Saturday, September 6, 2008

एंकर पर अंकुश नहीं

अंकुर भी अंक से ही बना है। jump-start-your-garden2-urban-garden (1) बीज से फूटते अंखुए को अंकुर कहा जाता है। अंकुर शब्द में कोमलता समायी हुई है।बीजावरण को भेद कर अंकुर का जो तीक्ष्ण हिस्सा बाहर निकलता है उसी लक्षण से अंकुर शब्द बना।
दबाव , काबू या नियंत्रण के लिए हिन्दी में अंकुश शब्द प्रचलित है।  मूलतः अंकुश एक उपकरण होता है जिसके जरिये हाथी को काबू में रखा जाता है। यह एक लोहे का एक कांटा होता है जो सिरे पर नुकीला और मुड़ा हुआ होता है। फारसी में अंकुश को अंगुज़ या अंकुज कहते हैं। अंकुश शब्द का प्रयोग अक्सर मुहावरे के तौर पर ही किया जाता है । इस की रिश्तेदारी काफी बड़ी है। अगर इसकी थाह लेने निकलें तो इनमें एक राष्ट्र , एक अंतरराष्ट्रीय भाषा, शरीर के अवयव, गणित का आधार, आभूषण, और वनस्पति से संबंधित शब्द नज़र आते हैं। मूलतः यह प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है।
अंकुश बना है संस्कृत के अंकः (या अङ्क) से जो बना है अंक धातु से । अंक में मूलतः टेढ़ा-पन, उकेरना, कोण, शरीर के अवयवों में घुमाव आदि। शरीर के अवयवों के लिए अंग शब्द प्रचलित है जो अंक का ही अगला रूप है। अंग किसी वस्तु का प्रभाग या अवयव, अंश, खंड। कोण या मोड़ के उदाहरण यूं तो शरीर के घुटना, कोहनी,ऐड़ी आदि अवयव हो सकते हैं मगर अंगुलि या अंगुली और अंगुष्ठ में अंग शब्द का भाव ज्यादा स्पष्ट होता है। शरीर का सबसे तीक्ष्ण अवयव भी अंगुली ही है। अंगुली की कोणीय मुद्राएं भी उल्लेखनीय हैं। फारसी में अंगुली को अंगुश्त और अंगूठी को अंगुश्तरी कहते हैं। बाहों में भरना, गोद में लेना जैसी क्रियाओं के लिए अंक भरना, अंक लेना या अंग लगाना जैसे मुहावरे भीहै।
भाषाविज्ञानियों ने इन तमाम शब्दों के मूल रूप में अंक या अंग को देखते हुए इनकी प्राचीन भारोपीय धातु ank/ang की कल्पना की है जिसका मतलब है मुड़ना या मोड़ना । अंक/अंग के कोणीय भाव का सादृश्य अंग्रेजी के एंगल में साफ नज़र आता है। यह बना है लैटिन के एंगुलम से जिसका मतलब होता है कोना, कोण। ग्रीक में कोहनी को एंग्कोन, लंगर को एंकर, लिथुआनी में फंदे के लिए एंका, अंग्रेजी ऐड़ी या टखने के लिए एंकल, पाजेब के लिए एंकलिट, जैसे शब्द इसके जोड़ और मोड़ वाली विशेताओं को ही बता रहे हैं। वैसे एंकर टीवी के प्रस्तोता को भी कहते हैं और अखबार के आधार पर छपने वाली खबर को भी कहते हैं। इन दोनों ही शब्दों का भाव थामने से है। टीवी प्रस्तोता कार्यक्रम को वैसे ही थामता है जैसे जहाज को लंगर। ये अलग बात है कि अब तो एंकर ही बेलगाम हैं। अंक या अंग शब्द की सबसे जबर्दस्त रिश्तेदारी है अंग्रेजी के साथ । इसलिए नहीं क्योंकि अंग्रेजी में भी इसी मूल के शब्द हैं बल्कि खुद इंगलिश, अंग्रेजी, अंग्रेज और इंग्लैंड जैसे शब्दों से भी इनका सीधा नाता है। बताया जाता है कि इंग्लैंड का नाम उसकी कोणीय स्थिति, हूक जैसी आकृति की वजह से पड़ा। उसे वहां बसनेवाली शुरूआती जनसमूहों ने इसी वजह से एंग्ला लैंड कहा। वैसे यह मान्यता भी है कि पांचवी सदी के आसपास जर्मन जनजातियों ने इंग्लैंड में बसना शुरू किया । वे खुद को उत्तरी जर्मनी के ऐंगेल्न से आया बताते थे। इसी आधार पर नई भूमि का नाम इंग्लैंड हुआ। जो भी हो, इस शब्द के बहुकोणीय अर्थ पर कोई विवाद नहीं है।
अंक का एक अर्थ होता है चिह्न , संकेत आदि। गणित की संख्या के लिए ही अंक शब्द प्रचलित है। गौर करें अंक में शामिल नुकीले और कोणीय भाव पर प्राचीनकाल में जब मनुश्य ने किसी आधार पर आकृतियां उकेरना और चिह्न बनाने शुरू किए । अंकन, आंकना जैसे शब्दों का यही अर्थ है। अंकेक्षक, क्रमांक , दिनांक, पूर्णांक जैसे शब्दों में अंक ही समाया है। बीज से फूटते अंखुए को अंकुर कहा जाता है। अंकुर शब्द में कोमलता समायी हुई है। किसलय, अंखुआ, कोंपल जैसे शब्द इसके लिए कहे जाते हैं। अंकुर भी अंक से ही बना है। बीजावरण को भेद कर अंकुर का जो तीक्ष्ण हिस्सा बाहर निकलता है उसी लक्षण से अंकुर शब्द बना। नाटक के खंड या रूपक के एक प्रकार के तौर पर अंक शब्द प्रचलित है जिसे एकांकी कहते हैं। अंक या अंग शब्द का अंश, हिस्सा या प्रभाग वाला भाव ही यहां प्रभावी हो रहा है। अंग गौर करें कबीरबानी का वर्गीकरण विद्वानों ने विभिन्न अंगों में बांटकर ही किया है। जिस तरह से शरीर का वर्गीकरण भी अंगों में विभाजित कर ही होता है। पौराणिक काल में वृहत्तर भारत के एक हिस्से के तौर पर अंग देश का नाम भी आता है। भारत के पूर्वी हिस्से में था। बिहार और बंगाल के बीच।
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Friday, September 5, 2008

मिर्जा एडमिरल उर्फ अमीरुल बह्र...

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अमीर खुसरो,मिर्ज़ा ग़ालिब और मीर तकी मीर जैसे कई और नाम हैं जिनके आगे लगे ये शब्द न होते तो वे इतने रसूख़दार न लगते

शब्दों के सफर में विदेशी मूल के ऐसे ढेरों आमफहम शब्द मिलेंगे जिन्होंने समतुल्य हिन्दी शब्दों को प्रचलन से हटाते हुए अपना प्रभुत्व कायम किया है। आज बोलचाल में उन्हें ही अपनाया जाता है। अरबी का अमीर ऐसा ही एक लफ्ज है जो श्रीमंत, धनवान, धनाढ्य, धनिक जैसे हिन्दी के पर्याय होने के बावजूद ज्यादा प्रचलित है।
अमीर मूलतः अरबी भाषा का शब्द है और अरबी सौदागर की तरह ही इसने भी खूब यात्राएं की और अपने कुनबे को समृद्ध किया है। यह बना है अम्र से जिसका मूल अर्थ है नायक, सरदार अथवा अध्यक्ष । जाहिर है ये तमाम लफ्ज किसी न किसी पद का बोध भी कराते हैं और इनके साथ प्रभुत्व, अधिकार और प्रकारांतर से समृद्धि भी जुड़ी हुई है जिसकी वजह से इससे बने अमीर में नायकत्व से जुड़े इन तमाम भावों के साथ धनवान, धनाढ्य, धनिक जैसे अर्थ प्रमुख हो गए। अमीर का बहुवचन होता है उमरा । इसी लिए बादशाही दौर में सामंतों को अमीर-उमरा कहते थे। शुद्ध रूप में यह अमीर अल उमरा है जिसका मतलब होता है अमीरों का अमीर। तुर्की के सुल्तान की भी यह उपाधि थी क्योंकि किसी ज़माने में उसे ईस्लामी दुनिया में अव्वल दर्जा मिला था। उमरा से ही हिन्दी में उमराव शब्द बना है । उमरावजान और उमरावसिंह जैसे नामों में यही झांक रहा है।
अमीर की महिमा का एक और रूप दिखता है मीर शब्द में । यह अमीर का ही संक्षिप्त रूप है मगर इसकी प्रथक सत्ता है। प्रायः राज्याश्रित कई पदों के साथ इसे जोड़ा जाता रहा है अथवा उपाधि के रूप में इसका प्रयोग होता रहा। मीरमुंशी अर्थात हैडक्लर्क। रीतिमुक्त धारा के सिरमौर कवि घनानंद मौहम्मदशाह रंगीले के दरबार में मीरमुंशी थे। मीरेकारवां, मीरबख्शी यानी तनख्वाह बांटने वाला अधिकारी, मीरमहफिल यानि सभापति आदि अनेक शब्द इससे बने हैं।
मिर्ज़ा शब्द भी इससे ही निकला है मगर यह अरबी नहीं बल्कि फारसी का है। अपने शुद्ध रूप में यह मीरज़ा है जिसका मतलब होता है शाही खून यानी राजपुत्र । यह शब्द भी मूल फारसी शब्द अमीरज़ादा का संक्षिप्त रूप है। अमीर यानी शासक ज़ादा यानी पुत्र अर्थात राजकुमार। मीरज़ा ने मुखसुख के आधार पर मिर्ज़ा रूप ले लिया । मीर और अमीर की तरह ही मिर्ज़ा शब्द का भी उपाधि या खिताब के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है।
अमीर के नायकत्व वाला भाव अगर सर्वाधिक अगर सुरक्षित रहा है तो एक ऐसे शब्द में जो है तो अंग्रेजी का मगर मूल उसका भी अरबी ही है। जलसेना अध्यक्ष को अंग्रेजी में एडमिरल कहा जाता है। यह बना है अरबी के अमीर अल बह्र से। यूरोप का इस शब्द से परिचय करीब ग्यारहवी सदी में क्रूसेड धर्मयुद्धों के दौर में हुआ जब उनका साबका अरब लड़ाकों से हुआ। अरबों की जलसेना जबर्दस्त थी और यूरोपवाले भी इसमें बढ़े-चढ़े थे। सबसे पहले कैटलन भाषा ने इसे अपनाया जो पश्चिमी भूमध्यसागरीय इलाके में बोली जाने वाली भाषा है। यहां इसका उच्चारण हुआ एमिरल। फिर पुर्तगाली में इसका रूपांतरण हुआ almirante जो अंग्रेजी में admyrall होता हुआ admiral के रूप में स्थापित हो गया।
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Thursday, September 4, 2008

एक शायर का बड़बोलापन- ग़ालिब और मीर मुझसे जलते...

basheerbadr मैं तो बस एक ही व्यक्ति की गोद में बैठा था, बैठा हूं और बैठा रहूंगा जिनका नाम है अटल बिहारी वाजपेयी।
मप्र उर्दू अकादमी के चेयरमेन
बशीर बद्र से सीधी बात
भोपाल से प्रकाशित दैनिक भास्कर समूह के टैब्लायड डीबी स्टार में इसी हफ्ते श्यामसिंह तोमर ने यह साक्षात्कार लिया जिसे जस का तस हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं।  

 

मप्र उर्दू अकादमी के आप 4 साल से चेयरमेन हैं, लेकिन इसके भी बाद उर्दू और शायरों की बेहतरी के लिए प्रदेश में कोई खास काम नहीं हुए ?
[विषय बदलते हुए दार्शनिक अंदाज में..]
देखिए, बेसिकली मैं संस्कृत के लेटेस्ट उर्दू एडीशन का शायर हूं। वक्त की आवाज को उर्दू कहते हैं। हिंदुस्तान में अभी तक मेरी करीब 6-7 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जो कि बड़ी मशहूर हैं। वहीं पाकिस्तान में इनकी संख्या 50 से अधिक है। इसी तरह से मेरे ऊपर लिखी गईं किताबें भी बेहिसाब हैं वहीं शेरों की संख्या की संख्या भी हजारों में है। मप्र उर्दू अकादमी से पहले मैं मेरठ में प्रोफेसर था, और तब भी जमकर लिखा करता था।
-लेकिन मेरा सवाल तो बतौर चेयरमेन प्रदेश में उर्दू और शायरों के लिए गए प्रयासों के बारे में है ?
[मुस्कुराते हुए]
ये बात आपको मेरे दोस्तों... ने कही होगी। मेरा वश चलता और अगर कैफ जिंदा होते तो उन्हें महीने में दो बार और इशरत को साल में दो बार बुलाता, लेकिन अब मेरे पास इतना समय नहीं है। वैसे भी भोपाल के शायर और उनकी भाषा समय के साथ नहीं चल रहे हैं। हां ये माना जा सकता है कि कैफ की भाषा वही थी जो आज बशीर की भाषा है।
-आपको पता है कि आपके समकालीन और भोपाल के उस्ताद शायर रजा रामपुरी लंबे समय से बीमार चल रहे हैं ?
क्या कह रहे हैं, मेरा विश्वास जानिए, मुझे तो खबर ही नहीं कि रजा रामपुरी बीमार हैं वो लंबे समय से। मुझे माफ करें, गलती मेरी ही है। लेकिन अब मेरी भी तो लिमिटेशन हैं। सभी मेरे सगे भाई की तरह हैं। जब से व्यस्तता बड़ी है, समय ही नहीं मिल पाता। जब आजाद था तो आज से 5 गुना 'यादा आमदनी थी, मुझे एक-एक शेर का हजारों रुपए मिलते हैं। मप्र के गर्वनर और अटल जी वही पूर्व प्रधानमंत्री खुश होकर मुझे एक-एक शेर पर 15 हजार रुपए दिया करते हैं।
-आपके शायर दोस्त कहते हैं कि बशीर बद्र अब पहले जैसे नहीं रहे, बेहद मतलबी और आत्ममुग्ध हो गए हैं। केवल वही काम करते हैं जिससे पैसा और शोहरत मिले ?
देखिए दुनिया बदल रही है, उसके साथ जो नहीं बदला समझो वो तो गया। बदलने में बुरा क्या है, समय के साथ अपडेट रहता हूं और अपनी मर्जी की करता हूं। पैसा और शोहरत किसे अच्छे नहीं लगते। मेरा घर आपने शायद अभी भीतर से नहीं देखा, करीब 20 कमरे हैं और हर कमरे को अलहदा ढंग से लाखों खर्च सजाया है, हां हर कमरे में टीवी भी है। अल्लाह मुझ पर मेहरबान है तो ही तो मुझे यह सब दे रहा है न। मेरा एक बेटा है जो कि हमेशा 92 प्रतिशत नंबरों से इम्तिहान पास करता आ रहा है , शासन की ओर से उसे 500 रुपए का वजीफा मिल रहा है और जब तक वो पढ़ता है, मिलता रहेगा।
- रजा रामपुरी को तो शासन द्वारा शायरों के लिए दिए जाने वाले 1500 रुपए वजीफे के लिए आज तक एडि़यां घिसना पड़ रहा है, बीमारी का इलाज भी ढंग से नहीं हो पा रहा, क्या आप सरकार से उनके लिए कुछ प्रयास किया ?
हम ही तो हैं शासन, मैं उर्दू अकादमी में हूं किस लिए। पता नहीं उन्होंने अभी तक क्यों यह बात मुझे नहीं बताई। वो दस्तखत करके एक आवेदन दे दें,उन्हें वजीफा दिलवा दूंगा।
 -मप्र उर्दू अकादमी पहले की तरह अब न तो शायरों के कलेक्शन छपवाती है और न हीं सालाना एक बड़ा मुशायरा करवाती , जब कि फंड की तो कोई कमी नहीं है?
नहीं साहब, फंड की तो अभी भी बेहद कमी है, मैं तो अपनी तनख्वाह भी नहीं लेता, हां इतना जरूर है कि वहां के बाकी कर्मचारियों को कोर-कसर नहीं रहने देता, उनको वेतन समय पर मिलता है।
-मप्र उर्दू अकादमी को सरकार से कितनी फंडिंग हो रही है ?
ठीक से याद नहीं कितनी फंडिग हो रही है लेकिन जितनी भी हो रही है वो बहुत कम है। बड़े मुशायरे न कराने की एक वजह तो फंड की कमी है और दूसरा मैं गवैए और खराब शायरों को तो हरगिज नहीं बुला सकता। जहां तक आयोजन का सवाल है तो अकादमी में हर पखवाड़े इसी तरह का एक बड़ा आयोजन होता है जिसमें करीब 500 लोग इकट्ठा होते हैं, इतना काफी है।
-इशरत कादरी का दर्द है कि उनके पास जो अदद लायब्रेरी है उसको वे जिम्मेदार हाथों में देना चाहते हैं लेकिन किसे दें, मप्र उर्दू अकादमी को तो वो हरगिज नहीं देना चाहते?
इशरत साहब को मैंने अपने पास से हजारों रुपए की किताबें दी हैं। अगर वो उनकी साज-संभाल नहीं कर पा रहे हैं तो मेरी अकादमी को दे दें, जितनी उनके घर में सुरक्षित हैं यहां भी रहेंगी, बाकी तो फिजूल की बाते हैं।
 आपके शायर दोस्त कहते हैं कि बशीर बद्र हमेशा सरकार की गोद में बैठ जाते हैं?
ऐसे दोस्तों के लिए मुझे कुछ नहीं कहना, खुदा की कसम मैं तो बस एक ही व्यक्ति की गोद में बैठा था, बैठा हूं और बैठा रहूंगा जिनका नाम है अटल बिहारी वाजपेयी। मैं तो उनका बेटा हूं।  अब लोग कुछ भी कहें मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता।
-अगर आप सब कुछ ठीक कर रहे हैं तो क्या बाकी शायर आपसे जलते हैं?
देखिये मैं ऐसा कुछ नहीं कह सकता, हां ये जरूर है कि आज गालिब और मीर भी होते वो भी यकीनन जलते, यह तो हिंदुस्तान की रिवायत है। इसके साथ ही उन्होंने ऐसे शायरों के लिए ये शेर पढ़ा-
खुदा ने मुझको गजल का दयार बख्शा,
ये सल्तनत मैं मुहब्बत के नाम करता हूं।
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Wednesday, September 3, 2008

सबका भाग्यविधाता कौन...[भगवान-2]

 dn13970-1_600 ब्रह्मांड के निर्माण की एक थ्योरी बिगबैंग यानी महाविस्फोट की भी है। विस्फोट के बाद वह पिंड अनंत पिंडों में विभक्त हुआ। भग यदि योनि है तो भी गर्भाशय में जीवन के निर्माण की प्रक्रिया कोशिकाओं के विभक्त होने से जुड़ी हैं। सृष्टि में लगाता विस्तार हो रहा है। सूक्ष्म एक कोशिकीय जीव लगातार विभाजन से अस्तित्व की समृद्धि पाते हैं। विभाजन ही जीवन-सृजन का आधार है। सृजन की इस शक्ति के भग नाम में परम सार्थकता है।
सफर की पिछली कड़ी में वक्त, बख्त और बख्श की चर्चा की गई। इंडो-ईरानी भाषा परिवार के इन शब्दों का दूसरे से गहरा संबंध है। वक्त यानी हिस्सों में बंटा समय । सेकेंड, मिनट, घंटा,पहर, दिन, महिना, साल...गिनते जाइये। ये सब समय के हिस्से हैं, अंश है। मनुष्य के हिस्से में प्रभु की तरफ से जो समय आया है, जो अंश मिला है, ऐश्वर्य रूपी जो आयु कलश मिला है , वही उसका भाग्य है यानी बख्त है । इसीलिए कहते हैं जान है , तो जहान है। बख़्श का अर्थ भी अंश ,खंड, भाग्य , हिस्सा, देनेवाला होता है। वैसे वक्त की व्युत्पत्ति संदिग्ध है। संकेत यही कहते हैं कि यह इंडो-ईरानी परिवार का है।  शब्दकोशों में इसे अरबी मूल का भी बताया जाता है। इसके बावजूद सेमेटिक भाषा परिवार से इसकी व्युत्पत्ति अभी तक सिद्ध नहीं हो पाई है।
भक्तिभाव का भात
इन तीनों ही शब्दों का रिश्ता जुड़ता है संस्कृत धातु भज् से जिसका अर्थ है हिस्से करना, अंश करना, वितरित करना, बांटना , लाभ प्राप्ति, पूजा-आराधना आदि। भज् से बने हैं भक्त , भगत, भगतिन जैसे शब्द । भक्त यानी जो ईश्वर से विभक्त है।  ( विभक्त की वक्त से तुलना कर लें ) । संस्कृत में भक्त का एक अर्थ होता है उबाला हुआ चावल अर्थात आहार अंश । गौरतलब है कि पके हुए चावल के लिए भात शब्द भक्त का ही रूप है। वैदिक काल में चावल का बड़ा महत्व था और विभिन्न अनुष्ठानों में इसका प्रयोग होता था। आज भी जन्म से मृत्यु तक के सभी संस्कारों में भात का प्रयोग अनिवार्य रूप से होता है। वैदिक देवता को इस भक्त की आहूति दी जाती थी। बाद मे यह उबला हुआ चावल भोजन का पर्याय भी हो गया। उपासक, सेवक, पुजारी, दास आदि के अर्थ में भक्त की व्याख्या यही है कि जो अपने प्रभु से, आराध्य से विभक्त है और भज् यानी आराधना के जरिये उसमें लीन होने का अभिलाषी है।भज् से ही निकला है भजन अर्थात भक्तिगान। पुरानी फारसी में यह बाज या बाजी हुआ जिसका मतलब होत था कर, टैक्स। गौर करें यहां अंश का भाव आ रहा है।
भक्त भी भगवान
भज् धातु से बना है संस्कृत का भगः शब्द जिससे बना है ईश्वर, सर्वशक्तिमान, दाता, प्रभु , सबको सबका हिस्सा देने वाला, सबका हिस्सा यानी भाग, अंश, आयु और प्रकारांतर से सबका भाग्यविधाता आदि के अर्थों वाला शब्द भगवान । भग शब्द के कई अर्थ हैं जिनमें एक वैदिक देवता, सूर्य, चंद्र और शिव भी हैं। भग का अर्थ होता है ऐश्वर्य, सम्पन्नता , सम्पत्ति, भाग्य आदि। ऐश्वर्य सौन्दर्य और लावण्य का भी हो सकता है। इसी तरह भग का अर्थ विभूतियों से भी है - 1 सम्यक ऐश्वर्य 2 सम्यक ज्ञान 3 सम्यक वीर्य 4 सम्यक यश 5 सम्यक श्रव। भग की एक व्याख्या है प्रदान करनेवाला अर्थात वह अपने उपासक को इन छह विभूतियों से विभूषित करता है अर्थात उन्हें भगवान बनाता है। चूंकि ईश्वर के पास तो ये विभूतियां हैं ही इसलिए वह स्वयं भगवान हुआ। यही भाग्य है। भज् धातु में निहित अंश, हिस्से करना, बांटना आदि अर्थ भगवान में समाहित हैं। गौरतलब है कि ये सभी गुण सूर्य में ही थे अतः वैदिक काल में भगः का अभिप्राय सूर्य से ही है जो पृथ्वी पर जीवन-समृद्धि के लिए उत्तरदायी है। सूर्य ही वह वैदिक देवता है जिसे भग कहा गया है।
विज्ञानसम्मत भी , दार्शनिक भी 
भग का एक अर्थ स्त्री की योनि भी होता है। इसकी दार्शनिक व्याख्या भी अद्भुत है। योनि अर्थात जन्मस्थान । गौर करें विश्व की सभी सभ्यताओं में सृष्टि का जन्म एक विशाल पिंड से माना जाता रहा है। जिस योनि अर्थात भग से समूची सृष्टि का निर्माण हुआ है उसे धारण करनेवाला परमब्रह्म ही भगवान है। एक अन्य व्याख्या यह भी हो सकती है, जो अध्यात्म दर्शन के साथ विज्ञान सम्मत भी है। भज् धातु में बांटने, विभक्त करने का भाव है। ब्रह्मांड के निर्माण की एक थ्योरी बिगबैंग यानी महाविस्फोट की भी है। विस्फोट के बाद वह पिंड अनंत पिंडों में विभक्त हुआ। भग यदि योनि है तो भी गर्भाशय में जीवन के निर्माण की प्रक्रिया कोशिकाओं के विभक्त होने से जुड़ी हैं। सृष्टि में लगाता विस्तार हो रहा है। सूक्ष्म एक कोशिकीय जीव लगातार विभाजन से अस्तित्व की समृद्धि पाते हैं। विभाजन ही जीवन-सृजन का आधार है। सृजन की इस शक्ति के भग नाम में परम सार्थकता है। पौराणिक काल के एक राजा का नाम भगदत्त था जिसका अर्थ हुआ  [भग] देवता से प्राप्त। कोई भी माता पिता अपने पुत्र के नाम की व्यंजना 'योनि से उत्पन्न' के रूप में नहीं करना चाहेंगे। जाहिर है भग का  स्त्री अंग के रूप में वह अर्थ नहीं है जैसा अज्ञानी समझते हैं। भगदत्त नाम भी अल्लाबख्श या रामबख्श जैसा ही है।
भगवान, उज्बेकिस्तान !
पुरानी फारसी, ईरानी और अवेस्ता में यह भग लफ्ज़ बग या बेग [BAG] के रूप में मौजूद है। अर्थ वही है-ईश्वर , सर्वशक्तिमान । गौर करें कि भग में निहित देने वाला, बांटनेवाला, अन्नदाता वाला अर्थ ही यहां भी प्रभावी हो रहा है।  बाद के दौर में राजाओं के लिए यह शब्द प्रचलित हुआ।  शक्तिशाली और ताकतवर के लिए भी इसका प्रयोग होने लगा। । बग या बेग बाद में रसूखदार लोगों की उपाधि भी हो गई। मध्यएशिया के शक्तिशाली कबीलों की जातीय पहचान यह बेग़ शब्द बना जिसका एक रूप बेक भी हुआ । मध्य एशिया के एक देश का नाम उज़बेकिस्तान इसी जाति की प्रधानता की वजह से पड़ा। यही लोग भारत में उज़बक कहलाए। कुछ विद्वान इस BAG में उद्यान के अर्थ वाला बाग़ भी देखते हैं जिसकी व्याख्या समृद्ध भूमि, ऐश्वर्य भूमि के रूप में है। बगीचा इसका ही रूप है। बगराम , बगदाद , बागेवान जैसे शहरों के नामों के पीछे शायद यही अर्थ छुपा है।
आपकी चिट्ठियां
अभय भाई,
आपकी प्रतिक्रिया हमेशा की तरह उर्वर थी। मेरा प्रयास रहता है कि जो कुछ भी मन में विचार आते हैं उन्हें यथासंभव पुस्तकों और इंटरनेट से प्राप्त प्रामाणिक स्रोतों से गुज़ार कर ही उसके आधार पर पोस्ट बनाऊं। मैं एक साथ कई पुस्तकें पढ़ता हूं और एक साथ कई शब्दों पर लिखता हूं। अलग अलग शब्दों से संबंधित सामग्री चुन-चुन कर डायरी में लिखता हूं या पुस्तकों में बुकमार्क लगा देता हूं। आपका कहना है कि मैं संदर्भों का उल्लेख नहीं करता। ऐसा नहीं है। अक्सर मैं संदर्भों का उल्लेख करता हूं। मगर इस पूरी प्रक्रिया में मुझे काफी समय लग जाता है, जिसकी कमी है सो कई बार छूट जाते हैं तो परवाह नहीं करता। क्योंकि नेट सामग्री के स्रोत का पता मेरे दिये संदर्भों के कीवर्ड डाल कर कोई भी सर्फिंग करके लगा सकता है। मुश्किल नहीं है। दूसरे , मैं ये संदर्भ फेवरिट में नहीं रखता अतः कापी में नोट कर के आगे बढ़ लेता हूं। बहरहाल आपके लिए इस बार लिंक दे रहा हूं। अक्सर ऐसा कर पाऊंगा, इसका वादा नहीं कर सकता। मैं अपनी धुन में हूं। अलबत्ता स्रोत का पता पूछते ज़रूर रहें । जिज्ञासाओं के जवाब यहां दिये गए दोनों लिंक्स में मिल जाएंगे। जहां तक बख्त का त , बख्श में श बनने पर हैरत की बात है तो भाषाविज्ञानयों के मुताबिक यह प्रवृत्ति फारसी , पश्तो में कभी कभी दिखती है। पख्तून और पश्तून में यह बात है। फारस नाम में ही यह उजागर हो रही है। पार्थ , पार्थिया और पर्शिया, पार्स, फारस आदि में इसे देख सकते हैं। संस्कृत-अवेस्ता का पुत्र पुरानी फारसी में पुस्स है। संस्कृत के पितु या पितृ का रूप पुरानी फारसी में पिस्स या पिसर मिलता है। इन उदाहरणों में त थ आदि स श में बदलते साफ दिख रहे हैं। मैं फारसी का विद्वान नहीं हूं , पर खोजने बैठूं तो और भी निकाले जा सकते हैं। टिप्पणी और फोन करने के लिए आभार....
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Tuesday, September 2, 2008

बड़े-बड़े सपने [बकलमखुद-68]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातरCopy of PICT4451 ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी और प्रभाकर पाण्डेय को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के बारहवें पड़ाव और छियासठवें सोपान पर मिलते हैं अभिषेक ओझा से । पुणे में रह रहे अभिषेक प्रौद्योगिकी में उच्च स्नातक हैं और निवेश बैंकिंग से जुड़े हैं। इस नौजवान-संवेदनशील ब्लागर की मौजूदगी प्रायः सभी गंभीर चिट्ठों पर देखी जा सकती है। खुद भी अपने दो ब्लाग चलाते हैं ओझा उवाच और कुछ लोग,कुछ बातें। तो जानते हैं ओझाजी की अब तक अनकही।
सपने इतने बड़े देखता हूँ कि चर्चा कर दूँ तो सामने वाला घबरा जाता है, फाइनल ईअर में कंपनी खोलने का भूत ऐसा चढा था की बस... और कुछ नहीं सूझता था. मेरे एक मित्र ऐसे-ऐसे आईडिया लेके आते की क्या बताऊँ. पर उनकी ७ अंको की तनख्वाह वाली नौकरी लगी तो ढीले पड़ गए.
कभी ये कभी वो
मेरा दिमाग कुलबुल करता रहा... अभी करता है और किसी दिन ज्यादा कुलबुला गया तो कभी भी बोरिया बिस्तर बाँध के सड़क पर उतर जाऊंगा :-) कंपनी भले कुछ दूर हो लेकिन पढने वाले सपने अभी भी पूरे हो रहे हैं और अभी चलते रहेंगे. नौकरी के साथ पढ़ाई भी चल ही रही है और शायद जीवन भर चले. और नौकरी लग गई: जब दिसम्बर में कैम्पस चालु हुआ तो हर जगह शोर्टलिस्ट हो जाता रिज्यूमे गुरु तो घोषित हो ही चुका था तो इस कला का खूब फायदा उठाया. पहली कंपनी ने ऐसा उलझाया कि साँस लेना कठिन मालूम होने लगा इंटरव्यू रूम से बाहर आके ही खुली हवा मिल पायी. दूसरी में गया तो उन्होंने ये पूछ लिया की तुम्हारा रिज्यूमे तो कहता है कि तुम पढने भाग जाओगे. बताओ जीआरइ स्कोर क्या है? मैं कुछ भी कहूं उन्हें भरोसा नहीं हुआ की मैं नौकरी चाहता हूँ.
हल चलाऊंगा
उसके बाद लगभग हड़ताल... कंपनी आती मैं बैठता ही नहीं लोगो की मदद करता. एक कंपनी की एच आर का ४ बार फोन आया कि ये तो बता दो क्यों नहीं बैठे. उसकी आवाज़ इतनी अच्छी थी कि मिलने चला गया कालर ट्यून भी उसने पहला नशा लगा रखा था जब पंहुचा तो देखा कि इनका ८ वां १० वां प्यार हो चुका होगा. खैर बिना कारण दिए मैंने उनसे कह दिया कि मेरे इंटेरेस्ट नहीं मिलते इस कंपनी से. अपने दोस्तों में ये घोषणा कर दी की ८.५ लाख सीमा रेखा है इससे कम देने वाली कंपनी में बैठने का सवाल ही नहीं और काम भी होना चाहिए गणित का. लोग ही ज्यादा परेशान होते... मैं फिल्में देखता. नौकरी नहीं लगी तो क्या करोगे, कहाँ जाओगे? मैं मस्ती करता कहता हल चलाऊंगा :-)
माइक्रोसॉफ्ट के अंतिम राऊंड में
बीच में माइक्रोसॉफ्ट के अन्तिम दौर तक चला गया गणित पूछा तो पास करता गया, एक बार डर लगा की अगर गलती से हो गया तो जिंदगी भर कोडिंग करनी पड़ेगी. पर इसकी नौबत नहीं आई अन्तिम राउंड में उन्होंने कोडिंग करने को कहा और मैंने हाथ खड़े कर दिए. एक दोस्त बहुत गुस्सा हुआ उसकी खूब मदद की सही और ग़लत दोनों तरीकों से आखिरी राउंड के पहले वो टॉप पर चल रहा था, मैं उस कंपनी के लिए नहीं बैठ रहा था उसने कहा की साले तू मुझे फंसाना चाहता है अच्छी कंपनी नहीं है मैंने कहा ऐसी बात नहीं है भाई मेरी बात और है तू चला जा. उसे भरोसा नहीं हुआ और आखिरी इंटरव्यू में उसने कुछ बोला ही नहीं. फिर नाचते हुआ बाहर आया... बाद में उसकी उससे बहुत अच्छी नौकरी लग गई.
छोरे को मिल गई नौकरी 
फिर एक दिन देखा की क्रेडिट स्विस आ रही है न्यूयार्क से, भारत में चालू ही होने वाली है और इनवेस्टमेंट बैंकिंग डिविजन के लिए आ रही है... हमने भी भर दिया... छंटते-छंटते अन्तिम चार में पहुच गया... इंटरव्यू में मैं ये मान के चल रहा था की होना तो है नहीं जो पूछते मैं ऐसे जवाब देता की ये तो बाए हाथ का खेल है और सबको अपने किसी न किसी प्रोजेक्ट से जोड़ देता. मैं फेकता गया और उन्हें लगता गया की लड़का नहीं हीरा है हीरा :-) इंटरव्यू के बाद लोगों ने पूछा कि कैसा हुआ तो बोला की कोई चांस ही नहीं है अगर बण्डलबाज़ को लेना हो तो ले जायेंगे पर उन्हें बण्डलबाज़ी ही पसंद आ गई... और फिर क्रेडिट स्विस ने एक ही को लिया और छोरे को स्विस बैंक में नौकरी मिल गई.
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ये तमाम फोटो स्वित्जर्लैंड में प्रोफेसर के घर की रसोई के हैं। उनके शाकाहारी बनने के दौरान की.
अगली कड़ी में समाप्त
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Monday, September 1, 2008

कमबख़्त को बख़्श दो ! [भगवान-1]

DivineLight शुक्रवार को ब्लागजगत में दो जगह भगवान के दर्शन हुए। पहली बार अनर्थ से , फिर अर्थ से । संयोग है कि शब्दों के सफर में भी इस शब्द को रविवार को ही आना था। अनर्थकारी ब्लागर ने दुर्योग से पहले लिख दिया। जाहिर है दिनेश जी जैसे सजग ब्लागर क्यों चुप रहते । उन्होनें बहुत संतुलित तरीके से उस पोस्ट की खबर ली। अन्य साथियो ने भी उलाहने दर्ज कराए। पेश है भगवान के संदर्भ की पहली कड़ी।
कहते हैं कि समय बड़ा बलवान है यानी दुनिया में वक्त से बढ़कर कुछ नहीं । इस बात की सत्यता एक दूसरे मुहावरे में नजर आ जाती है कि वक्त किसी के लिए नहीं ठहता । इसीलिए यह नसीहत भी दी जाती है कि समय के साथ चलना सीखो।
समय और काल के अर्थ में हिन्दी में वक्त शब्द का इस्तेमाल खूब होता है। हिन्दी वाले इसे उर्दू का समझते हैं। इसके उद्गम को लेकर भाषाविद एकमत नहीं हैं । कुछ लोग इसे फ़ारसी का समझते हैं और कुछ इसे अरबी का । इनसाइक्लोपीडिया इरानिका के मु्ताबिक अरबी शब्द 'वक़्त' का स्रोत ईरानी है या नहीं यह अनिश्चित है, मगर यह सेमिटिक  मूल का नहीं है। किस मूल का है ये पता नहीं। फारसी में इसका उच्चारण कुछ इस तरह होता है कि यह वख्त बन जाता है मगर लिखते समय वक्त ही लिखा जाता है। वक्त इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की भारत-ईरानी शाखा का शब्द है। फारसी में वक्त का मतलब होता है हिस्सा यानी अंश। मूल रूप से इस अंश का अभिप्राय समय का एक हिस्सा, कालांश, ज़माना, ऋतु, मौसम आदि से है । उर्दू के अलावा हिन्दी में भी इस से बने कई शब्द प्रचलित है जैसे वक्तन फ वक्तन यानी कभी कभी, यदा कदा या समय समय पर। इसका ही एक रूप होता है वक्त ब वक्त।  आम इस्तेमाल होने वाला एक शब्दयुग्म वक्त बे वक्त भी है ।
वक्त के कुछ अन्य रूप भी हैं जो फारसी के अलावा उर्दू हिन्दी में भी प्रचलित हैं जैसे बख्श और बख्त । व वर्ण के ब में तब्दील होने की जो प्रवृत्ति हिन्दी में है वही फारसी में भी है। वक्त का अगला रूप बख्त हुआ मगर यहां उसका अर्थ बदलकर हो गया भाग्य । समझा जा सकता है कि समय की महिमा में जो भी बातें कही जाती हैं वे उसे सबसे प्रबल और ताक़तवर साबित करती हैं , जाहिर है ये बातें प्रभावी होकर बख्त के अर्थ को भाग्य में बदल रही है। बख्त यानी भाग्य , किस्मत , प्रारब्ध आदि। मुस्लिम नामों के साथ इसका प्रयोग प्रायः भाग्य के अर्थ में ही किया जाता है जैसे सिकंदरबख़्त यानी अलेक्जेंडर दी ग्रेट जैसी किस्मतवाला। यहां यानी मुकद्दर का सिकंदर मुहावरे को याद कर सकते हैं।
इस बख़्त से बना एक शब्द ऐसा है जो आमतौर पर लेखन या बातचीत में नाटकीयता लाने के लिए प्रयोग किया जाता है वह है कमबख्त। बहुत कम हिन्दीवाले इसका सही समय पर सही प्रयोग करते हैं। अक्सर नासमझ, बेवकूफ , मूर्ख या हद से हद हल्की फुल्की गाली की तर्ज पर इसका प्रयोग कर लिया जाता है जबकि इसका सही अर्थ हुआ बदकिस्मत, हतभाग्य, अभागा। बदबख्त भी इससे ही बना है। कमबख्त यानी अभागा तो भाग्यवान कौन ? जाहिर है बख्तावर यानी किस्मतवाला । यह शब्द पुरानी हिन्दी फिल्मों में सुनाई पड़ता था। दिलचस्प यह कि उर्दू फारसी में बख्तावर पुरुष का नाम भी हो सकता है और स्त्री का भी। वैसे वक्त का एक रूप राजस्थानी , मालवी समेत अन्य कई बोलियों में बखत भी बनता है।
अब बात बख़्श की । गौर करें कि वक्त में निहित अंश या हिस्सा भी बख़्श में प्रभावी हो रहा है और भाग्य वाला भी। बख़्श के मायने होते हैं अंश ,खंड,भाग्य ,हिस्सा, देनेवाला आदि। दान ,अनुदान, खैरात आदि को बख्शीश इसीलिए कहते हैं। उत्तर पंजाब ,कश्मीर और सरहदी इलाकों में आमतौर पर एक उपनाम होता है बख्शी जैसे आनंद बख़्शी । दरअसल यह बादशाही ज़माने में यह एक रुतबेदार पद होता था जिसका काम था फौज में तनख्वाह बांटना और टैक्स वसूलना। यह उसी तरह उपनाम बन गया जैसे कानूनगो, चौधरी और पटेल–पाटील उपनाम बने । बख्त जहां मुस्लिम नामों के साथ जुड़ता है वहीं बख्श हिन्दू नामों के साथ भी जुड़ता है जैसे रामबख्श, शिवबख़्श। इनका मतलब हुआ  राम और शिव की कृपा से जन्मे। अल्लाह बख़्श, खुदाबख़्श, नूरबख्श ऐसे ही नाम हैं जो मुस्लिमों में होते हैं।
अगली कड़ी में भगवान की महिमा का गुणगान.
आपकी चिट्ठियां
सफर की पिछली चार पोस्टों

  • सिक्काः कहीं ढला , कहीं चला
  • बंद कमरे में कैमरे की कारगुज़ारियां
  • कानून का डंडा या डंडे का कानून
  • सोने की रंगत, सोने का मोल...

  • पर सर्वश्री Sanjay Tarun कुश एक खूबसूरत ख्याल Anil Pusadkar Pankaj Parashar Radhika Budhkar Swati अविनाश वाचस्पति sidheshwer Lavanyam - Antarman  महेद्र मिश्रा महेन डा. अमर कुमार GIRISH BILLORE MUKUL makrand जितेन्द़ भगत Mrs. Asha Joglekar अनूप शुक्ल और Gyandutt Pandey की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका तहेदिल से शुक्रिया । 

    @लावण्या शाह
    न वो ख़म है जुल्फे अयाज़ में
    कभी ऐ हक़ीक़ते मुंतजर....
    आपने इस गीत की याद दिला कर ग़ज़ब कर दिया...
    जब ये गीत अपने उरूज़ पर था तब मैं बच्चा था, मगर
    इसकी शोख़ धुन तब भी ग़ज़ब करती थी और आज भी।
    अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

    Sunday, August 31, 2008

    अरे यार क्या मस्त टांगें हैं ![बकलमखुद-67]

    ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है।Copy of PICT4451 ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी और प्रभाकर पाण्डेय को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के बारहवें पड़ाव और चौसठवें सोपान पर मिलते हैं अभिषेक ओझा से । पुणे में रह रहे अभिषेक प्रौद्योगिकी में उच्च स्नातक हैं और निवेश बैंकिंग से जुड़े हैं। इस नौजवान-संवेदनशील ब्लागर की मौजूदगी प्रायः सभी गंभीर चिट्ठों पर देखी जा सकती है। खुद भी अपने दो ब्लाग चलाते हैं ओझा उवाच और कुछ लोग,कुछ बातें। तो जानते हैं ओझाजी की अब तक अनकही।
    वो एक दिन का रोना:
    यूँ तो रोने में माहिर था पर उस दिन का रोना अब भी याद है, उस दिन कोई कला नहीं सच में रोया था. सातवी या आठवीं में पढता था और छुट्टियों में घर गया था. किसी बात पर माँ ने मार दिया, कुछ छोटी सी बात पर मुझे इस बात का बहुत दुःख हुआ कि क्यों दुःख पहुचाया. ये सोच कर रोता रहा बीच में माँ ने कह दिया की क्या इतना बड़ा हो गया की मैं मार भी नहीं सकती चुप क्यों नहीं हो रहा. इस बात पर और बुरा लगा... अपने आप को बुरा समझ के खूब रोया... किसी को नहीं बताया क्यों रोया, रोने में तो वैसे ही माहिर था तो शायद किसी को ध्यान भी नहीं. पर मैं वो दिन कभी नहीं भूलता. और शायद उस दिन के बाद मार भी नहीं खाया.
    पढ़ लिख लिया होता तो आज ये हाल ना होता:
    हम दो दोस्त ट्रेन में साथ-साथ जा रहे थे एक अंकल ने पूछा की बेटा क्या करते हो? और हम हमेशा की तरह खुशी-खुशी बता दिए कि आईआईटी में पढ़ते हैं. पर अंकलजी ठहरे अनुभवी आदमी और मेरा दोस्त ये बात ताड़ गया उसने कहा 'जी मैं तो हच के कस्टमर सर्विस में काम करता हूँ' अंकलजी मेरी तरफ़ देखते हुए बोले कुछ सीखो इससे... मन लगा के पढा होता तो ये हाल न होता. अब पढ़ते रहो अनाप-सनाप. मन से पढ़ा होता तो कहीं इंजीनियरिंग डाक्टरी पढ़ रहे होते नहीं तो इसकी तरह नौकरी कर रहे होते. हमने अंकलजी की बात गाँठ बाँध ली और तब से हम भी ट्रेन में यही कहते की हम हच के कस्टमर केयर में काम करते हैं.
    कैसे-कैसे दोस्त हैं तुम्हारे:
    रूम पार्टनर कि चर्चा तो हो ही चुकी है और अब तक आप ये भी जान चुके हैं कि प्रोफेसरों से भी दोस्ती है और उम्र में बड़े लोगों से भी खूब. फ़ोन पर बात होती है तो मोह-माया की चर्चा से चालु होकर समाज सेवा से होती हुई... विश्व राजनीतितक चली जाती है. इस बीच किसी ने कुछ बात सुन ली तो वो अक्सर कहता है 'कैसे-कैसे दोस्त हैं तुम्हारे ! इस उमर में यही सब बात करते हैं?' और बस सैंडल खाते-खाते बचा: जब इन्टर्न कर रहा था तो खूब मस्ती करते... ख़ास कर ट्रेन में

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    सिक्किम की शांति कुछ यूं भाई की लामा बनने की कोशिश कर डाली

    अगर कोई अच्छी लड़की आ गई तो हमारी हिन्दी का इस्तेमाल बढ़ जाता. कुछ भी बोलो. एक रात ज्यूरिक से वापस जाते समय ट्रेन में सामने की सीट पर एक लड़की आकर बैठी तो मैंने कह दिया 'अरे यार क्या मस्त टांगें हैं !' और भी बहुत कुछ कहा... और इस बीच मैं जो भी कहता वो हंसती. मेरे दोस्तों ने कहा 'अबे चुप कर लगता है इसे हिन्दी आती है', मैंने और कह दिया 'ऐसा कुछ नहीं है पी के आ रही है किसी पार्टी से और कुछ नहीं है' थोडी देर में पिछली सीट पर अंग्रेजी में एक अखबार मिल गया, उसमें भारत की स्टोरी छपी थी और मैं उसे पढने में लग गया. अचानक से उसने पूछा 'आर यू गायस फ्रॉम इंडिया? ' मेरे मित्र ने कहा 'यस'. 'एक्चुअली आई लिव्ड इन डेल्ही फॉर सिक्स यीअर्स.' अब मेरी हिम्मत ही नही हो रही थी की उधर आऊं. सब गंभीर हो गए थे... उस लड़की के पिताजी दिल्ली दूतावास में थे और वो दिल्ली में रह चुकी थी, हिन्दी समझ लेना स्वाभाविक ही था. भला हो उसका की उसने हिंदुत्व की बात छेड़ दी. और मैं भी आ गया चर्चा में... टांगों की बात वहीँ रुक गई पर हाँ जाते-जाते बोल गई 'थैंक्स फॉर व्हाट यू सेड अबाउट माय लेग्स' :-)
    बच्चो के साथ:
    बच्चो के साथ रहना और कहानी सुनाना बहुत पसंद है. बच्चे कितना पसंद करते हैं ये तो वही बता सकते हैं क्योंकि इन सब के साथ पढाना भी बहुत पसंद है. कभी-कभी पढाते समय गुस्सा भी आ जाता है, पर ना मारने की कोशिश पूरी रहती है और इस कोशिश को सफल बनाने का कार्य जारी है... किसी को भी पढाने का शौक तो बहुत है !  जारी
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    Saturday, August 30, 2008

    सिक्काः कहीं ढला , कहीं चला [सिक्का-1]

    splash_commem_coin_stack अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है।
    फुटकर मुद्रा या छुट्टे पैसों के लिए सिक्के से बेहतर हिन्दी उर्दू में कोई शब्द नहीं है। दोनों ही भाषाओं में मुहावरे के तौर पर भी इसका प्रयोग होता है जिसका अर्थ हुआ धाक या प्रभाव पड़ना। मूल रूप से ये लफ्ज अरबी का है मगर हिन्दी में सिक्के के अर्थ में अग्रेजी से आया। हिन्दी में फकत ढाई अक्षर के इस शब्द के आगे पीछे कभी कई सारे अक्षर भी रहे हैं।
    अरबी मे मुद्रा की ढलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले धातु के छापे या डाई को सिक्कः (सिक्काह) कहा जाता है जिसका मतलब होता है रूपया-पैसा, मुद्रा,मुहर आदि । इसके दीगर मायनों में छाप , रोब, तरीका-तर्ज़ आदि भाव भी शामिल हैं। पुराने ज़माने में भी असली और नकली मुद्रा का चलन था। मुग़लकाल में सिक्कए कासिद यानी खोटा सिक्का और सिक्कए राइज़ यानी असली सिक्का जैसे शब्द चलन में थे। अरबों ने जब भूमध्य सागरीय इलाके में अपना रौब जमाया और स्पेन को जीत लिया तो यह शब्द स्पेनिश भाषा में भी जेक्का के रूप में चला आया। मगर वहां इसका अर्थ हो गया टकसाल , जहां मुद्रा की ढलाई होती है। अब इस जेक्का यानी टकसाल में जब मुद्रा की ढलाई हुई तो उसे बजाय कोई और नाम मिलने के शोहरत मिली जेचिनो के नाम से ।
    जेचिनो तेरहवीं सदी के आसपास चेक्वेन शब्द के रूप में ब्रिटेन में स्वर्ण मुद्रा बनकर प्रकट हुआ। पंद्रहवीं सदी के आसपास अंग्रेजों के ही साथ ये चिकिन या चिक बनकर एक और नए रूप में हिन्दुस्तान आ गया जिसकी हैसियत तब चार रूपए के बराबर थी। यही चिक तब सिक्का कहलाया जब इसे मुगलों ने चांदी में ढालना शुरू किया। देखा जाए तो अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है।   संशोधित पुनर्प्रस्तुति
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    Friday, August 29, 2008

    बंद कमरे में कैमरे की कारगुज़ारियां

    telepococomp स्टिंग ऑपरेशन के इस दौर में आजकल बंद कमरों पर कैमरे की आंख लगी रहती है। पता नहीं कब कौन सी ख़बर नज़ारे की शक्ल में नुमांया हो जाए !कैमरे और कमरे का यह हेल-मेल यूं ही नहीं है। हिन्दी में सर्वाधिक प्रयोग होने वाले शब्दों में कमरा शब्द भी है। सुबह सो कर उठने से लेकर रात को सोने तक यह शब्द न जाने कितनी बार विभिन्न संदर्भों में हम इस्तेमाल करते होंगे। इसी तरह अंग्रेजी भाषा का कैमरा शब्द भी हिन्दी में शामिल हो चुका है। बल्कि शायद ही कोई जानना चाहता है कि तस्वीर खींचने वाले इस उपकरण के लिए कोई हिन्दी नाम है भी या नहीं। कैमरा तो खैर अंग्रेजी भाषा का शब्द है मगर हिन्दी में कमरा कहां से आया।
    हिन्दी में रचा – बसा कमरा दरअसल हिन्दी का नहीं है। भाषाविज्ञानी इसकी आमद पुर्तगाली से मानते है मगर आधुनिक पोर्चगीज़ में कमरा शब्द का उल्लेख स्पष्ट रूप से नहीं मिलता। हो सकता है पांच सदी पहले जब पुर्तगालियों की इस सरज़मीं पर आमद हुई हो तब देशज रूप में कक्ष या कोठरी के लिए इसका इस्तेमाल होता रहा हो। कमरा शब्द चाहे यूरोपीयों की देन हो मगर यह है इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द और इससे मिलते-जुलते शब्द हिन्दी और उसकी पड़ौसी ईरानी शाखा में साफ़ दिखते हैं।
    ग्रीक भाषा का एक शब्द है kamara यानी कमरा जिसका मतलब था छोटा , बंद कक्ष। लैटिन में इसका रूप हुआ camera यानी कैमरा मतलब तब भी वही रहा। ग्रीक और लैटिन से होते हुए पुर्तगाली में इस शब्द ने फिर kamara का देशज रूप लिया होगा। बहरहाल, छवियां लेने वाले उपकरण के तौर पर कैमरा शब्द लैटिन भाषा के कैमरा ऑब्स्क्योरा जिसका मतलब होता है अंधेरा कक्ष, के संक्षिप्त रूप में सामने आया। प्राचीन काल का यह वैज्ञानिक उपकरण कैमरे जैसा ही था जिसमें एक अंधेरा कक्ष होता था और एक लैंस से गुज़रती प्रकाश किरणे दीवार पर चित्र बनाती थीं। कम ही लोग जानते हैं कि ईराकी वैज्ञानिक इब्न अल हैथम [ 965ई -1049ई ] नें कैमरा ऑब्स्यक्योरा का आविष्कार किया था जो आधुनिक कैमरे का पूर्वज था और इसने ही फोटोग्राफी की दुनिया में वह उजाला फैलाया कि आज वैश्विक संदर्भ चाहे बाजारवाद हो या धर्म का, कला-सृजन हो या सुरक्षा का , संचार हो या स्वास्थ्य का , ज्ञान का हर ज्ञेत्र  इसके चमत्कारों से जगमग कर रहा है। इसके बिना नई दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती, नई दुनिया खोजी भी नहीं जा सकती।
    Ibn_Al_Haitham_Cover_Image ईराकी वैज्ञानिक इब्न अल हैथम [965ई -1049ई] नें कैमरा ऑब्स्यक्योरा का आविष्कार किया था जो आधुनिक कैमरे का पूर्वज था
    बहरहाल कैमरे का जन्म कमरे से हुआ। पुराने ज़माने के कैमरे किसी कोठरी से कम नहीं होते थे और उनके नामकरण के पीछे यही वजह थी। मूलतः ग्रीक शब्द kamara बना है इंडो-यूरोपीय धातु kam से जिसका मतलब होता है महराब, वक्र , कोना, झुका हुआ वगैरह। गौर करें कि महराब अर्धगोलाकार उस रचना को कहते हैं जिस पर छत टिकी होती है। साफ है कि कोई घिरा हुआ स्थान कक्ष या कमरा तब तक नहीं कहला सकता जब तक उस पर छप्पर न पड़ा हो। महराब की आकृति की एक अन्य रचना को कहते है कमान यह भी फारसी का शब्द है। तीर-कमान में इसका सर्वाधिक प्रयोग होता है। कमानी भी इससे ही बना है और इसकी आकृति वक्र ही होती है। मेहराब दरअसल कमान ही है जिस पर छत डाली जाती है।
    उर्दू फारसी का एक शब्द है ख़म जो इसी श्रंखला से जुड़ा है, जिसका मतलब भी वक्रता , टेढ़ापन , झुकाव ही होता है। पुराने ज़माने के मकानों में छत दोनो तरफ से ढलुआं होती थी क्योंकि बीच में खम देना ज़रूरी होता था। पेचोख़म शब्द भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है। गौर करें संस्कृत की कुट् धातु पर । kam से ध्वनिसाम्य वाली इस धातु में भी वक्रता , झुकाव का भाव है जो छप्पर डालने पर आता है। जाहिर है कुटि, कुटीर या कुटिया जैसे शब्द इससे बन गए जो कक्ष, कमरा या कोठी के पर्याय है। इन शब्दों का अंतर्संबंध यहां स्पष्ट हो रहा है और विकासक्रम के साथ इनकी रचना प्रक्रिया भी उजागर हो रही है। लैटिन camera का फ्रैंच रूप हुआ chamber यानी चैम्बर जिसका मतलब भी छोटा कमरा या न्यायाधीश का कक्ष था। अब तो चैम्बर के कई तरह से प्रयोग होने लगे हैं।
    ****Pictures have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.
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    Thursday, August 28, 2008

    कानून का डंडा या डंडे का कानून

    BooksandGavelA कानून लफ्ज की शख्सियत में जबर्दस्त सैलानीपन है। मज़े की बात ये कि कानून सबको कड़वा और कड़क लगता है मगर इसमें मिठास भी छुपी है। कानून एक ऐसा शब्द है जो रोजमर्रा की हिन्दी में इस्तेमाल होता है। प्रायः हर रोज़ हम इसे बोलते, लिखते, पढ़ते या सुनते हैं। अतिशयोक्ति लगे तो सचाई खुद परख लीजिए। इस लफ्ज के हिन्दी में दाखिल होने की दास्तान भी दिलचस्प है। ज़रा देखते हैं कानून के इस रमते जोगी का सफरनामा। [यहां भी ज़रूर जाएं]
    हिन्दी के अपने से लगने वाले कानून लफ्ज़ की हिन्दुस्तान में जब आमद हुई उससे पहले ये आधी दुनिया और दर्जनों मुल्कों का सफर कर चुका था। यह अरबी ज़बान का है और भारत में इस्लामी दौर की शुरूआत में ही आ चुका था। अब ये अलग बात है कि ईश्वर की राह का संदेश देने वाले सूफी फ़कीर इस क़ानून को अपने ब्रह्मज्ञान की पोटली में बांधकर लाए या खुदाई क़ानून की धज्जियां उड़ानेवाले बर्बर हमलावर।
    गौर करें कानून शब्द के चरित्र पर । इसका अर्थ बतलाने वाले जितने भी शब्द हैं मसलन- नियम , रीति, क़ायदा, ये सभी एक ही भाव लिए हुए हैं – सीधेपन का। यानी जो कुछ भी किया जाए सीधा हो, टेढ़ा न हो। समाजशास्त्रीय ढ़ंग से देखें तो भी सीधे काम स्वीकार्य होते हैं, टेढे या ग़लत नहीं। सीधा यानी सही, टेढ़ा यानी ग़लत। अब ज़रा सीधे–टेढ़े की पहेली भी सुलझा ली जाए। भाषाविज्ञानियों के मुताबिक दरअसल कानून मूलतः अरबी ज़बान का भी नहीं है अलबत्ता है यह सेमेटिक भाषा परिवार का ही। प्राचीन हिब्रू में एक शब्द है क़ैना(ह) यानी qaneh जिसका मतलब है लंबा-सीधा पोले तने वाला वृक्ष। सरकंड़ा या बांस का इस अर्थ में नाम लिया जा सकता है। यही शब्द ग्रीक ज़बान में कैना(ह) kannah के रूप में मौजूद है। अर्थ वही है लंबा, सीधा , पोला वृक्ष। एक और अर्थ है छोटी छड़ जिससे पैमाइश की जा सके। अर्थात किसी चीज़ का जो मानक तय किया जा चुका है उसका आकलन इस छड़ से होता था।
    कानून का पालन न करने वालों पर भी केन यानी डंडे ही बरसते हैं। गौर करें कि अंग्रेजी में केन का मतलब छड़ भी होता है। वाकिंग स्टिक भी केन ही कहलाती हैं और अपनी लंबाई और मिठास के चलते गन्ने को भी शुगरकेन नाम इसी वजह से मिल गया।यहां चाहें तो हिन्दी के गन्ने की तुलना भी मुखसुख के लिए इस केन से कर सकते हैं । दोनों में रिश्तेदारी जो ठहरी। इन शब्दों के अन्य यूरोपीय भाषाई रूप हुए अंग्रेजी में  केन (cane) फ्रेंच में केने (canne) लैटिन में केना अर्थात बांस वगैरह। इसी से बना है ग्रीक भाषा का kanwn जिसका मतलब हुआ नियम कायदा। अंग्रेजी में इसका रूप हुआ Canon और मतलब वही रहा।
    गौर करें नियम कायदे के संदर्भ में सीधे-टेढ़े की पहेली यहां सुलझ रही है। वृक्ष के सीधे तने को प्रतीक स्वरूप सीधी राह, रीति या जीवन पद्धति से जोड़कर देखें तो नियम, कायदा अपने आप साफ हो जाता है। थोड़ा और आगे की बात करें तो सीधी-सरल सी लगने वाली यह छड़ सही राह दिखाने के प्रतीक स्वरूप ही नियमों का पालन कराने वालों के हाथों में भी पहुंच गई। गौर करें हर राज्य का ध्वज एक दंड पर टिका रहता है। भारत में भी केन या बेंत को दंड या डंडा कहते है। अब सज़ा के लिए दंड शब्द यूं ही तो नहीं बन गया होगा ! दंड यानी डंडे से ही सज़ा तय होती थी सो दंड देने वाला दंडाधिकारी [मजिस्ट्रेट] बना। प्राचीन उल्लेखों, चित्रों व अन्य साक्ष्यों में हर शासक के हाथ में दंड भी उसकी सत्ता और दंडाधिकारी होने का प्रतीक था। मजिस्ट्रेट की टेबल पर रखा हथोड़ा इसी दंड का प्रतीक था, वर्ना लोगों को शांत कराने वाले उपकरण के तौर पर तो यह सबको नज़र आता ही है। दंड में निहित शक्ति ही अंग्रेजी के केन और कानून में भी झलक रही है।
    अरबों के स्पेन मे लगातार हमलों ने इस शब्द के अन्य रूपों को भी यूरोप में प्रसारित किया। हिब्रू के इस लफ्ज का सफर जहां बरास्ता अरबी यूरोप में हुआ वहीं तुर्की, फारसी होते हुए लगभग सभी भारतीय ज़बानों में ये कानून के रूप में मशहूर हो गया। हमारे यहां इसका मतलब हुआ शासकीय नियम, विधि आदि। अंग्रेजी राज के दौरान एक सरकारी पद भी सामने आया कानूनगो। आज भारत में ब्राह्मणों और कायस्थों में यह सरनेम के रूप में भी नज़र आता है। कानूनगो मालगुज़ारी महकमें का वह सरकारी सेवक होता था जिसके जिम्मे पटवारियों के सिपुर्द भूमि संबंधी दस्तावेजों की जांच करने का काम था। कानून से ही बने कानूनन, कानूनी, कानूनदां और कानूनियां जैसे शब्द भी प्रचलित हैं।
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    Wednesday, August 27, 2008

    सोने की रंगत, सोने का मोल...

    saffroncu मोटे अनुमान के मुताबिक ज़ाफ़रान के करीब दो लाख फूलों से सिर्फ आधा किलो केसर प्राप्त होता है। ज़ाफ़रान दरअसल फूलो के सुनहरे – पीले तंतु होते हैं जिनके निराले रंग, अनोखी महक और अनमोल औषधीय गुणों की वजह से इस वनस्पति को बेशकीमती सोने का रुतबा मिला हुआ है।

    http://www.gourmetsleuth.com/

    वो ज़ाफरानी पुलोवर , उसी का हिस्सा है
    कोई जो दूसरा पहन ले तो दूसरा ही लगे
    बशीर बद्र के इस शेर में जितनी भी रूमानियत है वो पूरी की पूरी ज़ाफरानी रंग की वजह से पुलोवर के खाते में जा रही है। ज़ाफरानी यानी केसरिया रंग , जिसमें लाल आभायुक्त पीला रंग शामिल है। इसमें पीत, गैरिक या स्वर्णिम वाले भाव भी हैं। इसे ही भगवा रंग भी कहते हैं। यह लफ्ज़ बना है ज़ाफरान से।
    ज़ाफरान यानी केसर। आयुर्वेद और युनानी दवाओं में ज़ाफ़रान का बड़ा महत्व है। प्राचीनकाल से ही पश्चिमी देशों में मशहूर भारतीय मसालों में एक मसाला केसर भी है। यह स्थापित तथ्य है कि दुनिया भर के मसालों में यह सबसे महंगा है और एक से डेढ़ लाख रूपए किलो बिकता है। विश्व में मुख्य रूप से कश्मीर घाटी और ईरान में इसकी खेती होती है। इसके अलावा स्पेन में भी इसे उगाया जाता है। मगर गुणवत्ता में अव्वल नंबर पर हिन्दुस्तानी ज़ाफ़रान ही माना जाता है।
    केसर को अंग्रजी में सैफ्रॉन कहते हैं जो ज़ाफरान से ही बना है। हिन्दी में भी ज़ाफरान शब्द खूब इस्तेमाल होता है। आमतौर पर ज़ाफरान को उर्दू – फारसी का शब्द समझा जाता है मगर यह है अरबी ज़बान का। अरबी में इसका शुद्ध रूप है अज़-ज़ाफरान। यह बना है सेमेटिक भाषा परिवार की धातु ज़पर से जिसका मतलब होता है पीतवर्ण या पीले रंग का। गौरतलब है फारसी में पीले रंग के लिए ज़ुफ्रा शब्द है। अरबी ज़ाफरान ही लैटिन में सैफ्रेनम बनकर पहुंचा और फिर अलग अलग यूरोपीय भाषाओं में छा गया मसलन ग्रीक में ज़फोरा, इतालवी में जैफेरनो,ज्यार्जियाई में जैप्रेनो, रूसी में शैफ्रॉन, फिनिश में सहरामी के रूप में मौजूद है। वैसे इसका वानस्पतिक नाम क्रोकस सटाइवा है।
    एक प्रसिद्ध तिलहनी फ़सल है करडी या करडई। इसका अरबी नाम उस्फुर है जो ज़ाफरान से ही निकला है क्योंकि इस पौधे में गहरे पीले रंग के फूल होते हैं जो मूल रूप से सुनहरी आभा वाले तंतुओं का समुच्चय होते हैं। अंग्रेजी में इस फूल को सैफ्लावर कहते हैं । कुछ लोग इसे उस्फुर और ज़ाफ़रान से बना नाम ही मानते हैं । कुछ लोग सेफ्रान+फ्लावर का रूप कहते हैं। जो भी हो, सेफ्रॉन भी ज़ाफ़रान से ही बना है। भारत में करडी को कुसुम या कुसुम्भ (कुसुंभा) कहते हैं। इसका तेल हृदय और मधुमेह के रोगियों के लिए बेहतर समझा जाता है। हमारे यहां जो रिफाइंड ऑइल बिक रहे हैं उनमें बड़ी मात्रा करडी के तेल से बने रिफाइंड की भी होती है।
    आपकी चिट्ठियां

    शब्दों के सफर की पिछली दो कड़ियों-ज़रूरी है नापजोख और मापतौल...और ज्ञ की महिमा - ज्ञान, जानकारी औरनॉलेज पर कई साथियों की प्रतिक्रियाएं मिलीं। खासतौर पर ज़रूरी है नापजोख और मापतौल...पर अभय तिवारी, स्मार्ट इंडियन और कात्यायान की प्रतिक्रियाएं बेहद ज़रूरी थीं। स्मार्ट इंडियन Rama Myfreetvsite.com Lavanyam - Antarman कुश एक खूबसूरत ख्याल रंजना [रंजू भाटिया] Dr. Chandra Kumar Jain अनुराग अभिषेक ओझा अभय तिवारी katyayan अनूप शुक्ल Udan Tashtari दिनेशराय द्विवेदी Arvind Mishra सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी हर्षवर्धन Gyandutt Pandey Mrs. Asha Joglekar.

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    Tuesday, August 26, 2008

    आगे भगवान मालिक है....[बकलमखुद-66]

    ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने bRhiKxnSi3fTjn गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी और प्रभाकर पाण्डेय को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के बारहवें पड़ाव और चौसठवें सोपान पर मिलते हैं अभिषेक ओझा से । पुणे में रह रहे अभिषेक प्रौद्योगिकी में उच्च स्नातक हैं और निवेश बैंकिंग से जुड़े हैं। इस नौजवान-संवेदनशील ब्लागर की मौजूदगी प्रायः सभी गंभीर चिट्ठों पर देखी जा सकती है। खुद भी अपने दो ब्लाग चलाते हैं ओझा उवाच और कुछ लोग,कुछ बातें। तो जानते हैं ओझाजी की अब तक अनकही।

    इन्टर्नशिप और डब्बे का लकी होना:

    बंगलोर से जिंदगी की पहली इन्टर्न करके लौटा था, प्रोफेसर की शाबाशी और ८,००० रुपये मिले थे २५ दिन के काम के. खुशी खूब थी प्रोफेसर साहब ने ऐसा लैटर लिख के दिया था की लोग बोलते क्या खिला के पटाया:-) कुछ और पैसे मिलकर ३५००० में हम कम्प्यूटर (डब्बा) ले आए. अपने कम्प्यूटर से ऍप्लिकेशन भेजा और ९ वें दिन स्विस से लैटर आ गया, खूब पैसे मिलेंगे ये भी लिखा हुआ था. यहाँ तक तो ठीक लेकिन इसके बाद अजीब घटना हुई, जिसकी भी इन्टर्न की काल आती सब ऍप्लिकेशन मेरे डब्बे से ही गई होती. और किसी ने ये भी हल्ला कर दिया की कवर लैटर और रिज्यूमे ओझा से ही लिखवाओ. तो डब्बे के साथ-साथ हम भी रिज्यूमे-गुरु बन निकले. यहाँ तक भी ठीक पर कुछ लोगों को तो इतना भरोसा था (खासकर एक मेरे करीबी मित्र गुप्ता को) की इस डब्बे से असाइंमेंट बना के भेजो तो कभी कम नंबर नहीं आ सकते, एक बार उनके टर्म पेपर को बेस्ट घोषित कर दिया गया तब से बेचारे कुछ भी करते मेरे डब्बे से ही, उनका डब्बा बेचारा तरसता रह जाता. कुछ इसी तरह की घटना हुई प्लेसमेंट के टाइम पर मेरा बेल्ट चल निकला, हाल ये था की मुझे नहीं मिल पाता था पहनने को :-) मेरा रूम वैसे ही अड्डा था चर्चा का, मैं सो रहा होता तो भी रूम में २-४ लोग होते ही. अब ये एक और कारण हो गया भीड़ का.

    मेरी बेटी कैसी रहेगी:

    हम्म... इसका शीर्षक ही रोचक है. तो चलिए बता ही देता हूँ, आईआईएम बंगलोर में दोबारा काम करने गया. पहली बार जिस प्रोफेसर के साथ काम किया वो भारत के जाने माने विद्वान् हैं. ज्यादा नहीं बता सकता, बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं मेरे उनसे, और वो जानी-मानी हस्ती हैं, सब बंटाधार हो जायेगा. जब दूसरी बार गया तो उनसे फ़िर मिलना हुआ. एक दिन गया तो खूब देर तक बात हुई, मैं क्या कर रहा हूँ, भविष्य के क्या प्लान है उन्होंने भी अपने बेटे की तस्वीर दिखाई जो अभी लन्दन में पढ़ाई कर रहा था. सब कुछ ढंग से चलता रहा, फिर उन्होंने मेरी उम्र और घर वालो के बारे में बात चालु की मुझे कुछ भनक नहीं लगी. बात होते-होते अंत में उन्होंने कहा की 'Actually I have a daughter to marry and she is as old as you are.' अब चालु हुई बात... अपनी बेटी के बारे में भी बताया उन्होंने, जो उन्हें चाहिए था सब मुझमे और मेरे परिवार में था बस उम्र कच्ची थी मेरी और पढ़ाई बाकी. मेरे पसीने छूट गए. मैं क्या कहूँ कुछ समझ में नहीं आया, मैंने कहा की ये काम मेरे माता-पिता का है मेरा नहीं. और वैसे भी अभी मुझे बहुत दिनों पढ़ाई करनी है. अभी कैसे कुछ कह सकता हूँ. जो भी हो चर्चा होती रही और ये फैसला लिया गया की मैं अपनी पढ़ाई पूरी करुँ और बाद में कभी मिलना हुआ तो मैं अपने माता-पिता का नंबर उन्हें दूंगा. (मैं लड़कियों को पसंद क्यों नहीं आता, उनके पिताओं को आता हूँ.. बहुत समस्या है !) फिलहाल वो बात उसके बाद बस एक बार और छिडी तब से नहीं... आगे भगवान मालिक है !

    अन्तिम वर्ष:

    आईआईटी के यादगार दिनों में आया अन्तिम वर्ष. वो सब कर डाला जो अब तक नहीं किया था... फाइनल परीक्षा के एक दिन पहले रात के २ बजे तक सिनेमा हॉल में, रात के २ बजे गंगा किनारे हो या जीटी रोड के ढाबे. घुमने का मन किया तो उत्तर पूर्व भारत घूम आए. चार साल में जितना पैसा खर्च नहीं किया था आखिरी सेमेस्टर में उडा दिया. मेस में खाना खाए हुए १५ दिन हो जाते. एक भी फ़िल्म रिलीज़ हो और हम सिनेमा हॉल में देख के न आयें ऐसा कभी नहीं हुआ. कानपुर के मित्र और उनकी बाइक... खूब एन्जॉय किया. इस बीच क्लास बंक करने का सिलसिला भी खूब चला. आईआईटी कानपुर की एक अच्छी बात है कि अटेंडेंस जरूरी नहीं है. कुछ प्रोफेसर इसके लिए कुल अंक का प्रतिशत निर्धारित कर देते हैं तो उन क्लास्सेस में जाना पड़ जाता था... उसमें भी अगर ये पता चल जाता की ५-१०% वेटेज है तो फिर यही कोशिश होती की ये ५-१०% कहाँ से लाये जाएँ अपने को तो वैसे भी नहीं मिलने. दो कोर्स ऐसे भी किए जिनमें कुल मिला कर दो बार ही गया. एक कोर्स में तो हद हो गई जब दुसरे मिड सेमेस्टर कि परीक्षा हो रही थी और मैं इंस्ट्रक्टर को ही नहीं पहचानता था. पर दोस्तों का साथ उनके नोट्स और रात भर की पढ़ाई इन दोनों कोर्स में अच्छे ग्रेड लगे.   [जारी]

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    गांव में बच्चों के बीच यूं बच्चा बन जाने में कितना आनंद है !
    हां, जब मनचाहे तब बड़प्पन झाड़ने से भी कौन रोकता है !
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    आईआईटी ,कानपुर
    में साथियों के साथ कुछ यादगार पल...
     

     

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    Monday, August 25, 2008

    राधिका ने कहा , शुक्रिया आपका ...

    नमस्कार !
    सोमवार को जब ऑनलाइन हुई तो स्वयं को शब्दों का सफर और कबाड़खाना पर पाया , देखकर आश्चर्य हुआ और आनंद भी।
    आज के युग में शास्त्रीय संगीत से परहेज करने वाले तो बहुत मिल जायेंगे, उससे प्रेम करने वाले बिरले ही नज़र आएंगे। मैं खुशनसीब हूं कि मेरे ही घर में मुझे मेरे संगीत को समझने वाले गुनिजन मिले । कलाकार के लिए सबसे बड़ा धन होता हैं,श्रोताओ का प्रेम। सबसे बड़ा सम्मान है श्रोताओं की वाह , सबसे बड़ी उपलब्धि होती हैं प्रशंसा के के दो बोल । मेरे वीणा वादन को आप पाठको में से किसीने अद्भुत कहा किसी ने अमित पुण्य का संचय। सच ! आपके ऐसा कहने से मुझे एक नया बल, एक नया उत्साह मिला हैं कि मैं और अधिक साधना करूं ,रियाज़ करू।
    सम्मान्य Udan Tashtariji, रंजना [रंजू भाटिया]जी अनूप शुक्लजी, Sanjeet Tripathiji आप सुनते हैं , यही बहुत बड़ी बात हैं। शास्त्रीय संगीत की पूरी समझ होना जरुरी नही हैं। आप सुरों का आनंद लेते हैं और हमें सुर साधने की धुन में डुबोते हैं यही काफी है। आपका धन्यवाद। Asha Joglekarji , दिनेशराय द्विवेदीजी, Rajesh Roshanji, बालकिशनजी,Parulji,लावण्याजी ,प्रभाकर पाण्डेयजी ,मीनाक्षीजी,महेन,सिद्धेश्वरजी , स्मार्ट इंडियन , अभिषेक ओझाजी और Mohit Ruikarji  को मैं धन्यवाद ज्ञापित करती हूं कि उन्होंने मेरी वीणा को सुना और सराहा। सच कहू तो धूम -धडाका संगीत के इस युग मैं अगर मैं विचित्र वीणा जैसे वाद्य का चयन कर पाई और उसको अपना जीवन ध्येय बना पाई तो आप जैसे श्रोताओ के कारण ।
    सम्मान्य डॉ चंद्रकुमार जैन ने मेरे वीणा वादन के लिए जो सुंदर पंक्तिया लिखी हैं,इन पंक्तियों को मैं हमेशा याद रखूंगी। इन पंक्तियों ने मेरी बहुत हौसलाअफजाई की है। आपका बहुत बहुत आभार । पुनः आप सब श्रोताओ को दिल से धन्यवाद देती हूं की उन्होंने विचित्र वीणा वादन सुना, सराहा। मेरी पोस्ट पढ़ी और उनके पर अपनी टिप्पणियां दी। दादा ( अजित जी ) ने बहुत अपनत्व से मुझे अपने ब्लॉग पर स्थान दिया। उनका ब्लॉग मैं पढ़ती रहती हूं।
    सधन्यवाद
    वीणासाधिका,
    राधिका
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    Sunday, August 24, 2008

    इश्क की मुंडेर पर , पहुंचे स्विट्जरलैंड [बकलमखुद-65]

    ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने bRhiKxnSi3fTjn गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी और प्रभाकर पाण्डेय को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के बारहवें पड़ाव और तिरेसठवें सोपान पर मिलते हैं अभिषेक ओझा से । पुणे में रह रहे अभिषेक प्रौद्योगिकी में उच्च स्नातक हैं और निवेश बैंकिंग से जुड़े हैं। इस नौजवान-संवेदनशील ब्लागर की मौजूदगी प्रायः सभी गंभीर चिट्ठों पर देखी जा सकती है। खुद भी अपने दो ब्लाग चलाते हैं ओझा उवाच और कुछ लोग,कुछ बातें। तो जानते हैं ओझाजी की अब तक अनकही।

    लड़कियों से दूरी वाली बात तो आप सुन ही चुके हैं... पर ये सिर्फ़ मेरी दास्ताँ नहीं है ९० प्रतिशत से ज्यादा आई आई टी वालों का यही हाल होता है. क्या करें बेचारे... लडकियां इज्जत बहुत करती है कोई कैसे बताये की इज्जत नहीं बराबरी चाहिए, प्यार चाहिए ! आप ने ये भी देखा की छठी कक्षा के बाद कभी लड़कियों से पाला नहीं पड़ा. आई आई टी में तो ये विलुप्त प्रजाति में ही आती हैं. अगर एक अच्छी लड़की हो तो आगे-पीछे के ४ बैच उसकी कुंडली याद कर लेते हैं. पर इस दौरान लडकियां खूब पसंद आई. हम अक्सर कहते हैं कि 'आज फिर से पहला प्यार हो गया'. लोग अपनी बेटियों को लेकर आते तो कहते कि भइया से टिप्स ले लो... कैसे पढ़ाई करनी है. आज तक ये समझ में नहीं आया कि भइया ही टिप्स दे सकते हैं क्या? कोई दोस्त, गुड फ्रेंड, जास्त फ्रेंड या कोई और रिश्ता हो तो शायद अच्छे टिप्स मिल जाएँ :-) पर ये बिडम्बना जारी है. छोडिये नहीं तो आँखें नम हो जायेगी.
    जो हुआ अच्छे के लिए:
    २००५ मैं हॉल ८ में रहता था... नया होस्टल, मस्त रूम, स्विस वीसा का इंतज़ार... हसीन दिन थे. मई आ गई... टिकट कैंसल हो गया, सब दोस्त पूरे ग्लोब पर पहुच गए ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका तक. मेरा वीसा नहीं आया. टेंशन ना लेने की आदत पता नहीं कहाँ से पायी. खूब फिल्में देखता और किताबे पढता, जब बाकी लोग बोलते की सबसे पहले इन्टर्न लगी थी अभी तक नहीं जा पाया, सहानुभूति लोग बोरे में भर कर देते... बात करते तो सहानुभूति टपकती. मैं मस्ती लेता, बस अपने रूम पार्टनर को बोलता की यार जो होता है अच्छे के लिए होता है. कुछ दिनों तक वो भी कहता की हाँ सही कह रहे हो पर जब दिन बिताते जाते तो बोला की यार वो तो ठीक है पर इतना ज्यादा भी अच्छे के लिए कुछ हो तो ठीक नहीं. मैं फिर भी कूल रहता. अपनी आईएमडीबी की लिस्ट छोटी करता जा रहा था.
    प्रोफेसर ब्राईट की सरपरस्ती में
    और फिर १ जून को वीसा और ५ जून को जाना हुआ इस पूरे क्रम में गुस्सा आया तो सिर्फ़ एम्बसी वालों पर. हर ४ दिन पर साले दिल्ली बुलाते और कहते की पुलिस वेरिफिकेशन नहीं हुई है (आजतक समझ में नहीं आया कि मेरी वेरिफिकेशन स्विस पुलिस कैसे कर रही थी). खैर मैं पंहुचा तो अच्छाई दिखानी शुरू हुई. मेरे लिए जो फ्लैट बुक हुआ था उसे किसी और को दे दिया गया था और मजबूरी में मेरा रहना तय हुआ प्रोफेसर ब्राईट के घर में. और ये मजबूरी इतना रंग ले आई की क्या कहने... एक दोस्ती जो आज भी कायम है. अगर उनके साथ ना रहा होता तो बहुत कुछ खो दिया होता, इतनी किताबें पढने को मिली, इतने अच्छे प्रोजेक्ट्स पर काम किया, इतने अच्छे से स्विस घुमा... इतने बड़े-बड़े लोगो से मिलता और प्रोफेसर साहब की बड़प्पन... क्या परिचय और बड़ाई करते. कितने बड़े-बड़े लोगों से मिलाया. बस अगर परदेश में घर हो सकता तभी इतना आराम मिल पाता. सो के उठता तो प्रोफेसर दम्पति नाश्ता टेबल पर लगाकर चले गए होते, और अक्सर एक पर्ची छोड़कर की आज शाम आप डिनर पर आमंत्रित हो. हम फलां रेस्टुरेंट जा रहे हैं... ऑफिस से जल्दी आ जाना.

    इस बीच इस सोने की घटना में बहुत खोया... प्रोफेसर साहब कई जगह क्लास लेते तो जिस दिन ऑफिस नहीं जाते मैं बस से जाता, एक दिन ७ बजे की बस से गया तो एक लड़की मिली... ओह क्या हसीन थी, छोडिये ज्यादा नहीं लिखूंगा, उसके फिगर के बारे में तो बिल्कुल नहीं. पर इतना बता दूँ की किस्मत पहली बार इस मामले में काम कर रही थी अक्सर लोग अकेली सीट पर बैठते हैं पर वो आकर बैठी ही नहीं बातें भी करने लगी, उसकी रूचि हिन्दुइस्म और हिन्दुस्तान में बहुत थी और इस मामले में लपेटने में मैं माहिर. पर २-३ दिन के बाद लाख कोशिश कर के भी उठ नहीं पाता ठंड में सोता ही रह जाता, रोज़ कोशिश करता पर ७.२० वाली बस ही मिल पाती... जो सोता है सो खोता है

    स्विस प्रोफेसर बन गए शाकाहारी...
    प्रोफेसर साहब को जब पता चला की मैं शाकाहारी तो वो भी लगभग बन गए... साथ किचेन में काम करते, गार्डन में भी और साथ ऑफिस जाते. एक मजे की बात ये की ऑफिस पहुचने के पहले कभी काम डिस्कस नहीं होता, बीच में गाड़ी रोककर आल्प्स, झील और किले घूमते, किताबों के बारे में डिस्कस करते, जॉर्ज बुश को गाली देते... धर्म की चर्चा करते... द्वितीय विश्व युद्ध की चर्चा से लेकर गाँधी तक, वैश्वीकरण से लेकर तेल की राजनीती तक. दोनों एक दुसरे से खूब प्रभावित नज़र आते. एक दुसरे की बात तन्मयता से सुनते... अपनी जीवनी एक दुसरे को सुनाते. ट्रेक्किंग पर जाते पहाड़ पर पहुंच जाते तो पीछे से मेरिलिन (उनकी पत्नी) कार लेकर आती और वापस आते. बोलते की आज ऑफिस मत जाओ चलो लुजेर्न घूम लेना... मैं कहता की ये काम है, तो बोलते की मैं बॉस हूँ. मैं जो कह रहा हूँ करो. वीकएंड पर कभी रुकने को ना कहते क्योंकि उन्हें पता था की कई मित्र अभी स्विस में है तो वीकएंड मुझे उनके साथ बिताना चाहिए. यूँ ही नहीं कहता मैं की जहाँ भी गया लगा उसी के लिए बनाया गया हूँ.  
    Madeleine Looking at cooking skills यादे-स्विस




    प्रो. ब्राइट की पत्नी मेरिलिन के साथ
    With Prof. Breit




    प्रोफेसर ब्राइट के साथ ब्रेकफास्ट का मज़ा


    [जारी]
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