Wednesday, June 17, 2015

//बीबी और बीवी...//


हि न्दी में पत्नी के अर्थ में अक्सर 'बीबी' और 'बीवी' के बीच घालमेल है। हालाँकि भाषा का अपना संस्कार होता है जिसके तहत सावाधानी से भाषा-बर्ताव करने वाले स्त्री के लिए आदरार्थी सम्बोधन के तौर पर 'बीबी' का इस्तेमाल करते हैं जैसे बीबी परमजीत कौर अथवा चांदबीबी। दूसरी ओर 'बीवी' शब्द का इस्तेमाल अक्सर पत्नी के तौर पर होता है। कोशों में इन दोनों ही शब्दों में घालमेल है अर्थात 'बीबी' का अर्थ कुलीन स्त्री तो है ही साथ ही कुलवधु और पत्नी भी दिया गया है। उसी तरह 'बीवी' प्रविष्टि के आगे कुलीन स्त्री और पत्नी दोनो ही अर्थ बताए गए हैं। यह ठीक है कि आज से छह-सात दशक पहले यह घालमेल ठीक था। तब से अब तक न जाने कितने नए शब्दकोश सामने आ चुके हैं और पुराने कोशों के नए संस्करण निकाले जा चुके हैं किन्तु आज की हिन्दी में 'बीवी' शब्द पत्नी के अर्थ में स्थिर हो चुका है, ऐसा कोई कोश नहीं कहता जबकि बतौर कुलीन स्त्री, बीवी शब्द का प्रयोग बिरले ही कोई करता होगा। बहरहाल हिन्दी में बीवी / शब्द का प्रयोग फ़ारसी के रास्ते ही शुरु हुआ। यह जानना दिलचस्प होगा कि बीबी शब्द आया कहाँ से।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बीबी और बीवी दोनों एक ही मूल से निकले हैं। यही नहीं दोनों की अर्थवत्ता भी एक ही थी। मूल 'बीबी' है, उसका दूसरा रूप 'बीवी' है। दोनों ही रूप फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी में आए। फ़र्क़ इतना हुआ कि आदरार्थी स्त्रीवाची के तौर पर 'बीबी' शब्द का प्रयोग चूँकि भारत की पश्चिमी बोलियों तक ही सीमित रहा। बीबी में निहित पत्नी का अर्थ हिन्दी में व्यापक तौर पर लोकप्रिय हुआ। यही नहीं, बीबी के बीवी रूप को इस अर्थ में प्रधानता भी मिली। हालाँकि दोनों ही शब्द हिन्दी में बने रहे। बहरहाल, बीबी के मूल में जो भाव है उसमें स्नेह और प्रेम का स्पर्श है।

हिन्दी में मुहब्बत / महब्बत शब्द खूब प्रचलित है। यह अरबी से फ़ारसी होते हुए हिन्दी / उर्दू में दाख़िल हुआ। मुहब्बत के मूल में अरबी भाषा की त्रिवर्णी धातु है हा-बा-बा ب- ب-خ जिसमें बीज का भाव भी है और मित्र, प्रिय, स्नेही जैसे भाव भी हैं। अरब के रेगिस्तान में बीजों के बिखरने की क्रिया को 'हिब्बत' कहते हैं। बीज यानी 'हब्ब' और बीजों का बिखरना यानी 'हिब्बत'। एक बीज को धरती के गर्भ में स्थान मिलता है। धरती का स्नेह-स्पर्श पा कर उसमें अंकुरण होता है और बीज से हटकर धीरे-धीरे एक समूचा पृथक अस्तित्व नजर आने लगता है। जीवन का स्पंदन आकार लेने लगता है। बिना प्रेम के जीवन संभव नहीं है। यह अरबी प्रत्यय (अत) संज्ञा-सर्वनाम को क्रियारूप में बदलता है।

हिब्बत में अरबी उपसर्ग 'म' जुड़ने से बनता है महब्बत जिसे हिन्दी में मुहब्बत कहा जाता है। अरबी में मित्र को 'हबीब' कहते हैं जो इसी धातुमूल से जन्मा है। 'हबीबी' का मतलब होता है प्रियतम, सुप्रिय, प्यारा, दुलारा। महब्बत का मतलब होता है स्नेह-स्पर्श अथवा प्रेमाभिव्यक्ति। प्यार जताना। जिससे प्यार किया जाता है वह पुरुष पात्र कहलाता है महबूब और स्त्री पात्र कहलाती है महबूबा। 'हब्ब' में मित्र का भाव है इसीलिए इसका बहुवचन हुआ 'हुबूब'। इसमें 'म' उपसर्ग लगने से बनता है महबूब या महबूबा।

अरबी में पत्नी को यूँ तो ज़ौजा कहते हैं किन्तु रफ़ीक़ा शब्द भी है जबकि रफ़ीक़ का अर्थ होता है मित्र। स्वाभाविक है मित्र अगर प्रिय है तो प्रियतमा भी हो सकती है। इस नज़रिये से पत्नी के अर्थ में अरबी, फ़ारसी में बीबी शब्द भी प्रचलित है। हबीबा का अर्थ होता है मित्र, मित्रवत। मुमकिन है हबीबा / हबीबी का ही संक्षिप्त रूप बीबी है जिसका एक रूप बीवी ज्यादा प्रचलित हुआ जिसका अर्थ है पत्नी जबकि बीबी आमतौर पर भद्र महिला के लिए सम्बोधन है। हब्बाखातून पर गौर करें। बीबी फात्मा, बीबी नाजरा, बीबी अख़्तरी जैसे नामों पर ध्यान दें। ये सम्बोधन समाज के दिए हुए हैं। इनमें पत्नी का भाव नहीं। अलबत्ता सामान्य तौर पर बीवी लिखने के स्थान पर पत्नी के लिए बीबी भी लिख दिया जाता है। अच्छी हिन्दी लिखने वालों को इस ग़लती से बचना चाहिए और पत्नी के लिए बीवी वर्तनी का प्रयोग ही करना चाहिए।
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//हस्ती मिटती नहीं हमारी//

हि न्दी में दो हस्ती है पर इनमें से एक का ही इस्तेमाल ज्यादा होता है। पहला ‘हस्ती’ वह है जिसका अर्थ है हाथी। गौर करें ‘हस्त’ से बना है ‘हस्तिन’ और फिर ‘हस्ती’। चूँकि हाथी की सूँड भुजा जैसी होती है और उससे वे सारे काम वह करता है जो मनुष्य अपने हाथ से करता है इसलिए उसका लाक्षणिक नाम पड़ा ‘हस्तिन’ यानी हाथ जैसा, हाथ वाला या हस्तयुक्त। पर बोलचाल की हिन्दी में हाथी चलता है, हस्ती नहीं। हम उस ‘हस्ती’ की बात कर रहे हैं जो बड़ी शख़्सियत के लिए इस्तेमाल होता है। मूल रूप से ये ‘हस्ती’ हिन्दी का अपना न होकर फ़ारसी का है मगर और इसकी रिश्तेदारियाँ संस्कृत, जेंद-अवेस्ता, उर्दू, फ़ारसी, ईरानी, पोलिश, चेक, इंग्लिस समेत समेत योरपीय भाषाओं में तलाशी गई हैं।

“कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी”। यह न समझ लें कि इस प्रसिद्ध पंक्ति के बहाने हम पुरातनता का अरण्यगान शुरू करने जा रहे हैं। अलबत्ता यह मशहूर इबारत शब्द ब्रह्म के सन्दर्भ में भी सार्थक हो रही है। हमारा आशय ‘हस्ती’ से है। उसी ‘हस्ती’ से जिसे आमतौर पर बड़े आदमी, महान व्यक्तित्व या खास शख़्सियत का दर्जा मिला हुआ है। इसके अलावा ‘हस्ती’ का एक अर्थ और है- होने का भाव। इसका प्रयोग अस्तित्व, महत्व, रसूख़, बिसात, प्रभाव, सामर्थ्य आदि के सन्दर्भ में आमफ़हम है। “तुम्हारी क्या हस्ती है?” से यह स्पष्ट है।

बात दरअसल यह है कि वैदिक क्रियारूप ‘अस्’ में होने का भाव है। उपस्थिति, विद्यमानता, जीवन आदि के अर्थ में इसके विभिन्न रूपों का प्रयोग होता है। ‘अस्ति’, ‘अस्तु’ जिससे होने, हो जाने का पता चलता है। ‘अस्तित्व’ एक सामान्य प्रचलित शब्द है जिससे किसी चीज़ होने का बोध होता है। हिन्दी वर्तमानकालिक वाक्य रचनाओं के अन्त में ‘हूँ’, ‘है’, ‘हो’ जैसी सहायक क्रियाएँ अवश्य लगती हैं। ये सभी ‘हो’ या ‘होना’ से सम्बद्ध हैं। विभिन्न व्याकरणाचार्यों ने ‘होना’ के विभिन्न रूपों का विकास संस्कृत की ‘अस्’ धातु या ‘भू’ धातु से माना है। हालाँकि अब यह स्थापित है कि इनका विकास ‘भू’ से हुआ है।

वैदिक संस्कृत का ही एक रूप अवेस्ता थी जिससे पहलवी, फ़ारसी का विकास हुआ। कुछ भाषाविज्ञानियों का मानना है कि अवेस्ता में इस ‘अस्’ का रूप अह हो जाता है। लेकिन यह बहुत विश्वसनीय मान्यता नहीं है। मैकेंजी को पहलवी कोश में ‘अस्त’ और ‘हस्त’ को समानार्थक दर्ज़ करते हुए ‘हस्त’ को उत्तरी पहलवी रूप बताया गया है। जो भी हो, पहलवी और फ़ारसी में ‘अस्त’ और ‘हस्त’ दोनों रूप चलते हैं अलबत्ता दोनों ही रूपों का महीन फ़र्क़ के साथ अलग-अलग इस्तेमाल होता है।

संस्कृत के ‘अस्ति’ में वर्तमानकालिक विद्यमानता का भाव है। यही ‘अस्तित्व’ है और फ़ारसी के ‘हस्ती’ का आशय भी यही है। चाहें तो फ़ारसी के ‘हस्ती’ में निहित होने के भाव को पूरी तरह समझने के लिए संस्कृत के ‘अस्ति’ से बने अस्तित्व की तर्ज पर हस्ति से ‘हस्तित्व’ की कल्पना कर भी समझा जा सकता है। इसी तरह अस्तित्व से व्यक्तिपरक ‘हस्ती’ बनता है जिसका अर्थ है विशिष्ट व्यक्ति या बड़ा आदमी। यह बड़ा आदमी कौन होता है ? किन्ही निजी गुणों, स्वभाव, रोब-दाब, रुआब, ठसक और ऐश्वर्य के प्रभाव के साथ अपने अस्तित्व का बोध कराने वाला व्यक्ति ही हस्ती है। यानी अस्तित्व से ‘हस्ती’ का पता चलता है।
‘अस्’ और ‘हस्त’ की रिश्तेदारी यूरोपीय भाषाओं में भी है। अंग्रेजी होने की सामान्य क्रिया का ‘is’ से पता चलता है। भाषाविज्ञानियों ने ग्रीक का एस्ती, लैटिन का एस्त, संस्कृत का अस्त, लिथुआनी का एस्ती, स्लोवानी का जेस्टी आदि शब्द सजातीय माने हैं। मिसाल के तौर पर फ़ारसी में ‘हस्त’ के हस्तम (मैं हूँ), हस्तिम (हम हैं) और हस्तन्द (वे हैं) जैसे रूप बनते हैं। ‘हस्तम’ यानी मैं हूँ कि तर्ज़ पर पोलिश भाषा में ‘यस्तेम’ या ‘जेस्तेम’ और चेक भाषा में ‘यशेम’ रूप मिलते हैं जो सजातीय है।
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//मोम में 'मधु' की तलाश//


ऐसे शब्द जिनका कोई समानार्थी या पर्याय नहीं मिलता, उनमें ‘मोम’ भी है। मोम यानी क्या? यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि मोम भी हिन्दी का अपना नहीं बल्कि बरास्ता फ़ारसी हिन्दी में समाया है। ऐसा नहीं कि वैदिक अथवा संस्कृत शब्दावली में मोम के लिए शब्द नहीं हैं किन्तु हिन्दी में इनकी छाया भी नज़र नहीं आती। फ़ारसी में मोम शब्द की व्युत्पत्ति मूम से मानी जाती है। इस मूम का मूल क्या है इसके आगे रास्ता बन्द मिलता है। हिन्दी में इस कड़ी में मोमजामा, मोमबत्ती, मोमिया जैसे कुछ पद प्रचलित हैं। जानते हैं मोम के जन्मसूत्रों को और इस फ़ारसी शब्द के संस्कृत-वैदिक रिश्तों को।

मोम के जितने भी विकल्प संस्कृत में मिलते हैं उन सबका रिश्ता मधु से जुड़ता है। संस्कृत में मधु का अर्थ फूलों का रस यानी शहद होता है, यह सब जानते हैं। इसी का विस्तार मदिरा या मद्य भी है जिसका अर्थ है शराब। मदिरा और मद्य भी मधु से ही विकसित है। फ़ारसी में शराब को मय कहते हैं। संस्कृत के मद्य से द का लोप करें तो फारसी का मय प्राप्त होता है। इसी के साथ मधु में मोम का भाव भी है। मधु का एक अन्य अर्थ है मधुमक्खियों का छत्ता।  जाहिर है कि मोम से अभिप्राय मधुमक्खियों द्वारा बनाए गए छत्ते से ही है। संस्कृत में ‘मधुकाश्रयम्’ का अर्थ भी मोम होता है और मधु भी। ‘मदना’ का अर्थ भी वही है जो अंग्रेजी में wax का होता है। इसी तरह एक अन्य शब्द है सिक्थक जिसका अर्थ भी मधुमक्खियों के छत्ते से प्राप्त मोम है। यूँ सिक्थ का अर्थ मोम भी होता है और पकाया हुआ चावल भी।

गौरतलब है कि मराठी में मोम के स्थान पर मेण शब्द प्रचलित है। मोमबत्ती की जगह वहाँ मेणबत्ती शब्द का इस्तेमाल होता है। इसी तरह सिन्धी में भी मेण शब्द प्रचलित है। ध्यान रहे, प्राचीनकाल में दुनियाभर में पशुओं की वसा या चर्बी का इस्तेमाल रात में उजाले के लिए किया जाता रहा है। इसके लिए संस्कृत में मिद्, मिन्द, मिन्न जैसे शब्द हैं जिसमें फूलने का भाव है। इसका एक अर्थ चर्बी या वसा भी होता है।

राजनिघण्टु में मोम के अनेक नाम दिए गए हैं- सिक्थकम्, मधुजम्, विघसम्, मधसम्भवम्, मोदनम्, काचम्, उच्छिष्टमोदनम्, मक्षिकामलम्, क्षौद्रेयम्, पीतरागम्, स्निग्धम्, माक्षिकजम्, क्षौद्रजम्, मधुशेषम्, द्रावकम्, मक्षिकाश्रमयम्, मधूत्थितम् और मधूत्थम् आदि। मोम को संस्कृत में मधुज भी कहा गया है अर्थात शहद से बना हुआ या जिसे शहद के छत्ते से प्राप्त किया गया हो।

मधुजम् शब्द पर गौर करें। मधु से जन्मा यानि मोम। मधुजम् से मउअम, मऊम और फिर मूम प्राप्त होता है। इसी तरह फ़ारसी की ओकारान्त प्रवृत्ति को ध्यान रखें तो मधुजम् > मउअम > मऊम > मूम > मोम के विकासक्रम से बात सुलझ जाती है। बेशक मोम फ़ारसी लफ़्ज़ है किन्तु उसका मूल इंडो-ईरानी है। यह कहने की ज़रूरत नहीं कि मधु शब्द की जड़ें समूचे भारोपीय परिवार की अनेक भाषाओं में व्याप्त हैं। इस पर फिर कभी।

‘ममी’ यानी संरक्षित मृतदेह से भी इस मोम का रिश्ता है। अरबी के ‘ममियाह’ शब्द का लैटिन रूप हुआ ममिया जो बिटुमिन या डामर के अर्थ में ही रहा और लैटिन से यह अंग्रेजी में ममी हुआ। अरबी का ममियाह भी फ़ारसी मोम का ही रूपान्तर है। प्राकृतिक परिवर्तनों के तहत भूमि के भीतर दफ्न हो गई जीवधारियों की देह तो फॉसिल अथवा जीवाश्म कहलाईं। मगर पुनर्जन्म की कल्पना के चलते दुनियाभर की संस्कृतियों में मृतदेह को इस आशा में संरक्षित करने की परंपरा रही है कि पुनर्जन्म के वक्त आत्मा को फिर पुराना शरीर मिल जाए। इसके लिए प्रचलित शब्द है ममी।

यह शब्द मिस्र की संस्कृति से आया है मगर है अरबी का जिसका मूल फारसी है। समझा जाता है कि प्राचीन प्राचीन मिस्र में इसी भूगर्भीय काले पदार्थ, जो गोंद, टार, वैक्स या राल से मिलता जुलता था, मृत देह के परिरक्षण के लिए इसका शरीर पर लेपन किया जाता था। इस देह के लिए ही ममी शब्द प्रचलित हुआ।
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//छाजन, बिस्तर और बिछौना//


हि न्दी में व्युत्पत्ति के नज़रिये सेबहुत भ्रम की स्थिति है। शब्दकोशों से बहुत ज़्यादा मदद नहीं मिलती। इस दृष्टि से बने हिन्दी के पहले कोश हिन्दी शब्दसागर को महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ है। मगर जैसा कि हिन्दी में शब्दकोशों को अद्यतन और संशोधित करने की परिपाटी नहीं के बराबर है इसलिए अनेक शब्दों की भ्रामक व्युत्पत्तियाँ भी मिलती हैं। शब्दों का सफर में प्रसंगवश उनका उल्लेख होता रहा है। ऐसा ही एक शब्द है बिछौना। हिन्दी शब्दसागर इसका रिश्ता बिछाना क्रिया से मानता है। बिछाना की व्युत्पत्ति विस्तरण बताई गई है। हिन्दी में बिछौना का अर्थ सीधे सीधे सोने का गद्दा है। जबकि इसी कड़ी में आने वाले बिछावन या बिछायत में बिस्तर, चांदनी, दरी, फर्श सब आ जाता है।

गौरतलब है हिन्दी में गद्दे के लिए बिस्तर शब्द भी आमफ़हम है और जिसकी आमद फ़ारसी से हुई है। फ़ारसी के बिस्तर का विकास पहलवी के विस्तर (संस्कृत विस्तरण) से माना जाता है जिसका अर्थ है बिछौना। समझा जा सकता है कि वैदिक विस्तर जिसमें फैलाव, खिंचाव, व्याप्ति, प्रसार जैसे भाव हैं, अवेस्ता और फिर पहलवी में भी उसका रूप यथावत रहा। पहलवी में एक क्रिया बनती है विस्तरदन जिसमें फैलाव या प्रसार का भाव है। फ़ारसी में इसका ही एक रूप गुस्तरदन हो जाता है। ध्यान रहे हिन्दी में संस्कृत शब्दों के रूपान्तर क्रम में ‘च्च’ या ‘च्छ’ जैसे रूप त्स से बनते हैं जैसे वत्स का वच्च या बच्छ हो जाता है। विस्तरम में त्स नहीं स्त है। स्त का रूपान्तर त्त या त्थ और फिर थ बनेगा। जैसे हस्त से हत्थ > हत्था > हाथ या हस्ती > हत्थी > हाथी। ज़ाहिर है विस्तरण से बिछौना बनने की बात भ्रामक है। विस्तरण से बिथरन/ बिथरना तो बन सकता है जिसका अर्थ है छितराना, अलग-अलग करना या होना, तितर-बितर होना, विच्छिन्न होना, बिखर जाना आदि। आम तौर पर बिजों के परागण या बुआई के सन्दर्भ में बिथराना ज्यादा प्रयुक्त होता है।

बिछौना चाहे बिस्तर का प्रतिरूप हो मगर शब्द निर्माण प्रक्रिया वह नहीं है जो विस्तर से बिस्तर में नज़र आती है। कालीन, फर्श, गलीचा आदि बिछाने की प्रक्रिया पर गौर करें तो विस्तर / विस्तरण का भाव समझ में आता है। इन सभी को आमतौर पर गोल लपेट कर रखा जाता है। बिछाते समय गोला खुलता जाता है और बिछावन का विस्तार होता जाता है। मगर बिछाने में विस्तरण के साथ-साथ आच्छादन का भाव भी है। भारतीय भाषाओं में ‘द’ का रूपान्तर ‘ज’ में आमतौर पर होता है। मिसाल के तौर पर वाद्य, वादन से ही बाजा, बजाना बनता है। छादन से ही बना है छाजन जिसका अर्थ है सायबान या छप्पर। छाने, छुपाने, छाया करने की क्रिया भी छाजन है। छाजन का एक अर्थ वस्त्र भी है। आच्छादन बना है ‘छद्’ क्रिया से जिसमें छा जाने या छिपाने का बोध होता। छत, छत्र, छत्री आदि की इसी ‘छद्’ से रिश्तेदारी है। ‘छद्’ में ‘आ’ उपसर्ग लगने से बनता है आच्छद अर्थात ढकना, छाना या छिपाना। विकास की शुरुआती प्रक्रिया में फर्श पर बिछाने वाला बिस्तर बाद में आता है। वह स्थिति तब आई जब मनुष्य ने अपने रहने का सुरक्षित स्थान बना लिया। इससे पहले तो ऊँची चट्टान, पेड़ों की डाल आदी पर छाजन तान कर ही शायिका बनाई जाती रही। यानी चट्टान या खुरदुरी सतह पर नर्म घास-फूस, पत्ती का आवरण जिस पर लेटा जा सके।

हिन्दी के ‘वि’ उपसर्ग में दूर, पास, खिंचाव, अलगाव, दूर करने जैसे भाव भी हैं। ‘आच्छद’ अगर छप्पर है तो ‘विच्छद’ में भी ढकने, फैलाने, दूर करने जैसे भाव हैं। आशय बिछाने का ही है। हिन्दी में ‘व’ का रूपान्तर ‘ब’ में होता है। विच्छादन से बिच्छअन > बिछऊन > बिछौन होते हुए बिछौना बनने की प्रक्रिया तार्किक लगती है। रॉल्फ़ लिली टर्नर भी बिछौना कि व्युत्पत्ति विच्छादन से मानते हैं। इसी तरह मराठी में बिछौना / बिछाना दोनों शब्द गद्दे के अर्थ में हैं। मराठी व्युत्पत्ति कोश में कृ.पा. कुलकर्णी भी विच्छादन से ही बिछाना की व्युत्पत्ति मानते हैं। भारतीय भाषाओं में बिछाउन, बिछउना, बिछाना, बिछोन, बिछाउनू, बिसाना, बिछाउना, बिछावन जैसे शब्दरूप गद्दे, बिस्तर के अर्थ में प्रचलित हैं।
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//डेढ़ पसली या ज़िला //


बा ज़ार और सरकार की ज़ुबान का असर किसी भी समाज की भाषा पर पड़ता है। हिन्दी में अरबी-फ़ारसी शब्दों की रचबस के पीछे यह दो कारण रहे हैं। डिस्ट्रिक्ट के लिए हिन्दी में जनपद शब्द है किन्तु उसका इस्तेमाल कम होता है। इस अर्थ में अरबी का ज़िला शब्द ही काबिज है। बड़ी अजीब बात है कि भारतीय उपमहाद्वीप में डिस्ट्रिक्ट के अर्थ में ज़िला शब्द जितना प्रचलित है, अरबी में इस रूप में इसे बहुत कम इस्तेमाल किया जाता है। हालाँकि वहाँ बतौर प्रशासनिक इकाई- ज़िला, क्षेत्र या इलाक़ा आदि के लिए कम से कम दो दर्जन शब्द हैं। हिन्दी वाले चूँकि नुक़ता नहीं लगाते तो ज़िले का उच्चार जिला करते हैं। हिन्दी में नुक़तों के न होने से अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ समस्या हो जाती है। क्योंकि अनेक शब्द ऐसे हैं जिनमें वर्तनी के नाम पर सिर्फ़ नुक़ता ही फ़र्क़ पैदा कर देता है। यही बात ज़िला के साथ भी है। अरबी में बिना नुक़ते का जिला भी है जिसका अर्थ होता है आभा, प्रभा, कान्ति अथवा चमक। बहरहाल जानते हैं ज़िले की जन्मकुंडली को।

ज़िला सामी परिवार का है और इसका मूल इच्चारण ज़िल्अ है और यह अरबी की त्रिवर्णी धातु दाद-लाम-ऐन (ل ع ض) से मिलकर बना है। अरबी का दाद अक्षर दरअसल द्साद की तरह उच्चारा जाता है। इस तरह ज़िला का उच्चार Dsila या Dzila होता है। अरबी द्साद के लिए फ़ारसी में ज़ाद ﺽ और उर्दू में ज़ुआद ض अक्षर हैं। फ़ारसी उर्दू के रास्ते हिन्दी में इसका उच्चार ज़ ही होगा। ज़िला का मूलार्थ है पार्श्वास्थि यानी पसलियाँ। इसके अलावा इसमें जनपद, मंडल अथवा प्रान्त का आशय भी है। ऐसा इलाका जो किसी सरकारी अहलकार के अधीन हो। ज़िला का एक अर्थ तालिका या लिखने का लम्बवत खाना भी होता है जिसे स्तम्भ या कॉलम कहते हैं। हालाँकि अरबी में ऐसे अनेक शब्द हैं जिनसे क्षेत्रवार प्रशासनिक इकाई को पता चलता है जैसे- इकलिम, बलादिया, बन्दर, बनादिर, कुत्त, कित्ता, दायरा, मरकज़, सन्जाक़, शुक़, अश्क़ा, मुतसर्रिफ़, अमल, अमाला, कुत्र, मुकाता, मक़ामिया, कूरा, लीवा, मिन्तक़ा, मनातिक़, जीहा, मवातिन और विलाया और फ़लाज़ा।

ज़िला के पसली या RIB वाले अर्थ की जनपद वाले अर्थ से तार्किक साम्यता स्थापित नहीं होती। सामी परिवार का होने की वजह से ज़िला हिब्रू में भी है और इसके समरूप हैं ज़ेला या ज़ेलाह। जिस तरह अरबी में दाद का उच्चार द्साद या द्ज़ाद की तरह है उसी तरह हिब्रू में इसका समरूप त्सा या त्ज़ा है। इस तरह इसका हिब्रू रूप हुआ Tsela या Tzela. बाइबल में ज़ेलाह नाम के एक शहर का भी उल्लेख हैं। अनेक सामी सन्दर्भों को देखने के बाद पता चलता है कि इसमें पहलू, पार्श्व, साइड, आजू-बाजू, क्षेत्र, फ़लक जैसे अर्थ भी हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि मूलतः ज़िला में परिधि, हदबंदी या दायरा का भाव है और ये सभी शब्द मूलतः सुरक्षा से जुड़े हैं। किन्तु अरबी में इसका आशय सिर्फ़ रिब या पसली के अर्थ तक सीमित रहा जबकि फ़ारसी में आकर इसका क्षेत्र या इलाका के अर्थ में विस्तार हुआ। गौर करें जनपद जैसे अर्थ के साथ पार्श्वास्थि या पसली जैसा अर्थ मेल क्यों नहीं खा रहा है। पार्श्वास्थियों या पसलियों की संरचना देखें। कुदरत ने इसे दिल और फेंफड़ों की हिफ़ाज़त के लिए बनाया है। गोल दायरे में यह सीने के दोनो तरफ़ और आगे-पीछे से इन नाज़ुक अंगों की रक्षा करती हैं। स्पष्ट है कि ज़िला का मूलार्थ एक ख़ास दायरे, एक खास हद वाले क्षेत्र से है।

एंग्लो इंडियन डिक्शनरी हॉब्सन-जॉब्सन के मुताबिक शायद 1776 में ज़िला को कम्पनी राज में जनपदीय ईकाई की तरह बरता जाने लगा था। हालाँकि मुस्लिम दौर में इसका प्रयोग दो सदियों पहले से देश में शुरू हो चुका था। मराठी में ज़िला का उच्चार जिल्हा होता है तो सिन्धी में इसे जिल्ओ कहते हैं। गौर करें यह जिल्ओ ज़िला के सही उच्चार जिल्अ के ज़्यादा क़रीब है। किसी ज़माने में ज़िला प्रमुख को ज़िलादार कहा जाता था। अंग्रेजों ने राजस्व वसूली के लिए जो व्यवस्था बनाई उसमें एक मंडल या जनपद के लिए कलेक्टर का पद होता था। कलेक्टर यानी जो लगान वसूली करे और सरकारी ख़ज़ाने में जमा कराए। आज ज़िलादार कहीं कलेक्टर कहीं ज़िला कलेक्टर या डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट यानी डीएम कहलाता है।
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।।हसन को मेहंदी न लगाओ।।


हिन्दी वाले अक्सर मेंहदी और मेहदी (महदी) में घालमेल कर जाते हैं। बतौर व्यक्तिनाम मेहदी को भी वे हिना के अर्थ में मेंहदी या मेहँदी लिखते और उच्चारते हैं। यानी में हिन्दी में महदी या मेहदी को बिना अनुनासिकता के उच्चारा ही नहीं जाता। ऐसा सिर्फ़ अज्ञानतावश होता रहा है। दरअसल व्यक्तिनाम वाले मेहदी का प्रयोग उतना नहीं होता जितना महावर मेंहदी का होता है। सो लोकप्रिय उच्चार ही मेहदी के साथ भी चस्पा हो गया। जानते हैं दोनों के फ़र्क़ को।

दरअसल प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक मेहदी हसन के नामोच्चार के साथ ही समस्या रही है। हिन्दी वाले इसे मेंहदी मेहंदी की तरह ही लिखते बोलतेे आ रहे हैं। मेहदी का सही रूप महदी है और सामी परिवार की भाषाओं में इसका प्रयोग होता है। बरास्ता फ़ारसी भारतीय भाषाओं में भी यह चला आया है। बहरहाल मेहदी या महदी का अभिप्राय है सही राह दिखाना, नेतृत्वकर्ता, उपदेशक, निर्देशक आदि । महदी का अर्थ है दीक्षित जिसे कुछ निर्देश मिला हो। जो निर्देशित हो। बतौर धर्मप्रमुख भी इसका प्रयोग होता है। मेहदी का संक्षिप्त रूप हादी भी है। जदीद उर्दू कोश के अनुसार शिया सम्प्रदाय के बारहवें इमाम को भी इसी रूप में पुकारा जाता है। विश्वास है कि क़यामत के दिन वे फिर प्रकट होंगे। महदी शब्द के मूल में है अरबी की हदा धातु- ي د هـ (हा-दा-या) जिसमें निर्देश, मार्गदर्शन, संस्कार, राह, स्पष्टता, व्याख्या, देना, भेट, प्रकार, तरीका जैसे भाव हैं। गौर करें निर्देश के लिए हिदायत शब्द भी खूब प्रचलित है जो मूलतः अरबी का शब्द है और और महदी का रिश्तेदार है।

दूसरी तरफ़ हाथ-पैरों पर गहरे लाल रंग के बेलबूटे बनाने के लिए एक खास कँटीली झाड़ी की पत्तियों का इस्तेमाल होता है उसे मेंहदी कहते हैं। संस्कृत में इसके लिए मेन्धि या मेन्धिका शब्द है। मोनियर विलियम्स इसे लासोनिया इनर्मिस का समरूप बताते हैं जो मेंहदी या हिना का वानस्पतिक नाम है। मेन्धि से मेंहदी की व्युत्पत्ति सम्भव है क्योंकि ध वर्ण में समाहित द + ह ध्वनियाँ मेंहदी में स्पष्ट हो रही हैं। मेन्धि या मेन्धिका से मेंहदी बनने में वर्णविपर्यय भी हो रहा है। मेंहदी के लिए अरबी का ही हिना शब्द हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है। अंग्रेजी का हेना भी अरबी के हिना से ही बना है। अरबी हिना का अर्थ है रंगीन बेलबूटे बनाना।
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//क्या हाल भिड़ू //


म राठी के अनेक शब्द हिन्दी में घुलमिल चुके हैं। जैसे हलकट, वास्तव, वापरना, बिन्दास आदि। इसी कड़ी में भिड़ू शब्द भी आता है। अनेक लोग अनजाने में इसका प्रयोग बीडू करते हैं जो सही नहीं है। मराठी ‘भिड़ू’ में मूलतः संगी, साथी, स्नेही, मित्र, यार जैसे भाव हैं। किसी ज़माने में इसमें प्रतिस्पर्धी का भाव था और मित्र, दोस्त, यार जैसे ये तमाम भाव प्रतिस्पर्धी का ही अर्थविस्तार हैं। हिन्दी की ‘भिड़ना’ क्रिया का मराठी रूप होता है ‘भिड़णे’ और इससे ‘भिड़ू’ का गहरा रिश्ता है। हिन्दी में भिड़न्त, भिड़ना, भेड़ना (दरवाज़ा), भिड़ाना जैसे शब्द इसी कड़ी में आते हैं। और तो और, भीड़ जैसा आमफ़हम शब्द भी इसी परिवार का सदस्य है। जानते हैं मराठी भिड़ू के उत्तर-भारतीय सजातीय बन्धुओं की जन्मकुंडली को।

मराठी की भिड़णे क्रिया का अर्थ है एक दूसरे के सम्मुख आना, पास-पास आना आदि। अर्थात सहचर-जोड़ीदार भी भिड़ू है और दूसरे पाले में खड़ा प्रतिस्पर्धी भी भिड़ू है। कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश (पृ.611) में भिड़णे क्रिया के अन्तर्गत ही भिड़ू शब्द का उल्लेख है और इसका अर्थ “खेळांतील गडी” अर्थात जोड़ीदार, साथी, कम्पैनियन, संगी आदि होता है। कुलकर्णी इस सिलसिले में कुछ भ्रम पैदा करते हैं। वे भिड़ू की व्युत्पत्ति प्राकृत ‘आब्भिड’ से बताते हुए इसका रिश्ता संस्कृत के ‘आद्भिद’ शब्द से जोड़ते हैं। गड़बड़ यह है कि संस्कृत कोशों में आद्भिद की प्रविष्टि नहीं है। कुलकर्णी भी इस शब्द का जिक्र करते हुए इसका सन्दर्भ नहीं बताते। इसी तरह प्राकृत ‘आब्भिड’ का उल्लेख भी अशुद्ध रूप से करते है। सही रूप है ‘अब्भिड’।

पण्डित हरगोविन्ददास त्रिकमचंद सेठ रचित प्राकृत भाषा के सम्मान्य कोश पाइअ सद्द महण्णवो (प्राकृत शब्द महार्णव) में 'अब्भिड' शब्द की प्रविष्टि है जिसका अर्थ है संगति करना, मिलना आदि। अगर हम भिड ध्वनि पर विचार करेंगे तो बात नहीं बनती। कुलकर्णी जिस आद्भिद का ज़िक्र करते हैं उसमें मूलतः 'भिद्' है। भिद् में भेदने, छेदने, फाड़ने का भाव है। इससे भिड नहीं बनता साथ ही सम्मुख, संग या साथ जैसे अर्थ भी विकसित नहीं होते। प्राकृत का ही एक शब्द है अब्भिट्ठ। प्राकृत शब्द महार्णव में जिसका अर्थ है संगत, सामने आकर भिड़ा हुआ। इसमें भिट्ठ या भिट पर गौर करने से राह निकलती है।

हिन्दी शब्दसागर के सम्पादक भिड़ना क्रिया के मूल में ‘भड़’ जैसा अनुकरणात्मक शब्द देखते हैं। कोश के मुताबिक भिड़ना में - “1. एक चीज का दूसरी चीज से टक्कर खाना। टकराना। 2. लड़ना । झगड़ना । लड़ाई करना। 3. समीप पहुँचना। पास पहुँचना। नजदीक होना। सटना।” जैसे भाव है। ‘भड़’ जैसी काल्पनिक ध्वनि पर विचार करें तो भिड़ना क्रिया में हर बार भौतिक टकराहट नहीं है। हर चीज़ टकराने पर ‘भड़’ आवाज़ नहीं करती। इसलिए भड़ से भिड़ना दूर की कौड़ी है। भिड़ाना क्रिया में सटाने, साथ लाने का भाव है। भिड़ना में टकराना कम और सम्मुख होने, जोर-आज़माइश करने या कशमकश का भाव है। जोर-आज़माइश सट कर भी होती है और संवाद से भी होती है। मूल रूप से इस शब्द के दायरे में दो चीज़ो का साथ होना है। चाहे सम्मुख हों या अगल-बगल में। सम्मिलन का भाव है। सटने का भाव है। दरवाज़ा भेड़ना या भिडाना इसी अर्थ में है। इन्ही भावों का अर्थ विस्तार लड़ाई, ज़ोर-आज़माइश, मिलाना, मिलना, गाँठना, पास आना, साथ चलना, निकटता आदि में होता है।

एक बार फिर से आते हैं प्राकृत के अब्भिट्ठ और अब्भिड पर। अब्भिड़ में भिड़ साफ पकड़ में आता है। अब्भिट्ठ का अगला विकास अब्भिड़ है। मिलने, पाने के अर्थ में हिन्दी के भेट शब्द पर विचार करें। भिट्ट> भिट्ठ> भिड इस भेट के प्राकृत रूप हो सकते हैं। इसकी पुष्टि होती है रॉल्फ लिली टर्नर के भारतीय-आर्य भाषाओं के तुलनात्मक कोश में भिट् प्रविष्टि से। टर्नर प्राकृत की ‘भिट्’ धातु का उल्लेख करते हैं। वे प्राकृत- भिडई (मिलना), सिन्धी- भैड़नूं (मिलना), मराठी- भिड़णे (पास आना, कशमकश), हिन्दी-भिड़ना (जोर-आजमाइश) का उल्लेख करते हुए भीड़ (जन-जमाव) और भेट यानी मिलना, भेला, भिल्ल (मिलना, समूहन, बन्धन, मिश्रण), सिन्धी- भेटणूँ (आलिंगन) जैसे शब्दों का उल्लेख भी करते हैं जो इसी कड़ी में आते हैं।

गौर करें, भेट शब्द में जो मिलने का भाव है। मालवी में भेट से भेटना क्रिया बनती है और मराठी में भेट से भेटणे। संस्कृत में निकटता, पास जाना, समीप आना जेसे भाव ‘अभ्ये’ से प्रकट होते हैं। कुलकर्णी ‘अभ्येति’ से प्राकृत भिट्ट का रिश्ता बताते हैं जो तार्किक है। मोनियर विलियम्स के कोश में अभ्येत्य की प्रविष्टि है। अभ्येत्य > अब्भिट्ठ
>अभिट्ठ > भिट्ट से हमें भिट मिलता है जिससे भेट बनता है या अभ्येत्य> अब्भिड >; भिड़ के विकासक्रम में हमें भिड़ना, भेड़ना प्राप्त होते हैं। मराठी का भिड़ू यानी संगी, साथी, प्रतिस्पर्धी या हिन्दी के भीड़भाड़, भिड़न्त जैसे अनेक शब्दों में रिश्तेदारी इससे साबित होती है।
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Thursday, December 25, 2014

// याद है ‘परकार’? जानिए ‘परकार’//

पिद्दी से दिनों में अपना स्कूल और बस्ता जितना नामुराद लगता था, उतना ही लुभाता था बड़े भाई-बहनों का स्कूल और उनका बस्ता। खास तौर पर कम्पास-बॉक्स के लिए बेहद कशिश थी। टीन का चपटा डिब्बा जिसमें अजीबोग़रीब आकार की चीज़ें और रबर-पैंसिल होती थीं। सोचते थे कब हम बड़े हों जाएँ और कब ये तिलस्माती बक्सा हमारे बस्ते में भी आ जाए। कुछ बच्चे अनुकरण के आधार पर कम्पाक्स-बॉक्स भी कहते थे। इस करिश्माती डब्बे में टिड्डे की टाँग जैसी दो नुकीली टाँगे होतीं- एक नुकीली होती। दोनों को घुमाने से कागज पर घेरा बन जाता। ये करतब हमें लुभाता था। बहरहाल, अब तक आप समझ चुके हैं कि हम ‘परकार’ की बात कर रहे हैं जो लगता हिन्दी का है पर आया फ़ारसी से है। ‘परकार’ का सही उच्चार ‘परगार’ है। बात थोड़ी अजीब लग सकती है कि यह ज्यामितीय उपकरण दरअसल हल जैसे कृषि उपकरण का विकसित रूप है। इस मिसाल से यह फिर साबित होता है कि हमारी आज की तरक्की दरअसल कृषि संस्कृति के लगातार विकसित होते जाने का परिणाम ही है।

‘परगार’ या ‘परकार’ में मूल आशय ऐसे उपकरण से है जो घेरा बनाता हो। ध्यान से देखें तो इस परकार में हमें भारोपीय भाषा परिवार का विस्तार नज़र आता है। गौरतलब है कि भारोपीय भाषा परिवार में 'पर' per / peri जैसी धातुएँ उपसर्ग की तरह प्रयुक्त होती हैं। इसमें चारों ओर, आस-पास, इर्दगिर्द, घेरा जैसे भाव हैं। संस्कृत का ‘परि’ उपसर्ग इसी से व्युत्पन्न है जिससे बने दर्जनों शब्द हम रोज़ इस्तेमाल करते हैं जैसे परिवहन, परिस्थिति, परिधान आदि। 'परि' इसका ही अवेस्ता रूप पइरी होता है। अवेस्ता के दाएज़ा यानि दीवार से जुड़ कर बने पइरीदाएज़ा (pairidaeza) में ऐसे स्थान का आशय है जिसके चारों ओर सुरक्षित परकोटा है। इसका अर्थ हुआ सुरम्य वाटिका, आरामग़ाह। प्रसंगवश पइरीदाएज़ा का कायान्तरण ग्रीक में paradeisos, लैटिन में पैराडिसस तो पुरानी फ्रैंच में यह पैरादिस में ढल गया। अंग्रेजी में इसका रूप पैराडाइज़ हुआ। इन तमाम रूपान्तरों में स्वर्ग, बहिश्त, वैकुण्ठ, जन्नत, ईडेनगार्डन जैसे अर्थ स्थिर हुए। बाद में अवेस्ता के पइरीदाएज़ा का बरास्ता पहलवी होते हुए फ़ारसी रूप बना फ़िर्दौस (हिन्दी में फिरदौस)।

तो बात चल रही थी भारोपीय धातु per / peri की जिसे उपसर्ग की तरह बरता जाता है। हिन्दी, अंग्रेजी, स्पैनिश, फ्रैंच, फ़ारसी आदि कई प्रमुख भाषाओं में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं। अंग्रेजी में पेरीनियल, पर्सेप्शन, पर्सिव जैसे शब्दों में यही per / परि है। इसी तरह हिन्दी में परिधि, परिपक्व, परिप्रेक्ष्य, परिभाषा, परिवार आदि शब्दों में यह भलीभाँति अपनी अर्थछटाओं के साथ मौजूद है।

हम जानते हैं कि जिस तरह हिन्दी, संस्कृत से स्वतन्त्र भाषा है, उसी तरह फ़ारसी भी अवेस्ता से स्वतन्त्र भाषा है। अलबत्ता इन दोनों की रिश्तेदारियाँ सघन है। विकासक्रम में हिन्दी, संस्कृत के बाद आती है उसी तरह अवेस्ता के बाद फ़ारसी। अवेस्ता और संस्कृत में बहनापा रहा है। संस्कृत या वैदिकी का ‘परि’ उपसर्ग अवेस्ता में ‘पइरी’ हो जाता है। परकार का पहला पद 'पर' अवेस्ता के ‘पइरी’ से आ रहा है जो संस्कृत ‘परि’ का समतुल्य है। ‘परकार’ के अगले पद ‘कार’ में मूलतः करने का भाव है, ऐसा अनेक भाषाविदों का मानना है। यह ‘कार’ वैदिकी या संस्कृत के ‘कर’ का समतुल्य है जिसमें ‘कर्म’ करने का भाव है। अर्थात संस्कृत के ‘परिकर’ का समतुल्य है अवेस्ता का ‘पइरी-कार’। अर्थ हुआ जिससे परिधि बनाई जाए।

दरहकीकत ऐसा नहीं है। कार का मूल 'कृष' है। ‘कृषि’ शब्द बना है ‘कृष्’ धातु से जिसका अर्थ है खींचना, धकेलना, उखाड़ना और हल चलाना। ध्यान दीजिए कि हल चलाने में ये सभी क्रियाएं पूरी हो रही हैं और हल चलाने का काम कौन करता है? हल खींचे बिना खेती मुमकिन नहीं सो कृष् से बना ‘कृषि’ जो संस्कृत-हिन्दी में समान रूप से है। कृष् से ही संस्कृत का एक अन्य शब्द जन्मा ‘कर्ष’ जिसका अर्थ भी खींचना, घसीटना, हल चलाना ही है। इसमें ‘आ’ उपसर्ग लगने से बना ‘आकर्षण’ जिसका मतलब है खिंचाव,रूझान या लगाव। अवेस्ता ने कृष् के स्थान पर ‘कर्ष’ को अपनाया। ‘र’ का लोप होते हुए ‘कश’ बाकी रहा। खींचने के अर्थ में फ़ारसी, उर्दू में यह ‘कश’ आज तक कई रूपों में नज़र आता है। धुएँ का कश, दिल के खिंचाव वाली ‘कशिश’, तनाव वाला खिंचाव यानी ‘कशमकश’, ‘रस्साकशी’ जैसे शब्दों में भी यह मौजूद है। ‘कशीदाकारी’ में यानी बेलबूटे बनाना जिसमें सूई में धागा पिरोने से लेकर टाँका लगाने तक में खींचने की क्रियाएँ शामिल है।

‘पइरी-कार’ में दरअसल ‘कर्ष’ से ही ‘कार’ बन रहा है। इसी ‘कर्ष’ से मध्यकालीन फ़ारसी में ‘काश्तन’ भी बनता है और फारसी रूप ‘कारीदन’ जिसमें बोने, जोतने, कुरेदने का भाव है। ‘कृष्’ से ‘कृषि’ और ‘कर्ष’ से ‘कश’ फिर ‘काश्तन’ और फिर ‘काश्तकारी’ जो हिन्दी में भी है। ‘परकार’ पर गौर करें तो इसकी दोनों नुकीली भुजाएँ दरअसल प्राचीनकाल में हल का जोड़ा ही है। पुराने ज़माने में हल के ज़रिये न सिर्फ़ जुताई होती बल्कि सीमांकन के लिए भी यही तरकीब आज़माई जाती थी। संस्कृत ‘परिकर’ की अर्थछटाओं को देखें तो उसमें से एक भी परकार में निहित भाव से मेल नहीं खाती। इससे ही साबित होता है कि ‘परिकर’ और ‘परकार’ का विकास अलग अलग ढंग से हुआ है। ‘परिकर’ में आसपास घूमना, अनुचर, परिचर जैसे भाव हैं या इसे कमरबंद, करधनी जैसा आभूषण बताया गया है। इसके विपरीत ‘परकार’ दरअसल प्राचीन सीमांकन तकनीक से विकसित हुआ शब्द है। पुराने ज़माने में ज़मीन में खूँटा गाड़ कर उसके इर्दगिर्द एक बड़ी रस्सी के छोर पर बैलों के गले में जुआ पहनाकर हल जोत दिया जाता था। वे दायरे में गोल चक्कर लगाते और इस तरह सीमांकन हो जाता। ‘परकार’ में कर्म वाला कर न होकर ‘कर्ष’ से विकसित ‘कार’ है जिसमें ‘श’ का लोप हो गया।

फ़ारसी में ‘क’ का रूपान्तर ‘ग’ में होना आम बात है। परकार का ‘परगार’ बना। अरबी में इसका एक रूप ‘बिरकार’ है तो दूसरा ज्यादा प्रचलित रूप ‘फरजार’ है। गौरतलब है कि अरबी में ‘ज’ और ‘ग’ में भी रूपान्तर होता है जैसे अरबी में ‘जमाल’ को ‘गमाल’ भी कहा जाता है।
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Saturday, December 20, 2014

।।रईसनामा।।


हि न्दी में अरबी-फ़ारसी शब्दों की रच-बस पर गौर करें तो भाषा, समाज, संस्कृति को समझने का नज़रिया व्यापक होने के साथ आसान भी होता जाता है। ‘रईस’ शब्द को ही लें। भाषा को च्युइंगम की तरह इस्तेमाल करनेवालों को इसकी कतई परवाह नहीं होनी चाहिए कि यह कहाँ से आया, कब आया। उनके लिए इतना काफी है कि समृद्ध, धनवान, पैसेवाला, ऐश्वर्यशाली, धन्नासेठ, करोड़पति, अरबपति, अमीर, श्रीमन्त, धनाड्य, मालदार या हीरालाल-पन्नालाल टाईप शख़्सियत के लिए ‘रईस’ शब्द का इस्तेमाल करने से उनका काम चल जाता है। पर बात इससे आगे निकलती है जब हम यह जानने की कोशिश करें कि अपनी मूल भाषा अरबी में इस शब्द के क्या मायने हैं। अरबी में ‘रईस’ अर्थात सर्वोच्च, प्रमुख, नेता, खास, मूल, प्रथम, सरदार, अगुआ, स्वामी, मालिक, अध्यक्ष अथवा सरपरस्त।

रईस यानी अमीर। बोलचाल की हिन्दी में इसकी इतनी ही अर्थवत्ता है। इसी तरह अमीर का अर्थ भी हिन्दी में सिर्फ धनी है मगर अरबी-फ़ारसी में अमीर की भी वही अर्थछटाएँ हैं जो रईस की हैं। रईस के मूल में अरबी की त्रिवर्णी धातु ‘रास’ س ا ر अर्थात ‘रा’ ‘अलिफ़’ ‘सीन’ है जिसमें मूल रूप से शीर्ष अथवा सिर का भाव है। ध्यान रहे अरबी ज़बान सेमिटिक परिवार से आती है। हिब्रू भी सामी कुनबे से ही है और इराकी अरबी जिसे आरमेइक कहते हैं वह भी। हिब्रू में अरबी की ‘स’ ध्वनि अक्सर ‘श’ हो जाती है मसलन अरबी का ‘अस्सलाम’ या ‘सलाम’ हिब्रू में ‘शॉलोम’ हो जाएगा। सो ‘रास’ की तर्ज़ पर हिब्रू में rosh अर्थात ראש है। जिसका अर्थ वास्तविक तौर पर शीर्ष यानी सिर– गर्दन के ऊपर का हिस्सा है। रोश का शुरुआती अक्षर हिब्रू वर्णमाला का रेश ר अर्थात resh है।

हम इस बहस में नहीं पड़ेंगे कि हिब्रू अधिक प्राचीन है या अरबी किन्तु यह तय है कि भाषा की प्राचीनता का शास्त्रीय आधार उसके अभिलेखीय प्रमाण है। इस आधार पर हिब्रू कि प्राचीनता निर्विवाद है। गौरतलब है कि हिब्रू वर्णमाला के 'रेश' ר अक्षर का आकार भी मनुष्य के सिर के पार्श्व जैसा है और इसका अर्थ भी शीर्ष ही है। ‘रेश’ का ही परिवर्तित रूप अरबी का ‘रा’ ر है। हिब्रू का ‘रोश’ ही अरबी में ‘रास’ हो जाता है। अरबी तक आते आते हिब्रू ‘रेश’, ‘रोश’ की अर्थछटाएँ काफी विस्तार पाती हैं और इससे कई अन्य शब्द भी विकसित होते हैं।

इसी ‘रास’ का रूपान्तर ‘रईस’ भी है जिसमें धनी-मानी की तमाम अर्थछायाओं के साथ स्वामी, प्रमुख या सरपरस्त जैसे भाव हैं। ‘रईस’ का विशेषण रूप ‘रईसी’ और ‘रईसाना’ हैं यानी रईसों जैसा। खास बात यह भी कि ख्यात भाषाविद् अर्न्स्ट क्लैन अपने हिब्रू व्युत्पत्तिकोश में ‘रईस का रिश्ता अंग्रेजी के उस ‘रेस’ शब्द से भी जोड़ते हैं जिसका अभिप्राय नस्ल, वंश, कुटुम्ब अथवा कुल है। हालाँकि भाषाशास्त्री इस पर एकमत नहीं हैं फिर भी इस बात की काफी सम्भावना है कि हिब्रू का ‘रोश’ ही अरबी में ‘रास होता हुआ स्पैनिश में रैज़ा हुआ| बरास्ता इतालवी रेज्ज़ा यह अंग्रेजी में ‘रेस’ हुआ। जातीय या जातिगत अर्थ में इससे ‘रैशल’ बनता है। सवाल उठता है प्रमुख, मुख्य, अधिपति, धनाड्य जैसे अर्थों से होते हुए कुल, कुटुम्ब जैसे अर्थ ‘रेस’ में कैसे समा गए ?

बात ये है कि ‘शीर्ष’ अर्थात भौतिक ‘सिर’ ही शरीर का मुख्य हिस्सा होता है। सबसे पहले सिर ही दिखता है। सो हिब्रू के ‘रेश’ का ‘सिर’ जब अरबी में पहुँचता है तो इसका अर्थविस्तार होता है। गौर करें अंग्रेजी में ‘हेड’ का अर्थ प्रमुख भी होता है और ‘सिर’ भी। हेड यानी सिर से ही प्रमुख की अर्थवत्ता विकसित हुई। इसी तरह ‘मुख’ में जो ‘मुखड़ा’ है वह ‘प्रमुख’ में भी नज़र आता है। शीर्ष से सिर बनता है और फिर ‘सरदार’ भी बनता है। सरदार यानी मुखिया। सो ‘रास’ यानी ‘सिर’। सिर यानी शीर्ष यानी सर्वोच्च। इस तरह जो सर्वोच्च है वह स्वामी, सरदार। जो मालिक- मुखिया होगा वह निर्धन तो हो नहीं सकता सो सर्वोच्च के साथ ऐश्वर्य भी जुड़ गया। इस तरह अरबी रास वाला सिर ‘रईस’ तक आते आते मुखिया या धनी-मानी हो जाता है। जो प्रमुख है वह मुख्य है। मुख्य में ही मूल है अर्थात वही मूलस्रोत है। वही जड़ है। वही आदि है और आरम्भ है। इस तरह 'रास' से ही अंग्रेजी के रेस में आरम्भ, शुरुआत, मूल जैसे अर्थों से गुज़रते हुए कुल, कुटुम्ब, जाति जैसे अर्थ स्थापित हुए।
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Wednesday, December 17, 2014

//क्या मशगला है//


हिन्दी में शग़ल शब्द का प्रयोग खूब होता है। ऐसा कोई काम जिससे मन बहलता हो, इसी अर्थ में अक्सर हिन्दी में इसका प्रयोग होता है। जबकि शग़ल के असली मायने हैं काम-धंधा या रोज़गार। सामान्य बातचीत में “...और क्या शग़ल इन दिनों?” के पीछे काम-धन्धे से ही तात्पर्य होता है। हिन्दी में शग़ल का मोटा अर्थ मनोविनोद या दिलबहलाव लिया जाता है। शग़ल सेमिटिक परिवार का शब्द है और अरबी से फ़ारसी होते हुए हिन्दी में दाखिल हुआ। इसके निकट सम्बन्धी कुछ अन्य शब्द भी हिन्दी में प्रचलित हैं।

शग़ल बनता है शीन-घ़ैन-लाम (ل- غ- ش) से। अ डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश में जॉन प्लैट्स इसकी विवेचना यूँ करते हैं- “Business, occupation, employment, labour, study; anything to occupy or divert” हालाँकि वे इसका एक अर्थ amusement यानी मनबहलाव भी बताते हैं पर यह इसकी अर्थछटाओं का एक रूप है। मूल अर्थ तो रोजगार, खुद को व्यस्त रखना, कामधंधा आदि ही है।

उर्दू के नज़रिए से शग़्ल, शुग़्ल व्यवहार में आते हैं। हिन्दी में शग़ल लिखा बोला जाता है। मुहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह के उर्दू-हिन्दी शब्दकोश में दिलबहलाव के संदर्भ में शग़लेमै लफ़्ज़ दिया है यानी मद्यपान के ज़रिये दिल बहलाना (शग़ल ऐ मै)। शग़ल में ही अरबी का ‘म’ उपसर्ग लगने से मश्ग़लः बनता है जिसका अर्थ व्यापार, शग़ल, व्यवसाय, रोज़ी, रोज़गार, काम-धंधा ही है। हिन्दी में इसे मशग़ला लिखा जाता है। व्यस्त, तल्लीन या मनोयोग से जुटे रहने के अर्थ में हिन्दी में मशगूल शब्द बड़ा आम है। इसकी वर्तनी मे गड़बड़ी की जाती है। कुछ लोग इसमें ह्रस्व स्वर लगाते हैं जो गलत है।

शग़ल से इश्ग़ाल और तश्ग़ील भी बनते हैं पर इनका चलन अरबी में ही है अलबत्ता उर्दू में इसी कड़ी का इश्तिग़ाल प्रचलित है जिसमें काम में लीन होना, मश्ग़ूल होना, तन्मयता, संलग्नता जैसे अर्थ हैं। गौरतलब है कि इश्तिग़ाल से मुँह फेरना या विमुख होना जैसी अभिव्यक्ति भी होती है। स्वाभाविक है कि जो व्यक्ति काम में मशग़ूल होगा, उसे दीनो-दुनिया से तो मुँह फेरना ही होगा। तल्लीन व्यक्ति दुनिया से विमुख इसीलिए कहे जाते हैं।
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Saturday, December 13, 2014

।।डण्डा करना।।


आ जकल एक मुहावरा चल पड़ा है- डण्डा करना। इसका लाक्षणिक अर्थ है किसी को डण्डे से आगे ठेलना। भावार्थ हुआ किसी काम में सक्रिय करना। इसका अर्थविस्तार अब किसी काम में व्यवधान डालना, अड़चन पैदा करना या उकसाना भी हो गया है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पुलिसिया कार्यप्रणाली से जन्मा शब्द है। लोक-व्यवहार में अतीत से ही डण्डे के ज़रिये उकसाने, ठेलने के काम आदि किए जाते रहे हैं। पहुँच से दूर किसी व्यक्ति तक उठ कर जाने की बजाय डण्डे के स्पर्श और दबाव से उसे संकेत देना या प्रेरित करना बहुत पुरानी तकनीक रही है। गौर करें किसी नाली को अवरुद्ध हो जाने पर डण्डे के ज़रिये ही सुचारू बनाया जाता है। यूँ इस मुहावरे का अश्लील अर्थ लेने वालों की भी कमी नहीं है। यन्त्रणा देकर अपराध कबूलवाने के लिए गुदा में डण्डा डालना भी एक आम पुलिसिया हथकण्डा है।

दुनियाभर की संस्कृतियों में डण्डे को बतौर कानूनी प्रतीक मान्यता मिली हुई है। इसी लिए डण्डे का पुलिस से भी स्वाभाविक रिश्ता है। मूलतः पुलिस-प्रशासन की जिम्मेदारी कानून का पालन कराने की है। डण्डा इसे लागू कराता है। डण्डा यानी बाँस या लकड़ी का लम्बा टुकड़ा , छड़ी या सोंटा। मोनियर विलियम्स दण्ड का रिश्ता ग्रीक डेन्डरॉन/ डेन्ड्रॉन- dendron से भी बताते हैं। डॉ. जेम्स स्ट्राँग के बाइबल-कोश में डेन्डरॉन/ डेन्ड्रॉन का अर्थ वृक्ष या पेड़ है। डण्डा के मूल में वैदिक क्रियारूप दण्ड है जिसमें लकड़ी, छड़ी, सोंटा जैसे अर्थ तो हैं ही कालान्तर में प्रताड़ना, सजा आदि के तौर पर दण्ड का अर्थविस्तार हुआ। किसी को “तीन डण्डे लगाने” में सजा देने का भाव निहित है। पुराने ज़माने में डण्डे जमा कर ही दण्डित किया जाता था। गौर करें “दण्डित करने” में डण्डे लगाने की क्रिया ही है। इस तरह दण्ड, सजा का पर्याय बना। दण्ड का अर्थ जुर्माना भी होता है। इसके लिए अर्थदण्ड शब्द भी प्रचलित हुआ।

बाद के दौर में नियन्त्रण, समूहन, सेना, न्यायशक्ति आदि जैसी अभिव्यक्तियाँ भी दण्ड में निहित हुईं। प्राचीनकाल से डण्डे के जोर पर दुनिया चल रही है। राजा के हाथ में हमेशा दण्ड रहता था जो उसके न्याय करने और सजा देने के अधिकारी होने का प्रतीक था। आज भी जिलाधीश के पास दंडाधिकारी के अधिकार होते हैं। इसीलिए उसे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट कहते हैं। वह न्याय करता है। मजिस्ट्रेट की टेबल पर रखा हथोड़ा इसी दंड का प्रतीक है। पौराणिक ग्रंथों में यम, शिव और विष्णु को भी दण्डाधिकारी कहा गया है। कानून व्यवस्था सम्भालने वाले अफसर को दण्डनायक शब्द मिलता है। अर्दली या चौकीदार को दण्डधर कहा जाता था।

भुजदंड भी एक प्रयोग है। प्रणिपात के अर्थ में भी 'दंडवत' शब्द का प्रयोग होता है जिसमें दण्ड की भाँति भूमि पर लेट कर नमन करने का आशय है। दंड धारण करने वाले सन्यासी को दंडीस्वामी कहा जाता है। दंड धारण करने की परंपरा प्रायः दशनामी सन्यासियों में प्रचलित है। शंकराचार्य परंपरा के ध्वजवाहक मठाधीश भी दंडधारण करते है। प्राचीन धर्मशास्त्र मे दंड का महत्व इतना अधिक था कि मनुस्मृति में तो दंड को देवता के रूप में बताया गया है। एक श्लोक है-
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।।
(दंड ही शासन करता है। दंड ही रक्षा करता है। जब सब सोते रहते हैं तो दंड ही जागता है। बुद्धिमानों ने दंड को ही धर्म कहा है)
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Tuesday, December 9, 2014

//थाँके टिपे नी काँईं ?//


प्र

त्येक बोली-भाषा में कुछ अनोखे शब्द होते हैं। मालवी भाषा में देखने के लिए एक खास क्रिया का प्रयोग होता है- ‘टिपना’ जैसे- “थाँके कम टिपे काँई?” अर्थात तुझे कम दिखता है क्या? यह ‘टिप’ कहाँ से आ रहा है? गौर करें प्रचीनकाल से ही ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सूर्य रहा है। अन्तरिक्ष की ओर ताकना प्रागैतिहासिक काल से मनुष्य का प्रिय शगल रहा। ऊष्मा, ऊर्जा, चमक ये सब अग्नि के गुणधर्म हैं। सूर्य उगने पर ही मनुष्य के सामने दृष्यजगत उजागर होता था। हमें कुछ भी दिखता इसलिए हैं क्योंकि वह प्रकाशित है। यानि प्रत्येक वस्तु में कुछ न कुछ भासित है क्योंकि वह दीप्त है। व्ह जो दीप्त है उसे हिन्दी में दिपना कहते हैं| यही मालवी का टिपना है| दिपना-टिपना के ज़रिये जानते हैं हिन्दी के कुछ बेहद प्रचलित शब्दों के बारे में। 

हर भाषा में किन्हीं ध्वनियों में बदलाव का अलग अंदाज़ होता है जिससे शब्दों का विकास होता है। हिन्दी-ईरानी में एक ही वर्णक्रम की ध्वनियों में बदलाव होता जाता है जैसे ‘प’ और ‘व’ में परस्पर बदलाव होता है। उदाहरण के लिए वैदिक शब्द ‘तप्’ को लें जिसमें अग्नि, चमक, ऊर्जा के साथ कष्ट, साधना, अभ्यास का भाव भी है। इससे ही तपस्वी, तपस्या, तापस जैसे शब्द बने। ‘तप’ का विकास ताप है। हिन्दी-फ़ारसी में ‘ताप’ से ‘ताव’ बनता है जिसमें गर्मी का भाव है। ‘ताव’ से ही मालवी-राजस्थानी में ‘तावड़ा’ बनता है यानी धूप। ‘तपः’ का एक रूप फारसी में तबाह बनता है जिसका अर्थ है बर्बादी, विनष्ट, जर्जर, ध्वस्त, निर्जन, वीरान आदि। समझा जा सकता है कि किसी जमाने में अग्नि से जुड़ी विभीषिका को ही तबाही कहा जाता रहा होगा।

हम जिसे दिन कहते हैं उसका एक रूप दिवस है। दिवस का मूल दिव है। गौर करें, यह दिव दरअसल दिप् रहा होगा और यह भी कि तप, ताप जैसे शब्द इसी दिप् से विकसित हैं। वैदिकी में दिप् नहीं है, दीप् क्रिया है किन्तु इसका पूर्वरूप दिप् ज़रूर रहा होगा क्योंकि कालान्तर में ऐसे अनेक वैदिक-संस्कृत शब्दरूप बने जिनका मूल दिप् ही सिद्ध होता है। यही दिप्, टिपना क्रिया का मूल है। ख्यात भाषाविद् डॉ रामविलास शर्मा “भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश-1” में ऋग्वेद के तपस् /तवस रूपों की चर्चा करते हैं। तपस् जो ऊष्मा के अर्थ में प्रयुक्त हुआ तथा तवस् जिसका प्रयोग ऊर्जा, शक्ति के अर्थ में हुआ है, इससे साबित होता है कि दिव् का पूर्वरूप भी दिप् रहा होगा जिससे दीप् क्रिया बनी होगी जिसमें जलना, ऊर्जा, ऊष्मा, चमक, प्रकाश जैसे भाव है और इससे ही दीप, दीपक, दीवाली जैसे अनेक शब्द बने। यह साबित होता है हिन्दी की ‘दिपना’ क्रिया से जिसका अर्थ चमक, प्रकाश या प्रदीपन है। मूल भाव है दिखना। यह न माना जाए कि ‘दिपना’ का अगला रूप ‘टिपना’ है। टिपना ‘टिप’ से आ रहा है और दिपना ‘दिप’ से। ‘दिप्’ के ‘टिप्’ रूप से मालवी की ‘टिपना’ क्रिया बनी।

‘दिप’ में निहित दीप्ति, चमक, प्रकाश जैसे भाव ही ‘टिप’ में भी समाहित है। कोई चीज़ जब चमकती है तो ही नज़र आती है। हाँ, संस्कृत में इसका अर्थविस्तार भी हुआ और इसमें चमक, झलक, दिखाना, व्याख्या जैसे भाव हैं। किसी वस्तु का दीप्तिमान होना या उसका दीपन, प्रदीपन होना ही उजागर होना है। टिप से ही मालवी बोली में ‘टिपना’ शब्द बना जिसका अर्थ है दिखना। हिन्दी में ‘टिप्पणी’ या टीका-टिप्पणी शब्द भी खूब प्रचलित है। टिप्पणी का अर्थ है किसी वाक्य, वस्तु, स्थान अथवा विचार को स्पष्ट करने वाला विवरण। इस में भी मूलतः उजागर करने का ही भाव है और इसीलिए इसे टिप्पणी कहा जाता है।
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Thursday, December 4, 2014

||टंटा और ताण्डव||


टं टा हिन्दी की प्रचलित शब्दावली का एक लोकप्रिय शब्द है। झगड़ा, फ़साद, दंगा, लड़ाई, अड़चन या बखेड़ा के अर्थ में इसका खूब इस्तेमाल होता है। यही नहीं प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए टंटा-फ़साद या झगड़ा-टंटा जैसे युग्म शब्द भी बोले जाते है। टंटा की रच-बस हिन्दी समेत तमाम उत्तर भारतीय भाषाओं में है। जानकर ताज्जुब हो सकता है कि द्रविड़ भाषाओं में भी इसकी व्याप्ति है। मराठी में टंटा का तंटा रूप देखने को मिलता है। कन्नड़ में इसका रूप तंटे है जिसके मायने झगड़ा, फ़साद, उपद्रव या उलझन है। मराठी-कन्नड़ में उपद्रवी या फ़सादी व्यक्ति को तंटेखोर कहा जाता है। टंटा करना, टंटा मचाना जैसी मुहावरेदार अभिव्यक्तियाँ हिन्दी में आम है। इसी तरह ताण्डव फैलाना या ताण्डव मचाना भी हिन्दी में खूब बोला जाता है। टंटा और ताण्डव में क्या रिश्ता है?

आर्य-द्रविड़ संस्कृतियों के बीच निरन्तर भाषायी सम्पर्क रहा है। शाब्दिक घुसपैठ इतनी ज्यादा है कि कभी कभी यह लगने लगता है कि कहीं संस्कृत और द्रविड़ दोनों भाषाओं का मूलस्रोत एक ही तो नहीं! बहरहाल हिन्दी के टंटा शब्द का रिश्ता कन्नड़ के तंटे से है। कन्नड़ का तंटे तमिल के ताण्टु से विकसित हुआ जिसमें नाचने का भाव है। एमेनो-बरो के द्रविड़ व्युत्पत्ति कोश में तण् क्रिया का उल्लेख है जो गतिवाचक है। इससे तण्टु, ताण्टि जैसे शब्द बनते हैं जिनमें उछल-कूद, फलांग, लांघ, छलांग और कूद-फांद का आशय है। इसी कड़ी में आता है ताण्टवम् जिसका अर्थ है रौद्र एवं उन्मत्त मुद्राओं वाली नृत्यशैली। बरो भारोपीय मूल की जर्मन भाषा के टान्त्स (नाच), टान्त्सन (नाचना) और अंग्रेजी के डान्स शब्द को द्रविड़ मूल तण्टु से रूपान्तरित ही मानते हैं। हालाँकि जॉन प्लैट्स टंटा शब्द की व्युत्पत्ति स्तनित से बताते हैं जिसका अर्थ मोनियर विलियम्स के कोश में कानफाड़ू शोर दिया हुआ है। टंटा में निहित कलह या उपद्रव का भाव कहीं नहीं है जबकि प्लैट्स स्तनित का सीधा सीधा अर्थ झगड़ा या लड़ाई बताते हैं जो ध्वनिसाम्य के आधार पर खींच-खांच कर व्युत्पत्ति सिद्ध करने का प्रयास लगता है।

तमिल ताण्टवम के सादृष्य पर संस्कृत का ताण्डव है। शिव की प्रसिद्ध नटराज शैली की नृत्यमुद्रा। इसे संहार से भी जोड़ा जाता है। इस शैली में नृत्य की चिर-परिचित चेष्टाओं का उल्लंघन है| सीमाओं को तोड़ कर, दायरे से बाहर निकलते हुए विलक्षण अंग-विक्षेपों और हाव-भाव-मुद्राओं की वजह से इसे ताण्डव कहा जाता है। तण्टु, तण्टि जैसे शब्दों में निहित उछल-कूद और फिर के शिव के रौद्ररूप को प्रदर्शित करने वाले ताण्टवम वाले परवर्ती विकास से कन्नड़ में तण्टे, तंटे जैसे शब्दरूप सामने आए और हलचल, उपद्रव जैसी अर्थछटाएँ विकसित हुईं। तण्टु में सीमोल्लंघन के साथ अंगविक्षेप का भाव महत्वपूर्ण है। टंटा में निहित झगड़ा, बखेड़ा, फ़साद, कोहराम, कलह, प्रपंच, तकरार या खटराग जैसे अर्थ इसी वजह से सहज विकसित होते चले गए।

प्रसंगवश यह भी चर्चा कर लेना ठीक होगा कि शिव को द्रविड़ मूल का देवता मानने जैसी धारणा को अब अधिकांश विद्वान सही नहीं मानते हैं। भाषा विज्ञान से प्रमाणित भी होता है। तमिल के चॅ, चॅम् जैसे शब्दों में लालिमा का भाव है। चिव क्रिया में लाल होने का अभिप्राय है। डॉ रामविलास शर्मा कहते हैं कि इसे ही शिव के द्रविड़ देवता होने का प्रमाण मान लिया गया। देखा जाए तो तमिल में श् ध्वनि नहीं है। संस्कृत में शिव, शंभु और शंकर तीनों नाम श् से आरम्भ होते हैं। संस्कृत में च् ध्वनि है। शिव का चिव रूप आत्मसात करने में संस्कृतभाषियों को समस्या नहीं थी। वैदिक शिव ही तमिल में चिव हो जाते हैं। वैदिक वाङ्मय में रुद्र का उल्लेख है। रुद्र के साथ शिव का एकाकार बाद में हुआ। इसी रुद्र से रौद्र शब्द बनता है। यही रौद्र रूप द्रविड़ संस्कृति वाले शिव में अभिव्यक्त होता है। इसीलिए शिव की रौद्र-मुद्रा वाली अभिव्यक्ति को वहाँ ताण्टवम कहा गया। संस्कृत ने इसे ताण्डव के रूप में ग्रहण किया।
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Tuesday, December 2, 2014

सचिन और राखी


राखी और सचिन में भला क्या रिश्ता हो सकता है? इसमें कोई दो राय नहीं कि क्रिकेट वाले सचिन की वजह से भारत में के लोकप्रिय नामों की सूची में सचिन का शुमार भी हो चुका है। हालाँकि जो सचिन हिन्दी में बरता जा रहा है वह हिन्दी का अपना न होकर मराठी प्रभाव वाला सचिन है। हिन्दी में शुद्धरूप स पहले तो ये जानें की सचिन के मायने क्या हैं।

सचिन का मूलार्थ दरअसल इन्द्र है। यह शचीन्द्र का ही घिसा हुआ तृतीय रूप है। द्वितीय रूप है सचिन्द्र। इसकी पृथक अर्थवत्ता नहीं है। बांग्ला-मराठी के स्वरतन्त्र में अन्त्य व्यंजनलोप की प्रवृत्ति है जैसे मिलिन्द > मिलिन, देवेन्द्र > देवेन या सचिन्द्र > सचिन। मराठी और बांग्ला में "न्द्र" का लोप होकर सिर्फ 'न' ध्वनि रह जाती है।
शची या शचि और कहीं कहीं सची का उल्लेख पुराणों में इंद्र की पत्नी के तौर पर है। इसे भी इंद्राणी कहते हैं। शचि दानवराज पुलोमा की कन्या थी। इसी लिए इन्द्र को शचीपति भी कहा जाता है। इसकी कई अर्थछटाएँ हैं। जैसे- सारतत्व। वाग्मिता। प्रज्ञा। शक्ति। भक्ति। प्रीति। पवित्रता।

प्रसंगवश रक्षाबंधन से भी इसका रिश्ता है। भविष्य पुराण के अनुसार देवासुर-संग्राम में असुरों से दुःखी और पराजित इन्द्र को विजयश्रीवरण की युक्ति उनकी पत्नी शची ने जो स्वयं असुर पुत्री थीं, सुझाई थी। जिसके मुताबिक़ श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को ब्राह्मणों के विशिष्ट विधान से तैयार रक्षासूत्र खुद उन्होंने इन्द्र की कलाई पर बांधा। यह भी उल्लेख है की शची के कहने पर ब्राह्मणों ने उसे इंद्र की कलाई पर बांधा| जो भी हो, कहते हैं इसी के प्रभाव से देवताओं की विजय हुई। रक्षाबंधन तभी से मूलतः ब्राह्मणों के पर्व के तौर पर प्रचलित हो गया। धीरे धीरे प्रतिज्ञा रक्षा, क्षात्रधर्म, ब्रह्मरक्षा से होते होते इसकी भावना विश्वबंधुत्व तक पहुंची। लेकिन बहन-भाई के बीच स्नेह-रक्षा सूत्र के रूढ़ अर्थ में यह सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ।
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