Tuesday, October 13, 2009

आशियाना दर आशियाना [बकलमखुद-110]

पिछली कड़ी-घर-गृहस्थी की फिक्र (बकलमखुद-109)

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और 110वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
ए घर में से डॉ. त्रिपाठी का क्लिनिक दूर पड़ने लगा। सरदार नजदीक के एक होमियोपैथ के पास जाने लगा, लेकिन उस से संतुष्टि नहीं हुई। उस की एक पत्थर खान में पार्टनरशिप थी, और चिकित्सा से अधिक रुचि उस में थी। एक दिन उसकी दवा से पूर्वा को कोई लाभ नहीं हुआ, सरदार को परेशानी में गुस्सा आया, वह होम्यो-स्टोर से पच्चीस-तीस डाईल्यूशन, इतनी ही खाली शीशियाँ और ग्लोब्यूल्स उठा लाया। खुद को आजमाना आरंभ किया। नतीजे लगभग सौ प्रतिशत निकलने लगे। एक दिन पिताजी मिलने आए, सरदार की बगल में एक बालतोड़ फुंसी निकली हुई थी, वह हाथ को कुछ ऊंचा कर के चल रहा था। पिताजी ने पूछा –ये कैसे चल रहे हो? सरदार ने वजह बताई, तो डाँट सुननी पड़ी –बहुत लापरवाह हो, एक बेलाडोना प्लास्टर ला कर चिपकाया नहीं गया। वह प्लास्टर लेने उसी समय बाजार दौड़ा लेकिन मेडीकल की दुकान बंद हो चुकी थी। उस ने होम्यो-संग्रह में से बेलाडोना की कुछ ग्लोब्यूल्स खाए और सो गया। सुबह उठा तो फुंसी गधे के सिर से सींग की तरह गायब थी। किताब उठा कर पढ़ी तो पता लगा कि प्रयोग सही था। पिताजी भी साबूदाने सी चार मीठी गोलियों के असर से चमत्कृत हुए। कहने लगे अपने यहाँ धन्वंतरी (आयुर्वेद की मासिक पत्रिका) आती है उस के दो चिकित्सा विशेषांक बारां पड़े हैं, उन में होमियोपैथी चिकित्सा का वर्णन है, उन्हें यहाँ ले आना। सरदार अगली बाराँ यात्रा में दोनो विशेषांक उठा लाया और जिल्द बंधवा कर रख लिए। उन के अध्ययन ने सरदार को घर का डॉक्टर बना डाला। पड़ौसियों को पता लगा तो वे भी उस की डाक्टरी आजमाने लगे।
परिवार की गाड़ी, गाड़ी पर परिवार
स घर से अदालत सात किलोमीटर पड़ती थी, बीच में एक टेम्पो बदलना होता था। आने जाने में परेशानी होती। उन दिनों एक बैंक के वकील बार ऐसोसिएशन के अध्यक्ष हो गए। उन्होंने वकीलों को बैंक से एक साथ लूना मोपेड फाइनेंस करवाईं। सरदार ने भी एक खरीद ली। अब लूना से अदालत का सफर होने लगा। वह पूरे परिवार को समेट लेती थी। आगे पूर्वा और शोभा पीछे बैठती। एक शाम भोजन किया ही था कि शोभा बोली अस्पताल चलना है। परिवार में फिर नया मेहमान दस्तक दे रहा था। अस्पताल एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर था। सरदार ने ऑटोरिक्षा लाने को कहा तो मना कर दिया। वह पूर्वा को पडौसी के यहाँ सोता छोड़ शोभा को लूना पर बिठा उसे अस्पताल में भर्ती करवा आया, फिर जा कर दीदी को खबर की। वह बहुत नाराज हुई। ऐसी हालत में कोई दुपहिया पर ले जाया जाता है। दीदी को अस्पताल छोड़ पूर्वा को संभालने घर पहुँचा तो देखा अम्मां भी आ चुकी थीं। अगहन के पूरे चांद की रात थी, चांद आसमान के बीच पहुँचता उस के पहले ही सरदार माँ को लेकर अस्पताल पहुँचा ही था कि नर्स ने उन्हें पोता होने की खबर दी।
नसीहत मुंसिफ न बनने की
गले ही सत्र में पूर्वा स्कूल जाने लगी। मुकदमे भी भरपूर आ रहे थे, सफलता भी खूब मिल रही थी। खर्च में कोई कमी न थी लेकिन बचत भी न थी। पिताजी चाहते थे कि अवसर मिले तो न्यायिक सेवा में चले जाना चाहिए। सरदार ने फार्म भर दिया गया। जिस दिन परीक्षा होनी थी उस के एक दिन पहले किसी गाँव में माहौल खराब हो गया। एक साथ पचास-साठ लोगों को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया। सरदार शाम साढ़े छह तक उन की जमानतें कराता रहा। अगले दिन पेपर दे दिए। साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। एक हाईकोर्ट जज साक्षात्कार में थे। उन्हों ने खूब मजा लिया। वापस लौटा तो दूसरे दिन ही सीनियर वकील पानाचंद जैन (अब सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज) ने पकड़ लिया, रेस्टोरेंट ले गए। एक घंटा इस विषय पर भाषण सुनाया कि इतनी अच्छी वकालत छोड़ कर मुंसिफ क्यों बनना चाहते हो? सरदार ने कान पकड़े कि वह यह गुनाह फिर न करेगा। चयन नहीं हुआ। लिखित परीक्षा में कुछ कसर रह गई, वरना साक्षात्कार में सरदार से कम अंक लाने वाले कई चुन लिए गए। पता लगा जमानतों में जो वक्त जाया हुआ था, उस वक्त में पढ़ा होता तो जरूर मुंसिफ हो गया होता। कुछ दिन बाद साक्षात्कार लेने वाले जज साहब का वकालतखाने में आना हुआ। बहुत वकील साक्षात्कार को चयन न होने के लिए जिम्मेदार मानते थे और कहते थे उस में बेईमानी हुई है। उन्होंने विरोध के लिए जज साहब को ज्ञापन देना चाहा, सरदार से हस्ताक्षर कराने आए तो उस ने मना कर दिया। जिन का चयन हुआ है उन से अधिक अंक मुझे साक्षात्कार में मिले हैं, मैं कैसे कहूँ कि बेईमानी हुई है?
अनुज को दिखाई राह
बाराँ से खबर आई कि छोटा भाई सैकण्डरी परीक्षा में फेल हो गया है। सरदार उसे अपने साथ ले आया। इस ने बताया उसे पढ़ना अच्छा नहीं लग रहा, वह मार्केटिंग का काम करना चाहता है। सरदार ने एक परिचित पेस्टीसाइड निर्माता से मिलाया, जिस ने मार्केटिंग का काम सिखाने और देने के पहले उसे कुछ दिन कारखाने आने को कहा। वह दिन भर वहाँ पेस्टीसाइडस् की दुर्गंध के बीच रहने लगा। पाँच दिनों मे ही मार्केटिंग का भूत उतर गया। शनिवार शाम को बोला कि वह बाराँ जा रहा है सोम को लौट आएगा। लेकिन वह नहीं लौटा। एक सप्ताह की थकान ने उसे फिर से पढ़ने को प्रेरित किया। साल बचाने को उस ने बहिन के घर मध्यप्रदेश जा कर हायर सैकण्डरी परीक्षा दी और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ और बाराँ कॉलेज में उसे दाखिला मिल गया। बाद में वह बी.एड. कर अध्यापक हो गया और उस में नेतृत्व का जबर्दस्त गुण था। वह अपने विभाग और नगर में महत्वपूर्ण हो गया था कि कहीं भी उस के बिना सामूहिक काम हो पाने कठिन थे। अध्यापन भी ऐसा की छात्र उस पर टूट कर पड़ते थे।
नई योजनाएं
हाउसिंग बोर्ड मकान का नया किराएदार पिताजी का पुराना विद्यार्थी था और मकान में स्कूल चला रहा था। एक दिन आया और पूछा– आप उस मकान में आ कर रहेंगे। सरदार ने कहा– शायद कभी नहीं। उस ने मकान खरीदने का प्रस्ताव किया। सरदार ने कहा जो भी बाजार की रेट हो, दे देना। हिसाब-किताब किया तो तीस हजार हुआ। वह पाँच एडवांस दे गया। सरदार ने उसी दिन एक दलाल को बुला कर नजदीक में प्लाट दिखाने को कहा। उस ने पास ही पार्क के पीछे की गली का एक प्लाट साढ़े अट्ठाईस हजार का बताया, सरदार ने उसी का सौदा करने को कहा और एग्रीमेंट कर एडवांस रकम दे दी। दलाल शाम को प्लाट की मूल पत्रावली दे गया। पता लगा प्लाट पार्क के सामने है और कोई ढाई सौ वर्ग फुट अधिक बड़ा है।

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Monday, October 12, 2009

रेखा का लेखा-जोखा (लकीर-2)

geometry संबंधित कड़िया-1.चार दिन की चांदनी 2.लीक छोड तीनों चलै, सायर, सिंह , सपूत[लकीर-1] 3.ईंट की आराधना [भगवान-4]

कीर और रेखा का अर्थ एक ही है। इन दोनों का मूल भी एक है। लिख् और रिष् धातुओं से इनका विकास हुआ है। इनसे बने लेख, लेखनी, लेखक, लीक, लकीर, रेखा जैसे शब्द तो हिन्दी में खूब प्रचलित हैं। मगर एक खास बात है रेखा की गणित और हिसाब-किताब में मौजूदगी। लेखा, लेखा परीक्षक, लेखाकार, लेखापाल और लेखा-जोखा जैसे शब्दों का प्रयोग करते वक्त यह अहसास नहीं रहता कि इनका रिश्ता भी लिख-रिष्-राईट की परम्परा से ही जुड़ता है।
लेखा-जोखा एक लोकप्रिय समास है जो हिसाब-किताब, परीक्षण और अंकेक्षण के संदर्भ में हिन्दी में इस्तेमाल होता है। यह दो शब्दों लेखा+जोखा से मिल कर बना है। लेखा का अर्थ हुआ, लिखा हुआ, चिह्नित, सूचीबद्ध, लिपिबद्ध, चित्रित, लिखावट, रेखांकन, धारीय आदि। प्राचीनकाल में कलम के आविष्कार से पहले किन्हीं बातों को याद रखने के लिए मनुष्य ने पहले मिट्टी, फिर वृक्षों और फिर चट्टानों पर चिह्नांकन करने की युक्ति सीखी। इन्हीं चिह्नों के जरिये विभिन्न समूदाय इकाई-दहाई के रास्ते पर आगे बढ़े और इस तरह गणित का जन्म हुआ। स्पष्ट है कि कलम से बनाए अक्षरों के जरिए नहीं, मनुष्य ने पत्थरों से बनाई लकीर के जरिए ही गणित सीखा। इस तरह रेखा का गणित से रिश्ता हजारों साल पुराना है। यह साफ है की लेखा-जोखा शब्द का यहां क्या अर्थ होगा। यूं रेखा या लेखा शब्द का प्रयोग ज्योतिष में भाग्यरेखा या भाग्य का लेखा के लिए भी होता है। लेखा-जोखा शब्द में जो जोखा है वह बना है जोख नाम की क्रिया से जिसका मतलब भी पैमाइश और तौल ही होता है। नाप-जोख में यह नज़र आ रहा है। इसमें वस्तु का वज़न, लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई आदि का हिसाब शामिल है। इससे ही जोखना शब्द भी बना है। यह बना है जुष् धातु से जिसमें परीक्षण, चिंतन-मनन, जांच-पड़ताल के अलावा सुखी और प्रसन्न होना जैसे भाव भी शामिल है। जुष् का अगला रूप हुआ जुख और फिर बना जोख। इस तरह लेखा-जोखा का अर्थ हुआ लिखे हुए की पड़ताल करना अर्थात हिसाब-किताब मिलाना।
रेखागणित यानी ज्यामिति का प्रयोग गणित में इनसान ने अंक गणित के आविष्कार के बाद ही किया। विद्वानों का मानना है कि रेखागणित की शुरुआत भारत में वैदिक युग में ही हो गई थी। वैदिक संहिताओं में यज्ञ के लिए बननेवाली वेदिकाओं के चौरस आकार में रेखीय गणनाएं हैं। इसी तरह उसके निर्माण में प्रयुक्त इष्टिका अर्थात ईंटों का आकार भी निश्चित होता था जो रेखागणित के दायरे में आता है। ज्यामेट्री को हिन्दी में ज्यामिति कहा जाता है।
geometrywars भारतीय परम्परा में मा धातु की अर्थवत्ता भी व्यापक है। मा धातु में चमक, प्रकाश का भाव है जो स्पष्ट होता है चन्द्रमा से।
ज्यामिति में मूलतः भूक्षेत्र की माप का भाव है। यह शब्द भारोपीय भाषा परिवार का है। अंग्रेजी का ज्यामेट्री ग्रीक ज्यामेट्रिया से बना है। ग्रीक भाषा के जिओ यानी geo का अर्थ होता है पृथ्वी, धरती, वसुधा, धरा आदि। आश्चर्यजनक रूप से संस्कृत में भी इन्ही अर्थो में ज्या शब्द है जिसका अर्थ है धरती, धनुष की प्रत्यंचा, दो चाप को मिलाने वाली रेखा आदि। मेट्रिक्स का अर्थ होता है मापना। यह बना है भारोपीय धातु मे me से जिसके लिए संस्कृत मे मा धातु है। इन दोनों मूल धातुओं में नाप, माप, गणना आदि भाव हैं। अंग्रेजी के मेट्रिक्स का रिश्ता अंतरिक्ष की परिमाप और उसके विस्तार से भी जुड़ता है। यानी बात खगोलपिंडों तक पहुंचती है। भारतीय परम्परा में मा धातु की अर्थवत्ता भी व्यापक है।
मा धातु में चमक, प्रकाश का भाव है जो स्पष्ट होता है चन्द्रमा से। प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ तो उसने इनमें दिलचस्पी लेनी शुरू की। स्पष्ट तो नहीं, मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए मा शब्द रहा होगा। मा के अंदर चन्द्रमा की कलाओं के लिए घटने-बढ़ने का भाव भी अर्थात उसकी परिमाप भी शामिल है। यूं चंद् धातु में भी चमक का भाव है और इससे ही चन्द्रमा शब्द बना है किन्तु चन्द् शब्द को विद्वानों ने बाद का विकास माना है। गौर करे कि फारसी का माह, माहताब, मेहताब, महिना शब्दों में मा ही झांक रहा है जो चमक और माप दोनों से संबंधित है क्योंकि उसका रिश्ता मूलतः चान्द से जुड़ रहा है जो घटता बढ़ता रहता है। और इसकी गतियों से ही काल यानी माह का निर्धारण होता है। अंग्रेजी के मंथ के पीछे भी यही मा है और इस मंथ के पीछे अंग्रेजी का मून moon है। रिश्तेदारी साफ है। माप-जोख सबसे पहले अगर हमने सीखी तो धरती और चांद से ही।

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Saturday, October 10, 2009

घर-गृहस्थी की फिक्र (बकलमखुद-109)

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और 109वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
पिछली कड़ी-कोर्ट में गुस्से का इजहार [बकलमखुद-108]
हले पहल जिस मकान में कमरा-रसोई किराए पर लिए, वह एक गली में था। कमरे की एक मात्र खिड़की पीछे चौक में खुलती थी। वही एक हवा-रोशनी का साधन थी। पीछे चौक के आस-पास के मकानों में जो लोग रहते थे, उन के मुख से बातचीत से ले कर लड़ाई-झगड़ों में यौनांगों के नामों और अवैध यौन सबंधों की संज्ञाएँ टपकती ही रहतीं। स्त्रियोँ और बच्चों तक को उन से परहेज न था। शोभा महीने भर में ही उकता गई। नए मकान की तलाश आरंभ हुई। तीसरे माह पिताजी के एक मित्र का मकान मिला, यूनियन दफ्तर पर भी नजदीक था। दुमंजिले का कमरा-रसोई तय हो गए। उस में आ गए। यहाँ पहला सीलिंग फैन खरीदा गया। लेकिन उस माह ही घर खर्च में परेशानी हुई। जेब बिलकुल खाली और घर में जरूरी सामान नहीं, क्या किया जाए? सरदार ने असमंजस में घर से यूनियन-दफ्तर तक के चक्कर लगाना आरंभ किया। बीच में एक धर्मकांटा था, जिस का मालिक साहित्य में रुचि रखता था। सरदार कभी कभी उस के साथ चर्चा करने बैठ जाता। उस दिन उस ने आवाज दे ली। वहाँ गया तो उस ने एक नोटिस पकड़ा दिया। उस के किसी पूर्व कर्मचारी ने बकाया वेतन का दावा कर दिया था। सरदार ने तय कर रखा था कि मजदूर के खिलाफ मालिक का मुकदमा न लड़ेगा। लेकिन जेब कह रही थी कि नोटिस ले लो, वकालतनामा हस्ताक्षर करवा लो, कुछ तो फीस मिलेगी, घर में सामान आ जाएगा। मन कह रहा था –यह क्या? पहली ही परीक्षा में फेल हो जाओगे क्या? नोटिस न लिया गय़ा, मना भी न किया। कहा –अभी तारीख दूर है, फिर ले लूंगा। वहाँ से उठा तो खाली जेब फिर कमरे से यूनियन दफ्तर के बीच चक्कर आरंभ हो गए। जैसे-तैसे वह दिन निकाला। दूसरे दिन सुबह अदालत जाने को टेम्पो के पैसे बचाने के लिए किसी से लिफ्ट ली। अदालत में एक नया मुवक्किल आ गया। जेब में कुछ पैसा आया तो असमंजस जाता रहा।
स मकान में रहते साल ही हुआ था कि गर्मी की एक रात सरदार और शोभा पास के पार्क में जा बैठे। वहाँ ठंडक में बैठे-बैठे देर हो गई। घर पहुँचे तो मकान के प्रवेश द्वार पर अंदर से ताला लग चुका था। मकान में किराएदारों के अलावा केवल मकान मालिक का लड़का रहता था, उसे आवाज लगाई, वह उतरा और ताला खोला। लेकिन वापस गया तो बड़बड़ाते हुए। उसी समय तय हो गया कि नया मकान तलाश कर लेना चाहिए, जिस में कमरे का एक रास्ता बाहर जरूर खुलता हो। सप्ताह भर में मकान बदल लिया गया। नए मकान में दो कमरे, रसोई थी। अब उन की जरूरत भी थी, घर में नया सदस्य आने वाला था। बाहर के कमरे को दफ्तर की शक्ल देने के लिए मेज और कुर्सियों की जरूरत थी। दीदी के घऱ से एक फालतू मेज लाई गई, दो कुर्सियाँ खरीदीं एक खुद के लिए और एक मुवक्किल के लिए। कुछ दिन बाद पिताजी आए, मेज और कुर्सियाँ देख प्रसन्न भी हुए। सरदार ने उन से जिक्र किया -तीन चार कुर्सियाँ और होतीं तो ठीक होता। पिताजी ने कहा कमाते जाओ, बसाते जाओ। उस दिन निश्चित हो गया कि अब सब कुछ खुद ही करना है।
धर खबर आई कि दादा जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं। सरदार उन से मिलने गया, देखा दादा जी की चला-चली की बेला है। उन्हें देख कर वापस लौटा तो खबर आई, दादा जी नहीं रहे। इस दशा में शोभा तो जा नहीं सकती थीं। सरदार अकेला ही बाराँ गया। वहाँ फिर चर्चा हुई कि बहू के पास कोई नहीं है। वापसी में छोटी बहिन अनिता को साथ लिया। भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू की शहादत का दिन था, शाम को सभा थी। सरदार और अनिता दोनों देर रात सभा से लौटे तो पत्नी ने अस्पताल जाने का संकेत दिया। उसी समय उन्हें पास के अस्पताल भर्ती कराकर सरदार मौसी को बुलाने दौड़ा। मौसी आ गईं तो तसल्ली हुई। सुबह दूसरे पहर तक बेटी नए सदस्य के रूप में साथ थी। खबर होने पर मामा जी, मामी जी मिलने आए। मामी जी अस्पताल तक गईं, मामा जी घर ही बैठे रहे। मामी जी मिला कर सरदार वापस लौटा, तब तक एक कागज पर मामाजी बिटिया की कुंडली बना चुके थे। उन के हिसाब से नाम कुछ और रखा जाना था। लेकिन जन्म नक्षत्र पूर्वाभाद्रपद था। उस दिन से उसे पूर्वा कहना आरंभ किया तो कोई दूसरा नाम जुबान पर चढ़ा ही नहीं। बेटी हमेशा शिकायत करती कि उस की सहेलियों के कई नाम हैं, घऱ का अलग. स्कूल का अलग और नाना-मामा का अलग, उस का एक ही क्यों है?
कुछ दिनों में माँ आ गईँ, शोभा और पूर्वा को अपने साथ ले गईं। दो माह में दोनों वापस लौटीं तो गर्मियाँ जोरों पर थीं। सरदार एक दिन अदालत से लौटा तो शोभा ने बताया पूर्वा बार-बार दस्त जा रही है। पत्नी से पूछा कि क्या बात हो सकती है? वह डॉक्टर की बेटी, उस ने अपने अनुभव से कहा, लगता है पहली गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही है। सरदार शाम को ठंडाई के लिए ब्राह्मी भिगो कर गया था। उस में से दो पत्ती ले कर निचोड़ा, निकला हुआ रस चम्मच से बेटी को पिलाया, दस्त बंद हो गए। युक्ति काम कर गई थी। लेकिन युक्तियों से काम न चलने वाला था। देर-सबेर कोई स्थाई चिकित्सक तो देखना ही था। यूँ तो मामा बैज्जी कोटा में ही थे, लेकिन वे दूर थे। चिकित्सक नजदीक होना चाहिए था। पड़ौसी एलआईसी साथी डीसी त्रिपाठी के बड़े भाई होमियोपैथ थे। पूर्वा को वहीँ दिखाया जाने लगा। वे मीठी गोलियाँ देते, जिन्हें पूर्वा बड़े चाव से खाती। सरदार को भी गोलियों ने चमत्कृत किया। पाँच मि.लि. की शीशी में कोई पाँच-दस बूंद दवा होती और वह चमत्कार की तरह बीमारी से निपटती। सरदार जीव-विज्ञान स्नातक और आयुर्वेद विशारद तो था ही, एक दिन होमियोपैथी की एक किताब भी घर आ गई।
स मकान मालिक के व्यवहार से भी असंतुष्टि हुई तो फिर मकान बदला गया। इस बार जो मकान मिला उस में भी वही दो कमरे और रसोई थे, लेकिन बड़े थे। बाहर का कमरा बड़ा था। एक मेज, दो कुर्सी मे दफ्तर भौंडा लगता। एक मित्र ने अपने कारखाने से लकड़ी का एक तख्त बनवा कर भिजवा दिया, दफ्तर ठीक लगने लगा। एक दिन सरदार अदालत से घर लौट रहा था तो टेम्पो स्टेंड पर एक बढ़ई को लकड़ी की एक बैंच बेचते देखा। कीमत सवा सौ बता रहा था। भाव किया तो नब्बे तक आ गया। घर आ कर पत्नी को पैसा दे कर भेजा। कुछ देर बाद देखा पत्नी के पीछे बढ़ई बेंच उठाए आ रहा है। पत्नी ने बताया पिचहत्तर में खरीदी है।

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Friday, October 9, 2009

स्वास्थ्य निकेतन और चिकित्सक [हकीम-4]

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कीम के अर्थ में रोजमर्रा की भाषा में डॉक्टर शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर होता है। चिकित्सक शब्द भी खूब प्रचलित है मगर इसका सिर्फ लिखित रूप में ही प्रयोग होता है। बोलचाल में बहुत कम यह इस्तेमाल होता है। दिलचस्प बात ये है कि औषधि और उपचार से जुड़े इन दोनो ही शब्दों का जन्म भारोपीय मूल से हुआ है। सबसे पहले बात चिकित्सक की। इसकी उत्पत्ति संस्कृत की प्राचीन धातु कित् से हुई जिसमें जानने का भाव छुपा है साथ ही स्वस्थ करने का भी। कित् का मूल भाव है रहना, चाहना। ये दोनों ही भाव परिचर्या यानी देखरेख से जुड़े हैं। किसी को स्वस्थ करने में सेवा के साथ-साथ समर्पण भी ज़रूरी है। परिचर्या में साथ रहना तो निहित है ही। कित् धातु का रहने संबंधी भाव इससे ही बने केतनम् में स्पष्ट है जिसका अर्थ है घर, आवास, स्थान, निमंत्रण और ध्वज, पताका आदि। केतन व्यक्तिनाम के तौर पर प्रचलित है जिसका अर्थ प्रतीक, चिह्न, मंगलकारी आदि होता है। घर या आवास के रूप में हिन्दी में केतनम् प्रचलित नहीं है पर इससे ही बने निकेत, निकेतन जैसे शब्द खूब इस्तेमाल होते हैं जिनका अर्थ भवन, आवास, आलय, घर आदि होता है। शांति निकेतन इसी कड़ी का शब्द है। अस्पताल के लिए चिकित्सालय शब्द बनाया गया है। इसी तरह स्वास्थ्य निकेतन, आरोग्य निकेतन  जैसे शब्दों का प्रयोग सेनिटोरियम के लिए किया जाता है। प्रसंगवश हिन्दी का अस्पताल दरअसल उर्दू के हस्पताल का रूप है। अंग्रेजी के हॉस्पिटल का हिन्दुस्तानी में जो उच्चारण हुआ वह हस्पताल ही था। अयोध्या नगरी को साकेत भी कहा जाता है, जिसमें यह कित् झांक रहा है। संभवतः रहने, बसने योग्य स्थान के तौर पर ही इसका नामकरण साकेत हुआ होगा।
कित् धातु से ही बने केतु शब्द का अर्थ है कांति, प्रकाश, उज्जवलता, स्वच्छता आदि। केतु का अर्थ पुच्छलतारा भी होता है और एक नक्षत्र भी जिसका भारतीय ज्योतिष में बड़ा महत्व है। इसका एक अर्थ ध्वज दंड अथवा पताका भी है। गौर करें प्रकाश, चमक जैसे भावों पर, जाहिर है ज्ञान और प्रकाश दोनों का भाव भी एक ही है। खगोलीय doctor_261425पिण्ड के रूप में प्रकाश और कांति अर्थ भी स्पष्ट हो रहे हैं तथा आसमान में इनकी स्थिति ऊंचाई की द्योतक है जिसका भाव पताका में झलक रहा है। कित् का ही एक महत्वपूर्ण रूपान्तर चित् भी है जिसका अर्थ हुआ प्रज्ञा-बुद्धि-ज्ञान। जानना, समझना, निरीक्षण करना, प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करना, सतर्क रहना आदि। इससे बने चित्त का अर्थ है मन-हृदय,  जाना हुआ, समझा हुआ आदि। चेतन शब्द भी इसी से बना है जिसका अर्थ हुआ स्वस्थ, जागरूक मनुष्य। रोगोपचार का उद्धेश्य भी अस्वस्थ व्यक्ति में चेतना लाना ही है। इस तरह चित+कित से बना चिकित्सा। इन तमाम शब्दों के सन्दर्भ में चिकित्सा का जो अर्थ निकलता है वह है रोग का निदान, औषधि-उपचार, स्वस्थ करना आदि। इसी तरह चिकित्सक का अर्थ हुआ जानकार, ज्ञानी, चिंतन करनेवाला, वैद्य, हकीम या डाक्टर। किंचित (किम्+चित्) और कदाचित (कदा+चित्) भी इसी मूल से बने हैं। किंचित का अर्थ है थोड़ा सा (ज्ञान), अल्प (ज्ञान) इसी तरह कदा का अर्थ है कब, किस समय। चित् जुडने से अर्थ होता है किसी समय, एक दिन, एक दफा आदि।
ब बात डॉक्टर की। अंग्रेजी का यह शब्द इंडो-यूरोपीय मूल के शब्द dek से जन्मा है जिसका अर्थ भी शिक्षा, ज्ञान से जुड़ता है। यूं डॉक्टर बना है लैटिन के docere से जिसमें धार्मिक शिक्षक, सलाहकार या अध्येता का भाव है।  जिसने अंग्रेजी में डाक्टर यानी चिकित्सक के अर्थ में अपनी जगह बना ली। भारोपीय धातु डेक की रिश्तेदारी संस्कृत की धातु दीक्ष् और दक्ष् से है जिनसे बने दीक्षा और दक्ष शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित हैं। पहले बात दक्ष की। दक्ष का मतलब होता है एक्सपर्ट, कुशल, विशषज्ञ, योग्य, चतुर आदि। पौराणिक चरित्र को तौर पर दक्ष प्रजापति का नाम भी इसी धातु से जुड़ा है। आप्टे कोश के मुताबिक दक्ष शिव का एक विशेषण भी है। अग्नि, नंदी को भी दक्ष कहा गया है। इसी तरह बहुत सी प्रेमिकाओं पर आसक्त प्रेमी को भी दक्ष कहा गया है। इसी तरह दीक्षा शब्द का मतलब है यज्ञ करना, धार्मिक क्रिया के लिए तैयार करना, खुद को किसी शिक्षा, ज्ञान के संस्कार के लिए तैयार करना आदि। इससे बने दीक्षक: का अर्थ है शिक्षक या शिक्षा देनेवाला। दीक्षणम् का अर्थ है ज्ञान प्रदान करना, शिक्षा देना। इसी तरह दीक्षित का अर्थ है शिक्षित, प्रशिक्षित, शिष्य, पुरोहित, उपाधि प्राप्त आदि।

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Thursday, October 8, 2009

बैजनाथ की वेदना और बैदजी [हकीम-3]

vaidya_thumb[7] "विद् से ही बना है विद्या जिसका मतलब है ज्ञान, शिक्षा, आगम आदि। चिकित्सा या रोगोपचार दरअसल विद्याए हैं यानी ये विशिष्ट ज्ञान हैं।."

वै द्य या वेदना में कुछ संबंध जुड़ता है? ज़रूर जुड़ता है। वैद्य यानी चिकित्सक का पाला हमेशा ऐसे लोगों से ही पड़ता है जो शारीरिक-मानसिक वेदनाओं से ग्रस्त रहते हैं। इन वेदनाओं का निदान करनेवाला ही डॉक्टर, चिकित्सक अथवा वैद्य होता है। प्राचीनकाल से ही ज्ञान परम्परा में चिकित्सा ज्ञान सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा है। भारतीय मनीषा का जैसा अजस्र प्रवाह दर्शन के क्षेत्र में नज़र आता है, वैसा ही या उससे अधिक आयुर्वेद में नज़र आता है। प्रायः सभी मानव समुदायों ने आदिम युग में भय, आहार, निंद्रा, मैथुन जैसी जैविक इच्छाओं से परे हटकर जिस विषय में सबसे पहले अपनी प्रज्ञा को केंद्रित किया होगा वह आयुर्वेद अर्थात रोग-चिकित्सा ही रहा होगा। आयुर्वेद शब्द हमारा पौराणिक ब्रांड है वर्ना आयुर्वेद के तहत जो कुछ आता है, कमो-बेश उस बारे में दुनियाभर के प्राचीन मानव समाजों में परम्पराएं और संचित ज्ञान अब सामने आ रहा है।
हरहाल बात वैद्य और वेदना की चल रही थी। ये दोनों ही शब्द एक ही मूल से उपजे हैं। हकीम और चारागर की तरह ही यह वैद्य शब्द भी ज्ञान परम्परा से आ रहा है। इस शब्द का मूल विद् भारोपीय भाषाओं की उन चुनींदा धातुओं में है जिससे दर्जनों भाषाओं में सैकड़ों शब्द बने हैं और आज भी बन रहे हैं। वैद्य की अर्थवत्ता प्राचीनकाल में चिकित्सक के सीमित दायरे में नहीं थी बल्कि वेद-शास्त्रों का ज्ञाता, पण्डित, आध्यात्मिक और विद्वान पुरुष वैद्य कहलाता था। बाद में इसके साथ आयुर्वेद संबंधी जानकार अर्थ भी जुड़ा और फिर यह हकीम के अर्थ में सीमित हो गया। वैद्य शब्द बना है संस्कृत के वेद

... केवल अंग्रेजी में ही करीब दो दर्जन से ज्यादा शब्दों की इसी विद् से रिश्तेदारी हैं। अन्य योरपीय भाषाओं में भी इसका योगदान है । knowledge_thumb[2] इसी से बना है वेद जो भारतीय जीवनदर्शन, धर्म-परंपरा के ज्ञान का भंडार है। यही वेद अवेस्ता(फारसी का प्राचीनतम् रूप) मे वैद , प्राचीन स्लाव में वेडे, लैटिन में वीडियो या वीडेयर, अंग्रेजी में वाइड या वाइस, विज़न,(टेलीविज़न में यही विज़न समाया है ), जर्मन में वेस्सेन के रूप में भी अपनी खास पहचान बनाए हुए हैं। ये तमाम शब्द अपनी इन भाषाओं में भी देखना, जानना, ज्ञान या परखना जैसे अर्थ बतलाते है। विद् ने ही ग्रीक में आईडेन का रूप लिया जिसका मतलब था देखना। वहां से यह अंग्रेजी के आईडिया, आईडियल जैसे अनेक शब्दों में ढल गया।...

से जिसका मतलब है ज्ञान, आध्यात्मिक चिंतन। देखना, समझना, सोचना जैसे भाव इसमें निहित हैं। वैद्य से बना वैद्यक जिसमें आयुर्विज्ञान, चिकित्साकर्म, आरोग्य शास्त्र का भाव निहित है। हिन्दी में इससे वैद्यकी शब्द बना है। बैजनाथ शब्द वैद्यनाथ का ही अपभ्रंश है। वैद्य को देशी रूप में बैज्जी भी उच्चारित किया जाता है और बैद भी। वेद बना है विद् धातु से जिसमें जानना, सीखना, समझना, अनुभव करना, मानना, व्याख्या-विवेचना करना जैसी बातें आती हैं। भारतीय मनीषा, प्रज्ञा का भण्डार हैं वेद जिनका नामकरण इसी मूल से हुआ है।
गौर करें कि जानना, सीखना, समझना, अनुभव करना, ये तमाम भाव कुछ पाने से सम्बंधित हैं। विद् का पूर्ववैदिक रूप रहा होगा वित्त। द वर्ण दरअसल अपने वर्ग में त के बाद आता है। वित्त का मतलब आज के अर्थ में तो धन, सम्पत्ति, अर्थ, ज़ायदाद, दौलत और द्रव्य होता है किन्तु प्राचीनकाल में इसमें भी सिर्फ प्राप्ति का ही भाव था जाहिर है इन प्राप्तियों में ज्ञान से लेकर द्रव्य (भौतिक पदार्थ) तक सब समाविष्ट था। धन-सम्पत्ति कुल मिलाकर प्राप्तियां ही हैं। कालांतर में वित्त का अर्थ धन सम्पत्ति तक सीमित हुआ और विद् का दायरा ज्ञान, समझ, चिन्तन तक। वित्त का क्षेत्र अब फाइनांस कहलाता है। जो कुछ भी प्राप्त हो, लब्ध (उपलब्ध) हो, जिस पर कब्जा हो सके, अवाप्त किया जा सके, जिसके बदले में द्रव्य अथवा मूल्य प्राप्त हो सके, जिससे किसी को उपकृत किया जा सके, पुरस्कृत किया जा सके और दान किया जा सके वह सब वित्त के दायरे में आता है। वित्त से ही बना है वेतन जो जिससे आज की दुनिया चलती है। ‘वेतन’ के बिना ‘तन’ किसी काम का नहीं।
विद् से ही बना है विद्वान। धनवान, शौर्यवान की तरह विद्वान अर्थात जो सबकुछ जानता है। गौर करें विद् शब्द के उपसर्ग के रूप में प्रयोग पर। विद् का यहां अर्थ होता है जानकार, समझदार। विद्वान शब्द की उत्पत्ति इसी विद् से हुई है। किसी शब्द के साथ विद् इसे लगा दिए जाने पर मतलब निकलता है जाननेवाला, मसलन भाषाविद् यानि भाषा का जानकार। इसी तरह जाननेवाले के अर्थ में उर्दू-फारसी में दाँ लगाया जाता है जैसे कानूनदां, अंग्रेजीदां, फारसीदां, साइंसदां वगैरह। यह दां भी इसी विद् का रूप है। विद् से ही बना है विद्या जिसका मतलब है ज्ञान, शिक्षा, आगम आदि। चिकित्सा या रोगोपचार दरअसल विद्याए हैं यानी ये विशिष्ट ज्ञान हैं। इसी कड़ी में विद्यार्थी, विद्यालय, विद्यापति जैसे शब्द आते हैं। ज्ञान के अर्थ में ही विद् धातु से वेदनम् या वेदना शब्द बना था। मूलतः इसका अर्थ था अनुभूति, प्रत्यक्ष ज्ञान, भावना आदि। अनुभूति के विभिन्न आयाम भी इसमें समाहित हुए। सुखानुभूति और दुखानुभूति दोनों ही। विद् की व्यापक अर्थवत्ता ने ज्ञान के अर्थ में इतने शब्द सृजित किए कि ज्ञान-अनुभूति की अर्थवत्ता वाला वेदना शब्द पीड़ा के अर्थ में सिमट गया। पीड़ा भी अनुभूति है और अनुभूति ज्ञानबोध को ही कहते हैं।
हाभारत के प्रसिद्ध पात्र, पांडु के छोटे भाई और दासीपुत्र विदुर को मनीषी और बुद्धिमान मनुष्य के तौर पर दर्शाया गया है। विदुर का अर्थ ही है मनीषी, विद्वान या बुद्धिमान पुरुष। उनकी कार्यशैली पांडवों के लिए फायदेमंद रहती थी। विदुरनीति शब्द से भी बुद्धिमानीपूर्ण बात ही स्पष्ट होती है। यह शब्द विद् धातु से बना है। गौर करें कि अत्यधिक ज्ञान भी घातक होता है। इसलिए संस्कृत में धूर्त और षड्यंत्रकारी को भी विदुर कहा गया है।

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Wednesday, October 7, 2009

चारागर का चालचलन [हकीम-2]

CharakSanhita
जो दवा के नाम पे जहर दे, उसी चारागर की तलाश है’ बचपन से यह कव्वाली सुनते आ रहे हैं। बरसों तक इसमें आए चारागर शब्द का मतलब ही नही पता था। बाद में चिकित्सक, हकीम या डॉक्टर के बतौर इसका मतलब पता चला। शब्दों के सफर में निकले तब जान पाए कि चारागर का रिश्ता किस तरह इलाज करनेवाले से जुड़ता है।

पिछली कड़ी-अल्लाह की हिक्मत और हुक्मरान [हकीम-2]

चा  रागर शब्द यूं तो फारसी ज़बान से हिन्दी में आया है मगर यह मूलतः इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और इसका रिश्ता संस्कृत-अवेस्ता से है। संस्कृत में एक धातु है चर् जिसमें घूमना-फिरना, गति, चलना, चक्कर काटना, भ्रमण करना आदि भाव हैं। यूं चर् धातु में विभिन्न तरह के दैनन्दिन क्रियाकलाप शामिल हैं जिनमें एक भोजन करना भी इसका अर्थ है। आपटे कोश में इस धातु का परम अर्थ दिया है वह है चलते जाना, जीना, किसी न किसी अवस्था में विद्यमान रहना। यही बात प्रसिद्ध उक्ति चरैवेति-चरैवेति के दार्शनिक अर्थों में भी समायी है। अरब के हकीम  शब्द की तरह ही चारागर शब्द भी ज्ञानपरम्परा से अपनी अर्थवत्ता ग्रहण करता है, मगर ज़रा दूसरे ढंग से। हकीम शब्द बना है सेमिटिक धातु ह-क-म (हा-काफ-मीम) से। इस धातु में बुद्धिमान होना, जानकार होना, ज्ञान और अपने आसपास की जानकारी होने का भाव है।

kerela_ayurveda गौर करें चर् धातु का ही अगला रूप चल् है जिसमे हिलना, गति करना, कांपना, धड़कना, सैर करना जैसे भाव हैं। हिन्दी का चल, चलना, चलित, चालित जैसे शब्द इससे ही बने हैं। पहाड़ स्थिर होते हैं, कभी चलते नहीं इसलिए चल् में उपसर्ग लगने से मनुष्य ने पर्वत के लिए अचल शब्द बना लिया जिसका लाक्षणिक अर्थ हुआ जो अडिग रहे, टस से मस न हो। चलते-चलते एक लीक बन जाती है। यही चलन है अर्थात ढंग, रीत। प्रचलन भी इससे ही बना है जिसका मतलब भी परम्परा ही है। मार्ग से भटकना अथवा गलत राह पर चलना ही विचलन है। चर् धातु के घूमने फिरने के अर्थों से ही बना है विचरण। घुमक्कड़ी और पर्यटन का ज्ञान से गहरा रिश्ता है। यायावरी अर्थात अर्थात विचरण से जिसने जैसा ज्ञान अर्जित किया वही उसका चरित्र बना। इसमें व्यभि लगने से बना व्यभिचार अर्थात गलत राह पर चलना, कपटपूर्ण व्यवहार, विश्वासघात आदि।  आचरण शब्द भी इसी मूल से आ रहा है। चल् से बने चलन से हिन्दुस्तानी में एक मुहावरा बना चाल-चलन जिसे किसी व्यक्ति के मूल्यांकन का आधार माना जाता है। दरअसल यही चरित्र है। जीवनी, इतिहास और साहस कथाओं के लिए चरित शब्द भी इसी मूल से निकला है जैसे दशकुमारचरित, रामचरितमानस आदि।

नुष्य के लिए घूमना सिर्फ आहार की खोज नहीं था बल्कि उसके भीतर दुनिया को जानने-समझने की सहज जिज्ञासा थी। जिज्ञासा यानी मानसिक भूख। प्राचीन मानव स्वभाव से घुमक्कड़ था। यायावर प्रकृति ने ही मनुष्य को विचारशील बनाया। उससे नई नई खोज करवाई। चर् धातु में वि उपसर्ग लगने से ही बना है है विचार जिसमें सोच, ज्ञान, विमर्श, बातचीत जैसे भाव शामिल हैं। विचार का अर्थ उपाय भी होता है। घुमक्कड़ी वही नही है जो बाहर होती है। एक यात्रा मन की होती है जिसे चिंतन कहते हैं। चिंतन-मनन के दौरान ही विचार उत्पन्न होते हैं। चर् से ही बना है विचरण जिसमें गति का भाव है। स्पष्ट है कि मन की गति ही विचारों को जन्म देती है। पशुओं की आहार समस्या का निदान चारा है। मनुष्य की मानसिक खुराक विचार है। फारसी में चारा शब्द में उपाय की अर्थवत्ता समा गई। प्रकृति ने सभी जीवधारियों को पैदा किया। जीव के जन्म के साथ ही गति, हलचल जुड़ी है। आहार जुटाने के लिए प्रत्येक जीवधारी अनादिकाल से ही नानाविध जतन करता आ रहा है। कारोबारे-दुनिया की सभी क्रियाएं मूलतः आहार जुटाने की कोशिश ही है।

चरणवंदना क्यों...हिन्दी में चरणवंदना की अर्थवत्ता अब बदल गई है और इसका अर्थ चापलूसी से लगाया जाता है। 1216721627lakshmi_padukaवैसे चरणस्पर्श की परम्परा के पीछे गहरी सोच छुपी है। चरण शब्द बना है संस्कृत के चरणः से जिसका जन्म हुआ है चर् धातु से। इसका अर्थ है चलना, भ्रमण करना, अभ्यास करना आदि। एक अन्य अर्थ भी है – सृष्टि की समस्त रचना। इसी से बना है चरण जिसका मतलब है पैर यानी जो चलते-फिरते हैं, भ्रमण करते हैं। गौरतलब है कि प्राचीनकाल में ज्ञानार्जन का बड़ा ज़रिया देशाटन भी था। चूंकि घूमें-फिरे बिना दुनिया की जानकारी हासिल करना असंभव था इसलिए जो जितना बड़ा घुमक्कड़, उतना बड़ा ज्ञानी। चूंकि पैरों से चलकर ही मनुष्य ने ज्ञानार्जन किया है इसीलिए प्रतीकस्वरूप उन्हे स्पर्श कर उस व्यक्ति के अनुभवों को मान्यता प्रदान करने का भाव महत्वपूर्ण है। घूमने फिरने पुराने जमाने में राजाओं के संदेश लाने ले जाने का काम करनेवाले दूतों को भी चर या चारण कहते थे । राजस्थान की एक जाति का नाम भी इसी आधार पर पड़ा है।

कम से कम कहावतों-मुहावरों में तो यही सच है। चर् धातु में गति और हलचल के भाव को मनुष्य द्वारा रोजीरोटी जुटाने प्रयास के तौर पर ही देखना चाहिए। चारा शब्द को आमतौर पर पशुआहार के रूप में देखा जाता है जो इसी मूल से जन्मा है। गौर करें मवेशी चलते-चलते घास खाते हैं इसीलिए चरना में घास खाने का भाव ही निहित है। चरागाह या चारागाह शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं।
किन्हीं समस्याओं के निदान के लिए विचार-विमर्श एक अनिवार्य प्रक्रिया है। अर्थात वैचारिक आदान-प्रदान जो दरअसल यात्रा है, विचरण है। प्राचीनकाल में किसी रोग का इलाज करना दरअसल उपाय तलाशना ही था। रोग समस्या है और चारा इलाज। अर्थात जो महानुभाव चारा यानी निदान प्रदान करे, वह चारागर है। इसीलिए इलाज के अर्थ में चारागरी शब्द प्रचलित हुआ। जब किसी समस्या का कोई हल या इलाज न निकले तब क्या होता है सिवाय इसके कि आप असहाय महसूस करें सो चारा में अरबी-फारसी का ला उपसर्ग लगने से लाचार, लाचारी जैसे शब्द बने। इन्ही हालात को बयां करने के लिए अरबी का बे उपसर्ग लगने से बने बेचारा, बेचारगी जैसे शब्द। हिन्दी में इनके बिचारा, बिचारी जैसे रूप भी प्रचलित हैं। देहात में किसी बच्चे को अगर कोई बिचारा कह दे तो उसके माता-पिता बुरा मान जाते हैं। जाहिर है बिचारा को अनाथ के अर्थ मे देखा जाता है।
र् धातु से संस्कृत में एक शब्द बना है चर्या जिसका अर्थ गतिविधि, घूमना-फिरना ही है मगर देखभाल करने का भाव शामिल हो गया है। दिनचर्या का मतलब हुआ दिनभर के क्रियाकलाप। प्राचीनकाल में इस खाते में ज्यादातर घुमक्कड़ी ही आती थी। इसमें परि उपसर्ग लगने से बना है परिचर्या यानी देखभाल करना। गौर करें इसमें मूलतः घूमफिर कर देखभाल करने का भाव शामिल है। इससे ही बने परिचर शब्द में यह भाव और भी स्पष्ट हो रहा है जिसका अर्थ सेवा-टहल करनेवाला ही होता है। अनुचर का मतलब हुआ पीछे चलनेवाला अर्थात सहायक, टहलुआ।  इलाज के अर्थ में हिन्दी में उपचार शब्द प्रचलित है। यह भी चर् धातु में उप उपसर्ग लगने से बना है। उपचार में फारसी के चारा शब्द का अर्थ स्पष्ट है। चर् शब्द में उपाय, इलाज जैसे शब्दों की पूर्णता सिद्ध होती है आयुर्वेद के महान महर्षि चरक के नाम से जो इसी धातु से बना है। चरक भारतीय ओषधि विज्ञान के प्रणेता माने जाते हैं। चरक संहिता भारतीय शैली की वैद्यक परम्परा का विलक्षण ग्रन्थ माना जाता है। ये ईसा की पहली सदी में हुए थे। चरक संहिता में विभिन्न रोगों का उपचार बताया गया है। यूं चरकः का अर्थ होता है दूत, रमता जोगी अथवा परिव्राजक। गौर करें, परिव्राजक का अर्थ होता है जिसने घर त्याग दिया हो। व्रज् धातु में जाना, गमन करना का भाव है।

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Tuesday, October 6, 2009

कोर्ट में गुस्से का इजहार [बकलमखुद-108]

पिछली कड़ी- जेके फैक्टरी में छंटनी का मामला [बकलमखुद-107]

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और 108वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

कं पनी के निर्णय को रिट याचिका में चुनौती देना संभव नहीं था। सरकार को पक्षकार होना आवश्यक था। जे.के. सिंथेटिक्स जैसे बड़े औद्योगिक संस्थान को छंटनी करने के पहले सरकार की अनुमति लेना कानूनन आवश्यक थी। यहाँ से गली निकाली गई। रिट याचिका प्रस्तुत हुई और आगे छंटनी पर रोक लग गई। पर रोक लगने के पहले कर्मचारी बेरोजगार हो चुके थे। कंपनी ने कानून को ही चुनौती देते हुए असंवेधानिक बताया। मामला पूर्णपीठ तक पहुँचा। दो जजों ने कंपनी के मत को और एक जज ने मजदूरों के पक्ष को उचित मानते हुए निर्णय दिया। मजदूरों ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। जहाँ से राहत मिली कि प्रबंधन हर छंटनीशुदा मजदूर को छंटनी की तारीख से प्रतिमाह एक तिहाई वेतन अदा करेगा। यह कानून की जीत थी, जिस में मजदूरों को जीने का सहारा मिला था।
तने सारे मजदूरों की छंटनी ने कोटा नगर की रौनक को छीन लिया था। मजदूरों का सारा वेतन बाजार में आता था। वह बाजार से हटा तो वहाँ सन्नाटा पसर गया। सरदार का निर्णय सही था कि उसे यूनियन पर निर्भर होने के स्थान पर वकालत में अपना स्थान बनाना चाहिए। वह मजदूरों की वकालत करना चाहता था और वह उसे मिल गई थी। प्रारंभिक मुकदमों के परिणामों ने उस की काबिलियत को सिद्ध कर दिया था। उस के पास सभी रंगों के और बिना रंगों के मजदूर आने लगे। उस ने भी अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता को मजदूरों की पैरवी करने के आड़े नहीं आने दिया और उन की निष्ठा के साथ वकालत की। उस पर ठप्पा लग गया कि वह मजदूरों का बेहतरीन और विश्वसनीय वकील है, रोजी-रोटी चलने लगी। इस बीच घऱ में दो बहनों के विवाह हुए, दादा जी और दादी ने विदा ली।
छंटनी के बाद मालिक परस्त यूनियन ने हड़ताल की घोषणा कर दी तो जवाब में मालिकों ने तालाबंदी घोषित कर दी। दोनों की मिलीभगत से कारखाने छह माह बंद रहे। छह माह बाद जिस दिन कारखाने वापस आरंभ करने थे पूरे इलाके को पुलिस छावनी में बदल दिया गया। जिसे चाहा उसे काम पर लिया, जिसे चाहा उसे न लिया। काम पर न लिए जाने वाले जिन मजदूरों ने कहा उन की छंटनी नहीं हुई है, उन्हें काम पर लिया जाए। उन्हें पुलिस पकड़ कर ले गई और शांति भंग करने की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। साधारणतः ऐसे लोगों को जमानत पेश करते ही छोड़ देना चाहिए। लेकिन उन से प्रमाणित हैसियत वाले व्यक्तियों की जमानत मांग कर कुछ दिन के लिए उन्हें जेल भेजने की व्यवस्था की गई ताकि मजदूरों में आतंक व्याप्त रहे। सरदार ने जेल में बंद मजदूरों की जमानत के लिए जमानतियों की हैसियत तस्दीक करवाने के लिए उन के रिश्तेदारों द्वारा नगरपरिषद और पटवारी की रिपोर्ट करवा कर लाए गए दस्तावेज तहसीलदार की अदालत में दाखिल किए तो उस के रीडर ने उन कागजों पर तस्दीक करने से मना कर दिया। पता लगा जिला कलेक्टर के निर्देश हैं कि जब तक हो सके हैसियतें तस्दीक न की जाएँ। सरदार ने नाराजगी दिखाते हुए कि जब इन दस्तावेजों की कोई कीमत नहीं तो इन का होना बेकार है, उन्हें अदालत में ही टुकड़े-टुकड़े कर जमीन पर डाल दिया। पंखे की हवा ने उन्हें अदालत कक्ष के कोने-कोने में फैला दिया और व्यवस्था को जितना बुरा भला कहना था कहते हुए अदालत से बाहर आ गया।
जेल में बंद मजदूरों के रिश्तेदार जो मुश्किल से नगरपरिषद और पटवारी के तीन दिनों तक चक्कर काट कर जो दस्तावेज लाए थे, उन्हें इस तरह चिंदी-चिंदी होते देख रुआँसे हो गए, अब उन का रिश्तेदार जाने कब जेल से बाहर आएगा? तहसीलदार अदालत में न हो कर अपने चैंबर में था। उस के कानों मे रुष्ट आख्यान के स्वर पहुँचे। चपरासी को दौड़ा कर सरदार को बुलाया। पूछा-क्या हुआ वकील साहब क्यों गुस्सा कर रहे थे? शांतिपूर्वक कहा गया कि कुछ नहीं, जो दस्तावेज राजाज्ञा के सामने न्याय को बेकार कर दें, उन का न रहना ही ठीक था उन्हें फाड़ कर आप की अदालत में छोड़ आया हूँ। तहसीलदार ने जो कभी बिना दस्तावेजों के किसी की हैसियत तस्दीक नहीं करता था बिना उन के हैसियत तस्दीक की। सरदार को पता लगा कि राजाज्ञा से डरने वाला अफसर, जनता की आवाज से अधिक डरता है। उस ने इस नुस्खे का बहुत बार उपयोग किया और यह भी अनुभव किया कि इस नुस्खे का उपयोग केवल सरकारी अफसरों पर केवल तब किया जा सकता है, जब अपना का पक्ष न्यायपूर्ण हो और अफसर गलती पर हो। स्वर ऊँचे तभी किए जा सकते हैं, जब आप खुद धब्बेदार न हों। तहसीलदार का हैसियत प्रमाणपत्र पेश कर देने पर भी मजिस्ट्रेट जमानतें लेने से हिचकिचाता रहा। उस ने जमानतें तभी तस्दीक की जब उसे जिला कलेक्टर ने हरी झंडी दे दी।
श्रम न्यायालय का काम इतना बढ़ गया था कि अक्सर सुबह ग्यारह बजे सरदार वहाँ प्रवेश करता तो शाम तीन बजे तक निकलना संभव न हो पाता। इस से दूसरे-दूसरे मुकदमों की पैरवी में बाधा आने लगी। उस ने तय किया कि कम से कम अपराधिक मुकदमें किसी और को दे दिए जाएँ। एक वकील साहब से बात कर साठ-सत्तर मुकदमे उन्हें दे दिए गए। वे सरदार के मुवक्किलों को संतुष्ट न रख सके। मुवक्किलों ने उन्हें छोड़ अपने हिसाब से वकील कर लिए। 1985 में पुरानी सूती मिल सुदर्शन टैक्सटाइल्स संकट में आ गई। मिल मालिकों ने सरकार के पास मिल बंद करने और मजदूरों की छंटनी करने की अनुमति के लिए आवेदन किया। सरकार परेशानी में पड़ गई। मिल बंद करने की अनुमति दे कर मजदूरों को कैसे नाराज करे? आखिर वे वोट भी थे। सरकार ने खुद तो मालिकों को अनुमति नहीं दी लेकिन मामला अदालत को पुनरावलोकन के लिए भेज दिया।
मामले की सुनवाई रोज होनी थी। वह नब्बे दिन तक चलती रही, अदालत ने दोनों पक्षों की गवाहियाँ लीं। निर्णय दिया कि मालिकों को मिल बंद करने की अनुमति देना उचित होगा। मिल बंद कर दी। मजदूर मुकदमा ले कर हाईकोर्ट चले गए। वहाँ कोई पन्द्रह साल बाद फैसला हुआ कि मिल को बंद करने की अनुमति देना गलत था। तब तक मिल की मशीनें और इमारत इस काबिल न रह गई कि उसे चालू किया जा सके। मिल के प्रबंधक सुप्रीमकोर्ट चले गए। मिल के मजदूर अभी भी राहत की उम्मीद लगाए, बिजली पानी की सुविधा से वंचित मिल की जर्जर क्वार्टरों में निवास करते हुए जैसे-तैसे फुटकर मजदूरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा में जी रहे हैं।

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Monday, October 5, 2009

रोड इंस्पेक्टर और रहनुमा[सफर के रास्ते-2]

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प्रा चीन संस्कृत धातु ऋत् और ऋष् में निहित गतिसूचक भावों का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। संस्कृत धातु से बना है ऋत् जिसमें उचित राह जाने और उचित फल पाने का भाव तो है ही साथ ही चक्र, वृत्त जैसे भाव भी निहित हैं। भाषा विज्ञानियों ने इससे मिलती जुलती धातु प्राचीन इंडो यूरोपीय भाषा परिवार में भी खोजी है-reidh इस धातु की व्याप्ति यूरोपीय भाषाओं के कई शब्दों में है। से बने शब्द रिष् या ऋष् की छाया फारसी के रशद या रुश्द जैसे शब्दों में नजर आती है जिनका का अर्थ है सन्मार्ग, दीक्षा और गुरू की सीख। उचित राह पर कुशल मार्गनिर्देशन में आगे बढ़ना है रुश्द का सही मतलब।
मार्ग के अर्थ में हिन्दी में प्रचलित राह या रास्ता जैसे शब्द वैसे तो उर्दू-फारसी के जरिये हिन्दी में आए हैं मगर इनका रिश्ता भी से ही है। फारसी में रास के मायने होते हैं पथ, मार्ग। इसी तरह रस्त: या राह का अर्थ भी पथ या रास्ता के साथ साथ ढंग, तरीका, युक्ति भी है। उर्दू-हिन्दी में प्रचलित राहगीर, राहजनी, राहनुमा [रहनुमा] और राहत, राहबर, राही जैसे ढेरों शब्द भी इससे ही बनें हैं। है। इसी तरह देवनागरी के वर्ण के मायने गति या वेग से चलना है जाहिर है से अवेस्ता में रस्तः शब्द बना जिसका फारसी रूप हुआ रास्तः जिसका मतलब है पथ, मार्ग, सरणि, पंथ आदि। फारसी-उर्दू में राह भी प्रचलित है और यह भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है। गौर करें कि पथ अथवा मार्ग की बनावट पर, इसके स्वभाव पर। यह एक रेखा होती है जो दो बिंदुओं को मिलाती है। रास्ता भी हमें कहीं न कहीं पहुंचाता है।मार्ग या राह का अर्थ भी इसमें छुपा है। इसी मूल से उपजा है हिन्दी का रिश्ता जो मूलतः फारसी से आया है। फारसी में रिश्ता का शुद्ध रूप है रिश्तः जिसका मतलब होता है धागा, सूत्र,KONICA MINOLTA DIGITAL CAMERA डोरी, लाइन, कतार, भूमि की माप करने की डोरी अथवा सूत्र। रिश्तः और रास्तः की समानता काबिलेगौर है। यूं भी रास्ता किन्हीं दो बिंदुओं के बीच का रिश्ता ही है।
हिन्दी में रास्ता या मार्ग के अर्थ में रोड शब्द भी समा चुका है जो इसी शृंखला का शब्द है और reidh धातु से बना है। यह बना है प्राचीन इंग्लिश के rad से जिसमें सवारी या सैर करने का भाव है। जाहिर है सवारी में यात्री और यान दोनों का भाव है जिनका संबंध गति और सैर से है। इन्हीं भावों का समावेश road रोड यानी राह में हुआ अर्थात दो स्थानों के बीच का सम्पर्क मार्ग। रोड इंस्पैक्टरी या रोड इंस्पैक्टर इन दिनों हिन्दी का नया मुहावरा है जिसका अर्थ फालतू घमना, बेकार भटकना है। भाव बेरोजगारी से है। सड़कें नापना मुहावरे का भी यही अर्थ होता है। रोड का संबंध अंग्रेजी के राईड ride से है जिसका अर्थ चढ़ना, सवारी करना आदि है। इसी धातु से बना है reda जिसका अर्थ होता है यान, वाहन। संस्कृत के रथ rath से इसकी समानता पर गौर करें। रथ और रित् की समानता भी यूं ही नहीं है। रथ में जो आवर्त यानी घूमने, गति करने का भाव है वह उसके पहियों से आ रहा है। वृत्त, आवृत्ति, ऋतु आदि का चक्र समझना आसान है। सैर भी एक चक्र है। एक बिन्दु से शुरू होकर फिर उसी बिन्दु पर पहुंचना ही घूमना है। पुनि जहाज पे आवै का यह क्रम जब खत्म होता है, तब घुमक्कड़ी का लक्ष्य अनंत की ओर होता है जहां से वापसी नहीं होती। वह प्रयाण नहीं, महाप्रयाण होता है। उसे गमन नहीं, निर्वाण कहते हैं।
हिन्दी का मार्ग शब्द बना है संस्कृत की मृग् धातु से जिसमें खोजना, ढूंढना, तलाशना जैसे भाव निहित हैं। आमतौर पर हिन्दी में मृग से तात्पर्य हिरण प्रजाति के पशुओं जैसे सांभर, चीतल से है मगर इस शब्द की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। वैदिक काल में संस्कृत में मृग का अर्थ हिरण तक सीमित न होकर किसी भी पशु के लिए था। मृग शब्द का अर्थ हरी घास भी प्राचीनकाल में मृग शब्द में चरागाह या चरने का भाव प्रमुख था। संस्कृत शब्द मृगणा का अर्थ होता है अनुसंधान, शोध, तलाश। मृगया में शिकार का भाव है। जिस तरह से चर् धातु में चलने, गति करने का भाव प्रमुख है उसी के चलते इससे चारा (जिसका भक्षण किया जाए), चरना (चलते चलते खाने की क्रिया), चरागाह (जहां चारा हो) जैसे विभिन्न शब्द बने है। कुछ यही प्रक्रिया मृग के साथ भी रही। पथ, राह, रास्ता के अर्थ में संस्कृत का मार्ग शब्द है जो इसका ही रूपांतर है। मार्ग में भी खोज और अनुसंधान का भाव स्पष्ट है। कभी जिस राह पर चल कर मृगणा अर्थात अनुसंधान या तलाश की जाती थी, उसे ही मार्ग कहा गया।

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Sunday, October 4, 2009

पतली गली से गुज़रना [सफर के रास्ते-1]

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वारगी या बेबसी के आलम में डोलते फिरने के लिए एक कहावत मशहूर है- गली गली फिरना या गलियों की खाक छानना। गली कहते हैं उस पतले, संकरे रास्ते को जो आबादी की भीतरी बसाहट में मकानों की दो कतारों के बीच की राह  होती है। यह रास्ता आमतौर पर मुख्य मार्ग पर खुलता है। आबादी सड़कों पर नहीं, गलियों में बसती है सो भटकन अगर गलियों में है तो समझ लें कि भटकनेवाला पूरे शहर से रूबरू हो रहा है क्योंकि चंद सड़कों की खाक छानने से उसका मसला हल होने वाला नहीं। आजकल एक मुहावरा और प्रचलित है-पतली गली से निकलना जिसका मतलब हुआ लोगों की निगाह से बचना या छुपने की कोशिश करना। इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि गलियां राहगुज़र के साथ साथ छुपने-छुपाने का जरिया भी हैं। समाज की भटकन, समस्याएं, असंतुलन, कुरूपता सबकुछ गलियों में पनाह पाता है। गली का चरित्र और रूप चाहे राह का है मगर इसके गुणसूत्रों में छुपने का भाव है।
गली/गला
हिन्दी का गली शब्द बना है संस्कृत की गल् धातु से जिसका अर्थ है टपकना, चुआना, रिसना, पिघलना आदि। गौर करें इन सब क्रियाओं पर जो जाहिर करती हैं कि कहीं कुछ खत्म हो रहा है, नष्ट हो रहा है। यह स्पष्ट होता है इसके एक अन्य अर्थ से जिसमें अन्तर्धान होना, गुजर जाना, ओझल हो जाना या हट जाना जैसे भाव हैं। कोई वस्तु अनंत काल तक रिसती नहीं रह सकती। स्रोत कभी तो सूखेगा अर्थात वहां जो पदार्थ है वह अंतर्धान होगा। गल् धातु से ही बना है संस्कृत का गलः जिसका मतलब होता है कंठ, ग्रीवा, गर्दन आदि। इन शब्दों के लिए हिन्दी में गला शब्द सर्वाधिक प्रचलित है जो गल् धातु से बने गलः का ही अपभ्रंश रूप है। गला हमारे आहारतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है। हिन्दी में गले से जुड़े कई महावरे प्रसिद्ध हैं जैसे गला पकड़ना यानी जबर्दस्ती किसी बात के लिए उत्तरदायी बनाना, गला छुड़ाना यानी पीछा cv35 छुड़ाना, गला फाड़ना यानी ऊंचे सुर में बोलना, गले न उतरना यानी किसी बात को स्वीकार न कर पाना, गले उतारना यानी अनिच्छापूर्वक किसी बात पर राजी होना आदि।
मुंह में जो कुछ भी डाला जाता है वह गले में जाते ही अंतर्धान हो जाता है, गायब हो जाता है। किसी चीज़ की बरामदगी के लिए हलक से निकलवाना जैसा मुहावरा इसीलिए कहा जाता है क्योंकि गायब करने के लिए पेट से बढ़कर और कोई गुप्त जगह नहीं। आज भी शातिर लोग कीमती चीज़ों को हलक में डाल लेते हैं। निगलना शब्द इसी मूल से बना है। गले की आकृति पर ध्यान दें। यह एक अत्यधिक पतला, संकरा, संकुचित रास्ता होता है। गली का भाव यहीं से उभर रहा है। कण्ठनाल की तरह संकरा रास्ता ही गली है। गली से ही बना है गलियारा जिसमें भी तंग, संकरे रास्ते का भाव है। गल् में निहित गलन, रिसन के भाव का अंतर्धान होने के अर्थ में प्रकटीकरण अद्भुत है। कुछ विद्वान गलियारे की तुलना अंग्रेजी शब्द गैलरी gallery से करते हैं।  मगर ज्यादातर इसे ध्वनिसाम्य का शब्दकौतुक ही मानते हैं। इसकी व्युत्पत्ति अज्ञात है।  गैलरी शब्द के प्राचीन रूप और अर्थ संदर्भ गल्, गलः और गली से मेल नहीं खाते। इसके प्राचीन अर्थों में चर्च का पोर्च जैसा भाव था जिसमें संकरापन ढूंढना मुश्किल है। यूं भी यूरोपीय चर्च अपनी विशालता और भव्यता के लिए ही मशहूर हैं।
सड़क
संस्कृत में एक क्रिया है सृ जिसका मतलब होता है जाना, तेज-तेज चलना, धकेलना, सीधा वगैरह। हिन्दी का सड़क शब्द भी सृ से ही जन्मा है। सृ के गति वाले भाव से संबंधित सड़क शब्द मूल रूप से संस्कृत में सरक: के रूप में मौजूद है जहां इसका मतलब राजमार्ग, सीधा चौड़ा रास्ता है। संस्कृत, हिन्दी, बांग्ला रास्ते या राह के लिए सरणि शब्द भी यहीं से पैदा हुआ। यही नहीं किसी राह या रास्ते पर चलना, किसी के पीछे चलना जैसे भावों को उजागर करने वाले सरण, अनुसरण जैसे शब्दों में भी संस्कृत मूल का सृ शब्द है।

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Saturday, October 3, 2009

आस्तीन में सरसराया सांप

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ते ज गति से चलने या भागने के लिए हिन्दी का एक शब्द है सरपट। इसी तरह एक शब्द है सरसराना जिसका मतलब है हवा का तेज चलना। लापरवाही से किए गए, या जल्दबाजी में किए गए काम के लिए फारसी का एक शब्द है सरसरी जो उर्दू-हिन्दी में भी खूब इस्तेमाल होता है। इसके सरसरी नज़र डालना या सरसरी तौर पर जैसे रूप रोज़ाना इस्तेमाल होते हैं। तेजी, जल्दबाजी और रफ्तार से जुड़े ये दोनों ही शब्द जन्मे हैं संस्कृत की सृ धातु से जिसका अर्थ है तेज चलना, आगे बढ़ना और फैलना आदि। इसी से जन्मा है सृप् शब्द जिसका इस्तेमाल रेंगनेवाले जीवो के संदर्भ में सरीसृप (रेप्टाइल्स)में देखा जाता है। अचरज की बात ये कि सृ से जन्में सृप् में गति का भाव तो सुरक्षित रहा मगर सृ में समाई तेजी का यहां लोप हो गया। मूलतः सृप् में पेट के बल रेंगने का भाव प्रमुख है । इसके अलावा इसके मंद मंद चलना, छुप छुप कर देखना, हिलना-डुलना रेंगना आदि अर्थ भी हैं। रेंगना को ही सरकना भी कहते हैं और यह भी इसी सृ धातु से बना है।
संस्कृत की इस धातु का जन्म भी संभवत: प्राचीन इंडो-यूरोपियन परिवार से ही हुआ है। इसी से भारतीय और यूरोपीय भाषाओं में कई शब्द बनें जिनका अर्थ किसी रेंगने वाले प्राणी अर्थात सांप से जुड़ा। भारतीय-यूरोपीय भाषा परिवार में सांप के लिए जो मूल शब्द मिलता है वह भी serp है । अंग्रेजी में सांप के लिए एक शब्द sarpent भी है जो लैटिन के serpentem से बना है। इसी तरह ग्रीक भाषा में एक शब्द है- herpein जिसका मतलब होता है रेंगना और herpeton जिसका मतलब होता है सांप। यहां स और ह में वही बदलाव हो रहा है जैसा सिन्धु और हिन्दू में हुआ। अल्बानियन भाषा के garper का मतलब भी यही होता है और इन भाषाओं के ये शब्द serp से ही बने है।
गौर करें कि सृ से ही बना है संस्कृत का सृप जिसका मतलब हुआ रेंगना या पेट के बल चलना। बाद में सर्पः या सर्पति शब्द चलन में आए जिनका रेंगने वाले जन्तु जैसा लाक्षणिक अर्थ नहीं होकर सीधा संबंध सांप या सांप से ही था। रेंगनेवाले प्राणियों (रेप्टाईल्स) के लिए सरिसृप शब्द प्रचलित है। सर्पः का प्राकृत रूप हुआ सप्प जिसने हिन्दी में सांप का रूप लिया। घुमावदार या कुंडलीदार के अर्थ में सर्पिल या सर्पिलाकार शब्द भी इसी मूल से जन्मे हैं। ये बड़ी अजीब बात है कि एक ओर जहां भारतीय संस्कृति में सर्प को पूजा जाता है , उसका धार्मिक महत्व है वहीं सांप के लाक्षणिक रूप से जुड़ी नकारात्मक कहावतें भी हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे सांप मरे और लाठी न टूटे, आस्तीन का सांप, सीने पे सांप लोटना , सांप सूंघना , सांप का सिर कुचलना आदि। सांप के बच्चे को संपोला कहते हैं और यह एक मुहावरे के तौर पर भी प्रयोग में लाया जाता है जिसका मतलब हुआ कि दुष्ट की संतान। अज्ञेय की एक प्रसिद्ध कविता भी सांप पर ही है- snake_1

    साँप!
    तुम सभ्य तो हुए नहीं
    नगर में बसना भी
    तुम्हे नहीं आया।
   एक बात पूछूँ - उत्तर दोगे?
   तब कैसे सीखा डसना,
   विष कहाँ पाया?                         [पुनर्प्रस्तुति]

सृ धातु के कुछ और रूप देखें 9  जुलाई 2007 की इस पोस्ट-सड़क-सरल-सरस्वती में।

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Friday, October 2, 2009

लीक छोड़ तीनौं चलै, सायर-सिंघ-सपूत [लकीर-1]

संबंधित कड़ी-रेखा का लेखा-जोखा (लकीर-2)scenic-picture-tuscany_34660_thumb[36]

म बोलचाल में परिपाटी, प्रणाली या मार्ग के संदर्भ में लीक शब्द का प्रयोग होता है। एक ही लीक पर चलना। लीक बनाना और लीक मिटाना जैसे मुहावरेदार प्रयोग भी होते हैं। लीक की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। कहीं यह मार्ग, पंथ या पगडण्डी है तो कहीं यह परिपाटी, रीति या परम्परा तो कहीं सिर्फ रेखा। इस संदर्भ में प्रसिद्ध दोहा है-लीक-लीक गाड़ी चलै, लीकां चलै कपूत। लीक छोड़ तीनौं चलै, सायर-सिंघ-सपूत।।
लीक शब्द दरअसल लकीर से आ रहा है। लकीर यानी रेखा, सूचक चिह्न, लाइन आदि। दिलचस्प बात यह कि लकीर, रेखा और लीक की आपस में रिश्तेदारी है और ये तीनों शब्द एक ही मूल से जन्में हैं। इसके अलावा लेखक और राईटर जैसे शब्द भी इसी मूल से उद्भूत हैं। यूं तो लकीर शब्द का रिश्ता संस्कृत धातु लिख से है जिसमें लकीर खींचना, रेखा बनाना, घसीटना और छीलना, खुरचना जैसे भाव हैं। गौर करें प्राचीन मानव ने लिखने का काम पत्थरों-चट्टानों पर ही शुरू किया था। कठोर सतह पर प्रतीक चिह्न बनाने के लिए उसे सतह को खुरचना पड़ा। इसीलिए लिख में खुरचने, घसीटने का भाव प्रमुख है। प्रचलित अर्थों में जिसे लिखना कहते हैं वह भाव इसमें बाद में विकसित हुआ। लिख का ही अपभ्रंश है लकीर या लीक जिसमें रेखा, प्रणाली, परिपाटी या मार्ग आदि भाव हैं। लिख का प्राचीन रूप था रिष् या ष्। देवनागरी का अक्षर दरअसल संस्कृत भाषा का एक मूल शब्द भी है जिसका अर्थ है जाना, पाना। जाहिर है किसी मार्ग पर चलकर कुछ पाने का भाव इसमें समाहित है। जाने-पाने में कर्म या प्रयास का भाव निहित है जो इसके एक अन्य अर्थ खरोचने, लकीर खींचने, चोट पहुंचाने जैसे अर्थ से स्पष्ट है। की महिमा से कई इंडो यूरोपीय भाषाओं जैसे हिन्दी, उर्दू, फारसी अंग्रेजी, जर्मन वगैरह में दर्जनों ऐसे शब्दों का निर्माण हुआ जिन्हें बोलचाल की भाषा में रोजाना इस्तेमाल किया जाता है। हिन्दी का रीति या रीत शब्द इससे ही निकला है। का जाना और पाना अर्थ इसके ऋत् यानी रीति रूप में और भी साफ हो जाता है अर्थात् उचित राह जाना और सही रीति से कुछ पाना। का प्रतिरूप नजर आता है अंग्रेजी के राइट ( सही-उचित) और जर्मन राख्त (राईट)में।
हिन्दी के लेखक और अंग्रेजी के राइटर शब्दों के अर्थ न सिर्फ एक हैं बल्कि दोनों शब्दों का उद्गम भी एक ही है। लेखक शब्द लेख् से बना है वहीं राइटर शब्द राइट से बना है। इन दोनों शब्दों के मूल में संस्कृत की धातु रिष् है जिसका मतलब होता है क्षति पहुंचाना, ठेस पहंचाना, चोट पहुंचाना ऋष् शब्द का अर्थ भी चोट पहुंचाना ही होता है। इसीलिए तलवार या भाला जैसी वस्तु के लिए ऋष्टि शब्द भी है। रिष् का अगला रूप बना रिख् जिसमें आघात करना, खरोचना, खींचना, जैसी क्रियाएं शामिल हैं। hieroglyphics2_thumb[9]खुरचने-खरोचने की क्रिया से ही लकीर बनाने की क्रिया के लिए लिख शब्द चल पड़ा जिसके तहत आलेखन, उत्कीर्णन और चित्रण की क्रियाएं भी शामिल हो गईं। लिख से ही निर्माण हुआ रेखा का जिसका अर्थ हुआ लकीर , धारी, पंक्ति , आलेखन आदि। भाषाविज्ञानी डॉ रामविलास शर्मा का मानना है कि द्रविड़ भाषा परिवार की तमिल में लेखन के लिए वरि शब्द मिलता हैं जिस का अर्थ है लिखना , चित्र बनाना। थोड़े बदलाव के साथ तेलुगू में व्रायु, रायु जैसे रूप मौजूद हैं। व्रात का मतलब भी लेखन होता है। व्रात (vrat ) की तुलना अंग्रेजी के write से करें तो समानता साफ नज़र आती है। अंग्रेजी में इस शब्द के विकास क्रम में भी खुरचना जैसे अर्थ शामिल रहे हैं।
जाहिर है लीक शब्द भी बहुत पुरानी लीक पर चलकर विकसित हुआ है। लोक परम्परा भी लीक है और सचमुच देहात का कच्चा रास्ता भी लीक है जिस पर बैल गाड़ियां चलती थीं। पुराने ज़माने में भूमि पर लकीर खींचने से जुड़े हुए बहुत से लोकाचार थे जो कभी अनुष्ठान थे तो कभी सांस्कृतिक कर्म जैसे जमीन की नाप-जोख के लिए लीक खींचना या हवन-यज्ञादि अवसरों पर भूमि पर मांगलिक चिह्न उकेरना। प्राचीन काल से चली आ रही किन्ही परम्पराओं को भी लीक कहा जाता है। उनके प्रति निष्ठा व्यक्त करने के लिए भी भूमि पर लकीर खींची जाती थी जिसे लीक कहा जाता था। इसमें और अर्थविस्तार हुआ मार्ग और राह के संदर्भ में। पुरानी लीक पर चलना या नई लीक बनाना में रास्ते का भाव ही है। राह, रास्ता जैसे शब्द भी धातु से ही निकले हैं। बंधी-बंधाई राह चलने को ही लीक पीटना कहा जाता है जो किसी के लिए मर्यादा में रहना है तो किसी के लिए पिछड़ेपन की निशानी।

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