Saturday, March 17, 2012

लाव-लश्कर का क़ायदा

army

सम्बन्धित आलेख-1.वैजयन्तीमाला , झंडाबरदार और जयसियाराम !2.रुआबदार अफसर था कभी जमादार...3.सेना से फौजदारी तक…4.लाजमी है मुलाजिमों का लवाजमा 5.क्या हैं गुड़ी पड़वा और नवसंवत्सर 6.मिस्री पेपर और बाइबल 7.लंबरदार से अलमबरदार तक 8.सैनिक सन्यासियों का स्वरूप 9.लाम पर जाना, लामबन्द होना 10.शहर का सपना और शहर में खेत रहना
भा री साज़ो-सामान के साथ कहीं आने-जाने के सन्दर्भ में लाव-लश्कर शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है । मूलतः यह फ़ौजी शब्दावली का हिस्सा है और लवाजमा की तरह ही इसका भी प्रयोग होता है । पुराने ज़माने में हर मुल्क में फ़ौजी क़वायद जारी रहती थी । एक इलाके से दूसरे इलाके में लश्करों का आना-जाना चलता रहता था । भारी तादाद में साज़ो-सामान, असबाब के साथ सेनाएँ एक जगह से दूसरी जगह कूच करती, बीच बीच में पड़ाव डालतीं । इस भारी लवाजमे के एक मुकाम से दूसरे मुकाम तक पहुँचने की खबरें खास तौर पर बहुत पहले से पहुँचाई जाती थीं ताकि फौजी-पड़ाव के लिए बंदोबस्त किया जा सके । लाव – लश्कर के साथ निकले फौजी जमावड़े का अर्थ ही यह था कि जंग का मक़सद है । गौरतलब है कि लश्कर का अर्थ होता है फौज । इसकी व्युत्पत्ति पर विस्तार से आगे चर्चा की जाएगी । सामान्य बोलचाल में भी लाव-लश्कर शब्द का प्रयोग होता है जिसका अर्थ है पूरी तैयारी अर्थात साजोसामान के साथ कहीं जाना या पहुँचना ।  हाथी, घोड़ा, पालकी । जय कन्हैयालाल की ।।
बसे पहले बात करते हैं लाव-लश्कर पद के पहले हिस्से यानी लाव की । किसी भी फौज के लिए ध्वज का सर्वाधिक महत्व है । यह ध्वज उस राष्ट्र की सम्प्रभुता का प्रतीक होता है जिसकी और से वह फौज लड़ रही होती है । दिलचस्प बात यह है कि पुराने ज़माने में किराए की सेनाएँ भी ली जाती थीं । कई छोटी रियासतें सिर्फ़ भाड़े पर अपनी फौज दिया करती थीं और बदले में मोटी रकम या जागीर वसूलती थीं । ध्वज इसीलिए ज़रूरी होता था ताकि फौजी जमावड़े को उस राज्य की पहचान मिल सके जिसकी ओर से वह जंग के मैदान में है । लाव-लाश्कर दरअसल बोली भाषा से बना शब्द है । लाव का मूल रूप अरबी का लिवा शब्द है जिसका अर्थ होता है ध्वज, झण्डा या पताका । लिवा बना है सेमिटिक धातु l-w-y अर्थात ‘लाम-वाव-या’ से । इसमें बांधना, लपेटना, घुमाना, एँठना, मरोड़ना, जोड़ना, सटाना, कसना जैसे भाव हैं । अरबी के अलम शब्द से ही अलमबरदार शब्द बना है जिसका अर्थ है ध्वजवाहक । संस्कृत के जयन्तकः से बना है झण्डा । इस झण्डा में फ़ारसी का बरदार लगाने से बनता है झण्डाबरदार
किसी ध्वज को जब दण्ड से बांधा जाता है तब यही सारी क्रियाएँ उसमें होती हैं । पताका यानी कपड़े का टुकड़ा, तभी ध्वज कहलाता है जब उसे दण्ड से बान्धा जाता है । दण्ड से बान्धना इसलिए ज़रूरी होता है ताकि दण्ड की ऊँचाई पर लगी यह जयन्तिका अर्थात विजय-लहरी सबको दिख सके । युद्ध के मोर्चे पर हटने के बाद इस पताका को या तो ध्वज-दण्ड के इर्दगिर्द गोल लपेट दिया जाता है या फिर पताका और दण्ड को अलग अलग कर, पताका को सावधानी से तह कर अलग रख दिया जाता है । कुल मिला कर बान्धना, सटाना, जोड़ना महत्वपूर्ण है । इससे जो समग्र भाव उभरता है वह साहचर्य का है । साथ होने का है । किसी से कुछ ‘जोड़ना’ या ‘सटाना’ किन्हीं दो चीज़ों को ‘साथ-साथ’ करना ही है । ‘बन्धन’ ज़रूरी है । यह बन्धन जब स्वभाव बन जाता है तब ‘साथ’ भी सहज हो जाता है । फौज दरअसल साथ-साथ चल रहे लोगों का समुच्चय ही है । अरबी में जमात का अर्थ भी सेना होता है । ज-म धातु में जुड़ाव, समुच्चय का भाव है । इससे बने जम, जमा, जमाव जैसे शब्दों में समूह, जत्था जैसे भाव स्पष्ट हैं । जमाव में जहाँ अड़चन का भाव है यह भी स्पष्ट है कि यह अड़चन दरअसल समूह की वजह से है । बहुत सारी राशि का समूह ही जमाजथा है । इससे ही जमाअत बनता है जिसका अर्थ है कतार या पंक्ति । बहुत सारी इकाइयाँ साथ-साथ होने से ही कतार बनती है । जमाअत ही हिन्दी में जमात है । जमातदार यानी फौजदार । बाद में यह जमादार बन गया ।
हरहाल, बहुत सारे लोगों के समूह को भी फौज ही कहा जाता है । अक्सर बोलचाल में कहा जाता है कि “यह फौजफाटा लेकर कहाँ जा रहे हो ?” फौजफाटा शब्द हिन्दी के अलावा मराठी में भी बोला जाता है ।  वैसे अरबी में फौज का अर्थ है सुगन्ध या तेज़ी से चारों ओर फैलना । ध्यान रहे आक्रमण करतेindiaflag1 समय सैन्य दल तेज़ी से सब तरफ फैलते हैं और फिर धावा बोलते हैं । साथ-साथ चलने की यही बात अरबी लिवा के मूल में है । लिवा का लाव, लेओ, लाओ, लिवाज़ा जैसे रूप भी हैं । इसका रूढ़ार्थ चाहे पताका है मगर इसकी विभिन्न अर्थछटाओं में सबसे महत्वपूर्ण भाव साहचर्य का ही है । रूसी भाषविद् लियोनिद् कोगन के मुताबिक l-w-y धातु का अर्थ है सहचर अथवा साथी । एलायड चैम्बर्स ट्रान्सिट्रेटेड कोश के मुताबिक लाव का अर्थ है साथ चलनेवालों का समूह । बहुत सारे लोगों का जत्था । कुल मिलाकर लश्कर का अर्थ फौज है और लाव का अर्थ है बहुत सारे लोगों का समूह, साथ चलने वाले लोग । स्पष्ट है कि लाव-लश्कर समानार्थी शब्दयुग्म है । किसी बात को प्रभावी ढंग से उजागर करने के लिए ऐसे समास बनते हैं जैसे नपातुला, खराखरा वगैरह ।
लश्कर यानी क्या ?
स देश की सांझी संस्कृति की सबसे रंगीन पहचान उर्दू का एक नाम लश्करी भी है। विभिन्न जातियों में लश्करी उपनाम पाए जाते हैं। ग्वालियर का एक उपनगर लश्कर lashkar मशहूर है। पर इन सबको पीछे धकेल कर दहशत का लश्कर हावी हो गया है । लश्कर अरबी - फारसी के जरिये हिन्दी-उर्दू में दाखिल हुआ। शब्दकोशों के अनुसार लश्कर का अर्थ होता है सेना, वाहिनी या फौज। फारसी - अरबी में इसका अभिप्राय फौजी जमाव जमावड़े से ही है। उर्दू में आकर लश्कर का अर्थ हुआ फौजी पड़ाव। खास बात यह कि  छावनी या पड़ाव के तौर लश्कर अधूरा शब्द है, इसका शुद्ध रूप है लश्करगाह अर्थात जहां सेना के डेरे लगते हों। ग्वालियर के लश्कर उपनगर का नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि वहां फौजी पड़ाव था। लश्कर यानी फौज के कार्मिकों को लश्करी कहा जाता था। लश्करी यानी सैन्यकर्मी। जरूरी नहीं कि लश्करी फौजी, सैनिक या लड़ाका ही हो। वह फौज का कोई भी कार्मिक हो सकता था। तोपची से लेकर रसद व्यवस्था देखनेवाला व्यक्ति लश्करी हो सकता था। लश्करी lashkari का एक अन्य अर्थ होता है सैना संबधी। मराठी में फौजी शासन अथवा मार्शल लॉ के लिए लश्करी कायदा शब्द खूब प्रचलित है। लश्कर अरबी शब्द अल-अस्कर al askar का बिगड़ा हुआ रूप है। अरबी में अस्कर का मतलब होता है रक्षक, लडाका अथवा इनका समूह। बाद में सिपाहियों के संगठित जमावड़े के तौर पर अस्करी को सेना या फौज का अर्थ भी मिल गया। अल-अस्कर जब फारस में दाखिल हुआ तो इसकी विभिन्न ज़बानों में अलग अलग उच्चारणों से होते हुए लश्कर में बदल गया।
रअसल अस्कर शब्द मूलतः अरबी का भी नहीं है बल्कि हिब्रू शब्द सिखर से बना है । बाइबल में वर्णित गोस्पेल के मुताबिक समारिया क्षेत्र में सिखर sychar नाम का एक कस्बा था। सिखर का ही अपभ्रंश रूप इस्ख़र ischar प्रसिद्ध हुआ। हिब्रू अरबी के बीच की कड़ी है आरमेइक जिसमें इस्खर का उल्लेख बस्ती, आबादी या घिरे हुए स्थान के तौर पर हुआ जिसने अरबी में अस्कर बन कर समूह, संगठन या फौज के रूप में स्वतंत्र अर्थवत्ता पा ली । यह भी दिलचस्प है कि सिर्फ बस्ती या गाँव की अर्थवत्ता वाले इस्खर से जन्मे लश्कर ने पहले तो फौज का रूप लिया और बाद में इस फौज ने जब पड़ाव डाला तो वही लश्कर एक बार फिर बस्ती बन गया । ग्वालियर के पास सिन्धिया की फौज ने जहाँ पड़ाव डाला था वह बस्ती आज देश के नक्शे पर लश्कर नाम का शहर है । मध्यभारत के प्रसिद्ध शहर ग्वालियर की पहचान ही लश्कर-ग्वालियर है । कहाँ बाइबल में वर्णित सुदूर पश्चिम एशिया के समारिया का सिखर क़स्बा और कहाँ सिखर से जन्मे अस्कर [ सिखर > इस्खर > अस्कर > अल अस्कर > लश्कर ] के लश्कर रूपान्तर को सचमुच सुदूर पूर्व में बतौर आबादी, फौजी पड़ाव, एक शहर की पहचान मिली ।

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6 कमेंट्स:

प्रवीण पाण्डेय said...

लाव लश्कर, फौज, सब शब्द चढ़े हुये हैं, युद्धों का प्रभाव जो है।

संगीता पुरी said...

अच्‍छी जानकारी ..

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

हमारे यहाँ कबूतरबाज़ भी अपने कबूतर के झुण्ड को लश्कर कहते है .

आशा जोगळेकर said...

लश्कर में ही है शिंदे की छावनी अब उस छावनी में सिपाही तो क्या होते होंगे । लाव लवाजमा लश्कर और जयन्तिका ये शब्द तो आज ही जाना और ये भी कि झंडा इसी की उपज है ।

आशा जोगळेकर said...

लश्कर में ही है शिंदे की छावनी अब उस छावनी में सिपाही तो क्या होते होंगे । लाव लवाजमा लश्कर और जयन्तिका ये शब्द तो आज ही जाना और ये भी कि झंडा इसी की उपज है ।

विष्णु बैरागी said...

हमारे समाज के एक अग्रणी वकील साहब हैं - श्री घनश्‍यामजी लश्‍करी। आपकी यह पोस्‍ट उन्‍हें पढवाकर पूछूँगा कि आपके 'लश्‍करी' से उनका क्‍या रिश्‍ता है।

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