Friday, January 16, 2009

हिन्दुस्तानी पैसा और अरबी रियाल [सिक्का-13]

भारत में रूपए का मूल्य किसी ज़माने में चालीस पैसे था, फिर चौंसठ पैसे हुआ । दाशमिक प्रणाली लागू होने के बाद सौ पैसों से एक रूपया बना। ऐसा नहीं कि अधेला ही सबसे छोटी मुद्रा थी। दाम का चौथाई हिस्सा पावला होता था ।
मु हावरों की दुनियामें मुद्रा का सिक्का खूब चला है। ज्यादातर कहावतें या मुहावरें वस्तु या व्यक्ति की निम्न या उच्चस्थितिको ही रेखांकित करते है। मुद्रा आखिर होती किस लिए है? मूल्य तय करने का जरिया ही तो है न ! दो कौड़ी का आदमी, छदाम भर का काम, सिक्कों में तुलना, दमड़ी पास न होना, दाम लगाना, सिक्का चलना, मोहर लगाना, पैसा बोलता है, अशर्फियां लुटाना, रुपयों की बारिश, चवन्नी छाप, टका सा जवाब या दो टके की बात, कौड़ियों के मोल बिकना, पैसे-पैसे को मोहताज जैसे दर्जनों मुहावरे गिनाए जा सकते हैं। इन सभी मुहावरों में कही गई गई बात के संदर्भ में उल्लेखित मुद्रा का वज़न स्पष्ट हो रहा है।

मुहावरों की इसी कतार में है धेले भर का काम या धेले भर का आदमी। किसी व्यक्ति का क्षुद्रत्व या उसकी हैसियत उजागर करने के लिए टके का आदमी की तरह ही धेले भर का आदमी भी तौला जाता है। यहां धेला का उल्लेख भी मुद्रा के तौर पर हो रहा है। प्राचीन मुद्रा रही है। मुग़लकाल से लेकर अंग्रेजी राज में भी इसका चलन रहा। दरअसल धेला संक्षिप्त रूप है। सम्पूर्ण रूप में यह अधेला adhela है। अधेला का अर्थ हुआ आधा। यह बना है अर्ध में इल प्रत्यय लगने से। एक पैसे का आधा मूल्य होने की वजह से अधेला को यह नाम मिला। दो अधेला मिलकर एक पैसा बनता था। मुगलकाल में दाम दस ग्राम की ताम्बे की मुद्रा थी। चालीस दाम से रुपया बनता था। पैसे के स्थान पर तब दाम का चलन था। अर्थात तब अधेला पेसे की जगह दाम के आधे मूल्य की मुद्रा को कहते थे। एलायड चैम्बर्स डिक्शनरी के मुगल ग्लॉसरी खंड में अधेला का अर्थ मोहर का आधा बताया गया है जबकि मोहर स्वर्ण मुद्रा थी। अब न आना बचा न पाई मगर कंजूस या टेंट ढीली न करने वाले व्यक्ति के संदर्भ में आना-पाई का हिसाब करना मुहावरा भी प्रचलित है। आना पाई का किसी ज़माने की सबसे छोटी मुद्राओं में शुमार था। भाव यही है कि तुच्छ धनराशि का भी हिसाब-किताब रखना। जाहिर है कंजूसी इसी को कहते हैं।

पाई और पैसा paisa शब्दों का मूल एक ही हैं। दोनों शब्द संस्कृत की पद् धातु से जन्मे हैं जिसमें चतुर्थांश, अध्याय, हिस्सा अथवा छोटी मुद्रा का भाव हैं। इससे बने पद्म में एक बहुत बड़ी संख्या का भाव है। आप्टे कोश के अनुसार एक के आगे पंद्रह शून्य जितनी। उसे पद्म कहते हैं। यह संख्या हजारों खरब होती है। भाषा विज्ञानी पैसा की दो व्युत्पत्तियां बताते हैं। पहली के मुताबिक यह पद्म+अंश बना है। दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार यह पाद+इका+सदृशकः से है। मेरी निगाह में पहली व्युत्पत्ति ज्यादा सही है क्योंकि इसमें विराट संख्या के अंश की बात कही जा रही है जो पैसा है। पाई भी इससे ही बना है जिसे रुपए की सबसे छोटी इकाई माना जाता है और पैसे के समकक्ष रखा जाता है। भारत में रूपए का मूल्य किसी ज़माने में चालीस पैसे था, फिर चौंसठ पैसे हुआ । दाशमिक प्रणाली लागू होने के बाद सौ पैसों से एक रूपया बना। ऐसा नहीं कि अधेला ही सबसे छोटी मुद्रा थी। दाम का चौथाई हिस्सा पावला होता था । गौर करें तौल और मात्रा की इकाई आज भी पाव है । पद में समाया चौथाई भाव इसमें स्पष्ट है। पावला से भी छोटी मुद्रा थी दमड़ी जो पाव का भी आधा और दाम अथवा रुपए का 1/ 8 हिस्सा कहलाती थी।

पैसा भी ऐसी मुद्रा है जिसका प्रसार पश्चिमी देशों में हुआ। मुगलकाल में अफगानिस्तान में भी पैसा चलता रहा। नेपाल और पाकिस्तान में आज भी चल रहा है। बांग्लादेश में भी इसे पोइशा कहा जाता है। ईरान के कुछ हिस्सों में ब्रिटिश काल में पैसा चलता रहा। कुछ अरब देशों में मसलन मस्कट, बहरीन, कतर और ओमान में भी पैसा सरकारी मुद्रा के तौर पर डटा हुआ है

ओमानी मुद्रा 100 बैसा का नोटभारतीय पैसा की तरह ही ओमान की सबसे छोटी मुद्रा भी बैसा ही है जिसका मौद्रिक मूल्य दो भारतीय पैसों के बराबर होता है। गौरतलब है कि एक ओमानी रियाल करीब बीस रूपए का होता है ।

अलबत्ता वहां इसका नाम बैसा baisa या बैजा baiza हो गया। भारतीय पैसा की तरह ही ओमान की सबसे छोटी मुद्रा भी बैसा ही है जिसका मौद्रिक मूल्य दो भारतीय पैसों के बराबर होता है। गौरतलब है कि एक ओमानी रियाल करीब बीस रूपए का होता है । एक रियाल rial एक हजार बैसा होते है। ओमान में सौ , दो सौ बैसा के नोट चलते हैं जिनकी हैसियत भारतीय मुद्रा में दो सौ पैसे अर्थात दो रूपए के बराबर होती है। औमान में 1940 तक रूपया और आना भी चलता रहा ।

अरब देशों में रियाल प्रमुख मुद्रा है । दिलचस्प बात यह कि यहां की सबसे बड़ी और सबसे छोटी दोनो ही मुद्राएं विदेशी मूल की हैं। बैसा के भारतीय मूल की बात हो चुकी है। रियाल मूल रूप से स्पेन का है। पुर्तगालियों ने जब पांचसौ साल पहले खाड़ी देशों में अपना प्रभुत्व जमाया तब स्पेन की शाही मुद्रा रियल real का वहां आगमन हुआ। रियल का अर्थ होता है खरा, सच्चा, सीधा, प्रामाणिक आदि। ये तमाम अर्थ इसे मिलते हैं इंडो-यूरोपीय धातु rei से। संस्कृत में इसके लिए ऋ धातु है जिसमें उचित, सच्चा, ईमानदार, प्रतिष्ठित जैसे भाव जुड़ते हैं जो शासक के प्रमुख गुण माने जाते हैं। अंग्रेजी का रॉय, रॉयल, वायसरॉय शब्द भी इसी मूल का है। संस्कृत के राजा > राया > राय > राई जैसे सभी शब्दों की इनसे समानता पर गौर करें। भी। रियाल में राजसी मुद्रा की बात अंतर्निहित है। इसीलिए कहते हैं दुनिया गोल, पैसा गोल। गोल गोल ताम्बे के पैसे की रिश्तेदारी स्पेनी रियल और अरबी रियाल दोनों से जुड़ रही है।

आपकी चिट्ठी

सफर की पिछली कड़ी मिस्री पेपर और बाइबल(पर्चा-2) में ज्ञानदत्त पांडे पूछते हैं कि पेपर से कागज कैसे रूपान्तरित हुआ?

मिठास का रिश्ता !
पेपर और कागज़ में जन्म का कोई रिश्ता नहीं ज्ञानदा अलबत्ता स्वाद का ज़रूर है। काग़ज़ चीनी मूल का है और पेपर मिस्री मूल का। तो जाहिर है इसमें चीनी और मिस्री की मिठास होगी। अपन ने कभी काग़ज़ खाकर नहीं देखा। जिन्हें बचपन में इसे खाने की आदत रही होगी वे बता सकते हैं। वैसे काग़ज़ के चीनी मूल की कथा पिछली कड़ी अरब की रद्दी, चीन का काग़ज़ [पर्चा-1]में बताई जा चुकी है।




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Thursday, January 15, 2009

मिस्री पेपर और बाइबल [पर्चा-2]

चीन में निर्मित काग़ज़ और पपायरस में तकनीकी फर्क इतना ही था कि मिस्री काग़ज़ को मनचाहा आकार नहीं दिया जा सकता था जबकि चीनी काग़ज़ को हर आकार में बनाया जा सकता था
दु निया भर में पेपर शब्द इस्तेमाल होता है। इसका मूल अर्थ काग़ज़ है मगर हिन्दी में पेपर paper शब्द दो खास अर्थों में इस्तेमाल होता है। ज्यादातर लोग पेपर का इस्तेमाल अखबार (न्यूजपेपर) के लिए करते हैं। पेपर का दूसरा सबसे ज्यादा प्रयोग प्रश्न-पत्र के अर्थ में होता है। इसके अलावा औसत हिन्दुस्तानी सामान्य अर्थ में पेपर के लिए काग़ज़ लिखना या बोलना पसंद करता है। पेपर के विकल्प के रूप में पर्चा, पत्र (समाचार पत्र, चिट्ठी-पत्री ) जैसे शब्द भी खूब बोले जाते हैं। पेपर शब्द का अखबार के रूप में इस्तेमाल तो बीती कुछ सदियों से होने लगा है मगर ईसाइयों के प्रमुख धर्मग्रंथ बाइबल के मूल में भी यही पेपर शब्द झांक रहा है।

पेपर शब्द हिन्दी में अंग्रेजी से आया है। अग्रेजी में इसकी व्युत्पत्ति फ्रैंच भाषा के शब्द पैपियर से मानी जाती है जो मूल रूप से लैटिन के पपायरस से जन्मा माना जाता है जो ग्रीक भाषा के पपायरोस(papyros) से पैदा हुआ है। भाषा विज्ञानियों का मानना है कि मूल रूप से पपायरोस इजिप्शियन अर्थात मिस्री भाषा का शब्द है और सेमेटिक भाषा परिवार से ताल्लुक रखता है न कि यूरोपीय भाषा परिवार से। ग्रीक पपायरोस का मतलब ऐसी वनस्पति से है जिससे काग़ज़ बनता है। नील नदी के कछारों में उगने वाली यह वनस्पति बहुउपयोगी मानी जाती है। काग़ज़ बनाने के अलावा इसका ओषधीय प्रयोग भी होता था।

पपायरोस के जन्म सूत्र भाषा विज्ञानियों ने सेमेटिक भाषा परिवार की मिस्री भाषा में तलाशे है। ज्यादातर लोग समझते हैं कि इजिप्ट यानी मिस्र में अरबी बोली जाती है। सुविधा के लिए इसे इजिप्शियन-अरेबिक ज़रूर कहा जाता है मगर यह सेमेटिक परिवार की एक अलग भाषा है। यहूदी भाषा विज्ञानी अव्राहम स्थैल और अर्नेस्ट क्लैन पपायरस शब्द को मिस्री मूल का ही मानते हैं। उनके मुताबिक इसकी व्युत्पत्ति पै-प-इयर(pa-p-yeor) अर्थात नील नदी से संबंधित या नील नदी का। गौरतलब है कि मिस्री और हिब्रू में नील नदी के लिए इयर( yeor) नाम है। पा का अभिप्राय वनस्पति से भी है। जाहिर है पै-प-इयर(pa-p-yeor) यानी पैपियर ही ग्रीक भाषा का पपायरोस हुआ जिसका अर्थ भी एक किस्म की मिस्री वनस्पति से बना काग़ज़ था।

इतिहास प्रसिद्ध फिनीशियाई व्यापारियों द्वार ईसा से पांच हजार वर्ष पूर्व स्थापित प्रसिद्ध बंदरगाह शहर बिब्लस (अरबी नाम जबेल जो मूल फिनीशी गभेल का रूपांतर हो सकता है) को यह नाम इसी वजह से मिला था क्योंकि इसी बंदरगाह पर भारी मात्रा में मिस्र से पपायरोस लाया जाता था और उसका अन्य स्थानों को लदान होता था। बिब्लस को यहीं पर एक और भी अर्थ मिला पपायरोस अर्थात काग़ज़ बनानेवाली वनस्पति की भीतरी परत । बिब्लस का एक अन्य अर्थ हुआ पुस्तक। गौरतलब है कि कुछ लोगों का मानना है कि बिब्लस ग्रीक उच्चारण है और मूल फिनीशी शब्द गभेल का बिगड़ा रूप भी हो सकता है। ग्रीक में बाइबल की व्युत्पत्ति का आधार यही बिब्लस है जिसका मतलब होता है पुस्तक। बरसों बाद ईसा मसीह के प्रवित्र संदेशों को जब ग्रंथ की शक्ल मिलने लगी तो उसे ग्रीक भीषा के

फिनीशियों द्वारा बसाए पांच हजार साल पुराने बंदरगाह [ऊपर] को बिब्लस नाम मिला एक मिस्री वनस्पति से जिसे पपायरस कहा जाता था और जिसकी आंतरिक परत से ईसापूर्व करीब पांच हजार साल पहले से काग़ज़ बनाया जाता था [दाएं]

बिब्लस के आधार पर बिब्लिआ, और फिर बिब्लिका कहा गया जिसने बाद में बाइबल का रूप लिया। गौरतलब है कि ग्रंथ सूची या संदर्भ सूची के लिए बिब्लियोग्राफी शब्द भी इसी मूल से जन्मा है।

पेपर के अर्थ में हिन्दी- उर्दू में पर्चा शब्द प्रचलित है। पेपर की ही तरह पर्चा भी अखबार और प्रश्नपत्र के अर्थ में प्रयोग होता है। अखबार के लिए पर्चा शब्द हिन्दी में किसी ब्रिटिश राज के दौरान ज्यादा प्रचलित था। अब पर्चा का प्रयोग इश्तेहारी पर्चे के तौर पर ही होता है जिसे पैम्फलेट कहते हैं। पर्चा parcha का छोटा रूप पर्ची होता है। पर्चा शब्द बना है फारसी के पर्चः से जिसका मतलब हुआ काग़ज़ का छोटा पुर्जा, किसी के हाथ भेजी जाने वाली चिट्ठी(दस्ती ख़त), अख़बार, प्रश्न पत्र या रपट आदि। इस पर्चे में फारसी का ‘पर’ झांक रहा है। पर यानी पंख। यह इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है। संस्कृत में प वर्ण अपने में उच्चता का भाव समेटे है। उड़ान का ऊंचाई से ही रिश्ता है। परम, परमात्मा जैसे शब्दों से यह जाहिर हो रहा है। पर में भी यही उच्चता लक्षित हो रही है। संस्कृत की पत् धातु का अभिप्राय है उड़ना, फहराना, उड़ान आदि। द्रविड़ परिवार की कोत भाषा में पर्न या पर्नद का मतलब भी उड़ना ही है। द्रविड़ और फारसी में एक जैसा रूपांतर यह भी स्थापित करता है कि किसी ज़माने में द्रविड़ भाषाओं का प्रसार सुदूर उत्तर पश्चिम तक था।

इस पर्चः का रिश्ता पर्चम से भी जुड़ रहा है जिसका अर्थ है झंडा, झंडे का कपड़ा। पर्चम किसी भी राष्ट्र, समाज या संगठन का सर्वोच्च प्रतीक होता है। पताका का अर्थ भी ध्वज ही होता है। पर्चम parcham और पताका एक ही मूल के हैं और दोनों का संबंध उड़ान से, लहराने से, फहराने से है। गौरतलब है कि फारसी में पार्चः का अर्थ भी कपड़ा ही होता है। पत्ते के लिए संस्कृत में पत्रम् शब्द है। पत्र में उड़ने का भाव भी है और गिरने का भी। डाल से टूटने के बाद पत्ता पहले उड़ता है फिर गिरता है। प्राचीन भारत में वृक्षों की छाल पर लिखा जाता था जैसे भोजपत्र और ताड़पत्र। मूलतः इनकी छाल इतनी महीन होती है कि यह पत्र की श्रेणी में ही गिनी जाती है इसीलिए यह लिखावट के लिए भी अनुकूल होती है। यह भी दिलचस्प है कि भारत मे वृक्षों की बाहरी छाल पर लिखने के सफल प्रयोग हुए वहीं धुर पश्चिम स्थित मिस्र में पपायरस की भीतरी परतों को जोड़ कर काग़ज़ के टुकड़े बनाए जाते रहे।

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Wednesday, January 14, 2009

अरब की रद्दी, चीन का काग़ज़ [पर्चा-1]

कई सदियों तक चीनियो की काग़ज़ बनाने की तकनीक गुप्त रही मगर आखिरकार सातवीं आठवीं सदी के आसपास किसी तरह यह तरकीब उज्बेकिस्तान के प्राचीन शहर समरकंद तक पहुंच गई
कबीरदास की प्रसिद्ध उक्ति मसिकागद छूयो नहीं, कलम गहि नहीं हाथ में काग़ज़, कलम और सियाही की महिमा उभर रही है। इसमें भी सियाही और कलम तब तक बेमानी हैं जब तक काग़ज़ न हो। ये काग़ज़ क्या है और कहां से आया ?

संवाद-संकेतों और तथ्योंको दस्तावेजी स्परूप प्रदान करने के लिए प्राचान काल से ही मनुष्य विभिन्न माध्यमों को तलाशता रहा है। पाषाणकालान शैलाश्रयों (रॉक शैल्टर्स) में आदिमानव द्वारा उत्कीर्ण पशु पक्षियों के रेखा चित्र, सुमेरी सभ्यता में मिट्टी की ईंटों पर मिले संकेत चिह्न, सिन्धु घाटी की सभ्यता में पकी हुई मिट्टी पर उत्कीर्ण चिह्न इन्हीं प्रयासों को साबित करते हैं। सभ्यता के विकास के साथ मानव ने वृक्षों की छाल को लिखने का माध्यम बनाया । पूर्वी देशों में यह खूब प्रलित हुआ। अरब देशों में जानवरों की पतली सूखी खाल पर लिखने के प्रयोग चलते रहे। हिन्दी-उर्दू-फारसी में प्रचलित काग़ज़ kaghaz शब्द इन भाषाओ में अरबी से आया है मगर यह शब्द मूलतः अरबी का भी नहीं है बल्कि चीनी भाषा से आया है।

यह स्थापित तथ्य है कि काग़ज़ का आविष्कार पश्चिम में नहीं बल्कि पूर्व में हुआ था। ईसा से करीब एक सदी पहले चीन के उत्तर पश्चिमी गांसू प्रांत में त्साई लिन नामक एक उद्यमशील राजकीय कर्मचारी ने किया था। चीन में इस पदार्थ को नाम मिली गू-झी अर्थात Gu zhi । चीनी भाषा में इसका अर्थ हुआ लेखन सामग्री। कई सदियों तक चीनियो की काग़ज़ बनाने की तकनीक गुप्त रही मगर आखिरकार सातवीं आठवीं सदी के आसपास किसी तरह यह तरकीब उज्बेकिस्तान के प्राचीन शहर समरकंद तक पहुंच गई जहां इसका तुर्की नाम हुआ काघिद। बरसों तक फारस, अरब और तुर्किस्तान में यह समरकंदी काघिद के तौर पर विख्यात रहा। अरब में इसका उच्चारण हुआ काग़ज़ जिसे फारसी के साथ उर्दू ने भी अपनाया। भारत की उत्तर से दक्षिण तक कई भाषाओं में इसके विभिन्न प्रतिरूप देखने को मिलते हैं जैसे मराठी, राजस्थानी,पूर्वी में कागद, तमिल में कागिदम्, मलयालम में कायितम् और कन्नड़ में कायिता। चीनी में गू-झ़ी के अलावा इसकी एक अन्य व्युत्पत्ति
कोग-द्ज के रूप में भी मिलती है जिसका अर्थ होता है एक खास किस्म के शहतूत के रेशे से बना पत्र।

शुरूआती दौर में काग़ज़ हस्तनिर्मित होता था। यूरोपवालों ने मध्यकाल में इसे मशीनों से उत्पादित करने की तरकीबें ईज़ाद कीं।

राजस्थान में काग़ज़ का कारोबार करनेवालों को कागदी भी कहा जाता है। सागानेर समेत देश में कई स्थानों पर कुटीर उद्योग के तौर पर हस्तनिर्मित काग़ज़ बनाया जाता है।

काग़ज़ के संदर्भ में ही अक्सर रद्दी का भी जिक्र आता है। हिन्दी में आमतौर पर इस्तेमाल शुदा काग़ज़ को रद्दी या रद्दी काग़ज़ कहते हैं। रद्दी शब्द मूलतः अरबी का है और इसके दायरे में सिर्फ काग़ज़ ही नहीं वे सब पदार्थ आते हैं जो अनुपयोगी हैं, फेंकने लायक हैं अथवा त्याज्य हैं। रद्दी बना है अरबी के रद्द शब्द से जिसका मूल अर्थ है खारिज़ करना, अस्वीकार करना अथवा नापसंद करना। रद्द शब्द रद का ही रूपांतर है जिसका मूलार्थ है उलटी अथवा वोमिट करना। गौर करें कि शरीर ने जिसे अस्वीकार कर दिया वही है मितली अथवा उलटी। अस्वीकार का यही भाव रद्द से बने तमाम शब्दों में प्रमुखता से उभरा है। रद्द से इस्लामी शब्दावली का एक प्रमुख शब्द रिद्दाह भी जन्मा है जिसका अर्थ होता है इस्लाम से इनकार करना। जाहिर है ऐसा व्यक्ति इस्लाम की निगाह में काफिर होगा। रद्द से ही बने रद्दे-अमल अर्थात किसी बात अथवा कार्य की प्रतिक्रिया और रद्दो-बदल यानी परिवर्तन अथवा बदलाव आदि शब्द भी हिन्दी में आमतौर पर इस्तेमाल होते हैं। बहरहाल यह तो निर्विवाद है कि काग़ज़ का आविष्कार चीन में हुआ और यह शब्द भी मूल चीनी शब्द का ही रूपांतर है। शुरूआती दौर में काग़ज़ हस्तनिर्मित होता था। यूरोपवालों ने मध्यकाल में इसे मशीनों से उत्पादित करने की तरकीबें ईज़ाद कीं। पर्यावरण और स्वास्थ्य के मद्देनजर हस्तनिर्मित काग़ज़ का इस्तेमाल अब बढ़ रहा है। दिलचस्प यह कि इसके निर्माण की प्रमुख सामग्री कपड़े और काग़ज़ की रद्दी ही है।

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Monday, January 12, 2009

तलाश दूध के विकल्प की...[बकलमखुद-84]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के चौदहवें पड़ाव और बयासीवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-

ए क पुलिस ऑफिसर के तौर पर अब तक मैं अपने आपको काफी कुछ इस परिवेश में ढाल चुकी थी!लेकिन फिर भी कभी कभी अपने लिए टाइम न निकाल पाना बहुत खलता था! खासकर कई बार ऐसा हुआ जब मैंने किसी को डिनर पर बुलाया और ऐन डिनर के टाइम पर अचानक कोई घटना हो गयी और मुझे घर से तुंरत निकलना पड़ा...मेहमानों को इस खेद सन्देश के साथ की " डाइनिंग टेबल पर खाना रखा है...प्लीज़ खाकर ही जाइयेगा"! कई बार गेस्ट मेरी अनुपस्थिति में खाना खाकर गए! जब दुसरे देशों के पुलिस सिस्टम के बारे में पढ़ती हूँ तो अच्छा लगता है की वहाँ सबके काम के घंटे तय हैं!लेकिन हमारे यहाँ ऐसा नहीं है! कई बार दो दो रात तक नींद नसीब नहीं होती! ऐसे में जब मैं मेहमानों को वक्त नहीं दे पायी या बाज़ार से कोई ज़रूरी शौपिंग नहीं कर पायी तो मुझे काफी खीज पैदा हुई ! लेकिन वहीं ये सोचने वाली बात है की एक सिपाही या हवलदार के पास तो कोई अर्दली भी नहीं होते, उन्हें अपने घर के काम भी खुद ही निपटाने पड़ते हैं! ऐसे में कोई वीकली ऑफ न होना उनके लिए वाकई तनाव का कारण है! हमारे यहाँ पुलिस कर्मचारी सचमुच बहुत स्ट्रेस में काम करता है! उन्हें ऑफ नहीं मिलता इसलिए सरकार उन्हें तेरह महीने की तनख्वाह देती है लेकिन पैसों से वक्त की कमी कैसे पूरी की जा सकती है!

नकली डॉक्टर, असली पुलिसः पुलिस में कई खट्टे मीठे अनुभवों के साथ कई मजेदार वाकये भी सामने आये!जिनमे से एक था जब हमने फर्जी डॉक्टरों की एक टीम को पकडा था!! हुआ यूं !एक बार मैं अपने थाने में बैठी हुई थी,तभी एक पास के किसी गाँव से एक व्यक्ति आया और उसने बताया कि गाँव में कुछ डॉक्टरों ने पिछले १० दिन से कैम्प लगा रखा है और १०-१० रुपये में इलाज कर रहे हैं!खबर में कुछ ज्यादा दम नहीं थी फिर भी थोडा अजीब लगा!सोचा जाकर देख आते हैं,अगर कुछ न भी हुआ तो गाँव का दौरा तो हो ही जायेगा ! अपने थाना प्रभारी को लिया और पहुँच गयी उस गाँव में!पता चला कि गर्मी की छुट्टियों में गाँव का सरकारी स्कूल बंद है तो हेडमास्टर ने डॉक्टरों को किराये पर दे दिया है और उसी में मेडिकल कैम्प चल रहा है! खैर उस तथाकथित मेडिकल कैम्प मैं पहुंचे ,देखा तो नज़ारा कुछ इस प्रकार था! दो कमरों के उस स्कूल में पहले दोनों कमरों में तीन तीन पलंग डले हुए थे जिन पर तीन लडकियां और दो लड़के लेटे थे और सभी को ड्रिप लगी हुई थी !अच्छा तो ये मरीज हैं..हमने सोचा!एक मरियल सा छोटे कद का लगभग २०-२१ साल का लड़का कुर्सी पर बैठा हुआ था जो देखने से मैकेनिक लग रहा था!शायद किसी मरीज का रिश्तेदार होगा...हमने पूछा कि डॉक्टर कहाँ है? तो वो बोला कि मैं ही डॉक्टर हूँ!हमने बमुश्किल अपनी हंसी रोकते हुए पूछा कि आपके साथ के बाकी डॉक्टर कहाँ हैं तो जवाब मिला " सभी बीमार हो गए हैं! कहकर सामने पड़े पलंगों कि तरफ इशारा कर दिया!अब हंसी रोकना नामुमकिन था! उसने बताया कि तेज़ गर्मी के कारण ये सब बीमार हो गए हैं!वो सभी लोग भी बमुश्किल १९-२० साल से ज्यादा के नहीं लग रहे थे!अब पूरा मामला डाउटफुल लग रहा था! उनसे उनकी डिग्री के बारे में पूछा तो एक डब्बे में से किसी काशी के विद्यालय कि फर्जी डिग्री निकाल कर बताई!हमने तुरंत सभी डॉक्टरों को उनके साजो सामान के साथ गाडी में बैठाया और थाने ले आये!

कम्पाऊंडर के भरोसे ठगीः थाने आकर पहले उनका असली परिचय प्राप्त किया जो थोड़े नानुकुर के बाद उन्होने इस प्रकार बताया! उनके असली नाम अब मुझे याद नहीं हैं लेकिन उनमे से एक लड़की ग्यारहवी क्लास में पढ़ रही थी,उसका चिकित्सा से इतना संबंध अवश्य था कि वो आगे चलकर डॉक्टर बनने की इच्छा रखती थी! दूसरी तीन साल पहले पढाई छोड़ कर घर बैठी हुई थी और तीसरी किसी ब्यूटीपार्लर में काम करती थी! लड़कों का परिचय कुछ यूं था,एक किसी ऑटो पार्ट्स की दुकान में मैकेनिक का काम करता था, दूसरा बी.कॉम. प्रथम वर्ष का छात्र था और तीसरा किसी डॉक्टर के क्लीनिक में ५ साल कम्पाऊंडर रह चुका था!एक मात्र वही था जो थोडी बहुत मरहम पट्टी करना जानता था! जब उनका सामान देखा तो थोडी बहुत बेसिक दवाइयों के अलावा एक रजिस्टर और कुछ पेम्फलेट्स मिले! रजिस्टर में उन मरीजों के नाम थे जो अब तक इलाज करवा चुके थे!

... जरा नज़र डालिए, मरीज और उनके रोगों पर! मोनू- उम्र दस वर्ष, हेपेताइतिस! सुनैना- उम्र आठ वर्ष, गुप्त रोग! रामजी लाला- पचास वर्ष, कैंसर! गोया कि मरीजों को स्टेथस्कोप लगाकर ही हर मर्ज पहचाना जा रहा था!...

नाम के आगे रोग लिखा हुआ था....जरा नज़र डालिए, मरीज और उनके रोगों पर! मोनू- उम्र दस वर्ष, हेपेताइतिस! सुनैना- उम्र आठ वर्ष, गुप्त रोग! रामजी लाला- पचास वर्ष, कैंसर! गोया कि मरीजों को स्टेथस्कोप लगाकर ही हर मर्ज पहचाना जा रहा था! कुल बीस मरीजों को ये देख चुके थे!यानी दो सौ रुपये कमा चुके थे!और उस पर सबसे मजेदार बात ये थी जिसके कारण ये सारे चिकित्सक दुखी थे कि अपने व्हाइट एप्रन और दवाइयाँ खरीदने में ये करीब दो हज़ार रुपये खर्च कर चुके थे उस पर खुद बीमार पड़े सो अलग! इन्हें दख इस बात का था कि काश मूल पूँजी ही निकल आती! इनके पेम्फलेट में भी संसार में जितनी बीमारियाँ हो सकती हैं सबका शर्तिया इलाज करने का दावा किया गया था!जी हाँ...ये एड्स का भी इलाज कर रहे थे!और वो भी बेचारे बिना पढ़े लिखे गाँव वालों को क्रोसिन और बी कॉम्प्लेक्स के टेबलेट्स देकर!इस मजेदार वाकये के पीछे ये आज कि बहुत बड़ी सच्चाई है कि आज भी गाँव के लोग ऐसे फर्जी डॉक्टरों का हर रोज़ शिकार हो रहे हैं!

शहरों से गांव न्यारेः अपनी देहात की पोस्टिंग के दौरान गावों को बहुत करीब से देखने का मौका मिला और जो बात मुझे बहुत प्रभावित करती है वो ये कि स्वागत सत्कार और अपनेपन में शहर इन गावों से बहुत पीछे हैं! गावों में जाते ही गाडी के पीछे भागते और हाथ हिलाते बच्चे, एक लड़की को पुलिस यूनीफोर्म में देखने के लिए घूंघट किये अपने घरों से झांकती महिलायें और बैठाने के लिए झटपट अपने घरों के आँगन में खटिया बिछाते लोग...सचमुच बहुत अच्छा लगता था! पहले पहल मैं गाँव में किसी के घर पानी नहीं पीती थी क्योंकि मैं अपना फिल्टर पानी अपने साथ गाडी में रखती थी!और वही पीती थी पता नहीं गाँव का पानी क्या बीमारी लेकर आये! लेकिन बाद में मैंने महसूस किया कि मेरा पानी पीने से इनकार करना उन्हें दुःख पहुंचाता था! इसके लिए फिर मैंने एक रास्ता निकला! मैं पानी तो नहीं पीती थी लेकिन चाय के लिए पूछने पर उनसे गर्म दूध कि फरमाइश कर देती थी! चूंकि मैं चाय नहीं पीती हूँ इसलिए उबला दूध ही मुझे सबसे सुरक्षित लगता था! वो भी खुश और मैं भी!इससे उन्हें पानी न पीने कि शिकायत भी नहीं रहती थी! हांलाकि ये अलग बात है की उबला दूध मुझे नहीं भाता है!लेकिन इसी बहाने कैल्सियम तो मिल ही रहा है!पर दूध का भी विकल्प तलाश रही हूँ जो नुक्सान भी न करे और मुझे पसंद भी आये!आप कोई आइडिया दे सकें तो बताइए!

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Saturday, January 10, 2009

बनियागीरी और बंजारापन [सिक्का-12]


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किसी ज़माने में क्रय-विक्रय के काम में लगा एक आत्मनिर्भर समुदाय आज बंजारा कहलाता है और खानाबदोश विमुक्त जाति का दर्जा पाकर सरकारी रहमोकरम की राह देख रहा है।

उ त्तर वैदिक काल में पणि (फिनीशियन) आर्यावर्त में व्यापार करते थे। उनके बड़े-बड़े पोत चलते थे। वे ब्याजभोजी थे। आज का 'बनिया' शब्द वणिक का अपभ्रंश ज़रूर है मगर इसके जन्मसूत्र पणि में ही छुपे हुए हैं। दास बनाने वाले ब्याजभोजियों के प्रति आर्यों की घृणा स्वाभाविक थी। आर्य कृषि करते थे, औरपणियों का प्रधान व्यवसाय व्यापार और लेन-देन था।

उत्तर वैदिककाल के उल्लेखों में पण, पण्य, पणि जैसे शब्द आए हैं। पण या पण्य का अर्थ हुआ वस्तु, सामग्री, सम्पत्ति। बाद में पण का प्रयोग मुद्रा के रूप में भी हुआ। पणि से तात्पर्य व्यापारी समाज के लिए भी था। पणि उस दौर के महान व्यापारिक बुद्धिवाले लोग थे। पणियों की रिश्तेदारी आज के बनिया शब्द से है।पणिक या फणिक शब्द से ही वणिक भी जन्मा है। आर्यों ने पणियों का उल्लेख अलग अलग संदर्भों में किया है मगर हर बार उनके व्यापार पटु होने का संकेत ज़रूर मिलता है। वैदिक साहित्य में पणियों को पशु चोर बताया गया है। गौरतलब है कि आर्य पशुपालक समाज के थे जहां पशु ही सम्पत्ति थे। सामान्य व्यापारी जिस तरह तोलने में गड़बड़ी कर लाभ कमाना चाहता है, संभव है प्राचीनकाल में वस्तु-विनिमय के दौरान पणियों द्वारा आर्यजनों से पशुओं की ऐसी ही ठगी सामान्य बात रही हो। इसीलिए वैदिक संदर्भों में पणियों को पशु चोर बताया गया हो। कृषि-संस्कृति से जुड़े आर्यों को पणियों का वाणिज्यजीवी होना, ब्याज की धन राशि लेना और लाभ कमाना निम्नकर्म लगता था और वे उन्हें अपने से हेय समझते थे।

हिन्दी में व्यापार के लिए वाणिज्य शब्द भी प्रचलित है। वाणिज्य की व्युत्पत्ति भी पण् से ही मानी जाती है। यह बना है वणिज् से जिसका अर्थ है सौदागर, व्यापारी अथवा तुलाराशि। गौरतलब है कि व्यापारी हर काम तौल कर ही करता है। वणिज शब्द की व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक पण+इजी से हुई है। इससे ही बना है वाणिज्य और वणिक जो कारोबारी, व्यापारी अथवा वैश्य समुदाय के लिए खूब इस्तेमाल होता है। पणिक की वणिक से साम्यता पर गौर करें। बोलचाल की हिन्दी में वणिक के लिए बनिया शब्द कहीं ज्यादा लोकप्रिय है जो वणिक का ही अपभ्रंश है इसका क्रम कुछ यूं रहा-वणिक>बणिक>बनिअ>बनिया। इससे हिन्दी में कुछ नए शब्द रूप भी सामने आए मसलन वणिकवृत्ति के लिए बनियागीरी या बनियापन। इन शब्दों में मुहावरों की अर्थवत्ता समायी है और सामान्य कारोबारी प्रवृत्ति का संकेत न होकर इसमें ज़रूरत से ज्यादा हिसाब-किताब करना , नापतौल की वृत्ति अथवा कंजूसी भी शामिल है।

यायावरी, डगर-डगर घूमना, आवारगी आदि भावों को प्रकट करने के लिए हिन्दी-उर्दू में बंजारा शब्द है। इसकी रिश्तेदारी भी पण् से है। पण् से बना वाणिज्य अर्थात व्यापार। इस तरह व्यापार करनेवाले के अर्थ में वणिक के अलावा एक नया शब्द और बना वाणिज्यकारक इस शब्द के बंजारा में ढलने का क्रम कुछ यूं रहा -वाणिज्यकारक > वाणिजारक > वाणिजारा > बणिजारा > बंजारा। प्राचीनकाल में इन वाणिज्यकारकों की भूमिका वणिको से भिन्न थी। वणिक श्रेष्ठिवर्ग में आते थे और वाणिज्यकारक मूलत फुटकर या खेरची कारोबारी थे। रिटेलर की तरह। वाणिज्यकारक भी घूम घूम कर लोगों को उनकी ज़रूरतों का सामान उपलब्ध कराते थे। स्वभाव की भटकन को व्यक्त करने के लिए बंजारापन जैसा शब्द हिन्दी को इसी घुमक्कड़ी वृत्ति ने दिया है। यह परंपरा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में फेरीवालों के रूप में प्रचलित है। सामाजिक परिवर्तनों के तहत धीरे धीरे वाणिज्यकारकों की हैसियत में बदलाव आया। क्रय-विक्रय से हटकर उन्होंने कुछ विशिष्ट कुटीर-कर्मों और कलाओं को अपनाया मगर शैली वही रही घुमक्कड़ी की। इस रूप में बंजारा शब्द को जातिसूचक दर्जा मिल गया। ये बंजारे घूम-घूम कर जादूगरी, नट-नटी के तमाशे(नट-बंजारा), जड़ी-बूटी, झाड-फूंक आदि के कामों लग गए। कहीं कहीं रोज़गार की उपलब्धता में कमी के चलते बंजारों का नैतिक पतन भी हुआ। कुल मिलाकर किसी ज़माने में क्रय-विक्रय के काम में लगा एक आत्मनिर्भर समुदाय आज बंजारा कहलाता है और खानाबदोश विमुक्त जाति का दर्जा पाकर सरकारी रहमोकरम की राह देख रहा है।

पणिक से वणिक और बनिया बनते-बनते हिन्दी को कुछ नए शब्द भी मिले जैसे बनियागीरी या बनियापन।
वियोगी हरि संपादित हमारी परंपरा पुस्तक में शौरिराजन द्रविड़ इतिहास के संदर्भ में पणिज समुदाय की दक्षिण भारत मे उपस्थिति का उल्लेख करते हैं और इस संबंध में क्रय-विक्रय, व्यापारिक वस्तु और एक मुद्रा के लिए पणि, पणम, फणम जैसे शब्दों का हवाला भी देते हैं। तमिल में बिक्री की वस्तु को पण्णियम् कहा जाता है। तमिल, मलयालम और मराठी में प्राचीनकाल में वैश्यों को वाणिकर, वणिकर या वाणि कहा जाता था। पणिकर भी इसी क्रम में आता है। इस उपनाम के लोग मराठी, तमिल और मलयालम भाषी भी होते हैं। पणिकर को पणिक्कर भी लिखा जाता है। प्रख्यात विद्वान डॉ सम्पूर्णानंद पणियों(फिनीशी/प्यूनिक) को पूर्वी भारत का एक जाति समूह बताते हैं जो बाद में पश्चिम के सागर तट से होता हुआ ईरान तक फैल गया। हड़प्पा और सिन्धु घाटी की सभ्यता पर गौर करें तो यह धारणा ज्यादा सटीक लगती है क्योंकि इस सभ्यता का विस्तार सिन्ध के समुद्रतट से लेकर दक्षिण गुजरात के समुद्र तट तक होने के प्रमाण मिले हैं। डॉ भगवतशरण उपाध्याय भी भारतीय संस्कृति के स्रोत पुस्तक में फिनीशियाई लोगों अर्थात फणियों के भारत भूमि पर बसे होने का उल्लेख करते हैं हालांकि वे ये स्पष्ट संकेत नहीं करते कि ये लोग कहां के मूल निवासी थे। आर्य संस्कृति से पश्चिमी जगत को परिचित कराने का श्रेय फिनिशियों को ही दिया जाता है। ये लोग अपने लंबं-चौड़े व्यापारिक कारवां(सार्थवाह) एशियाई देशों से योरप तक ले जाते थे। वाणिज्यकर्म के साथ ही ये लोग विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति के बीज भी अनायास ही छोड़ आते थे।

जो भी हो, पश्चिमी एशिया में और यूरोप के मूमध्यसागरीय क्षेत्र में किसी ज़माने में फिनिशियों (पणियों) की अनेक बस्तियां थीं। कार्थेज उनका केंद्र बन चुका था। यहां के फिनिशियों के लिए प्यूनिक नाम भी प्रचलित रहा है। रोमन साम्राज्य के साथ सदियों तक इन प्यूनिकों का युद्ध चला और अंततः यह समुदाय इतिहास में अपने उद्गम की कई गुत्थियां और अस्तित्व के स्पष्ट संकेत छोड़ते हुए ईसा से एक सदी पहले तक विलीन हो चुका था। इसके बावजूद इन्हें खोजने का काम पुरातत्ववेत्ता आज भी जारी रखे हुए हैं। जीनोग्राफिक तकनीक के जरिये हाल ही में यह पता चला है कि भूमध्यसागरीय क्षेत्र में कई स्थानों पर पर प्राचीन फिनीशियों के कईवंशज विभिन्न समाजों में घुले-मिले हैं। मगर फिनिशियों का भारतीय पणियों से रिश्ता स्थापित करने के लिए इस शोध का दायरा बढ़ाने की ज़रूरत है। फिलहाल तो प्राचीन ग्रंथों के उल्लेख और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के आधार पर देशी-विदेशी विद्वान भारतीय पणियों, प्रकारांतर से फिनिशियों के रिश्ते स्थापित कर ही चुके हैं। इतिहास-पुरातत्व के साथ प्रामाणिकता का द्वन्द्व हमेशा रहा है और इस क्षेत्र में अंतिम सत्य कुछ नहीं होता।

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Friday, January 9, 2009

लेबनान का पंसारी [सिक्का-11]

फिनीशियों ने जहां बसेरा किया वह फिनीशिया कहलाया। इस क्षेत्र को आज के लेबनान के रूप में पहचाना जा सकता है। फिनीशी सभ्यता का असर फलस्तीन, इस्राइल,कार्थेज,सीरिया और जॉर्डन में भी रहा।

जि स तरह से वनस्पतियों के प्रसार के लिए परागण की विधियां सहायक होती हैं उसी तरह भाषा के विस्तार और विकास में भी कई कारक सहायक होते हैं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं व्यापार-व्यवसाय। ईसा से भी कई सदियों पहले से भारत के पश्चिमी दुनिया से खासतौर पर दक्षिण-पूर्वी योरप से कारोबारी रिश्ते थे। इन्हीं रिश्तों की बदौलत विशाल क्षेत्र की भाषा संस्कृति भी समृद्ध होती चली गई। पश्चिमी एशिया में एक भूमध्यसागरीय इलाका जिसे आज लेबनान कहा जाता है , भी फिनीशिया कहलाता था। इस क्षेत्र के फिनीशिया नामकरण के पीछे भी वैदिक काल का एक शब्द पणि या पण झांक रहा है और आज भी हिन्दी में यह पणि अपने बहुरूप में मौजूद है।

प्राचीन भारत(ईसापूर्व)में प्रचलित कार्षापण मुद्रा में भी पण ही झांक रहा है। कर्ष शब्द का अर्थ होता है अंकन करना, उत्कीर्ण करना। पण का उल्लेख वैदिक साहित्य में कारोबार, सामग्री, हिसाब-किताब, व्यापार, क्रय-विक्रय और मुद्रा के अर्थ में आता है। कार्षापण का इस तरह अर्थ हुआ उत्कीर्ण मुद्रा। इससे साफ है कि उत्तर वैदिक काल से लेकर कार्षापण का चलन होने तक पण ही लेन-देन के भुगतान का जरिया थी मगर पण नामक मुद्रा टंकित नहीं थी। धातु के अनघड़ टुकड़ों को ही तब पण कहा जाता रहा होगा। पण से ही निकला पण्य शब्द जिसका अर्थ होता है व्यापारिक सामग्री। हिन्दी-उर्दू में प्रचलित छोटे व्यापारी या दुकानदार के लिए पंसारी शब्द के पीछे भी यही पण्य शब्द है जो बना है पण्य+शाल >पन्नशाल>पंसार के क्रम में। क्रय-विक्रय के अर्थ में विपणन शब्द खूब प्रचलित है गौर करें इसमें झांक रहे पण् शब्द पर। मुंबई के पास पनवेल नामक जगह है जो समुद्र तट पर है। जाहिर है किसी ज़माने में यह सामुद्रिक व्यापार का केन्द्र रहा होगा। पण्य+वेला अर्थात क्रय-विक्रय की जगह के तौर पर इसका नाम पण्यवेला रहा होगा जो घिसते-घिसते पनवेल हो गया।

ईसा से पांच-छह सदी पहले भारतीय उपमहाद्वीप में पण नाम की ताम्बे की मुद्रा प्रचलित थी। पण का रिश्ता वैदिक पणि से जुड़ता है। पणि शब्द वैदिक ग्रंथों में कई बार इस्तेमाल हुआ है जिसका अर्थव्यापारी, कारोबारी के रूप में बताया गया है। किसी ज़माने में पणि समुदाय भारतवर्ष से लेकर पश्चिमी एशिया तक फैला हुआ था। पणि अर्थात व्यापारी, वाणिज्य व्यवसाय करनेवाले लोगों का समूह किस काल में था इसका अनुमान भी वैदिक कालनिर्धारण से ही होता है क्योंकि इस शब्द का उल्लेख वेदों से ही शुरू हुआ है। जर्मन विद्वान विंटरनिट्ज ईसापूर्व 7000 से लेकर 2500 के बीच वैदिक काल मानते हैं मगर ज्यादातर विद्वान इसे 2500-1500 ईपू के बीच ही ऱखते हैं।

विद्वानों का मानना है कि पणियों और आर्यों के बीच महासंग्राम हुआ था जिसके चलते वे भारत के उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों से खदेड़े गए। परास्त पणियों के बड़े जत्थों ने पश्चिम की राह पकड़ी, कुछ बड़े जत्थे दक्षिणापथ की ओर कूच कर गए। शेष समूह इधर-उधर छितरा गए। पश्चिम की ओर बढ़ते जत्थों नें ईरान होते हुए अरब में प्रवेश किया और आज जहां लेबनान है वहां क़याम किया। अनेक भारतीय-पाश्चात्य विद्वानों ने पणियों की पहचान फीनिशियों के रूप में की है। ग्रीक-यूनानी संदर्भों में भी फिनीशियाईलोगों की जबर्दस्त व्यापारिक बुद्धि की खूब चर्चा है। पणि या फिनीशी लोग समुद्रपारीय यात्राओं में पारंगत थे वे महान नाविक थे। गणित ज्योतिष आदि में भी उन्हें दक्षता हासिल थी। किसी ज़माने में भूमध्यसागरीय व्यापार करीब करीब उन्हीं के कब्जे में था। कई सदियों बाद अरब के सौदागरों नें जहाजरानी में अपना दबदबा कायम किया वह दरअसल फिनीशियों की परंपरा पर चल कर ही सीखा। लेबनान, फलस्तीन और इस्राइल का क्षेत्र नृतत्वशास्त्र की दृष्टि से कनान अथवा कैननाइट्स का था। यहूदियों के पुरखे भी कनॉन ही कहलाते हैं। समूची दुनिया में यहूदी भी महान सौदागर कौम के तौर पर ही विख्यात हैं।
पणि या फिनीशी लोग समुद्रपारीय यात्राओं में पारंगत थे वे महान नाविक थे। गणित ज्योतिष आदि में भी उन्हें दक्षता हासिल थी। किसी ज़माने में भूमध्यसागरीय व्यापार करीब करीब उन्हीं के कब्जे में था।

संभव है सिंधु घाटी की सभ्यता के नष्ट होने के पीछे जिस आर्य आक्रमण का उल्लेख किया जाता है वह आर्यों और पणियों के महासंग्राम की शक्ल में सामने आया हो। सिंधु घाटी की सभ्यता व्यापार-व्यवसाय में खूब उन्नत थी। सुदूर सुमेरी सभ्यता से भी उसके रिश्तों के प्रमाण मिले हैं। कई विद्वान उसे द्रविड़ सभ्यता भी मानते हैं। दक्षिण पूर्वी अफ़गानिस्तान के एक हिस्से में ब्राहुई भाषा का द्रविड़ भाषाओं से साम्य यह साबित करता है कि कभी सुदूर उत्तर पश्चिमी भारत में द्रविड़ बस्तिया फल फूल रही थीं। पणि शब्द चाहे हिन्दी में विद्यमान नहीं है मगर द्रविड़ भाषाओं में मुद्रा, धन के अर्थ में फणम्(fanam), पणम् जैसे शब्दों की मौजूदगी से यह पता चलता है कि भारत के उत्तर पश्चिम में पणियों का निवास था। मगर ये सारी अटकलबाजियां ही हैं। कुछ विद्वानों ने तो यादव समुदाय का रिश्ता भी फिनीशियों से जोड़ डाला है। गौरतलब है द्वापर काल में गुजरात के पश्चिमी तट पर यादवों की कई सघन बस्तियां थीं और वे सामुद्रिक गतिविधियों में खूब बढ़े-चढ़े थे। इसके बावजूद खासतौर पर फिनीशियों के भारतीय रिश्तों के बारे में पश्चिमी विद्वान एकमत नहीं हैं। [जारी] पणि और फिनिशियों पर कुछ और चर्चा अगली कड़ी में

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Thursday, January 8, 2009

पति को थप्पड़ मारने की ख्वाहिश [बकलमखुद-83]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के चौदहवें पड़ाव और इक्यासीवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-

ती न माह का थाना प्रभारी के कार्य का अनुभव लेकर मैं वापस विदिशा आ गयी! ये तीन माह का अनुभव मुझे आज भी बहुत काम देता है क्योंकि आज मैं थानेदारों की कठिनाइयों को ,उनकी व्यावहारिक परेशानियों को समझ पाती हूँ और हाँ इसके साथ ही वे कहाँ बदमाशी कर रहे हैं ये भी पकड़ में आ जाता है!

बालाघाट में नक्सली ट्रेनिंग
विदिशा जिले के लटेरी थाने के दिलचस्प अनुभवों से गुजरने के बाद दो माह की नक्सलाईट ट्रेनिंग हुई...इसके लिए हमें बालाघाट जिले में भेजा गया! ये पार्ट मेरी ट्रेनिंग का सबसे रोमांचक था! इसमें हमें अपने सामान और हथियारों के साथ जंगल में रहना पड़ा ! हम लोगों को ६-६ के ग्रुप में बाँट दिया गया था! एक बार रात को जंगल में सोते समय तेज़ बारिश शुरू हो गयी थी! हम लोगों के पास बरसात से बचने के लिए कोई इंतजाम नहीं था! जिस चटाई को बिछाकर सोये थे....उसी को सर पर ओढ़ लिया! लेकिन आधे घंटे में ही हम चटाई सहित पानी में तर बतर हो चुके थे! चारों तरफ कीचड ही कीचड! पानी में भीगकर हमारा सामान भी भारी हो गया था!और अब हमारे पास बदलकर पहनने को सूखे कपडे भी नहीं थे! और वहाँ से हमारा रेस्ट हाउस करीब पचास किलोमीटर दूर था...और जाने के लिए कोई साधन नहीं! हम सभी पैदल ही चल रहे थे! भीगे हुए हम सब आगे एक गाँव में पहुंचे! वहाँ आग जलाकर अपने कपडे सुखाये!इसके बाद गाँव के ही सरपंच ने गरम गरम मोटी रोटियाँ और आलू की सब्जी खिलाई! हम इतने भूखे थे की न जाने कितनी रोटियाँ खा गए! अब तक शाम हो चुकी थी!

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है...
दोबारा चलना शुरू किया! इस बार रास्ता बहुत खूबसूरत था....छोटे छोटे झरने, जानवर और चारों तरफ हरियाली ! पिछली रात के सारे कष्ट हम भूल चुके थे! तीन घंटे चलने के बाद अँधेरा हो गया और ये रात हमने एक किसान के भूसे से भरे हुए कमरे में काटी! हम इतने थके हुए थे कि भूसे पर लेटते ही कब नींद आई पता ही नहीं चला! कभी कभी सोचती हूँ कि हम लोग इतने आराम तलब हो गए हैं कि घर पर रहते हुए छोटी छोटी परेशानियों से खीजने लगते हैं! बिजली चली जाए या एक दिन आरामदायक बिस्तर न मिले तो नींद नहीं आती! लेकिन जंगल के इस अनुभव से मुझे समझ में आ गया कि एक मजदूर दिन भर थकने के बाद फूटपाथ पर इतनी गहरी नींद कैसे सो लेता है! अब मैंने इन छोटी छोटी बातों से परेशान होना छोड़ दिया है! वैसे सच कहूं तो इस ट्रिप से मुझे थकने के बहुत सारे फायदे समझ में आये! पहला तो ये कि जब आप कड़ी मेहनत करके थक जाते हो तो बिना किसी शिकवा शिकायत के कहीं भी सो सकते हो! क्योंकि उस वक्त सोना ही पहली ज़रुरत होती है! दूसरा ये कि थकान के बाद आप कभी तनाव में नहीं रह सकते , निरर्थक बातें सोचने के लिए आपके पास दिमागी ताकत भी नहीं बचती है! मैं आज भी जब कभी बोर होती हूँ या जल्दी सोना चाहती हूँ उस दिन लम्बी वाक पर निकल जाती हूँ!

अफ़सरी शुरू...पहली पोस्टिंग घर पर...
अब ट्रेनिंग पूरी हो चुकी थी! इसके बाद पहली पोस्टिंग मेरी शिवपुरी की बटालियन में हुई! चूंकि शिवपुरी मेरा घर भी है तो मुझे तो मज़ा आ गया! एक साल तक घर में रहकर नौकरी की! ड्रायविंग मैंने यहीं रहकर सीखी! और ड्रायविंग सीखने के दौरान ही मैं इतने उत्साह में आ गयी थी कि शिवपुरी से भोपाल मुझे किसी काम से जाना था ! तो पूरे तीन सौ किलोमीटर गाडी मैंने अकेले चलाई! और मेरी स्पीड ८० से कम नहीं थी! यहाँ तक की टर्निंग पर भी मैं स्पीड कम नहीं करती थी! ड्रायवर बेचारा पीछे बैठा भगवान् को याद कर रहा था! बाद में जब गाडी अच्छे से चलाना आ गया तो मुझे महसूस हुआ कि उस दिन मैंने कितनी खतरनाक ड्रायविंग की थी! और शायद ड्रायवर के भगवान को याद करने से ही हम बचे थे! सचमुच अति उत्साह भी कोई अच्छी चीज़ नहीं है!

लटेरी थाने में ट्रेनिंग के बाद अगला पड़ाव था बालाघाट जिले में नक्सली इलाके में ट्रेनिंग का। नीचे चित्र में साथियों के साथ जंगल कैम्प के दौरान कुछ हल्के फुल्के क्षण ट्रेनिंग के दौरान ही हमने कान्हा-कीसली नेशनल पार्क घूमने का मौका भी नहीं छोड़ा

ग्वालियर में जिंदगी के तजुर्बात
एक साल घर पर रहकर नौकरी करने के बाद मेरा ट्रांसफर ग्वालियर हो गया! अब असली फील्ड का काम था! वहाँ जाकर मुझे एस.डी.ओ.पी. बेहट पोस्टिंग मिली! बेहट ग्वालियर का एक सब डिविज़न है! और तानसेन का जन्मस्थान भी! वहाँ की सबसे अच्छी बात ये थी की मेरा हैड क्वार्टर ग्वालियर ही था! इसलिए देहात की नौकरी होने के बाद भी शहर में ही रहने को मिल गया था! यहाँ मैं चार देहात के थाने देखने के साथ शहर का महिला थाना भी देख रही थी! एक साल बाद मेरा ट्रांसफर सी.एस.पी. ग्वालियर के रूप में हो गया! ग्वालियर की साढ़े तीन साल की नौकरी के दौरान दुनिया के बारे में इतना कुछ जानने को मिला कि शायद जीवन के इतने रंग तो मैंने अपनी पूरी जिंदगी में नहीं देखे थे! मुझे महसूस हुआ कि दुनिया न तो इतनी खूबसूरत है जितना हम सोचते हैं और न ही इतनी बदसूरत कि हम इससे नफरत करें! जहां एक और अच्छाई बिखरी पड़ी है वहीं बुराई की दलदल भी दूर दूर तक दिखाई देती है! जहां एक ओर मैंने अपने भाई को सजा से बचाने के लिए खुद पर अपराध की जिम्मेदारी लेते हुए एक इंसान को देखा तो वहीं दूसरी और पिता को अपनी सात साल की बेटी का बलात्कार करते भी देखा!जहां एक ओर देखा कि एक माँ खुद पुलिस के पास चलकर आती है और अपने चोर बच्चे को आंसू भरी आँखों से पुलिस के हवाले करती है वहीं देखा कि एक पत्नी अपने पति की हत्या करके अपने ही घर में गाड़ देती है और बिना किसी अपराध बोध के उसी घर में रहती है! ऐसे कई अनुभव हैं जिन्हें पूरा का पूरा तो लिख पाना संभव नहीं है लेकिन फिर भी कुछ ख़ास अनुभव तो मैं सभी के साथ शेयर करना ही चाहूंगी!

चांटे से बुद्धि की शुद्धिकरण !!
मैं महिला थाना देखने के साथ ग्वालियर के तीन परिवार परामर्श केन्द्रों का सुपरविज़न करती थी! इसके पहले तक मैं सोचती थी की गरीब और अशिक्षित तबके की औरतें ही घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं लेकिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब मैंने देखा की ये समस्या पढ़े लिखे और अमीर परिवारों में भी उतनी ही है! नौकरीपेशा महिलायें भी दहेज़ और ससुराल वालों के अत्याचार जैसी दिक्कतों का सामना कर रही हैं! एक बार मेरे पास एक पति पत्नी आये! पत्नी ने रोते हुए बताया की उसका पति उसे रोज़ पीटता है!पति ने भी गर्व से स्वीकार किया कि वह उसे पीटता है! पति का कहना था कि पत्नी अगर गलती करे तो पति को पीटने का अधिकार है! पत्नी उससे अलग होना चाहती थी! उसने थाने में खड़े होकर डरते डरते मुझसे एक फेवर माँगा! वह एक बार अपने पति को एक चांटा मारना चाहती थी! सालों से जो वो रोज़ पिटती चली आ रही थी...अलग होने के पहले वह पति को भी उस जिल्लत का एहसास दिलाना चाहती थी! मैंने उसे इजाज़त दे दी...! उसने पूरी ताकत से अपने पति को ज़ोरदार तमाचा रसीद किया! पति अपमानित होकर हक्का बक्का देखता रह गया! चूंकि थाने में खडा था इसलिए कुछ कह नहीं सकता था! खैर उस वक्त दोनों चले गए! एक महीने बाद दोनों एक साथ ख़ुशी ख़ुशी मेरे पास आये! पति ने पत्नी को मारना बंद कर दिया था! चांटा खाकर उसकी बुद्धि शुद्ध हो गयी थी! कभी कभी व्यक्ति को अपने किये गए जुल्म का एहसास नहीं होता, जब तक कि उसके साथ भी वैसा ही व्यवहार किया जाए!

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Monday, January 5, 2009

सिक्का-कहीं ढला, कहीं चला [सिक्का-1]

जेम्स द्वितीय के ज़माने की ब्रिटिश गिन्नी


देखा जाए तो अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है
फुटकर मुद्रा या छुट्टे पैसों के लिए सिक्के से बेहतर हिन्दी उर्दू में कोई शब्द नहीं है। दोनों ही भाषाओं में मुहावरे के तौर पर भी इसका प्रयोग होता है जिसका अर्थ हुआ धाक या प्रभाव पड़ना। मूल रूप से ये लफ्ज अरबी का है मगर हिन्दी में सिक्के के अर्थ में अग्रेजी से आया। हिन्दी में फकत ढाई अक्षर के इस शब्द के आगे पीछे कभी कई सारे अक्षर भी रहे हैं।
अरबी मे मुद्रा की ढलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले धातु के छापे या डाई को सिक्कः (सिक्काह) कहा जाता है जिसका मतलब होता है रूपया-पैसा, मुद्रा,मुहर आदि । इसके दीगर मायनों में छाप, रोब, तरीका-तर्ज़ आदि भाव भी शामिल हैं इसीलिए हिन्दी-उर्दू में सिक्का जमाना या सिक्का चलाना जैसे मुहावरे इन्ही अर्थों में इस्तेमाल होते रहे हैं। पुराने ज़माने में भी असली और नकली मुद्रा का चलन था। मुग़लकाल में सिक्कए-कासिद यानी खोटा सिक्का और सिक्कए-राइज़ यानी असली सिक्का जैसे शब्द चलन में थे। अरबों ने जब भूमध्य सागरीय इलाके में अपना रौब जमाया और स्पेन को जीत लिया तो यह शब्द स्पेनिश भाषा में भी जेक्का के रूप में चला आया। जेक्का का ही एक अन्य रूप सेक्का भी यहां प्रचलित रहा है। मगर वहां इसका अर्थ हो गया टकसाल, जहां मुद्रा की ढलाई होती है। अब इस जेक्का यानी टकसाल में जब मुद्रा की ढलाई हुई तो उसे बजाय कोई और नाम मिलने के शोहरत मिली जेचिनो के नाम से । जेचिनो तेरहवीं सदी के आसपास सिक्विन शब्द के रूप में ब्रिटेन में स्वर्ण मुद्रा बनकर प्रकट हुआ।

पंद्रहवीं सदी के आसपास अंग्रेजों के ही साथ ये चिकिन या चिक बनकर एक और नए रूप में हिन्दुस्तान आ गया जिसकी हैसियत तब चार रूपए के बराबर थी।

किस्से कहानियों में अशरफी, मोहर जितना जिक्र ही गिन्नी का भी है। गिन्नी ब्रिटिश स्वर्णमुद्रा थी और इसका उच्चारण था गिनी। हिन्दुस्तान के सर्राफा व्यापार की शब्दावली में सोने के भावों के संदर्भ में गिन्नी का उल्लेख आए दिन होता है

यही चिक तब सिक्का कहलाया जब इसे मुगलों ने चांदी में ढालना शुरू किया। आज ब्रिटेन में सिक्विन नाम की स्वर्णमुद्रा तो नहीं चलती मगर सिक्विन शब्द बदले हुए अर्थ में डटा हुआ है। महिलाओं के वस्त्रों में टांके जाने वाले सलमे-सितारों जैसी चमकीली सजावटी सामग्री सिक्विन के दायरे में आती है। जाहिर सी बात है कि सजाने से किसी भी चीज़ की कीमत बढ़ जाती है। यह भाव स्वर्णमुद्रा की कीमत और उसकी चमक दोनों से जुड़ रहा है। देखा जाए तो अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है।

एक अन्य स्वर्णमुद्रा थी गिन्नी जिसका चलन मुग़लकाल और अंग्रेजीराज में था। दरअसल गिन्नी का सही उच्चारण है गिनी जो कि उर्दू-हिन्दी में बतौर गिन्नी कहीं ज्यादा प्रचलित है। मध्यकाल में अर्थात करीब 1560 के आसपास ब्रिटेन में गिनी स्वर्णमुद्रा शुरू हुई। इसे यह नाम इसलिए मिला क्योंकि अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित गिनी नाम के एक प्रदेश से व्यापार के उद्धेश्य से ब्रिटिश सरकार ने इसे शुरू किया था। गौरतलब है कि सत्रहवीं सदी में पश्चिमी अफ्रीका के इस क्षेत्र पर यूरोपीय देशों की निगाह पड़ी। अर्से तक यह प्रदेश पुर्तगाल और फ्रांस का उपनिवेश बना रहा। गिनी को अब एक स्वतंत्र देश का दर्जा प्राप्त है। गिनी का इस क्षेत्र की स्थानीय बोली में अर्थ होता है अश्वेत व्यक्ति। आस्ट्रेलिया के उत्तर में प्रशांत महासागर में एक द्वीप समूह है न्यूगिनी जिसके साथ लगा गिनी नाम भी अफ्रीकी गिनी की ही देने है। इस द्वीप का पुराना नाम था पापुआ। मलय भाषा परिवार के इस शब्द का अर्थ होता है घुंघराले बाल। स्पेनियों ने इस द्वीप को ये नाम यहां के मूल निवासियों को इसी विशेषता के चलते दिया। दिलचस्प है कि अफ्रीकी गिनी का नाम भी उसके मूलनिवासियों के रंग के आधार पर पड़ा था। इस द्वीप का पश्चिमी हिस्सा इंडोनेशिया का हिस्सा है जबकि पूर्वी हिस्सा पापुआ न्यूगिनी कहलाता है और स्वतंत्र देश है।
संशोधित पुनर्प्रस्तुति

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दो टके का आदमी... [सिक्का-10]


तिब्बती टङ्का
बांग्लादेशी टका
...टंकण में निहित उत्कीर्ण करने का भाव ही मुद्रा के तौर पर टका या टंका नाम में उजागर हो रहा...
ट का सा जवाब, टांग खींचना या टांग अड़ाना जैसे मुहावरे आमतौर पर बोलचाल की हिन्दी में प्रचलित हैं। इन मुहावरों में टका और टांग जैसे शब्द संस्कृत के मूल शब्द टङ्कः (टंक:) से बने हैं। संस्कृत में टङ्कः का अर्थ है बांधना, छीलना , जोड़ना, कुरेदना या तराशना। हिन्दी के टंकण या टांकना जैसे शब्द भी इससे ही निकले है। दरअसल टका या टंका शब्द का मतलब है चार माशे का एक तौल या इसी वजन का चांदी का सिक्का। अंग्रेजों के जमाने में भारत में दो पैसे के सिक्के को टका कहते थे। आधा छंटाक की तौल भी टका ही कहलाती थी। पुराने जमाने में मुद्रा को ढालने की तरकीब ईजाद नहीं हुई थी तब धातु के टुकड़ों पर सरकारी चिह्न की खुदाई यानी टंकण किया जाता था।

गौरतलब है कि दुनियाभर में ढलाई के जरिये सिक्के बनाने की ईजाद लीडिया के मशहूर शासक ( ईपू करीब छह सदी) क्रोशस उर्फ कारूँ ( खजानेवाला ) ने की थी। टका या टंका किसी जमाने में भारत में प्रचलित था मगर अब मुद्रा के रूप में इसका प्रयोग नहीं होता। कहावतों-मुहावरों में यह जरूर इस्तेमाल किया जाता है। किसी बात के जवाब में दो टूक यानी सिर्फ दो लफ्जों मे साफ इन्कार करने के लिए यह कहावत चल पडी - टका सा जवाब। टके की दो पैसा की कीमत को लेकर और भी कई कहावतों ने जन्म लिया। मसलन -(1)टका सा मुंह लेकर रह जाना (2)टके को न पूछना (3)टके-टके को मोहताज होना(४) टके-टके के लिए तरसना (5)टका पास न होना,(6)दो कौड़ी का की तर्ज पर दो टके का...वगैरह-वगैरह। भारत में चाहे टके को अब कोई टके सेर भी नहीं पूछता मगर बांग्लादेश की सरकारी मुद्रा के रूप में टका आज भी डटा हुआ है। बांग्लादेश के अलावा भी कई देशों में यह लफ्ज तमगा, तंका, तेंगे या

कजाक़िस्तान का तेंगसे

तंगा Tenga के नाम से चल रहा है जैसे ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, तिब्बत (टङ्का) और मंगोलिया। इन सभी देशों में यह मुद्रा के रूप में ही है। हालांकि वहां इस शब्द की उत्पत्ति चीनी शब्द तेंगसे से मानी जाती है जिसका अर्थ होता है मुद्रित सिक्का और एक तरह की माप या संतुलन। अर्थ की समानता से जाहिर है कि तेंगसे शब्द भी टङ्कः का ही रूप है। टंका से ही चला टकसाल शब्द अर्थात टंकणशाला यानी जहां सिक्कों की ढला होती है।

अब आते हैं टङ्कः के दूसरे अर्थों पर । इसका एक मतलब होता है लात या पैर। संस्कृत में इसके लिए टङ्गा शब्द भी हैं। हिन्दी का टांग शब्द इसी से बना है। गौर करें टङ्कः के जोड़ वाले अर्थ पर । चूंकि टांग में घुटना और ऐडी जैसे जोड़ होते हैं इसलिए इसे कहा गया टांग। इसी अर्थ से जुड़ता है इससे बना शब्द टखना । जाहिर जोड़ या संधि की वजह से ही इसे ये अर्थ मिला होगा। इसी तरह देखें तो पता चलता है कि वस्त्र फट जाने पर , गहना टूट जाने पर , बर्तन में छेद हो जाने पर उसे टांका लगाकर फिर कामचलाऊ बनानेका प्रचलन रहा है। यह जो टांका है वह भी इस टङ्कः से आ रहा है अर्थात इसमें जोड़ का भाव निहित है।

टङ्कः का एक और अर्थ है बांधना। गौर करें कि जोड़ने के लिए बांधने की क्रिया भी सहायक होती है। धनुष की कमान से जो डोरी बंधी होती है उसे खींचने पर एक खास ध्वनि होती है जिसे टंकार कहते हैं। यह टंकार बना है संस्कृत के टङ्कारिन् से जिसका मूल भी टङ्कः है यानी बांधने के अर्थ में। तुर्की भाषा का एक शब्द है तमग़ा जो हिन्दी-उर्दू-फारसी में खूब प्रचलित है यानी ईनाम में दिया जाने वाला पदक या शील्ड। प्राचीन समय में चूंकि यह राजा या सुल्तान की तरफ से दिया जाता था इस लिए इस पर शाही मुहर अंकित की जाती थी। इस तरह तमगा का अर्थ हुआ शाही मुहर या राजचिह्न। अब इस शब्द के असली अर्थ पर विचार करें तो साफ होता है कि यह शब्द भी टंकण से जुड़ा हुआ है। [संशोधित पुनर्प्रस्तुति]

मूल पोस्ट पर जो टिप्पणियां आईं थीं वे जस की तस यहां हैं-

विष्णु बैरागी अरे ! वाह, आपने तो 'टके' में कुबेर का खजाना उपलब्‍ध करा दिया ।
उन्मुक्त. अरे यह तो मालुम नहीं था।
आलोक पुराणिक-गहरे पानी पैठ कर लाते हैं आप। इस तरह के शोधपरक कार्य के लिए आपको साधुवाद। शुभकामनाएं।
आभा - इस बजट स्रत्र मे ढाका का टका और ऊपर का खजाना ज्यादा महत्व रखता है, बाकी जानकारी के लिए शुक्रिया सर....
चंद्रकुमार जैन-...टका आज भी डटा हुआ है...कितना रोचक प्रयोग है ! आप डटकर लिखते रहिए और ज्ञानबोध के विस्तृत नभ पर नवीन जानकारियों के नए सितारे टांकते रहिए। यही शुभकामनाएं
महामंत्री-तस्लीम-आपकी शैली बहुत ही लाजवाब है। बहुत-बहुत बधाई।
ममता-पर हम तो कहेंगे लाख टके का है आपका ब्लॉग।
मीनाक्षी-सही में आपकी रोचक शैली है जो रूखे सूखे शब्दों का भी सफर रोचक जानकारी के साथ चल रहा है...




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Saturday, January 3, 2009

मोहर की मुखमुद्रा [सिक्का-8]



मोहर मुग़लकाल में सोने की मुद्रा थी जिसकी कीमत सोलह चांदी के सिक्कों अर्थात सोलह रूपयों के बराबर होती थी।
अ शरफी की ही तरह मोहर/मुहर भी किसी ज़माने में स्वर्ण मुद्रा ही थी। ये अलग बात है कि अशरफी नाम की मुद्रा दरअसल दिनार का ही सुधरा हुआ रूप थी। शब्दकोशों में मुहर को भी स्वर्णमुद्रा के तौर पर अशरफी ही बताया गया है। मुहर का रिश्ता दरअसल छाप, पहचान, प्रमाण से जुड़ा है।

हिन्दी-उर्दू के मोहर/मुहर शब्द का रिश्ता फारसी के मुह्र शब्द से जोड़ा जाता है। इसकी उत्पत्ति हुई है प्राचीन ईरानी अर्थात अवेस्ता के मुध्र शब्द से जिसमें से द की ध्वनि का लोप होने से बचा रह गया ह और इस तरह बना मुह्र जिसका हिन्दी उर्दू रूप होता है मोहर या मुहर। अवेस्ता के मुध्र की संस्कृत के मुद्र/मुद्रा से समानता गौरतलब है। संस्कृत में सिक्के के लिए मुद्रा शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। आज भी आर्थिक शब्दावली में यह लोकप्रिय है और मुद्रास्फीति (मुद्रा-प्रसार या मनी इन्फ्लेशन) के रूप में आए दिन इसका प्रयोग सामने आता है। मुहर के पीछे यही मुद्रा शब्द छुपा है। मुद्रा का अर्थ है छापना, चिह्न अंकित करना आदि। ऐसी अंगूठी जिस पर चिह्न अंकित हो मुद्रिका कहलाती थी। प्राचीनकाल में प्रभावशाली व्यक्ति अपने निर्देशों का पालन कराने के लिए आदेशपत्र के नीचे दस्तखत की जगह पर अंगूठी अर्थात मुद्रिका का निशान लगाते थे। श्रीमान हुक्मरान अंगूठीछाप थे और श्रीहीन हुकुम बजानेवाले थेअंगूठाछाप!!

मुद्राका जन्म मुद् धातु से बताया गया है जिसका अर्थ है भाव मगर मूलतः हर्ष, प्रसन्नता, संतोष आदि ही इसके दायरे में आते हैं। मुद्रा का एक अर्थ हाव-भाव का प्रकटीकरण भी है जो इसी कड़ी का हिस्सा है। इन्हीं हाव-भाव का पत्थरों पर मानवाकृतियों में उत्कीर्णन मुद्रा कहलाया। नाथपंथी-तांत्रिक शब्दावली में भी मुद्रा शब्द का महत्व है जिनका संबंध अंगुलियों के विशिष्ट आध्यात्मिक संकेतों से है। इसी वजह से मुद्रा का एक अर्थ रहस्य भी है। नृत्य में अंगुलियों और हाथों की मुद्राओं में इन्हें बखूबी समझा जा सकता है। गौरतलब है कि नृत्य अपने प्राचीन रूप में ईश्वर आराधना की शैली ही रही है। बतौर मुहर, इन तमाम भावार्थों की व्याख्या यही है कि शासकीय या अन्य सांस्थानिक दस्तावेजों पर अंकित आधिकारिक-प्रामाणिक निशान या चिह्न को ही मुद्रा कहते हैं।

मुद्रा अथवा मुहर की एक अन्य व्युत्पत्ति भी बताई जाती है। पाश्चात्य पुरातत्विदों और भाषाशास्त्रियों के मुताबिक पत्थरों पर अब तक जो सबसे प्राचीन अंकन मिला है, वह सुमेरी सभ्यता (प्राचीन इराक में दजला फरात के दोआब में पनपी ईसा से

प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता की एक मुद्रा

भी आठ से दस सदी पूर्व की सभ्यता) का है। दरअसल अंकन विद्या का ज्ञान सुमेरियों ने ही विश्व को दिया। राजकीय चिह्न को उत्कीर्ण करने के लिए प्राचीन सुमेरी चित्रलिपि में मुसुरू शब्द पढ़ा गया है। सुमेरी चित्रलिपि कीलाक्षर लिपि कहलाती है जो पत्थरों पर उत्कीर्ण की जाती थी। मुसुरू शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है मु अर्थात नाम, परिचय तथा सर यानी लिखना। जाहिर है तात्पर्य पत्थरों पर विरुदावली के बखान से ही है जो प्राचीनकाल से लेकर अब तक सभी प्रभावशाली हस्तियों का प्रमुख शग़ल रहा है। इसी मुसुरू ने प्राचीन ईरानी में मुध्र का रूप लिया जो संस्कृत में मुद्रा के रूप में दाखिल हुआ। रूपए-पैसे के लिए भी मुद्रा शब्द का प्रयोग इसी वजह से हुआ क्योंकि सिक्कों पर शासकीय चिह्न ही अंकित रहता है जो मुद्रा कहलाती है। चेहरे के हाव-भाव के लिए मुखमुद्रा जैसा शब्द खूब चलता है।

मुद्रा का परिचय चिह्न और अंकन के रूप व्यापक प्रयोग होता है। रूपए-पैसे, करंसी के तौर पर तो मुद्रा शब्द का प्रयोग होता ही है, छपाई के लिए इससे ही बना मुद्रण शब्द प्रचलित है। छापने वाले के लिए मुद्रक शब्द भी बना लिया गया। मुद्रणालय, मुद्रांकन, मौद्रिक, मुद्रांकित इसी कड़ी के अन्य शब्द हैं जो इस्तेमाल किए जा रहे हैं। मोहर का प्रयोग भी अब शासकीय या संस्थागत सील, ठप्पा, छापा, चिह्न, ही ज्यादा प्रचलित है। चिह्न के तौर पर होता है। वस्तु या व्यक्ति पर किसी के प्रभाव या छाप का उल्लेख करने के लिए भी मोहर लगना जैसे वाक्य का मुहावरेदार प्रयोग किया जाता है। मोहर का ठप्पा इतना प्रभावकारी था की लोगों ने पहचान चिह्न से भी ऊपर व्यक्तिनाम के तौर पर भी उसका इस्तेमाल शुरू कर दिया और मोहर बन गई मोहरसिंह।

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Friday, January 2, 2009

चवन्नीछाप और सोलह आना सच [सिक्का-7]

...आना-पाई की व्यवस्था खत्म हो चुकी है मगर सच की चमक अब भी मुहावरा बनकर सोलह आना में झलक रही है...
स च की कीमत क्या सोलह आने हो सकती है? ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि सोलह आने सच वाला मुहावरा कह रहा है। सच तो सच है, उसकी कीमत कैसे हो सकती है! लेकिन मुहावरा अपनी जगह सही है और इसका मतलब यही है कि सच , सिर्फ सच होता है, सौ फीसद सच ही असली सच है। वैसे ज्ञानी अर्धसत्य का अस्तित्व भी बताते हैं। हमारे आस-पास आमतौर पर ज्यादातर मामलों में आध सच या आधा झूठ ही सामने आ पाता है। अर्धसत्य वाली बात महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर की प्रसिद्ध उक्तिशैली से प्रसिद्ध हुई जिसे उन्होंने द्रोणाचार्य के सम्मुख कहा-‘अश्वत्थामा हतः ’ इसे अपने पुत्र के अवसान का समाचार समझ कर द्रोणाचार्य ने भी प्राण त्याग दिए। धर्मराज ने अश्वत्थामा नाम के हाथी का उल्लेख किया था मगर सत्य को ऊंचे सुर में नहीं उच्चारा और पांडवों की रणनीति को इस तरह लाभ पहुंचाया । इस तरह अर्धसत्य की कूटनीति को धर्मनीति के रूप में मान्यता मिल गई।

जहां तक सोलह आना सच वाले मुहावरे का सवाल है, यह सौ फीसद खरी सचाई की बात ही करता है। विभिन्न मुद्राओं के मूल्य के आधार पर भाषा मुहावरों से समृद्ध होती रही है, यह मुहावरा भी उनमेंसे एक है। इसका रिश्ता भी आना नाम की एक प्राचीन मुद्रा से है जो मुगल काल और अंग्रेजीकाल में भी जारी रही। आना शब्द बना है संस्कृत के अणकः या आणव से जिसका अर्थ होता है तांबे का एक छोटा सिक्का। इसी का अपभ्रंश रूप है आना। अणकः का जन्म हुआ संस्कृत के अण् धातु से जिसका अर्थ होता है अत्यंत तुच्छ, सूक्ष्म, नगण्य छोटा इत्यादि। सृष्टि के सर्वाधिक सूक्ष्म पदार्थ के लिए अणु शब्द भी इसी मूल से जन्मा है जिसके मायने हैं सबसे छोटा अंश, विभाग, कालांश। अणु से भी छोटे कण के लिए परम उपसर्ग लगा कर परमाणु शब्द बनाया गया। सूई की नोक के लिए अनी शब्द भी संस्कृत केअणिः से बना है जो इसी कड़ी का हिस्सा है और सूक्ष्मता दर्शाता है। पृथ्वी पर अंतरिक्ष से निरंतर धूलकणों की वर्षा हो रही है। यह धूल एस्टीरायड्स अर्थात क्षुद्रग्रहों के वायुमंडल में प्रवेश के बाद घर्षण की वजह से जलने से उत्पन्न होती है। धूलकणों के लिए अत्यंत प्राचीन शब्द है रेणु । यह बना है री+अणु से। अर्थात निरंतर गिरते रहनेवाले कण। रेणु का एक अन्य अर्थ होता है

...छोटी मुद्रा के लिए आना शब्द संस्कृत की अण् धातु से जन्मा है जिसका अर्थ होता है अत्यंत तुच्छ, सूक्ष्म, नगण्य और छोटा...अणु इसी मूल से जन्मा है...

पुष्पकण , परागकण, पुष्परज अथवा पुष्पधुलि। जमदग्नि ऋषि की पत्नी और परशुराम की माता का नाम रेणुका था जो इसी मूल का है। यह बना है रेणुकः से । विभिन्न स्रोत रेणुका के कई अर्थ बताते हैं जिसके मुताबिक इसका अर्थ है पृथ्वी, धुलिकण, एक जीवनरक्षक ओषधि और मटर की फली । अण् से बने आना शब्द की रिश्तेदारियां काफी महत्वपूर्ण हैं।

एक आना का मूल्य चार पैसों के बराबर होता था। इस तरह से मुगलों और अंग्रेजी शासन में भी इकन्नी, दुअन्नी जैसी मुद्राएं प्रचलित थीं। चार आने अर्थात पच्चीस पैसे का सिक्का हाल के वर्षों तक प्रचलित रहा है। इसे चवन्नी कहा जाता था। इस चवन्नी ने भी मुहावरे में अपनी पैठ बनाई और निकृष्टता, निम्नता, घटियापन के रूप में चवन्नीछाप, चवन्ना, चवन्निया जैसे शब्द बन गए जो मुहावरे की अर्थवत्ता रखते हैं। लोग लंपट,बदमाश आदि को भी इसी रुतबे से नवाज़ने लगे है। चवन्नीछाप को आजकल अंग्रेजी में बतौर चवन्नीचैप दाखिला मिल चुका है। हिन्दी का छाप शब्द चवन्नी के साथ जुड़कर जो प्रभाव पैदा कर रहा है वहीं अंग्रेजी का चैप भी कर रहा है। यह मुहावरे में रचनात्मक बदलाव है मगर अर्थवत्ता वही है। अंग्रेजी का चैप शब्द बना है चीप से जिसे हिन्दी में सस्ता, निकृष्ट, घटिया,तुच्छ, साधारण या निकम्मा के अर्थ में समझा जाता है। यूं इस शब्द में ग्राहक, मोल-भाव करना, तोल- मोल करना, ऊंच-नीच आदि भाव हैं। उचित मू्ल्य पर खरीदारी के अर्थ में प्रचलित हुए इस शब्द के साथ सौदेबाजी के रूप में साथ जुड़ा नकारात्मक भाव ही चीप शब्द को ले बैठा।

चवन्नी की तरह अठन्नी शब्द भी प्रचलित हुआ। यह बना आठआना से। गौरतलब है कि पुराने जमाने में चौंसठ पैसे का रुपया होता था। इस तरह सोलह आने अर्थात एक रूपया यानी चांदी का सिक्का बनता। सच के संदर्भ में सोलह आने का सौ फीसद सच का भाव यहां पूरी तरह स्पष्ट हो रहा है। अंग्रेजी राज में बाद जब मौद्रिक व्यवस्था में दाशमिक प्रणाली को अपनाया गया तो आना छह पैसे का हो गया और सोलह आने तब भी एक रूपया ही बने रहे और चवन्नी-अठन्नी का महत्व बना रहा। आजादी के बाद आना-पाई की व्यवस्था समाप्त हुई और आना का चलन भी खत्म हुआ मगर सच की चमक सोलह आना वाले मुहावरे में आज भी नजर आ रही है।

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