जाड़े में जड़मति को जूड़ी का बुखार
सतही सोच-समझ और मतलबपरस्ती के लिए एक कहावत है जड़ से बैर , पत्तों से यारी । इसी तरह खुद को प्रतिष्ठित करने या दूसरे को नुकसान पहुंचाने, पूरी तरह नष्ट कर देने के अर्थ में हिन्दी में दो मुहावरे आमतौर पर इस्तेमाल होते हैं । जड़ जमाना और जड़ उखाड़ना। यहां चाहे जड़ का शाब्दिक अर्थ वृक्ष के मूल से है मगर मगर भाव उस आधार से है जो किसी भी चीज़ को मज़बूती प्रदान करता है।
हिन्दी में जड़ शब्द का तीन तरह से प्रयोग होता है। दिलचस्प बात यह कि तीनों ही प्रकारों में जड़ शब्द का अर्थ अलग अलग है।
जड़ -1
आमतौर पर इस जड़ का प्रयोग विशेषण के रूप में होता है।
निष्क्रिय, निष्चेष्ट या आलसी को जड़ शब्द प्रचलित है। यह बना है संस्कृत के जड से जिसका मतलब होता है अत्यधिक शीत, ठंड, ठिठुरन या जमाव बिंदु तक सर्दी होना। दिलचस्प बात यह कि जड शब्द का निर्माण जल् धातु से हुआ है जिसका मतलब भी स्फुर्तिहीन, ठंडा या शीतल ही होता है। इसी से बना है पानी के लिए जलम् शब्द । जाहिर सी बात है कि तरलता के बाद पानी का सबसे बड़ा गुण उसकी शीतलता ही है और अपने मूलस्रोत पर तो यह हिमशीतल रहता है। शीतलता के इन्हीं भावों से एक और नए शब्द का जन्म हुआ जाड्यम् जिसमे यही सारे अर्थ समाहित हैं। गौर करें कि अत्यधिक सर्दी में मनुष्य का मन कुछ काम नही कर पाता इसी लिए जाड्यम् में अनासक्ति, आलस्य और निष्क्रियता जैसे अर्थ भी जुड़ गए। लगातार बर्फीले क्षेत्र में निवास अवसाद तक उत्पन्न कर देता है। जाड्यम का ही अर्थविस्तार हिन्दी शब्द जाड़ा के रुप में हुआ । सर्दी के मौसम को जाड़े का मौसम भी कहा जाता है। ठिठुरन के साथ आने वाले बुखार को देहात में जुड़ी का बुखार कहते हैं जो इसी मूल से उपजा शब्द है।
अत्य़धिक शीत या बर्फ में निवास से शरीर निष्क्रिय होते होते निश्चेत होने लगता है। इस अवस्था में मस्तिष्क बहुत ज्यादा नहीं सोच पाता । इस अवस्था को उदासीन या चेतनाशून्य भी कहते हैं। इसी अवस्था के लिए जड शब्द का प्रयोग होता है जिसे हिन्दी में जड़ कहा जाता है। कालांतर में निष्क्रिय या निश्चेत की बजाय मंदबुद्धि, मूर्ख, बुद्धू आदि के लिए जड़ शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। गौरतलब है कि अक्लमंद की बुद्धि तीक्ष्ण होती है सो इसी के विपरीत मूर्खों को मोटी बुद्धिवाला कहा जाने लगा। जड़ यानी मोटी बुद्धिवाला । जड़बुद्धि वाले को पहले जाड़ा या जाड्या कहा गया। इसी मुकाम पर आकर लोकभाषा सक्रिय होती है और जड़ से जाड़ा यानी मोटा जैसा शब्द बना लेती है। मालवा, महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ हिस्सों में मोटे या मोटी के लिए जाड़ा या जाड़ी जैसा शब्द भी है।
मूर्ख के लिए हिन्दी में जड़ भरत विशेषण भी है। दरअसल ये पौराणिक पात्र हैं। ये ऋषभ के पुत्र थे और बहुत बड़े विद्वान थे । सांसारिक मायामोह से उचाट के चलते ये अपने ज्ञान का परिचय किसी को नहीं देते थे और उदासीन , जड़वत रहते थे। उनके व्यक्तित्व को सम्मान देते हुए तत्कालीन समाज ने उन्हें जड़ भरत कहना शुरू कर दिया। मगर कालांतर में समाज ने मंदबुद्घि और मूर्ख की उपमा के तौर पर इस शब्द को सीमित कर दिया। बुद्ध से बुद्धू , पाषंड से पाखंडी और वज्रबटुक से बजरबट्टू वाला किस्सा यहां भी दोहराया गया ।
जड़ -2
यह जड़ दरअसल संज्ञा के रूप में हमेशा प्रयोग में आता है। जड़ यानी वृक्ष का वह अंग जो धरती के अंदर होता है
और जिससे पेड़ को भरण-पोषण प्राप्त होता है। जड़ बना है संस्कृत धातु जट् से जिसमें पेचीदा, उलझाव, जुड़ाव, गुत्था और सम्मिलित होने का भाव है। जिस तरह पोषण के अतिरिक्त जड़ का प्रमुख काम वृक्ष को थामे रखने का भी है । जड़ की विशेषता होती है जितना वृक्ष सतह के ऊफर ऊंचा-फैला रहता है उतनी ही वह भी धरती के अंदर गहरी-फैली रहती है -अपने सभी लक्षणों यानी मिट्टी-पत्थर में उलझती, गुत्था बनाती, पेचीदा राह तलाशती और चट्टानों से जुड़कर मज़बूत पकड़ बनाती हुई। इस तरह जड़ पेड़ को सहारा देती है सो जड़ में एक और भाव समाहित हुआ आधार का । यही भाव जड़ से उखाड़ना या जड़ जमाना जैसे मुहावरों में प्रमुखता से उभर रहा है। जड़ें बड़ी गुणकारी होती हैं इसलिए छोटे पौधों की जड़ कहलाई जड़ी और उसमें बूटी जुड़ कर औषधि के लिए जड़ीबूटी जैसा शब्द भी बन गया ।
जड़ -3
किसी वस्तु में दूसरी वस्तु को समाहित करना , बैठाना या संयुक्त करने के लिए इस जड़ का प्रयोग किया जाता है। जड़ का यह तीसरा प्रकार क्रिया के रूप में ही प्रयुक्त होता है। इसका जन्म भी जट् धातु से हुआ है जिसमें जुड़ाव, सम्मिलन आदि का भाव प्रमुख है। जड़ना, जड़ाऊ, जड़ित जैसे शब्द इससे ही बने हैं। जड़ देना जैसा मुहावरा खासतौर पर इस शब्द की देन है जिसमें झूठी बातें बनाना जैसा भाव है तो दूसरी ओर अचानक जोर से मार देना अर्थात थप्पड़ जड़ देना भी शामिल है।
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Thursday, July 10, 2008
जड़ से बैर , पत्तों से यारी
Wednesday, July 9, 2008
रवीश की ब्लागवार्ता में शब्दों का पुरोहित
साथियों आज (बुधवार 7.7.2008) के दिल्ली से प्रकाशित होने वाले दैनिक हिन्दुस्तान में एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीशकुमार ने अपने साप्ताहिक कॉलम ब्लागवार्ता में शब्दों का सफर पर लिखा है। कृपया ज़रूर देखें । रवीश भाई का शुक्रिया कि सफर में न सिर्फ वे साथ हैं बल्कि पैनी नज़र भी है।
इस कॉलम में शब्दों के सफर पर लिखा गया है इसकी सूचना मुझे अफलातूनजी के ईमेल से प्राप्त हुई जिसे मैने दोपहर दो बजे देखा। उन्होंने मुझे हिन्दुस्तान का लिंक भी भेजा जिस पर यह लेख छपा है। अफ्लूभाई का भी मैं शुक्रिया अदा करता हूं। उनके द्वारा भेजे लिंक के जरिये फांट डाऊनलोड नहीं हो पाए तो मैने पल्लव बुधकर की मदद ली जिन्होने मुझे पीडीएफ फाइल उपलब्ध करा दी जिसे यहां देखा जा सकता है।
और शब्दों के सफर का साल पूरा
रवीश के लेख में तथ्य की एक मामूली भूल थी। शब्दों का सफर ब्लाग की शक्ल में दिसंबर 2006 में बन गया था मगर तब तक इसमें ब्लाग प्रोफाईल के अलावा कुछ भी नहीं डाला जा सका था । इसे दो बार डिलीट भी किया गया और पहली पोस्ट तीन जुलाई 2007 को डाली गई थी - अश्व यानी गधा , घोड़ा, सिपाही. इस तरह शब्दों का सफर को अभी दो साल नहीं बल्कि चार दिन पहले ही एक साल पूरा हुआ है। चूंकि जन्मदिन मनाने की मेरी आदत नहीं सो सफर का एक साल पूरा होने की सूचना मैने किसी को नहीं दी। बहरहाल, इस पूरे साल में ब्लागजगत ने शब्दों के सफर का दिल से स्वागत किया , अपनाया और सफर में कदमताल शुरू की उसके लिए में सभी साथियों का आभारी हूं। शब्दों में जता नहीं सकता, नाम गिना नहीं सकता । सफर में साथ बने रहें , इतना ही कह सकता हूं । मैं अपनी ओर से रोज़ एक नया शब्द लेकर आभार जताने का विनम्र प्रयास पूरे साल करता रहूंगा। आमीन ।
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प्रस्तुतकर्ता
अजित वडनेरकर
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3:36 PM
थप्पड़ जड़ने की जटिलता
शब्द जब अपनी मूल धातु से उपजते हैं तब उनका अर्थ कुछ और होता है मगर जैसे जैसे समाज उन्हें इस्तेमाल करता है, भिन्न भिन्न परिवेश और स्थितियों में व्यवहृत होते हैं, उनका अर्थविस्तार होता चला जाता है। यह अर्थ कभी कभी इतना भिन्न होता है कि उसे मूल शब्द से पृथक देखने पर दोनो अर्थ अजनबी नज़र आते हैं। ऐसा ही एक शब्द है जटिल जिसका सीधा सादा अर्थ है पेचीदा, उलझा हुआ या कठिन । मुश्किल सवाल भी जटिल हो सकता है और समस्या भी जटिल । अगर समस्या का निराकरण आसान नहीं हो तो समाधान को भी जटिल कह दिया जाता है। अशिक्षा तो जीवन को जटिल बनाती ही है मगर शिक्षा भी अक्सर जटिल ही होती है। दिलचस्प बात यह कि किसी ज़माने में साधु-सन्यासियों और परिव्राजकों को ही जटिल कहा जाता था । वजह सांसारिक बंधनों से मुक्त रहने की वजह से ये अपने बाल नहीं काटते थे और वे जटा का रूप ले लेते थे इसीलिए उन्हें जटिल कहा जाता था। शिव के औघड़ रूप को भी जटिल का विशेषण दिया जाता है ।
जटा शब्द बना है संस्कृत की जट् धातु से जिसमें आपस में मिलना, संयुक्त होना, घनत्व , गुत्था होने के भाव हैं । जट् से ही बने जोड़े के अर्थवाले जुट, एकजुट जैसे शब्द। एकत्रित करना , इकट्ठा करना , सम्मिलित होना, पहुंचना आदि के अर्थ में जुटना जुटाना जैसे शब्द भी बने। आपस में जुड़े होने से ही लंबे घने , खासतौर पर पुरुषों के केश जटा कहलाए । इसीलिए सन्यासियों के लिए जटा-जूटधारी शब्द भी प्रचलित हुआ। जाहिर सी बात है कि जटिल के अर्थ में उलझाव या पेचीदापन यूं ही नहीं समा गया । अपने विशिष्ट रेशे के लिए पहचानी जाने वाली एक खास वनस्पति के लिए जूट नाम भी इसी वजह से चलन में आया । जूट के रेशों का रंग और बनावट जटाओं जैसी ही होती है। वटवृक्ष की अधोमुखी शाखाओं या तन्तुओं को भी जटा ही कहा जाता है।जट् धातु ने स्त्री – पुरुषों के साथ समान न्याय किया है। अगर पुरुषों के केश के लिए इससे जटा शब्द बना तो महिलाओं का एक खास केशविन्यास जूड़ा भी कहलाया । जूड़े की खासियत पर अगर गौर करें तो इसकी जट् से रिश्तेदारी समझ में आ जाएगी।
स्पष्ट है कि बोलचाल की हिन्दी में सर्वाधिक प्रयुक्त जुड़ना, जोड़ना , जुड़वाना, जुड़ाव जैसे शब्दों के पीछे जट् ही है। कीमती नगों को आभूषणों से जोड़ने या युक्त करने के लिए जड़ना शब्द इसी से बना है। रत्नयुक्त के लिए रत्नजड़ित या रत्नजटित शब्द इसके लिए इस्तेमाल होते हैं। ऐसे गहनों के लिए समाज ने एक नया शब्द रच लिया जड़ाऊ । जड़वाना या जड़ना जैसी क्रियाएं भी इससे ही निकली हैं। सुनारों की एक उपशाखा को जड़िया भी इसीलिए कहते हैं क्योंकि उनके यहां गहने बनाने का नहीं बल्कि नग जड़ने का काम प्रमुख होता है। जड़ने का काम यूं तो काफी महीन और बारीकी का होता है मगर गुस्से में काम बिगड़ जाता है और फिर जड़ाई कहीं भी हो सकती है मसलन गाल पर थप्पड़ भी जड़ा जा सकता है। हालांकि उसके बाद जड़नेवाले के लिए परिस्थिति जटिल हो सकती है।
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प्रस्तुतकर्ता
अजित वडनेरकर
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3:14 AM
Monday, July 7, 2008
जुग जुग जियो जुगल जोड़ी...
युग, जुआ ( हल), जुग और जुगल जैसे शब्दों में रिश्तेदारी की कल्पना करना यूं तो मुश्किल है मगर ये सचमुच एक दूसरे के संबंधी हैं। ये तमाम शब्द बने हैं संस्कृत धातु ‘यु’ से जिसका मतलब होता है जोड़ना, सम्मिलित होना , बांधना, जकड़ना वगैरह। इसी ‘यु’ से भारतीय भाषाओं में दर्जनों शब्द बने हैं । गौर करें कि युवन् से बने युवा , युवक, जवान, जवां , यूथ और यंग जैसे शब्द कहीं न कहीं ‘यु’ से संबंधित हैं क्योंकि ये सभी शब्द वयःसंधि की तरफ इशारा कर रहे हैं। युवावस्था कुलमिलाकर जीवन के दो विभिन्नकालों का मिलन ही है। [विस्तार से देखें यहां ]
व्यापक होने के बाद ‘यु’ से बने शब्दों का अर्थविस्तार ग़ज़ब का रहा। मिसाल के तौर पर युग को देखें। यह बना है संस्कृत के युगम् से जिसका मतलब हुआ सृष्टि में समय का एक विशाल परिमाण।
इसे काल भी कह सकते हैं और समय भी। जुग भी इसका ही रूप हुआ। शायद ही कोई होगा जिसने जुग जुग जियो का आशीर्वचन न सुना हो। सृष्टि में चार युग माने जाते हैं सत्य, त्रेता , द्वापर और कलि। युगपुरुष, युगांतर, युगांत जैसे शब्द इससे ही बने हैं। जोड़े के लिए युग्म शब्द प्रचलित है । युगल यानी दंपती, जोड़ा, बंधु , दो साथी आदि भाव इसमें समाहित हैं। जुगल इसका ही देशी रूप है और जुगल किशोर नाम भी इसी से उत्पन्न है। युगम् से बना जुगम और फिर बना जुआ अर्थात लकड़ी का ऐसा उपकरण जिसमें बैलों को एक साथ बांध कर खेत में चलाया जाए ताकि ज़मीन की निराई-गुड़ाई हो सके। हल इसे ही कहते हैं। जुआ जिस क्रिया को संपन्न कर रहा है उसे ही जोतना या जुताई कहते हैं। गौरतलब है कि पति-पत्नी की जुगलजोड़ी तो यूं भी युगों से गृहस्थी का जुआ कंधों पर उठाए जीवनरूपी बंजर खेत को उपजाऊ बनाने में जुती रहती हैं। जुए से किसी कवि की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-शायद बच्चन जी की हैं-
कुछ किस्मत के सांड़ जगत में होते हैं
संघर्षों के जुए न जाते जोते हैं
बेनकेल वो घूम घूम कर खेतों में
खाते हैं , जो दुनियावाले बोते हैं
बहरहाल, इसी ‘यु’ से हिन्दी में अन्य कई शब्द भी बने हैं जैसे युक्त यानी मिला हुआ, सम्मिलित आदि। इससे बना युक्ति यानी मिलाप, संगम। यहां अर्थ विस्तार हुआ उपाय के रूप में ।
गौर कि उपाय या तरकीब से कुछ मिलता है, जुड़ता है, प्राप्ति होती है सो युक्ति यानी तरकीब, उपाय अथवा योजना। इसके देशी रूप जुगत , जुगुति या जुगुत खूब प्रचलित हैं। संस्कृत व अन्य भारतीय भाषाओं में जहां ‘यु’ से अनेक अर्थ वाले शब्द बने हैं वहीं इस ‘यु’ की व्यापक मौजूदगी यूरोपीय भाषाओं में भी नज़र आती है। इंडो-यूरोपीय मूल धातु युग (Yeug) भी सम्मिलन, बंधन,मिलाप आदि भाव समेटे हुए है। इसी से बना है Yoke जिसका मतलब भी जुआ ही होता है। ‘यु’ से बने युगम् की छाया कई भारोपीय भाषाओं में है जैसे अंग्रेजी का योक या लैटिन का जुगम । अवेस्ता का यओज़ या युज हो या फारसी का जुग । इसी तरह जर्मन का जॉकिज़ भी इसी कड़ी में शामिल है और सभी भाषाओं में इसका एक ही अर्थ है जुआ यानी जोतने का उपकरण। अर्थ विस्तार के नज़रिये से देखें तो जोड़ने – बांधने के अर्थ वाले कुछ अन्य शब्द भी नज़र आते हैं जैसे जॉइंट, जंक्शन या जॉइन आदि। इन सभी में सम्मेलन, जुड़ाव या इकट्ठा जैसे भाव शामिल हैं।
इसी कड़ी में कुछ अन्य शब्दों की चर्चा अगले पड़ाव पर
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किस्सा- ए- बेवकूफी यानी एटलस
हिन्दी समेत दुनिया को ज्यादातर भाषाओं में विश्व के मानचित्र या नक्शों की किताब के लिए `एटलस´ शब्द चलन में है। भारत में भी कई एटलस प्रकाशित होते हैं। अक्सर एटलस के कवर पर एक विशाल आकार का आदमी अपने कंधों पर पृथ्वी को उठाए नज़र आता है। बताया जाता है कि ग्रीक पुराणों में `एटलस´ का जिक्र एक दानव के तौर पर हुआ है। यह उन खंभों की रक्षा करता है जिन पर स्वर्ग टिका हुआ है। अफ्रीका उत्तर पश्चिमी मुल्क मोरक्को में एक पर्वत श्रंखला का नाम भी एटलस है। वहां के लोगों की धारणा भी यही है की स्वर्ग इसी पर्वत पर टिका है।
दरअसल बेल्जियम निवासी प्रसिद्ध भूगोल शास्त्री जेरार्ड्स मर्केटर (1512-1596 ) ने नक्शों के एक संग्रह का प्रकाशन कराया था जिसके शुरू में पृथ्वी को कंधों पर उठाए एक दैत्य की तस्वीर थी और नीचे `एटलस´ लिखा था। तभी से स्वर्ग के खंभों का रखवाला यह यूनानी राक्षस नक्शों की किताबों में अमर हो चुका है। मर्केटर पहले गणितीय उपकरण बनाते थे मगर बाद में धातु पर नक्काशी का काम सीखने के बाद उनकी दिलचस्पी मानचित्रों में जागी। मानचित्रों की दुनिया में मर्केटर का असल काम जर्मनी के ड्यूसबर्ग शहर आने के बाद हुआ।
ग्रीक पुराणों में दानवों (टाइटन्स) का उल्लेख है। एटलस भी एक दानव था। भारतीय पुराणों की तरह ही ग्रीक कथाओं में भी देव-दानवों के युद्ध प्रसंग हैं। तो एटलस एक बार देवताओं से हार गया और बतौर सज़ा उसे आकाश अपने कंधों पर उठाना पड़ा। क़िस्सा आगे तब बढ़ता है जब एक पुराणकालीन हीरो- हरक्यूलिस,जिसमें हर तरह के नायकोचित गुण थे, को अचानक सुनहरे सेब प्राप्त करने की इच्छा जागती है। उसे बताया जाता है कि सुनहरे सेबों की पैदावार जहां है वहां का पता तो सिर्फ एटलस ही जानता है। हरक्यूलिस एटलस के पास जाता है जहां वह कंधे पर आकाश उठाए सज़ा भुगत रहा होता है।
एटलस सेब लाने को तैयार हो जाता है मगर उसकी परेशानी है कि आकाश को उठाए वह यहां वहां कैसे जाए ? उसकी बात को वाजिब मान कर हरक्यूलिस उसका बोझ अपने कंधे पर ले लेता है। एटलस जब सेब ले कर आता है तो दूर से ही हरक्यूलिस को देखता है, जिसकी इतनी सी देर में ही आसमान के बोझ से हालत पतली हो गई है। पसीने के धारे बह रहे हैं, हांफनी चल रही है (अपने हिन्दुस्तान में तो बच्चे ही आसमान सर पर उठा लेते हैं और उन्हें नहीं , दुनिया को पसीने छूटते हैं)। वह सोचता है कि अब फिर ये बोझ उठाना होगा ,
सो क्यों न सुनहरी सेब हरक्युलिस को थमा कर पतली गली से निकल लिया जाए !
उधर हरक्यूलिस उसके दिल की बात भांप लेता है सो एटलस से कहता है कि भैया , एक मिनट के लिए इसे पकड़ना, ज़रा कंधे के नीचे कुछ गद्दा-चुमली लगा लूं। एटलस फिर से अपने कंधे पर आसमान थाम लेता है। अपनी बेवकूफी से खुद बुलाई बला के टलते ही हरक्यूलिस ने तो वहां से दौड़ लगाने में ही भलाई समझी और मूर्ख एटलस को गधापन दिखाने यानी दोबारा बोझ उठाने का फल यह मिला कि वक्त के साथ वह पहाड़ में बदल गया जिसे आज मोरक्को के एटलस पर्वत के नाम से जाना जाता है।
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प्रस्तुतकर्ता
अजित वडनेरकर
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3:53 AM
Sunday, July 6, 2008
नायक, खलनायक और नायिका
नेत्र के अलावा आंख का एक और पर्यायवाची शब्द है नयन। हिन्दी की अन्य बोलियों में इसके लिए नैन और नैना जैसे शब्द भी प्रचलित हैं। नयन का जन्म संस्कृत धातु नी से हुआ है जिसका अर्थ ले जाना, मार्गदर्शन करना, संचालन करना आदि है। नी से बना नयः और फिर बना नयनम् । गौरतलब है कि शरीर के सभी हिस्सों यानी अंगों के संचालन का काम दृष्टि के जरिये होता है और चूंकि दृष्टि का गुण आंखों के पास होता है इसलिए उन्हें नयनम् की संज्ञा मिली जो हिन्दी में नयन कहलाए।
यह जानना दिलचस्प होगा कि न्याय की जिस देवी की आंखों पर हमेशा पट्टी बंधी होती है उस न्याय और नयनों का जन्म एक ही मूल से हुआ है। नी धातु से ही बने न्याय का मतलब नीति, नियम, कानून, इंसाफ आदि है। यही नहीं राजनीति , शास्त्र, सुशासन , सच्चाई और ईमानदारी जैसी बातें भी इसके अंतर्गत आती हैं। न्याय के अर्थ में उक्ति है ‘नियन्ति अनेन’ यानी वह प्रणाली अथवा तरीका जिससे उचित निर्णय की ओर जाया जा सके वही न्याय है।
नी धातु से बने नयः का मतलब प्रदर्शन करना ,बताना, निर्देशन करना भी है । नयः में उपसर्गों के लगने से कई नए शब्द बनें जैसे अभिनय । अभि उपसर्ग लग जाने से यहां अर्थ हुआ आंगिक चेष्टाओं का प्रदर्शन अथवा मनोभावों को नेत्रों या अन्य शारीरिक संकेतों से दिखाना। इसके बाद नायक , नायिका अथवा खलनायक शब्दों का जन्म हुआ।
नयः के साथ शासन, नीति, सिद्धांत, विचार जैसे अर्थों के चलते भी
कुछ नए शब्द जन्मे जैसे राजनय जिसका अर्थ हुआ राजनीति। अर्थात शासन को संचालित करने वाली प्रणाली। भारत के संदर्भ में देखें तो राजनय का मतलब डिप्लोमेसी होता है जबकि राजनीति का अर्थ पालिटिक्स है। इसी तरह नयः में जब वि उपसर्ग लगता है तो विनय शब्द बनता है जिसका मतलब होता है श्रद्धा , विनम्रता और सौजन्यता। विनय के इस अर्थ में समाहित है नीति और सिद्धांत के भाव। इसके अन्य अर्थों में शिक्षण,प्रशिक्षण और अनुशासन भी शामिल हैं । [संशोधित पुनर्प्रस्तुति]
आपकी चिट्ठियां
सफर की पिछली पांच कड़ियों बेगुन बैंगन महाराज, सरदारजी की शरारत, प्यारा कौन ? बैल, बालम या मलाई ?कै घर , कै परदेस और जवानी दीवानी से युवातुर्क तक पर सर्वश्री Udan Tashtari. दिनेशराय द्विवेदी. Dr. Chandra Kumar Jain. Ghost Buster. अरुण. मीनाक्षी .DR.ANURAG.
अभिषेक ओझा. Ashok Pande. Pratyaksha. arvind mishra. अजित वडनेरकर. Manish Kumar. Lavanyam - Antarman. डा० अमर कुमार. Smart Indian... E-Guru Maya. Kalp Kartik. Ashok Pande. Mired Mirage.श्रद्धा जैन. कुश एक खूबसूरत ख्याल.Nilotpal. PD. रंजू. ranju. बलबिन्दर. anitakumar. mohan. महेन. Arun.सजीव सारथी. Pramod Singh. महामंत्री-तस्लीम. दिलीप मंडल. SANJAY SHARMA.अभिषेक ओझा. मीनाक्षी. अभय तिवारी. Pramod Singh. दिनेशराय द्विवेदी. श्रद्धा जैन.हर्षवर्धन. Sanjeet Tripathi. मीनाक्षी. Dr. Chandra Kumar Jain. neelima sukhija arora. और डा० अमर कुमार की हौसला बढ़ानेवाली टिप्पणियां मिलीं। आप सबका सफर में बने रहने के लिए शुक्रिया।
@डॉ अमरकुमार
डॉक्टर साहेब , आपका सवाल वाजिब है और गलती मेरी है। दरअसल शब्द व्युत्पत्ति और भाषा के संदर्भ में हमेशा भाषा-परिवारों का उल्लेख आता है। भाषा वैज्ञानिकों ने भाषाओं के अध्ययन के लिए दुनियाभर की भाषाओं को कुछ परिवारों में बांटा है जिनमें से एक है इंडो-यूरोपियन लैंग्वेज फैमिली। इसे ही भारतीय यूरोपीय भाषा परिवार कहा जाता है। हिन्दी के विद्यार्थी इसके संक्षिप्त रूप "भारोपीय" शब्द से परिचित हैं । मगर यह सामान्य बात नहीं है और शब्दों का सफर विषय विशेष के लोगों के लिए नहीं बल्कि सामान्य पाठकों के ही लिए है सो गलती मेरी है। कोशिश करता हूं कि अगली किन्हीं कड़ियों में भाषा परिवारों के बारे में जानकारी दे सकूं। शुक्रिया। सफर में बने रहें।
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Saturday, July 5, 2008
जवानी दीवानी से युवा तुर्क तक
युवावस्था अर्थात जवानी बड़ी अनमोल होती है और बुजुर्ग इसे संभालकर रखने की बात कहते हैं। यहां तक की यौवन को धन संपत्ति जितना ही मूल्यवान माना जाता है और नसीहत दी जाती है कि जिस तरह धन की सार संभाल की जाती है वैसे ही यौवन को भी संजो कर रखना चाहिए क्योकि चार दिन की चांदनी , फिर अंधेरी रात । मगर संत महात्मा इसे निस्सार भी बताते हैं और कहते हैं कि मनुश्य के परमलक्ष्य अर्थात ईश्वर की प्राप्ति में धन-यौवन किसी काम नहीं आते। इसलिए उस पर गर्व करना बेकार है। कबीर ने कहा है-
धन जोबन को गरब न कीजै , झूठा पचरंग चोल रे
हिन्दी में तरुण के लिए जवान शब्द आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है। युवक शब्द भी आम है। जवांमर्द, जवांदिल, जवानी-दीवानी , जोश-ओ-जवानी शब्द भी इसी सिलसिले की कड़ी हैं । नौजवान, जवान या जवाँ शब्द उर्दू फारसी में भी हैं और हिन्दी में भी। जवान या युवक सोलह से तीस वर्ष की उम्र के तरुण अथवा किशोरवय के बाद की अवस्था को कहा जाता है।
बालिग भी जवान कहलाता है। सशस्त्रबलों के सिपाही को भी बोलचाल में जवान ही कहा जाता है क्योंकि लड़ाकापन युवावस्था में ही होता है। युवक का स्त्रीवाची हिन्दी में युवती है मगर उर्दू फारसी में जवान का स्त्रीवाची जवानी नहीं होता बल्कि जवानी का मतलब तरुणाई होता है। राजकुल के उत्तराधिकारी को युवराज कहा जाता है। युवराज की पत्नी को युवराज्ञी या युवरानी कहते हैं। देशी बोली में यौवन ,जोबन बन जाता है।
ये सभी शब्द एक ही मूल से जन्मे हैं । संस्कृत में युवन् शब्द है जिसका मतलब तरुण, जवान , वयस्क , युवा आदि होता है। संस्कृत की संगिनी प्राचीन फारस की भाषा अवेस्ता में भी इसका रूप युवन ही रहा । प्राचीन फारसी में यह जुआँ होते हुए जवाँ में ढल गया जिससे जवान , जवानी जैसे रूप भी सामने आए। इसके प्राकृत रूप जवाण, जुवाण, ज्वाण आदि बने मगर खड़ी बोली ने जवान रूप ही ग्रहण किया।
अंग्रेजी के यंग और यूथ जैसे शब्दों की भी युवा और जवानी से रिश्तेदारी है। भाषाविदों ने प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार से एक मूल धातु yeu की कल्पना की है जिससे भारतीय और यूरोपीय भाषाओं में तरुण, तरुणाई से जुड़े कई शब्द बने हैं। मिसाल के तौर पर अंग्रेजी के जुवनाइल juvenile शब्द जिसका अर्थ भी युवक या जवान ही होता है, की
जवानी या यौवन से साम्यता गौरतलब है। young, , youth आदि शब्द भी इसी मूल के हैं। कनिष्ठ या छोटे के लिए बोलचाल की हिन्दी में जूनियर junior शब्द बहुत आम है। मूलतः इसका प्रयोग पिता की तरूण संतान के लिए ही होता था जिसका परिचय ही पिता का जूनियर था। अंग्रेजी मुहावरे यंग टर्क की तर्ज पर हिन्दी में भी युवातुर्क मुहावरा आपात्काल के दौर में काफी मशहूर हो गया था। दरअसल यह मूल फ्रैंच मुहावरे का अंग्रेजी अनुवाद था। गौरतलब है कि 1889 से 1908 तक तुर्की के ऑटोमन शासकों के खिलाफ चले सुधारवादी आंदोलन के नेताओं को यही पहचान मिली थी। उनकी गतिविधियों का केंद्र फ्रांस भी था इसलिए यह नामकरण वहीं से चला।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...
प्रस्तुतकर्ता
अजित वडनेरकर
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3:45 AM
Friday, July 4, 2008
कै घर , कै परदेस !
हिन्दी में दिशा शब्द के लिए प्रचलित विकल्प बहुत सीमित हैं । दिशा का मतलब पूछा जाने पर सामान्य तौर पर [ उस ] तरफ या [ उस ] ओर जैसे अर्थ बताए जाते हैं। जानकार दिश् , दिक् ,दिग् , सिम्त या डायरेक्शन जैसे शब्द बताने लगेंगे मगर ये प्रचलित नहीं हैं। दिशा का विकल्प चाहे न हो मगर ऐसे कई शब्द है जिनमें दिशा शब्द छुपा हुआ नज़र आता है। इससे ही बना है देश शब्द जिसके कई विकल्प हिन्दी में प्रचलित है मसलन राष्ट्र , मुल्क, वतन, नेशन और कंट्री आदि।
दिशा शब्द बना है संस्कृत धातु दिश् से जिसका मतलब होता है होता है दिखलाना , संकेत करना आदि। गौर करें कि दिश् में निहित दिखलाने के भाव पर । रास्तों में हमने अक्सर दिशा सूचक चिह्न या पट्टिकाएं देखी होंगी वो किसी खास तरफ इंगित करती हैं- कुछ दिखलाती हैं। जाहिर है दिशा में सबसे पहले इंगित करने का भाव ही सामने आया। दिश् से ही बना है दिष्ट अर्थात जो अंगुली के इशारे से दिखाया जा सके। इसमें निर् उपसर्ग लगने से बना है निर्दिष्ट यानी जिस ओर बतलाया जाए, दिखाया जाए, तयशुदा । निर्देश , निर्देशन या निर्देशक भी इसी मूल से बने हैं। दिश् शब्द में दिशा या दिग्बिंदु, चार दिशाओं वाले भाव बाद में समाए। इससे बने दिशा शब्द का अर्थ पृथ्वी का चौथाई, आकाश का चौथाई भी होता है। संस्कृत में दिश् के ही अन्य रूप दिक् और दिग् भी मिलते हैं जिनसे दिग्गज, दिग्विजय,दिक्पाल जैसे शब्द बने हैं । दिश् में दस का भाव भी शामिल हैं। गौरतलब है सामान्यतः चार दिशाएं मानी जाती हैं मगर ज्योतिष शास्त्र में दस दिशाएं बताई गई हैं- पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, वायव्य, नैऋत्य, आग्नेय, आकाश और पाताल । दिग्गज या दिक्पाल का अर्थ भी दिशाओं के रखवाले के अर्थ में ही हुआ है। पुराणों में आठ दिशाओं का भी उल्लेख है (आकाश-पाताल नहीं)। इस तरह आठों दिग्गजों के नाम इस प्रकार हैं (१) ऐरावत, (२) (पुंडरीक,) (३) वामन, (४) कुमुद, (५) अंजन, (६) पुष्पदंत, (७) सार्वभौम व (८) सुप्रतीक।
इसी तरह देश शब्द का
जन्म भी इस दिश् धातु से ही हुआ है। यहां दिश् से बने देश शब्द में स्थान, जगह , स्वदेश, प्रदेश, विदेश ,प्रांत, राज्य, मुल्क आदि अर्थ समाहित हैं। बात वही है , इंगित करने के अर्थ में दूरस्थ स्थान के अर्थ में ही इस शब्द का प्रयोग होता रहा है। इससे ही बने बिदेस, बिदेसिया , देस-परदेस जैसे शब्द लोक बोलियों में खूब रचे बसे हैं। बिदेसिया तो पूरब की एक प्रसिद्ध लोकगायन शैली ही है। परदेसगमन पर सभी भाषाओं में खूब लोकगीत रचे जाते रहे हैं। राजस्थान के मारवाडी बरसों पहले कमाई के लिए अपना घर छोड़कर जब परदेस जाते थे तो उनके इस यात्रा-काल को दिसावरी कहा जाता था। अब परदेस से आनेवाले समाचारों के लिए संदेश, संदेसा जैसे शब्द और आशंका के लिए अंदेशा, अदेसा जैसे शब्द भी इसी मूल से उपजे हैं। देशाटन शब्द हालांकि इसी मूल का है मगर इसका अर्थ किसी वक्त देश का भ्रमण या मुल्क की सैर न होकर विशुद्ध भ्रमण या पर्यटन था । सूक्ति , वचन के अर्थ में उपदेश जैसा शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है और इन उपदेशों के जरिये ही संत-महात्माओं ने भी देस-परदेस के दार्शनिक भाव उजागर किए हैं। संसार की निस्सारता के बारे में कबीर कहते हैं-
कबीर कहा गरबियौ, काल कहै कर केस ।
ना जाणै कहाँ मारिसी, कै घर , कै परदेस ॥
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...
Wednesday, July 2, 2008
प्यारा कौन ? बैल , बालम या मलाई ?
बोलचाल की हिन्दी में सर्वाधिक प्रयोग किए जाने वाले शब्दों का रिश्ता अक्सर संस्कृत या इसके वैदिक रूप से निकल आता है। इसके अलावा अरबी, फारसी और अंग्रेजी के ढेरों लफ्ज हैं जो हिन्दुस्तानी जबान पर चढे़ हुए हैं। डॉ भगवत शरण उपाध्याय जैसे विद्वानों का मानना है कि अन्य सभ्यताओं से भी भारतीय संस्कृति ने बहुत कुछ लिया है । और इसी कड़ी में कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो न तो संस्कृत के हैं और न ही इंडो -यूरोपीय भाषा परिवार के बल्कि ये सुमेरी( मेसोपोटेमियाई), बाबुली( बेबिलोनियन) और इब्रानी(हिब्रू) आधार से उठ कर किसी न किसी वजह से संस्कृत और इसके जरिये भारतीय भाषाओं में समा गए। हिन्दी में प्रचलित बल, बलमा , बलराम, बलदेव, बैल, बालक और बालिका जैसे कई शब्दो के मूल में वैदिक शब्दावली या संस्कृत नहीं बल्कि हिब्रू है । सुमेरी यानी मेसोपोटेमियाई भाषा में यह शब्द बेल और हिब्रू में बाल Baal के रूप में मिलता है और इसी रूप में हिन्दी, उर्दू व फारसी में भी प्रचलित है। डॉ भगवत शरण उपाध्याय अपनी पुस्तक भारतीय संस्कृति के स्रोत पुस्तक में लिखते हैं कि वेदों में इस शब्द का उल्लेख नहीं है जबकि अपने सुमेरी मूल से उठकर बाद में बेल या बाल शब्द संस्कृत में समा गया। सुमेरी संस्कृति में इसका मतलब होता है -सर्वोच्च, शीर्षस्थ या सबसे ऊपरवाला। हिब्रू में इसका मतलब होता है परम शक्तिमान, देवता अथवा स्वामी । गौरतलब है कि लेबनान की बेक्का घाटी में बाल देवता का मंदिर है। जानकारों के मुताबिक सुमेरियंस के बाल देवता का रूपांतरण ही बाद में रोमन जुपिटर के रूप में हुआ । [ऊपर चित्र में लेबनान के बालबेक स्थित मंदिर के अवशेष ]
हिब्रू के बाल (baal) में निहित सर्वोच्च या सर्वशक्तिमान जैसे भावों का अर्थविस्तार ग़ज़ब का रहा। संस्कृत में इसी बाल या बेल के प्रभाव से
बलम् शब्द प्रचलित हुआ जिसका अभिप्राय शक्ति , सामर्थ्य , ताकत, सेना, फौज आदि है। बल के पर्याय बैल का बलीवर्दः नामकरण भी इसी धातु से हुआ है। एक सुमेरी देवता का नाम बेलुलू है। गौर करें कि संस्कृत में भी इन्द्र का एक विशेषण बललः है । ये सभी समानताएं जाहिर करती हैं कि वृहत्तर भारत दरअसल विभिन्न संस्कृतियों के मेल से ही बना है। अनिष्टकारी शक्ति के , आसमानी मुसीबत, विपत्ति आदि के लिए हिन्दी में बला शब्द खूब प्रचलित है। यह अरबी फारसी के जरिये हिन्दी में आया । अरबी में इसका प्रवेश हिब्रू के बाल की ही देन है अर्थात बला में बल की महिमा तो नज़र आ रही है। इससे कुछ हटकर संस्कृत में बला शब्द मंत्रशक्ति के रूप में विद्यमान है। महाशक्ति , सर्वशक्तिमान को प्रसन्न करने के लिए दी जानेवाली आहूतियों में जब जीवित प्राणी भी स्वीकार्य हो गए तो इन्हें बलि कहा जाने लगा। नामों के साथ प्रत्यय के रूप में बल शब्द लगाने का चलन सुमेरी संस्कृति में भी रहा है । हेन्नीबाल ,हस्रूबाल जैसे प्राचीन यौद्धाओं के नाम यही साबित करते हैं। यही परम्परा भारत में भी इसी के साथ शुरू हो गई और बलदेव, बलराम, बीरबल, बलवीर ,बलभद्र जैसे नाम चल पड़े।
बेल या बाल के सर्वोच्च या ऊपरवाला जैसे शाब्दिक अर्थ अन्य भाषाओं में प्रमुख हो गए। नतीजतन बाल ( सिर के ऊपर), अनाज के पौधे का ऊपरी हिस्सा (बाली) जैसे शब्द भारतीय-ईरानी परिवार की भाषाओं में भी आ गए। यही नहीं बलम, बालम या बलमा ( सर्वाधिक प्रिय, सवोत्तम पात्र, पति) जैसे थोड़े भिन्न अर्थ वाले शब्द भी बने। भगवत् शरण उपाध्याय के मुताबिक बालक, बालिका , जैसे शब्दों का मूलार्थ किसी ज़माने में घोड़े की पूछ था जो उठाए जाने पर घोड़े के शरीर का सबसे ऊंचा हिस्सा बनती है। बाल के सर्वोच्च या शीर्षस्थ अर्थ का संस्कृत में और भी विस्तार हुआ और इससे बल यानी शक्ति और बाद में बैल जैसे शब्द भी बन गए। गौर करें की दूध के ऊपर जो क्रीम जमती है उसे हिन्दी में मलाई कहते हैं। मलाई को उर्दू, फारसी और अरबी में बालाई कहते हैं क्योंकि इसमें भी ऊपरवाला भाव ही प्रमुख है। जो दूध के ऊपर हो वही बालाई। ब की जगह म ने ले ली। गौरतलब हैं कि ये दोनों ही अक्षर एक ही वर्णक्रम में आते हैं और अक्सर इनमें अदल-बदल होती है। पुराने ज़माने में मकान की ऊपरी मंजिल को बालाख़ाना कहते थे । बाला यानी ऊपर और खाना यानी स्थान। गौर करें कि अग्रेजी में छज्जा , दुछत्ती को बालकनी कहते हैं । इसमें भी ऊंचाई का ही भाव है। रूस की बोल्शेविक क्रांति दुनिया में प्रसिद्ध है। बोल्शेविक का शाब्दिक अर्थ हुआ बहुसंख्यक। मगर इसमें भी कुछ लोगों को बाल यानी सर्वशक्तिमान की महिमा नजर आ रही है।
प्रस्तुतकर्ता
अजित वडनेरकर
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Tuesday, July 1, 2008
सरदारजी की शरारत [पुस्तक चर्चा- 1]
इस साल की शुरूआत में हमने नियमित तौर पर पुस्तक चर्चा चलाने की बात कही थी मगर एक कड़ी के बाद कुछ लिखना नहीं हुआ । अलबत्ता हमेशा की तरह पढ़ा खूब गया। कोशिश है कि धीरे धीरे उन तमाम पुस्तकों के बारे में बताता चलूं जो इस दौरान पढ़ी गई हैं। इस बार पेश है खुशवंतसिंह की आत्मकथा ।
अंग्रेजी के प्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह की दिलचस्प आत्मकथा अब हिन्दी में भी उपलब्ध है। राजकमल प्रकाशन ने इसका पेपरबैक संस्करण निकाला है। मेरा मानना है कि किस्सागोई में उर्दूवालों की तरह ही पंजाबीवालों का भी कोई जवाब नहीं। हिन्दीवाले जहां भारी भरकम शब्दावली और चमत्कार पैदा करने की ग़लतफ़हमी के साथ नीरस वर्णन और विवेचन में लगे रहते हैं वहीं उर्दू-पंजाबी लेखक बड़ी आमफ़हम भाषा में ऐसे ऐसे किस्सों के जरिये अपनी बात कह जाते हैं कि ज़रा भी ऊब महसूस नहीं होती। खुशवंतसिंह की आत्मकथा भी इसी वर्ग में आती है और पहले पन्ने से आखिरी पन्ने तक ऊबने नहीं देती। लंबे राजनयिक और फिर पत्रकारीय जीवन के चलते सरदारजी के सामाजिक संपर्कों का दायरा बहुत बड़ा रहा है। आज़ादी से पहले और बाद की राजनीति और समाज को उन्होने बहुत बारीकी से समझा, परखा और जाना फिर अपने अंदाज़ में उसे लिख डाला। इस पुस्तक में राजनीतिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों जैसे नेहरू, इंदिरा, कृष्णमेनन, मेनका, संजयगांधी से लेकर सामाजिक-फिल्मी क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों तक के बारे में बड़ी बेबाकी से खुलासा किया गया है और जहां आवश्यक हुआ उन्हें निशाने पर भी रखा गया है।
खुशवंतसिंह के लेखन की सबसे बड़ी खूबी वे औरतें रही हैं जो जीवन में कभी न कभी उनके सम्पर्क में आई हैं या ताउम्र उनके इर्दगिर्द रही हैं। औरत-मर्द रिश्तों के बारे में वे इतना खुलकर लिखते हैं कि कभी कभी लगता है कि वे शायद मनोरोगी हैं। खासतौर पर औरतों के जिस्म की बातें इतनी ज्यादा इस पुस्तक में आई हैं कि लगता है जैसे उन्होंने ढूंढ ढूंढ कर ये मौके तलाशे हैं। मगर ऐसा नहीं है। वे देश के सबसे महत्वपूर्ण दौर यानी आपात्काल के दौरान की राजनीति और पत्रकारिता की दुनिया में जब हमें ले जाते हैं तो कई बडे चेहरे बेनकाब होते हैं। कुल मिलाकर पुस्तक अपने शीर्षक- सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत के मुताबिक इन तीनों ही चीज़ों का मेल है । बस, थोड़ी सी की जगह शरारत ज़रूरत से ज्यादा नज़र आती है।
पढ़ने के शौकिनों के लिए यह एक अच्छी पुस्तक है। अनुवाद ठीक ठाक है मगर हेमामालिनी को धर्मेन्द्र की रखैल बताने जैसे वाक्य खटकते हैं। पुस्तक का मूल्य 195 रूपए है जो सामान्य है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...
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अजित वडनेरकर
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10:23 PM
बेगुन बैंगन महाराज !
बैंगन को कई लोगों ने मुखसुख के आधार पर बेगुन अर्थात जिसमें कोई गुण न हो , कहा है। मगर ऐसा है नहीं। बैंगन में सिर्फ स्वाद ही नहीं गुण भी हैं और भारतीय मूल के इस फल (सब्जी) से चीन और मलेशिया में आंतों के रक्तस्राव का इलाज किया जाता है। बैंगन को सुपाच्य माना जाता है । हालांकि आयुर्वेद में बैंगन को वातवर्धक भी कहा गया है। बैंगन को अंग्रेजी में एगप्लांट (eggplant)या branjal भी कहते हैं। इसके मूल में है संस्कृत का वातिंगमः शब्द। इसे वातिंगण भी कहा जाता है। यह बना है वात+गम=वातिगमः से। संस्कृत में वात कहते हैं हवा या वायु को । जानकारों के मुताबिक शरीर में वायु से संबंधित विकारों को ही वात रोग कहते हैं और ये दर्जनों प्रकार के होते हैं। देशी ज़बान में इसके बाई, बादी वगैरह भी कहा जाता है। गठिया भी एक वात रोग है। संस्कृत धातु गम् का अर्थ जाना, गुज़रना, चलना-फिरना आदि होता है साथ ही भोगना, अनुभव करना , ग्रस्त होना आदि भाव भी इसमें समाए हैं। वातिंगमः के रूप में यही भाव उजागर होते नज़र आ रहे हैं। यानी बैंगन का नामकरण उसके वायुवर्धक गुणों की वजह से हुआ है। दुनियाभर की भाषाओं में बैंगन शब्द के अलग अलग रूप मिलते हैं मगर ज्यादातर के मूल में संस्कृत शब्द वातिंगमः ही है। संस्कृत से यह शब्द फारसी में बादिंजान(badin-jan) बनकर पहुंचा वहां से अरबी ज़बान में इसका रूप हुआ अल-बादिंजान (al-badinjan) । अरबी के जरिये ये स्पेनी में अलबर्जेना हुआ वहां से केटलॉन में aubergine और फिर अंग्रेजी में हुआ brinjal .
हिन्दी में ही , खासतौर पर मध्यभारत में बैंगन को भटा या भंटा भी कहने का चलन है । दरअसल यह बना है संस्कृत के वृन्तम् से । वृन्त से बना है वृन्तम् जिसका मतलब होता है किसी पौधे,फल, फूल या पत्ती का डंठल। वृन्त बना है वृ धातु से जिसका मतलब हुआ चुनना, छांटना आदि। गौर करें कि पौधों से फूल या फलों को चुनने या छांटने के लिए उसके डंठल को ही चुना जाता है और वहीं से उसे तोड़ा जाता है। संस्कृत में बैंगन का एक अन्य नाम है वृन्ताकः । बैंगन के सामान्य से लंबे और बड़े डंठल पर अगर गौर करें तो यह नाम सही साबित होता है। बैंगन के बड़े डंठल की वजह से ही उसे एक टांग का मुर्गा भी कहते हैं । वृन्ताकः से भटा बनने का क्रम वृन्ताकः > वन्टाअ > भन्टा > भटा रहा होगा।
प्रस्तुतकर्ता
अजित वडनेरकर
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2:48 AM
Sunday, June 29, 2008
मायानगरी से परिचय [बकलमखुद-53]
ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी और अरुण अरोरा को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के दसवें पड़ाव और चालीसवें सोपान पर मिलते हैं खुद को इलाहाबादी माननेवाले मगर फिलहाल मुंबईकर बने हुए हर्षवर्धन त्रिपाठी से। हर्षवर्धन पेशे से पत्रकार हैं और मुंबई में एक हिन्दी न्यूज़ चैनल से जुड़े हैं। बतंगड़ नाम से एक ब्लाग चलाते हैं जिसमें समाज,राजनीति पर लगातार डायरी-रिपोर्ताज के अंदाज़ में कभी देश और कभी उत्तरप्रदेश के हाल बताते हैं। जानते हैं बतंगड़ की आपबीती जो है अब तक अनकही-
साल भर से ज्यादा का देहरादून का मेरा समय अब तक की पत्रकारिता का सबसे यादगार समय रहा है। कई बड़ी खबरें ब्रेक कीं। ये, अलग बात है कि टीवी और दिल्ली, मुंबई में न होने की वजह से ब्रेकिंग न्यूज लाने वाले रिपोर्टर का तमगा नहीं मिल सका।
टीवी की नौकरी 
लेकिन, इंसान की फितरत होती है कि कितना भी मिले उससे ज्यादा चाहिए। टीवी की नौकरी और ज्यादा पैसे कमाने का मन अखबार की नौकरी पर भारी पड़ गया। टीवी चैनलों के चक्कर लगाए। और, नौकरी जनरल न्यूज चैनल में काम करने निकला था। नौकरी मिली अनोखे कॉन्सेप्ट वाले चैनल सीएनबीसी आवाज में। जब अप्वाइंटमेंट लेटर मिला तो, बस ये पता था कि टीवी एटीन हिंदी में कुछ अलग सा शुरू कर रहा है, चैनल का नाम भी नहीं पता था। चैनल शुरू होने के बाद आज चार साल बाद कंज्यूमर नाम की बला से इतना परिचित हो गया हूं कि अब लगता है इसी में कुछ खास करूं। इकोनॉमिक्स में एमए करते वक्त सोचा भी नहीं था कि कभी ये नौकरी की योग्यता में शामिल होगा। वैसे, अभी भी राजनीति और अपराध की रिपोर्टिंग खूब लुभाती है। आठ साल से ज्यादा समय इलाहाबाद से बाहर रहते हो गया नहीं तो, पहले तो पूर्वी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर विधानसभा-लोकसभा के जातीय-सामाजिक-राजनीतिक समीकरण जुबानी याद थे।
मुंबई अब भी बहुत अपनी नहीं लगती
जब 2004 में नौकरी ज्वाइन करने आया तो, तीन घंटे देर से आई फ्लाइट और होटल के रास्ते में सड़क किनारे भरी पड़ी झुग्गियों ने मन मार दिया। मायानगरी की मन में बसी छवि चकनाचूर कर दी। इससे पहले बचपन में एक बार मैं मुंबई आया था। मन में मुंबई की छवि फिल्मी टाइप की थी। लेकिन, दिखा ट्रैफिक जाम, लोकल की मारामारी, हर जगह लंबी कतार, मुश्किल से मिलती छत और वो, भी बेहद महंगी। लगा जीवनस्तर कभी यहां बहुत अच्छा हो ही नहीं पाएगा। जितना तनख्वाह बढ़ती, उससे तेज अनुपात में मकान का किराया बढ़ जाता। एक फिल्म अगर दो लोग साथ देखें तो, हजार रुपए की चपत पड़ जाती है। तय किया 6 महीने से ज्यादा इस शहर में नहीं रहूंगा। खैर, उस 6 महीने के आठ सेमेस्टर बीत गए लेकिन, मुंबई की पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई है। अब मुंबई ठीक लगने लगी है लेकिन, इतने समय तक यहीं रहने के बाद भी बहुत अपनी नहीं लग पा रही है। बंबई न आता तो, पता नहीं अभी तक ब्लॉगिंग कर रहा होता या नहीं लेकिन, मुंबई में आने के बाद लगा कि यहां नहीं आता तो, जिंदगी के कई फलसफे अधूर रह जाते। मुंबई ने टीवी का उस्ताद (खुद को लगने लगा है, पता नहीं अभी कितने उस्तादों से पाला पड़ना है) बना दिया। और, यहीं शशि सिंह से मुलाकात के बाद ब्लॉगिंग का चस्का लगा। मैंने ब्लॉग बनवा दिया (अब तो, मेरी भी गिनती शायद कुछ अच्छे ब्लॉगर्स में होने लगी हो, वैसे धुरंधरों के आगे टिकना बड़ा मुश्किल है। यहां भी बड़ा मुकाबला है, भई)।
हनीमून से निकली पहली ब्लॉग पोस्ट लगती
बड़ी मजेदार बात है कि, मेरी पहली ब्लॉग पोस्ट मेरे हनीमून से लौटने के बाद तैयार हुई। इसे पढ़ने के बाद मेरे कुछ मित्रों ने कहा- बिजनेस चैनल में हो तुम्हें हर जगह बिजनेस और बाजार ही दिखता है। शादी के बाद माताजी ने कहा वैष्णोदेवी जरूर हो आओ। देवीजी का आशीर्वाद लेकर आओ। गोवा, पोर्ट ब्लेयर कैंसिल हुआ। और, हनीमून के लिए देवी दर्शन के बाद श्रीनगर जाना तय हुआ। श्रीनगर, गुलमर्ग घूमने के दौरान वहां की आबोहवा में दिखे बदलाव को शब्दों में बदल दिया और शुरू हो गया ब्लॉगिंग का सफर। फिलहाल, जिंदगी एकदम से पटरी पर तो नहीं कह सकता वो, जद्दोजहद तो बनी रहेगी। लेकिन, घर-परिवार, दोस्तों का अच्छा साथ और अब अपने मन के मुताबिक पत्नी, कुल मिलाकर जिंदगी अच्छी ही चल रही है। अब तक का सफर तो यही है। फिर कभी किसी मोड़ पर आगे की दास्तान। और, तो जिंदगी का सफर है वो, तो चलता ही रहेगा ... [समाप्त]
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अजित वडनेरकर
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बकलमखुद
Friday, June 27, 2008
झीनी झीनी बीनी चदरिया ....
मैं जिसे ओढ़ता, बिछाता हूं
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूं
इस मशहूर शेर में दुश्यंत कुमार अपने शायराना मिज़ाज की बात कह रहे हैं। मगर बात अगर पहेली में बदली जाए कि ऐसी कौनसी चीज़ है जो ओढ़ी भी जाती है और बिछाई भी जाती है तो सभी की ज़बान पर चादर लफ्ज़ ही आएगा। चादर हिन्दी का एक आमफ़हम शब्द है जिसका मतलब होता है कंधे या सिर के ऊपर से ओढ़ा जा सकने वाला कपड़ा, बिस्तर पर बिछाया जाने वाला पटका, धातु के चौड़े पत्तर या पानी की मोटी धार आदि। राजस्थानी में किसी बांध या टंकी के ओवरफ्लो होने की स्थिति को चादर चलना कहा जाता है । हिन्दी के अलावा चादर शब्द उर्दू, फारसी और अरबी में समान रूप से मौजूद है फर्क सिर्फ इतना है कि वहां इसका अर्थ बुर्का या नक़ाब होता है । जो भी हो, काम तो जिस्म को ढकने का ही हो रहा है।
चादर संस्कृत मूल से निकला शब्द है। संस्कृत की एक धातु है छद् जिसका मतलब होता है ढकना , छिपाना , पर्दा करना आदि। छद् से ही बना है छत्रः , छत्रकः या छत्रकम् ।
इन्ही शब्दों से बने हैं छाता , छत्री छतरी जैसे शब्द जो जिसका मतलब होता है ऐसा आवरण जिससे सिर ढका रहे, छाया बनी रहे। राजाओं के सिंहासन के पीछे लगे छत्र से भी यह साफ है । छत्रपति, छत्रधारी जैसे शब्द इससे ही निकले हैं। मंडपनुमा इमारत भी छतरी ही कहलाती है। राजाओं की याद में भी पुराने ज़माने में जहां उन्हें दफनाया जाता था , छतरियां बनाईं जाती थीं। कहावत है कि चाहरदीवारी को ही घर नहीं कहते । सही है क्यों कि अगर चाहरदीवारी पर छत नहीं होगी तो आश्रय अधूरा माना जाएगा और घर यानी सम्पूर्ण आश्रय । छद् के चादर में तब्दील होने का क्रम कुछ यूं रहा होगा - छत्रकः> छत्तरअ > छद्दर > चद्दर > चादर ।
चादर में समाए ओढ़ने, बिछाने, ढकने, छुपाने के भावों ने कविता और मुहावरों में दार्शनिक-लाक्षणिक अर्थ ग्रहण किये हैं मसलन –
ते ते पांव पसारिये, जेती चादर होय ।
कबीर की झीनी झीनी बीनी चदरिया तो सब दुखों से मुक्ति का रास्ता बताती है और चिन्तामुक्ति के बाद मनई को चादर तान कर ही सोना चाहिये । फारसी होते हुए जब यह चादर अरबी में
पहुंची तो वहां के सामाजिक संस्कार इसमें समा गए और खासतौर पर इसका मतलब हो गया शरीर को ढकने का वस्त्र, नकाब या बुर्का । इसका प्रयोग भी विशेष रूप से महिलाओं के संदर्भ में होने लगा। भारत में मुस्लिम शासन के दौरान इस किस्म के प्रयोग यहां भी होने लगे जो मुहावरों में नज़र आते हैं जैसे चादर डालना या चादर ओढ़ाना जिसका मतलब होता है किसी विधवा को घर में डाल लेना या उससे विवाह कर लेना। भाव आश्रय देने का ही है मगर लाक्षणिकता साबित करती है कि इसमें पुरुषवादी सोच पैठी है। यूं देवताओं को छत्र छढ़ता है तो मज़ारों पर चादर चढ़ती है। दोनों मूलतः एक ही हैं और श्रद्धास्वरूप किए जाने वाले अनुष्ठान हैं।
आपकी चिट्ठियां
सफर के पिछले पांच पड़ावों- छिनाल का जन्म , छप्पन छुरी और असली छुरी, ऊंची अटरिया में ठहाके, कैसे कैसे अड्डे और अड्डेबाज , हाथी ने दिखाई हाथ की सफाई पर सर्वश्री समीरलाल, ज्ञानदत्त पांडेय, लावण्या शाह , डॉ चंद्रकुमार जैन, कुश ,संजय पटेल , घोस्ट बस्टर, डॉ अनुराग आर्य, अभिषेक ओझा, ममता, शिवनागले, दिनेशराय द्विवेदी, ई गुरूमाया, बोधिसत्व, संतराम यादव, अरुण , तरुण, प्रभाकर पांडे, आलोक पुराणिक, नीलिमा, पल्लवी त्रिवेदी, अभिजित, रंजना , अभय तिवारी, पल्लव बुधकर , संजय शर्मा, प्रशांत प्रियदर्शी, आभा, शिवकुमार मिश्र, डॉ अमरकुमार, अनामदास, राजेश रोशन , सजीव सारथी, अशोक पांडेय , अफ़लातून, मीनाक्षी , आशीष कुमार अंशु, स्मार्ट इंडियन और अशोक पांडे की टिप्पणियां मिलीं । आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
@अनामदास-आपने अट्ट से अट्टालिका वाली पोस्ट में आए लाफ्टर के हवाले से लॉफ्टी, लॉफ्टर, लॉफ्ट जैसी ऊंचाई को इंगित करती जो जानकारियां दी उनसे सचमुच अट्टहास और अट्टालिका की ही रिश्तेदारी सामने आती दिखी। बाद में सोचा तो लगा कि लिफ्ट भी इसी मूल का शब्द है। शुक्रिया ।
@संजय शर्मा, पल्लव बुधकर, अरुण
आप सभी का शुक्रिया कि अट्टापीर वाली शब्द चर्चा में हिस्सा लिया।
@अभय तिवारी
भाई, लगता तो है कि खुखरी शब्द भी क्षुर् या खुर की देन है। अलबत्ता ईंट शब्द इष्टिका से बना है । अट्ट से इसकी रिश्तेदारी नहीं है।
खास बात-
साथियों ,
इस ब्लाग पर आपका आना बहुत अच्छा लगता है । अनुरोध ये है कि अगर कोई शब्द जो आपके भाषायी क्षेत्र से ताल्लुक रखता है, आपको कुछ संदर्भ याद दिलाता है तो कुछ समय निकालकर उसके बारे में मुझे ज़रूर लिखें।
एक निवेदन यह भी कि कृपया अपनी टिप्पणियों में ऐसे विशेषण न दें जिन्हें स्वीकारने में मुझे संकोच हो। ये मेरा शौक है और आप सबसे साझा कर रहा हूं। ज्ञानी-ध्यानी नहीं हूं, बस जो हूं आपके बीच से हूं। पढ़ रहा हूं और तलाश रहा हूं। जो मिल रहा है उसे सबसे बांट रहा हूं । अरुण जी ने ठीक कहा, इसे तो अड्डा ही समझिये।
अन्यथा न लें। बस, निवेदन ही मानें।
आपका ,
अजित
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...
प्रस्तुतकर्ता
अजित वडनेरकर
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2:53 AM
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Thursday, June 26, 2008
मेरी बरबादी की भविष्यवाणी [बकलमखुद-52]
ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी और अरुण अरोरा को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के दसवें पड़ाव और तिरतालीसवें सोपान पर मिलते हैं खुद को इलाहाबादी माननेवाले मगर फिलहाल मुंबईकर बने हुए हर्षवर्धन त्रिपाठी से। हर्षवर्धन पेशे से पत्रकार हैं और मुंबई में एक हिन्दी न्यूज़ चैनल से जुड़े हैं। बतंगड़ नाम से एक ब्लाग चलाते हैं जिसमें समाज,राजनीति पर लगातार डायरी-रिपोर्ताज के अंदाज़ में कभी देश और कभी उत्तरप्रदेश के हाल बताते हैं। जानते हैं बतंगड़ की आपबीती जो है अब तक अनकही-
बरबाद हो जाएगा मैनेजर साहब का लड़का
विश्वविद्यालय की राजनीति में पहले से सक्रियता, घूमने-टहलने से सामान्य छवि पर असर पड़ने लगे। हर कोई सामने तो सलीके से बात करता। लेकिन, कुछ-कुछ लोग ये भी कहने लगे कि मैनेजर साहब का लड़का अब कुछ नहीं कर पाएगा। बस, नेताओं के पीछे घूमता रहता है। विश्वविद्यालय में पढ़ाई पूरी करने के बाद ये लगने लगा कि जरूरतें पूरी करने के लिए कुछ पैसे तो चाहिए ही होंगे। एक बहुत ही नजदीकी मित्र के पिताजी (लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर) के साथ ठेकेदारी शुरू कर दी। ज्यादा हल्ला नहीं किया लेकिन, ऐसी बातें छिपती कहां हैं। फिर तो मेरी बरबादी की भविष्यवाणियां और तेज हो गईं।
मैं पत्रकारिता के लिए ही बना था
इंजीनियरों और बाबुओं के सामने कमीशन के निपटान करते और किसी तरह घाटे को मुनाफे में बदलने की जुगत के लिए 100रुपए में से 40 रुपए का काम कराना मेरे जमीर को धक्का देने लगा और मुझे ये अच्छे से समझ में आने लगा था कि मैं ठेकेदारी जैसा काम नहीं कर पाऊंगा। मैंने ठेकेदारी को नमस्ते कर दिया। और, ये बहुत अच्छा लगता है कि मेरे बाद ठेकेदारी का काम शुरू करने वालों ने करोड़ो रुपए भले कमाए। लंबी गाड़ियों और असलहों के साथ घूमते हैं लेकिन, रोत रहते हैं कि यार, तुम्हारा काम बड़ा इज्जत वाला है।
चुनाव लड़वाना चाहते थे...
विश्वविद्यालय के दौरान की गतिविधियों से एकाध बार लोगों ने मुझ पर चुनाव लड़ने का भी दबाव डाला। लेकिन, मेरा मन पढ़ने-लिखने के काम में ज्यादा लगता था। और, मुझे ये भी लगता था कि मैं चुनाव का बहुत अच्छा मैनेजर हूं, सबको बांधकर रख सकता हूं लेकिन, शायद चुनाव लड़ना मेरे बस की बात नहीं। पढ़ने-लिखने की रुचि और लोकतंत्र के चौथे खंभे के प्रति मेरी रुचि ने मुझे पत्रकार बना दिया।
महाकुंभ में तगड़े सबक मिले
छिटपुट अखबारों में अपने ही शहर में काम करता था। कुछ थोड़ा बहुत फीचर, कैंपस पेजेज के लिए लिख देता था। 2000-2001 में इलाहाबाद में महाकुंभ होना था। इसी बीच पता चला कि प्रतापजी वेबदुनिया के साथ जुड़कर महाकुंभ पर कुछ अलग सा करने वाले हैं। उनके पास पहुंचा तो, उन्होंने दो विषयों में से किसी एक पर कुछ लिखने को कहा। माघमेला और इलाहाबाद विश्वविद्यालय। इलाहाबाद विश्वविद्यालय पर तो, मैं कभी भी कितना भी लिख सकता था। लेकिन, मुझे लगा कि महाकुंभ में काम करना है तो, माघमेले पर लिखना चाहिए। मेरे बाबा (हम दादू कहते थे) तब जीवित थे। उनसे पूछकर संगम, माघमेला, प्रयाग के कई श्लोक अपने लेख में जोड़ दिए। लेख को देखने के बाद प्रतापजी की वो, बात – कि तुम्हारी कॉपी 5-7 साल की पत्रिकारिता कर चुके लोगों से बेहतर है, मेरे लिए जिंदगी भर का संबल बन गई।
नेताओं-बाबाओं से मुलाकात
तगड़ी ट्रेनिंग हुई- सुबह सात-आठ बजे से रात के दस बजे तक काम करता था। इसी दौरान रामजन्म भूमि आंदोलन के लिए जोर लगाने वाले विहिप के अशोक सिंघल, स्वर्गीय महंत रामचंद्र परमहंस दास (जिन्हें उस समय लगना शुरू हो गया था कि भाजपा के नेता इस मुद्दे पर सिर्फ राजनीति चमका रहे हैं) और महंत नृत्य गोपालदास से भी मुलाकात हुई। बाबाओं का सकारात्मक प्रभाव, बाबाओं की राजनीति और बाबाओं का पाप इन सारी चीजों के दर्शन उन छे महीनों में हो गए। गोविंदाचार्य से लेकर हेमामालिनी और नागा सन्यासिनों तक से मुलाकात हुई। महाकुंभ में लोकल पत्रकारों के लिए नीला छोटा कार्ड बना था जबकि, बाहर से आए नेशनल और इंटरनेशल पत्रकारों को गुलाबी रंग का थोड़ा बड़ा कार्ड मिला था। जिसे लटकाए हम लोग खुश रहते थे और इलाहाबाद के अखबारों में काम करने वाले कुछ बुढ़ाते पत्रकार चिढ़ते भी थे।
पत्रकारिता से देश दर्शन
और, इलाहाबाद से शुरू हुआ मेरा सफर दिल्ली पहुंचा। दिल्ली में इंडियाज मोस्ट वांटेड में कुछ दिन काम किया लेकिन, निहायत बकवास काम लगा। फिर, कानपुर जागरण में डेस्क की नौकरी का जुगाड़ लगा तो, कानपुर पहुंच गया, वैसे दिल्ली छोड़ना नहीं चाहता था। कुछ समय तो मजा आया। काफी कुछ सीखा लेकिन, फिर एडिट पेज की मात्रा, व्याकरण सुधारते, फीचर पेज के लिए बेतुके आर्टिकल लिखते (संगिनी के लिए कहीं से उड़ाकर एक सलाह ये भी लिखी थी कि सुहागरात का मजा बढ़ाने के लिए चादर को फ्रिज में रखें और फिर उसे बिस्तर पर बिछा दें। अब इस सलाह पर हंसी आती है) और जागरण डॉट कॉम की साइट संवारते मन ऊबने लगा। और, पहुंच गया देहरादून।
चारधाम यात्रा
देहरादून में अमर उजाला के लिए जमकर रिपोर्टिंग की। इंडियन मिलिटरी एकेडमी की पासिंग आउट परेड से लोकसभा चुनाव तक। साल भर से ज्यादा का देहरादून का मेरा समय अब तक की पत्रकारिता का सबसे यादगार समय रहा है। कई बड़ी खबरें ब्रेक कीं। ये, अलग बात है कि टीवी और दिल्ली, मुंबई में न होने की वजह से ब्रेकिंग न्यूज लाने वाले रिपोर्टर का तमगा नहीं मिल सका। चारधाम यात्रा के समय करीब डेढ़ महीने अमर उजाला का ऋषिकेश ब्यूरो चीफ भी रहा। ऋषिकेश, चारधाम यात्रा और वहां के लोगों के लिए कितनी बढ़ीं सुविधाएं- इस पर की गई मेरी खबरों की तर्ज पर सभी संस्करणों को वैसी ही खबर करने को कहा गया। त्रिवेणी घाट और परमार्थ निकेतन में शाम का समय अब भी याद आता है। [जारी]
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...
प्रस्तुतकर्ता
अजित वडनेरकर
16
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पर
12:21 PM
लेबल:
बकलमखुद








































