Monday, July 12, 2010

ज़ख़्म भी बेशर्म होता है…

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ना सूर वह घाव है जो हमेशा रिसता रहता है। यह जख्म भी हो सकता है या फोड़ा फुंसी भी जिसमें गहराई तक एक नली सी बन जाती है और अक्सर मवाद बहता रहता है। इसे ठीक होने में बहुत वक्त लगता है। इसीलिए किसी असाध्य समस्या के संदर्भ में नासूर शब्द में मुहावरे की अर्थवत्ता भी आ गई है। संभवतः नासूर, अरबी के ही नसा से बना है जिसमें नाड़ी का भाव है। शरीर की रक्त वाहिकाओं के लिए संस्कृत- हिन्दी में स्नायु, नस, नाड़ी या शिरा शब्द हैं जिनमें से नस का प्रयोग आमतौर पर होता है। यूं अरबी में नस शब्द नहीं मिलता है जिसका प्रचलन हिन्दी में खूब है। अरबी-फारसी के नब्ज और रग जैसे लफ्ज भी इन्हीं अर्थों में इस्तेमाल किए जाते हैं। अंग्रेजी में देखें तो इनके लिए नर्व, नर्वस जैसे शब्द चलन में हैं। खास बात ये कि नस या स्नायु और nerve, nervous जैसे शब्द एक ही मूल से जन्में है।
इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के ही एक शब्द sneu से ही इनका उद्गम माना जाता है। इसी से बना है संस्कृत का स्नु शब्द और स्नु से ही निकले हैं स्नायु और नस। वर्ण विपर्यय सिंद्धांत अर्थात अक्षरों का क्रम बदलने से स्नायु हो गया नस। हालांकि नब्ज शब्द अरबी का है और ये भाषा इंडो-यूरोपीय परिवार की नहीं है मगर ऐसा लगता है कि यह नब्ज भी अरबी में इंडो-यूरोपीय मूल से ही पहुंचा है। मिसाल के तौर पर अरबी में साइटिका नर्व को नसा कहा जाता है। कोई ताज्जुब नहीं कि अरबी का नब्ज और नसा भी वहीं से आया हो। इसी स्नु का एक अर्थ है बह निकलना या रिसाव। नासूर में रिसाव भी स्पष्ट है और स्नू में भी रिसाव है। नसा शब्द से निश्चित ही नासूर की रिश्तेदारी है। मद्दाह के कोश में भी नसा का अर्थ साइटिका नाड़ी दिया है। इसी तरह नासूर का अर्थ नाड़ीव्रण दिया हुआ है अर्थात नाड़ी तक गहराई वाला घाव या फोड़ा।
पूर्वी बोली में नासूर का नसूर रूप भी है। नासूर के लक्षण पर गौर करें तो इसकी उग्रता, तीव्रता और लगातार बढ़ते जाने की वजह से यह असाध्य माना जाता रहा है। ध्यान रहे नासूर उसी जख्म को कहते हैं जो बिगड़ चुका हो अर्थात इलाज के क्रम में भी ठीक न हो रहा हो। इसी नसूर से उस व्यक्ति के लिए नसूरिया> नसूड़िया शब्द चल पड़ा होगा जिसकी उपस्थिति या संपर्क से काम बिगड़ जाता हो अर्थात अपशकुनी, अमंगली। बरास्ता फारसी इसकी आमद हिन्दुस्तानी में हुई। कोई ताज्जुब नहीं कि इस नासूर से नसुरिया> नसूड़िया के कुछ रूपांतर पश्चिमोत्तर क्षेत्रों की बोलियों में भी मिलें। num ज्ञानमंडल शब्दकोश में इसका रूप नसूड़िया दिया है। गौरतलब है कि हिन्दी शब्दसागर, ज्ञानमंडल, वृहत हिन्दीकोश जैसे अधिकांश शब्दकोशों में हिन्दी की पूर्वी शैली वाले उच्चारणों की भरमार है क्योंकि इनकी रचना पूर्वी क्षेत्रों में ही हुई और इनके संपादक मंडल में भी ज्यादातर लोग उधर के ही भाषा भाषी थे।
हरहाल, नसूड़िया का अर्थ यहां भी अमंगली, अपशकुनी ही दिया है। हिन्दी शब्दसागर में इसकी व्युत्पत्ति अरबी के नासूर से दी गई है। अपशकुनी या अमंगली के अर्थ में अगर नसूड़िया के संस्कृत मूल से उद्भूत होने का आग्रह न हो तो फिलहाल एकमात्र उपलब्ध व्युत्पत्ति पर मैं भरोसा करना चाहूंगा। शिष्टाचार भी यही है कि जब तक दूसरी तार्किक व्युत्पत्ति न मिले, पहली से काम चलाया जाए। हालांकि शोध की गुंजाईश लगातार बनी रहेगी। विदेशज शब्दों में देशी प्रत्यय लगाकर लगातार शब्द बनते रहे हैं। ज्यॉग्रॉफी को उर्दू पंजाबी में जुगराफ़िया बना लिया जाता है। अरबी-फारसी का मेल तो एक हजार साल से भी ज्यादा पुराना है। नासूर> नसूर> नसूरिया > नसुड्ढा, निसळढा, निसल्डा जैसे रूपांतर संभव हैं। इसमें अमंगली के साथ ढीट, बेशर्म का भाव भी समाहित है। नासूर बेशर्म ही होता है। ब्लागर साथी प्रतीक पांडे बताते हैं कि औरैया-इटावा की तरफ़ यह शब्द "निसुड्ढ" के रूप में काफ़ी प्रचलित है। साथ ही "निसुड्ढपन" फैलाना और "निसुड्ढे" जैसे बाक़ी सारे इस्तेमाल अभी भी बहुत आम हैं।
सी तरह अपशकुनि, अमंगली के अर्थ में हिन्दी क्षेत्रों में एक शब्द और इस्तेमाल होता है सूम। मालवी, राजस्थानी में इसमें अड़ा / अड़ी प्रत्यय लगाकर सूम + अड़ा= सूमड़ा या सूम + अड़ी= सूमड़ी जैसे शब्द भी बना लिए जाते हैं। सूम, सूमड़ा, सूमड़ी मूलतः अरबी से बरास्ता फारसी, उर्दू होते हुए हिन्दी आया हुआ शब्द है। यह बना है सेमिटिक धातु sh--m अर्थात शूम से जिसका अर्थ भी अनिष्टकारी, अमंगलकारी, कंजूस, मक्खीचूस, मनहूस, कृपण आदि। हिन्दी का सूम इसी शूम का रूपांतर है जिसमें मूलतः अमंगली या कृपण के साथ-साथ कंजूस का भाव प्रमु्खता से उभरता है।

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15 कमेंट्स:

shikha varshney said...

आपका ब्लॉग तो ज्ञान का भण्डार है

वन्दना अवस्थी दुबे said...

क्या शानदार हैडिंग है!!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

क्या शानदार हैडिंग है!

Udan Tashtari said...

ज्ञानवर्धक आलेख...

गिरिजेश राव said...

आपका ब्लॉग तो ज्ञान का भण्डार है| यहाँ आना अनूठे आनन्द की अनुभूति देता है।
ये बताइए उल्टे स्वस्तिक और अंकमाला का लेख के विषय से क्या सम्बन्ध है?

अजित वडनेरकर said...

गिरिजेश भाई,
दो दिनी वैवाहिक आयोजन की खुमारी छायी है।
मूल विषय संबंधी तस्वीरें जुगुप्सा जगा रही थीं।
सो यूं ही....

आपकी तेज दृष्टि का कायल हूं।
वाम चिंतन को एक साथ पढ़ूंगा। कल नज़र गई थी। इन दिनों
सफर पर भी आने की फुर्सत नहीं है। बीते तीन माह से काफी व्यस्तता है।

शुभकामनाएं

प्रवीण पाण्डेय said...

जख्म का नासूर बनना तो खतरनाक होता है ।

Mrs. Asha Joglekar said...

स्नु से स्नायू और नस और फिर नासूर से नसुरिया । शब्दों का सफर तो होता ही है कमाल का और तिस पर आप जैसे इस सफर को रोचक बनाने वाले शोध कर्ता हों तो सोने पे सुहागा । संस्कृत में एक और शब्द होता है स्नुषा जिसको पंजाबी में नू कहते हैं पुत्र-वधू के अर्थ में प्रयोग होता है आशा है उसका इससे कोई संबंध न होगा ।

Mrs. Asha Joglekar said...

आशा है आपका जख्म पूरी तरह से ठीक हो गया होगा । स्वस्तिक कहीं ये तो नही दर्शा रहा कि हिटलर की महत्वाकांक्षा जर्मनी और नात्सीयों के लिये कैसे नासूर बन गई थी ।

निर्मला कपिला said...

बहुत ग्यानवर्द्धक आलेख धन्यवाद।

ali said...

फिलहाल श्रीमती जोगलेकर की टिप्पणी हमारी भी मानी जाये :)

Mansoor Ali said...

'ज़ख्म' 'नासूर' बन रहे है अब,
सुस्त रफ्तारियाँ है 'नब्ज़ों' में,
बोल बाला है 'सूमड़ो' का अब,
हक़ का मज़मून गुम है लफ्ज़ो में.

अजित वडनेरकर said...

बोलबाला सूमड़ों का है अब...
बहुत खूब मंसूर साहब....

किरण राजपुरोहित नितिला said...

राजस्थानी में सूमड़े शब्द का प्रयोग ऐसे इंसान के लिये होता है जो बेनूर सी सूरत बनाकर बोले नही और दूसरो में शामिल न हो ।

Baljit Basi said...

पंजाबी का नू(नूंह) स्नुषा से ही बना है.

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