Sunday, January 6, 2008

घास चरने से ही कुशाग्र बुद्धि

किसी कार्य को बहुत ही चतुराई और उत्तम प्रणाली से करने के लिए हिन्दी में आम प्रचलित शब्द है कुशल। खैरियत , मंगल और प्रसन्नता के अर्थ में भी कुशल शब्द का प्रयोग होता है। कुशल-क्षेम , कुशल-मंगल से यह साफ जाहिर है। यह बना है संस्कृत के कुशः से । हिन्दी में यह भी काफी आम है और इससे बने शब्द खूब प्रचलित हैं। संस्कृत के कुशः का मतलब होता है एक प्रकार की वनस्पति, तृण, पत्ती,घास जो पवित्र-मांगलिक कर्मों की आवश्यक सामग्री मानी जाती है। प्रायः सभी हिन्दू मांगलिक संस्कारों में इस दूब या कुशा का प्रयोग पुरोहितों द्वारा किया ही जाता है।

तेज, नुकीला


कुशः से ही बना है कुशाग्र। हिन्दी के इस शब्द का मतलब होता है अत्यधिक बुद्धिमान, अक्लमंद। चतुर आदि। गौर करें कुशः के घास या दूब वाले अर्थ पर । यह घास अत्यंत पतली होती है जो अपने किनारों पर बेहद पैनी हो जाती है। चूंकि इसका आगे का हिस्सा नोकीला होता है इसलिए इस हिस्से को कुशाग्र कहा गया अर्थात कुश का अगला हिस्सा ( जो नोकीला है )। जाहिर सी बात है कि कालांतर में बुद्धिमान व्यक्ति की तीक्ष्णता आंकने के लिए कुशाग्र बुद्धि शब्द चल पड़ा। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में जो लिखा वो एक प्रसिद्ध उक्ति बन गई- पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे अचरहिं ते नर न घनेरे

दूब-दर्भ-दुर्वा

कुशः या कुश का एक अन्य नाम है दुर्वा या दूब। मांगलिक कार्यों के लिए इसके उपयोग से सभी परिचित हैं और इसीलिए कुश की तुलना में दूब नाम ज्यादा प्रचलित है। आयुर्वेद में दूब को महौषधि भी कहा गया है क्योंकि रोजमर्रा की आम व्याधियों में इसके जरिये किए उपचार को रामबाण माना गया है। पौराणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख दूर्वा, अनंता, गौरी , भार्गवी और शतपर्वा जैसे नामों से भी है। यह बना है दर्भः से । संस्कृत में इसका अर्थ है एक प्रकार की घास जो यज्ञानुष्ठानों में काम आती है। दर्भः ने ही हिन्दी में दूब का रूप लिया । मराठी में इसे दुर्वा कहते है। यह वही घास है जो प्रायः भारत के मैदानों में उगती है और जिस पर जमी ओस पर चलना नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। जाहिर है कि नेत्र ज्योति बढ़ने से दुनियादारी की समझ तो ज्यदा ही होगी सो अक्ल के घास चरने वाले मुहावरे में ज्यादा अर्थ नज़र नही आता क्योंकि घास चरने से नही, मगर घास पर चलने से तो अक्ल तेज़ हो ही रही है न...।

कुश पर कुछ और जानते हैं अगले पड़ाव में ...

आपकी चिट्ठी

सफर के पिछले पड़ाव दोपहर की पहरेदारी और प्रहार पर कई साथियों से मिलना हुआ। कुछ ने पास आकर दस्तक दी। इनमें हैं सर्वश्री दिनेशराय द्विवेदी, अफलातून, संजय, मीनाक्षी, राजेश रोशन , सिद्धेश्वर और ममता। आप सबका आभार। अफलातून जी की चिट्ठी पर साभार मैं संबंधित पोस्ट पर भी दे चुका हूं।

4 कमेंट्स:

ghughutibasuti said...

आपने बढ़िया जानकारी दी है । शायद दूब पर चलने से पाँवों पर कुछ एक्यूप्रेशर सा प्रभाव पड़ता हौ ।
नववर्ष की शुभकामनाओं सहित
घुघूती बासूती

मीनाक्षी said...

आपने सही कहा है कि घास चरने वाली कहावत का कोई औचित्य नहीं है, इसी प्रकार कई और कहावतें हैं जिनका आज के सन्दर्भ में कोई अर्थ नहीं रह गया है...काला अक्षर भैंस बराबर...अनपढ़ कैसे हुए..जब कि भैंस का दूध पीकर ही हम कुशाग्र होते हैं.

दिनेशराय द्विवेदी said...

अजित जी, दूब व कुशा दोनों अलग अलग तरह की घासें हैं। कुशा का तना बीच में से चीरे हुए बांस जैसा होता है इस कारण से उस पर उंगलियां भी नहीं फेरी जा सकती हैं। इस का अग्र भाग नुकीला और तनिक कठोर होता है। मान्यता है कि ग्रहण के सूतक के आरम्भ के पूर्व इस के तिनके खाद्य पदार्थों में रख देने से उन पर ग्रहण का प्रभाव नहीं होता है। इस के आसन बनाए जाते हैं जिन का उपयोग पूजा के समय किया जाता है। इस के बिना तर्पण, श्राद्ध पूरा नहीं किया जा सकता है।
इस के विपरीत दूब नरम घास होती है। उस के बिना कोई पूजा पूर्ण नहीं होती, इसे सब जानते हैं। इसका अग्र भाग अत्यन्त कोमल होता है।
वैसे घासों की महिमा अपरम्पार है। इन के बिना मानव जीवन सम्भवतः इतना विकास ही न कर पाता। सब से पौष्टिक खाद्य पदार्थ गेहूँ भी एक प्रकार की घास ही है।

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

आज 04/02/2013 को आपकी यह पोस्ट (दीप्ति शर्मा जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!

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