Sunday, November 4, 2007

तेज, तेजस्वी, तेजतर.....


उर्दू-फारसी में एक मुहावरा है तेज़ी दिखाना। इसका मतलब होता है होशियारी और शीघ्रता से काम निपटाना। तेज शब्द हिन्दी में भी चलता है और फारसी में भी । फर्क ये है कि जहां हिन्दी के तेज में नुक्ता नहीं लगता वहीं फारसी के तेज़ में नुक्ता लगता है।
फारसी-हिन्दी में समान रूप से लोकप्रिय यह शब्द मूलतः इंडो़-इरानी भाषा परिवार का शब्द है। संस्कृत और अवेस्ता में यह समान रूप से तेजस् के रूप में मौजूद है।
दरअसल हिन्दी , उर्दू और फारसी में जो तेज, तेज़ है उसके मूल में है तिज् धातु जिसका मतलब है पैना करना, बनाना। उत्तेजित करना वगैरह।
तिज् से बने तेजस् का अर्थ विस्तार ग़ज़ब का रहा। इसमें चमक, प्रखरता, तीव्रता, शीघ्रता जैसे भाव तो हैं ही साथ ही होशियारी, दिव्यता, बल, पराक्रम,चतुराई जैसे अर्थ भी इसमें निहित है। इसके अलावा चंचल, चपल, शरारती, दुष्ट, चालाक शख्सियत के लिए भी तेज़ विशेषण का प्रयोग किया जाता है। हिन्दी में तेजवंत, तेजवान , तेजस्वी, तेजोमय, तेजी, जैसे शब्द इससे ही बने हैं। इसी तरह उर्दू – फारसी में इससे तेज़ निग़ाह, तेज़ तर्रार, तेज़ दिमाग़, तेज़तर, जैसे शब्द बने हैं जो व्यक्ति की कुशलता, होशियारी, दूरदर्शिता आदि ज़ाहिर करते हैं। दिलचस्प बात ये कि तीव्रगामी, शीघ्रगामी की तर्ज पर हिन्दी में तेजगामी शब्द भी है। सिर्फ नुक्ते के फर्क़ के साथ यह लफ्ज़ फारसी में भी तेज़गामी है।
तेजी़ में तीखेपन का भाव भी है। तेज धार या तेज़ नोक से यह साफ है। दरअसल संस्कृत शब्द तीक्ष्ण के मूल में भी तिज् धातु है। तिज् से बना तीक्ष्ण जिसका मतलब होता है नुकीला, पैना, कठोर, कटु, कड़ा वगैरह। उग्रता , उष्णता, गर्मी आदि अर्थों में भी यह इस्तेमाल होता है। तीक्ष्ण का ही देसी रूप है तीखा जो हिन्दी के साथ साथ उर्दू में भी चलता है। इस तीखेपन को भारतीय मसालों की एक अहम कड़ी के रूप में तेजपान या तेजपात के रूप में समझा जा सकता है। अपनी तेज-तीखी गंध और स्वाद के चलते ही तेजपत्र को भारतीय मसालों में खास शोहरत मिली हुई ।

4 कमेंट्स:

अनूप शुक्ल said...

बहुत तेज लेख है। सीधा दिमाग में घुस गया। :)

Udan Tashtari said...

अज्ञानी के चक्षु खुल गये.

Pratyaksha said...

तेज़पत्र वाली बात रोचक है ।

रंजू said...

बहुत सही ओर रोचक जानकारी अजित जी

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