Friday, March 9, 2012

बनिया-बक्काल यानी प्रोविज़न स्टोर वाला

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मतौर पर किसी शब्द की पहचान इसलिए उभर नहीं पाती क्योंकि वह किसी शब्दयुग्म का हिस्सा होता है । बक्काल ऐसा ही एक शब्द है जिसका स्वतंत्र प्रयोग शायद ही हिन्दी में होता हो । किसी के सामने बोलने पर वह भी इसकी शिनाख़्त शायद ही कर पाए । मगर बनिया-बक्काल के रूप में इसे सब जानते हैं । भारतीय समाज में व्यवसायगत पहचान ही सदियों बाद जातीय पहचान बन कर उभरी । इस प्रक्रिया में कई ऐसे शब्द बने हैं जिनका जन्म सामान्य बोलचाल में हुआ मगर कालान्तर में उन्हें जातीय पहचान के हीन दृष्टिकोण से देखा जाने लगा । भारत के व्यापारी समुदाय मे बनिया वर्ग भी शामिल है । बनिया शब्द की अर्थवत्ता में इज़ाफ़ा हुआ और यह शब्द ऐसे लोगों के लिए भी प्रयोग होने लगा जो जोड-गुणा-भाग के साथ जीवन जीते हैं । बेहद कंजूस, कृपण व्यक्ति को भी बनिया कहा जाने लगा और चतुर, व्यवसाय बुद्धिवाला व्यक्ति भी बनिया हो गया । इस शब्द के मेल से कई विशेषण भी बने जिनका मुहावरेदार प्रयोग हम आए दिन करते हैं मसलन बनिया-बुद्धि, बनिया-मानिसिकता, बनिया-मेन्टैलिटी , बनियाटाइप, बनियापन जैसे प्रयोगों ने हमारी अभिव्यक्ति को नया आयाम दिया है । ऐसा ही एक शब्दयुग्म है बनिया-बक्काल । यह भी सच है कि इन प्रयोगों की बदौलत ही बनिया की जातीय पहचान रखने वाले लोगों में असन्तोष भी है और वे इस शब्द से खुद की शिनाख्त नही कराना चाहते । एक सदी से भी पहले ब्रिटिशकाल में बनिया-बक्काल विशेषण के स्थान पर वैश्य शब्द का प्रयोग करने की माँग की थी ।
बसे पहले बक्काल की बात । बक्काल हिन्दी का अपना नहीं है बल्कि सेमिटिक शब्दावली का हिस्सा है और फ़ारसी और उर्दू पर सवार होकर यह हिन्दी के कारवाँ में दाखिल हुआ है । सेमिटिक परिवार की अरबी के ज़रिये यह न सिर्फ हिन्दी बल्कि यूरोपीय भाषाओं में भी शामिल हुआ । बक्काल के बारे में हिन्दी के कोश  कामचलाऊ जानकारी ही देते हैं सिर्फ़ इतना ही कि यह बनिया शब्द का पर्याय है और रोज़मर्रा की चीज़ें बेचनेवाला छोटा दुकानदार, किरानी आदि का भाव इसमें है । सेमिटिक मूल के बिकाला का अरबी भाषा में अर्थ होता है ताज़ा बने सामान की दुकान जैसे दूध, मक्खन, पनीर, घी, सब्ज़ी आदि । इससे ही बना है बक्क़ाल जिसका अर्थ है दूध, पनीर, सब्ज़ी आदि बेचने वाला । हिन्दी में सब्ज़ी, डेरी प्रॉडक्ट या ताज़ा वस्तुओं की दुकान के लिए कोई शब्द नहीं मिलता । अंग्रेजी का फ्रेश-मार्ट शब्द शहरों में चल पड़ा है । सब्ज़ी बेचनेवाले को सब्ज़ीवाला ही कहते हैं, मगर वह दूध, दही या पनीर नहीं रखता । बतौर सब्ज़ीवाला, अरविन्दकुमार के सहज समान्तर कोश में बक्काल भी एक पर्याय है । हिन्दी का कुँजड़ा शब्द सिर्फ़ देहात में बोला समझा जाता है । कुँजड़ा सब्ज़ी बेचनेवाले को कहते हैं । यह जातीय विशेषण भी है । कुँजड़ावर्ग में मुस्लिम ज्यादा हैं । सब्ज़ीवाला एक सामान्य सम्बोधन है और सब्ज़ीफ़रोश अप्रचलित शब्द है । माली शब्द बहुत व्यापक है क्योंकि इसका आशय बाग़वानी करनेवाले उस समुदाय से है जो मुख्यतः बाग़ीचे की देखभाल करता है, फूल उगाता है और सब्ज़ी भी उगाता है । इसके बावजूद इन विक्रेताओं के यहाँ हम दूध, दही, पनीर मिलने की कल्पना नहीं कर सकते । इसीलिए ताज़ा बने सामान के विक्रेता के लिए बक्काल शब्द की अर्थवत्ता काफ़ी व्यापक है और एशिया से लेकर पूर्वी यूरोप तक अब बक्क़ाल के मायने किराने की दुकान या किरानी होता है ।
बिक़ाला में मूलतः हरी-ताज़ा वस्तुओं की दुकान का भाव है । इसे सब्ज़ी की दुकान भी कहा जा सकता है । इसी कड़ी में आता है बक़्ल जिसका अर्थ है जड़ी-बूटी । इसका एक रूप है बक़ाला यानी बीज । बक्काल को कही छोटा बाज़ार कहा जाता है तो कहीँ छोटी दुकान । बक्क़ाल दरअसल पुराने ज़माने का सुपर मार्केट था जहाँ एक ही स्थान पर बहुत सी चीज़ें मिल जाती थीं । आज भी छोटे छोटे गाँवों में किराने की एक ही दुकान होती है जहाँ प्याज-लहसुन से लेकर दूध-दही, आटा-दाल से लेकर नमक-मिर्च तक सारी वस्तुएँ मिलती हैं । अरब के रेगिस्तान में दूरदराज़ के सैलानी ऐसी ही दुकानों से सौदा-सुलफ़ लिया करते थे । बिक़ाल का जन्म ब-क़-ल धातु से माना जाता है जिसमें अंकुरण, वृद्धि, खिलना, बढ़ना, फूलना जैसे भाव हैं । ज़ाहिर है ये सभी भाव ताज़गी में भी हैं । अंकुरित बीज, ताज़ा दूध, नमक, मिर्च, आटा-दाल जैसी चीज़ें ही प्राचीन क़बाइली समाज की प्रमुख ज़रूरत थी । यह सब बिक़ाला में मिल जाता था । बिक़ाला यानी किराना या जनरल स्टोर और बक्क़ाल यानी किरानी, पंसारी या बनिया ।
बक्काल शब्द अरबी से तुर्की में गया जहाँ किराने की दुकान के भाव को और विस्तार मिला और तुर्की भाषा में इसकी व्याख्या हुआ बाक़-आल । बाक ( bak )यानी देखना और आल ( aal ) यानी चुनना अर्थात ऐसी जगह जहाँ रोजमर्रा का सामान मिलता है । इस व्याख्या से पुराने ज़माने के किसी छोटे-मोटे सुपरमार्केट की कल्पना दिमाग़ में आती है । हॉब्सन-जॉब्सन कोश से पता चलता है कि उन्नीसवीं सदी के भारत में सेकंड हैंड वस्तुओं के व्यापारी या कबाड़ी के लिए भी बक्क़ाल शब्द प्रचलित था । व्यु्त्पत्ति के सेमिटिक आधार को मज़बूत करने की एक वजह और है । बक़्ल की तर्ज़ पर अरबी में ब-क-ल धातु से बना है बक्र जिसका अर्थ है शुरुआत, दिन की शुरुआत, ताज़ा, पवित्र, शुद्ध या प्राकृतिक वगैरह । ताज़गी का भाव यहाँ भी उभर रहा है ।  बक्ल और बक्र में और का अन्तर है । और ध्वनियों में रूपान्तर की वृत्ति होती है । ज़ाहिर सी बात है कि बक्र और या बक्ल, दोनों में बात ताज़गी की है । सुबह सो कर उठने के साथ, दिन की शुरुआत दूध-ब्रेड से होती है । सबसे पहले इन्हीं पदार्थों की दुकानें खुलती हैं । दिन चढ़ने के साथ साथ ये दुकानें जनरल स्टोर में तब्दील हो हो जाती हैं और दूध, दही, सब्ज़ी की बिक्री कम होती जाती है । सो बक्काल में मूलतः सब्ज़ी-दूध की दुकान का भाव था जो बाद में किराने की दुकान में तब्दील हो गया । आज के किराने के दुकान को प्रोविज़न स्टोर कहते हैं  जहाँ बक्काल की प्राचान अवधारणा के तहत दूध, दही, पनीर, सब्ज़ी से लेकर खाने-पीने की पैक बन्द सामग्री और किराने का दूसरा सामान भी मिलता है ।
ब बनिया की बात । उत्तर वैदिककाल के उल्लेखों में पण, पण्य, पणि जैसे शब्द आए हैं। पण या पण्य का अर्थ हुआ वस्तु, सामग्री, सम्पत्ति। बाद में पण का प्रयोग मुद्रा के रूप में भी हुआ । पणि से तात्पर्य व्यापारी समाज के लिए भी था। पणि उस दौर के महान व्यापारिक बुद्धिवाले लोग थे। पणियों की रिश्तेदारी आज के बनिया शब्द से है। पणि (फिनीशियन) आर्यावर्त में व्यापार करते थे। उनके बड़े-बड़े पोत चलते थे। वे ब्याजभोजी थे। आज का 'बनिया' शब्द वणिक का अपभ्रंश ज़रूर है मगर इसके जन्मसूत्र पणि में ही छुपे हुए हैं। दास बनाने वाले ब्याजभोजियों के प्रति आर्यों की घृणा स्वाभाविक थी। आर्य कृषि करते थे, और पणियों का प्रधान व्यवसाय व्यापार और लेन-देन था। पणिक या फणिक शब्द से ही वणिक भी जन्मा है । आर्यों ने पणियों का उल्लेख अलग अलग संदर्भों में किया है मगर हर बार उनके व्यापार पटु होने का संकेत ज़रूर मिलता है । हिन्दी में व्यापार के लिए वाणिज्य शब्द भी प्रचलित है । वाणिज्य की व्युत्पत्ति भी पण् से ही मानी जाती है। यह बना है वणिज् से जिसका अर्थ है सौदागर, व्यापारी अथवा तुलाराशि। गौरतलब है कि व्यापारी हर काम तौल कर ही करता है। वणिज शब्द की व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक पण+इजी से हुई है । इससे ही बना है “वाणिज्य” और “वणिक” जो कारोबारी, व्यापारी अथवा वैश्य समुदाय के लिए खूब इस्तेमाल होता है । पणिक की वणिक से साम्यता पर गौर करें। बोलचाल की हिन्दी में वणिक के लिए बनिया शब्द कहीं ज्यादा लोकप्रिय है जो वणिक का ही अपभ्रंश है इसका क्रम कुछ यूं रहा- वणिक > बणिक > बनिअ > बनिया
वियोगी हरि संपादित हमारी परंपरा पुस्तक में शौरिराजन द्रविड़ इतिहास के संदर्भ में पणिज समुदाय की दक्षिण भारत मे उपस्थिति का उल्लेख करते हैं और इस संबंध में क्रय-विक्रय, व्यापारिक वस्तु और एक मुद्रा के लिए पणि , पणम , फणम जैसे शब्दों का हवाला भी देते हैं। तमिल में बिक्री की वस्तु को पण्णियम् कहा जाता है। तमिल, मलयालम और मराठी में प्राचीनकाल में वैश्यों को वाणिकर, वणिकर या वाणि कहा जाता था। पणिकर भी इसी क्रम में आता है। इस उपनाम के लोग मराठी, तमिल और मलयालम भाषी भी होते हैं। पणिकर को पणिक्कर भी लिखा जाता है।

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7 कमेंट्स:

सुज्ञ said...

पण, पण्य, पणि और पणिक से बने वणिक का सफर शानदार है, पण्य से ही आपकी एक पुरानी पोस्ट याद आ गई, दुकान के लिए 'पण्यशाला' और पंसारी इसी की उतपत्ति है। बनियों में एक उपनाम है भंसाली या भणशाली यह भी वस्तुतः पण्यशाली लगता है जो भ्रंश हुआ है।
आर्यों में वाणिज्य समुदाय का न होना और आर्यों का मात्र कृषिकर्म ही होना विश्वसनीय नहीं है।

विष्णु बैरागी said...

'बक्‍काल' पहली ही बार देखा, पढा और जाना। मेरे लिए तो यह मेरी शब्‍द-सम्‍पदा में वृध्दि है। इस हेतु विशेष आभार।

'पण' का उपयोग, हिन्‍दी धारावाहिक 'चाणक्‍य' और उससे पहले, श्‍याम बेनेगल के 'भारत एक खोज' में तत्‍कालीन मुद्रा-इकाई के रूप में प्रयुक्‍त होते देखा/सुना था।

आशा जोगळेकर said...

तो वणिक की या बनिये की उत्पत्ती पण से हुई । हम कोई तीन साल कुवैत में रहे तो वहां आसपास की परचून दुकान को बकाला कहते थे । उसकी उत्पत्ती का स्त्रोत बक्काल है य़ह आपसे जाना । पर मराठी में बकाल बस्ती को उजाड के अर्थ में जाना जाता है वह कैसे और कहां से ।

आशा जोगळेकर said...

तो वणिक की या बनिये की उत्पत्ती पण से हुई । हम कोई तीन साल कुवैत में रहे तो वहां आसपास की परचून दुकान को बकाला कहते थे । उसकी उत्पत्ती का स्त्रोत बक्काल है य़ह आपसे जाना । पर मराठी में बकाल बस्ती को उजाड के अर्थ में जाना जाता है वह कैसे और कहां से ।

आशा जोगळेकर said...

तो वणिक की या बनिये की उत्पत्ती पण से हुई । हम कोई तीन साल कुवैत में रहे तो वहां आसपास की परचून दुकान को बकाला कहते थे । उसकी उत्पत्ती का स्त्रोत बक्काल है य़ह आपसे जाना । पर मराठी में बकाल बस्ती को उजाड के अर्थ में जाना जाता है वह कैसे और कहां से ।

प्रवीण पाण्डेय said...

देख कर चुनना, हम सब ही बक्काल हो गये तब तो।

Mansoor Ali said...

# 'माल' की गर है तलब हाज़िर यहाँ 'बक्क़ाल' है,
ताज़ा सब्ज़ी, दूध, फ़ल, सेवा यहाँ तत्काल है.
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# 'ब्याजभोजी' है 'वणिक' बनिया बड़ा हुशियार है,
स्वार्थ बिन चलता नहीं कोई भी कारोबार है,
तेल- धातु- असलहा* अब आज की खूराक है, *[Oil,Gold,Weapons]
धौंस की 'बनियागिरी' ही वैश्विक व्यापार है.
http://aatm-manthan.com

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