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| "कन्नड़ में गण्डा का अर्थ होता है मोटा आदमी । इसका एक अन्य अर्थ है शक्तिशाली पुरुष । ध्यान रहे उभार की अर्थवत्ता के चलते ही गण्ड में नायकत्व का भाव आया है अर्थात जो दूसरों से ऊपर दिखे ।" |
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पिछली कड़ी-‘काम’ में ‘कमी’ की तलाश [कम-1]
श्रम विभाजन और वर्ग विभाजन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । कार्मिक विभाजन हुआ ही इसलिए था क्योंकि जो पहले से श्रेष्ठ थे वे बेहतर स्थिति में रहें । श्रम से जुड़ी व्यवस्था में मनुष्य ने ‘कर्म’ शब्द के साथ भी भेदभाव बरता । कर्म से जुड़ी सामान्य सामाजिक-पहचान सदियों बाद जातीय पहचान बन गई और फिर उस शब्द को हीन अर्थों में देखा जाने लगा । रोज़मर्रा से जुड़े तमाम कार्यों को सम्पादित करने वाले श्रमिक समाज पर नज़र डालिए, एक नहीं, हज़ारों ऐसे शब्द मिल जाएँगे । दुनियाभर के समाजों में मनुष्य सदियों से जातीय हीनता का दंश सहता रहा है । प्रायः सभी भाषाओं में नस्ली भेदभाव के शब्द मिलते हैं । भारतीय भाषाओं में भी ये हैं । वैदिक साहित्य से ही ये साक्ष्य मिलने लगते हैं । बहरहाल, ‘कमीन’ शब्द के सन्दर्भ में हमेशा ग़लतफ़हमी रही है । हिन्दी में ‘कमीन’ शब्द भी प्रचलित है और ‘कमीना’ भी । दोनो को एक ही समझा जाता है । देखा जाए तो दोनो में बहुत ज्यादा अन्तर भी नहीं है । अपने मूल रूप में ये दोनों ही अपशब्द नहीं थे, मगर आज दोनों की ही अर्थावनति हो चुकी है और इनका प्रयोग अभद्र बोल-व्यवहार समझा जाता है ।
फ़ारसी का कमीना
‘कम’ शब्द की तरह ही ‘कमीन’ शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में भी हिन्दी कोश ज्यादा जानकारी नहीं देते हैं । अलबत्ता यह स्पष्ट है कि हिन्दी में आज गाली की तरह मशहूर ‘कमीना’ शब्द फ़ारसी मूल के ‘कमीनः’ (कमीनह्) से बना है । संस्कृत-फारसी का विसर्ग हिन्दी में स्वर हो जात है । सवाल यह है कि ‘कमीन’ शब्द कहाँ से आया है ? मोटे तौर पर तो ‘कमीन’ और ‘कमीना’ एक ही जान पड़ते हैं मगर ‘कमीना’ जहाँ सौ फ़ीसद फ़ारसी शब्द है, वहीं ‘कमीन’ शब्द का रिश्ता एकाध जगह फ़ारसी से और कुछ जगह हिन्दी से बताया गया है । हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी के कई कोशों में तो ‘कमीन’ शब्द दर्ज़ तक नहीं हुआ है । शायद इसीलिए कि ‘कमीन’ को ‘कमीना’ का पर्याय मान लिया गया । मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश ‘कमीन’ शब्द है ही नहीं और फ़ैलन के कोश में ‘कमीन’ शब्द को तो हिन्दी का बताया गया है मगर उसकी व्युत्पत्ति फ़ारसी ‘कमीनः’ से बताई गई है । ‘कमीन’ का अर्थ फ़ैलन नीच जात बताते हैं और ‘कमीना’ का अर्थ टहलुआ, चाकर, सेवक, नौकर, दास आदि । फैलन ‘कार-कमीन’ और ‘कमीन-कंडु’ शब्दों का उल्लेख भी करते हैं ।
कम्मी से कमीन
‘कमीन’ शब्द प्राचीन भारतीय समाज की जजमानी प्रथा के सन्दर्भ में सामने आता है और इसीलिए मेरे विचार में हिन्दी के ‘कमीन’ और ‘कमीना’ दो अलग अलग शब्द है, दोनों की अलग अलग अर्थवत्ता है और दोनों के जन्मसन्दर्भ भी पृथक है । ‘कमीना’ बना है फ़ारसी के ‘कमीनः’ से जिसके मूल में ‘थोड़ा’, ‘कुछ’, ‘न्यून’ के अर्थवाला फ़ारसी का ‘कम’ शब्द है । इसका रिश्ता पुरानी फ़ारसी और अवेस्ता के ‘कम्ना’ शब्द से है । दूसरी ओर ‘कमीन’ शब्द के मूल में संस्कृत का ‘कर्म’ शब्द है । पाली, अपभ्रंश में ‘कर्म’ का ‘कम्म’ रूप होता है । हिन्दी के विभिन्न रूपों में ‘कार्य’ के अर्थ में प्रचलित ‘काम’ शब्द इसी ‘कम्म’ का अगला रूप है । जिस तरह हिन्दी का ‘काम’ शब्द पाली , अपभ्रंश के ‘कम्म’ का रूपान्तर है उसी तरह पाली के ‘कम्मी’, ‘कम्मिक’ ( पाली हिन्दी कोश, भदन्त आनन्द कौसल्यायन ) का रूपान्तर है हिन्दी का ‘कमीन’ शब्द जिसका आशय है कार्मिक, कर्मी, करने वाला , मज़दूर, श्रमिक आदि । प्रचलित तौर पर वे जातियाँ जो सेवाएँ लेती हैं उन्हें ‘जजमान’ कहते हैं और वे जातियाँ जो सेवाएँ प्रदान करती हैं, उन्हें ‘कमीन’ कहते हैं । सो काम करने वाले ‘कम्मी’ कहलाए । अब यहाँ ‘कमीन’ नीच व्यक्ति नहीं है बल्कि इसका अर्थ है ‘कार्मिक – कर्मकार’ । शोषण का दायरा जब व्यापक हुआ तब निम्नवर्गीय सेवाओं और गौण कृषिकर्म करने वाले तबकों को ‘कम्मी’ कहा जाने लगा । बाद के दौर में तो ब्राह्मणों के सेवाकर्म को छोड़ कर शेष सभी सेवाएँ गौण कर्म समझी जाने लगीं मसलन, खेत-मजूरी, हस्तशिल्प, कुम्हारी, लुहारी जैसे काम, घास छीलना, बाँस छीलना जैसे काम करने वाले समुदाय ‘कमीन’ जाति कहलाने लगे ।
कम्मकर से कमेरा
इन्हीं अर्थों में पाली में ‘कम्मकर’, ‘कम्मकार’ जैसे शब्द भी हैं जिनसे हिन्दी का ‘कमेरा’ शब्द बना है । ‘कमेरा’ यानी मज़दूरी करने वाला । ‘कम्मी’ यानी कमाने वाला । चाकर, सहायक, छोटे-मोटे काम करने वाला ही ‘कमेरा’ है । फैलन के कोश में जो ‘कार-कमीन’ है वह दरअसल ‘कारकम्मी’ ही है । इसी तरह हिन्दी – उर्दू कोशों में ‘कमीनकंडु’ शब्द मिलता है जिसका अर्थ पुराने ज़माने में तीर तैयार करना था । गौरतलब है संस्कृत में ‘काण्ड’ शब्द बाँस की गाँठ को कहते हैं । बाँस छील कर तीर बनाने वाला ‘काण्डपाल’ कहलाता है । इससे ही बना है ‘कण्डु’ या ‘कडु’ शब्द । जाहिर यह कर्म से जुड़ा नाम है इसलिए इसके साथ जुड़े ‘कमीन’ शब्द का पूर्वरूप ‘कम्मी’ ही तार्किक है । इसी तरह मुहावरेदार भाषा में ‘कम्मीं-कमीन’ शब्दयुग्म का प्रयोग भी होता है । यहाँ ‘कम्मीं’ और ‘कमीन’ दोनों का अर्थ अलग अलग है । यहाँ ‘कम्मीं’ का आशय छोटी जात या ओछा काम करने वाले से है जबकि कमीन में फ़ारसी वाले ‘कमीना’ ( नीच, धूर्त, क्षुद्र, लफंगा, बदमाश ) का आशय निकलता है । ख्यात लेखक यशपाल ने मेरी तेरी उसकी बात उपन्यास में कमीन का अर्थ “ बेगार, कठिन परिश्रम और अप्रिय काम करने वाले ” बताया है । कम्मी और कम्मा के अवशेष हमें आज भी अपने आसपास मिलते हैं । कमीना में कमीन की तलाश करने वाले ज़रा पहचानें निकम्मा और निकम्मी जैसे शब्दों को । जिसके पास काम नहीं है वह निकम्मा, जो व्यस्था काम न करे वह निकम्मी । ये बेहद प्रचलित शब्द हैं । मूल भाव है कर्म का । लोगों को काम करना चाहिए । कम्मी यानी कामगार । बाद में यह हीनकर्म के अर्थ में रूढ़ हो गया ।
कम्मी यानी प्रजा
‘कमीन’ और ‘कमीना’ शब्द भाव सादृष्य और अर्थ सादृष्य के चलते आपस में कुछ इस तरह घुलमिल गए कि ये एक मूल से जन्मे जुड़वाँ शब्द नज़र आने लगे । ध्यान देने की बात है कि यजमानी प्रथा से जुड़े ‘कम्मी’ शब्द में कामगार के भाव के साथ प्रजा का भाव भी है । अब यह कहने की ज़रूरत नहीं कि संरक्षण और शोषण भी एक चीज़ के दो आयाम हैं । किसी के संरक्षण में जाते ही शोषण का आरम्भ होता है । मगर मूलतः शोषण की शुरुआत पुचकारने से होती है । अतः यह नहीं माना जा सकता कि अपने शुरुआती दौर में ही यजमानी प्रथा का ‘कमीन’ शब्द सचमुच गाली का दर्ज़ा रखता था । समूची प्रजा, रियाया के लिए गाली समान शब्द का प्रचलन भला किसी भी काल की सत्ता-व्यवस्था में क्योंकर सम्भव होगा ? निश्चित ही फ़ारसी ने जब हिन्दुस्तान की धरती पर पैर रखा तब ‘कमीनः’ का ‘कमीना’ रूप भी विकसित हुआ । इसमे निहित कमतरता के दास्यभाव की अवनति हुई । बाद में ओछापन, नीचता, तुच्छता जैसे भावों का स्पष्ट विकास हुआ । शब्दों अर्थावनति के ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं । बोलचाल की भाषा में फ़ारसी के कमीन का चलन बढ़ा और जनमानस में सदियों से प्रचलित पाली का ‘कम्मीं’ भी ‘कमीन’ बन गया । इस तरह हिन्दी की ज़मीन पर मेरे विचार से दो ‘कमीन’ विराजमान हैं । एक फ़ारसी से आया हुआ और दूसरा फ़ारसी के प्रभाव में बना हुआ ।
शायर कमीना, आशिक कमीना
रही बात फ़ारसी के ‘कमीनः’ की तो न्यून, हीन, छोटा, क्षुद्र, ओछा आदि के अर्थ वाला कम ही इसके मूल में है । ‘कमीनः’ शब्द अपने मूल रूप में यह शब्द गाली या अपशब्द नहीं था, मगर बाद में हो गया । ‘कमीन’ का आशय था अपने पालक की तुलना में हीन, क्षीण, दीन आदि । साधक प्रायः खुद को ईश्वर की तुलना में दीन, हीन, कमजोर ही मानता है । मध्यकालीन सधुक्कड़ी भाषा के कवियों नें प्रायः इसी अर्थ में खुद को ‘कमीन’ कहा है । शायरी भी मूलतः सूफ़ीयाना काव्य परम्परा से ही जन्मी है । शायरों ने खुद को हक़ीर माना । इश्को-आशिकी की उनकी रचनाएँ दरअसल आध्यात्मिक अनुभूतियाँ ही हैं जिनमें माशूक का प्रयोग ब्रह्म के रूप में हुआ है । शायरों ने भी इसीलिए खुद को हक़ीर, गुलाम, फ़क़ीर और ‘कमीन’ तक कहा है, सो इसी भावना से । शायर भी कमीना, आशिक भी कमीना । इसका अर्थ लफंगा, बदमाश तो कतई नहीं, बल्कि विनम्रतावश खुद को कमतर मानने का भाव ही है यहा है । पर मेरा मानना है कि जातिवाचक कमीन शब्द का व्युत्पत्तिक आधार चाहे फ़ारसी के कमीन से न जुड़ता हो मगर जातिवाची संज्ञा के तौर पर ‘कमीन’ शब्द का प्रयोग मुस्लिम दौर में ही बढ़ा है । ‘कमीन’ में निहित ओछेपन के भाव का विस्तार ही हीन जाति के अर्थ में हुआ । बाद में इसमें नीच, अधम, धूर्त जैसे भाव समा गए और इस तरह ‘कमीन’ और ‘कमीना’ एक हो गए । अगली कड़ी- किसी कंपेश को जानते हैं आप ?
सम्बन्धित आलेख- 1.ये भी पाखण्डी और वो भी पाखण्डी 2.‘अहदी’ यानी आलसी की ओहदेदारी 3.मदरसे में बैठा मदारी…[संत-8] 4.गुरुघंटाल लवगुरु, हो जा शुरु.... 5.समझदार से बुद्धू की रिश्तेदारी
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...
बहुत शोधपरक, उपयोगी और महत्वपूर्ण जानकारियां। हिंदी में इतनी संलग्नता के साथ ऐसा परिश्रम करने वाले विरले ही होंगे।
'शब्दों का सफर' मुझे व्यक्तिगत रूप से हिन्दी का सबसे समृद्ध और श्रमसाध्य ब्लॉग लगता रहा है।
आप के समर्पण और लगन के लिए मेरे पास ढेर सारी प्रशंसा है और काफ़ी सारी ईर्ष्या भी।
सच कहूँ ,ब्लॉग-जगत का सूर और ससी ही है शब्दों का सफ़र . बधाई.... अंतर्मन से
लिखते रहें. यह मेरे इष्ट चिट्ठों मे से एक है क्योंकि आप काफी उपयोगी जानकारी दे रहे हैं.
थोड़े में कितना कुछ कह जाते हैं आप. आपके ब्लाँग का नियमित पारायण कर रहा हूं और शब्दों की दुनिया से नया राब्ता बन रहा है.
आपकी मेहनत कमाल की है। आपका ये ब्लॉग प्रकाशित होने वाली सामग्री से अटा पड़ा है - आप इसे छपाइये !
बेहतरीन उपलब्धि है आपका ब्लाग! मैं आपकी इस बात की तारीफ़ करता हूं और जबरदस्त जलन भी रखता हूं कि आप अपनी पोस्ट इतने अच्छे से मय समुचित फोटो ,कैसे लिख लेते हैं.
सोमाद्रि
इस सफर में आकर सब कुछ सरल और सहज लगने लगता है। बस, ऐसे ही बनाये रखिये. आपको शायद अंदाजा न हो कि आप कितने कितने साधुवाद के पात्र हैं.
शब्दों का सफर मेरी सर्वोच्च बुकमार्क पसंद है -मैं इसे नियमित पढ़ता हूँ और आनंद विभोर होता हूँ !आपकी ये पहल हिन्दी चिट्ठाजगत मे सदैव याद रखी जायेगी.
भाषिक विकास के साथ-साथ आप शब्दों के सामाजिक योगदान और समाज में उनके स्थान का वर्णन भी बडी सुन्दरता से कर रहे हैं।आपको पढना सुखद लगता है।
आपकी मेहनत को कैसे सराहूं। बस, लोगों के बीच आपके ब्लाग की चर्चा करता रहता हूं। आपका ढिंढोरची बन गया हूं। व्यक्तिगत रूप से तो मैं रोजाना ऋणी होता ही हूं.
आपकी पोस्ट पढ़ने में थोड़ा धैर्य दिखाना पड़ता है. पर पढ़ने पर जो ज्ञानवर्धन होताहै,वह बहुत आनन्ददायक होता है.
किसी हिन्दी चिट्ठे को मैं ब्लागजगत में अगर हमेशा जिन्दा देखना चाहूंगा, तो वो यही होगा-शब्दों का सफर.
निश्चित ही हिन्दी ब्लागिंग में आपका ब्लाग महत्वपूर्ण है. जहां भाषा विज्ञान पर मह्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध रह्ती है. 
good,innovative explanation of well known words look easy but it is an experts job.My heartly best wishes.
चयन करते हैं, जिनके अर्थ को लेकर लोकमानस में जिज्ञासा हो सकती हो। फिर वे उस शब्द की धातु, उस धातु के अर्थ और अर्थ की विविध भंगिमाओं तक पहुँचते हैं। फिर वे समानार्थी शब्दों की तलाश करते हुए विविध कोनों से उनका परीक्षण करते हैं. फिर उनकी तलाश शब्द के तद्भव रूपों तक पहुंचती है और उन तद्बवों की अर्थ-छायाओं में परिभ्रमण करती है। फिर अजित अपने भाषा-परिवार से बाहर निकलकर इतर भाषाओँ और भाषा-परिवारों में जा पहुँचते हैं। वहां उन देशों की सांस्कृतिक पृष्टभूमि में सम्बंधित शब्द का परीक्षणकर, पुनः समष्टिमूलक वैश्विक परिदृश्य का निर्माण कर देते हैं। यह सब रचनाकार की प्रतिभा और उसके अध्यवसाय के मणिकांचन योग से ही संभव हो सका है। व्युत्पत्तिविज्ञान की एक नयी और अनूठी समग्र शैली सामने आई है।
16.चंद्रभूषण-
[1. 2. 3. 4. 5. 6. 7. 8 .9. 10. 11. 12. 13. 14. 15. 17. 18. 19. 20. 21. 22. 23. 24. 25. 26.]
15.दिनेशराय द्विवेदी-[1. 2. 3. 4. 5. 6. 7. 8. 9. 10. 11. 12. 13. 14. 15. 16. 17. 18. 19. 20. 21. 22.]
13.रंजना भाटिया-
12.अभिषेक ओझा-
[1. 2. 3.4.5 .6 .7 .8 .9 . 10]
11.प्रभाकर पाण्डेय-
10.हर्षवर्धन-
9.अरुण अरोरा-
8.बेजी-
7. अफ़लातून-
6.शिवकुमार मिश्र -
5.मीनाक्षी-
4.काकेश-
3.लावण्या शाह-
1.अनिताकुमार-
शब्दों के प्रति लापरवाही से भरे इस दौर में हर शब्द को अर्थविहीन बनाने का चलन आम हो गया है। इस्तेमाल किए जाने भर के लिए ही शब्दों का वाक्यों के बाच में आना जाना हो रहा है, खासकर पत्रारिता ने सरल शब्दों के चुनाव क क्रम में कई सारे शब्दों को हमेशा के लिए स्मृति से बाहर कर दिया। जो बोला जाता है वही तो लिखा जाएगा। तभी तो सर्वजन से संवाद होगा। लेकिन क्या जो बोला जा रहा है, वही अर्थसहित समझ लिया जा रहा है ? उर्दू का एक शब्द है खुलासा । इसका असली अर्थ और इस्तेमाल के संदर्भ की दूरी को कोई नहीं पाट सका। इसीलिए बीस साल से पत्रकारिता में लगा एक शख्स शब्दों का साथी बन गया है। वो शब्दों के साथ सफर पर निकला है। अजित वडनेरकर। ब्लॉग का पता है http://shabdavali.blogspot.com दो साल से चल रहे इस ब्लॉग पर जाते ही तमाम तरह के शब्द अपने पूरे खानदान और अड़ोसी-पड़ोसी के साथ मौजूद होते हैं। मसलन संस्कृत से आया ऊन अकेला नहीं है। वह ऊर्ण से तो बना है, लेकिन उसके खानदान में उरा (भेड़), उरन (भेड़) ऊर्णायु (भेड़), ऊर्णु (छिपाना)आदि भी हैं । इन तमाम शब्दों का अर्थ है ढांकना या छिपाना। एक भेड़ जिस तरह से अपने बालों से छिपी रहती है, उसी तरह अपने शरीर को छुपाना या ढांकना। और जिन बालों को आप दिन भर संवारते हैं वह तो संस्कृत-हिंदी का नहीं बल्कि हिब्रू से आया है। जिनके बाल नहीं होते, उन्हें समझना चाहिए कि बाल मेसोपोटामिया की सभ्यता के धूलकणों में लौट गया है। गंजे लोगों को गर्व करना चाहिए। इससे पहले कि आप इस जानकारी पर हैरान हों अजित वडनेरकर बताते हैं कि जिस नी धातु से नैन शब्द शब्द का उद्गम हुआ है, उसी से न्याय का भी हुआ है। संस्कृत में अरबी जबां और वहां से हिंदी-उर्दू में आए रकम शब्द का मतलब सिर्फ नगद नहीं बल्कि लोहा भी है। रुक्कम से बना रकम जसका मतलब होता है सोना या लोहा । कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का नाम भी इस रुक्म से बना है जिससे आप रकम का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे तमाम शब्दों का यह संग्रहालय कमाल का लगता है। इस ब्लॉग के पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी अजब -गजब हैं। रवि रतलामी लिखते हैं कि किसी हिंदी चिट्ठे को हमेशा के लिए जिंदा देखना चाहेंगे तो वह है शब्दों का सफर । अजित वडनेरकर अपने बारे में बताते हुए लिखते हैं कि शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषा विज्ञानियों का नज़रिया अलग अलग होता है। मैं भाषाविज्ञानी नहीं हूं, लेकिन जज्बा उत्पति की तलाश में निकलें तो शब्दों का एक दिलचस्प सफर नजर आता है। अजित की विनम्रता जायज़ भी है और ज़रूरी भी है क्योंकि शब्दों को बटोरने का काम आप दंभ के साथ तो नहीं कर सकते। इसीलिए वे इनके साथ घूमते-फिरते हैं। घूमना-फिरना भी तो यही है कि जो आपका नहीं है, आप उसे देखने- जानने की कोशिश करते हैं। वरना कम लोगों को याद होगा कि मुहावरा अरबी शब्द हौर से आया है, जिसका अर्थ होता है परस्पर वार्तालाप, संवाद । शब्दों को लेकर जब बहस होती है तो यह ब्लॉग और दिलचस्प होने लगता है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा का एक लोकप्रिय लैंडमार्क है- अट्टा बाजार। इसके बारे में एक ब्लॉगर साथी अजित वडनेरकर को बताता है कि इसका नाम अट्टापीर के कारण अट्टा बाजार है, लेकिन अजित बताते हैं कि अट्ट से ही बना अड्डा । अट्ट में ऊंचाई, जमना, अटना जैसे भाव हैं, लेकिन अट्टा का मतलब तो बाजार होता है। अट्टा बाजार । तो पहले से बाजार है उसके पीछे एक और बाजार । बाजार के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द हाट भी अट्टा से ही आया है। इसलिए हो सकता है कि अट्टापीर का नामकरण भी अट्ट या अड्डे से हुआ हो। बात कहां से कहा पहुंच जाती है। बल्कि शब्दों के पीछे-पीछे अजित पहुंचने लगते हैं। वो शब्दों को भारी-भरकम बताकर उन्हें ओबेसिटी के मरीज की तरह खारिज नहीं करते। उनका वज़न कम कर दिमाग में घुसने लायक बना देते हैं। हिंदी ब्लॉगिंग की विविधता से नेटयुग में कमाल की बौद्धिक संपदा बनती जा रही है। टीवी पत्रकारिता में इन दिनों अनुप्रास और युग्म शब्दों की भरमार है। जो सुनने में ठीक लगे और दिखने में आक्रामक। रही बात अर्थ की तो इस दौर में सभी अर्थ ही तो ढूंढ़ रहे हैं। इस पत्रकारिता का अर्थ क्या है? अजित ने अपनी गाड़ी सबसे पहले स्टार्ट कर दी और अर्थ ढूंढ़ने निकल पड़े हैं। --रवीशकुमार [लेखक का ब्लाग है http://naisadak.blogspot.com/ ]
मुहावरा अरबी के हौर शब्द से जन्मा है जिसके मायने हैं परस्पर वार्तालाप, संवाद।
लंबी ज़ुबान -इस बार जानते हैं ज़ुबान को जो देखते हैं कितनी लंबी है और कहां-कहा समायी है। ज़बान यूं तो मुँह में ही समायी रहती है मगर जब चलने लगती है तो मुहावरा बन जाती है । ज़बान चलाना के मायने हुए उद्दंडता के साथ बोलना। ज्यादा चलने से ज़बान पर लगाम हट जाती है और बदतमीज़ी समझी जाती है। इसी तरह जब ज़बान लंबी हो जाती है तो भी मुश्किल । ज़बान लंबी होना मुहावरे की मूल फारसी कहन है ज़बान दराज़ करदन यानी लंबी जीभ होना अर्थात उद्दंडतापूर्वक बोलना।
दांत खट्टे करना- किसी को मात देने, पराजित करने के अर्थ में अक्सर इस मुहावरे का प्रयोग होता है। दांत किरकिरे होना में भी यही भाव शामिल है। दांत टूटना या दांत तोड़ना भी निरस्त्र हो जाने के अर्थ में प्रयोग होता है। दांत खट्टे होना या दांत खट्टे होना मुहावरे की मूल फारसी कहन है -दंदां तुर्श करदन
अक्ल गुम होना- हिन्दी में बुद्धि भ्रष्ट होना, या दिमाग काम न करना आदि अर्थों में अक्ल गुम होना मुहावरा खूब चलता है। अक्ल का घास चरने जाना भी दिमाग सही ठिकाने न होने की वजह से होता है। इसे ही अक्ल का ठिकाने न होना भी कहा जाता है। और जब कोई चीज़ ठिकाने न हो तो ठिकाने लगा दी जाती है। जाहिर है ठिकाने लगाने की प्रक्रिया यादगार रहती है। बहरहाल अक्ल गुम होना फारसी मूल का मुहावरा है और अक्ल गुमशुदन के तौर पर इस्तेमाल होता है।
दांतों तले उंगली दबाना - इस मुहावरे का मतलब होता है आश्चर्यचकित होना। डॉ भोलानाथ तिवारी के मुताबिक इस मुहावरे की आमद हिन्दी में फारसी से हुई है फारसी में इसका रूप है- अंगुश्त ब दन्दां ।