Tuesday, October 12, 2010

क्या बाज़ार ही भाषा को भ्रष्ट करता है? [बाज़ारवाद-3]

साहित्य रचना के लिए परिष्कृत भाषा ज़रूरी होती है मगर बोलचाल की भाषा या बाज़ार की भाषा में विचार व्यक्त नहीं हो सकता यह तथ्य सौ फीसद सच नहीं है क्योंकि लोक में प्रचलित सैकड़ों उक्तियों, कहावतों और मुहावरों में प्रचलित भाषा का ही प्रयोग हुआ है। इन्हें गढ़नेवाले समाज ने चलताऊ और बाजारू शब्दों का इस्तेमाल किया है जिसका उद्धेश्य आम आदमी तक गूढ़, शिक्षाप्रद संवाद को सुगम बनाना था। कबीर की सधुक्कड़ी भाषा को साहित्यिक या अत्यंत परिष्कृत नहीं कहा जाता। भाषाई संस्कार की जकड़न से मुक्त उनकी भाषा या बोली पर विद्वानों ने गहन चिन्तन किया है और पाया है कि आम लोगों की बोली में उन्होंने प्रचुर वैचारिक सम्पदा रच दी। हमारे संवाद में अधिकांश हिस्सा बाज़ार की भाषा का ही होता है।

निश्चित ही आज के मीडिया में जिस भाषाई संकट की सर्वाधिक चिन्ता जताई जा रही है वह दरअसल अभिव्यक्ति के विविध आयामों से वंचित होते जाने के भयावह भविष्य की ओर संकेत करता है। हिन्दी अख़बारों के पास इस वक्त शब्दों का भयंकर अकाल है। प्यून शब्द के प्रति आग्रह के चलते अब वे भ्रत्य शब्द को विदेशी समझने लगे हैं। भ्रत्य को अगर कठिन मान भी लिया जाए तो उसके आसान विकल्प चपरासी पर पूरा न्यूज़ रूम चर्चा में डूब जाता है कि जिस तरह से सफ़ाईकर्मी के लिए अगर भंगी शब्द का इस्तेमाल करने पर कोई बवाल खड़ा होता, वैसा ही भ्रत्य के स्थान पर अगर चपरासी शब्द का इस्तेमाल करने पर होता। लिहाज़ा वर्गभेद की खाई को पाटने के लिए अंग्रेजी का प्यून ही तारणहार बनकर हमारे पत्रकारों के दिमाग़ में कौंधता है।

चाय की छोटी दुकानों पर आधा कप चाय के लिए कट और खास चाय के लिए डीलक्स, सुपर जैसे शब्द प्रचलित हैं। ये अंग्रेजी के शब्द हैं। हिन्दी में इनका इस्तेमाल खूब होता है। ये दुकाने आमतौर पर सड़क की पटरी पर होती हैं। फुटपाथ के लिए पटरी शब्द बहुतप्रचलित नहीं है। सड़क किनारे की चाय की दुकान के लिए अगर मेरे दिमाग़ में फुटपाथी टीस्टाल शब्द कौंधता है तो क्या यह भाषा को भ्रष्ट करने की मिसाल है? चाय की दुकान को चाय की थड़ी भी कहा जाता है मगर टीस्टाल शब्द लोकमानस में खूब प्रचलित है। इसमें कोई दो राय नहीं कि समकालीन प्रचलित अन्य भाषाओं से शब्दों को उदारतापूर्वक लेने, नए शब्द गढ़ने और उनके विविधअर्थी प्रयोगों से ही कोई भाषा समृद्ध बन सकती है। मगर यह भी उचित नहीं कि हमारी अपनी सक्षम भाषा के विराट शब्दभंडार की उपेक्षा कर जबर्दस्ती सिर्फ एक भाषा अर्थात अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करने पर ज़ोर दिया जाए।

रल और आसान भाषा लिखने की (कु)चेष्टा के चलते संचार माध्यमों में जो हिन्दी रची जा रही है, राष्ट्रभाषा और मातृभाषा जैसे विशेषणों के संदर्भों में लगता नहीं कि हम हिन्दी का सम्मान करते हैं। पिछले एक अर्से से लगातार संचार माध्यमों में हिन्दी का स्तर गिरा है। भाषाओं के संदर्भ में वर्तनी की गलती या अशुद्ध उच्चारण आमतौर पर किसी से भी हो सकता है मगर आसान भाषा की आड़ में बोलचाल के शब्दों से लगातार किनारा करते जाना भयावह है। मज़े की बात यह भी कि आसान भाषा का नारा लगानेवाले ये पत्रकार बंधु खुद अर्धशिक्षितों जैसी भाषा लिखते है, क्योंकि परिनिष्ठित भाषा लिखना इन्हें आता नही...और इसीलिए इन्होंने खुद ही तय कर लिया कि अच्छी हिन्दी दरअसल कठिन होती है। तब क्या किया जाए? सीधी सी बात है, जो बोलचाल की अंग्रेजी मिश्रित भाषा है, वही लिख दी जाए। हाल ये है कि एक बड़े हिन्दी दैनिक से अंग्रेजी के रेगुलर ने नियमित को, डेली वजेस ने दैनिक वेतनभोगी को, सैलरी ने तनख्वाह को और प्यून ने चपरासी या भ्रत्य को ख़ारिज़ कर दिया है।
-जारी

14 कमेंट्स:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बाज़ार के साथ-साथ बदलते जीवन का उथलापन भी भाषा को उतना ही भ्रष्ट करता है.

संगीता पुरी said...

आधा कप चाय के लिए कट
हमारे यहां आधी कप चाय हाफ चाय से अब हाफचा बन गयी है !!
बाजार ही तो हर चीज को प्रभावित करती है .. भला भाषा केसे बचे इससे ??

anshumala said...

मेरे संपादक ने कहा की अख़बार जरुर भाषा के जानकर बनाते है पर उसे पढ़ने वाला तो आम आदमी है यदि उसे ही हमारी सही और अच्छी हिंदी के शब्दों का मतलब ही नहीं पता है तो उसे लिखने से फायदा क्या तो वही लिखिए जो आम बोलचाल में प्रचलित है पर हा वहा भी अनुशासित रहे किन आम शब्दों का प्रयोग करना है और किसका बिलकुल नहीं |

k.jain said...

समस्या यह है कि हिंदी तो इन अख़बारों को बाजारवाद के चक्कर में लिखनी पड़ रही है पर मन मंदिर में तो मैकाले और प्रगतिवादी संघ विराजमान हैं जो अपनी संस्कृति से जुडी हर बात को दकियानूसी समझतें हैं| उसके लिए इनके मन में सम्मान की कोई भावना नहीं है| अंग्रेजी लिखने बोलने में तो जरा सी गलती को आपकी अनपढ़ता समझ लिया जाता है और उस पर लोग हँसते भी हैं परन्तु एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसमें गलतियों की और ध्यान दिलाने पर आपको शुद्धतावादी, ब्राह्मणवाद का पोषक और न जाने क्या क्या कहा जाता है| हिंदी भाषा का अज्ञान सरलता के नाम पर खपाया जा रहा है| के० जैन

शोभना चौरे said...

गाँव में ,मजदूर वर्ग में तो टेंसन (टेंशन )ही टेंशन है |तनाव शब्द क्या होता है मालूम ही नहीं ?दूर क्यों जाये म .प्र .की हिंदी की प्राथमिक शालाओ की कोर्स की किताबो के नम्बर अंगेजी में ही होते है गिनती तो १ से १० तक सिख रहे है पर लिखित में वन से तें है ....

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

पहले जहां दस लिखते/कहते थे, अब हजार लिखते/कहते हैं। सो पानी मिलना लाजमी है।
बाजारू चल रहा है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है कि स्तरीय लोग बाजार हथिया नहीं पा रहे। दकियानूसी बने हैं। प्रयोगधर्मी नहीं हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

बाजार जहाँ भाषा को प्रभावित करता है वहीं उसे लोकप्रिय भी बनाता है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप की बातों से सहमति है। मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि मैं कैसी भाषा प्रयोग में लेता हूँ। लेकिन कोई बताने की जहमत उठाए तब न?

विनोद शर्मा said...

मैं इस आलेख से अक्षरशः सहमत हूँ। बिलकुल मेरे दिल की आवाज है यह आलेख। आपके दो वाक्य उद्धृत करना चाहूँगा,
हिन्दी अख़बारों के पास इस वक्त शब्दों का भयंकर अकाल है।
भाषाओं के संदर्भ में वर्तनी की गलती या अशुद्ध उच्चारण आमतौर पर किसी से भी हो सकता है।

यहाँ बहुत ही विनम्रता से मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि ऊपर उद्धृत दूसरा वाक्य आम आदमी के संदर्भ में है या
यह साहित्य की अलग-अलग विधाओं में सृजन-कार्य कर रहे नव-हिंदी प्रेमियों पर भी लागू होता है। उच्चारण दोष
के तो आंचलिकता जैसे कई कारण संभव हैं, किंतु बारंबार की जाने वाली वर्तनी की भूलों को क्या आप अनदेखा
करने के पक्ष में हैं। कृपया इसे मेरी धृष्टता न समझें, यह मेरा हिंदी के प्रति अनुराग है जिसके कारण इसका अपमान
होते देख-सुन कर मन पीड़ा से भर जाता है।
-विनोद शर्मा

Mansoor Ali said...

'धोबी' को धोबी कहना अब गाली लगता है,
नृत्य, भृत्य शब्दों में अब कुछ जाली लगता है,
'short' लुभाते हमको, 'low cut' पर तो न्योछावर !
'शुद्ध-विचार' ! हमको 'गुजराती थाली' लगता है.
=================================
कौन भ्रष्ट किसे करता है; आओ जाने,
अपनी भाषा के शब्दों से हम अनजाने,
'भृत्य' हमें क्यों 'peon' से कमतर लगता है?
'स्वीपर' ' कैसे अब ख़ुद को 'भंगी' माने !
बढ़ी गरिमा, अपनी भी "बाज़ार" के संग,
'colour' हमारा निखरा जबसे भूले 'रंग'.
=================================
mansoorali हाश्मी
http://aatm-manthan.com

Dr. shyam gupta said...

""हमारे संवाद में अधिकांश हिस्सा बाज़ार की भाषा का ही होता है।""--यह सही नही-- वस्तुतः सामान्य जन बाज़ारू नहीं घरेलू भाषा का प्रयोग करता है। घरेलू भाषा व बाज़ारू भाषा में वही अन्तर है जो घरेलू स्त्री व बाज़ारू स्त्री में होता है। अतः समाचार पत्रों, कबीर की बानी, व सामान्य जन जन के लिये साहित्य निश्चय ही घरेलू भाषा में होना चाहिये, बाज़ारू में नहीं; परंतु शास्त्रीय व उच्च साहित्य सदैव परिष्क्रत भाषा में ही होना चाहिये क्योंकि शास्त्र व उच्च साहित्य से ही भाषा उन्नत होकर जन सामान्य तक आती है व प्रगति के सोपान खुलते हैं।
---अतः यह सही ही है कि---"बाज़ार ही भाषा को भ्रष्ट करता है?"

अजित वडनेरकर said...

@श्याम गुप्ता
डॉक्टर साब, आपने घरेलु भाषा की बात अच्छी कही। मगर गौर करें, इस शृंखला में मैने बाज़ारू भाषा की नहीं बल्कि बाज़ार की भाषा का संदर्भ रखा है। दोनों में अंतर है। बाज़ारू शब्द में जो हलकापन है उससे सब परिचित हैं। बाजा़र की भाषा से तात्पर्य बाज़ारवादी रुझान के चलते भाषा पर पड़नेवाला प्रभाव। विभिन्न उत्पादों के नाम, प्रवृत्तियां, मुहावरे आदि बाज़ार की देन हैं। यह सदियों से होता आया है। व्यापारिक काफ़िलों के जरिए शब्दों का जितना व्यापार हुआ है, वह सचमुच अनोखा है। संवाद का हिस्सा बाज़ार की भाषा होती है पर भी आपने क्षेपक रखा है। वहां भी तात्पर्य बाज़ारू भाषा से नहीं है। बाज़ारू भाषा से हमारा तात्पर्य स्तरहीन और अश्लील शब्दावली से भरपूर भाषा से होता है।

किरण राजपुरोहित नितिला said...

बाजार में हिंदी का रूप इतना नहीं बिगड़ा है जितना की इन प्रेस वालो ने हिंदी का कचरा कर रखा है . क्लिष्ट हिंदी इतनी मुश्किल नहीं है जीतनी की होवा कर दिया है . प्रेस ने दूसरी भाषा के शब्द डाल कर उन्हें आमजन में लोकप्रिय कर दिया है क्या वे हिंदी के बढ़िया शब्द को लोकप्रिय नहीं कर सकते ? जैसे -तत्काल आरक्षण के कारण तत्काल लोकप्रिय हो गया. रंग दे बसंती ने पाठशाला को जीवित कर दिया .
आजकल गीतकार पुराने शब्दों को जीवित कर रहे है .
जैसे जिया हिया रसिया .

ali said...

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