Tuesday, September 21, 2010

एक किस्म की कट्टरता है शुद्धतावाद [बाज़ारवाद-2]

रा ष्ट्रभाषा या मातृभाषा के अस्तित्व पर मंडराते खतरों के मद्देनज़र अक्सर लोग भावुक होकर बातें करते हैं। शुद्धतावाद एक किस्म की कट्टरता है जो भाषा के विकास में रुकावट डालती है। दरअसल समाज में भाषा दो स्तरों पर प्रचलित रहती है। पहली है वह भाषा जो बोली जाती है और दूसरी है वह भाषा जो लिखी जाती है। इसे बोलचाल की भाषा और साहित्य की भाषा भी कहा जा सकता है। बोलचाल की भाषा को कई तत्व प्रभावित करते हैं। लोकव्यवहार में आया बदलाव शब्दों के बरते जाने की प्रवृत्ति में साफ़ नज़र आता है और यह भाषा को एक नया संस्कार देता है। संस्कृत की बुध् धातु में ज्ञान, प्रकाश, चमक जैसे भाव हैं। बुद्धि, बुद्ध जैसे शब्दों के मूल में यही बुध् धातु है। भारत से लेकर समूचे मध्यएशिया में बुद्ध की इतनी प्रतिमाएं बनीं कि फारसी में जाकर बुद्ध का उच्चारण बुत हो गया और मतलब हुआ प्रतिमा। जाहिर है संस्कृत का बुद्ध फारसी का बुत बनकर एक नए अर्थ में फिर भारतीय भाषाओं में लौट आया। एक ही शब्द से दो शब्द बनने, उनकी अर्थवत्ता बदलने की वजह से भाषा के समृद्ध होते जाने की ऐसी अनगिनत मिसालें ढूंढी जा सकती हैं। इस संदर्भ में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा बनाया गया वनस्पति घी डालडा भारत में, खासतौर पर हिन्दी पट्टी में इतना लोकप्रिय हुआ कि डालडा का अर्थ ही वनस्पति घी हो गया। हिन्दी के लगातार विकसित होते जाने में बाज़ार की भूमिका के ये कुछ उदाहरण हैं।

जिस तरह से कठोर खुरदुरी चट्टानों को भी पानी चिकना बना देता है ताकि उस पर सुगमता से गुजर सके उसी तरह सदियों तक अलग अलग समाजों के बीच भाषा विकसित होती है। किसी शब्द में दिक्कत होते ही, ध्वनितंत्र अपनी जैविक सीमाओं में शब्दों के उच्चारणों को अनुकूल बना लेता है। स्कूल-इस्कूल, लैन्टर्न-लालटेन, एग्रीमेंट-गिरमिट, गैसलाईट-घासलेट, ऊं नमो सिद्धम्-ओनामासीधम, सिनेमा-सलीमा, प्लाटून-पलटन, बल्ब-बलब-बलप-गुलुप, लैफ्टीनेंट-लपटन जैसे अनेक शब्द हैं जो एक भाषा से दूसरी में गए और फिर उस जब़ान में अलग ही रूप में जगह बनाई। कई शब्द हैं जिनका उच्चारण दूसरी भाषा के ध्वनितंत्र के अनुकूल रहा और उनके उच्चारण में बहुत ज्यादा अंतर नहीं आया। ध्यान रहे शब्दों की अर्थवत्ता और उनके उच्चारणों में बदलाव की प्रक्रिया दुतरफा रहती है। आमतौर पर शासक वर्ग की भाषा किसी क्षेत्र की लोकप्रचलित भाषा को तो प्रभावित करती ही है मगर इसके साथ शासक वर्ग की भाषा भी उसके प्रभाव से अछूती नहीं रहती। अंग्रेजी, फारसी यूं तो इंडो-यूरोपीय परिवार की भाषाएं हैं इसलिए उसकी शब्दावली में अर्थसाम्य और ध्वनिसाम्य नज़र आता है। इसके बावजूद हिन्दी अथवा द्रविड़ भाषाओं के शब्दों को भी अंग्रेजी ने अपनाया है जैसे नमस्कार, गुरु आदि। इसके अलावा भी कुछ शब्द ऐसे हैं जिनकी अर्थवत्ता और उच्चारण अंग्रेजी में जाकर सर्वथा बदल गया जैसे जैगरनॉट। खुरदुरा सा लगनेवाला यह शब्द मूलतः हिन्दी का है। आप गौर करें यह अंग्रेजी भाषा के ध्वनितंत्र के मुताबिक हुआ है इसलिए हमें खुरदुरा लगता है। उड़ीसा का भव्य जगन्नाथ मंदिर और विशाल रथ अंग्रेजी में जैगरनॉट हो गया। शुरुआती दौर में जगन्नाथ के विशाल रथ में निहित शक्ति जैगरनॉट की अर्थवत्ता में स्थापित हुई उसके बाद जैगरनॉट में हर वह वस्तु समा गई जिसमें प्रलयकारी, प्रभावकारी बल है। एक हॉलीवुड फिल्म के दैत्याकार पात्र का नाम भी जैगरनॉट है। जगन्नाथ को जैगरनॉट ही होना था और जयकिशन की नियति जैक्सन होने में ही है। हालांकि असली जैकसन वहां पहले ही है। दिल्ली, डेल्ही हो जाती है। ये तमाम परिवर्तन आसानी के लिए ही हैं। भाषा का स्वभाव तो बहते पानी जैसा ही है।

याद रहे, विदेशी शब्दों के प्रयोग की दिशा पढ़े लिखे समाज से होकर सामान्य या अनपढ़ समाज की ओर होती है। रेल के इंजन का दैत्याकार रूपवर्णन जब ग्रामीणों आज से करीब दो सदी पहले सुना तब उनकी कल्पना में वह यातायात का साधन न होकर सचमुच का दैत्य ही था। लोकभाषाओं में इंजन के बहुरूप इसलिए नहीं मिलते क्योंकि इस शब्द की ध्वनियां भारतीय भाषाओं के अनुरूप रहीं अलबत्ता अंजन, इंजिन जैसे रूपांतर फिर भी प्रचलित हैं। मालवी, हरियाणवी, पंजाबी में इस इंजन के भीषण रूपाकार को लेकर अनेक लोकगीत रचे गए। इंजन चाले छक-पक, कलेजो धड़के धक-धक, या इंजन की सीटी में म्हारो मन डोले जैसे गीत इसी कतार में हैं। ध्यान रहे इंजन की सीटी में मन डोलने वाली बात में जिया डोलने वाली रुमानियत नहीं बल्की भयभीत होने का ही भाव है। यदि उधर हमारे जगन्नाथ रथ को अंग्रेजी में जैगरनॉट जैसी अर्थवत्ता मिली तो इधर अंग्रेजी का इंजन भी डेढ़ सदी पहले के लोकमानस में भयकारी रूपाकार की तरह छाया हुआ था। इस प्रक्रिया के तहत कई पौराणिक चरित्रों में अलौकिकता का विस्तार होता चला गया। शब्दों के साथ भी यही होता है।

पूरब के अग्निपूजक मग (मागध) पुरोहित जब ईरानियों के अग्निसंस्कारों के लिए पश्चिम की जाने लगे तब मग शब्द के साथ जादू की अर्थवत्ता जुड़ने लगी। उन्हें मागी कहा गया जो अग्निपुरोहित थे। और पश्चिम की तरह यात्रा करते हुए यह मैजिक में तब्दील हुआ जिसका अर्थ जादू था। याद रहे अग्निपूजकों के हवन और आहूति संबंधी संस्कारों में नाटकीयता और अतिरंजना का जो पुट है उससे ही इस शब्द को नई अर्थवत्ता और विस्तार मिला। मराठी, हिन्दी पर फारसी अरबी का प्रभाव और फिर एक अलग उर्दू भाषा के जन्म के पीछे कही न कही राज्यसत्ता का तत्व है। मगर मराठी और हिन्दी कहीं भी फारसी से आक्रान्त नहीं हुई उलट उन्होंने इसे अपने शृंगार का जरिया बना लिया। यह उनकी आन्तरिक ताकत थी। आज भी देवनागरी के जरिये उर्दू का इस्तेमाल करने की ललक से यह साबित होता है।-जारी

इन्हें भी पढ़े-
1.शब्दों की तिजौरी पर ताले की हिमायत...2.शुद्धतावादियों, आंखे खोलो…



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Sunday, September 19, 2010

पुरानी है बाज़ार से भाषा की यारी (बाजारवाद-1)

भा षा संबंधी विमर्शों के दौरान अक्सर अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से प्रदूषित होती हिन्दी के स्वरूप पर फिक्र जताई जाती है। ऐसी फिक्र करनेवाले यह भूल जाते हैं कि बीते बारह सौ साल में कोई वक्त ऐसा नहीं रहा जब इस देश की भाषाओं पर किन्हीं विदेशी भाषाओं का प्रभाव न पड़ा हो। पहले अरबी, फिर फ़ारसी इस मुल्क में सत्ता की भाषा रही मगर हिन्दी तब भी लोक में रची बसी रही। शुद्धतावादियों को अरबी-फारसी का बढ़ता प्रभाव रास नहीं आया मगर लोक मानस अपने स्तर पर इन भाषाओं से अपनी भाषा बोली को अलग संस्कार देता रहा।

ह राज्यसत्ता या धर्म के जोर पर नहीं हुआ बल्कि बाजार की ज़रूरत पर हुआ। उपज के लिए फ़सल शब्द आम हो गया। कोश के लिए ख़ज़ाना शब्द का कोई दूसरा विकल्प हिन्दी में ढूंढने से भी नहीं मिलता। साबुन का कोई विकल्प हिन्दी के पास नहीं है। पुर्तगाली मूल के सैपोन शब्द को अरब सौदागरों ने साबुन बनाया। अरब के शासक इस मुल्क पर तलवार की दम पर इस्लाम थोपते, उससे पेशतर अरबी सौदागर ने हिन्दुस्तानियों को सैपोन को साबुन की शक्ल में एक नई सौग़ात दे दी थी। बात यह है कि बड़ा भाषायी समूह ही किसी भी समाज का प्रभावी समूह होता है। चाहे धर्म और सत्ता जैसे तत्व उसके खिलाफ़ हों।


बीती कई सदियों से अरबी, फ़ारसी, पुर्तगाली, अंग्रेजी के बीच पलती-पनपती हिन्दी इसका प्रमाण है। वजह है इस भाषायी समूह के साथ गाढ़ा रिश्ता बनाने की बाज़ार की पुरज़ोर कोशिश। बाज़ार उस भाषा में संवाद करता है जो जनमानस में पैठी है। बाज़ार के तत्व चूंकि स्थानीय धर्म और सत्ता की सीमाओं से बाहर निकल कर विस्तृत भौगोलिक सामाजिक परिवेश से जुड़ता है इसलिए विभिन्न क्षेत्रों के साथ उसका संवाद होता है। कारोबारी तबका विराट स्तर पर भाषाओं को प्रभावित करता है और यह परिवर्तन राजकाज की भाषा पर कम और लोकभाषाओं या सम्पर्क भाषाओं पर ज्यादा तेज़ी से असर डालता है। हर दौर में समाज बदलता है क्योंकि यह प्रकृति का स्थायी नियम है। भाषा जब समाज से जुड़ती है तब वह धर्म, नस्ल से परे अपने सफ़र पर होती है। यह सफ़र कठिन से आसान की राह चुनता है। हालांकि भाषा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में धर्म और राज्यसत्ता भी हैं मगर भाषा का असली याराना सिर्फ और सिर्फ बाज़ार के साथ है। साहित्य में भाषाएं सांस भर लेती हैं पर उनकी असली चेतनता लोक में प्रचलित बरताव से पता चलती है। प्राचीनकाल से ही कारोबारी समुदायों का योगदान भाषाओं के विकास में रहा है।

ज हम जिस बाजारवाद के नाम का सियापा करते हैं दरअसल यह विकास की प्रक्रिया है। विभिन्न देशों प्रदेशों के बीच कारोबार के दौरान सबसे पहले नए शब्दों से व्यापारी ही परिचित होता है। उसमें संस्कृति भी है, स्थानीय समाज भी है पर सबसे महत्वपूर्ण वह उत्पाद होता है जिससे वह परिचित होता है और फिर उसका कारोबार दूसरे कई इलाकों में करता है। यूं ही बढ़ते हैं शब्द और भाषाएं। जनता-जनार्दन के मुख की भाषा लोकभाषा है। यह लोकभाषा बाढ़ के पानी के समान नियन्त्रण में नहीं आती। भाषाविद् डॉ सुरेश कुमार वर्मा के मुताबिक भाषा बड़ी मौज से सब तरफ़ बहती है और वैयाकरण का अनुशासन का बर्दाश्त नहीं कर पाती। मूल या तत्सम शब्दों से निस्सृत नए शब्दों को कोई लाख भ्रष्ट कहे, किन्तु वास्तव में वे भाषा के निरन्तर परिवर्तनशील बने रहने के परिचायक हैं। परिवर्तन जीवन्तता का प्रतीक है। परिवर्तन प्रकृति का विधायी तत्त्व है, जो उसे सदैव ताजा़, स्फूर्त और सानन्द बनाए रखता है।   


स्लाम की आंधी में अरबीकरण पर जोर देने के बावजूद फारसी को फारसी ही कहा जाता है। शुद्धतावाद के बावजूद सरकारी हिन्दी और संस्कृतनिष्ठता से हटकर बोलचाल की हिन्दी ने अलग अलग इलाकों में अपनी अलग पहचान कायम रखी है। हर दौर में भाषाओं को जिंदा रखने में बाजार की ही भूमिका प्रमुख रही है। मनोरंजन के पैमाने पर साहित्य तो भाषा की एक आज़माईश भर है। समाज, बाजार और भाषा यही त्रिकोण महत्वपूर्ण है। सदियों से बाजार के जरिये ही शब्दों का कारोबार होता आया है जिसने भाषाओं को समृद्ध किया है। लेन-देन में कोई हर्जा नहीं, बल्कि लेन-देन चलता रहे तभी भाषाएं भी चलेंगी।  अगली कड़ी में भी जारी

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Thursday, September 16, 2010

ब्लॉग बोला- सीखो सबक...

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Friday, September 10, 2010

अल्हड़, खिलंदड़ी होती है लोकभाषा…

... इन दिनों मैं शब्दों का सफ़र के पुस्तकाकार रूप की साज-संभार में व्यस्त हूं और  प्रूफरीडिंग कर रहा हूं।  चार वर्षों में पहली बार पिछले दो-तीन महीनों से सफ़र अनियमित चल रहा है। आप सबका आभारी हूं कि इसके बावजूद साथ बने हुए हैं। जल्दी ही सफ़र अपनी पुरानी रफ़्तार पकड़ लेगा।  दीवाली तक इस पुस्तक का पहला खण्ड  आपके हाथों तक पहुंच सकेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। यह आलेख मेरे गुरु, प्रो. सुरेशकुमार वर्मा ने वीणा से प्रवीण और कुश से कुशल पोस्ट में बलजीत बासी की प्रतिक्रिया से प्रेरित होकर लिखा है। बलजीत भाई की संदर्भित शब्दों और विवेचना के बारे में कुछ जिज्ञासा थी। निश्चित ही बलजीत भाई की उर्वर जिज्ञासा का समाधान करने की क्षमता मुझमें नहीं थी। डॉक्टर वर्मा के आलेख ने मेरा काम आसान कर दिया। मैं गौरवान्वित हूं कि सफ़र के लिए उन्होंने स्वतःप्रेरणा से यह आलेख भेजा।  प्रसंगवश बताता चलूं कि सफ़र के पुस्तक रूप की भूमिका गुरुवर ने ही लिखी है।

डॉ. सुरेशकुमार वर्मा
फ़र की पिछली पोस्ट  वीणा से प्रवीण और कुश से कुशल पर बलजीत बासी की दो प्रतिक्रियाओं ने मेरा ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने समध्वनीय शब्दों पर
SKVARMA ख्यात भाषाविद, कहानीकार प्रो. सुरेशकुमार वर्मा मध्यप्रदेश के कई महाविद्यालयों में प्राचार्य रहे। मध्यप्रदेश शासन के उच्चशिक्षा विभाग के संचालक पद पर प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी वहन कीं। कई पुस्तकें लिखीं जिनमें अर्थविज्ञान के क्षेत्र में शोधग्रन्थ हिन्दी अर्थान्तर महत्वपूर्ण है। कहानी संग्रह जंग के बारजे पर काफी चर्चित रहा। 
जिज्ञासा की है। इससे उनकी बहुज्ञता का परिचय मिलता है। समध्वनीय शब्दों के स्रोतों (व्युत्पत्तियों) तक पहुंचना ज़रूरी होता है। `शब्दों के सफ़र´ का यही महत्त्व है कि वहां शब्दों के स्रोतों तक पहुंचकर मूलार्थ और निहितार्थ को प्रासंगिक आयामों के साथ विवेचित किया जाता है। व्युत्पत्तिविज्ञानी श्री अजित ने संस्कृत के वीणा से विकसित प्रवीण आदि शब्दों की विवेचना की है। यह `प्रवीण´ ही `परबीन´ के रूप में देशी भाषाओं में विकसित हो गया है। शब्द के आदि में आये संयुक्ताक्षर का विघटन देशी भाषाओं की सामान्य प्रकृति रही है। अवधी, बुन्देली, ब्रज आदि बोलियों मे संयुक्ताक्षरों को तोड़ कर स्वतन्त्र वर्णों के प्रयोग की प्रवृत्ति आम है जैसे करम, मरम, धरम, शरम, कारज, तीरथ, बरत इत्यादि। उर्दू भी इस सन्दर्भ में असहनशील दिखाई देती है। वहां शब्द के आदि में संयुक्ताक्षर का परहेज़ किया जाता है। इसीलिए `ब्रिटेन´ वहां `बरतानिया´ हो गया है। असल में अरबी लिपि में संयुक्ताक्षर की लिपिपरक अलग पहचान नहीं है। `स्नान´ में सीन और नून वर्णों का स्वतन्त्र प्रयोग होगा,, जिसे `सनान´ पढ़ा जा सकता है। `खयाल´ शब्द में ख़ और ये वर्ण स्वतन्त्र रूप से लिखे जाते हैं। हिन्दी परम्परा में इस शब्द का उच्चारण `ख्याल´ भी हो सकता है। उर्दूवाले प्राण, प्रीति, स्मरण, और ज्योति के लिए परान, पिरीत, सिमरन और जोत का प्रयोग करना चाहेंगे। रही `व´ की `ब´ में बदलने की बात, तो खड़ी बोली को छोड़कर सभी बोलियों की यह बहुत आम प्रवृत्ति रही है। संस्कृत के जिन तत्सम षब्दों में `व´ को प्रयोग हुआ है, वहां बड़े धड़ल्ले से `ब´ कर दिया गया है। कुछ उदाहरण देखें - पूरब , करतब, बरत, बायस, बानी, बाजा, बिन्दु, बेदी आदि। अपवाद हो सकते हैं, किन्तु अपवादों से नियम नहीं टूटते।
श्री बलजीत बासी ने `दाना-बीना´ पद की चर्चा की है। यहां `बीना´ शब्द , संस्कृत के विनयन से उद्भूत है, जिसका मूल क्रियारूप `बीनना´ है। उन्होंने देखने के अर्थ में एक और `बीना´ शब्द का तज़किरा उठाया है। निस्सन्देह यह बरास्ते फ़ारसी उर्दू में आया है। `दूरबीन´ में यही शब्द विराज रहा है। दृष्टि का समानार्थक `बीनाई´ काफ़ी प्रचलित है। `बीना´ शब्द एक और अर्थ का वाचक है। वह अर्थ है बाज़ार। यह `बीना´ शब्द संस्कृत के `पण्य´ से विकसित हुआ है। एक रोचक लोकोक्ति का उल्लेख मुनासिब होगा। मांसाहारियों को मालूम होना चाहिये कि बकरे के शरीर का कौन सा हिस्सा अधिक स्वादिष्ट है। शायद उन्हें प्रशिक्षितकरने के लिए ही लोकपरम्परा में यह लोकोक्ति प्रचलित हुई - चले जाओ बीना, तो ले आओ सीना / न मिले सीना, तो ले आओ पुट /न मिले पुट तो चले आओ उठ। उन्होंने पंजाबी शब्द के `बैण´ का जिक्र किया है। हिन्दी में यही `बैन´ है। यह शब्द संस्कृत वाणी से विकसित हुआ है। हिन्दी की बोलियों में `वचन´ या PP009XX `कथन´ के रूप में `बैन´ शब्द खूब प्रयुक्त हुआ है। `रामचरितमानस´ में राम-वन-गमन के अन्तर्गत गंगा पार करने के प्रसंग में एक सोरठे में इसका प्रयोग हुआ है - `सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे।´
ब कृष्ण जन्माष्टमी का प्रसंग चल रहा है, तो जगन्नासदास रत्नाकर के `उद्धवशतक´ के एक मार्मिक पद को उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं। गोपियां श्रीकृष्ण के प्रेम-रस में पगी थीं। उद्धव उन्हें निर्गुण, निराकार की उपासना के शुश्क उपदेश रूपी पत्थर से घायल करना चाहते हैं। वे दर्पण के दृष्टान्त से अपनी व्यथा को प्रकट करती हैं। यह तथ्य है कि दर्पण जब साबुत रहता है, तो उसमें एक ही छवि प्रतिबिम्बित होती है। दर्पण को जब तोड़ दिया जाता है, तो दर्पण के जितने टुकड़े होते हैं, उसके हर टुकड़े में अलग-अलग उतने ही प्रतिबिम्ब दिखाई देते हैं। गोपियां कहती हैं कि हमारा मन दर्पण के समान है। उसमें कृष्ण का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। कृष्ण के एक ही प्रतिबिम्ब ने हमारी यह दुर्दशा कर रखी है। हे उद्धव, तुम अपने निर्गुण ब्रह्म का वचन (बैन) रूप पत्थर मत चलाओ। तुम्हारे इस पत्थर से हमारा मन-रूपी दर्पण टुकड़े-टुकड़े हो जायगा। मन-रूप दर्पण के जितने टुकड़े होंगे, उतने कृष्ण हमारे मन में बस जायेंगे। एक कृष्ण ने तो हमारी यह दुर्दशा कर रखी है, जब ढेर सारे कृष्ण हमारे मन में बस जायेंगे, तो न जाने हमारी क्या दुर्दशा होगी !
टूकि टूकि जइहै मन मुकुर हमारो हाय/ चूकि ही कठोर बैन पाहन चलावो ना/ एक मनमोहन तो बसि के उजारियौ मोहिं/ हिय में अनेक मनमोहन बसावो ना।
नता-जनार्दन के मुख की भाषा लोकभाषा है। यह लोकभाषा बाढ़ के पानी के समान नियन्त्रण में नहीं आती। बड़ी मौज से सब तरफ़ बहती है और वैयाकरण का अनुशासन का बर्दाश्त नहीं कर पाती। मूल या तत्सम शब्दों से निस्सृत नये शब्दों को कोई लाख भ्रष्ट कहे, किन्तु वास्तव में वे भाषा के निरन्तर परिवर्तनशील बने रहने के परिचायक हैं। परिवर्तन जीवन्तता का प्रतीक है। परिवर्तन प्रकृति का विधायी तत्त्व है, जो उसे सदैव ताजा़, स्फूर्त और सानन्द बनाये रखता है। बकौल जयशंकर प्रसाद - `पुरातनता का यह निर्मोक, सहन कर सकती न प्रकृति पल एक / नित्य नूतनता का आनन्द, किये है परिवर्तन में टेक।´  शब्दों के सफ़र में भाषा के इन्हीं जीवन्त तत्त्वों की व्याख्या और विवेचना की गई है और जब हमसफ़र जीवन्त हों, तो सफ़र तो जीवन्त और हुलासपूर्ण रहेगा ही।

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Thursday, September 2, 2010

कृष्ण की गली में

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वि ष्णु के सर्वाधिक लोकप्रिय नामों में एक नाम कृष्ण भी है। इस शब्द की व्युत्पत्ति कृष् धातु से हुई है जिसमें खींचने का भाव निहित है। आकर्षण, खींचना, खिंचाव, कशिश जैसे शब्द भी इससे ही बने है। कृष धातु से बने कुछ और महत्वपूर्ण शब्द हैं कृषि, किसान, कृषक और आकृष्ट आदि। कृष्ण का एक अर्थ है काला, श्याम, गहरा नीला। इसी तरह काला हिरण भी इसके अर्थों में शामिल है। प्रख्यात संस्कृत विद्वान पांडुरंग राव कृष्ण शब्द की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि नटवर का प्रमुख लक्षण की आकर्षण है। समस्त संसार को वह अपनी ओर खींच लेते हैं। कृष्ण का जन्म रात को हुआ और राम का दिन में। रात सबको अपनी ओर खींच लेती है और दिन सबको अपने अपने काम मे लगा देता है। रात में लोग अपने में लीन हो जाते हैं ,सपनों की नई दुनिया में प्रवेश करते हैं जबकि दिन में लोग बहिर्मुख हो जाते है, बाहर के कामों में लग जाते हैं जिस प्रकार राम और कृष्ण एक दूसरे के पूरक हैं वैसे ही जैसे दिन और रात। कृषि तत्व से भी कृष्ण का संबंध है। भूमि पर कृषि की जाती है और सारी पृथ्वी भगवान के लिए कृष्य अर्थात खेती करने योग्य है। विशाल विश्व को कृष्यभूमि बनाकर विराट् कृष्ण भगवान् अच्छी अच्छी फसलें उगाते हैं। यही कृष्ण का आकर्षण है। कृष् धातु भू की सत्ता की प्रतीक है और ‘न’ निर्वृत्ति का वाचक। सत्ता और निर्वाण के संयोग से ही कृष्ण की उत्पत्ति होती है।

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Tuesday, August 31, 2010

सिक्का-कहीं ढला, कहीं चला

जेम्स द्वितीय के ज़माने की ब्रिटिश गिन्नी




देखा जाए तो अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है


फुटकर मुद्रा या छुट्टे पैसों के लिए सिक्के से बेहतर हिन्दी उर्दू में कोई शब्द नहीं है। दोनों ही भाषाओं में मुहावरे के तौर पर भी इसका प्रयोग होता है जिसका अर्थ हुआ धाक या प्रभाव पड़ना। मूल रूप से ये लफ्ज अरबी का है मगर हिन्दी में सिक्के के अर्थ में अग्रेजी से आया। हिन्दी में फकत ढाई अक्षर के इस शब्द के आगे पीछे कभी कई सारे अक्षर भी रहे हैं।


अरबी मे मुद्रा की ढलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले धातु के छापे या डाई को सिक्कः (सिक्काह) कहा जाता है जिसका मतलब होता है रूपया-पैसा, मुद्रा,मुहर आदि । इसके दीगर मायनों में छाप, रोब, तरीका-तर्ज़ आदि भाव भी शामिल हैं इसीलिए हिन्दी-उर्दू में सिक्का जमाना या सिक्का चलाना जैसे मुहावरे इन्ही अर्थों में इस्तेमाल होते रहे हैं।  पुराने ज़माने में भी असली और नकली मुद्रा का चलन था। मुग़लकाल में सिक्कए-कासिद यानी खोटा सिक्का और सिक्कए-राइज़ यानी असली सिक्का जैसे शब्द चलन में थे। अरबों ने जब भूमध्य सागरीय इलाके में अपना रौब जमाया और स्पेन को जीत लिया तो यह शब्द स्पेनिश भाषा में भी जेक्का के रूप में चला आया। जेक्का का ही एक अन्य रूप सेक्का भी यहां प्रचलित रहा है। मगर वहां इसका अर्थ हो गया टकसाल, जहां मुद्रा की ढलाई होती है। अब इस जेक्का यानी टकसाल में जब मुद्रा की ढलाई हुई तो उसे बजाय कोई और नाम मिलने के शोहरत मिली जेचिनो के नाम से । जेचिनो तेरहवीं सदी के आसपास सिक्विन शब्द के रूप में ब्रिटेन में स्वर्ण मुद्रा बनकर प्रकट हुआ।

पंद्रहवीं सदी के आसपास अंग्रेजों के ही साथ ये चिकिन या चिक बनकर एक और नए रूप में हिन्दुस्तान आ गया जिसकी हैसियत तब चार रूपए के बराबर थी।

किस्से कहानियों में अशरफी, मोहर जितना जिक्र ही गिन्नी का भी है। गिन्नी ब्रिटिश स्वर्णमुद्रा थी और इसका उच्चारण था गिनी। हिन्दुस्तान के सर्राफा व्यापार की शब्दावली में सोने के भावों के संदर्भ में गिन्नी का उल्लेख आए दिन होता है

यही चिक तब सिक्का कहलाया जब इसे मुगलों ने चांदी में ढालना शुरू किया। आज ब्रिटेन में सिक्विन नाम की स्वर्णमुद्रा तो नहीं चलती मगर सिक्विन शब्द बदले हुए अर्थ में डटा हुआ है। महिलाओं के वस्त्रों में टांके जाने वाले सलमे-सितारों जैसी चमकीली सजावटी सामग्री सिक्विन के दायरे में आती है। जाहिर सी बात है कि सजाने से किसी भी चीज़ की कीमत बढ़ जाती है। यह भाव स्वर्णमुद्रा की कीमत और उसकी चमक दोनों से जुड़ रहा है। देखा जाए तो अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है।

क अन्य स्वर्णमुद्रा थी गिन्नी जिसका चलन मुग़लकाल और अंग्रेजीराज में था। दरअसल गिन्नी का सही उच्चारण है गिनी जो कि उर्दू-हिन्दी में बतौर गिन्नी कहीं ज्यादा प्रचलित है। मध्यकाल में अर्थात करीब 1560 के आसपास ब्रिटेन में गिनी  स्वर्णमुद्रा शुरू हुई। इसे यह नाम इसलिए मिला क्योंकि अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित गिनी नाम के एक प्रदेश से व्यापार के उद्धेश्य से ब्रिटिश सरकार ने इसे शुरू किया था। गौरतलब है कि सत्रहवीं सदी में पश्चिमी अफ्रीका के इस क्षेत्र पर यूरोपीय देशों की निगाह पड़ी। अर्से तक यह प्रदेश पुर्तगाल और फ्रांस का उपनिवेश बना रहा। गिनी को अब एक स्वतंत्र देश का दर्जा प्राप्त है। गिनी का इस क्षेत्र की स्थानीय बोली में अर्थ होता है अश्वेत व्यक्ति। आस्ट्रेलिया के उत्तर में प्रशांत महासागर में एक द्वीप समूह है न्यूगिनी जिसके साथ लगा गिनी नाम भी अफ्रीकी गिनी की ही देने है। इस द्वीप का पुराना नाम था पापुआ। मलय भाषा परिवार के इस शब्द का अर्थ होता है घुंघराले बाल।  स्पेनियों ने इस द्वीप को ये नाम यहां के मूल निवासियों को इसी विशेषता के चलते दिया। दिलचस्प है कि अफ्रीकी गिनी का नाम भी उसके मूलनिवासियों के रंग के आधार पर पड़ा था। इस द्वीप का पश्चिमी हिस्सा इंडोनेशिया का हिस्सा है जबकि पूर्वी हिस्सा पापुआ न्यूगिनी कहलाता है और स्वतंत्र देश है।   
संशोधित पुनर्प्रस्तुति

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Friday, August 27, 2010

मसख़रे की मसख़री सिर माथे

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मतौर पर हंसोड़ और परिहासप्रिय व्यक्ति को समाज में पसंद किया जाता है। ये लोग चूंकि सामान्यत: हर बात में हंसी-ठट्ठे का मौका तलाश लेते हैं इसलिए ऐसे लोगों को अक्सर विदूषक या मसखरा की उपाधि भी मिल जाती है। हालांकि ये दोनों ही शब्द कलाजगत से संबंधित हैं और नाटक आदि में ठिठोलीबाजी और अनोखी वेषभूषा, बातचीत, हावभाव,मुखमुद्रा आदि से परिहास उत्पन्न कर दर्शकों के उल्लास में वृद्धि करनेवाले कलाकार को ही मसखरा या विदूषक कहा जाता है। हिन्दी में मसखरा शब्द अरबी के मस्खर: से बरास्ता फारसी उर्दू होते हुए आया। में अरबी में भी मस्खर: शब्द का निर्माण मूल अरबी लफ्ज मस्ख से हुआ जिसका मतलब है एक किस्म की खराबी जिससे अच्छी भली सूरत का बिगड़ जाना या विकृत हो जाना। यह तो हुई मूल अर्थ की बात । मगर यदि इससे बने मसखरा शब्द की शख्सियत पर जाएं तो अजीबोगरीब अंदाज में रंगों से पुते चेहरे और निराले नैन नक्शों वाले विदूषक की याद आ जाती है। हिन्दी के मसखरा शब्द का अरबी रूप है मस्खरः जिसके मायने हैं हँसोड़, हँसी-ठट्ठे वाला, भांड, विदूषक या नक्काल वगैरह। जाहिर है लोगों को हंसाने के लिए मसखरा अपनी अच्छी-भली शक्ल को बिगाड़ लेता है। मस्ख का यही मतलब मसखरा शब्द को नया अर्थ देता है।
सी नए अर्थ के साथ अरब के सौदागरों के साथ यह शब्द स्पेन और इटली में मैस्खेरा बन कर पहुंचता है जहां इसका मतलब हो जाता है मुखौटा या नकाब। अरब से ही यह यूरोप की दीगर जबानों में भी शामिल हो गया और इटालियन में मैस्ख और लैटिन में मैस्का बना । फ्रैंच में मास्करैर कहलाया जहां इसका मतलब था चेहरे को काला रंगना। अंग्रेजी में stilt_guy इसका रूप हुआ मास्क यानी मुखौटा। मध्यकाल में मसखरा शब्द ने मेकअप और कास्मैटिक की दुनिया में प्रवेश पाया और इसका रूपांतर मस्कारा mascara में हो गया जिसके तहत मेकअप करते समय महिलाएं काले रंग के आईलाईनर से अपनी भौहों और पलकों को नुकीला और गहरा बनाती हैं। आवारगी, बेचारगी, दीवानगी की तर्ज पर मस्खरः में ‘अगी’ प्रत्यय लगने से अरब,फारसी में बनता है मस्खरगी यानी मसख़रापन या ठिठोलेबाजी। मगर इसके विपरीत इसमें ‘शुदा’ प्रत्यय लगने से बन जाता है विकृत, रूपांतरित आदि।
हालांकि सेमेटिक भाषा परिवार की होने के बावजूद अरबी ज़बान में मस्ख की मौजूदगी मूलभूत नहीं जान पड़ती। संस्कृत में एक धातु है मस् जिसका मतलब है रूप बदलना, पैमाइश करना। इसके अतिरिक्त इसमें ऊपर का या ऊपरी जैसे भाव भी हैं। याद रहे मस्तक शरीर का सबसे ऊपरी हिस्सा या अंग है। इसी ऊपरी अंग पर ही मुखौटा भी लगाया जाता है जो मसखरे की खास पहचान है। इससे बना है मसनम् जिसका मतलब है एक प्रकार की बूटी (चेहरे पर लेपन के लिए )। हिन्दी-संस्कृत के मस्तक या मस्तकः या मस्तम् ( सिर, खोपड़ी ) शब्द के मूल में भी यही मस् धातु है। गौर करें कि मस्ख से बने मास्क को मस्तक पर ही लगाया जाता है। मस्तिष्क यानी दिमाग़ का मस्तक से क्या रिश्ता है बताने की ज़रूरत नहीं, ज़ाहिर है इसके मूल में भी यही धातु है। माथा, मत्था जैसे देशज शब्द भी इसी की उपज हैं। मस् धातु में निहित रूप बदलने के अर्थ से ही खुलता है एक और शब्द का जन्मसूत्र।
संस्कृत में सियाही के लिए मसि शब्द प्रचलित है। इसका हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है। कबीर का मसि-कागद छुए बिना विशाल साहित्य रच देना सबको चमत्कृत करता है। यह मसि भी मस् की देन है। गौर करें मसिलेखन किसी भी सतह पर ही होता है। मसि अपने आप में एक रंग है और प्रकारांतर से लेपन ही। चेहरे को विविध रंगों से रंगना बहुरूपियों का शगल होता है। चेहरा बिगाड़ने के लिए सियाही भी पोती जाती है। जलपोत का सबसे ऊंचे सिरे को मस्तूल कहते हैं जिस पर ध्वज लहराता है और जो हवा बहने की दिशा भी बताता है। मस्तूल mastool अरबी का शब्द है। अंग्रेजी में इसे मास्ट कहते हैं। अखबारों के ऊपरी सिरे पर जिस पट्टी में अखबार का नाम लिखा होता है, उसे भी मास्ट हैड कहते हैं। सड़कों के किनारे बिजली के खम्भे अब हाईमास्ट high mastमें बदल गए हैं। मास्ट शब्द भी भारोपीय मूल का है और इसकी रिश्तेदारी मस् धातु में निहित ऊपरी शब्द से है। भाषा विज्ञानियों नें प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में एक धातु mazdos खोजी है जिसका अर्थ है ऊंचा डण्डा। एटिमऑनलाईन के मुताबिक पोस्ट जर्मनिक में इससे mastaz शब्द बनता है जिसका अंग्रेजी रूपांतर mast हुआ।  -संशोधित पुनर्प्रस्तुति

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Tuesday, August 24, 2010

वीणा से प्रवीण और कुश से कुशल

Radhika

प्रा यः सभी भाषाओं में शब्दसम्पदा के बढ़ने के कई कारण होते हैं जिनमें एक प्रमुख कारण अर्थविस्तार की प्रवृत्ति भी है। यह अर्थविस्तार इतना व्यापक होता है कि उस शब्द के मूलार्थ से नए अर्थ का दूर-पास का भी कोई रिश्ता नहीं जुड़ता है। प्रवीण भी ऐसा ही एक शब्द है। किसी कार्य को बहुत ही चतुराई और उत्तम प्रणाली से करने के लिए हिन्दी में आम प्रचलित शब्द है प्रवीण। किसी कार्य में दक्ष या निष्णात या सिद्धहस्त होने के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है। किसी वक्त प्रवीण का अर्थ होता था वह व्यक्ति जो वीणा बजाने में कुशल हो। वीणा प्राचीनतम् भारतीय वाद्य है। भारतीय देवी-देवताओं के हाथों में वीणा ही नजर आती है। वीणा बजाने में सिद्धहस्त कलाकार को प्रवीण कहा जाने लगा। स्पष्ट है कि वीणावादन का उस काल में कितना महत्वरहा होगा। कालान्तर में हर तरह के कार्य को कुशलता से करनेवाले के लिए प्रवीण शब्द प्रचलित हो गया और इसका मूलार्थ लोप हो गया। विडम्बना यह भी रही कि उत्तर भारतीय संगीत से भी वीणा की परम्परा धीरे धीरे कम होती चली गई, अलबत्ता दक्षिण भारत में उत्तर की बनिस्बत वीणा का चलन कहीं ज्यादा है।
पटे कोश में के अनुसार वीणा (वेति वृद्धिमात्रमपगच्छति- वी+न, नि. णत्वम्) का अर्थ सारंगी जैसा वाद्य, बीना, बताया गया है। इसके अलावा इसका एक अन्य अर्थ विद्युत भी है। संस्कृत की वी धातु में जाना, हिलना-डुलना, व्याप्त होना, पहुंचना जैसे भाव हैं। बिजली की तेज गति, चारों और व्याप्ति से भी वी में निहित अर्थ स्पष्ट है। विद्युत की व्युत्पत्ति भी वी+द्युति से बताई जाती है। वी अर्थात व्याप्ति और द्युति यानी चमक, कांति, प्रकाश आदि। प्रकाश की तीव्र कौंध ही विद्युत है। वी से बने हैं वेति, वेत या वीत जैसे शब्द जिनसे बने कुछ शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे चरैवेति यानी बढ़ते चलो। वीत भी गतिवाचक है जिसमें जाने का भाव है। चले जाना। इससे बना एक शब्द है वीतराग अर्थात सौम्य, शान्त, सादा, निरावेश। राग का अर्थ कामना, इच्छा, रंग, भावना होता है। वीतराग वह है जिसने सब कुछ त्याग दिया हो। एक पौराणिक ऋषि का नाम भी वीतराग था। वीतरागी वह है जो संसार से निर्लिप्त रहता है। जाहिर है एक तन्त्रवाद्य होने के नाते वीणा की वी से व्युत्पत्ति में तीव्रता के साथ इसकी मधुर स्वर लहरियों की सब दूर व्याप्ति का भाव भी है। इन्हीं शब्दों के पूर्ववैदिक रूप वेण, वीण या वेणि रहे होंगे।
यूं वीणा में अंतर्निहित ध्वनि पर गौर करें तो वीणा का रिश्ता वाणी से भी हो सकता है। आपटे कोश के अनुसार वाणी शब्द बना है संस्कृत की वण् धातु से जिसका अर्थ है शब्द करना। वण् से बने वाणी में वचन, भाषण, वाक् शक्ति, बोलना, magadi2 ध्वनि आदि होता है। संस्कृत में वेण् या वेन् शब्द भी मिलते हैं जिनका अर्थ है जाना, हिलना-डुलना या बाजा बजाना। इसी क्रम में वेण् से बने वेणः का अर्थ होता है गायक जाति का एक पुरुष। बांसुरी को वेणु भी कहते हैं जो इसी मूल का है। वेणु मूलतः बांस को ही कहते हैं। बांसुरी शब्द को एक वाद्य की अर्थवत्ता इसीलिए मिली क्योंकि यह बांस से उत्पन्न है। वण् धातु से व्युत्पन्न बांस के अर्थ वाले वेणु शब्द की तार्किक विवेचना क्या हो सकती है? यही कि प्राचीनकाल से ही बांसों के जंगल से गुजरती हवा की तेज़ ध्वनि से मनुष्य परिचित था। यही बात उसने बांस के पोले तने से हवा गुज़ारने पर भी महसूस की। तात्पर्य यही है कि वेत, वेण जैसे शब्दों का मूल रिश्ता गति और प्रकारान्तर से ध्वनि से था।
खैरियत, मंगल और प्रसन्नता के अर्थ में भी कुशल शब्द का प्रयोग होता है। कुशल-क्षेम, कुशल-मंगल से यह साफ जाहिर है। यह बना है संस्कृत के कुशः से। हिन्दी में यह भी काफी आम है और इससे बने शब्द खूब प्रचलित हैं। संस्कृत के कुशः का मतलब होता है एक प्रकार की वनस्पति, तृण, पत्ती, घास जो पवित्र-मांगलिक कर्मों की आवश्यक सामग्री मानी जाती है। प्रायः सभी हिन्दू मांगलिक संस्कारों में इस दूब या कुशा का प्रयोग पुरोहितों द्वारा किया ही जाता है। प्राचीनकाल में गुरुकुलवासी बटुकों से मुनिजन कुश घास को एकत्र कराते थे जो विभिन्न कामों प्रयोग की जाती थी। छप्पर यज्ञ कर्म में इसका विशेष महत्व था। जो शिष्य सही तरीके से कुश को बीनता था वह कुशल कहलाता था। कालान्तर में किसी कार्य को दक्षतार्वक करने वाले के लिए यही कुशल शब्द रूढ हो गया।  इसी क्रम में आता है कुशाग्र।  हिन्दी के इस शब्द का मतलब होता है अत्यधिक बुद्धिमान, अक्लमंद। चतुर आदि। गौर करें कुशः के घास या दूब वाले अर्थ पर। यह घास अत्यंत पतली होती है जो अपने किनारों पर बेहद पैनी हो जाती है।  पचूंकि इसका आगे का हिस्सा नोकीला होता है इसलिए इस हिस्से को कुशाग्र कहा गया अर्थात कुश का अगला हिस्सा ( जो नोकीला है )। जाहिर सी बात है कि कालांतर में बुद्धिमान व्यक्ति की तीक्ष्णता आंकने के लिए कुशाग्र बुद्धि शब्द चल पड़ा। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में जो लिखा वो एक प्रसिद्ध उक्ति बन गई- पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे अचरहिं ते नर न घनेरे।। 

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Thursday, August 19, 2010

ऑनर किलिंग के बहाने महिमा गोत्र की…

8-3-07

जातिवादी सामाजिक व्यवस्था की खासियत ही यही रही कि इसमें हर समूह को एक खास पहचान मिली। हिन्दुओं में गोत्र होता है जो किसी समूह के प्रवर्तक अथवा प्रमुख व्यक्ति के नाम पर चलता है। सामान्य रूप से गोत्र का मतलब कुल अथवा वंश परंपरा से है। गोत्र को बहिर्विवाही समूह माना जाता है अर्थात ऐसा समूह जिससे दूसरे परिवार का रक्त संबंध न हो अर्थात एक गोत्र के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते पर  दूसरे गोत्र में विवाह कर सकते, जबकि जाति एक अन्तर्विवाही समूह है यानी एक जाति के लोग समूह से बाहर विवाह संबंध नहीं कर सकते। गोत्र मातृवंशीय भी हो सकता है और पितृवंशीय भी। ज़रूरी नहीं कि गोत्र किसी आदिपुरुष के नाम से चले। जनजातियों में विशिष्ट चिह्नों से भी गोत्र तय होते हैं जो वनस्पतियों से लेकर पशु-पक्षी तक हो सकते हैं। शेर, मगर, सूर्य, मछली, पीपल, बबूल आदि इसमें शामिल हैं। यह परम्परा आर्यों में भी रही है। हालांकि गोत्र प्रणाली काफी जटिल है पर उसे समझने के लिए ये मिसालें सहायक हो सकती हैं। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लोकायत में लिखते हैं कि कोई ब्राह्मण कश्यप गोत्र का है और यह नाम कछुए अथवा कच्छप से बना है। इसका अर्थ यह हुआ कि कश्यप गोत्र के सभी सदस्य एक ही मूल पूर्वज के वंशज हैं जो कश्यप था। इस गोत्र के ब्राह्मण के लिए दो बातें निषिद्ध हैं। एक तो उसे कभी कछुए का मांस नहीं खाना चाहिए और दूसरे उसे कश्यप गोत्र में विवाह नहीं करना चाहिए। आज समाज में विवाह के नाम पर आनर किलिंग का प्रचलन बढ़ रहा है उसके मूल में गोत्र संबंधी यही बहिर्विवाह संबंधी धारणा है।
ह जानना दिलचस्प होगा कि आज जिस गोत्र का संबंध जाति-वंश-कुल से जुड़ रहा है, सदियों पहले यह इस रूप में प्रचलित नहीं था। गोत्र तब था गोशाला या गायों का समूह अथवा गोवंश का बाड़ा। दरअसल संस्कृत में एक धातु है त्रै-जिसका अर्थ है पालना, रक्षा करना और बचाना आदि। गो शब्द में त्रै लगने से जो मूल अर्थ प्रकट होता है जहां गायों को शरण मिलती है, जाहिर है गोशाला मे। इस तरह गोत्र शब्द चलन में आया। गौरतलब है कि ज्यादातर और प्रचलित गोत्र ऋषि-मुनियों के नाम पर ही हैं जैसे भारद्वाज-गौतम आदि मगर ऐसा क्यों ? इसे यूं समझें कि प्राचीनकाल में ऋषिगण HittPlowविद्यार्थियों पढ़ाने के लिए गुरुकुल चलाते थे। इन गुरूकुलों में खान-पान से जुड़ी व्यवस्था के लिए बड़ी-बड़ी गोशालाएं होती थीं जिनकी देखभाल का काम भी विद्यार्थियों के जिम्मे होता था। ये गायें इन गुरुकुलों में दानस्वरूप आती थीं और बड़ी तादाद में पलती थीं। गुरुकुलों के इन गोत्रो में समाज के विभिन्न वर्ग भी दान-पुण्य के लिए पहुंचते थे। कालांतर में गुरूकुल के साथ साथ गोशालाओं को ख्याति मिलने लगी और ऋषिकुल के नाम पर उनके भी नाम चल पड़े। बाद में उस कुल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने भी अपनी पहचान इन गोशालाओं यानी गोत्रों से जोड़ ली जो सदियां बीत जाने पर आज भी बनी हुई है।
मूलतः गोत्र शब्द भी हमारी पशुपालन संस्कृति से उपजा है। सप्तसैंधव क्षेत्र के निवासी आर्यों का प्रिय पशुधन गौ था। इसी रूप में गोपालक समुदाय के लिए गोत्र शब्द उपजा होगा जो बाद में वंश के विशिष्ट गुणों की पहचान का आधार बना। सफाई देवता पुस्तक में ओमप्रकाश वाल्मीकि प्रख्यात विद्वान राहुल सांकृत्यायन के हवाले से लिखते हैं कि गोत्रकाल का ज्ञान हमारे पास बहुत ही कम है। विश्वामित्र, भरद्वाज आदि जितने भी गोत्र (ब्राह्मणी काल) प्रसिद्ध हैं, ये वस्तुतः गोत्रकाल या पित्रसत्ताकाल के भी नहीं हैं। ये सारे ऋषि 1500 ईसा पूर्व के काल में दासता और सामन्तवादी युग में हुए हैं। हो सकता है कुभा (काबुल) और सुवास्तु (स्वात) की उपत्यका में रहते वक्त गोत्रसत्ता उनमें मौजूद रही हो। डीएन झा के मुताबिक जो लोग अपनी गायों के साथ एक ही गोष्ठ में रहते थे, उनका संबंध उसी गोत्र से हो जाता था। बाद में रक्तसंबंध का अभिप्राय भी इस शब्द से जुड़ गया। गोत्र का अभिप्राय ऐसे समूह से भी लगाया जाता है जो रक्तसंबंध से बाहर हो। कालांतर में विवाह संबंधों के संदर्भ में गोत्र का अर्थ बहिर्विवाही समूह हो गया। डॉ काणे के अनुसार गोत्र में कोई भी व्यक्ति अपने गुरू के साथ सम्पूर्ण परिवार को संबंधित करता है, ठीक वैसे ही जैसे सामान्य जीवन में हम खुद को अपने पिता से संबंधित करते हैं। हालांकि ऋग्वेदकाल में गोत्र का अर्थ सिर्फ गोशाला या गोपालक समूह ही था मगर उपनिषद काल तक गोत्र की पहचान विशिष्ट समूहों के रूप में हो चुकी थी।

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Saturday, August 14, 2010

बात ग़ुस्लखाने की…

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हि न्दी की कुछ बोलियों में पाखाना के लिए तारत शब्द का प्रयोग भी होता है। पूर्वांचल में जहां यह तारत है वहीं मालवी में कहीं कहीं इसका उच्चारण तारज भी सुनाई पड़ता है। ये शब्द दरअसल प्राकृत-संस्कृत से नहीं उपजे हैं बल्कि इस्लामी संस्कृति की देन है सो अलग अलग क्षेत्रों में उच्चारण भिन्नता है। यह शब्द बना है अरबी के तहारत से जिसमें शुद्धता का भाव है। मूल रूप से तहारत इस्लामी परम्परा का शब्द है और इसका इबादत से पूर्व की शुचिता प्रक्रिया से रिश्ता है। स्नान, अंगप्रक्षालन जैसी क्रियाएं इसमें निहित हैं। पाखाना शब्द जिस तरह से पाकखाना से बना है वहीं बात तारत में भी है।
ट्टी या शौचालय के अर्थ में हिन्दी में पाखाना शब्द का भी खूब इस्तेमाल होता है। इसके कई रूप प्रचलित हैं जैसे पैखाना, पखाना या पाखाना। यह फारसी के पाखानः या पाखानह से जन्मा शब्द है। पाखाना के साथ लगा “खाना” साफ बता रहा है कि यह स्थानवाची शब्द है। पाखाना में आए पा का अर्थ प्रायः पैर से लगाया जाता है। कुछ व्याख्याकार पाखाना का अर्थ वह स्थान बताते हैं जहां पाद प्रक्षालन अर्थात पैर धोए जाएं। इस अर्थ में पाखाना का अन्वय हुआ पा + खाना। पुराने ज़माने में बाहर से आने पर लोग घर के आंगन में एक नियत स्थान पर पैर धोकर ही कमरों में प्रवेश करते थे। शौचालय में निहित शुचिता यानी पवित्रता की व्यंजना के आधार पर अगर पाखाना शब्द का अन्वय अगर पाक+ खाना किया जाए तब इसका भावार्थ वहीं निकलता है जो शौचालय का स्थूल अर्थ है। पाक में क्रिया और विशेषण का बोध भी होता है। मुझे लगता है बतौर शौचालय इस शब्द की यह व्युत्पत्ति तार्किक है।
spiral-vip-latrine-1 तारत या तारज का मूल रूप है तहारतखाना अर्थात पवित्र होने का स्तान। मराठी में पाखाना के लिए शेतखाना या तारतखाना ही चलन में हैं। शौचालय शब्द भी चलता है मगर लोक परम्परा में इन्ही दो शब्दों की व्याप्ति है। दिलचस्प यह कि दोनों शब्द मुस्लिम दौर में प्रचलित हुए। पाकखाना की तरह ही तहारतखाना का अर्थ हुआ शुद्ध या पवित्र होने का स्थान। मुस्लिमों में वुज़ू के संदर्भ में तहारत, ग़ुस्ल आदी शब्दों का प्रयोग होता है। वुज़ू जहां नमाज़ से पूर्व शुद्धि की प्रक्रिया के लिए रूढ़ हो चुका है वहीं तहारत या ग़ुस्ल में दैहिक पवित्रता के विभिन्न क्रिया-आयाम अभिव्यक्त होते हैं। सामान्यतौर पर स्नान के अतिरिक्त शौच के उपरान्त तीन बार गुप्तांग को धोने का भाव भी तहारत में है। तहारतखाना शब्द के साथ जुड़े शौचालय की अर्थवत्ता चस्पा होने की वजह यही है। हिन्दी में भी स्नानगृह और शौचालय का भाव एक ही है पर नहाने के स्थान को कोई शौचालय नहीं कहता। इसी तरह ग़ुसलखाना शब्द का अर्थ स्नानगृह या बाथ रूम है। गुसलखाना बना है ग़ुस्ल ghusl शब्द से जिसमें पवित्रता और स्नान का भाव है। इसका अरबी मूल है ग़साला ghasala जिसकी मूल धातु है gh-s-l जिसका अर्थ है शुचितापूर्ण, पवित्र।   
मुहम्मद मुस्तफा खां मद्दाह के  उर्द-हिन्दी कोश के अनुसार तहारत का अर्थ है शुद्धता, पवित्रता, पाकीज़गी, स्नान और ग़ुस्ल आदि। मलविसर्जन के उपरांत पवित्र होने का भाव इसमें बाद में जुड़ा। अरबी में इसके लिए इस्तिंजा और फ़ारसी में आबदस्त शब्द पहले से हैं। आबदस्त इंडो ईरानी मूल का शब्द है जिसमें आब यानी पानी और दस्त यानी हाथ अर्थात हाथों के जरिये अंग प्रक्षालन की बात स्पष्ट है। अब आते हैं मराठी के शेतखाना शब्द पर। मराठी में शेत का अर्थ खेत होता है जो क्षेत्र से बना है। इस अर्थ में देखें तो शेतखाना का एक अर्थ खलिहान हो सकता है जहां खेत की उपज का भंडारण होता है। पेशवाओं के ज़माने में मराठी में फारसी का काफी असर आया। यहां शेत शब्द फारसी के सेहत शब्द का रूपांतर या देशज रूप है। सेहतखाना यानी पवित्र होने की जगह। फारसी का सेहत भी इंडो ईरानी मूल का शब्द है। मेरी नज़र में इसका रिश्ता संस्कृत के स्वस्थ से है। स ध्वनि यहां यथावत है। का लोप होकर मे निहित त+ह ध्वनियों का अन्वय होता है और फिर वर्ण विपर्यय के जरिये का स्थान लेता है और बनता है सेहत। गौरतलब है  कि पवित्र होने की सभी क्रियाओं ने अंग्रेजी के बाथरूम शब्द में ठौर पाया है जहां नहाने के अलावा भी “सब कुछ” किया जा सकता है।

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Tuesday, August 10, 2010

ज़ुबानदराज़, ड्रॉअर और दीर्घदर्शी

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हि न्दी में दीर्घ deergh का अर्थ होता है लंबा, दूर तक पहुंचनेवाला, ऊंचा, उन्नत आदि। अरबी फारसी का दराज़ शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है जिसके दो मायने हैं। एक दराज़ वह है जिसका अर्थ है मेज़ या टेबल में छिपा वह खाना जिसे खींच कर खोला जाता है और दूसरा दराज़ वह है जिसमें लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई जैसे आयामों के साथ विशालता का भाव है। आमतौर पर दराज से तात्पर्य लम्बाई से होता है जैसे ज़बानदराज़ यानी ज्यादा बोलनेवाला, दराज़दुम यानी लम्बी पूछवाला, उम्रदराज यानी वृद्ध या लम्बी उम्रवाला। इस दीर्घकाय का अर्थ हुआ लंबा व्यक्ति मगर दीर्घकाय शब्द का अभिप्राय आमतौर पर विशालकाय के अर्थ में ही लगाया जाता है। दरअसल जब किसी आकार के साथ दीर्घ शब्द का विशेषण की तरह प्रयोग होता है तब लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई के आयाम भी उसमें जड़ जाते हैं, इस तरह दीर्घाकार, दीर्घकाय जैसे शब्दों में बड़ा अथवा विशाल का भाव आ जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति को दूरदर्शी कहा जाता है। संस्कृत में इसके लिए दीर्घदर्शी शब्द भी है यानी दूर तक देखनेवाला। लंबी आयु के लिए दीर्घजीवी शब्द प्रचलित है।
भाषाविज्ञानियों नें संस्कृत के दीर्घ शब्द की रिश्तेदारी प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु dlonghos में खोजी है। अंग्रेजी का लाँग long शब्द भी इससे ही बना है जिसका अर्थ भी लंबा या दीर्घ ही होता है। गौरतलब है कि संस्कृत दीर्घ शब्द ने ही बरास्ता अवेस्ता, ईरानी परिवार की भाषाओं में जाकर दराग, दिरंग होते हुए फारसी के दराज़ शब्द का रूप लिया। फारसी के दराज़ का अर्थ होता है लंबा। गौरतलब है कि भारोपीय भाषाओं मे र-ल और क-ग-घ जैसे वर्णों में आपस में तब्दीली होती है। फारसी का दराज़ शब्द उम्रदराज़ के रूप में हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ होता है लंबी आयु वाला अर्थात बूढ़ा, वृद्ध, बुजुर्ग। गौरतलब है कि फारसी के बुजुर्ग शब्द की भी संस्कृत-हिन्दी के वज्र से रिश्तेदारी है जिसका मतलब होता है महान, कठोर, वरिष्ठ आदि। बुजुर्ग में भी मूलतः आदरणीय, महान, प्रभुतासम्पन्न जैसे भाव ही हैं। मगर कालांतर में इसके साथ वरिष्ठता के विभिन्न भाव जुडते चले गए जिनका अर्थ विस्तार रसूख, प्रभाव में हुआ और बाद में आयु के उत्कर्ष के तौर पर ये सब बुजुर्ग में सिमट गए।
वाचालता अथवा अशिष्ट सम्भाषण के लिए ज़ुबानदराज़ी शब्द भी हिन्दी में इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ है ज्यादा बोलना। जुंबानदराज़ी करना मुहावरा मूलतः

team-7-custom-closet-drawersjpg ...इंडो यूरोपीय मूल का ड्राअर्ज drawers शब्द भी भारोपीय मूल का है जिसका अर्थ है मेज़ में छुपा एक खाना जिसे आगे खींच कर खोला जाता है। ध्यान दें खींचना के भाव पर जिसमें लम्बा होने का भाव सुरक्षित है। ...

फ़ारसी से ही हिन्दी में आया है जिसका मूल रूप है ज़ुबानदराज़ करदन यानी बढ़-चढ़ कर बोलना। राज शब्द का एक अन्य अर्थ में भी हिन्दी में प्रयोग होता है जिसका मतलब होता है टेबल, मेज या आलमारी में बना हुआ काग़ज-पत्र या अन्य छोटी सामग्री रखने का खाना या खण्ड जिसे खींच कर बाहर निकाला जा सके। संभवतः इस दराज़ से इसका कोई रिश्ता नहीं है। मुहम्मद मुस्तफा खां मद्दाह के कोश के मुताबिक मूलतः यह अरबी के दरजः (दर्जः) से बना है। यह उर्दू में दर्जः हो गया और इसका हिन्दी उच्चारण दराज की तरह होने लगा। दर्जः का मतलब है वर्ग, खण्ड, ओहदा, श्रेणी आदि। गौरतलब है कि उत्तर भारत में आज भी कक्षा के लिए भी दर्जा शब्द का ही इस्तेमाल होता है। रेलवे की आरक्षण शब्दावली में श्रेणी शब्द चाहे लिखा जाता है, पर इस्तेमाल मे दर्जा शब्द ही आता है। दर्जा का मतलब इमारत की मंजिल या माला भी होता है। अवस्था के लिए भी दर्जा शब्द का प्रयोग होता है।
कुछ लोग अंग्रेजी के ड्राअर्ज को दराज़ शब्द का मूल मानते हैं। अग्रेजी के ड्राअर से दराज शब्द का बनना तार्किक तो लगता है, पर खण्ड या खाना के अर्थ में फारसी में दरजः शब्द पहले से मौजूद है। मैने कई संदर्भों को टटोलने के बाद ही मेज की दराज को भी इसी मूल का माना है। ये ठीक है कि आगे खींच कर बाहर निकालने के लिए अंग्रेजी के ड्राअर्ज शब्द से इसकी समानता कई लोगों को नजर आती है। पर मूलतः यह है तो खण्ड या आला ही। और मेज, आलमारी में भी इसकी कई मंजिलें यानी दरजे होते हैं। यह मान लेना कुछ मुश्किल लगता है कि यूरोपीयों के आने से पहले अरब, फारस या भारत के लोग टेबल या मेजनुमा किसी देशी व्यवस्था के बिना गुजारा करते थे। खास कर तब, जब प्रायः सभी सभ्यताओं-समाजों में काष्ठकला सर्वाधिक प्रारम्भिक कलाओं में रही है। जब मुहम्मद मुस्तफा खां मद्दाह के कोश में संदर्भ टटोला तो वहां अपनी धारणा को पुष्ट करता हुआ उदाहरण मिला। इसी तरह सीरियक अरबी में भी सीधे सीधे इसका अर्थ मेज की दराज दिया हुआ है। मैं भी यही मानता हूं कि यह अंग्रजी से नहीं बल्कि फारसी-अरबी मूल का ही शब्द है।
वैसे भी इंडो यूरोपीय मूल का ड्राअर्ज drawers शब्द भी भारोपीय मूल का है जिसका अर्थ है मेज़ में छुपा एक खाना जिसे आगे खींच कर खोला जाता है। ध्यान दें खींचना के भाव पर जिसमें लम्बा होने का भाव सुरक्षित है। ड्राअर्ज शब्द बना है ड्रॉ से जिसमें खींचने, बाहर निकालने का भाव है। ड्रॉ की मूल भारोपीय धातु *dhragh- मानी गई है जिसकी संस्कृत के दीर्घ deergh से तुलना गौरतलब है। ड्रॉ शब्द का विकास ओल्ड हाई जर्मन के tragen से हुआ है। इसकी रिश्तेदारी ड्रैग या ड्रैगन से भी है। सेमेटिक भाषा परिवार की अरबी की ही एक बोली है यमनी जिसमें दराजू शब्द है जिसमें विकसित होने का भाव है। मोशे पिमेन्ता की अ डिक्शनरी ऑफ पोस्ट अरेबिक यमनी  के मुताबिक आंखों में आश्चर्य का भाव भी इसमें है। गौरतलब है कि चकित होने पर आंखे बड़ी होती हैं। परिनिष्ठित हिन्दी में इसे विस्फारित नेत्र कहा जाता है और चालू भाषा में आंखे फटी की फटी रह जाना। विस्फारित और फटना दोनों ही शब्दों में विस्तार का भाव है। दीदे फाड़ना भी इसे ही कहते हैं। विस्तार में निहित लम्बाई के भाव को व्याख्या की जरूरत नहीं है। इसी तरह दराज़ा शब्द का अर्थ लपेटना, गोल गोल घुमाना भी है। चड़स या रहंट को भी दराजा कहते हैं जिसमें खींचने की क्रिया निहित है। -परिवर्धित पुनर्प्रस्तुति

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Friday, August 6, 2010

छिनाल का जन्म

...छिन्न का आमतौर पर इस्तेमाल छिन्न-भिन्न के अर्थ में होता है। ...
हि न्दी में कुलटा, दुश्चरित्रा, व्यभिचारिणी या वेश्या के लिए एक शब्द है छिनाल। आमतौर पर हिन्दी की सभी बोलियों में यह शब्द है और इसी अर्थ में इस्तेमाल होता है और इसे गाली समझा जाता है। अलबत्ता पूरबी की कुछ शैलियों में इसके लिए छिनार शब्द भी है। छिनाल शब्द बना है संस्कृत के छिन्न से जिसका मतलब विभक्त , कटा हुआ, फाड़ा हुआ, खंडित , टूटा हुआ , नष्ट किया हुआ आदि है। गौर करें चरित्र के संदर्भ में इस शब्द के अर्थ पर । जिसका चरित्र खंडित हो, नष्ट हो चुका हो अर्थात चरित्रहीन हो तो उसे क्या कहेंगे ? जाहिर है बात कुछ यूं पैदा हुई होगी- छिन्न + नार> छिन्नार> छिनार> छिनाल। जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी-इंग्लिश-उर्दू कोश में इसका विकासक्रम कुछ यूं बताया है-छिन्ना + नारी > छिन्नाली> छिनाल। इसी तरह हिन्दी शब्दसागर में -छिन्ना+नारी से उसकी व्युत्पत्ति बताते हुए इसके प्राकृत रूप छिणणालिआ> छिणणाली > छिनारि के क्रम में इसका विकासक्रम छिनाल बताया गया है। परस्त्रीगामी और लम्पट के लिए हिन्दी में छिनाल का पुरुषवाची शब्द भी पनपा है छिनरा

छि
न्न शब्द ने गिरे हुए चरित्र के विपरीत पुराणों में वर्णित देवी-देवताओं के किन्ही रूपों के लिए भी कुछ खास शब्द गढ़े हैं जैसे छिन्नमस्ता या छिन्नमस्तक। इनका मतलब साफ है- खंडित सिर वाली(या वाला)। छिन्नमस्तक शब्द गणपति के उस रूप के लिए हैं जिसमें उनके मस्तक कटा हुआ दिखाया जाता है। पुराणों में वर्णित वह कथा सबने सुनी होगी कि एक बार स्नान करते वक्त पार्वती ने गणेशजी को पहरे पर बिठाया। इस बीच शिवजी आए और उन्होंने अंदर जाना चाहा। गणेशजी के रोकने पर क्रोधित होकर शिवजी ने उनका सिर काट दिया। बाद मे शिवजी ने गणेशजी के सिर पर हाथी का सिर लगा दिया इस तरह गणेश बने गजानन। इसी तरह छिन्नमस्ता देवी तांत्रिकों में पूजी जाती हैं Picasso और दस महाविद्याओं में उनका स्थान है। इनका रूप भयंकर है और ये अपना कटा सिर हाथ में लेकर रक्तपान करती चित्रित की जाती हैं। हिन्दी में सिर्फ छिन्न शब्द बहुत कम इस्तेमाल होता है। 

छिन्न से बने छिनाल की व्याप्ति मराठी में भी है जहाँ इसका आशय व्यभिचारी स्त्री या पुरुष  है। ऐसा पुरुष जिसमें वेश्या प्रवृत्ति हो। अश्लील, बदचलन चरित्र का होना। जिसके रंगढंग अश्लील हों या जो चाल-ढाल से नखरेबाज, रंगीनमिजाज हो उसे छिनालचाळा कहते हैं। इसी तरह किसी के यही रंगढंग देख कर उसे अपशब्द के तौर पर छिनालचोदीचा कह कर गाली भी दी जाती है जिसमें उसे वेश्या की सन्तान कहा जा रहा है। ऐसी जगह जहाँ व्यभिचार/वेश्यावृत्ति होती है उसे छिनालपुरा भी कहा जाता है (मोल्सवर्थ)। 

साहित्यिक भाषा में फाड़ा हुआ, विभक्त आदि के अर्थ में विच्छिन्न शब्द प्रयोग होता है जो इसी से जन्मा है। छिन्न का आमतौर पर इस्तेमाल
छिन्न-भिन्न के अर्थ में होता है जिसमें किसी समूह को बांटने, विभक्त करने, खंडित करने या छितराने का भाव निहित है। छिन्न बना है छिद् धातु से जिसमें यही सारे अर्थ निहित है। इससे ही बना है छिद्र जिसका अर्थ दरार, सूराख़ होता है। छेदः भी इससे ही बना है जिससे बना छेद शब्द हिन्दी में प्रचलित है। संस्कृत में बढ़ई के लिए छेदिः शब्द है क्योंकि वह लकड़ी की काट-छांट करता है।सहज ही प्रश्न उठता है कि जिस हिन्दी समाज ने छिन्न शब्द से स्त्री के लिए छिनाल जैसा उपालम्भ-सम्बोधन बनाया वहीं छिनाल के लक्षणोंवाले पुरुष के लिए कौन सा शब्द है? हिन्दी की पूर्वी बोलियों में इसके लिए छिनरा, छिनारा है। हिन्दी के कवि बोधिसत्व ने छिनरा के बारे में जो लिखा है वह जस का तस यहां प्रस्तुत है-
जिन संदर्भों में छिनाल की चर्चा होती है उन्हीं संदर्भों में छिनरा व्यक्ति की भी चर्चा होती है। छिनाल के साथ जो छिनरई करते धरा जाता है सहज ही वह छिनरा होता है। वहाँ दोनों का कद बराबर है- छिनरा छिनरी से मिले हँस-हँस होय निहाल। किसी भी समाज में अकेली स्त्री छिनाल नहीं हो सकती। उसे सती से छिनाल बनाने में पहले एक अधम पुरुष की उसके ठीक बाद एक अधम समाज की आवश्यकता होती है। छिनाल शब्द की उत्पत्ति पहले हुई या छिनरा की यह एक अलग विवाद का विषय हो सकता है । साथ ही समाज में पहले छिनरा पैदा हुआ या छिनाल। क्योंकि बिना छिनरा के छिनाल का जन्म हो ही नहीं सकता। एक पक्का छिनरा ही किसी को छिनार बना सकता है। तत्सम छिनाल का पुलिंग शब्द भले ही न मिले लेकिन तद्भव छिनरी का पुलिंग शब्द छिनरा जरूर मिलता है...। छिनरा का शाब्दिक अर्थ है लंपट, चरित्रहीन और परस्त्रीगामी। वहीं छिनाल या छिनार का अर्थ है व्यभिचारिणी, कुलटा,पर पुरुषगामी। रोचक बात यह है कि लोक ने उस स्त्री में छिपे छिनाल को खोज लिया जिसके गालों में हँसने पर गड्ढे पड़ते हों- हँसत गाल गड़हा परै, कस न छिनरी होय।’

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Tuesday, August 3, 2010

मै इधर जाऊं या उधर जाऊं!!!

dilemma
मतौर पर मीडिया में आसान हिन्दी के नाम पर हिन्दी की तत्सम शब्दावली से पीछा छुड़ाने की प्रक्रिया इन दिनों जोरों पर है। यातायात के स्थान पर अब ट्रैफिक शब्द के इस्तमाल का आग्रह ज़्यादा है। कठिनाई, दुविधा अथवा निर्णय न ले पाने की स्थिति के लिए हिन्दी में असमंजस एक बहुत लोकप्रिय शब्द के तौर पर डटा हुआ है। कठिन शब्द से तात्पर्य आमतौर पर ऐसे शब्द से होता है जो भाषा में कम इस्तेमाल होता हो और जिसका अर्थ जानने के लिए शब्दकोश की मदद लेनी पड़े। निश्चित ही असमंजस शब्द का शुमार इस समूह के शब्दों में नहीं है। मगर अब असमंजस को भी कठिन कहा जाने लगा है। दरअसल यह इसी वजह से होता है क्योंकि हमारे भीतर शब्दों की व्युत्पत्ति जानने की जिज्ञासा नहीं है। उद्गम को जानने के बाद ही किसी चीज़ की अर्थवत्ता के विभिन्न आयामों का खुलासा होता है। असमंजस के स्थान पर दुविधा शब्द भी चिरपरिचित है मगर यह जानकर ताज्जुब हुआ कि गूगल पर असमंजस शब्द की 109000 प्रविष्टियां है जबकि दुविधा शब्द की प्रविष्टियां उससे बीस हजार कम यानी 107000 निकलीं। मज़े की बात यह भी कि असमंजस की तुलना में दुविधा को आसान माननेवालों से जब दुविधा का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ पूछा गया तब यह भी असमंजस जितना ही कठिन साबित हुआ।

खैर, बात करते हैं असमंजस के जन्मसूत्रों पर। असमंजस की व्युत्पत्ति अगर पूछी जाए तो यह अ + समञ्जस से निकलती है। संस्कृत में समञ्जस का अर्थ है सही, उचित, भली प्रकार से, सुसंगत, ठीक, न्यायोचित, तार्किक आदि। इसके  अलावा अभ्यस्त, यथार्थ, स्वस्थ आदि भी इसकी अर्थवत्ता में शामिल हैं। आप्टे कोश के मुताबिक असमञ्जस शब्द बना है सम्यक् अञ्ज औचित्यं यत्र यानी सब दूर से भली प्रकार से उद्घाटित या दृष्यमान। जाहिर है जो बोधगम्य है, उचित है, वही समञ्जस है। समञ्जस में उपसर्ग लगने से इसमे निहित भावों का विलोम होता है इस तरह संस्कृत के असमञ्जस शब्द का अर्थ है जो समझ न आए, अस्पष्ट, अनुपयुक्त, असंगत, बेतुका, निरर्थक आदि। समञ्जस में शामिल संस्कृत धातु अञ्ज को Sleeper'sDilemmaसमझने से असमंजस का अर्थ और स्पष्ट होता है। अञ्ज् धातु का अर्थ है प्रस्तुत करना, स्पष्ट करना, चमकना, प्रकाशित होना, चित्रण करना आदि। जाहिर है अञ्ज् में स उपसर्ग लगने से बना है समञ्जस। ध्यान रहे संस्कृत के स उपसर्ग में सहित या गुणवृद्धि का भाव है। अञ्ज् से ही बना है अञ्जन या अंजन जिसमें लीपने, पोतने, मिलाने, मलने, प्रकट करने का भाव है। आंखों में सुरमा लगाने को आंजना भी कहते हैं। सुरमा या काजल को संस्कृत में अञ्जन कहा जाता है। दोनों हथेलियों को मिलाकर बने कमलवत आकार को भारतीय संस्कृति में मांगलिक माना जाता है। इसे अञ्जलि कहते हैं। हिन्दी में इसे ही अंजुरी कहा जाता है। किसी पदार्थ को ग्रहण करने अथवा किसी को दान देने के लिए हथेलियों की यही मुद्रा मान्य है। जाहिर है वह वस्तु जिसे अंजुरी में रखा जाता है भली भांति नुमायां होती है, स्पष्ट होती है अतएव प्रस्तुत होती है इसीलिए यह मुद्रा अंजुरी है। सुसंगतता, संतुलन या तादात्म्य के अर्थ में सामंजस्य शब्द भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है जो इसी कड़ी से जुड़ा है। अंञ्ज् के स्पष्ट होते ही समञ्जस् के अर्थ खुलते हैं और फिर असमंजस के साथ कोई असमंजस नहीं रह जाता।
ब बात दुविधा की। दुविधा का अर्थ भी पसोपेश में पड़ना होता है। अनिर्णय की स्थिति को दुविधा कहते हैं। किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए जब एकाधिक संभाव्य विकल्प मौजूद हो तो असमंजस की स्थिति बनती है, यही दुविधा है। दुविधा शब्द का दुबधा रूप भी लोकशैली में प्रचलित है। दुविधा बना है द्वि + विधा से। द्वि अर्थात दो और विधा यानी राह, रास्ता, रीति या विकल्प। संस्कृत का विधा शब्द बना है विध् धातु से जिसमें चुभोना, काटना, सम्मानित करना, पूजा करना, राज्य करना जैसे भाव हैं। विध् का ही एक रूप वेध भी है जिसमें छेद करना, प्रवेश करना, चुभोना का भाव है। बींधना या बेधना जैसे शब्द इसी मूल से उपजे हैं। मोटे तौर पर विध् में राह, परिपाटी या रीति का भाव है। प्राचीन मानव ने पत्थरों पर उत्कीर्णन के जरिये ही खुद को विविध रूपों में अभिव्यक्त किया था। लकीरें खींचने, कुरेदने में पहले नुकीले पत्थर माध्यम बने, फिर तीरों के सिरे और फिर तराशने के महीन औजारों से यह काम हुआ। लकीर ही राह या रास्ते का पर्याय बनी। बाद में विकल्प, समाधान, रीति और तरीका के रूप में भी राह, रीति जैसे शब्द को नई अभिव्यक्त मिली। द्विविधा में किसी बात के दो समाधान या दो रूपों का ही भाव है। जाहिर है सत्य तो एक ही है। चुनाव अगर एक का करना है तब द्विविधा स्वाभाविक है। यही दुविधा है। प्रणाली, अनुष्ठान, रीति या तरीका के अर्थ में विधि का अर्थ भी यही है। विधि-विधान शब्द भी यहीं से आ रहा है। किसी बिध मिलना होय…में मिलने की राह तलाशने की जो उत्कंठा व्यंजित हो रही है उसका सूत्र इसी विध् से जुड़ता है। नियम, रीति, कानून के अर्थ मे विधान शब्द का मूल भी यही विध् है। आप्टे कोश इसका मूल वि+ धा बताता है किन्तु यह सिर्फ व्याकरिणक आधार है। दरअसल विधान के मूल में भी विध् धातु ही है। स्वाभाविक है कि नियम संहिता के अर्थ मे संविधान जैसा शब्द, जिसकी आत्मा में रीति-नीति बसती है, के जन्मसूत्र भी यहीं मिलते हैं।
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Thursday, July 29, 2010

रब्बी का मुरब्बा

murabba1ज़ मीन की एक नाप के बतौर मुरब्बा शब्द का इस्तेमाल हिन्दी समेत पश्चिमोत्तर भारत की ज़बानों में होता है। यह अरबी का शब्द है। भूमि के चौरस टुकड़े को मुरब्बा कहते हैं। वह भूखण्ड जिसकी सभी भुजाएं एक समान हों। वैसे यह भूमि की एक माप भी है। करीब पच्चीस एकड़ रक़बा मुरब्बा कहलाता है। वैसे मुरब्बा में किसी अंक का उसी से गुणा करने से प्राप्त नतीजे का भाव भी है। इस अर्थ में मुरब्बा के मायने पच्चीस गुणा पच्चीस मीटर का भूखण्ड भी मुरब्बा है और पच्चीस गुणा पच्चीस एकड़ भूमि भी मुरब्बा है। कम से कम बेवरली ई क्लैरिटी का इराकी-अरेबिक कोश तो यही कहता है। मुरब्बा का रिश्ता अरबी धातु r-b-b से है। रब्ब वही धातु है जिससे परमशक्तिमान के अर्थ में हिब्रू, अरबी भाषाओं के रब, रब्बी जैसे शब्द बने हैं जिसमें सर्वशक्तिमान, कृपानिधान, भगवान का भाव है।
ब शब्द का प्रयोग समूचे उत्तर भारत की बोलियों में होता है पर पश्चिमोत्तर की भाषाओं में, खासतौर पर पंजाबी में यह आम शब्द है। सूफी कवियों की वाणी ने ही इसे भारतीय भाषाओं में प्रसारित किया है। इश्क, प्यार, मुहब्बत के प्रसंगों में रब्ब, रब्बा या रब्बी जैसे शब्द हिन्दी फिल्मी गीतकारों के लिए भी अभिव्यक्ति का सशक्त जरिया है। हर दूसरी तीसरी फिल्म के प्रेमगीत में इसका इस्तेमाल नजर आता है। रब शब्द मूलतः सेमिटिक भाषा परिवार का है। हिब्रू में रब्ब शब्द का रूप रव या रब है जबकि अरबी में यह रब्ब है। हिब्रू और अरबी दोनों भाषाओं में इस शब्द का जन्म प्रोटो सेमिटिक धातु rbb से हुआ है।

... मुरब्बा जैसा खाद्य पदार्थ भारत को अरबों की देन है। इसी तरह अचार भी फारसी शब्द है। ये दोनों ही लम्बे समय तक चलनेवाले खास तरीकों से बने खाद्य पदार्थ हैं। स्पष्ट है कि सुरक्षा का जो भाव रब्ब में है, वही उससे बने रब या रब्बी में है। वही भूमि के चौरस टुकड़े और खाने के पदार्थ मुरब्बा में है ... murabba

रब अरबी में ईश्वर के 99 नामों में शुमार है। मूलतः रब्ब धातु में कुछ प्रमुख भाव समाहित हैं- 1.रखवाला, साथ ले जाने वाला, हर ज़रूरत का ख्याल रखनेवाला, इच्छा-पूर्ति करनेवाला। 2.संरक्षक, पालक, पिता, मार्गदर्शक। 3.सत्ताधीश, स्वामी, शक्तिमान, राजा। 4.नेता, प्रमुख, सर्वोच्च, धर्मगुरु, अन्नदाता, जिसके आगे सभी सर झुकाएं।
गौर करें तो पता चलता है कि रब्ब में मूलतः सुरक्षा का भाव निहित था। रब्ब का मूलार्थ घेरा, चहारदीवारी या घिरा हुआ स्थान है क्योंकि इसमें सुरक्षा प्राप्त होती है। अरबी में किला या गढ़ी के लिए रबात शब्द है। मोरक्को के एक शहर का नाम रबात भी है जो एक खाड़ी के मुहाने पर बसा है। रबात में परकोटे से घिरी बसाहट का भाव है। रब्ब में अरबी का मु उपसर्ग लगने से बनता है मुरब्बा जिसका अर्थ है संरक्षित, सुरक्षित। इसका प्रचलित अर्थ हुआ भूमि का चौरस टुकड़ा। दरअसल इसमें मूल भाव भूमि के घिरे हुए टुकड़े से ही था। रेगिस्तानी भूमि पर नदियों, झीलों जैसी प्राकृतिक विविधताएं बहुत कम होती हैं। वहां हर विभाजन चौकोर या समभुज ही होता है जबकि एशिया के शेष हिस्सों में नदियां, पहाड़ और झीलें सीमाओं का निर्धारण करती है। समूचे अरबी क्षेत्र के देश-प्रदेश के नक्शों के आकार से भी यह बात समझी जा सकती है। जाहिर है कि रब्ब में निहित सुरक्षित का भाव मुरब्बा में भूमि के चौरस खण्ड के रूप में व्यक्त हुआ। किले, गढ़ियां आमतौर पर चौकोर ही होते हैं।
ब्ब में निहित सुरक्षा के भाव की पुष्टि एक अन्य सेमिटिक शब्द मुरब्बा से होती है जो एक ज़ायकेदार मीठा व्यंजन है। आम या आंवले जैसे फलों को उबालकर शकर की गाढ़ी चाशनी में डालकर इसे तैयार किया जाता है। गाढ़ी चाशनी से इसका प्रसंस्करण हो जाता है और यह लम्बे समय तक सुरक्षित रहता है। मुरब्बा जैसा खाद्य पदार्थ भारत को अरबों की देन है। इसी तरह अचार भी फारसी शब्द है। ये दोनों ही लम्बे समय तक चलनेवाले खास तरीकों से बने खाद्य पदार्थ हैं। स्पष्ट है कि सुरक्षा का जो भाव रब्ब में है, वही उससे बने रब या रब्बी में है। वही भूमि के चौरस टुकड़े और खाने के पदार्थ मुरब्बा में है। हालांकि हिन्दी शब्दसागर मीठे मुरब्बे की वर्तनी मुरब्बह् और चौरस भूमि के अर्थ में मुरब्बअ बताता है, किन्तु मेरा मानना है कि यह मूलतः भाषा विकास के बाद के व्याकरणिक बदलाव हैं। मूलतः ये एक ही स्रोत से उपजे शब्द हैं। रब्ब से ही बनता है रब्बानी जिसका अर्थ है मालिक, रक्षा करनेवाला, ईश्वर आदि। मुरब्बी शब्द में वकील, संरक्षक, उस्ताद, गुरू का भाव है।

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