Wednesday, March 14, 2012

बर्रूकाट भोपाली और बर्रूक़लम

reed1सम्बन्धित आलेख-1.सरपत के बहाने शब्द संधान…2.सरपत की धार पर अभय तिवारी 3.हरियाली और घसियारा…4.कैसे कैसे वंशज! बांस, बांसुरी और बंबू 5.कानून का डंडा या डंडे का कानून 6.कनस्तर और पीपे में समाती थी गृहस्थी

बाँ स का एक नाम “बर्रू” भी है । हालाँकि इस अर्थ में इसका इस्तेमाल कम होता है अलबत्ता “बर्रूकाट भोपाली” ( barru kat bhopali ) और “बर्रूक़लम” के साथ इसका इस्तेमाल लोगों ने ज़रूर सुना होगा । बचपन में बर्रूक़लम ( सरकंडे की क़लम ) से सुलेखन का अभ्यास करने वाले छात्रों की आखिरी पौध साठ के दशक की पैदाइश थी । सत्तर के दशक तक यह परिपाटी खत्म हो गई । हमें भी याद हैं वे दिन । कभी लिखा तो नहीं, मगर बड़े बहन-भाइयों की कलम हाथ में लेकर उसे दवात में डुबोना और कोरे काग़ज़ पर बेमतलब सी आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने में मज़ा आता था । यही नहीं, इस कलम की नर्म-नाज़ुक नोक को टोपाज़ ब्लेड से छीलकर नुकीला बनाना भी दिलचस्प शग़ल होता था । कई बार ऐसा भी हुआ कि इस चक्कर में छह इंच की क़लम दिन भर में दो इंच की रह गई !!! ख़ैर, बात बर्रूकलम की हो रही थी । हिन्दी की विभिन्न बोलियों में बाँस के लिए बर्रू शब्द भी मिलता है, ये अलग बात है कि सामान्य बोलचाल में बाँस के अर्थ में इसका इस्तेमाल बहुत कम होता है । जहाँ तक “बर्रूकाट भोपाली” का सवाल है, भोपाल के लोग तो इससे परिचित हैं ही, भोपाली तहज़ीब और मिज़ाज के जानकार इस शब्द से परिचित हैं, मगर बर्रू शब्द की बाँस से रिश्तेदारी शब्दों के इस सफ़र में जानने की कोशिश करते हैं ।
“बर्रूकाट भोपाली” या “बर्रूक़लम” के “बर्रू” को अगर समझ लिया जाए तो इन दोनों शब्दयुग्मों का अर्थ स्पष्ट हो जाएगा । हिन्दी कोशों में बर्रू शब्द की प्रविष्टि नहीं मिलती अलबत्ता बर, बोरू, बारू, बरु, बरो जैसे शब्द ज़रूर पकड़ में आते हैं जिसका अर्थ है घास की एक किस्म । ध्यान रहे कि पृथ्वी की आदिम फ़सलों में घास ही ऐसी फ़सल है जिसकी विविध किस्मों का आज भी उपयोग होता है और हमारे लोकाचार, अनुष्ठानों में इसका सर्वाधिक महत्व है । दूब से लेकर सरकण्डा, गेहूँ, गन्ना और बाँस सब घास की ही किस्में हैं । रॉल्फ़ लिली टर्नर के कोश में “बरू” प्रविष्टि मिलती है जिसका अर्थ घास या बाँस की एक किस्म बताया गया है । प्राकृत में इसके बरुआ रूप का उल्लेख है । सिन्धी-पंजाबी में यह बरू या बारू है । हिन्दी में यह बरू या बरो बताया गया है किन्तु हाड़ौती, मालवा और मध्यप्रदेश में यह बर्रू के नाम से जाना जाता है । पूजा से लेकर आवास और आहार तक में इसी घास का उपयोग सर्वविदित है । संस्कृत के विभिन्न कोशों में बर्ह्, बर्हिस् जैसे शब्द हैं जिनका अर्थ है एक किस्म की घास अथवा पूजा-अनुष्ठान के निमित्त काम आने वाली पवित्र घास है । गौरतलब है कि यज्ञ वेदिका के नीचे दूब बिछाई जाती है । यज्ञकर्ता का आसन भी इसी घास से बनाया जाता है और हवन सामग्री का प्रमुख अंश भी घास ही होती है ।
र्ह् में छाजन, छत, आवरण का भाव भी है । गौर करें छत और छाजन बनाने में घास की अहम भूमिका होती है । लकड़ी के शहतीरों या चारदीवारी पर डाली जाने वाली बाँस की बल्लियाँ भी घास की ही एक किस्म है और उन बल्लियों पर फिर घास के पूले बिछाकर छाजन तैयार किया जाता है । बर्ह् का एक निहितार्थ मोनियर विलियम्स ने छादन ( आच्छादन ) भी बताया है, जो यहाँ स्पष्ट हो रहा है । समझा जा सकता है कि इसी बर्ह् से ह का लोप होकर बर्र और फिर बर्रू जैसे रूपान्तर सामने आए होंगे । मराठी में बर्रू के लिए बरू, बोरू जैसे शब्द हैं । कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी कोश में इसका अर्थ तृण ( घास या तिनका) अथवा घास की एक किस्म बताया गया है । इसकी व्युत्पत्ति अज्ञात खाते में डाली गई है । कुलकर्णी ने इतना भर संकेत दिया है कि प्राकृत बरुआ का उल्लेख करती एक उक्ति उन्होंने व्युत्पत्ति संकेत के रूप में अपनी प्रविष्टि में डाली है “बरुअ इक्षुसदृशतृणम” अर्थात बरू गन्ने जैसी संरचना वाली घास की कोई किस्म है । यहाँ बाँस से आशय स्पष्ट हो रहा है । इसी प्रविष्टि में बुरुड शब्द भी है जिसका अर्थ है बाँस की डलिया इत्यादि बनाने वाली जाति ।
जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी, उर्दू, इंग्लिश कोश में भी बर्र शब्द नहीं मिलता मगर उनकी प्रविष्टि में बरू की व्युत्पत्ति आश्चर्यजनक रूप से उलूक से बताई गई है । प्लैट्स के कोश में इसका कोई स्पष्टीकरण भी नहीं मिलता । मोनियर विलियम्स के कोश में उलूक का अर्थ घास की एक किस्म बताया गया है, मगर बर्र, बरू, बरो, बर, बारू जैसे रूपान्तर उलूक से किस तरह हुए होंगे यह समझना कठिन है । इस नतीजे तक पहुँचने के लिए तुक्केबाजी का सहारा लेने से कहीं बेहतर है बर्ह् से बर्र की व्युत्पत्ति । प्लैट्स के कोश में अलबत्ता बरू के लक्षण इसे बर्रू ही सिद्ध करते हैं जैसे उन्होंने इसे लम्बी-ऊँची जंगली घास बताया है । लिखने के काम आने वाले सरकण्डे की किस्म के रूप में भी उनके कोश में ‘बरू’ की शिनाख्त मिलती है । मराठी में भी ‘बरू’ और ‘बोरू’ का अर्थ सरकण्डे की लेखनी ही है । छत्तीसगढ़ी में बरुहा शब्द है । पौधे के रूप में यह भरुहा और कलम के रूप में प्रयुक्‍त होने पर इसे भर्रू कहा जाता है। भर्रू और बर्रू एक ही है । कलम लगाना चाहे वनस्पति विज्ञान की टर्म हो मगर यह जो कलम है वह बर्रूकलम वाले कलम से जुदा नहीं है । क़लम वही है जिसे चीरा लगाया जाए । क़लम नाम ही इसलिए पड़ा क्योंकि बाँस या सरकंडे का सिर क़लम कर के ही उसे नोकदार बनाया जाता है । बरुहा का अगर अन्वय करें तो हमारे सामने ब-र-ह वर्णों में छुपी ध्वनियाँ बरुहा में स्पष्ट रूप से उजागर दिखती हैं । बर्ह् से बर्रू के जन्म का यह महत्वपूर्ण प्रमाण है ।
र्रू के इतिवृत्त के बाद बर्रूकाट भोपाली की कहानी बहुत थोड़ी सी रह जाती है । जैसा कि ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि भोपाल का नाम चाहे राजा भोज से जुड़ा हो मगर शहर के तौर पर इसका विकास और विस्तार अफ़ग़ान सरदार दोस्त मोहम्मद खान ( dost mohammad khan ) की देन माना जाता है । दोस्त मोहम्मद खान शुरुआती दौर में मुग़ल फौज के अधीन मालवा प्रान्त में तैनाती पर रहा मगर बाद में औरंगज़ेब की मौत के बाद उसकी महत्वाकांक्षा बढ़ी और वह मुग़लों के खिलाफ़ स्थानीय राजपूत सरदारों की मदद के बहाने अपनी शक्ति बढ़ाने लगा । 1712 के आसपास इसी के तहत उसने भोपाल के पास जगदीशपुर के राजपूत सरदार को धोखे से मार कर उसकी रियासत पर कब्ज़ा जमा लिया और फिर बेरसिया  ( berasia )होते हुए भोपाल में जम गया जो पहले रानी कमलापति ( rani kamlapati )की छोटी सी जागीर हुआ करता था ।
भोपाल और उसके आसपास उस ज़माने में बाँस के घने जंगल थे । उसके पास जिन फौजियों की टुकड़ी थी वे दोस्त मोहम्मद के साथ यायावरी करते हुए अपने अस्थाई डेरे बनाने में माहिर हो गए थे । बाँस का जंगल उनके लिए वरदान था । देखते ही देखते भोपाल में इन पठानों ने अपने लिए बाँस-बल्लियों से अस्थायी डेरे बना लिए और इस तरह भोपाल के विस्तार की नींव डल गई । ये शुरुआती पठान ही बर्रूकाट भोपाली कहे गए । बर्रूकाट यानी बाँस काटने वाले । बाद में बर्रूकाट का रूपान्तर बर्रूकट हो गया । जहाँ तक भोपाली की बात है तो यह भोपाल से ही बना है और भोपाल की व्युत्पत्ति राजा भोज के नाम पर भोज + पाल से मानी जाती है। दरअसल करीब दस सदी पहले राजा भोज द्वारा बनाए गए विशाल तालाब की पाल इस जगह बांधी गई थी, इसी वजह से इसे भोजपाल कहा जाता था। बाद में यहाँ बस्ती हुई । पहले यह क्षेत्र गौंड राजाओं के अधीन था। रानी कमलापति छोटी सी गोंड रियासत की शासक थी । पहले दोस्त मोहम्मद रानी की मदद के लिए भोपाल आया और फिर यहाँ का शासक बन बैठा ।

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5 कमेंट्स:

प्रवीण पाण्डेय said...

राजा बनने के गला काट प्रयास तो सुने थे, यह बाँस काट प्रयास तो पहली बार सुना।

Rahul Singh said...

छत्‍तीसगढ़ में भरुहा काटना मुहावरा है, जिसका उल्‍लेख यहां http://akaltara.blogspot.in/2010/06/blog-post.html किया गया है.

विष्णु बैरागी said...

बरु की कलम से लिखने का मौका तोमिला किन्‍तु 'बर्रूकट भोपाली' पहली ही बार सुना/पढा। अचरज इस बात का डेड-दो बरस भोपाल रहा और पुरानी भोपाल की गलियॉं रौंद दीं किन्‍तु एक बार भी 'बर्रूकट भोपाली' सुनने को नहीं मिला।

अजित वडनेरकर said...

@राहुलसिंह
बर्रू, बरुआ की कतार में छत्तीसगढ़ी भरूहा की जानकारी देने के लिए बहुत आभार ।

निश्चित ही यह इसी कड़ी का शब्द है और मेरी यह स्थापना पुष्ट होती है कि इन शब्दों मूल संस्कृत
का बर्ह् हो सकता है ।

सफ़र में आपकी निरन्तर उपस्थिति उत्साहित करती है ।

Mansoor Ali said...

'बरकतुल्लाह' जी के शहर से 'बर्रुकाटो' को ख़ूब ढूँढ़ निकाला है. उसी सरकंडो के झुण्ड से एक तिनका [तृण] मेने भी ढूँढ़ निकाला और [अब] 'ऊँगली रूपी बरू' से [की बोर्ड पर] कुछ कुछ इस तरह लिख दिया :-

'तृण' के 'मूल' में 'घास' को देख कर,
'हंसिये'* ने ये समझा कि कट जायेगी,
क्या पता था कि 'ममता' जो 'काली' बनी,
बाद 'Nano' के नैया* उलट जायेगी. *[पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार]

http://aatm-manthan.com

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