Monday, March 16, 2009

रिश्तों का धागा और डोला हिंडोला

 

rope 
रिश्ता शब्द के साथ संबंध का भाव पीछे से आता है मगर डोरी का भाव प्रमुख है। 
सं बंध के वैकल्पिक शब्द के बतौर रिश्ता शब्द बोलचाल में खूब प्रचलित हैं। संबंध यानी समान रूप से बंधे हुए। रिश्ता भी यही है। दो लोगों के बीच जुड़ाव ही रिश्ता होता है। संबंध तो चूंकि सम+बंध् से मिलकर बना है। बंध् में निहित बंधनकारी भाव स्पष्ट है। रिश्ता शब्द के साथ भी इसका प्रयोग होता है और रिश्तों का बंधन जैसा मुहावरा प्रचलित है। बंधन का काम तो डोरी से ही होता है। यही नहीं, रिश्तों की डोर भी मुहावरे के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता है। जाहिर है डोर के साथ रिश्ते की रिश्तेदारी काफी मजबूत है।
रिश्ता शब्द यूं तो फारसी से आया है मगर यह इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और इसकी रिश्तेदारी संस्कृत, अवेस्ता और फारसी में है। इसके कई संबंधी इन भाषाओं में अलग-अलग रूपों में गुज़र-बसर कर रहे हैं। फारसी में रिश्ता का शुद्ध रूप है रिश्तः जिसका मतलब होता है धागा, सूत्र, डोरी, लाइन, कतार, भूमि की माप करने की डोरी अथवा सूत्र। संस्कृत की एक धातु है ‘ऋ’ जिसमें जाने और पाने का भाव है। इसी तरह ‘र’ वर्ण में भी रास्ते का भाव है जिसे ज्ञानमार्ग से जोड़ा जाता है। इससे बने संस्कृत के ऋषि शब्द का अर्थ गुरू ही है जो ज्ञान की राह बताता है।
से अवेस्ता में रस्तः शब्द बना जिसका फारसी रूप हुआ रास्तः जिसका मतलब है पथ, मार्ग, सरणि, पंथ आदि। फारसी-उर्दू में राह भी प्रचलित है और यह भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है। गौर करें कि पथ अथवा मार्ग की बनावट पर, इसके स्वभाव पर। यह एक रेखा होती है जो दो बिंदुओं को मिलाती है। रास्ता भी हमें कहीं न कहीं पहुंचाता है। दो गंतव्यों को जोड़ता है। सूत्र का काम भी यही होता है। धागा, डोरी, रस्सी, रास सबका काम यही है कहीं जाना और कुछ पाना। कुंए में रस्सी भेजी जाती है तभी जल आता है। रस्सी एक जरिया है, रस्सी राह है, रस्सी ही मार्ग है। रिश्ता शब्द में प्रमुखता से जिस डोर का भाव है वहीं दरअसल उसके सामान्य प्रचलित अर्थ यानी संबंध का आधार है। रिश्ता में जुड़ाव या बंधन का भाव ही प्रमुखता से उभर रहा है और संबंध के तौर पर ही इसका अर्थ प्रचलित है। रिश्ते बेहतर हों तो अक्सर उसकी तासीर में मिठास आ जाती है। मगर रिश्ता शब्द की रिश्तेदारी तो सचुमच मिठास से ही है। जिसे हम सेवईयां कहते हैं, फारसी में वह रिश्ता है। साफ है कि लंबे धागेनुमा आकृति की वजह से ही सेवईयों को रिश्ता नाम मिला है। रिश्ता समूचे ईरान, अरब, स्पेन, रूस, चीन, तुर्की आदि देशो में इसी नाम से जाना जाता है।
डोरी या रस्सी के लिए हिन्दी में धागा शब्द बेहद लोकप्रिय है। धागा शब्द काफी पुराना है। रहीम भी रिश्तों की बाबत जब कहते हैं तो धागा शब्द का ही इस्तेमाल करते हैं-रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े, जुडे़ गांठ पड़ जाए।। धागा शब्द बना है संस्कृत के तन्तु से। कहीं कहीं इसे तागा भी कहा जाता है। दरअसल धागा शब्द तागा का बिगड़ा हुआ रूप है। यह बना है तन्तु+अग्र के मेल से पहले यह ताग्गअ हुआ , फिर तागा और अगले क्रम में धागा बन गया। सुई में पिरोने से पहले धागे के अग्र भाग को ही छेद में डाला जाता है।
Bharat-Rahugana दोलन से बनी डोली में डोलने की क्रिया साफ नजर आ रही है। डोलने की क्रिया से ही रस्सी के अर्थ में डोर शब्द का निर्माण हुआ है।
तागा शब्द इसी आधार पर बना है।
सी तरह धागे को सूत्र भी कहा जाता है। संस्कृत में सूत्र यानी कपास से बना हुआ तन्तु। सूत्र का मतलब होता है बांधना, कसना आदि। गौर करें कि कपास के लिए संस्कृत में सूत्रपुष्पः शब्द भी है। सूत्र का एक अर्थ गुर, संक्षिप्त विधि अथवा तरीका भी है। रस्सी के लिए डोर, डोरी जैसे शब्द भी हिन्दी-उर्दू में बहुप्रचलित हैं। संस्कृत धातु दुल् से बना है डोर शब्द। दुल में हिलाना, घुमाना जैसे भाव शामिल है। इससे बना है दोलः जिसका अर्थ होता है झूलना, हिलना, दोलन करना, एक जगह से दूसरी जगह जाना, घट-बढ़ होना। हिंडोला शब्द इससे ही बना है जिसका संक्षिप्त रूप डोला या डोली होता है। इसके लिए शिविका या पालकी शब्द भी प्रचलित है। दोलन से बनी डोली में डोलने की क्रिया साफ नजर आ रही है। डोलने की क्रिया से ही रस्सी के अर्थ में डोर शब्द का निर्माण हुआ है। झूलने के भाव से साफ है कि किसी जमाने में डोर उसी सूत्र को कहते रहे होंगे जिसे ऊपर से नीचे की ओर लटकाया जाए। मगर अब तो डोर का प्रयोग लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई, गहराई हर तरह की माप में प्रयोग आने वाली रस्सी के लिए होने लगा है।

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19 कमेंट्स:

अनूप शुक्ल said...

डोलने से डोर बना यह बताओ अब पता लगा! शुक्रिया!

Udan Tashtari said...

सफर बहुत पसंद आया..डोला डोली और डोर के संग!!! आभार.

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप ने तो हम सब पर पहले ही खूब डोरे डाल रखे हैं।

ghughutibasuti said...

सदा की तरह बढ़िया!
घुघूती बासूती

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

सम्बन्ध का ताना बना थोडा थोडा समझ आया
पतंग की डोर पतंग को डोलती है या पतंग डोलती है तब डोर डोलती है .

Dr. Chandra Kumar Jain said...

संबंधों के विषय में कहना दुष्कर है,
जो करते हैं प्यार ये जग उनका घर है.
रहिमन घागे से सम्बद्ध सफ़र अपना,
लगे न इसको नज़र कोई बस ये डर है !
=================================
सबंध के धागे और धागों के संबंध पर भी
आपकी सुरुचिपूर्ण पोस्ट मोह रही है.
==========================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

डोला रे डोला रे डोला ..डोर और सँबँध का अटूट रीश्ता अब समझ मेँ आया जी
- लावण्या

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

भाई के हाथों की शोभा,
भगिनी का अनुबंधन।

कच्चा धागा ही होता है,
प्रेम-प्रीत का बन्धन।।

शब्दों का ये सफर, चल रहा है आगे ही आगे।

जो इससे वंचित रह जाते, वो हैं बहुत अभागे।।

आलोक सिंह said...

बहुत अच्छा डोरी , धागा ज्ञान .
धन्यवाद

Shiv said...

बहुत बढ़िया जानकारी मिली रिश्ता, सम्बन्ध और डोर के बारे में. हमेशा की तरह शानदार.

रंजू भाटिया said...

बढ़िया जानकारी

Dr.Bhawna said...

बहुत अच्छी जानकारी शुक्रिया...

Unknown said...

बहुत बढ़िया हम तो इतना ही कहेंगें।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

्डोलने शब्द से वो पुराना गीत याद आया - होंडलना झूलन आई बलमा...शब्दों का यह डोलना चलता रहे...

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

होंडलना = हिंडोलना

Rajeev (राजीव) said...

आपने शब्दों के आपसी सम्बन्ध और उनकी उत्पत्ति के सूत्रों को पिरो कर यह ज्ञानवर्धक और रोचक ताना-बाना बनाया है। कपास - पुष्प के संस्कृत नाम की भी सार्थकता मालूम हुई।

रंजना said...

सचमुच ,रिस्ते में सम भाव सम्बन्ध को दृढ़ता प्रदान करते हैं....

बहुत सुन्दर सफ़र रहा यह भी हमेशा की तरह.

Anonymous said...

रेस्पेक्टेड वडनेर साहब, मैं आपके शब्द पढ़ कर सोच में हूँ कि क्या कहू? मेरा ब्लॉग जगत से रिश्ता आपके ब्लॉग से आरम्भ होता है क्योंकि [ नाम नहीं लुंगी ] जिनके साथ इस रेगिस्तान की सैर कई दिनों तक की उन्होंने ही बताया था मुझे आपके बारे में, मैं सवेरे जब काम के सिलसिले में बाहर निकलती हूँ तब मेरे पास सिर्फ अव्यवहारिक किन्तु भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कार्य होता है, आपके ब्लॉग पर मैं पिछले एक महीने लगा तर आ रही हूँ और एक विद्वेता से कुछ कहना मुनासिब नहीं लगा. कृपया मेरा अभिवादन स्वीकार करें . नंदनी

Asha Joglekar said...

आपके लेख से हम ब्लॉगरों के बीच का धागा, डोर रिश्ता सब समझ में आ गया।

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