Saturday, February 16, 2008

नागा यानी जुझारू और दिगंबर भी...

तीर्थ स्थानों और विशिष्ट धार्मिक समागमों जैसे कुंभ आदि अवसरों पर नागा साधुओं का जमघट होता है। नागा दरअसल साधुओं का वह सम्प्रदाय है जो वैराग्य के उस चरम बिंदु पर पहुंच चुका है कि वस्त्र तक उसे बोझ लगते हैं, प्रपंच लगते हैं। छोड़ना, जाना आदि भावों को समेटे व्रज् धातु से ही सन्यासी के लिए परिव्राजक शब्द बना जिसमें भी सांसारिक बंधनों को त्यागने का भाव शामिल है। मगर यह संकेत सिर्फ गृह, संबंध और माया के त्याग तक हैं। परिव्राजक के त्याग की पराकाष्ठा नागा सम्प्रदाय में नज़र आती है जहां वस्त्रों तक का त्याग कर दिया जाता है। जैन पंथ का भी एक सम्प्रदाय है दिगंबर जैन। इस पंथ के साधु भी वस्त्र धारण नहीं करते । वे दिगंबर इसलिए कहलाते हैं क्योंकि वस्त्र के नाम पर उनके चारों ओर सिर्फ दिशाएं होती है अर्थात दिशाएं ही जिसका अंबर (वस्त्र) हो वही दिगंबर। गौर करें कि निर्वसन अवस्था के लिए भी दिगंबर शब्द में अंबर यानी वस्त्र शब्द का मोह झलक रहा है मगर नागा सम्प्रदाय इस मोह से भी मुक्त है। नागा साधु आज गुंसाईं, बैरागी, दादूपंथी आदि विशेषणों के साथ कुंभ व अन्य धार्मिक समागमों में अपने लवाजमें के साथ राजसी वैभव का प्रदर्शन करते हुए इकट्ठा होते हैं और शाही सवारियां निकालने की इनमें होड़ लगती है।
नागा शब्द बना है संस्कृत के नग्न से। नग्न यानी विवस्त्र, नंगा, वस्त्रहीन। नंगा भिक्षु। इसका एक अर्थ पाखंडी भी होता है। जाहिर है कि साधुओं की पूजा अभ्यर्थना करने वाले समाज में कुछ लोग यही सम्मान पाने के लिए ढोंग करने लगे होगे और झूठ-मूठ के वैराग्य का प्रदर्शन करने के लिए वस्त्र त्याग कर भिक्षावृत्ति करने लगे होंगे इसीलिए नग्न का एक अर्थ पाखंडी भी हुआ। नग्न से बना नग्नक यानी दिगंबर संम्प्रदाय अथवा विवस्त्र साधु। इसका प्राकृत रूप हुआ नग्गओ और फिर हिन्दी रूप बना नागा। नागा सम्प्रदाय के साधु स्वयं को आदि अवधूत कपिलमुनि, ऋषभदेव और दत्तात्रेय की परंपरा और आदर्शों पर चलने वाला मानते हैं।
इस्लाम के आगमन के बाद नागा साधुओं की जमात में बदलाव आया। इन्होने खुद को हथियारबंद जत्थों में संगठित किया। इनके मठ अखाड़ों मे तब्दील हो गए। समय समय पर राज्यसत्ता के साथ मिलकर और खिलाफ भी युद्ध लड़े। मराठों, निज़ाम , अवध के नवाब आदि की ओर से इन्होने लडाइयां लड़ीं।

आपकी चिट्ठियां-

सफर के पिछले तीन पड़ावों ये नागनाथ, वो सांपनाथ, कारूं भी था और उसका खजाना भी... और कपडे छिपाओ, किताबें छिपाओ.. पर सर्वश्री अरविंद मिश्रा, दिनेशराय द्विवेदी, नीलिमा सुखीजा अरोरा, अफ़लातून, संजीत त्रिपाठी, गौरवप्रताप, ज्ञानदत्त पाण्डेय, तरुण, प्रत्यक्षा, प्रियंकर, चंद्रभूषण, माला तैलंग, संजय , नीरज रोहिल्ला, जाकिर अली रजनीश, आशीष और रोहित त्रिपाठी की टिप्पणियां मिलीं,आप सबका आभार।
नीरज रोहिल्ला जी, द्रविड़ भाषाएं संस्कृत से नहीं उपजी है। यह स्वतंत्र भाषा परिवार है अलबत्ता सदियों के साझा सांस्कृतिक विकासक्रम में इनके बीच सहज रिश्तेदारी पनप चुकी है। इस पर सफर में आगे किसी पड़ाव पर ज़रूर कुछ जानने का प्रयास करेंगे।

अफ़लातून जी, नागनाथ वाली पोस्ट पर आपकी टिप्पणी - क्या आप 'ष ' में यक़ीन नहीं रखते ? का अभिप्राय नहीं समझ पाया था। कृपया थोड़ा स्पष्ट करेंगे तो अच्छा लगेगा। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, February 14, 2008

कपड़े छिपाओ, किताबें छिपाओ....

पुस्तक और पोशाक में मोटे तौर पर तो कोई रिश्तेदारी नज़र नहीं आती मगर भाषाविज्ञान के नज़रिये से इनमें बहुत गहरा संबंध है। दोनों में ही छिपाने का भाव प्रमुख है। अच्छे वस्त्र और अच्छी पुस्तकें भी तो लोगों की निगाहों से तब तक छिपाकर रखी जाती हैं जब तक आप खुद उनका इस्तेमाल न कर रहे हों। मगर इस छुपाने की वृत्ति का रिश्ता इन दोनों से नहीं है। ये क्या छिपाते है , जानना दिलचस्प होगा।
पहनने के कपड़ों या वस्त्रों के लिए हिन्दी में पोशाक शब्द बहुत आम है। यह इंडोयूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है। सामान्य तौर पर इसे उर्दू का लफ्ज समझा जाता है मगर है फारसी का और वहीं से ये बरास्ता उर्दू , हिन्दी में चला आया। फारसी में पोश का अर्थ है छिपानेवाला। जाहिर है कि वस्त्र शरीर को छिपाने का काम करते हैं इस लिए धारण करने वाले कपडे, सिले हुए कपडे पोशाक कहलाए। इसके मूल में जो छिपानेवाला भाव है वह इसे संस्कृत से जोड़ता है। संस्कृत की पस धातु से बने पक्षमल, पक्ष, पुस्त और पुच्छ जैसे शब्द बने है और इन सभी का रिश्ता खाल, ढंका हुआ,बाल ,ऊन, छिपाना जैसे अर्थों से जुड़ता है। इससे ही पोश जैसे हिन्दी, उर्दू और फारसी के कई शब्द बने हैं। गौरतलब है कि सभ्यता के विकासक्रम में मनुष्य शुरु से ही पशुओं की खाल से ढंकने का काम करता आया है फिर चाहे शरीर हो, छप्पर तम्बू हो या फिर पुस्तकों के लिए चमड़े की जिल्द हो।
संस्कृत के पुस्त का अर्थ ढंकने से संबंधित है और पुस्तक शब्द में इसके आवरण वाला भाव ही प्रमुख है।  इसे यूं समझें कि किसी जमाने में ग्रंथ या किताब के आवरण यानी कवर को ही पुस्तक कहा जाता था मगर बाद में इसमें स्वतः ही ग्रंथ का भाव शामिल हो गया। हालाँकि पुस्त और बुस्त का अर्थ बांधना भी है जो ग्रन्थ में भी निहित है। इसी तरह फारसी में पोस्त का अर्थ पशु की खाल से है जिसका अगला रूप पोश बना जिसमें ढंकने का अर्थ समा गया और मतलब निकला खाल अथवा आवरण। बोल व्यवहार में इसके व्यापक अर्थ भी निकलने लगे । यह भी ध्यान रहे कि पुराने ज़माने के ग्रन्थ खाल में ही बांधे जाते थे। आमतौर पर व्यवहारगत दुराव या छिपाव के लिए पोशीदगी जैसा शब्द इस्तेमाल किया जाता है जो इसी मूल से जन्मा है। रोंएदार बालों वाली लोमड़ी,समूर आदि जंतुओं को पोस्तीन कहते हैं। फारसी में शेर की खाल को भी पोस्तीने शेर कहते है। पोश से मिलकर बने कुछ और शब्द हैं सफेदपोश, पापोश आदि। यहां एक और मज़ेदार शब्द बनता है नकाबपोश। गौर करे कि नकाब तो अपने आप में ही चेहरे को छुपाने का ज़रिया है। पोश का मतलब भी छुपाना ही है। अर्थ हुआ चेहरा छुपाना। मगर प्रयोग होता है ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने चेहरा छुपा रखा हो।
पस् से ही बना संस्कृत का पक्ष्मल जिसके मायने हुए बड़े बड़े बाल वाला। यहां इसका मतलब भी पशुओं की खाल से ही है जो रोएं दार होती है। फारसी में ही पक्ष्मल का रूप बना पश्म यानी ऊन अथवा बाल। पश्मीं का मतलब हुआ ऊन से बना हुआ या ऊनी। पश्मीनः का मतलब हुआ बहुत ही नफीस ऊनी कपड़ा जिसकी मुलायमियत और मजबूती लाजवाब हो।
दुनियाभर में मशहूर कश्मीरी शाल को इसीलिए पश्मीना भी कहते हैं। गांवों के मेलों ठेलों में बिकनेवाली एक खास मिठाई है बुढ़िया के बाल या बुढ़िया का सूत। अंग्रेजी में इसे कॉटन कैंडी कहते हैं। नर्म ,महीन चाशनी के लच्छों से इसे बनाया जाता है जिन्हें बाद में गुच्छे की शक्ल में बेचा जाता है। इन्हें कई रंगों से रंगा भी जाता है। । फारसी में इसे कहते हैं पश्मक। यह मिठाई मुगलों के साथ भारत आई और बच्चे इसे खूब चाव से खाते हैं। यह पश्मक इसी मूल से निकला हुआ शब्द है।

आपकी चिट्ठियों का हाल अगली कड़ी में
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, February 13, 2008

कारूं भी था और उसका खजाना भी ..[संशोधित]

बेहिसाब दौलत का जब भी जिक्र आता है तो अक्सर कारूं के खजाने का मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल होता है। भारत में यह मुहावरा फारसी से आया । उर्दू-फारसी के किस्सों में इस कारूं का उल्लेख कारून के रूप में मिलता है-एक अमीर जो अत्यधिक कृपण था और शापग्रस्त होकर अपनी दौलत समेत धरती में समा गया। वैसे मुहावरे के तौर पर उर्दू में इसका मतलब हुआ मालदार होने के साथ कंजूस भी होना। अंग्रेजी ज़बान में भी कारूं का उल्लेख क्रोशस के रूप में है और मुहावरे के तौर पर एज़ रिच एज़ क्रोशस वाक्य प्रचलित है। सवाल उठता है कारूं का खजाना महज़ किस्सागोई है या हकीकत ? दरअसल कारू, कारून या क्रोशस नाम का इन्सान सचमुच था और एशिया माइनर ( समझें की आज का तुर्की-टर्की ) में ईसा से ५६० साल पहले लीडिया नाम के मुल्क का बादशाह था जिसकी सीमाएं भूमध्य सागर, एजियन सी और कालासागर तक थीं । लीडियन साम्राज्य की राजधानी सार्डिस थी जिसकी समृद्धि के खूब चर्चे थे। सोनेकी खानों और नदियों से बहकर आते स्वर्णकणों की बदौलत वह उस जमाने का सबसे दौलतमंद राजा था । ऊपर से घमंडी भी। अमीरी की खुमारी में न सिर्फ खुद को दुनिया का सबसे सुखी इन्सान समझता बल्कि चाहता था कि लोग भी ऐसा ही मानें । गौरतलब है कि स्वर्णप्रेम की वजह से दुनियाभर में विख्यात (कुख्यात?) ग्रीक कथाओं का अमरचरित्र किंग मिडास इसी कारूं का पुरखा था । कारूं को लालच, स्वर्णप्रेम और घमंड अपने पुरखे से विरासत में मिले ।
आज के तुर्की, सीरिया, जार्डन, निकोसिया, जार्जिया और आर्मीनिया जैसे देश कारूं के साम्राज्य का हिस्सा थे । लीडिया की ज़मीन सचमुच सोना उगलती थी । न सिर्फ सोना बल्कि चांदी भी । कारूं की दुनिया को एक बड़ी देन है टकसाली सिक्कों की । इससे पहले सिक्के ढाले नहीं जाते थे बल्कि ठोक-पीटकर बना लिए जाते थे । कारूं ने जो स्वर्णमुद्रा चलाई उसे इलेक्ट्रम के नाम से जाना जाता था और उसमें सोने की शुद्धता को लेकर बेहद सावधानी बरती जाती थी ।
कारूं ग्रीस की ( प्राचीन आयोनिया-यवन-युनान ) की सभ्यता-संस्कृति का दीवाना था । ग्रीस यानी युनान पर कब्जा करने वाला पहला एशियाई विदेशी भी उसे ही माना जाता है। ईसा से ५४६ बरस पहले फारस यानी ईरान के शासक साइरस
( भारतीय इतिहास में कुरूश, जिसका फारसी उच्चारण खुसरू होता है ) ने अपनी महान विजययात्रा शुरू की और समूचे पश्चिम एशिया को जीतते हुए लीडिया पर भी कब्जा कर लिया । डरपोक कारूं ने बजाय लड़ने के उसके आगे सिर झुकाना बेहतर समझा । साइरस के वारिस डेरियस ने अपने साम्राज्य को एशिया के पश्चिम में यूरोप तक और पूर्व में भारत के सिंध प्रान्त तक फैला दिया । गौरतलब है कि भारतीय इतिहास में वह दारा के नाम से जाना जाता है। सिकंदर जब अपना आलमी फतह पर निकला तो सिंध और पंजाब पर विजय पाने से पहले दारा के साथ भारत की सीमा पर उसका युद्ध हुआ था , जो तब ईरान से लगती थी । ज़ाहिर है कुरूश,दारा और सिकंदर के सैन्य अभियानों और कारोबारियों के ज़रिये ही कारूं का ख़ज़ाना भूमध्यसागर से हिन्द महासागर तक मुहावरे के तौर पर लोगों की ज़बान पर चढ़ गया ।

चित्र परिचय

1.पेरिस के लूवर संग्रहालय में रखा कारूं का चित्र
2.कारूं के खजाने में मिली एक सुराही देखें यहां
3.सार्डिस के खंडहर जो कारूं की राजधानी थी। देखे कुछ और चित्र
4.इलेक्ट्रम नाम की स्वर्णमुद्रा जिसे चलाने का श्रेय कारूं को जाता है देखें यहां

सफर की यह कड़ी कैसी लगी, आपके अनुभव जानना चाहूंगा। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, February 12, 2008

ये नागनाथ , वो सांपनाथ...

सर्प का पर्यायवाची शब्द नाग भी इंडो यूरोपीय मूल से ही जन्मा है। हिन्दी नाग की व्युत्पत्ति संस्कृत के नागः से हुई है जिसका मतलब होता है काला भुजंग सांप। एक काल्पनिक दैत्य जिसकी मुखाकृति तो मनुष्य जैसी होती है मगर धड़ से नीचे का हिस्सा सर्प जैसा ही होता है । इसे पातालवासी बताया गया है। हिन्दू विश्वासों के मुताबिक यह पृथ्वी भी एक विशाल सर्प के फन पर टिकी है। पुराणों के मुताबिक इस सर्प का नाम शेषनाग है। दरअसल ये कश्यप ऋषि ओर दक्षपुत्री कद्रु के पुत्र है। इनके सौ फन हैं और एक फन पर पृथ्वी टिकी है। इनकी देह पर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी निवास करते हैं। इन्हे ही नारायण भी माना गया है। प्रलय के समय पृथ्वी के नष्ट होने के बावजूद ये शेष रहे इसलिए इन्हें शेषनाग कहा जाता है। इनका निवास पाताल है। अमरनात धाम की यात्रा का एक पड़ाव शेषनाग भी है। यहां एक विशाल झील है।
यूं देखा जाए तो नाग जाति का जो उल्लेख पुराणों में है वह मनुष्यों की ही एक जाति के रूप में है न कि रेंगने वाले सरीसृपों के रूप में। गौरतलब यह भी है कि सर्प जाति के लिए उपजे नकारात्मक भाव का बोध जहां सांप में जबर्दस्त होता है वही नाग शब्द के साथ ऐसा नहीं है। अलबत्ता दो एक जैसी बुराइयों को रेखांकित करने के लिए नागनाथ और सांपनाथ वाले मुहावरे में ज़रूर इसका उल्लेख है जिसे नकारात्मक कहा जा सकता है। नाथ सम्प्रदायों के नवनाथों में से एक नागनाथ भी बताए जाते हैं ।
अब आते हैं नाग यानी snake की उत्पत्ति पर । पुरानी अंग्रेजी के snaca, स्वीडिश के snok, जर्मन के schnake और लगभग सभी भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल किए जाने वाले नाग-नागिन जैसे तमाम शब्द भारतीय-यूरोपीय परिवार के मूल शब्द snag से ही बने हैं। इस शब्द का मतलब भी कोई रेंगने वाला जंतु ही होता है। अंग्रेजी का snail शब्द , जिसका मतलब होता है घोंघा, भी इसी स्नैग से ही बना है। गौर करें कि घोंघा भी रेंगता ही है। अजीब बात है कि अंग्रेजी के sarpent शब्द को जहां snag से बने snake ने पछाड़ दिया है वहीं इसी snag से बना नाग शब्द हिन्दी में सर्प के लिए आमतौर पर बोले जाने वाले सांप शब्द से ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाया है।
नाग शब्द के कई अन्य संदर्भ भी हैं। इतिहास में एक नागवंश भी प्रसिद्ध हुआ है। पर्वतीय जी के भारतीय संस्कृति कोश के मुताबिक 150 से 250 विक्रमी संवत् के बीच मथुरा से लेकर उज्जैन तक फैले विशाल भूक्षेत्र पर नागवंशियों का शासन था। सिकंदर के आगमन के समय नागवंशी राजा ने ही उसका स्वागत किया था ऐसा उल्लेख है।
जनमेजय के नागयज्ञ का संदर्भ भी पुराणों में खूब आता है। कश्यप और कद्रू की सौ संतानें थी जो नाग थी। जब इन्होने लोगों को कष्ट दिया तो ब्रह्मा ने शाप दिया कि गरुड़ और जनमेजय के यज्ञ द्वारा उनका नाश होगा। पश्चाताप करने पर ब्रह्मा ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि एक विशेष स्थान पर तुम सुरक्षित रहोगे । वह नागलोक कहलाएगा। इसी लिए पाताल को नागलोक भी कहते हैं ब्रह्मा ने जिस दिन आशीर्वाद दिया उसे ही नागपंचमी कहते हैं। ।
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Monday, February 11, 2008

आस्तीन में सरसराया सांप


तेज गति से चलने या भागने के लिए हिन्दी का एक शब्द है सरपट। इसी तरह एक शब्द है सरसराना जिसका मतलब है हवा का तेज चलना। लापरवाही से किए गए , या जल्दबाजी में किए गए काम के लिए फारसी का एक शब्द है सरसरी जो उर्दू-हिन्दी में भी खूब इस्तेमाल होता है। इसके सरसरी नज़र डालना या सरसरी तौर पर जैसे रूप रोज़ाना इस्तेमाल होते हैं। तेजी, जल्दबाजी और रफ्तार से जुड़े ये दोनों ही शब्द जन्मे हैं संस्कृत की सृ धातु से जिसका अर्थ है तेज चलना , आगे बढ़ना और फैलना आदि। इसी से जन्मा है सृप् शब्द जिसका इस्तेमाल रेंगनेवाले जीवो के संदर्भ में सरीसृप(रेप्टाइल्स)में देखा जाता है। अचरज की बात ये कि सृ से जन्में सृप् में गति का भाव तो सुरक्षित रहा मगर सृ में समाई तेजी का यहां लोप हो गया। मूलतः सृप् में पेट के बल रेंगने का भाव प्रमुख है । इसके अलावा इसके मंद मंद चलना, छुप छुप कर देखना, हिलना-डुलना रेंगना आदि अर्थ भी हैं। रेंगना को ही सरकना भी कहते हैं और यह भी इसी सृ धातु से बना है।
संस्कृत की इस धातु का जन्म भी संभवत: प्राचीन इंडो-यूरोपियन परिवार से ही हुआ है। इसी से भारतीय और यूरोपीय भाषाओं में कई शब्द बनें जिनका अर्थ किसी रेंगने वाले प्राणी अर्थात सांप से जुड़ा। भारतीय-यूरोपीय भाषा परिवार में सांप के लिए जो मूल शब्द मिलता है वह भी serp है । अंग्रेजी में सांप के लिए एक शब्द sarpent भी है जो लैटिन के serpentem से बना है। इसी तरह ग्रीक भाषा में एक शब्द है- herpein जिसका मतलब होता है रेंगना और herpeton जिसका मतलब होता है सांप। यहां स और ह में वही बदलाव हो रहा है जैसासिन्धु और हिन्दू में हुआ। अल्बानियन भाषा के garper का >मतलब भी यही होता है और इन भाषाओं के ये शब्द serp से ही बने है।
गौर करें कि सृ से ही बना है संस्कृत का सृप जिसका मतलब हुआ रेंगना या पेट के बल चलना। बाद में सर्पः या सर्पति शब्द चलन में आए जिनका रेंगने वाले जन्तु जैसा लाक्षणिक अर्थ नहीं होकर सीधा संबंध सांप या सांप से ही था। सर्पः का प्राकृत रूप हुआ सप्प जिसने हिन्दी में सांप का रूप लिया। घुमावदार या कुंडलीदार के अर्थ में सर्पिल या सर्पिलाकार शब्द भी इसी मूल से जन्मे हैं। ये बड़ी अजीब बात है कि एक ओर जहां भारतीय संस्कृति में सर्प को पूजा जाता है , उसका धार्मिक महत्व है वहीं सांप के लाक्षणिक रूप से जुड़ी नकारात्मक कहावतें भी हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे सांप मरे और लाठी न टूटे, आस्तीन का सांप, सीने पे सांप लोटना , सांप सूंघना , सांप का सिर कुचलना आदि। सांप के बच्चे को संपोला कहते हैं और यह एक मुहावरे के तौर पर भी प्रयोग में लाया जाता है जिसका मतलब हुआ कि दुष्ट की संतान। अज्ञेय की एक प्रसिद्ध कविता भी सांप पर ही है-

साँप!
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना भी
तुम्हे नहीं आया।
एक बात पूछूँ - उत्तर दोगे?
तब कैसे सीखा डसना,
विष कहाँ पाया?


सृ धातु के कुछ और रूप देखें 9 जुलाई 2007 की इस पोस्ट-सड़क-सरल-सरस्वती में।

अगली कड़ी में नज़र ( सरसरी नहीं भरपूर ) डालते हैं नाग पर। इंतजार करें और ये ज़रूर बताएं कि ये पड़ाव कैसा लगा। इस बीच हम मोहल्ले में मनुवादी,ब्राह्मणवादी जैसी गालियां खाकर आते हैं।

आपकी चिट्ठियां-

सफर के पिछले पड़ावों पर आई टिप्पणियों के लिए हम साथियों का आभार नहीं जता पाए थे। फिर आंच न तेज करनी पड़ जाए, नस नस फड़कती है खानदान के नाम पर, जात न पूछो कल्लू की और अतिथि तो यायावर ठहरा पर कुल अट्ठाइस चिट्ठियां मिलीं जो हमें - संजय, दिनेशराय द्विवेदी, संजीत त्रिपाठी, माला तैलंग, कुन्नूसिंह, दिलीप मंडल, नीरज गोस्वामी , पंकज सुबीर , तरुण, आशा जोगलेकर, मीत, शम्भु चौधरी, चंद्रभूषण, लावण्या, समीरलाल, ज्ञानदत्त पाण्डेय, अनूप भार्गव, स्वप्नदर्शी, नीलीमा सुखीजा अरोरा और प्रमोदसिंह -ने लिखीं।
चंद्रभूषण जी ने अतिथि तो यायावर ठहरा की एक ग़लती की तरफ ध्यान दिलाया था। अतिथि देवो भवः में विसर्ग नहीं लगता है। धन्यवाद चंदूभाई। हम इसे सुधार लेंगे।
सभी साथियों का आभारी हूं।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, February 9, 2008

...फिर आंच तेज न करनी पड़ जाए

मोहल्ला में शुक्रवार को अपनी पोस्ट वहां क्यों नहीं जातिवादी गंध और शब्दों का सफर पर जात न पूछो कल्लू की ..में हमने मोहल्ला मे दिलीप मंडल द्वारा मीडिया में दलितों की गैरमौजूदगी पर चलाई जा रही बहस में शिरकत की थी। शनिवार को सुबह सुबह अचानक मन उचट गया और दिलीपजी की इस पोस्ट के जवाब में अपनी पोस्ट वो सुबह कभी तो आएगी में कुछ लिख कर हमने इस बहस से खुद को अलग करने की बात कह दी।

देखें इस प्रसंग को-

मीडिया में दलितों के न होने पर दिलीप मंडल द्वारा शुरू की गयी बहस से मैं अब खुद को अलग कर रहा हूं। इसलिए नहीं कि गंभीर असहमतियां अथवा मतभेद उभर कर आये हों, बल्कि इसलिए कि ये मुद्दा मुझे गैरज़रूरी और अस्वाभाविक लग रहा है। इस शृंखला में दिलीप जी की ताज़ा कड़ी कितने आदमी थे, दरअसल एक भी नहीं... पढ़ी। उसका मोटा मोटा अर्थ समझा, गूढ़ार्थ समझ में नहीं आया। चंदूभाई को भी हैरानी है कि क्यों नहीं आया। इसलिए कि हम मानते हैं कि न्यूज़ रूम में कोई जातीय या दलित विरोधी षड़्यंत्र नहीं हो रहा है। अगर कुछ अनहोनी हो रही है, तो वह है गंभीर मुद्दों के प्रति आपराधिक उदासीनता का पनपना, भाषा के साथ खिलवाड़ अथवा जिज्ञासा वृत्ति का अभाव।

दिलीप भाई के आलेखों से एक संकेत लगातार यह मिलता रहा है कि कहीं कोई षड्यंत्र है । हमारा मानना है कि ये प्रवृत्तियां हैं जो जन चेतना के साथ धीरे-धीरे खत्म होती जाएंगी। आरक्षण, सामाजिक संतुलन, जातीय चेतना जैसी बातें बौद्धिक मुहावरों के तौर पर भले ही दोहराई जाती रहें , इनमें घुस आई राजनीति को खींच कर जब तक सभी वर्गों के लोग अलग नहीं कर देंगे, वैसी सुबह आप जल्दी नहीं देख पाएंगे दिलीप जी , जैसी देखना चाहते हैं। देखेंगे ज़रूर, हम भी यही चाहते हैं।
( पूरी पोस्ट यहां पढ़ें)

उसके बाद देर रात मोहल्ला पर दिलीप जी की ये पोस्ट पढ़ी-

अजित जी, आप सही कहते हैं। वो सुबह जरूर आएगी। आपकी बातो में मैं इसकी आहट महसूस कर रहा हूं। आप न्याय के पक्षधर हैं। आपमें अन्याय के पक्ष में खड़े होने का साहस ही नहीं है। आने वाले दिनों में कई दलित बच्चे-बच्चियां आपसे शब्दों का सफरनामा लिखना सीखेंगे। पत्रकारिता के गुर सीखेंगे। सीख रहे होंगे। अजित बाबू, आप इस बहस से बचकर कहां जाएंगे। ये तो हमारी जिंदगी की बहस है। इस बहस में हम आपके साथ हैं। कहानी अभी तो शुरू ही हुई है। एक महत्वपूर्ण मेल मेरे पास आया है। आप लोगों के साथ आगे शेयर करूंगा। बने रहिए इस चर्चा में।

दिलीप मंडल
(पूरी पोस्ट यहां पढ़े)

इस पर हमारा जवाब था-

अजित वडनेरकर said...
अरे भाई, आपसे नहीं बच रहे हैं। हर बार लिख कर लगता है कि कहीं ज्यादा तो नहीं लिख गए। ईमानदार ज़रूर हैं पर सामाजिक मुद्दों पर आपकी जैसी पकड़ नहीं है। अधपकी सोच है। ज्ञान के चूल्हे पर बरसों से अदहन ही चढ़ा हुआ है। क्या पका, क्या नहीं , कौन जाने। जल्द बाजी में बीच-बीच में आंच और तेज कर देते हैं तो हांडी उफन जाती है। मगर ऐसा उफान कुछ पकाता नहीं , अलबत्ता जला ज़रूर डालता है। अब क्या करें बताइये...समझदारी इसी में लगी कि ऐसा कुछ देखें ही ना कि आंच तेज करनी पड़ जाए। जो आंच पर रखा है उसे ही पकने दें। सबसे साझा जो करना है....



इससे पहले मोहल्ले पर आई तीन प्रतिक्रियाओं के बाद हम शुक्रिया अदा कर चुके थे-

आप सबका आभार।
एक पत्रकार के नाते न्यूज़ रूम में मेरे लिए यह वर्गीकरण ज्यादा अनुकूल रहता है कि मेरे इर्द गिर्द कितने लोग खेल वाले हैं, कितने कला संस्कृति का रूझान रखते हैं, कौन लोग हैं जो राजनीति को बेहतर समझते हैं और विज्ञान पर आसान भाषा में किसकी पकड़ है। साहित्य को कौन बेहतर समझता है वगैरह वगैरह। ये खयाल तो कभी नहीं आया कि जातियां सोचूं, जातियां जानूं या जातियां लिखूं और जातियां गिनूं.....
बहरहाल, गिनती जारी रहे, अपन चले।

और गिनती पर एक शेर याद आ गया-

मोहतसिब तस्बीह के दाने पे ये गिनता रहा
किनने पी, किनने न पी, किन किन के आगे जाम था

सवाल यह नहीं है कि मैं इस बहस में रहूं या न रहूं , सवाल यह है कि कितने लोग इस बहस को सार्थक मानते हैं और सभी सुबुद्ध साथियों के पास इस मुद्दे के सार्थक निराकरण के लिए कोई उर्वर सोच, दृढ़ संकल्प जैसी कुछ बातें हैं या नहीं। बहस में शामिल होने या न होने से कहीं ज्यादा यह ज़रूरी है।

जिन साथियों ने इस विषय पर अब तक प्रतिक्रियाएं दी हैं उन्हें एक साथ यहां देख सकते हैं
सबसे पहले जात न पूछो कल्लू की पर आई टिप्पणियां-

Sanjay said... मैं इस बात का पूरा समर्थन करता हूं कि यहां मध्‍यप्रदेश में वैसे जातिवादी ताने कभी नहीं सुनाई देते जिन्‍हें अगले दिन सुर्खियों में शामिल करने की विवशता होती है. लेकिन पत्रकारों में दलितों की तलाश के बारे में जो कुछ कहा जा रहा है उससे सहमत नहीं हूं. मैने ऐसे कई लोगों के साथ काम किया है जिन्‍हें दलित कहा जाता है.
आज से पहले कभी आवश्‍यकता नहीं पड़ी इसलिए आज याद करना पड़ रहा है और लिस्‍ट बहुत लंबी होती जा रही है. लेकिन मुझे यह देख कर हैरानी भी होती है कि जो लोग खुद को जात-पात से ऊपर होने का प्रदर्शन करते हैं उन्‍होंने अभी तक अपने नाम के आगे से जाति सूचक शब्‍दों को हटाने का दुस्‍साहस नहीं दिखाया है.
आपकी यह बात बिल्‍कुल सही है बड़े भाई कि यह अजायबघर टाइप मानसिकता है और केवल शिक्षा से ही यह असमानता समाप्‍त होगी. अंतिम बात यह कि मैं न ब्राह्मण हूं न दलित, जब भी लिखवाया गया तो हिंदू लिखा, भारतीय लिखा. अब तक इससे ज्‍यादा जानने की जरूरत न कभी पड़ी है न आगे पड़ेगी. फिर भी यदि कोई मुझसे जानना चाहता है तो उनके लिए मैं कल्‍लू चमार हूं... पेशे से पत्रकार हूं... :)


दिनेशराय द्विवेदी said... अजित जी। सच न छुपता है और न समाप्त होता है। आप ने जो बात कही उस की आवश्यता नहीं थी। हम जानते हैं कि जाति को लेकर भेद अभी कायम हैं। लेकिन न्ए भेद भी उत्पन्न हुए हैं। हम उन असमानताओं के विरुद्द मोर्चा भी लगाते हैं। लेकिन हम क्यों छुपाएं अपनी पहचान। अनेक ऐसी जातियों के मैं सम्पर्क में हूँ जो ब्राह्मण न होते हुए भी शर्मा उपनाम का प्रयोग कर रही हैं। अनेक ऐसों से ब्राह्मणों से भी जो खुद के लिए अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त करना चाहते हैं। यह कौनसी मानसिकता है जो खुद के लिये अजायबघर में स्थान ढूंढती है। मुझे जो संस्कार प्राप्त हुए हैं वे तो ये हैं कि एक बुजुर्ग ने बहस करते हुए किसी बात का जवाब न बन पड़ने पर जब मुझ से यह कहा कि तुम तो कम्युनिस्ट हो गए हो (तब यह शब्द गाली के रुप में इस्तेमाल किया गया था) और जवाब में मैं ने यह कहा कि मैं कम्युनिस्ट हो गया हूँ तो क्या मेरी बात का उत्तर आप नहीं देंगे? तो मेरे पिता जी ने मुझे अकेले में इस बात के लिये डांट लगाई थी कि जो तुम हो नहीं कहते क्यों हो।
तब मैं ने जानने का प्रयत्न किया था कि कम्युनिस्ट क्या होता है।
हम अपनी पहचान क्यों छुपाएँ? उस से कितना ही नुकसान क्यों न होता हो।


दिलीप मंडल said...
अजित जी, शायद ये मेरे लिखे का ही दोष है कि ब्राह्मणवाद के विरोध से किसी खास जाति के विरोध का स्वर आता है। ब्राह्मणवादी होने के लिए ब्राह्मण होने की जरूरत कहां है? जातिवाद का सबसे विकृत रूप जो हमें दिखता है, वो ज्यादातर मझौली जातियों से जुड़ी कहानियां है।

लेकिन मीडिया का ब्राह्मणवाद अभी तक सवर्ण परिघटना है। आज रात आपके लिए एक और पहलू लाने की तैयारी में हूं। आज के नवभारत टाइम्स के संपादकीय पेज पर मेरा मुख्य लेख पढ़िए।

नीरज गोस्वामी said... मैने कभी खुद को ब्राह्मण जाहिर नहीं किया और न ही गर्व करने लायक कुछ नज़र आता है। मैं जहां हूं उसमें एकमात्र आधार योग्यता है।"
अजीत जी
आप ने बहुत सार गर्भित पोस्ट लिखी है....इंसान का विभाजन होना ही नहीं चाहिए चाहे आधार कोई भी हो जाती धर्म या वर्ण...क्यों हमने आपने आप को इतने खानों में बाँट रखा है समझ नहीं आता...और फ़िर ये खाने में पड़े लोग जब एक दूजे से लड़ते हैं हैं तो इंसान और जानवर का भेद लुप्त हो जाता है दोनों एक समान ही लगने लगते हैं...मैं आप की सोच से 100% सहमत हूँ...
नीरज


Sanjeet Tripathi said... सहमत-सहमत!!
ब्राह्मण होने पर आज गर्व करने लायक मुझे भी कुछ नही दिखता।


पंकज सुबीर said...
मैं शत प्रतिशत ही सहमत हूं वास्‍तव में तो हम सभी मानव हैं और किसी का कोई समाज या धर्म का होना उसको महान नहीं बनाता है ।


Tarun said...
आशा है कुछ सालों बाद आपकी ऐसी किसी पोस्ट का शीर्षक हो - जात ना पूछो इंडियन की


Mrs. Asha Joglekar said...
पढने लिखने को जिन्होने पेशा बनाया है उन सबकी
जात एक ही है उपनाम चाहे कुछ ही क्यूं न हो । असल में हमारी सरकार ही नही चाहती की जातिभेद मिटे तभी तो हर फॉर्म में हमसे जाति और धर्म पूछती रहती है । ऐसा करे भी कैसे जाति के नाम पर राजनीति कर लोगों को बरगलाने का मौका जो नही मिलेगा। जाति में गर्व करने जैसा कुठ है भी नही जिसमें हमारा योगदान शून्य है । मेरे कई दलित मित्र हैं जो सवर्णों से किसी तरह कम नहीं है,और मेहनत से अपना मुकाम हासिल करने में विशवास रखते हैं ।

मोहल्ले में कितने आदमी थे? दरअसल एक भी नहीं! पर आई टिप्पणियां-

Anonymous said...
Dileep ji, main sirf itna nahi samajh paay aki aap kehna kya chahte hain...


डा.मान्धाता सिंह said...
दिलीपजी सिर्फ गिनने के लिए अगर दलित पत्रकार की बात की जा रही है तो सन्मार्ग के प्रसादजी को भी शामिल कर लीजिए। कुछ और अखबारों में भी मिल जाएंगे मगर मुखिया कब बनेंगे। यानी सचमुच प्रभावशाली हो उनका अधिकार और पद। खैर छोड़िए, मायावती जी ने निजी संस्थानों में आरक्षण को कारगर तरीके से लागू करने वादा किया है मगर कितना कर पाएंगी जबकि पासवान जैसे नेता ही उनके विरोध में खड़े हो रहे हैं। शायद दलितों का भी सवर्ण वर्ग तैयार हो गया है।

अजित वडनेरकर said... पहली बात - आपकी ये पोस्ट समझ में नहीं आई।
दूसरी बात - साहस भी है ,धैर्य भी है। बस , चौबीस घंटों के पच्चीस घंटे नहीं हो सकते हैं अर्थात वक्त की कमी है। फिर भी कहानी पूरी सुनेंगे।
तीसरी बात- किसी दलित पत्रकार की मौजूदगी में आपका अफसर आपसे उसके जातीय विशेषणों चमट्टे, बसोर या भंगी के उल्लेख से बात करे तो आप क्या करेंगे ?
1.अफसर को जूते लगाएंगे
2.पत्रकार से कहेंगे,इस ब्याह मे यही गीत हैं
3.चुप रहने की समझदारी दिखांएंगे
4.पत्रकार को कहेंगे कि साहब का मतलब वह नहीं था
5.पत्रकार के साथ खुद भी नौकरी छोड़ देंगे

क्या करेंगे आप?
दलित पत्रकार तो हैं और बाकायदा काम कर रहे हैं। वैसे अपशब्दों में बात करने वाला माहौल भी इधर नहीं देखा। मेहनत ही आगे ले जाती है। हर क्षेत्र की अलग पहचान है। जिसने जहां जाना है , पहुंचेगा। आंबेडकर साहेब को ऊंचाई पर आपने , मैने या उनके माँ - बाप ने पहुंचाया था ? वे अपनी मेहनत , लगन से दशकों पहले वहां पहुंच गए थे। क्या आज का पिछड़ावर्ग, दलित वर्ग इतना हीन है कि इतने बरस बाद भी कुछ न कर पाए? हमारे इधर कोई नौकरीपेशा दलित को अपशब्द बोल कर देखे या न देखे, अगर दलित को खुन्नस आ गई कि फलाने को फसाना है तो वह तमाम कानूनों का सहारा लेकर अच्छे-खासे रसूखदार को नचा देगा। ये कानून किसने बनाए हैं ?
देश का मुस्लिम सेनाध्यक्ष, देश का दलित प्रधानमंत्री, देश का पिछड़ा नेवी चीफ़, ये सब तो आसान बाते हैं। बना दीजिए और संतुष्ट हो जाइये। एनजीओ चलाइये। मगर इस पर कभी आंदोलन
( गौर करें आंदोलन कह रहा हूं ) मत करिये कि शिक्षा का बजट क्यों नहीं बढ़ता । महिला बालविकास प्राथमिकता के साथ क्यों नहीं हैं राजनीतिक दलों के एजेंडे में। सदियों पुराने तमाम तरह के कानून बदलने की मुहिम क्यों नहीं छेड़ी जाती तथाकथित प्रगतिशील तबके द्वारा। जघन्य अपराधों की आसान सजाएं कब तक ?
ये सब हो जाए तो फिर बहुत कुछ आसान होगा।
पत्रकारिता संस्थान का दलित मुखिया किसे होना चाहिए ? आप नाम तय करिये हम मुहिम छेड़ने को तैयार हैं। पहले कभी मुहिम छेड़ी गई है ?
निजी संस्थानों के कर्ता-धर्ता ही अगर निशाने पर अगर हैं तो बात अलग है।


Sanjay said... कहना क्‍या चाह रहे हैं यह भी तो समझ आना चाहिए.. बातों की जलेबियां बनाने का क्‍या फायदा...

दिलीप मंडल said... समझ में नहीं आ रहा है तो अफसोस है दोस्तो। चंद स्थापनाएं हैं। सरल और सीधी। अब भी न समझ में आए तो धिक्कार है मेरी भाषा को। आपकी समझ और नीयत पर कोई शक नहीं है, न कोई शिकायत। ये चैलेंज तो मेरे लिए हैं कि समझ में आने लायक लिखूं।

- पत्रकारिता में वंचित सामाजिक समूहों की हिस्सेदारी कम है। दिल्ली में मीडिया संस्थानों की सोशल ऑडिटिंग हुई है, आप कहेंगे तो उपलब्ध करा दूंगा।
- हिस्सेदारी कम होने के ऐतिहासिक और सामाजिक कारण हैं। बड़े फलक पर देखें तो ये किसी की साजिश का नतीजा नहीं है।
- ये कारण बदलते वक्त के साथ बदल रहे हैं, हालात सुधर रहे हैं।
-मीडियाकर्मियों के लिए जरूरी है कि वो इस पहलू को ध्यान में रखें क्योंकि न्यूजरूम में सामाजिक असंतुलन का असर कंटेट पर, मीडिया की विश्वसनीयता पर पड़ रहा है। बाबरी मस्जिद कांड और आरक्षण विरोधी आंदोलन के समय की पत्रकारिता आपने देखी है। उस समय के कवरेज की कंटेट एनालिसिस भी आपने देखी होगी।
- यथास्थिति को बदलने की जिनकी थोड़ी-बहुत हैसियत है, वो इसके लिए अपनी ओर से कुछ कर सकते हैं। करना चाहिए। न करें तो भी हालात तो बदलेंगे ही। देखिए ना, न्यूजरूम में लड़कियां आ गई हैं और छा गई हैं। इंग्लिश न्यूज चैनलों में काम करने वालों में उनकी संख्या क्या 50 परसेंट तक पहुंच गई है? शायद हां।


चंद्रभूषण said...
दिलीप जी की पोस्ट किसी की समझ में क्यों नहीं आ रही है, यह बात उनके अलावा मेरी भी समझ में नहीं आ रही है। बात तो सीधी-सी है कि न्यूजरूम में पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक नहीं के बराबर हैं लिहाजा निहित स्वार्थी तत्व वहां खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं। हाल के आरक्षण विरोधी मेडिकल आंदोलन में कहीं कोई आत्मदाह हुआ ही नहीं और देश के ज्यादातर लोगों की तरह मैं भी अबतक यही माने बैठा हूं कि ऐसी छिटपुट दो घटनाएं सचमुच हुई थीं। पता नहीं किस-किस मामले में ऐसे क्या-क्या घपले हो रहे होंगे, लिहाजा और बातों के अलावा खबरों के वस्तुगत होने के लिए भी यह जरूरी है कि मीडिया में व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व हो। ऐसा हो जाने के बाद भी लाला के लोग उसके और अपने फायदे के लिए खबरों को खास ऐंगल देने का कोई मौका नहीं चूकेंगे, लेकिन यह एक अलग मामला है।

शेष said... सीधे-सीधे समझ में आने वाली बात समझ में नहीं आ रही है।
- यह त्रासदी इस बहस की जरूरत को रेखांकित करती है।

और अंत में...मोहल्ला में वो सुबह कभी तो आएगी पर मिली प्रतिक्रियाएं -


ambrish said...
delhi,chattisgarh phir uttar pradesh sabhi jagah jati ka asar
patrkarita per padte dekha hai.mandal aandolan ke samai express ke mahan sampadak ke kamre me mandal viodhiyo ki baithak bhi dekhi aur kaise mandal ke samarthan ki khabre jansatta me kat ker kinare kar di jati thi yeh bhi dekha aur dat ker virodh bhi kiya.up ke pichle chunav me media
ka motiabind bhi dekha jise mayavati ki jeet nahi dikhai per
rahi thi.aur bhi bahut kuch hai.isliye yeh kahana ki jati koi mudda nahi hai theek nahi hai.

ambrish

दिनेशराय द्विवेदी said... इस विषय पर मित्रों के बीच बहस का होना कोई बुरी बात नहीं। लेकिन इस से मित्रों के बीच दीवार खड़ी नहीं होना चाहिए। यह सही है कि आज भी दलितों के साथ अन्याय होता है यह सत्य है। लेकिन आरक्षण इस भेद को दूर नहीं कर पाया है। इसे दलित जातियों के सम्पन्न लोगों ने अधिकार समझ लिया है। दलितों में दलितों को तो इस का लाभ मिल ही नहीं रहा है। यह भी सही है कि दलितों की खबरों को मीडिया में मौजूद एक तबका दबाने का प्रयास करता है। लेकिन मीडिया में आज बहुमत ऐसे लोगों का नहीं है। अल्पसंख्यक सवर्णों (ब्राह्मण, कायस्थ आदि जातियों का बहुत बड़ा तबका ऐसा है जो पूरी तरह नौकरयों पर निर्भर है। आरक्षण ने इनमें से कइयों को नौकरियों से वंचित किया है। उन की सोच क्या बन रही होगी यह भी सोचें। एक समतावादी समाज की ओर बढ़ने के लिए आरक्षण का मौजूदा मॉडल बिलकुल उचित नहीं है। पूर्ण रोजगार की स्थिति ही इसे बदल सकती है। लेकिन यह आरक्षण और आरक्षण नहीं की लड़ाई इस मूल लड़ाई को पीछे धकेले जा रही है। आवश्यकता इस बात की है कि दलित और सवर्ण सभी वंचित एक साथ मिल कर इस संघर्ष को लड़ें। यह संघर्ष के बीच का साथ ही दोनों के बीच के भेद को दूर करेगा।

Ek ziddi dhun said... चिंताएं वाजिब हो सकती हैं, मगर हमने भी यही लिखा कि स्थिति दिल्ली में बैठ कर जितनी चिंताजनक लग रही है, वैसी है नहीं।....
isi ek line me.n sab saaf ho jaata hai. yahi kahte hain ki kahan hai jatiwad, kahan chhuwachhoot, kahan anyay....Apne kya khoob kaha hai--
चिंताएं वाजिब हो सकती हैं, मगर हमने भी यही लिखा कि स्थिति दिल्ली में बैठ कर जितनी चिंताजनक लग रही है, वैसी है नहीं।
Theek hai, apko yahi dekhna suitable lagta hai to koi kya kar sakta hai.....Kahne ko to aap ye bhi kah sakte the--Jo hai, vo jaruri hai, Desh ke liye, samaj ke liye, dharm ke liye.....Apki itni bhari sadashyata ke liye apko sadhuwad

February 8, 2008 11:25 PM अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, February 8, 2008

नस-नस फड़कती है खानदान के नाम पर....


रोमांच की अवस्था या खुशी के संचार को मुहावरेदार भाषा में नस फड़कना कहा जाता है। नस शब्द से जुड़े कई और भी मुहावरे है मसलन नस पहचानना, नस ढीली पड़ना, नस-नस में समाना आदि। शरीर की रक्त वाहिकाओं के लिए संस्कृत - हिन्दी में स्नायु, नस, नाड़ी या शिरा शब्द हैं जिनमें से नस का प्रयोग आमतौर पर होता है। अरबी-फारसी के नब्ज और रग जैसे लफ्ज भी इन्हीं अर्थों में इस्तेमाल किए जाते हैं। अंग्रेजी में देखें तो इनके लिए नर्व, नर्वस जैसे शब्द चलन में हैं। खास बात ये कि नस या स्नायु और nerve, nervous जैसे शब्द एक ही मूल से जन्में है। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के ही एक शब्द sneu से ही इनका उद्गम माना जाता है। इसी से बना है संस्कृत का स्नु शब्द और स्नु से ही निकले हैं स्नायु और नस। वर्ण विपर्यय सिंद्धांत अर्थात अक्षरों का क्रम बदलने से स्नायु हो गया नस। यह वैसे ही है जैसे लखनऊ खांटी लखनवी में हो जाता है नखलऊ। यही है वर्ण विपर्यय। बहरहाल, खास बात ये कि जहां संस्कृत में स्नायु का अर्थ नाड़ी, पेशी या तंत्रिका है वहीं अंग्रेजी में sneu से बने nerve का का अर्थ सिर्फ तंत्रिका यानि एक ऐसी नाड़ी जो मस्तिष्क और शरीर के बीच संदेशों को लाने-ले जाने का जरिया बने। गौरतलब है कि sneu से ही प्राचीन लैटिन में बना neuros ,ग्रीक में neuron , आर्मीनियाई भाषा में neard जिसका अर्थ भी यही था। इसी से अंग्रेजी में बने sinew, nerve और nervous - जैसे शब्द जो नाड़ी या तंत्रिका के अर्थ में प्रयोग किए जाते हैं जबकि हिन्दी में नाड़ी अथवा नस को आमतौर पर रक्तवाहिनी के रूप में समझा जाता है। हालांकि नब्ज शब्द अरबी का है और ये भाषा इंडो-यूरोपीय परिवार की नहीं है मगर ऐसा लगता है कि यह नब्ज भी अरबी में इंडो-यूरोपीय मूल से ही पहुंचा है। मिसाल के तौर पर अरबी में साइटिका नर्व को नसा कहा जाता है। जाहिर है जिस sneu से अंग्रेजी में nerve और हिन्दी में नस ने जन्म लिया । कोई ताज्जुब नहीं कि अरबी का नब्ज और नसा भी वहीं से आया हो। इसी स्नु का एक अर्थ है बह निकलना या रिसाव। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की एक ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है-

कब याद में तेरा साथ नहीं,कब हाथ में तेरा हाथ नहीं
सद शुक्र कि अपनी रातों में,अब हिज्र की कोई रात नहीं


इसका एक शेर है-

मैदाने-वफ़ा दरबार नहीं,यां नामो-नसब की पूछ कहां
आशिक तो किसी का नाम नहीं,कुछ इश्क किसी की ज़ात नहीं



इसमें नाम ओ नसब शब्द पर गौर करें। खानदान ,जाति, कुल या गोत्र दरअसल एक परंपरा है। गौर करें कि परंपरा का कोई न कोई स्रोत होता है जो बना है संस्कृत की स्रु धातु से जिसमें बहना, गिरना, धारा बहाना आदि भाव हैं। । नदी का पर्यायवाची शब्द सरिता भी इसी स्रोत की उपज है। स्रोत से ही जन्मा है हिन्दी का शब्द सोता जिसका मतलब जलस्रोत,छोटा नाला,बहाव आदि होता है। बहाव में गति है, विकास है। कुल, गोत्र , खानदान या वंश-परंपरा भी लगातार गतिशील रहती है। इसमें भी बहाव का ही भाव है। अरबी ज़बान के लफ्ज नसब का मतलब भी कुल या गोत्र ही है। निखालिस हिन्दुस्तानी बोलने वाले आज भी खानदान के अर्थ में नाम ओ नसब शब्द का प्रयोग करते हैं। नसीब यानी भाग्य, तकदीर भी इसी कड़ी के शब्द हैं। सुबह-सुबह की हवा को नसीम कहते हैं। इसके प्रवाहवाची शब्द पर गौर करें तो रिश्तेदारी नज़र आती है। हिन्दी में भी किसी अज्ञात कुल गोत्र वाले का उल्लेख करते समय होता न सोता मुहावरा बोला जाता है अर्थात जिसका कोई न हो। यहां होता में होतृ यानी यजमान और सोता में स्रोत यानी वंश छुपा नज़र आ रहा है। स्रु की ही तर्ज पर इसी वर्णक्रम की धातु है शृ जिसमें भी बहाव सार्थक हो रहा है। नस का ही एक प्रकार है शिरा । इसका मतलब होता है रक्त वाहिका, नालिका, नाड़ी आदि। जाहिर है शिरा इसी शृ की देन है।

आपकी चिट्ठियां-

तीन पड़ावों से आपके ख़तों का जवाब भी नहीं दिया गया और न ही ज़िक्र् हुआ। ये सब अगली बार। शुक्रिया। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, February 7, 2008

जात न पूछो कल्लू की....

हर शहर में फुटपाथ पर चाय और पान सिगरेट की दुकानें होती हैं और वे तमाम खाने पीने की चीज़े भी रखते हैं। पास में ही एक पानी की टंकी होती है । चमकदार स्टील या पीतल की। एक नौकरनुमा छोकरा होताहै जो जूठे गिलास प्लेट धोता है। मालिक होता है वह या तो चाय बनाता है या पान लगाता है। वह कल्लू ,रामदीन, भगवत, सलीम , बलभद्दर या कोई भी हो सकता है। यहां आसपास के दफ्तरों के लोग आते हैं। आसपास के क्षेत्रों के लोग जो रोजमर्रा के काम निपटानें आते हैं वे भी इनमें होते है। सब बडे़ मजे़ में यहां खाते पीते हैं। ।ये चायवाला या पानवाला बड़ा खास होता है। सभी से मीठा बोलता है , कभी तड़ी में भी बोलता है। अच्छे भले सूटबूट वाले उससे उधारी का रिश्ता रखते हैं। देर शाम घर जाने वाले छुपाकर गिलास में दारू पीने का रिश्ता भी बना लेते हैं। दफ्तर का फ्रस्ट्रेशन भी इससे शेयर कर लेते है। कुछ भाई कल्लू से उसकी जात भी पूछ लेते हैं और उस पर भरोसा कर लेते हैं, मगर ज्यादातर नहीं पूछते। कमोबेश यही हाल राजमार्गों के ढाबों पर होता है। ये तस्वीर आम हिन्दुस्तान की है। यहां जातिवाद की गंद क्यों नज़र नहीं आती?

मोहल्ला में ये जो हमारा कूड़ेदान है में दिलीप जी ने मेरी टिप्पणी को पोस्ट का मूल आधार बनाया है। दिलीपभाई भी मेरे उन गिने-चुने मित्रों में हैं जिनसे बौद्धिक ऊर्जा ग्रहण करने का सुख मिलता है। एक दलित पत्रकार की तलाश वाली पोस्ट पर मैने उक्त टिप्पणी की थी । कुछ बातें अंतर्विरोध जैसी लगी थी इसीलिए वह प्रतिक्रिया जन्मी।

सबसे पहले अरविंद शेष की बात । अरविंदजी मेरे सामने जब सच आया ही नहीं तो उसका स्वाद कैसे बता सकता हूं? मुहावरे में सच का स्वाद कड़वा बताया गया है मगर सच का स्वाद मैने हमेशा मधुर ही पाया है। वादी -प्रतिवादी के झमेले में पड़ूं तो यह स्वाद सापेक्ष होगा।

दिलीप जी , आप स्वयं कह रहे हैं कि शहरों की स्थिति अलग है । उनियाल जी की जिस कालजयी रिपोर्ट का आप हवाला दे रहे हैं उनमें प्रेस क्लब की लिस्ट की बात कही गई है। पूरी दिल्ली की भी बात मान लें तो भी बात तो शहर पर ही सिमट गई। सर्वे के नाम से जाहिर हो रहा है कि शायद यह अंग्रेजी में है । मैं अनुमान लगा रहा हूं कि इसमें ज्यादातर अंग्रेजी के पत्रकार ही होगे। अंग्रेजी में हो सकता है पिछड़े ,दलित पत्रकार न हों या कम हों तब, मगर अब तो हैं। जहां तक हिन्दी पत्रकारिता का सवाल है यहां तो शर्तिया हैं। मेरे इर्द-गिर्द हैं। प्रकाशन केंद्र तो शहरों में ही हैं न..... तो अनुभव शहरों से ही आएंगे। पूर्वी भारत की तुलना में मध्यप्रदेश में हमें अपने आसपास वैसे अमानवीय जातीय जुमले सुनाई नहीं पड़ते जिनसे कहानियां बनती हैं। दीप्ति भी शायद यही कहना चाहती है।
मेरा ऐतराज अनावश्यक तौर पर ब्राह्मणों को कोसने पर है। मुझे जो कहना था मैं कौन हूं, शर्मा या वडनेरकर पोस्ट में कह चुका हूं। मैने कभी खुद को ब्राह्मण जाहिर नहीं किया और न ही गर्व करने लायक कुछ नज़र आता है। मैं जहां हूं उसमें एकमात्र आधार योग्यता है। अलबत्ता जातिवादी समाज में जब मुझे खुद को गैर ब्राह्मण समझे जाने के संकेत मिलते हैं तो मज़ा आता है। मैने अभी तक जातिसूचक कालम में हिन्दू ही लिखा है। ब्राह्मणों के अत्याचारों पर बात कर कई बार सजातीय सहकर्मियों या संबंधियों की नाराजगी भी मोल ली है। इस पूरे आलेख में मैने सिर्फ अपनी बात कही है , आपकी किसी पोस्ट से असहमति नहीं जताई है । प्रभु ने जब भी चाहा है , भले काम हमारे हाथों हुए हैं।

आज चंदूभाई से फोन प्रसंगवश इस विषय पर चर्चा हुई। उन्होंने आपके मुद्दों का समर्थन किया मगर यह भी कहा कि दरअसल आलोचना किसी भी वर्ग के ताकतवर पक्ष की हो रही होती है मगर उससे नुकसान सबसे ज्यादा कमजोर पक्ष का होता है। कमजोर यानी वह वर्ग जहां से दीप्ति और मेरे जैसे लोग आते हैं। हमारे ब्राह्मण संस्कारों के बीज रूप में कहीं यह नही रोपा गया कि अवर्णों से घ्रणा करना है। छुआछूत बरतना है वगैरह। ब्राह्मण हूं, पर शर्म नहीं । जैसा मेरे संस्कारों ने बनाया वैसा हूं। अपने होने से किसी को लजाया नहीं है। कहां कितने दलित हैं,कहां कितने मुसलमान है जैसी अजायबघर टाइप की सोच से हटते हुए एकमात्र विकल्प शिक्षा को ही मानता हूं इन तमाम बुराइयों को मिटाने का। जागरुकता बढ़ेगी तो सदियों पुरानी चीजें अपने आप खत्म होंगी। हो रही है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, February 6, 2008

अतिथि तो यायावर ठहरा [ किस्सा ए यायावरी-9 ]

अतिथि शब्द की महिमा निराली है । तैत्तिरीयोपनिषद की की प्रसिद्ध उक्ति अतिथि देवो भवः उसे पूजनीय बनाती है। मगर मेहमान को मुसीबत समझने की परंपरा भी पूरी दुनिया में प्राचीनकाल से ही रही है। रोमन विद्वान प्लाटियस का कथन- कोई भी अतिथि इतना श्रेष्ठ नहीं कि तीन दिन बाद भी अपने मेजबान को बुरा न लगे यही साबित करता है।
इसके बावजूद अतिथि शब्द के हिस्से में ज्यादातर रुतबा और सम्मान ही आए हैं। अतिथि शब्द की कुछ लोग बड़ी दिलचस्प व्युत्पत्ति बताते है। वे इस शब्द का संधि विच्छेद करते हुए (अ+तिथि) साबित करते हैं कि जिसके आने की कोई तिथि न हो वह अतिथि है। वैसे यह बात बड़ी मज़ेदार लगती है और एक हद तक तार्किक भी क्योंकि मेहमान कभी भी टपक पड़ता है और इस शब्द में इसकी व्याख्या भी छुपी है। मगर यह सही नहीं है।
संस्कृत धातु अत् से बना है यह शब्द । अत् में इथिन् प्रत्यय लगने से हुआ अतिथि। अत् का मतलब होता है घूमना, फिरना, चक्कर लगाना आदि। आज चाहे अतिथि का अर्थ आगंतुक, अभ्यागत या मेहमान हो गया है मगर प्राचीन काल में इसका अर्थ कहीं गूढ़, दार्शनिक और मानवीय था। अत् धातु में निहित लगातार गमनशील रहना है। जिसके जीवन का उद्देश्य ही चरैवेति-चरैवेति हो यानि चलते रहो, रुको मत, इसे जीवनसूत्र बनाने वाला कौन हुआ ? जाहिर है वह ज्ञानमार्गी है , यायावर है, संत है, परिव्राजक है। अथवा जीवन को कर्म मानते हुए निकला कोई कर्मयोगी है। यही है अतिथि का अर्थ । सामान्य पथिक भी इसी श्रेणी में आता है। अब लगातार कर्मशील रहना एक सात्विक और नैतिक बात हो सकती है मगर ठहराव तो शरीर की आवश्यकता है। ऐसे ही आगंतुक जब प्राचीनकाल में कहीं ठहराव की इच्छा प्रकट करते तब अतिथि का अर्थ मेहमान अथवा आगंतुक में स्थापित हुआ, अन्यथा अतिथि का अर्थ यात्री हुआ। और ऐसे व्यक्ति की अभ्यर्थना करना, उसे आश्रय उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण माना गया।
अतिथि से ही बना आतिथ्य अर्थात आवभगत करना, स्वागत सत्कार करना। आतिथेय यानी मेज़बान भी इससे ही बना है। डा राजबली पांडेय हिन्दू धर्मकोश में अतिथि के बारे कहते हैं कि-

यस्य न ज्ञायते नाम न च गोत्रं स्थितिः।।
अकस्माद् गृहमायाति सो तिथिः प्रोच्यते बुधैः।।


अर्थात् जिसका नाम, गोत्र , स्थिति नहीं पता हो और जो अचानक घर पर आता है वही अतिथि है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, February 5, 2008

ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं ...

ब्रज या ब्रिज शब्द से सभी परिचित है । चाहे लोग इसे कृष्णलीला भूमि के तौर पर जानते हों मगर किसी ज़माने में इस शब्द का सीधा सरल अर्थ था मवेशियों का रेवड़। वैसे भगवान कृष्ण, गोप-गोपियों और गोधन के अलावा ब्रज का रिश्ता वैराग्य से भी है।
ब्रज का संस्कृत में रूप है व्रज जिसका जन्म हुआ है व्रज् धातु से। संस्कृत धातु व्रज् एक गतिवाचक शब्द है जिसके मायने हुए जाना , चलना , प्रगति करना , पधारना आदि भाव इसमें समाए हुए हैं। इससे ही बना है ब्रजः जिसका मतलब हुआ समुच्चय, समूह, रेवड या संग्रह आदि। मवेशियों की प्रवृत्ति कभी एक स्थान पर टिक कर बैठने की नहीं होती है। वे लगातार विचरण करते ही रहते हैं।
मथुरा के नज़दीक स्थित एक विशाल क्षेत्र को पौराणिक काल से ही ब्रज नाम इसीलिए मिला क्योंकि द्वापरयुग में यहां भगवान श्रीकृष्ण का वास था। रूढ़ अर्थों में इसकी व्याख्या करते हुए समझा जा सकता है कि ब्रज प्रदेश यानी जहां श्रीकृष्ण ने गौएं चराई। उनके गोपाल स्वरूप की सर्वव्यापकता ने ही इस क्षेत्र को ब्रजप्रदेश की ख्याति दिलाई।
व्रज् में निहित घूमने-फिरने का भाव इससे ही बने ब्रजः में आश्रय, समूह आदि से जुड़ जाता है। जाहिर है गौशाला , गोष्ठ, गोधन और ग्वालों के आश्रयस्थल के रूप में ब्रजः के अभिप्राय विकसित होते चले गए। व्रज् धातु के गतिवाचक भाव से ही जुड़ता है सन्यास अथवा वैराग्य। साधु सन्यासी भी कभी एक जगह टिक कर नहीं बैठते हैं । इसी वजह से उन्हें परिव्राजक कहा जाता है। इस शब्द में भी व्रज् में निहित भटकने,जाने,छोड़ने का भाव निहित है। जो सांसारिक वासनाओं को छोड़ निर्वासित हो चुका हो , वही हैपरिव्राजक। इसी लिए प्राचीन काल में सन्यास लेने को प्रव्रज्या लेना भी कहा जाता था। व्रज या ब्रज से बने लोकप्रिय हिन्दी शब्दों पर जरा गौर करें- ब्रजेश, ब्रजवासी, ब्रजधाम, ब्रजमंडल, ब्रजेन्द्र, बिरजू, बिरज ( बिरज में , होरी खेलत नंदलाल..)आदि।
आज की तरह ही प्राचीन काल में भी पशुगणना होती थी जिसे घोष-यात्रा अथवा व्रज-घोष कहा जाता था। यह शासन के अधिकारियों का एक लंबा चौड़ा दल होता था जो वन प्रांतरों में जाकर प्रतिवर्ष घोष-यात्रा के जरिये पशुओं की गणना करता था । इसके अंतर्गत गायों की गणना की जाती थी। तुरंत ब्याई हुई गायों को, बछड़ों को और गाभिन गायों की अलग अलग गणना करते हुए उनके शरीर पर ही अंक या निशान डाल दिये जाते थे। इस प्रक्रिया के तहत दस सहस्र गायों की संख्या को व्रज कहा जाता था।
स्थान के अर्थ में ब्रज के अंतर्गत पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यमुना और चंबल तटवर्ती क्षेत्र आता है। आज भी इस समूचे क्षेत्र को ब्रजप्रदेश बनाने की मांग बीच बीच में उठती रहती है।

आपकी चिट्ठियां-

सफर के पिछले दो पड़ावों- वरुण , डालर और इस्लाम तथा भारत विभाजन पर कुछ खास (पुस्तक चर्चा)
पर कई टिप्पणियां मिलीं जिनमें सर्वश्री दिनेशराय द्विवेदी, पंकज सुबीर , पल्लव बुधकर , नीलिमा सुखीजा अरोड़ा और संजीत त्रिपाठी , संजय , तरुण, संजय बैंगाणी, ममता , दीपक भारतदीप, माला तैलंग, संजीत त्रिपाठी और ज्ञानदत्त पाण्डेय जी शामिल हैं । आप सबका आभार । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, February 4, 2008

भारत विभाजन पर कुछ खास [ पुस्तक चर्चा ]

शब्दों के सफर में एक नई शुरूआत पुस्तक-चर्चा के जरिये हो रही है। हिन्दी में प्रकाशित जो कुछ भी मैं नया पढ़ रहा हूँ , मेरा प्रयास होगा कि उसकी जानकारी आप तक भी पहुँचाऊँ। हो सकता है कि आप भी इसे पढ़ चुके हों या इस अनुभव से गुजर रहे हों तो अनुभव साझा किये जा सकते हैं। शुरूआत प्रियंवद की हाल ही में प्रकाशित भारत विभाजन की अंतःकथा से ।

बीती एक सदी में दुनियाभर में आए सामाजिक राजनीतिक बदलावों ने साहित्य की दुनिया को भी बेतरह प्रभावित किया है । साहित्य समाज का आईना होता है इसलिए संवेदना के स्तर पर तमाम परिवर्तन स्याही से गुज़रकर काग़जी इबारत बनें और इतिहास का एक हिस्सा हो गए। भारत विभाजन भी एक ऐसी ही महत्वपूर्ण घटना थी जिसने विश्व को प्रभावित किया । इस विषय पर अंग्रेजी हिन्दी में खूबलिखा गया। राजनीतिक विश्लेषण, आत्मकथात्मक आख्यान, कहानियां, उपन्यास, विशुद्ध इतिहास लेखन और वैमनस्यकारी प्रलाप तक कागज़ों की इबारत बने। हिन्दी के प्रख्यात कहानीकार-उपन्यासकार प्रियंवद की हाल ही में आई एक पुस्तक भारत विभाजन की अंतःकथा इस कड़ी की एक महत्वपूर्ण रचना है। मेरा मानना है कि भारत के हर पढ़ेलिखे नौजवान को यह पुस्तक ज़रूर पढ़नी चाहिए। इस देश के इतिहास ,उसकी नियति,विडम्बनाएं और भविष्य की थाह लेने के लिए हमेशा ही हम सदियों पुराने अतीत में गोते नहीं लगा सकते हैं। आज की पीढ़ी अगर साठ बरस पहले हुए भारत विभाजन को ही एक राष्ट्र का जन्म माने और उसे अपने अस्तित्व से जोड़ कर देश के वर्तमान हालात,हिन्दू मुस्लिम समस्या ,ग़रीबी,सदियों की गुलामी,सहसंस्कृति और आने वाले दिनों के बारे में कुछ सार्थक सोचना चाहे तो उसके लिए यह पुस्तक सही समय पर लाए हैं प्रियंवद। पुस्तक जो मुख्य सवाल उठाती है वे है कि वे क्या कारण थे कि धर्म के नाम पर बंद कमरों में बैठकर सियासी लोगों ने देश को दो टुकड़ों में बाँट दिया। एक वृहत सार्वभौम भारत जो सदियों से साँसें ले रहा था उसका अंत कर दिया। लगातार कई सदियों तक साथ रहे हिन्दू मुस्लिम आजादी के अंतिम दिनों में साथ बने रहने पर सहमत क्यों न हो सके। कहां थे इस विभाजन के बीज।
कुल मिलाकर यह पुस्तक ऐसे अनेक सवालों के जवाब भी तलाशने की कोशिश करती है।लेखक ने पूरी ईमानदारी से अतीत मे गोते लगाए हैं। जबर्दस्त शोधकार्य के साथ ईसापूर्व भारत के संदर्भों से लेकर मुगलकाल के दस्तावेजी संदर्भों और अंग्रेजी राज के हर उपलब्ध लिखित मुद्रित सबूत को उन्होने टटोला है। हिन्दी में विभाजन के विद्रूप पर भावुक कविताएं ,तिलमिला देने वाली कहानियां और गहरे अवसाद मे डुबो देने वाले उपन्यास तो लिखे गए मगर भारत विभाजन की अंतःकथा के रूप में जैसा संदर्भग्रंथ प्रियंवद ने लिखा है वैसा काम अभी तक नहीं हुआ। भारी भरकम संदर्भों से लदी-फदी होने के बावजूद यह पुस्तक किसी कथा साहित्य का सा मज़ा देती है। प्रियंवद जिस रोचक शैली में कठिन सवालों की तलाश में गूढ़ तथ्यों की पड़ताल करते हैं, उसमें पाठक को कही उलझाव महसूस नही होता। 2007 की यह हिन्दी साहित्य को मिली सबसे कीमती भेंट है।
पुस्तक भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली ने प्रकाशित की है। मूल्य है 495 रूपए। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, February 3, 2008

वरुण, डॉलर और इस्लाम

है न अजीब बात । वरूण का इस्लाम या डालर से क्या रिश्ता हो सकता है? कहां वरुण एक संस्कृत मूल का हिन्दी शब्द जिसका अर्थ है समुद या समुद्रदेव। हिन्दू धर्म में पूजे जाने वाले अनेक देवताओं में एक। दूसरा है इस्लाम जो बहुदेववाद नहीं बल्कि एकेश्वरवाद पर आधारित है। और तीसरा है डालर , जो आज के ज़माने में खुद अपने आप में एक देवता है। दरअसल वरुण का इस्लाम और डालर से रिश्ता जुड़ता है बुनेई के जरिये। ब्रुनेई हिन्द महासागर में स्थित एक इस्लामी देश है। यहां के समुद्र में तेल के भारी मात्रा में भंडार हैं और इसके चलते यहां का सुल्तान दुनिया के चंद सबसे अमीर लोगों में एक है। यहां की मुद्रा है ब्रुनेई डालर। ब्रुनेई देश का नाम संस्कृत के वरुण से ही निकला है। वरुण यानी समुद्र, नदी , जल। वाशि आप्टे के संस्कृत शब्दकोश के अनुसार वरुण समुद्र का अधिष्ठाता देवता है। उसे पश्चिम दिशा का देवता भी कहा गया है। यही नहीं, वरुण का एक अर्थ अंतरिक्ष भी है।
प्राचीनकाल से ही सभ्यताओं ने जलस्रोतों के इर्द-गिर्द विकास किया है। ये जलस्रोत न सिर्फ जीवन के लिए आधार बने बल्कि जीवन व्यापार का आधार भी बने। जल-प्रवाह ही मनुश्य के गतिशील होने का दूसरा सबसे बड़ा माध्यम बना। पहला माध्यम तो उसके पैर थे ही जिनके जरिये उसने जल स्रोत खोजे। जाहिर है नदी , सागर तट आदि शुरु से ही बसाहट के लिए मनुश्य के प्राकृतिक आश्रय रहे।
सदियों पहले मलेशिया में हिन्दू धर्म का प्रसार हो चुका था। मलेशियाई भाषा में वरूण ने बरूनाह का रूप अपना लिया जिसका अर्थ निकलता है बसने लायक जगह। करीब एक हजार साल पहले जब मलेशियाई यहां बसने आए तो यहां के प्राकृतिक सौंदर्य से प्रभावित होकर उन्होने इस जगह को यही नाम दिया। तेरहवीं सदी तक यहां हिन्दू धर्म था। चौदहवी सदी में यहां राजा ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया और पंद्रहवीं सदी में यहां के दूसरे सुल्तान ने अपने देश का नया नाम बरूनाह की जगह रखा ब्रुनेई। इस तरह हिन्दी का वरुण हो गया ब्रुनेई।

आपकी चिट्ठी

सफर के पिछले तीन पड़ावों - दरिया तो संगीत है , औरत में सचमुच कुछ भी अश्लील नहीं और सदियां कुर्बान हैं पर जो चिट्ठियां मिली उनमें है - संजीत त्रिपाठी , माला तैलंग, पंकज सुबीर , आशीष महर्षि , ज्ञानदत्त पाण्डेय, संजय , अभय तिवारी , अनुराधा श्रीवास्तव, और लावण्याजी। आप सभी का आभार । सदियां कुर्बान वाली पोस्ट के लिए दिनेशभाई ने एक सुंदर शीर्षक सुझाया, ज्ञान-वाहक - उनका आभारी हूं। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, February 2, 2008

सदियां कुर्बान हैं...

दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में शनिवार ( 2फरवरी ) के अंक में मुख्यपृष्ठ पर प्रकाशित इस तस्वीर और चित्र परिचय ने दफ्तर में ही हमसे तय करा लिया था कि इसे ब्लाग पर चढ़ाएंगे। यह ब्लाग शब्द, भाषा और पुस्तकों को ही समर्पित है। भास्कर जयपुर के स्थानीय संपादक नवनीत गुर्जर और उनके सहयोगियों को बधाई।


पुस्तकों का अपना अलग इतिहास होता है। कई बार एक पुस्तक पर सदियां न्योछावर हो जाती हैं और कई दफा एक देश के लोग दूसरे देश जाकर पुस्तकों का विषय बन जाते हैं। जैसे भारत में आक्रान्ता के रूप में आए सिकंदर और उसकी चंदन की कुर्सी पर मेसीडोनिया में लोकगीत गाए जाते हैं। इसी तरह समरकंद के एक अमीर सौदागर के बेटे इज्जत बेग ने जब भारत आकर एक गरीब कुम्हारन से प्रेम किया तो भारतीय कवियों ने कई गीत लिखे। दिल्ली में 2 फरवरी से शुरू हो रहे वर्ल्ड बुक फेयर की तैयारियों के दौरान सिर पर किताबें उठाए जा रहे इस मजदूर की अपनी कहानी हैं। ये किताबें इसके लिए भले ही बोझ हो लेकिन वह नहीं जानता कि किताबों के रूप में जाने कितनी सदियां उसके सिर पर कुर्बान हैं।
(तस्वीर एएफपी की है ) अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, February 1, 2008

औरत में सचमुच कुछ भी अश्लील नहीं

शब्दों की तिजौरी पर ताले की हिमायतपर जो प्रतिक्रियाएं मिलीं उनमें से सभी ने इस पोस्ट में कही गई बातों से सहमति जताई है। इस पोस्ट में एक उपशीर्षक था,क्या औरत अश्लील शब्द हैइस उपशीर्षक पर ही एक प्रतिक्रिया जो बाद में मिली,वह यहां पेश है।

अजित जी,
औरत शब्द को मैं भी अश्लील ही मानती रही हूं। इसे हमारे समाज में शादीशुदा महिला के सन्दर्भ में माना जाता रहा है। जैसे उप्र में बाई शब्द निचले दर्जे का माना जाता है तो महाराष्ट्र में महिला शिक्षक को भी बाई कहते हैं। जैसा हमें बचपन से बताया गया या पढ़ा है उससे भी बात मस्तिष्क में जम जाती है। जिससे परंपराओं को समझने या बदलने मे थोड़ी दिक्कत तो आती है। सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास मुझे चांद चाहिए में नायिका वर्षा , हर्षवर्धन से एकाकार होने के बाद अपनी मित्र दिव्या से ये क्यों कहती है कि मैं अब औरत हो गयी हूं । -अश्मिता


औरत शब्द हिन्दी में बरास्ता फारसी, उर्दू से आया। इसका अर्थ है स्त्री, नारी ,भार्या पत्नी आदि। मूलतः यह आया है अरबी भाषा से। अरबी में इसका रूप है औराह । दरअसल यह एक क्रिया है जिसका मतलब होता है शरीर के अंगों को ढकना, छुपाना । शरीर के गुप्तांग भी इसके दायरे में आते हैं। यह बना है अरबी धातु औरा से जिसका मतलब है कानापन या एक आंख से देखना। कुछ लोग इस धातु का अभिप्राय कमजोर, निर्बल, अधूरापन आदि से भी लगाते हैं।
इस्लामी नज़रिये से औराह का मतलब सिर्फ सिर्फ स्त्री से नहीं है बल्कि इसमें पुरुष भी शामिल हैं। शरीर के गुप्त अंगों को छुपाने की क्रिया ही औराह कहलाती है । अलबत्ता स्त्री और पुरुषों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। मसलन मर्द के लिए नाभि से घुटनों तक बदन को ढक कर रखना ज़रूरी है जबकि महिलाओं को चेहरे को छोड़करसिर से पैर तक शरीर को ढके रहना ज़रूरी है । इस्लामी व्यवस्थाओं में इस सिलसिले में हिजाब, निक़ाब और बुर्का जैसी विभिन्न व्यवस्थाएं दी हुई हैं। मगर औराह के मूल में शरीर को ढकने की ही बात है। स्त्रियों के लिए चूंकि अरबी समाज में सिर से पैर तक (आपादमस्तक- नख से शिख तक ,सरापा)जिस्म को ढकने की बात कही गई और यह सामाजिक रीति भी बन गई तथा औरत शब्द बना अर्थात जो सिर से पैर तक ढकी रहे। यही शब्द जब फारसी और उर्दू में आया तो सामान्य महिला के लिए प्रचलित हो गया क्योंकि भारत में औराह जैसी प्रथा तो नहीं थी अलबत्ता पर्दा प्रथा में इसका एक अलग रूप ज़रूर नज़र आता था।
नारीवादी सोच के लोगों की निगाह में यह शब्द खराब इसलिए है क्योंकि इसके मूल अर्थ में औरत को कमज़ोर, अपूर्ण मानने जैसी बातें भी निहित हैं। मैं इससे सहमत नहीं हूं। औरत शब्द में कहीं भी ओछापन, सस्तापन या पुरुषवादी अहंकार वाली बात कम से कम उर्दू-हिन्दी की सरज़मीं इस हिन्दुस्तान में तो नज़र नहीं आती ।यह शब्द भी उतनी ही मर्यादा अथवा शालीनता रखता है जितनी कि महिला या स्त्री शब्द। अलबत्ता जैसा कि अश्मिताजी ने मुझे चांद चाहिए के किसी प्रसंग का उदाहरण दिया है । उसका तो इस भाषा संबंधी पूरी बहस से कोई लेना-देना नहीं है। स्त्री, महिला, नारी, औरत जैसे शब्दों में सिर्फ परिपक्वता, वयस्कता ही नज़र आती है। इससे पहले की अवस्था को लड़की , कन्या वगैरह कहा जा सकता है। विवाह या शारीरिक सम्पर्क के आधार पर स्त्री, नारी, औरत जैसे शब्दों के अर्थ नहीं निकाले जाने चाहिए। अश्मिताजी मुझे चांद चाहिए की जिस नायिका के मुंह से निकली बात का हवाला दे रही हैं वह सिर्फ एक नारी पात्र का संवाद है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


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