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पिछली कड़ियां-जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17] गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]
रि हाइशी ठिकानों के लिए प्रयुक्त हिन्दी शब्दों में सराय लफ्ज का भी शुमार है। हालांकि सराय शब्द में स्थायित्व का भाव नहीं है बल्कि अस्थायी निवास के तौर पर ही इसका इस्तेमाल होता है। सराय शब्द का सही सही मतलब होता है धर्मशाला, लॉज या विश्रामगृह जहां यात्रा के दौरान मुसाफिर थोड़े या सम्बे समय तक डेरा डालते हैं। सराय शब्द की आमद हिन्दी में फारसी से हुई है मगर यह इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और संस्कृत से इसकी गहरी रिश्तेदारी है। सराय शब्द का विस्तार दुनिया की कई भाषाओं में अलग-अलग रूपों में हुआ है और इनका अर्थविस्तार भी होता रहा है।
सराय शब्द में मूलतः आश्रय का भाव है। ईरानी संस्कृति में सराय की अर्थवत्ता में महल भी शामिल है। मुस्लिम शासन के दौरान सराय शब्द का इस्तेमाल उत्तर भारत में खूब बढ़ा। सराय के धर्मशाला वाले अर्थ में इसका खूब विस्तार हुआ। देश भर में कई आबादियां बिखरी पड़ी हैं जिनके नाम के साथ-साथ सराय शब्द लगाता है। मुगलों के पड़ाव या डेरे के तौर पर बसी आबादी को मुगलसराय नाम से जाना जाता है। जाहिर है कभी यहां सराय नाम की इमारत ज़रूर रही होगी। शेख़ सराय, बेर सराय, सराय मीरां जैसे नामों के साथ दर्जनों अन्य नाम भी गिनाए जा सकते हैं। दिल्ली के पास सराय रोहिल्ला स्टेशन है। नाम से जाहिर है कभी यहां रुहेले पठानों ने डेरा डाला होगा। आज का रुहेलखंड इन्ही रुहेलों के नाम पर है। यही नहीं, दक्षिण पूर्वी यूरोप के एक देश बोस्निया की राजधानी सराजेवो का नाम भी इसी सराय से निकला है। सराजेवो बना है सराय-ओवेसी से जिसका संक्षिप्त देशी रूप हुआ सराजेवो। गौरतलब है कि पूर्वी यूरोप का रिश्ता तुर्की से रहा है। फारसी से सराय शब्द तुर्की ज़बान में रच-बस गया और वहां से यह यूरोप में भी गया। बोस्निया में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है और वहां मिली जुली संस्कृति है। सराय के मायने वहां गवर्नर हाऊस या महल ही रहा। सराय-ओवेसी का मतलब महल के इर्द-गिर्द बसी बस्ती से है।
सराय के आश्रय वाले अर्थ पर गौर करें। आश्रय मूलतः मनुष्य को सुरक्षा प्रदान करता है। संस्कृत में एक धातु है त्रा जिसमें परिरक्षण, संरक्षण , बचाव का भाव है। आर्यभाषा परिवार की एक शाखा है इडो-इरानी। अवेस्ता इसकी प्रमुख भाषा रही है जिसकी प्राचीन वैदिकी से आश्चर्यजनक साम्यता है। संस्कृत की त्रा धातु से ही संस्कृत-हिन्दी में कई शब्द बने हैं। त्राता का मतलब होता है संरक्षण करनेवाला यानी ईश्वर, प्रभावशाली व्यक्ति। तारणहार भी इसी मूल से निकला है जिसका अर्थ होता है कष्टों से बचानेवाला। इसी तरह त्राण, परित्राण, तारक जैसे शब्द भी इसी सिलसिले की कड़ी हैं। त्रा का ही एक रूप अवेस्ता में थ्रायेन्ति thrayeinti मिलता है जिसका मतलब है- वे संरक्षण करते हैं । ईरानी में इसका रूप हुआ थ्राया thraya अर्थात संरक्षण, सुरक्षा आदि। प्राचीन फारसी में इसका रूप सरा(इ) हुआ जिसका अर्थ था सुरक्षित ठिकाना, महल, भवन आदि। हिन्दी , उर्दू व अन्य कई भारतीय भाषाओं में इसका उच्चारण सराय की तरह होता है। सराय शब्द का विस्तार यूरोप के पश्चिमी छोर की स्पैनी और इतालवी ज़बानों में भी हुआ है जिसका रूप है सेरैग्लियो seraglio जिसका मतलब है विशाल राजनिवास या सुल्तान का हरम, रनिवास जहां उसकी रानियां रहती हैं। सेरैग्लियो बना है लैटिन के देशज शब्द सेरेकुलम से जिसका मतलब होता है अहाता या बाड़ से घिरा हुआ स्थान। समझा जाता है कि लैटिन में यह फारसी से, बरास्ता तुर्की पहुंचा है। सराय का फारसी रूप होता है सरा जिसका मतलब भी महल, राजभवन या पैलेस ही होता है। सरा शब्द का इन अर्थो में प्रयोग उर्दू फारसी के महलसरा, हरमसरा जैसे शब्दो मे साफ समझ में आता है। दार्शनिक अर्थों में फारसी में नश्वर शरीर, मृत्युलोक या संसार को सराए-फ़ानी कहा जाता है क्योंकि आखिरकार इसे फ़ना यानि नष्ट हो जाना है। सरा में मुसाफिरखाना या यात्रीनिवास जैसे अर्थ भी इसमें शामिल हैं।
सराय से मिलता जुलता एक शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है आसरा जो बना आश्रय से ही है मगर जिसमें भरोसा, सहारा, निर्भरता जैसे भाव आ गए हैं जो अंततः सुरक्षा-अवलम्ब के ही रूप हैं। आश्रय शब्द बना है संस्कृत की श्रि धातु से जिसमें सहारा लेना, बचाव के लिए पहुंचना, बसना, निवास करना, चिपकना, सटना जैसे भाव है जो अंततः संरक्षण के भाव से जुड़ते हैं। श्रि में क्त प्रत्यय लगने से बना श्रित जिसका अर्थ हुआ समाया हुआ अथवा शरण में आया हुआ। इसमें आ उपसर्ग लगने से बनता है आश्रित अर्थात रक्षित, निर्भर, निवासी आदि। इसी तरह शरण भी हिन्दी का जाना-पहचाना शब्द है। यह बना है शरणम् से। शरणस्थल यानी सुरक्षित स्थान जो शरण+स्थल से बना है। शरणम् शब्द में मूलतः सुरक्षित स्थान का भाव है। यह बना है शृ धातु से जिसमें खोदने, टुकड़े टुकड़े करने, क्षति पहुंचाने का भाव है। जाहिर है प्राचीन कंदराओं, गुफाओं की निर्माण प्रक्रिया इस धातु में समायी है जब मनुष्य ने अपने प्रारम्भिक आवास बनाए थे। शृ धातु से बने शरण शब्द का अर्थ हुआ सुरक्षित कक्ष, आवास, देवालय, ओट या सहारा आदि।
श्रंखला की अन्य कड़ियां-1.किले की कलई खुल गई.2.कोठी में समाएगा कुटुम्ब!3.कक्षा, कोख और मुसाफिरखाना.4.किलेबंदी से खेमेबंदी तक.5.उत्तराखण्ड से समरकंद तक.6.बस्ती थी बाजार हो गई.7.किस्सा चावड़ी बाजार का.8.मुंबईया चाल का जायज़ा.9.अंडरवर्ल्ड की धर्मशाला बनी चाल [आश्रय-9].10.चाल, शालीनता और नर्क [आश्रय-10]
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पिछली कड़ी-कभी धूप, कभी छाँव [बकलमखुद-112]
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पिछली पोस्ट- गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17]
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संबंधित आलेख-सरपत के बहाने शब्द-संधान
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पिछली कड़ी-घर-शहर की बदलती सूरत [बकलम खुद-111]
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बहुत शोधपरक, उपयोगी और महत्वपूर्ण जानकारियां। हिंदी में इतनी संलग्नता के साथ ऐसा परिश्रम करने वाले विरले ही होंगे।
'शब्दों का सफर' मुझे व्यक्तिगत रूप से हिन्दी का सबसे समृद्ध और श्रमसाध्य ब्लॉग लगता रहा है।
आप के समर्पण और लगन के लिए मेरे पास ढेर सारी प्रशंसा है और काफ़ी सारी ईर्ष्या भी।
सच कहूँ ,ब्लॉग-जगत का सूर और ससी ही है शब्दों का सफ़र . बधाई.... अंतर्मन से
लिखते रहें. यह मेरे इष्ट चिट्ठों मे से एक है क्योंकि आप काफी उपयोगी जानकारी दे रहे हैं.
थोड़े में कितना कुछ कह जाते हैं आप. आपके ब्लाँग का नियमित पारायण कर रहा हूं और शब्दों की दुनिया से नया राब्ता बन रहा है.
आपकी मेहनत कमाल की है। आपका ये ब्लॉग प्रकाशित होने वाली सामग्री से अटा पड़ा है - आप इसे छपाइये !
बेहतरीन उपलब्धि है आपका ब्लाग! मैं आपकी इस बात की तारीफ़ करता हूं और जबरदस्त जलन भी रखता हूं कि आप अपनी पोस्ट इतने अच्छे से मय समुचित फोटो ,कैसे लिख लेते हैं.
सोमाद्रि
इस सफर में आकर सब कुछ सरल और सहज लगने लगता है। बस, ऐसे ही बनाये रखिये. आपको शायद अंदाजा न हो कि आप कितने कितने साधुवाद के पात्र हैं.
शब्दों का सफर मेरी सर्वोच्च बुकमार्क पसंद है -मैं इसे नियमित पढ़ता हूँ और आनंद विभोर होता हूँ !आपकी ये पहल हिन्दी चिट्ठाजगत मे सदैव याद रखी जायेगी.
भाषिक विकास के साथ-साथ आप शब्दों के सामाजिक योगदान और समाज में उनके स्थान का वर्णन भी बडी सुन्दरता से कर रहे हैं।आपको पढना सुखद लगता है।
आपकी मेहनत को कैसे सराहूं। बस, लोगों के बीच आपके ब्लाग की चर्चा करता रहता हूं। आपका ढिंढोरची बन गया हूं। व्यक्तिगत रूप से तो मैं रोजाना ऋणी होता ही हूं.
आपकी पोस्ट पढ़ने में थोड़ा धैर्य दिखाना पड़ता है. पर पढ़ने पर जो ज्ञानवर्धन होताहै,वह बहुत आनन्ददायक होता है.
किसी हिन्दी चिट्ठे को मैं ब्लागजगत में अगर हमेशा जिन्दा देखना चाहूंगा, तो वो यही होगा-शब्दों का सफर.
निश्चित ही हिन्दी ब्लागिंग में आपका ब्लाग महत्वपूर्ण है. जहां भाषा विज्ञान पर मह्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध रह्ती है. 
good,innovative explanation of well known words look easy but it is an experts job.My heartly best wishes.
चयन करते हैं, जिनके अर्थ को लेकर लोकमानस में जिज्ञासा हो सकती हो। फिर वे उस शब्द की धातु, उस धातु के अर्थ और अर्थ की विविध भंगिमाओं तक पहुँचते हैं। फिर वे समानार्थी शब्दों की तलाश करते हुए विविध कोनों से उनका परीक्षण करते हैं. फिर उनकी तलाश शब्द के तद्भव रूपों तक पहुंचती है और उन तद्बवों की अर्थ-छायाओं में परिभ्रमण करती है। फिर अजित अपने भाषा-परिवार से बाहर निकलकर इतर भाषाओँ और भाषा-परिवारों में जा पहुँचते हैं। वहां उन देशों की सांस्कृतिक पृष्टभूमि में सम्बंधित शब्द का परीक्षणकर, पुनः समष्टिमूलक वैश्विक परिदृश्य का निर्माण कर देते हैं। यह सब रचनाकार की प्रतिभा और उसके अध्यवसाय के मणिकांचन योग से ही संभव हो सका है। व्युत्पत्तिविज्ञान की एक नयी और अनूठी समग्र शैली सामने आई है।
16.चंद्रभूषण-
[1. 2. 3. 4. 5. 6. 7. 8 .9. 10. 11. 12. 13. 14. 15. 17. 18. 19. 20. 21. 22. 23. 24. 25. 26.]
15.दिनेशराय द्विवेदी-[1. 2. 3. 4. 5. 6. 7. 8. 9. 10. 11. 12. 13. 14. 15. 16. 17. 18. 19. 20. 21. 22.]
13.रंजना भाटिया-
12.अभिषेक ओझा-
[1. 2. 3.4.5 .6 .7 .8 .9 . 10]
11.प्रभाकर पाण्डेय-
10.हर्षवर्धन-
9.अरुण अरोरा-
8.बेजी-
7. अफ़लातून-
6.शिवकुमार मिश्र -
5.मीनाक्षी-
4.काकेश-
3.लावण्या शाह-
1.अनिताकुमार-
शब्दों के प्रति लापरवाही से भरे इस दौर में हर शब्द को अर्थविहीन बनाने का चलन आम हो गया है। इस्तेमाल किए जाने भर के लिए ही शब्दों का वाक्यों के बाच में आना जाना हो रहा है, खासकर पत्रारिता ने सरल शब्दों के चुनाव क क्रम में कई सारे शब्दों को हमेशा के लिए स्मृति से बाहर कर दिया। जो बोला जाता है वही तो लिखा जाएगा। तभी तो सर्वजन से संवाद होगा। लेकिन क्या जो बोला जा रहा है, वही अर्थसहित समझ लिया जा रहा है ? उर्दू का एक शब्द है खुलासा । इसका असली अर्थ और इस्तेमाल के संदर्भ की दूरी को कोई नहीं पाट सका। इसीलिए बीस साल से पत्रकारिता में लगा एक शख्स शब्दों का साथी बन गया है। वो शब्दों के साथ सफर पर निकला है। अजित वडनेरकर। ब्लॉग का पता है http://shabdavali.blogspot.com दो साल से चल रहे इस ब्लॉग पर जाते ही तमाम तरह के शब्द अपने पूरे खानदान और अड़ोसी-पड़ोसी के साथ मौजूद होते हैं। मसलन संस्कृत से आया ऊन अकेला नहीं है। वह ऊर्ण से तो बना है, लेकिन उसके खानदान में उरा (भेड़), उरन (भेड़) ऊर्णायु (भेड़), ऊर्णु (छिपाना)आदि भी हैं । इन तमाम शब्दों का अर्थ है ढांकना या छिपाना। एक भेड़ जिस तरह से अपने बालों से छिपी रहती है, उसी तरह अपने शरीर को छुपाना या ढांकना। और जिन बालों को आप दिन भर संवारते हैं वह तो संस्कृत-हिंदी का नहीं बल्कि हिब्रू से आया है। जिनके बाल नहीं होते, उन्हें समझना चाहिए कि बाल मेसोपोटामिया की सभ्यता के धूलकणों में लौट गया है। गंजे लोगों को गर्व करना चाहिए। इससे पहले कि आप इस जानकारी पर हैरान हों अजित वडनेरकर बताते हैं कि जिस नी धातु से नैन शब्द शब्द का उद्गम हुआ है, उसी से न्याय का भी हुआ है। संस्कृत में अरबी जबां और वहां से हिंदी-उर्दू में आए रकम शब्द का मतलब सिर्फ नगद नहीं बल्कि लोहा भी है। रुक्कम से बना रकम जसका मतलब होता है सोना या लोहा । कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का नाम भी इस रुक्म से बना है जिससे आप रकम का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे तमाम शब्दों का यह संग्रहालय कमाल का लगता है। इस ब्लॉग के पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी अजब -गजब हैं। रवि रतलामी लिखते हैं कि किसी हिंदी चिट्ठे को हमेशा के लिए जिंदा देखना चाहेंगे तो वह है शब्दों का सफर । अजित वडनेरकर अपने बारे में बताते हुए लिखते हैं कि शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषा विज्ञानियों का नज़रिया अलग अलग होता है। मैं भाषाविज्ञानी नहीं हूं, लेकिन जज्बा उत्पति की तलाश में निकलें तो शब्दों का एक दिलचस्प सफर नजर आता है। अजित की विनम्रता जायज़ भी है और ज़रूरी भी है क्योंकि शब्दों को बटोरने का काम आप दंभ के साथ तो नहीं कर सकते। इसीलिए वे इनके साथ घूमते-फिरते हैं। घूमना-फिरना भी तो यही है कि जो आपका नहीं है, आप उसे देखने- जानने की कोशिश करते हैं। वरना कम लोगों को याद होगा कि मुहावरा अरबी शब्द हौर से आया है, जिसका अर्थ होता है परस्पर वार्तालाप, संवाद । शब्दों को लेकर जब बहस होती है तो यह ब्लॉग और दिलचस्प होने लगता है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा का एक लोकप्रिय लैंडमार्क है- अट्टा बाजार। इसके बारे में एक ब्लॉगर साथी अजित वडनेरकर को बताता है कि इसका नाम अट्टापीर के कारण अट्टा बाजार है, लेकिन अजित बताते हैं कि अट्ट से ही बना अड्डा । अट्ट में ऊंचाई, जमना, अटना जैसे भाव हैं, लेकिन अट्टा का मतलब तो बाजार होता है। अट्टा बाजार । तो पहले से बाजार है उसके पीछे एक और बाजार । बाजार के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द हाट भी अट्टा से ही आया है। इसलिए हो सकता है कि अट्टापीर का नामकरण भी अट्ट या अड्डे से हुआ हो। बात कहां से कहा पहुंच जाती है। बल्कि शब्दों के पीछे-पीछे अजित पहुंचने लगते हैं। वो शब्दों को भारी-भरकम बताकर उन्हें ओबेसिटी के मरीज की तरह खारिज नहीं करते। उनका वज़न कम कर दिमाग में घुसने लायक बना देते हैं। हिंदी ब्लॉगिंग की विविधता से नेटयुग में कमाल की बौद्धिक संपदा बनती जा रही है। टीवी पत्रकारिता में इन दिनों अनुप्रास और युग्म शब्दों की भरमार है। जो सुनने में ठीक लगे और दिखने में आक्रामक। रही बात अर्थ की तो इस दौर में सभी अर्थ ही तो ढूंढ़ रहे हैं। इस पत्रकारिता का अर्थ क्या है? अजित ने अपनी गाड़ी सबसे पहले स्टार्ट कर दी और अर्थ ढूंढ़ने निकल पड़े हैं। --रवीशकुमार [लेखक का ब्लाग है http://naisadak.blogspot.com/ ]
मुहावरा अरबी के हौर शब्द से जन्मा है जिसके मायने हैं परस्पर वार्तालाप, संवाद।
लंबी ज़ुबान -इस बार जानते हैं ज़ुबान को जो देखते हैं कितनी लंबी है और कहां-कहा समायी है। ज़बान यूं तो मुँह में ही समायी रहती है मगर जब चलने लगती है तो मुहावरा बन जाती है । ज़बान चलाना के मायने हुए उद्दंडता के साथ बोलना। ज्यादा चलने से ज़बान पर लगाम हट जाती है और बदतमीज़ी समझी जाती है। इसी तरह जब ज़बान लंबी हो जाती है तो भी मुश्किल । ज़बान लंबी होना मुहावरे की मूल फारसी कहन है ज़बान दराज़ करदन यानी लंबी जीभ होना अर्थात उद्दंडतापूर्वक बोलना।
दांत खट्टे करना- किसी को मात देने, पराजित करने के अर्थ में अक्सर इस मुहावरे का प्रयोग होता है। दांत किरकिरे होना में भी यही भाव शामिल है। दांत टूटना या दांत तोड़ना भी निरस्त्र हो जाने के अर्थ में प्रयोग होता है। दांत खट्टे होना या दांत खट्टे होना मुहावरे की मूल फारसी कहन है -दंदां तुर्श करदन
अक्ल गुम होना- हिन्दी में बुद्धि भ्रष्ट होना, या दिमाग काम न करना आदि अर्थों में अक्ल गुम होना मुहावरा खूब चलता है। अक्ल का घास चरने जाना भी दिमाग सही ठिकाने न होने की वजह से होता है। इसे ही अक्ल का ठिकाने न होना भी कहा जाता है। और जब कोई चीज़ ठिकाने न हो तो ठिकाने लगा दी जाती है। जाहिर है ठिकाने लगाने की प्रक्रिया यादगार रहती है। बहरहाल अक्ल गुम होना फारसी मूल का मुहावरा है और अक्ल गुमशुदन के तौर पर इस्तेमाल होता है।
दांतों तले उंगली दबाना - इस मुहावरे का मतलब होता है आश्चर्यचकित होना। डॉ भोलानाथ तिवारी के मुताबिक इस मुहावरे की आमद हिन्दी में फारसी से हुई है फारसी में इसका रूप है- अंगुश्त ब दन्दां ।