Sunday, October 31, 2010

प्रभा खेतान और ‘पीली आंधी’

logo_thumb20[2]रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार शामिल किया है सुप्रसिद्ध लेखिका प्रभा खेतान के चर्चित उपन्यास पीली आंधी को। प्रभाजी की स्त्री उपेक्षिता कॉलेज के ज़माने में पढ़ी थी। उसके बाद उनकी किसी कृति से गुज़रना न हुआ। उनकी कई किताबें चर्चित हूईं। बरसों बाद अब जाकर उनके कथा साहित्य को पढ़ना शुरू कुया है जिसकी कड़ी में अभी अभी इस उपन्यास को हमने पूरा किया है। प्रभाजी के बारे में विस्तार से सफ़र के पाठकों को बताने के लिए जेब नेट को खंगाला तो ख्यात समालोचक अरुण माहेश्वरी के ब्लाग कलम पर पहुँचना हुआ। अरुणजी ने प्रभाजी निधन के बाद अपने ब्लॉग पर एक संस्मरण लिखा था, उसका ही एक अंश है यह पुस्तक चर्चा। पीली आंधी के बारे में इससे बेहतर परिचय और कुछ नहीं हो सकता था, जैसा अरुणजी ने लिखा, सो हम साभार वही अंश यहा दे रहे हैं। किताब राजकमल ने प्रकाशित की है। पुस्तकों के शौकीनों को हम इसे अपने संग्रह में शामिल करने की सलाह देंगे।...

पी
ली आंधी' में प्रभा जी ने सोमा के जिस चरित्र की रचना की थी, वह शायद उन्हींका अपना काम्य व्यक्तित्व रहा होगा जो अपने
dr.prabhakhaitanख्यात लेखिका प्रभा खेतान अपने वक्त से बहुत आगे थीं। लेखन के क्षेत्र के साथ वे  उद्योग जगत की भी जानी मानी हस्ती थीं। कोलकाता चैम्बर ऑफ कामर्स की वे एकमात्र महिला अध्यक्ष थीं। उनके बारे में विस्तार से पढ़ें यहाँ…और विकिपीडिया पर भी। 
मारवाड़ीपन की ग्रंथी को झटक कर अपने पैसे वाले नपूंसक मारवाड़ी पति को ठुकरा देती है और एक बंगाली प्रोफेसर के साथ घर बसाती है। यहां पीली आंधी के बारे में थोड़ा विस्तार से चर्चा करना उचित होगा, क्योंकि यही एक ऐसा उपन्यास है जिसे प्रभाजी के जीवन-काल की बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। यह उपन्यास दो हिस्सों में है। इसके प्रथम हिस्से का मुख्य चरित्र है माधोबाबू जिसने राजस्थान से आकर कोलकाता के निकट धनबाद-रानीगंज-झरिया के इलाके में अपनी कोयला खदानों का साम्राज्यफैलाया था और इसी उद्यम में वह खप गया था। मृत्यु के वक्त भी माधोबाबू आंख बंद किये यही सोच रहा था कि ''बीमार हूं, लोग कहते हैं थोड़े दिन के लिये बनारस हो आइये, मन बदल जायेगा। नहीं, मुझे यहां रानीगंज में ही अच्छा लगता है। यहां से पड़ा-पड़ा कोयला खान को देखता रहता हूं ...इतना पैसा इतनी ठाट-बाट।'
माधो बाबू की यह मानसिकता वैसी ही थी जिसे इतालवीं मार्क्सवादी विचारक ग्राम्शी ने फोर्डवाद की संज्ञा दी थी। फोर्डवाद उम्र की आखिरी घड़ी तक कर्मलीन मुनाफे और अपनी पूंजी के साम्राज्य-विस्तार की सीमाहीन लिप्सा को मूर्तिमान करने वाली प्राणीसत्ता का सिध्दांत है। माधो बाबू इसी के एक लघु भारतीय संस्करण थे। माधो बाबू तो कोलियरियों का साम्राज्य फैलाने में ही मर-खप गये, लेकिन अपने पीछे उन्होंने अन्य मानवीय गुण-दोष वाले जिंदा लोगों का एक पूरा परिवार छोड़ा था। 'पीली आंधी' उपन्यास का दूसरा भाग ऐसे ही बाकी के मानवीय चरित्रों को लेकर है।  माधो बाबू अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद राजस्थान में अपने गांव से अपने से काफी कम उम्र की एक लड़की पद्मावती को ब्याह लाये थे। उम्र में कम होने पर भी पद में बड़ी होने के नाते पद्मावती माधोबाबू और उनके छोटे भाई सांवर के परिवार में उनके जीवित काल में ही अपना केंद्रीय स्थान बना लेती है। माधोबाबू का एक विश्वस्त गुमाश्ता था पन्नालाल सुराणा, उनके पुराने सेठ की गद्दी के मुनीम म्हालीराम का इंजीनियर बेटा। माधो बाबू ने अपनी जायदाद की आधी पाती पद्मावती को दी थी और मरते वक्त सुराणा को कहा था कि वे पद्मावती के हितों का ध्यान रखेंगे। माधोबाबू के अपनी कोई संतान नहीं थी।
पन्यास के दूसरे हिस्से में माधोबाबू के भाई सांवर का भरापूरा परिवार है जो कोलकाता में बस गया है। पद्मावती इस परिवार की ताईजी के रूप में परिवार की केंद्रीय धुरी होती है। लेकिन इस ताईजी के व्यवहार में अजीबोगरीब विरोधाभास दिखाई देते हैं। ऊपर से तो वे एक टिपिकल संयुक्त वाणिज्यिक परिवार की तमाम नैतिकताओं के संरक्षण का केंद्र दिखाई देती है, लेकिन जब उनकी मृत्यु होती है तो वे अपनी सारी संपत्ति सांवर के छोटे बेटे की उस बहू सोमा के नाम लिख जाती है जो अपने नपूंसक पति से विद्रोह करके एक बंगाली प्रोफेसर के साथ रहने के लिये घर छोड़ देती है, और जिसे घर का दूसरा कोई भी कभी अपना नहीं पाता है। सोमा अपनी ताईजी की संपत्ति तो नहीं लेती लेकिन लाल कपड़े में बंधी ताईजी की उस पुस्तक को ले जाती है जिसे घर के सभी लोग गीता समझते थे। दरअसल वह किताब गीता नहीं बल्कि पन्नालाल सुराणा की निजी डायरी थी जिसमें उन्होंने पद्मावती के साथ अपने Piili aandhiअंतरंग संबंधों के बारे में लिखा था। उपन्यास के अंत में इसी डायरी की चर्चा से ताईजी के चरित्र की अपनी खासियत पर से पर्दा उठता है और यह भी जाहिर होता है कि क्यों संयुक्त परिवार की सामंती नैतिकताओं की प्रतीक बनी पद्मावती व्यक्ति सोमा के मर्म को समझने में समर्थ हुई थी।
'पीली आंधी' पर एक बार प्रभाजी के घर में बात हो रही थी और तब प्रभाजी ने बताया था कि उनके इस उपन्यास को उनके संपर्क के कई मारवाड़ी मित्रों ने मारवाड़ी समाज की निंदा कहा था। ताईजी अर्थात पद्मावती और सोमा का चरित्र ऐसे लोगों को नागवार गुजर रहा था। संभवत: प्रभाजी की इसी 'गलती' को दुरुस्त करने के लिये अलका सरावगी ने 'कलिकथा वाया बाईपास'' के जरिये उसी कथानक का नया पाठ तैयार किया। उस उपन्यास का केन्द्रीय चरित्र है किषोर बाबू, माधो बाबू का एक नैतिक प्रतिरूप। किशोर बाबू माधो बाबू की तरह धन कमाने की धुन में मरता नहीं है, अपनी नैतिकता का झंडा बुलंद करने के लिये मरते हुए भी बाई पास सर्जरी से जी उठता हैं। उपन्यास के अन्य सारे चरित्र किशोर बाबू की धुरी पर घूमते रहते हैं। किशोर बाबू तमाम 'श्रेष्ठताओं' का पुंज होता है और, इसीसे 'मारवाड़ी श्रेष्ठता' का एक पूरा आख्यान लिख दिया जाता है। जाहिर है 'जातीय श्रेष्ठता' के किसी आख्यान में पद्मावती, सोमा तो दूर की बात, किसी भी स्वतंत्र और स्वावलंबी नारी चरित्र के लिये कोई स्थान नहीं हो सकता था। और बिल्कुल वैसा ही हुआ भी। इस बारे में यही कहना चाहूंगा कि तमाम कलात्मक मुलम्मों के बावजूद नकल नकल ही रहती है। जीवन के किसी बृहद परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत करने की आलोचनात्मक यथार्थवादी दृष्टिै खुद में एक सृजनात्मक उपलब्धि है, इसे सिर्फ किसी नयी पैकेजिंग का मामला भर नहीं बनाया जा सकता है। प्रभाजी ने इस आलोचनात्मक यथार्थवादी दृष्टिक‍ को अर्जित किया था। 'पीली आंधी' के पद्मावती और सोमा के 'विरासत' के प्रसंग ने प्रियम्वदा बिड़ला की वसीयत से जुड़े बहुचर्चित प्रकरण के वक्त इस लेखक को अनायास ही उस उपन्यास की याद दिला दी थी और 'एक वसीयत दो उपन्यास' की तरह की टिप्पणी लिखी गयी थी। [अरुण माहेश्वरी के ब्लॉग क़लम से साभार]
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11 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर आलेख, इस के साथ ही कलम से परिचय कराने के लिए आभार!

Rahul Singh said...

मुझे बहुत पहले देखा 'चांद' का मारवाड़ी अंक याद आ रहा है.

ali said...

प्रस्तुति पसंद आई ! अब उपन्यास भी देखते हैं !

मनोज भारती said...

प्रभा खेतान को थोड़ा बहुत पढ़ा है । उनके लेखन में अस्तित्ववादी दर्शन है और साथ ही स्त्री -विमर्श भी । इस जानकारी के लिए आभार ।

उपेन्द्र said...

प्रभा जी और उनके इस उपन्यास से परिचय करने के लिए धन्यवाद

mahendra verma said...

प्रख्यात लेखिका प्रभा खेतान जी का उपन्यास‘पीली आंधी‘ की विस्तृत समीक्षा अच्छी लगी...आभार।

केवल राम said...

प्रभा खेतान का योगदान वैसे तो कथा साहित्य में ज्यादा है , परन्तु कवितायेँ भी उन्होंने बखूबी लिखी है ,समीक्षा के क्षेत्र में भी उनकी खासी पहचान है ,"उपनिवेश में स्त्री मुक्ति कामना की दस वार्ताएं " उनकी सम्पादित पुस्तक है , परन्तु वर्तमान परिवेश के संदर्भ उन्होंने स्त्री मुक्ति चर्चा की है , सार्त्र और कामू पर भी काफी कुछ लिखा है प्रभा जी ने , कुल मिलकर प्रभा जी सम्पूर्ण साहित्यकार थी ,और उससे आगे बढ़कर एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व , संवेदना भरा ह्रदय ......आपकी समीक्षा ने भी काफी कुछ विश्लेषित किया है ......सार्थक पोस्ट ,
शुभकामनायें

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

पीली आँधी की समीक्षा बहुत बढ़िया रही!

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी ये चर्चा बहुत सुन्दर रही, अच्छा विश्लेषण है. हमें भी अपने शोध कार्य के दौरान मौका मिला इसको पढने का.
आप बधाई के पात्र हैं, इसको पुनः स्मरण करवाने के लिए.
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

रंजना said...

पीली आंधी,कुछ ही दिनों के अंतराल में चार बार पढी...कथा ने मुझे ऐसे सम्मोहित किया की कह नहीं सकती...

नीरज गोस्वामी said...

शानदार प्रस्तुतीकरण...प्रभा जी विलक्षण लेखिका थीं...उनकी आत्म कथा "अन्या से अनन्या" अद्वितीय है और अवश्य पढ़ने लायक है...

नीरज

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