Friday, March 23, 2012

गुमशुदा और च्यवनप्राश

memory-loss[2]
गु मना, खोना, लापता होना जैसी सामान्य घटनाएँ हमारे इर्द-गिर्द रोज़ होती हैं । ज़िन्दगी की जद्दोजहद में हम इस क़दर व्यस्त रहते हैं कि कई लोग हमें गुमशुदा समझने लगते हैं और कई चीज़ें हम गुमा बैठते हैं । इन्सानी फ़ितरत भी अजीब होती है । दरअसल चीज़ें कहीं गुमती नहीं, हम ही उन्हें कहीं रख कर भूल जाया करते हैं और फिर उन्हें तलाशते हुए यह कहते पाए जाते हैं कि पता नहीं, कहाँ चली गईँ ! । बेजान वस्तुएँ भी कहीं चलती हैं जो कहीँ जा सकें ! दरअसल वे हमारी याददाश्त से चली जाती हैं और हम उन्हें गुम समझते हैं । यक़ीनन वे वहीं होती हैं जहाँ हमने उन्हें रखा होता है । फिर कभी अचानक हम कह उठते हैं “मिल गई, मिल गई” । दिलचस्प ये कि मिलना तो गुमी हुई याददाश्त का है, पर इज़हारे-खुशी चीज़ को फिर पाने की होती है । अक्सर ऐसे लोगों को भुलक्कड़ कहा जाता है और उन्हें च्यवनप्राश खाने की सलाह दी जाती है । ये तमाम बातें सिर्फ़ बेजान चीज़ों के बारे में सही हैं वर्ना मासूम बच्चा सचमुच कहीं चला जाता है । उसे गुमशुदा कहते हैं । कोई जानबूझकर हमारी ज़िंदगी से दूर चला जाता है, वह हमारे लिए लापता होता है । विडम्बना यह भी है कि कुछ चीज़ों को सचमुच हम खुद से दूर कर देते हैं, ग़ायब कर देते हैं, लापता हो जाने देते हैं और दुनिया पर ज़ाहिर करते हैं कि दरअसल वे गुमशुदा हैं ।

गुमशुदा का मतलब है जो हमसे दूर चला गया हो । जिसका कुछ पता न हो । गुमशुदा शब्द हिन्दी में बरास्ता फ़ारसी आया है और इंडो-ईरानी मूल का है । यह बना है गुम में शुदा [गुम+शुदा] परसर्ग लगने से । फ़ारसी के शुदा परसर्ग से कई शब्द बने हैं जो हिन्दी में भी प्रचलित हैं जैसे शादीशुदा, तलाक़शुदा या गुमशुदा । ‘शुदा’ का अर्थ है, हो जाना या हो चुकना  । मूलतः इसमें होने का भाव है । गुमशुदा का अर्थ हुआ ‘गुम’ [गायब] ‘शुदा’ [हो जाना] अर्थात जो गायब हो चुका हो । फ़ारसी का ‘शुदा’ प्रत्यय अवेस्ता के ‘शुता’ का रूपान्तर है । ‘शुदा’ का सम्बन्ध वैदिक च्युत् से है जिसमें गति करना, हलचल होना, हिलाना-डुलाना, नीचे आना,  हटाना, जाना जैसे भाव हैं । च्युत बना है च्यु धातु से जिसमें   नीचे आना, गिरना, टपकना, झरना, पतन, हटाना जैसे भाव हैं । च्युत शब्द का प्रयोग हिन्दी में भी परसर्ग की तरह होता है । इससे बने कुछ शब्दों पर गौर करें- पदच्युत, धर्मच्युत, समाजच्युत, जातिच्युत  आदि । इन सभी में अपने मूल स्थान से हटने, हिलने-डुलने या पतन का भाव है । च्युत का अवेस्तन रूप शुता हुआ जो फ़ारसी में शुदा बना ।
च्युत से एक संज्ञानाम बनता है अच्युत [+च्युत] जिसका अर्थ है अडिग, स्थिर , अटल, अविनाशी, अमर आदि । ये सभी मायने परम शक्तिशाली से जुड़ते हैं । पुराणों में विष्णु और कृष्ण को भी अच्युत कहा गया है । अग्नि के लिए भी ‘अच्युत’ संज्ञा का हवाला मिलता है । च्युत शब्द सम्बन्ध संस्कृत की च्यु क्रिया से है जिसमें गिरने, टपकने, बहने, मंद होने, टपकने, क्षीण होना, चले जाने जैसे भाव हैं । किसी जलाशय के रिसाव को बोली भाषा में कहते हैं कि पानी ‘चू’ रहा है । पानी ‘चूना’, ‘चुअन’ या ‘चुआना’ जैसे क्रियारूप भी बनते है । यह जो ‘चू’ है वह ‘च्यु’ से ही आ रहा है । अवेस्ता में च्यु का रूप शु होता है । च्युत का शुदा के में बदलता स्पष्ट दिख रहा है । गुमशुदा की च्यवनप्राश से भी रिश्तेदारी है । जी हाँ, वही च्यवनप्राश जो अक्षय यौवन के लिए प्राचीनकाल से हमारे ऋषि-मुनि करते रहे हैं । अक्षय यौवन अर्थात वृद्धावस्था को दूर रखना । बुढ़ापे के प्रमुख लक्षणों में स्मरणशक्ति क्षीण होना भी है । च्यवनप्राश से स्मरणशक्ति भी तेज़ होती है । च्यवन शब्द की व्युत्पत्ति भी च्यु धातु से हुई है जिससे च्युत और शुदा बने हैं । हालाँकि च्यवन शब्द में स्मरण या याददाश्त की अर्थवत्ता नहीं है ।
च्यवनप्राश नाम की स्मृतिवर्धक दवा का नाम तो च्यवन ऋषि के नाम पर प्रचलित हुआ जिन्हें पुनः यौवन प्रदान करने के लिए अश्वनीकुमारों नें एक विशेष औषधि बनाई थी । बाद में औषधि च्यवनऋषि के नाम से ही प्रसिद्ध हुई । च्यु धातु में निहित च्यवन शब्द का अर्थ भी बहना, टपकना, क्षीण होना जैसे भाव हैं । च्यवन के पिता ऋषि भृगु और माता पुलोमा थी । कहानी है कि च्यवन जब अपनी माँ के गर्भ में थे तब किसी राक्षस ने ऋषिपत्नी पर कुदृष्टि डाली । भ्रूण रूप में च्यवन ऋषि ने अपने तेज से राक्षस को भस्म कर दिया । चूँकि ये अपनी माता के गर्भ से गिर पड़े थे इसलिए इन्हें च्यवन नाम मिला । च्यवन में भी वही भाव हैं जो च्यु में हैं अर्थात गिरना, झरना या टपकना । प्रतीकार्थ यह भी है कि बढ़ती उम्र में क्षीण होती काया, स्मरण शक्ति को जो प्राश ( खुराक) रोक दे, वह च्यवनप्राश है ।
गायब, लापता के अर्थ वाले गुम शब्द में जो खास बात है वह है किसी चीज़ का खो जाना,  उसका अता-पता न मिलना । मूल बात यह कि अता-पता इसलिए नहीं मिलता क्योंकि उस वस्तु के अस्तित्व की स्थिति या तो हमारी स्मृति से निकल जाती है या फिर सचमुच वह वस्तु कही और रख दी जाती है । कोई बात दिमाग़ से निकल गई या कोई वस्तु जगह से हट गई दोनो ही अवस्थाओं में स्थान परिवर्तन है, गति है । संस्कृत में जाने, चलने, गति करने, कहीं निकल जाने के के भाव गम् धातु में अभिव्यक्त होते हैं । गमन एक क्रिया है जिसका अर्थ है जाना । यह हिन्दी में भी प्रचलित है । किसी चीज़ के लापता हो जाने या गायब हो जाने के लिए फ़ारसी का गुम शब्द इसी गमन वाले गम् से सम्बन्धित है । अवेस्ता और पहल्वी में भी गम् का यही रूप सुरक्षित रहता है मगर फ़ारसी में इसका कायान्तरण गुम के रूप में हो जाता है और अर्थवत्ता में भी खो जाने, गायब हो जाने गुम हो जाने का भाव आ जाता है ।
गुम शब्द में मुहावरेदार अर्थवत्ता है । फ़ारसी का मुहावरा है अक़्ल गुमशुदन जिसका हिन्दी रूप है अक़्ल गुम होनागुमसुम शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता पर गौर करें । उदासी के भाव के साथ चुप बैठे व्यक्ति को “गुमसुम” कहा जाता है । चुप्पा तबीयत के आदमी को बोलीभाषा में गुम्मा कहा जाता है जैसे- “वो गुम्मा है, कुछ नहीं बताएगा ।” किसी को ग़लत सीख देने, रास्ते से भटकाने के सन्दर्भ में “गुमराह करना” भी हिन्दी में खूब प्रचलित है । गुमराह करने में सही रास्ता न दिखाने यानी उस रास्ते तक न पहुंचने देने या ज़रिये को गायब करने का भाव है जिससे किसी का मक़सद पूरा होता हो । अन्यमनस्कता या बेख़याली की स्थिति में अक्सर सुनने को मिलता है- “कहाँ गुम हो ?”
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9 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अच्छी पोस्ट, ये टिप्पणी बताती है कि हम गुम न हुए हैं।

RDS said...

वडनेरकर जी, प्रणाम ..

(गमन -> गम् -> गुम ) + ( च्युत् -> शुत् -> शुदा ) = गुमशुदा ।
इस प्रकार के अनगिन उद्धरण आपके आलेखों मे प्रतिबिम्बित हुये हैं जब देश विदेश मे प्रचलित शब्दों के मूल मे संस्कृत की ही कोई धातु पाई गई है । संस्कृत अभी तक यथावत् है ।

सहज जिज्ञासा है कि संस्कृत का भोगोलिक विस्तार कहाँ से कहाँ तक रहा होगा ? द्रविड भाषाओं से संस्कृत का सामीप्य देखते हुये अंग्रेज़ीदाँ इतिहासकारों की यह युक्ति तो भ्रांत सिद्ध होती है कि आर्य विदेशी आक्रांता थे ।

आपका हर आलेख गहन शोध और सुगम्यता का संगम होता है । साधुवाद !

प्रवीण पाण्डेय said...

गुमशुदा घास,
घोड़ा क्या खाये,
बस च्यवनप्राश।

संजय बेंगाणी said...

गजब है...

और भाईश्री 'मुब्तिला' जैसे शब्द हमारे लिए अबुझ है. उन पाठकों का भी ध्यान रखे जो उप्र से सम्बन्ध नहीं रखते :)

Mansoor Ali said...

कैसे वहम-ओ-गुमान होते है !
'गुमशुदा', पासबान होते है,
हम तो समझे थे इसको गाली कोई,
'च्युतानंदन' महान होते है !!
--------------------------------------
@ संजय बेंगाणी जी,
'मुब्तिला' को 'व्यस्त' पढ़ लीजे,
ख्वामख्वाह क्यों परेशाँ होते है !
http://aatm-manthan.com

सदा said...

वाह ..बहुत ही बढिया।

विष्णु बैरागी said...

'च्‍यवनप्राश' का यह अर्थ पहली बार जाना।

mridula pradhan said...

bahut gyanvardhak hai ye post......

आशा जोगळेकर said...

गुमशुदा याददाश्त के लिये लें च्यवन प्राश । गम (जाना) से गुम ये तो नई बात है । क्या जब खुशी गुम हो जाती है तो इसे गम कहते हैं ।

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