्क प्राप्त करना है या वसूल करना है?

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