Friday, August 7, 2015

आखिर क्या है ‘नावक’ और उसका तीर !!

हिन्दी के सामान्य पाठक का हक है लोकप्रचलित पदों का अर्थ जानना

एक ऐसे शब्द को बरतते हुए नए दौर की हिन्दी ने पूरी एक सदी बिता दी जिसका सटीक प्रयोग सब करते हैं किन्तु व्युत्पत्ति-विवेचना की दृष्टि से सम्भवतः पहले कभी इस पर इतनी गम्भीरता से विचार नहीं किया गया।


आज की हिन्दी में चाहे ‘नावक’ शब्द का प्रयोग नहीं होता, पर पाठ्यपुस्तकों वाली हिन्दी के ज़रिये इस शब्द से वास्ता ज़रूर पड़ता है। महाकवि बिहारी के सात सौ दोहों के संग्रह ‘सतसई’ का परिचय जिस “सतसैया के दोहरे, ज्यों ‘नावक’ के तीर, देखन में छोटे लगै, घाव करे गंभीर” दोहे में आता है, दरअसल हर किसी का ‘नावक’ शब्द से पहली बार साबका तभी पड़ता है। दिक्कत यह है कि सहजता से उपलब्ध हिन्दी सन्दर्भ ‘नावक’ का अर्थ बताने में लड़खड़ाते नज़र आते हैं। ‘हिन्दी शब्दसागर’ भी जब ‘नावक’ का अर्थ “एक छोटा तीर” बताता है तब सामान्य शब्दकौतुकी की जिज्ञासा का समाधान कैसे हो? गौरतलब है कि ‘नावक’ शब्द की आधारोक्ति में ही “ज्यों ‘नावक’ के तीर” यानी “जिस तरह ‘नावक’ के तीर होते हैं”...स्पष्ट किया गया है तब भी कोशकारों ने ‘नावक’ का अर्थ ‘छोटा तीर’ बता कर ही काम चला लिया जबकि अंग्रेजी, फ़ारसी, हिन्दुस्तानी कोशों में इसका अर्थ छोटे तीर के साथ साथ नली, नाली भी दिया हुआ है। दोहे से ही स्पष्ट है कि ‘नावक’ एक तरह का उपकरण है जिससे छोटे तीर चलाए जाते होंगे। अनजानेपन का आलम यह कि उच्चस्तरीय परीक्षाओं में ‘नावक’ के सम्बन्ध में आधिकारिक तौर पर कल्पना की उड़ान भरी जाती है। 2008 में राज्य लोकसेवा आयोग की अभ्यास पुस्तिका में देखिए क्या दर्ज़ है- ‘नावक’ = एक प्रकार के पुराने समय का तीर निर्माता जिसके तीर देखने में बहुत छोटे परन्तु बहुत तीखे होते थे। इसी तरह उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की परीक्षा में यही प्रश्न पूछा गया था और वहाँ ‘नावक’ का अर्थ बहेलिया बताया गया है। आश्चर्य क्या जब अनेक विद्वान-लेखक इसे ‘नाविक’ लिखते-बोलते हैं और ‘नाविक’ की पैरवी भी करते हैं। अब भला नाविक चप्पू चलाएगा या तीर? ‘नावक’ और उसके तीर के बारे में फ़ेसबुक पर छपी इन्हीं चंद पंक्तियों को पढ़ कर ख्यात कवि-अनुवादक श्री नीलाभ अश्क कुछ इस अंद़ाज़ में सामने आ गए मानो हमने किसी वर्जित क्षेत्र में दखल दे दिया हो। बहरहाल, आभारी हूँ कि उनकी आपत्तियों (चाहे वे रूढ़ थीं) के बहाने हमें अपनी बात और भी ज़्यादा विस्तार से रखने का मौका मिला। इस समूचे प्रकरण को समझने से पहले संक्षिप्त आलेख और उस पर नीलाभ अश्क की टिप्पणी पढ़ना ज़रूरी


‘नावक’ और उसका तीर
• आमतौर पर बन्दूक में एक नली होती है। ‘दुनाली’ शब्द सामने आते ही हमारे सामने ऐसी बन्दूक की छवि आती है जिसके साथ दो नलियाँ जुड़ी होती हैं। इसी तरह ‘नावक’ को भी समझा जा सकता है। ‘नावक’ दरअसल फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी में आया है। फ़ारसी में ‘नावः’ शब्द का अर्थ होता है पनाला, परनाला। संस्कृत में प्रणाली या प्रणालिका जैसे शब्द हैं और इनका फ़ारसी रूप हुआ परनाला, पनाला। ‘नावः’ या ‘नाव’ में सामान्य नाली, नहर या प्रणाली का भाव भी है। गौर करें नली जहाँ चारों और से बन्द लम्बी मगर पोली प्रणाली है वहीं नाली अर्धवृत्ताकार, खुली प्रणाली है। ‘नाव’ का प्रणाली वाला अर्थ और स्पष्ट होता है नाबदान से जिसका अर्थ भी दूषित पानी बहाने वाली नाली ही है। यह मूलरूप से ‘नावदान’ है। भारत-ईरानी परिवार की भाषाओँ में ‘व’ का रूपान्तर अक्सर ‘ब’ में होता है (जैसे वन से बन) उसी के तहत ‘नावदान’ का उच्चार ‘नाबदान’ हो गया। मद्दाह के कोश में नाव यानी नाली, नावः यानी छत से पानी गिराने वाला पाइप, नाबदान यानी दूषित जल का परनाला जैसे अर्थ दिए हैं। कुल मिलाकर हमें प्रणाली वाला अर्थ ग्रहण करते हुए ‘नावक’ का नलीदार भाव समझने में समस्या नहीं होनी चाहिए। मूलतः फ़ारसी में ‘‘‘नावक’ ’ ’ एक ऐसे अर्धस्वचालित धनुष को कहा जाता है जिसमें सीधे कमान में तीर फँसाकर नहीं छोड़ा जाता बल्कि कमान खींचने के बाद तीर को एक नाली में से गुज़ारा जाता है। तीर को लीवर या ट्रिगर के ज़रिये कमान से मुक्त किया जता है। ‘नावक’ में जो मुख्य भाव है वह तीर नहीं बल्कि उसका आशय खाँचा, सिलवट, शिकन, दर्रा, घाट, नहर, पाइप, नाड़ी, प्रणाली, प्रवाहिका आदि से है। एक ऐसा रास्ता जिससे सहज प्रवाह और गति मिले। जिससे कोई वस्तु गुज़र सके। यह प्रणाली ही गुज़रने वाली चीज़ को दिशा प्रदान करती है, लक्ष्य की ओर ठेलती है। संस्कृत में नाव का अर्थ नौका है फ़ारसी में ‘नाव’, ‘नावः’ दोनों शब्द हैं। दरअसल नाव जहाँ नौका है वहीं ‘नावः’ का अर्थ नाली भी है। फ़ारसी नावः (नावह) का एक रूप ‘नावक’ हुआ। भारत में ‘नावक’ इस्लामी दौर में ही आया।
नीलाभ अश्क की आपत्तियाँ-
• आप ने ये तस्वीरें गूगल पर crossbow India से ली हैं,किसी अजायबघर से नहीं, इसलिए मैं आप पर पूरा यक़ीन नहीं कर सकता। तो भी आप को सन्देह का लाभ देते हुए मैं असलहों और cross bow पर जिसे मध्य पूर्व में क़ौस फ़िरंगी (फ़रान्सीसी धनुष) कहा जाता था, कई साइटें देख गया। कहीं भी यह नहीं पता चला कि इसका हिन्दुस्तान में इतना आम इस्तेमाल होता था कि बिहारी को इसे दोहे के गुन के रूप में उपमा की तरह इस्तेमाल करने का ख़याल आये। मुस्तफ़ा ख़ां मद्दाह के शब्द कोश में भी ‘नावक’ का अर्थ तीर ही है और ग़ालिब के अशआर में भी। हां यह ठीक है कि आप यही सोचेंगे कि नाविक चप्पू चलायेगा या तीर, तो आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि शिप्रा जैसे नालों के तो नहीं पर गंगा जमुना जैसी नदियों के नाविक पूरी तरह हथियार बन्द होते थे और ज़ाहिर है कि उनके तीर और कमानें छोटी ही हो सकती थीं, होती थीं। देवी चौधरानी देख लीजिये। हमने बिहारी के सिलसिले में ‘नावक’ और नाविक दोनों ही सुना है। बाक़ी आप जाने कौन-से फ़ारसी शब्द कोश की बात कर रहे हैं, फ़ारसी में नली के लिए जो छत पर बारिश के पानी को बहाने के लिए लगायी जाती है नाव: इस्तेमाल होता है। ग़ालिब लफ़्ज़ों के मामले में बहुत सतर्क थे और फ़ारसी के विद्वान भी थे, उनका शेर है- क्यों न ठहरें हदफ़-ए-नावक-ए-बेदाद कि हम, आप उठा लाते हैं गर तीर ख़ता होता है- दूसरा मिसरा देखिये -- ग़रज़ शिस्ते-बुते-नावक’ -फ़िगन की आज़माइश है। बस।

‘नावक’ का प्रयोग सही, व्युत्पत्ति भ्रामक-
व्युत्पत्ति जानने के लिए धीरज की ज़रूरत होती है। ये नहीं कि चट-पट बात निपटा दी। अनेक शब्दों की अन्तर्वस्तु पर और गहराई से विचार करने पर ऐसे-ऐसे सूत्र मिलते हैं जिनसे दूसरे कई शब्दों की जीवन-रेखा भी स्पष्ट होती है। अधिकाधिक सन्दर्भों के लिए लगातार प्रयत्न चलता रहता है। शब्दों का सफ़र में एक साथ कई शब्दों पर भी काम चल रहा होता है। हिन्दी वालों से शोध नाम की चिड़िया का शिकार करने को मत कहिए, बस क़यासों के कबूतर उड़वा लीजिए। अब नीलाभ अश्क साहब ‘‘‘नावक’ ’ ’ के बारे में फ़ेसबुक पर छपी परिचयात्मक टिप्पणी पढ़ने के बाद कई साइटें देख गए और हमारे पूरे शोध को पढ़े बिना तंज़िया अंदाज़ में चंद सतरें (‘सन्देह का लाभ’, ‘शिप्रा जैसे नाले’, ‘जाने कौन से फ़ारसी कोश’ वगैरह-वगैरह) लिख कर सरपट चले गए। सक्रिय ब्लॉगर-अनुवादक प्रिय निशान्त मिश्र के आग्रह पर मैं बीते कुछ वर्षों से ‘नावक’ के तीर पर थोड़ा-थोड़ा काम करता रहा हूँ। इसी प्रयास के तहत अब जाकर ‘नावक’ पर कुछ कह-लिख पाने की स्थिति में आया तो एक पोस्ट फ़ेसबुक पर शाया की। ये तो बड़ी नाइंसाफ़ी है कि तात्कालिक प्रभाव में उस काम का परीक्षण निपटाने के अंदाज़ में किया जाए जिस पर न सिर्फ़ मेहनत हुई बल्कि कारआमद नतीजे भी सामने आए। बेशक, इस तरह के काम में कई चूकें भी होती हैं पर समीक्षक की दृष्टि अंदाज़मार नहीं होती और न ही वह अटकलबाजियों से काम लेता है। समीक्षा तार्किक होनी चाहिए, मीनमेखी नहीं।

हिन्दी कोशों में पूरा सन्दर्भ नहीं-
अब बात ‘नावक’ की। मैंने सिर्फ़ ये जानकारी साझा करनी चाही कि ‘नावक’ तीर के साथ-साथ तीर छोड़ने वाला उपकरण भी है और इस बात पर हैरत जताई कि हमारे यहाँ के कोशों ने इस तथ्य की उपेक्षा की। मैने कहीं यह नहीं कहा कि ‘नावक’ तीर नहीं है। साहित्य-सुधियों में दशकों से जो ग़लतफ़हमी है वह “नावक’ ‘के’ तीर” की वजह से है। यह जो ‘के’ सम्बन्ध-कारक है इससे पता चलता है कि ‘नावक’ अपने आप में तीर नहीं है बल्कि ‘नावक’ वाला तीर है या ‘नावक’ का तीर है। स्पष्ट है कि ‘नावक’ अपने आप में तीर नहीं है बल्कि एक उपकरण है और बात उससे चलाए जाने वाले तीर की हो रही है। तो विद्वानों को भी यह सम्बन्धकारक ‘के’ खटका अवश्य किन्तु बजाय ‘नावक’ पर शोध करने के उन्होंने पण्डिताऊ ढंग से इसे ‘नाविक’ माना और तीर को किनारा।

नाविक नहीं है ‘नावक’ -
हिन्दी कोश परम्परा में व्युत्पत्ति के नज़रिए से शोध की प्रवृति कम और अद्यतन के नाम पर पूर्ववर्तियों के कामों को जस का तस या थोड़ा बहुत फेरफार करते रहने की प्रवृत्ति ज्यादा रही है। या तो रामायण में ‘र’ वर्ण की आवृत्ति जैसे विषयों पर शोध होते हैं अन्यथा बैठे-बैठाए की गवेषणा और पाण्डित्य ही हिन्दी वालों का मूल स्वभाव है। इसी तरह कोश देखने की वृत्ति भी हिन्दी वालों में विरल है। अधिकांश लोग अगल-बगल के लोगों से अपनी वर्तनी सम्बन्धी जिज्ञासाएँ शान्त कर लेते हैं, बजाय कोश देखने के। वर्तनी के सम्बन्ध में लोग लिखित सन्दर्भों की तुलना में सुनी-सुनाई पर ज्यादा निर्भर हैं। अब लेखक तो लेखक है, कोई कीर्तनिया नहीं। सब कुछ उच्चार के आधार पर बरतना है तब सारे शब्दकोश जला दिए जाएँ। नीलाभ अश्क कहते हैं कि “हमने बिहारी के सिलसिले में ‘नावक’ और नाविक दोनों ही सुना है।” गौर करें, नीलाभ जी सुने के आधार पर ‘नावक’ की वर्तनी ‘नाविक’ लिख रहे हैं और उसके नाविक यानी मल्लाह होने के तर्क भी दे रहे हैं जो हमने किसी सन्दर्भ में नहीं पढ़े। छोटे तीर-कमान वाले ‘नावक’ की वर्तनी ‘नाविक’ किसी भी स्तरीय कोश में नहीं देखी। खास बात यह कि हिन्दी के लगभग सभी महत्वपूर्ण और प्रचलित कोशो में बतौर छोटा तीर ‘नावक’ ही दर्ज़ है। कहीं भी ‘नावक’ का पर्याय अथवा वर्तनी नाविक नहीं है। अलबत्ता हमें नाविकों के तीर-कमान रखने की बात पर कोई ऐतराज नहीं है। और तो और हमारी लोक बोलियों में तो नाविक का उच्चार भी ‘नावक’ हो जाता है- “उदधि उतरने जावत जेहु, ‘नावक’ शरन सो लेवत तेहु”। अब हुआ यह कि हिन्दी कोशों ने ‘नावक’ प्रविष्टि के तहत ‘नावक’ का एक अर्थ नाविक भी दे दिया। स्पष्ट है कि यह जो ‘नावक’ है वह नाविक का अपभ्रंश है और आमतौर पर नाविक का मैथिल या कहीं कहीं अवधी-भोजपुरी उच्चार है। हमारे विद्वानों ने ‘नावक’ और नाविक को पर्याय समझ कर बरतना शुरू कर दिया।... और क्या प्रमाण चाहिए ‘नाविक’ को ख़ारिज़ करने का?

देखन में छोटे लगे-
थोड़ा और व्यावहारिक होने का प्रयत्न दिखाते हुए नीलाभ अश्क “देखन में छोटे लगे” से भाव ग्रहण करते हुए ऐसे लघु धनुष-बाण की कल्पना करते हैं जिसकी ज़रूरत ‘शिप्रा’ जैसे नालों के नाविकों को नहीं थी बल्कि जिनकी नौकाएँ गंगा-यमुना जैसी विशाल नदियों में तैरती थीं उनके पास होते थे छोटे-छोटे धनुष-बाण। नाविक के पक्ष में वे तर्क देते हैं कि ‘नावक’ अगर नाविक नहीं है तो मध्यकालीन हिन्दी साहित्य में सिवाय बिहारी के ‘नावक’ का ज़िक़्र किसी अन्य ने क्यों नहीं किया? जी, बिल्कुल किया है। इसकी कई मिसालें आगे आएँगी पर इससे पहले पूछना चाहेंगे कि क्या ज़रूरी है कि जो बात आपके यहाँ प्रचलित हो, उसी का उल्लेख साहित्य में होता है!! हमारे यहाँ ख़ूबसूरती के सन्दर्भ में कोहकाफ़ की परियों का ज़िक़्र होता रहा तो क्या कोहकाफ़ हिन्दुस्तान में है? प्रसंगवश एशिया-यूरोप के बीच काकेशस उपत्यका ही फ़ारसी में कोहकाफ़ कहलाती है। हमारे यहाँ कारूँ के ख़ज़ाने का इस क़दर ज़िक़्र होता है कि इसका मुहावरे की तरह सटीक प्रयोग होने लगा। तो क्या कारूँ और उसका ख़ज़ाना यहाँ था? ज़ाहिर है ये तमाम बातें अरबी, तुर्की, फ़ारसी, मंगोल लोगों से लम्बे सम्पर्क के दौरान ही हमारी भाषा-संस्कृति में दाख़िल हुईं।

अकेले बिहारी नहीं, और भी हैं-
नीलाभ अश्क इसके ‘नावक’ के आम इस्तेमाल पर भी सन्देह ज़ाहिर करते हैं। ‘आम’ था या नहीं इस पचड़े में हम नहीं पड़ेंगे मगर बिहारी, कुलपति, ब्रजवासी दास या चरणदास जैसे मध्यकालीन कवियों से लेकर उन्नीसवीं सदी में ‘ग़ालिब’ और ‘मोमिन’ ने इसे बरता- “नावक -अंदाज़ जिधर दीदए-जानां होंगे। नीम बिस्मिल कई होंगे, कई बेजाँ होंगे”। फिर बीसवीं सदी ‘फ़ैज़’ की शायरी में यह नज़र आता है- “न गंवाओ ‘‘नावक’ ’ -ए-नीमकश, दिल-ए-रेज़ा रेज़ा गंवा दिया जो बचे हैं संग समेट लो, तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया”। इक्कीसवीं सदी में डॉ शैलेष ज़ैदी तक की कविताई में इसका इस्तेमाल हआ- “शाखे-शजर पे बैठा हूँ मैं इक यतीम सा, सैयाद है निशानए-नावक लिए खड़ा”। ज़रा सोचिए, ‘आम’ का सवाल कितना ‘ख़ास’ रह जाता है? फिर भी बताते चलें कि ‘नावक’ का उल्लेख करने वाले बिहारी अकेले न थे बल्कि तत्कालीन समाज इस नए किस्म के फौजी अस्त्र से परिचित था तभी यह साहित्य में भी दर्ज़ हुआ। सत्रहवीं सदी में आचार्य कुलपति मिश्र ने ‘रस-रहस्य’ में लिखा- “नावक तीर लौं प्राण हरै पलकैं बिछरैं हिय व्याकुल साजै” ब्रजवासी दास की उक्ति “बय बालक चालक दृगनि, सुन्दरि सुछिम सरीर, मनौं मदन गुन पै धरौ, इह नावक कौ तीर” को देख लें। इसी तरह संत कवि चरणदास कहते हैं- “सदगुरु सबदी लागिया नावक का सा तीर, कसकत है निकसत नहीं, होत प्रेम की पीर”। यही नहीं बिहारी दास ने भी एकाधिक जगह ‘नावक’ का उल्लेख किया है- “नावक सर में लाय कै तिलक तरुनि इति नाकि” आदि।

कितना प्रचलित था ‘नावक’ -
मज़े की बात ये कि एक तरफ़ उर्दू शायरी के लिहाज़ से नीलाभ अश्क ‘नावक’ को तीर की तरह लेते हैं मगर साथ ही उसके ‘नाविक’ यानी नाखुदा होने के पक्ष में भी दलील रखते हुए बताते हैं कि शिप्रा जैसे नालों में तो नहीं, मगर गंगा-जमुना के नाविक छोटे-धनुष-बाण रखते थे। कहने का मक़सद ये कि इसी वजह से इसे ‘नाविक का तीर’ कहा गया। अब इस सुन्दर कल्पना के ही अन्दाज़ में हम भी कल्पना करते हैं। अगर यही तीर भारतीय नाविकों के पास होते तो स्लीमैन के स्थान पर नाविक ही पिंडारियों को न निपटा देते ! जंगलों, नदियों, घाटियों, घाटों, बाटों और पिंडारियों का रिश्ता रहा है। यूँ भी कारगर चीज़ का प्रसार अन्य क्षेत्रों में भी होता है। नाविक के मारक तीर पैदल सेना के पास क्यों नहीं थे? कारवाँ के साथ चलते सिपाहियों के पास क्यों नहीं थे? ग्रामीणों के पास क्यों नहीं थे? नाहक स्लीमैन के हिस्से गया पराक्रम जो ‘नावक’ , क्षमा करें नाविक के तीर को मिल जाता। नाविक का तीर प्रकारान्तर से आम आदमी का तीर बन जाता। ‘नावक’ को नाविक कहना ऐसी दूर की कौड़ी है, हाँ यह ज़रूर है कि नदियों और सागरों में पोतों पर भी धुनर्धारी यौद्धा होते थे।

‘नावक’ मूलतः नली थी, तीर नहीं-
‘नावक’ मूलतः नली है न कि तीर, इस बारे में किसी सन्देह की गुंजाइश ही नहीं है। फ़ारसी के नाव और नावः (अवेस्ता में नवाज़ा, फ़ारसी का एक रूप नाविया भी) बुनियादी तौर पर एक ही हैं मगर एक वाहन है और दूसरा वाहिका/प्रवाहिका। नाव पेड़ को काट कर, कुरेद कर बनाई जाती है और प्रकृति द्वारा कुरेदी गई सिलवटों, दरारों से होकर नदियाँ बहती हैं। संस्कृत में नाव, नौ के लिए आधार शब्द ‘नु’ है जिसमें नौका, पोत जैसे भाव हैं पर वे बाद में स्थापित हुए। ‘नु’ में निहित पहला अर्थ ध्वनि है। आह्लाद की। गिरते प्रपात की, बहते पानी की ध्वनि मनुष्य के लिए कितनी सुखद रही होगी। इसीलिए नाद का अर्थ आवाज़ हुआ। बाद में प्रवाही-जल ने अपना रास्ता बनाया। यूँ नद और नदी शब्द प्रचलित हुए। इसी तरह बाँस की खोखल को नद् की तर्ज़ पर नड़् संज्ञा मिली होगी। एक मिसाल देखें। संस्कृत में नड् का अर्थ है खोखल, बाँस, बाँसुरी, नली। नड का रूपविकास है नद् जिसका अर्थ है विशाल जल प्रवाह। जाहिर है धरती में बने खोखले, पोले स्थान में ही पानी जमा होता है। जिस दरार या खाँचे से होकर पानी सतत प्रवाही रहे उसे नद् या नदी कहते हैं जो नड् से सम्बद्ध है। इसका एक रूप नळ या नल होता है जिसमें नाली या नाड़ी का भाव है। ‘नू’ का अर्थ एक विशेष अस्त्र भी है।

नाल, बाँस, पुँपली-
प्रायः सभी शब्द कोशों में ‘नावक’ का अर्थ अनिवार्य रूप से नली बताया गया है। तीर से हट कर इसकी जितनी भी अर्थछटाएँ हैं वे नली, नाली से जुड़ती हैं क्योंकि व्युत्पत्तिमूलक अर्थ ही नल, नाली, प्रवाहिका, वितरिका, नहर, बाँस, पुँपली, पोंगली आदि है। “ए डिक्शनरी ऑफ पर्शियन अरेबिक एंड इंग्लिश डिक्शनरी” में देखिए जॉन रिचर्ड्सन ‘नावक’ के बारे में क्या कहते हैं- 1).बाँस से बना एक तीर जिसकी दाँतेदार नोक तेजी से सीधे निशाने पर लगती है और जिसका उपयोग प्रायः तीतर-बटेर के शिकार के लिए किया जाता था. 2).एक ऐसी नली जिसके ज़रिये तीर छोड़ा जाता था.3).एक बाँस या बाँस सरीखी ऐसी कोई भी चीज़ जो सामान्यतः या कृत्रिम रूप से नालीदार या खोखली बनाई गई हो. 4).किसी अनाज पीसने की चक्की तक जाने वाली प्रवाहिका.5). कोई भी नहर, कैनाल.6). मनुष्य की पीठ गर्दन से कमर तक बनी लम्बी गहरी धारी.) आदि।

नली में बारूद से तीर का प्रक्षेपण-
जॉन रिचर्ड्सन समेत डेविड निकोल, डंकन फोर्ब्स, जॉन प्लाट्स आदि के कोशों में भी ‘नावक’ शब्द की विवेचना में उसे नाल बताया गया है। गौरतलब है कि जिस तरह वामन शिवराम आप्टे का संस्कृत-अंग्रेजी कोश, संस्कृत-हिन्दी कोश मूलतः मोनियर विलियम्स के काम पर आधारित है उसी तरह हिन्दी शब्दसागर समेत हिन्दी कोशों में अंग्रेजों द्वारा बनाए हिन्दुस्तानी, उर्दू, फ़ारसी कोशों से बहुत कुछ लिया है। हिन्दी शब्दसागर शब्दकोश परियोजना 1928 में पूरी हो गई थी। इसमें ‘नावक’ को “एक छोटा तीर” बता कर काम चला लिया गया। इसके सम्पादक मण्डल के एक सदस्य रामचन्द्र वर्मा नें दशकों बाद इस ग़लती को दुरुस्त किया। 1965 के आसपास उन्होंने अपनी पुस्तक ‘शब्दार्थ-दर्शन’ में स्पष्ट किया कि ‘नावक’ का अर्थ तीर ही समझा जाता है पर ‘नावक’ साधारण तीर नहीं है बल्कि एक विशेष प्रकार का छोटा तीर या उसका फल होता है जो लोहे की नली में रखकर बारूद की सहायता से चलाया जाता था”। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने ‘केशवदास’ में ‘नावक’ का अर्थ दिया है बाँस की छोटी पुपली। ध्यान रहे पुपली, पींपनी अथवा पीपी का अर्थ लोकबोलियों में नली होता है।

क्रॉसबो जैसी चीज़-
‘नावक’ के नालधनुष या क्रॉसबो जैसा चीज़ रही होगी। अनेक ऐतिहासिक सन्दर्भ बताते हैं कि क्रॉसबो जैसी तकनीक यूरोप और एशिया की धरती पर अनेक स्थानों पर प्रचलित थी और इसका प्राचीन इतिहास है। अरब, फ़ारस और चीन का भारत से इतना गहरा नाता रहा है कि यह माना नहीं जा सकता कि ‘नावक’ कभी भारत आया न हो। यह पूरी तरह स्पष्ट है कि ‘नावक’ दरअसल नालधनुष था। ये हम अपने मन से नहीं कह रहे हैं बल्कि जॉन प्लॉट्स, रामचंद्र वर्मा समेत अनेक विद्वान लेखक-कोशकार कह रहे हैं और ‘नावक’ का हवाला क्रॉसबो जैसे उपकरण से दे रहे हैं जो नलीदार होता है और कमान के ज़ोर से तीर को नली से होकर गुज़ारा जाता है। हमने फ़ेसबुक पर ‘नावक’ के रूपाकार को स्पष्ट करने के लिए मध्यकालीन क्रॉसबो की तस्वीर छापी ताकि हिन्दी प्रेमियों के सामने ‘नावक’ का खाका आ सके। हालाँकि कहीं भी यह दावा नहीं किया कि यही ‘नावक’ है यह सिर्फ़ समझाने का प्रयत्न था कि ‘नावक’ तीर नहीं, खास किस्म का धनुष है। श्री नीलाभ अश्क को इससे भी ऐतराज है और वे प्रस्तुत तस्वीर में दिखाए गए क्रॉसबो को पुराना मानने को तैयार नहीं है, बल्कि उसे आधुनिक कहते हैं। क्या कहा जाए! यही नहीं देश के बड़े संग्रहालयों में से एक सालारजंग संग्रहालय में ‘नावक’ प्रदर्शित है। इसके अलावा भी ‘‘‘नावक’ ’ ’ अनेक संग्रहालयों की विवरणिका में मोजूद है। आपत्ति करने से पहले भारी मेहनत खुद भी करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

काफूर की दक्षिण विजय में ‘नावक’’ -
‘नावक’ के आम इस्तेमाल की बात पर फिर लौटते हैं। ऊपर अनेक मिसालें दी गई हैं कि किस तरह साहित्य में ‘नावक’ शब्द दर्ज़ हुआ है। कहीं प्रक्षेपास्त्र के तौर पर तो कहीं प्रक्षेपण-यन्त्र के तौर पर। हाँ, ‘नावक’ को बतौर माँझी या नाखुदा कहीं दर्ज़ नहीं किया गया। ये अलग बात है कि भोजपुरी, मैथिली या अवधी में अनेक स्थानों पर नाविक को ‘नावक’ की तरह बरता जाता है। उसकी भी चर्चा ऊपर हो चुकी है। ‘नावक’ का इस्तेमाल आम था या नहीं इसे तूल देने की बजाय गौर किया जाना चाहिए कि मध्यकाल में समाज ‘नावक’ से परिचित था। यूँ ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में भी ‘नावक’ का उल्लेख दर्ज़ है। मुग़ल फ़ौज़ें जिन जिन हथियारों और प्रणालियों का इस्तेमाल करती थीं, उनमें ‘नावक’ का उल्लेख है। ये तमाम सन्दर्भ इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। मुग़ल फौजो में ‘नावक’ का प्रयोग होता था इसके ऐतिहासिक प्रमाण हैं। मुगलों से भी पहले सल्तनत काल में अलाउद्दीन खलजी के सिपहसालार मलिक काफूर ने दक्षिण अभियानों के दौरान ‘नावक’ का जमकर इस्तेमाल किया था, ऐसा द स्केर्क्रो प्रेस, लंदन से प्रकाशित इक्तिदार अहमद खान की “हिस्टॉरिकल डिक्शनरी ऑफ़ मीडिवल इंडिया” समेत अनेक सन्दर्भों में भी ज़िक़्र मिलता है।

वैतस्तिक और नालास्त्र-
‘नावक’ तुर्की से लेकर फ़ारस तक और फिर चीन के कुछ हिस्सों में प्रचलित रहा। यही नहीं, नावः या नाव (नली) के ज़रिये चलाए जाने वाले धनुषाकार अस्त्र की श्रेणी में ही क्रॉसबो भी आता है। फ़ारसी में इसे ही ‘नावक’ कहते थे। इसका आविष्कार चीन में बताया जाता है जहाँ इसे ‘थुंग’ कहते हैं। गौरतलब है। साइंस एंड सिविलाइजेशन इन चाइना में जोसेफ़ नीधम ने इसी थुंग की तुलना फ़ारसी ‘नावक’ और अरबी शैली के नालधनुष ‘मजरा’ से की है। नीलाभ जी ‘नावक’ को फ्रान्सीसी चीज़ बता रहे हैं जबकि तमाम सन्दर्भ भरे पड़े हैं जो इसे पूरब का और चीन का आविष्कार बताते हैं। यहाँ तक कि प्राचीन भारत में भी नालधनुष जैसा अस्त्र था, इसकी गवाही मिलती है। अमरकोश में नालिका नाम के एक अस्त्र का भी उल्लेख है जिसकी व्याख्या बतौर नालास्त्र की गई है। वैदिक सन्दर्भों में अत्यन्त छोटे आकार के तीर (बालिश्त भर का) को वैतस्तिक कहा गया है। महाभारत के द्रोणपर्व में “शरैर्वैतस्तिकै राजन् विव्याधासन्नवेधिभिः” में इसका उल्लेख है। संस्कृत विद्वान डॉ.विक्रमजीत के मुताबिक यहाँ 'वितस्ति' शब्द ‘द्वादशाङ्गुल प्रमाण’ यानी एक बालिश्त माप का वाचक है। वितस्ति से इक प्रत्यय करके वैतस्तिक बनेगा। यहाँ वैतस्तिक शब्द शर (बाण) का विशेषण है सो वैतस्तिक शर का अर्थ हो गया- बारह अंगुल के तीर। वितस्ता से भी वैतस्तिक शब्द तो बन सकता है पर यहाँ वितस्ता से कोई लेना-देना नहीं। इस तरह श्लोक का अर्थ हो जाएगा - हे राजन् ! निकटवर्ती (शत्रु) को बींधने वाले वैतस्तिक बाणों से (उसने उसको) बींध दिया।” प्रसंगवश पाली भाषा में धनुक का तात्पर्य छोटे धनुष से है। भदन्त आनन्द कौसल्यायन के पाली-हिन्दी कोश में दर्ज़ है। शैलेष ज़ैदी ने तुलसी काव्य की अरबी-फ़ारसी शब्दावली में भी इसी आशय का उल्लेख किया है कि भारतीय लोग ‘नावक’ से काफी पहले से परिचित थे। उन्होंने तो यहाँ तक अनुमान लगाया है कि फ़ारसी ‘नावक’ शब्द दरअसल हिन्दी की ज़मीन से ही बना होगा। उनके इस अनुमान का प्रमाण मुझे नहीं मिला। इसी तरह ‘नावक’ को संस्कृत ‘नखक’ का रूपान्तर भी बताया जाता है मगर इसकी भी पुष्टि नहीं होती। संस्कृत सन्दर्भों में इसे नाखून की आकृति में आगे की ओर से मुड़ा हुआ चाकू बताया गया है। ध्वनिसाम्य के अलावा नखक के ‘नावक’ बनने का और कोई आधार नहीं है।

क़ौस-अल-नावकिया-
गौरतलब है कि करीब 224 ई. से 651 ई. के दौर में फ़ारस के सासानी वंश के दौर में अल-नावकिया नाम का एक समूह भी था जिसे यह नाम ‘नावक’ की वजह से मिला। यह भी उल्लेख है कि ‘नावक’ के ज़रिये दुश्मनों पर जलते हुए तीर भी बरसाए जाते थे। यही नहीं इसी दौर में ‘नावक’ का उल्लेख “क़ौस-अल-नावकिया” भी मिलता है। ध्यान रहे अरबी में क़ौस यानी धनुष। अरबी-फ़ारसी का ‘इया’ प्रत्यय सम्बन्धसूचक है। सो नावकिया का अर्थ हुआ ‘नावक’ वाला। इस तरह क़ौस-अल-नावक़िया का अर्थ हुआ नालधनुष या नलीदार धनुष। कहने वाले कह सकते हैं क़ौस-अल-नावकिया का अर्थ छोटे (तीर) वाला धनुष भी हो सकता है! हमारा कहना है ऐसा सोचना भूल होगी। धनुष में बाण समाहित है। धनुष से तीर ही चलाया जाएगा। यहाँ आशय तीर नहीं प्रणाली से है। मिसाल के तौर पर रायफल, बन्दूक, रिवॉल्वर, मशीनगन सबका रिश्ता गोली से है पर इनके अलग अलग नाम गोली के आकार में बदलाव की वजह से नहीं बल्कि तकनीक के बदलाव की वजह से है। स्पष्ट है कि ‘नावक’ एक प्रणाली पहले है, तीर बाद में है।

और आखिर में...बंदूक से निकली बंदूक-
अस्त्रों के नामकरण का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कभी उसे प्रक्षेपित करने वाले उपकरण का नाम मिला तो कभी प्रक्षेपित होने वाले पदार्थ का। जैसे ‘नावक’ का मूलार्थ है “वह नली जिससे तीर छोड़ा जाए” पर ‘नावक’ का अर्थ तीर भी हुआ, हालाँकि नली की पहचान भी बनी रही। इसके उलट हाल बंदूक का है जो अरबी शब्द है और दरअसल वह गोली है। बंदूक की नली से भी बंदूक ही निकलती है और बंदूक ही लगती है। बंदूक शब्द ध्यान में आते ही लंबी नली नज़र आती है मगर बंदूक के नामकरण में नली का नहीं बल्कि गोली का योगदान है। 'बंदूक' मूल रूप से अरबी भाषा का शब्द भी नहीं है, यह ग्रीक के 'पोंटिकोन' से बना। पोंटिकोन का ही अरबी रूप 'अल-बोंदिगस' हुआ। इसका अगला रूप 'फुंदुक' और फिर 'बुंदूक' हुआ। बाद में जब राईफल का आविष्कार हुआ तो उसकी गोली यानी कारतूस को बंदूक कहा जाने लगा। बाद में मुख्य हथियार का नाम ही बंदूक लोकप्रिय हो गया। इसके विपरीत बेहद छोटे आकार के जेबी हथियार के तौर पर बनाई गई पिस्तौल की पहचान नली की बजाय उसका हत्था और ट्रिगर होती है, मगर पिस्तौल के नामकरण में नली का योगदान है। पिस्तौल शब्द का मूल पूर्वी यूरोपीय माना जाता है। रूसी भाषा में एक शब्द है पिश्चैल paschal जिसका अर्थ होता है लंबी पतली नली। बंदूक और पिस्तौर की मिसालों से साबित होता है कि ‘नावक’ के साथ भी वैसा ही हुआ। ‘नावक’ मूलतः उपकरण है। कालान्तर में तीर को भी उपकरण का ही नाम मिल गया और उसे भी ‘नावक’ कहा जाने लगा।


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।।नाड़े के बहाने शब्द-विलास।।


पु राने ज़माने से लेकर आज तक कमरबन्द के लिए निहायत देसी किस्म का शब्द आज तक डटा हुआ है-नाड़ा। हालाँकि कमरबन्द और इज़ारबन्द भी चलते हैं पर उतने नहीं। नाड़ा दरअसल बेल्ट ही है जिसका चलन आज आम है। नाड़ा अब नितान्त भारतीय किस्म के अधोवस्त्रों में ही इस्तेमाल होता है। यूँ देखें तो बेल्ट की तकनीक नाड़े का आधुनिक रूप है। नाड़ा जहाँ कमर के इर्द-गिर्द वस्त्र को दोहरा कर बनाई गई नाल में डाला जाता है वहीं बेल्ट को नाल में नहीं बल्कि कमर के इर्द-गिर्द लूप से होकर गुज़ारा जाता है।

नाड़ा का मूल है नाड़ी अर्थात वह नाल अथवा पोला-खोखला रास्ता जिसमें कमर कसने के लिए पतली रस्सी, सुतली या डोरी डाली जाए। इस तरह नाड़ी से नाड़े की अर्थवत्ता स्थापित होती है- जिसे नाड़ी में डाला जाए वह नाड़ा। इस शृंखला से कुछ अन्य शब्द भी जुड़ते हैं। गौर करें नड़, नद, नळ और नल पर। नड या नड़ का अर्थ है बाँस। ध्यान रहे पुराने ज़माने से ही बाँस के पोले तने के विविध उपयोग मनुष्य ने खोजे। सिंचाई के साधन के तौर पर नाड़ा, नाड़ी, नाड़िका जैसे शब्द प्रचलित हैं। मालवी-राजस्थानी में छोटी नहर को नाड़ी या नाड़ा भी कहते हैं। इसके अलावा जल-प्रवाह के साधन के तौर पर नाल, नाली या नालिका, नलिका जैसे शब्द भी हैं। नदी शब्द तो है ही।

हिन्दी का नदी शब्द संस्कृत के नाद से आ रहा है जो बना है संस्कृत धातु नद् से जिसमें जिसमें मूलतः ध्वनि का भाव है। नद् से ही बना है नद जिसका अर्थ है दरिया, महाप्रवाह, विशाल जलक्षेत्र अथवा समुद्र। प्राचीनकाल में पवर्तों से गिरती जलराशि के घनघोर नाद को सुनकर जलप्रवाह के लिए नद शब्द रूढ़ हो गया अर्थात नदी वह जो शोर करे। गौर करें कि बड़ी नदियों के साथ भी नद शब्द जोड़ा जाता है जैसे ब्रह्मपुत्रनद। ग्लेशियर के लिए हिमनद शब्द इसी लिए गढ़ा गया। अब साफ है कि नद् शब्द से ही बना है नदी शब्द जो बेहद आम है।
नाड़ी या नाडि का अर्थ होता है किसी पौधे का पोला तना या डंठल। कमलनाल में यह पोलापन स्पष्ट हो रहा है। नारियल का मोटा तना भीतर से पोला होता है। नाडि या नाड़ी एक ही मूल यानी नड् से जन्मे हैं।

गौर करें, नद् धातु का ही एक अन्य रूप नड् है। नड् में निहित पोलापन दरअसल ध्वनि या नाद से ही आ रहा है। नड् का मतलब होता है तटीय क्षेत्र में पाई जाने वाली घास, नरकुल, सरकंडा। वनस्पतियों के इन सभी प्रकारों में तने का पोलापन जाना-पहचाना है। नाडि का अर्थ बांसुरी भी होता है जो प्रसिद्ध सुषिर वाद्य है। बांस का पोलापन ही उसे सुरीलापन देता है जिससे बांसुरी नाम सार्थक होता है। बाँस की पोल से गुज़रती हवा से नाद पैदा होता है। इस पोल का प्रवाही उपयोग भी बाद में हुआ और पानी के बहाव या धारावाही के अर्थ में नाड़ी का प्रयोग भी होने लगा। धमनियों-शिराओं के लिए भी नाडि शब्द प्रचलित है।

हिन्दी का नाली शब्द बना है नल् धातु से जिसका मतलब होता है गोलाकार, पोली वाहिनियां। यह नड़ का अगला रूप है। शरीर की नसों के लिए मूलतः इनका प्रयोग होता है। बाद में जल-प्रवाह की कृत्रिम संरचनाओं के लिए भी इससे नाली शब्द बनाया गया। घरों में पानी की सप्लाई के लिए जिन पाईपों से होकर पानी आता है उसे नल इसी लिए कहते हैं। मराठी समेत द्रविड़ भाषाओं में इसका नळ रूप है। अर्थ वही है प्रवाहिका। प्रणाली में भी ‘नाली’ को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है।
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।।हिन्दी पत्रकारिता के ‘प्रश्न’ और ‘विस्मय’।।


हि
न्दी पण्डितों की विभिन्न भ्रान्तियों में एक विस्मय-चिह्न और प्रश्न-चिह्न के शीर्षकों में प्रयोग पर ऐतराज भी है। ख़ासतौपर पर पत्रकारिता की हिन्दी में। किसी भी शीर्षक में विस्मयादिबोधक या चिह्न लगाइये, मसलन- “ चौहान से छिनेगी कुर्सी!” ज्ञानी महोदय तत्काल आपत्ति करेंगे- इसमें विस्मय की क्या बात है ? अब अगर आपने इसी शीर्षक में प्रश्नवाचक चिह्न लगाया तो भी आपत्ति होती है कि जब आपको ही नहीं पता तो पाठक क्या बताएगा कि कुर्सी छिनेगा या नहीं। यही बात “चांद पर पानी!” या “मंगल पर पानी ?”जैसे शीर्षकों के साथ भी है। बीते तीस सालों में ऐसे अनेक लोगों से पाला पड़ा है जो शीर्षकों में चिह्नों का प्रयोग एक सिरे से गलत बताते रहे।

मानता हूँ कि विस्मयादिबोधकचिह्न का गैरज़रूरी और असावधान प्रयोग हिन्दी में होता रहा है। इसीलिए व्यक्तिगत स्तर पर इससे बचते हुए मैं ऐसे शीर्षकों में ‘कयास’ ,‘चर्चा’ ,‘अटकल’, ‘आसार’, ‘सम्भावना’ या ‘आशंका’ जैसे शब्दों का प्रयोग करने का हामी हूँ। मगर चिन्दी-बजाजों का ऐसा भी क्या डर कि बेचारा पत्रकार मनमाफ़िक़ चिह्नों का प्रयोग न कर सके। सबसे पहले तो इस ग्रन्थि से मुक्त हो जाइये कि शीर्षक में प्रश्नवाचक चिह्न लगाने से यह ग़लतफ़हमी भी हो सकती है कि आप पाठक से प्रश्न पूछ रहे हैं। व्याकरण चिह्नों से भाषा स्पष्ट और सरल बनती है। शीर्षकों में चिह्नों के प्रयोग से स्पेस तो बचता ही है, वह प्रभावी बनता है। जहाँ तक विस्मयादिबोधक चिह्न का प्रश्न है, उसके बारे में हिन्दी के तथाकथित पण्डित भी स्पष्ट नहीं है।

ऊपर लिखे दोनों उदाहरण मेरी नज़र में गलत प्रयोग की मिसाल नहीं है। व्याकरण के मुताबिक जो अविकारी शब्द हर्ष, शोक, आश्चर्य, घृणा, क्रोध, तिरस्कार आदि भावों का बोध कराते हैं, उनके साथ विस्मय चिह्न का प्रयोग होता है। विस्मयादिबोधक शब्द से ही स्पष्ट है कि विस्मय + आदि अर्थात विस्मय तथा इससे मिलते जुलते भावों का बोध कराने वाली अभिव्यक्तियों में प्रयुक्त चिह्न। चांद वाले उदाहरण में आश्चर्य का भाव है। इसमें विस्मय चिह्न का प्रयोग गलत नहीं। इसी तरह चौहान वाले उदाहरण में अटकल का भाव है। ध्यान रहे अटकल भी आश्चर्य की श्रेणी में लिया जाने वाला भाव है क्योंकि व्यापम घोटाले में चौहान नज़दीकियों के शामिल होने की बातें जितनी आम हैं उतना दम और पुख्ता आधार उनकी कुर्सी छिनने वाली चर्चाओं में नहीं। खबर अनुमान की बात भी कर रही है, चर्चा पर आधारित भी है। यहाँ भी विस्मय चिह्न को गलत नहीं ठहराया जा सकता। वैसे चौहान की कुर्सी छिनने के आसार अथवा मायावती चौहान की कुर्सी छिनने की चर्चा जैसे शीर्षक भी लगाए जा सकते थे।
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।।हाथ कंगन को आरसी क्या।।



मारी शिक्षा पद्धति की सबसे बड़ी मुश्किल ज्ञान को सरल और आसान न बना पाने की अक्षमता है। ऐसा अनेक मिसालों से साबित होता रहता है। ऐसा ही मामला है कहावतों, मुहावरों का अर्थ न समझना। जिसकी वजह से लोग उनका प्रयोग तीर-तुक्के की तरह करते हैं। सही बैठ जाए तो ठीक नहीं तो जब उसके मायने पूछे जाएँ तो बगलें झाँकने की नौबत आनी तय है। ऐसी कहावतों, मुहावरों की लम्बी फ़ेहरिस्त में “हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या” वाली कहावत भी है जिसकी दोनों पंक्तियों की आपसी रिश्तेदारी उलझन भरी है।

यह जानना ज़रूरी है कि इस कहावत के दो पद हैं। पहला पद है “हाथ कंगन को आरसी क्या” दूसरा पद है “पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या”। इन दोनों पदों की भाषा का गठन आधुनिक हिन्दी है। अगर आरसी शब्द को छोड़ दें तो कहावत का एक भी शब्द ऐसा नहीं है जिसे समझने में मुश्किल हो। आरसी यानी आईना, मिरर, शीशा। हिन्दी में में अब आरसी शब्द का प्रचलन नहीं रहा अलबत्ता मराठी में इसका रूप आरसा होता है और यह खूब प्रचलित है। तो “हाथ कंगन को आरसी क्या” वाला पूर्वपद अपने आप में पूरी कहावत है।

मूलतः यह प्राकृत-संस्कृत परम्परा की उक्ति है और फ़ारसी के उत्कर्ष काल से भी सदियों पहले यह कहावत प्रचलित थी। इसका प्राकृत रूप देखिए- “हत्थकंकणं किं दप्पणेण पेक्खि अदि”। इसी बात को संस्कृत में इस तरह कहा गया है- “हस्ते कंकणं किं दर्पणेन”। यह नहीं कहा जा सकता कि संस्कृत उक्ति के आधार पर प्राकृत रूप बना या प्राकृत उक्ति के आधार पर संस्कृत उक्ति गढ़ी गई। कहावतें सार्वजनीन सत्य की अभिव्यक्ति का आसान ज़रिया होती हैं इसलिए वही कहावत जनमानस में पैठ बनाती हैं जो लोकभाषा में होती हैं। इस सन्दर्भ में आठवीं-नवीं सदी के ख्यात संस्कृत साहित्यकार राजशेखर के प्रसिद्ध प्राकृत नाट्य ‘कर्पूरमंजरी’ में “हत्थकंकणं किं दप्पणेण पेक्खि अदि” का उल्लेख मिलता है।

रूप-सिंगार के लिए आईना होना बेहद ज़रूरी है, किन्तु सजन-सँवरने की सभी क्रियाओं के लिए आईना हो, ये ज़रूरी नहीं। मसलन हाथों में कंगन पहनना है तो यूँ भी पहना जा सकता है, उसके लिए आईने की ज़रूरत क्या? इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि चेहरा देखना हो तो शीशा आवश्यक है किन्तु हाथ-पैर के गहने देखने के लिए आईने की क्या ज़रूरत। वो तो यूँ भी देखे जा सकते हैं। कोई स्त्री अपने हाथों के कंगन या मेहँदी की सज्जा आईने में नहीं देखती। आशय है प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्।

इस कहावत के दूसरे पद को समझने के लिए इसकी बुनियाद समझना ज़रूरी है। मुस्लिम काल की राजभाषा फ़ारसी थी। जिस तरह ब्रिटिश राज में अंग्रेजी जानने वाले की मौज थी और तत्काल नौकरी मिल जाती थी उसी तरह मुस्लिम काल में फ़ारसी का बोलबाला था। हिन्दू लोग फ़ारसी नहीं सीखते थे क्योंकि यवनों, म्लेच्छों की भाषा थी। हिन्दुओं के कायस्थ तबके में विद्या का वही महत्व था जैसा बनियों में धनसंग्रह का। कायस्थों का विद्याव्यवसन नवाचारी था। नई-नई भाषाओं के ज़रिये और ज्ञान का क्षेत्र और व्यापक हो सकता है यह बात उनकी व्यावहारिक सोच को ज़ाहिर करती है। उन्होंने अरबी भी सीखी और फ़ारसी भी। नवाबों के मीरमुंशी ज्यादातर कायस्थ ही होते थे। रायज़ादा, कानूनगो, मुंशी, बहादुर यहाँ तक की नवाब जैसी उपाधियाँ इन्हें मिलती थी और बड़़ी बड़ी जागीरें भी।

तो इस तरह मुस्लिम दौर में फ़ारसीदाँ होना और पढ़ा-लिखा होना परस्पर पर्याय था। जब शिक्षा का माध्यम ही फ़ारसी हो, तब किसी शख़्स का यह कहना कि उसे फ़ारसी नहीं आती ग़ैरमुमकिन सी बात थी। इसे यूँ भी कह सकते हैं उस दौर के तमाम उदार हिन्दू तबके ने फ़ारसी सीखी जो बदलते दौर में अपना और अपनी क़ौम के बेहतर भविष्य का सपना देखता था। कायस्थों, ब्राह्मणों, वणिकों यहाँ तक कि क्षत्रियों में भी ऐसे तमाम लोग थे। ग्यारहवीं-बारहवीं सदी तक हिन्दू समाज से ऐसे तमाम लोग फ़ायदे में रहे जिन्होंने अरबी-फ़ारसी सीखी।

इस पृष्ठभूमि में देखें कि हिन्दुस्तान में फ़ारसी का दौर बारहवी-तेरहवीं सदी से शुरू होता है। “हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या” इस पूरी कहावत का गढ़न आज की हिन्दी का लगता है। हिन्दी में प्रचलित अनेक प्राचीन कहावतें सीधे-सीधे फ़ारसी समेत अवधी, बृज, बुंदेली, राजस्थानी व अन्य देसी भाषाओं से आती है। लेकिन यह भी सच है कि बारहवीं सदी से ही हिन्दी ने वह रूप लेना शुरू कर दिया था जिसकी बुनियाद पर आज की हिंदी खड़ी है। चौदहवीं –पन्द्रहवीं सदी की हिन्दी के अनेक प्रमाण उपलब्ध है जो आज की हिन्दी से मेल खाते हैं। मुमकिन है कि “हत्थकंकणं किं दप्पणेण पेक्खि अदि” खुसरो काल तक आते-आते इस रूप में ढल गई हो। पर यह तय है कि उस वक्त तक भी समूची कहावत का पहला पद ही प्रचलित रहा होगा।

बतौर सरकारी भाषा मुस्लिमों से इतर समाज के प्रभावशाली तबके में भी फ़ारसी सीखने की वृत्ति बढ़ी दूसरा पद तभी प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् के अर्थ में “हाथ कंगन...” वाली उक्ति को और प्रभावशाली बनाते हुए इसके साथ जुड़ा होगा क्योंकि इसमें आरसी को फ़ारसी से मिलाने वाली स्वाभाविक तुक है। यह कहना मुश्किल है यह दूसरा पद किस दौर में “हाथ कंगन...” के साथ चस्पा हुआ, पर ये दोनों अलग अलग उक्तियाँ हैं। पहली उक्ति कम से कम डेढ़ हज़ार साल पुरानी है जबकि दूसरी उक्ति तो स्वतः साबित करती है कि वह फ़ारसी के राजकाज वाले उत्कर्ष की रचना है। ज़ाहिर है मुग़ल दौर में ही यह मुमकिन हुआ होगा।
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Wednesday, June 17, 2015

//हिन्दूवादी कुनबा और इस्तेमाल की हिन्दी//

क्सर स्वदेशी और हिन्दूवाद का बुखार जब चरम पर होता है तो भाषा को भी अपनी गिरफ़्त में लेता है। हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाने की हास्यास्पद कोशिशें शुरु हो जाती हैं। ‘स्वदेशी/हिन्दूवादी’ मित्र ललकारते हैं,“हिन्दी में अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल बन्द करो”। तोगड़िया खोखियाता है, “योग के दौरान ‘अल्लाह’ नाम का इस्तेमाल हिन्दू बर्दाश्त नहीं करेंगे” अगर हम कहें कि सबसे पहले उन्हें अपने क्रान्तिकारी आह्वान की भाषा दुरुस्त करनी चाहिए तो वे तिलमिला उठेंगे। यहाँ वे खुद अरबी और फ़ारसी शब्दों का प्रयोग करते नज़र आते हैं। प्रयोग के अर्थ वाला ‘इस्तेमाल’ अरबी शब्द है और निषेध की अभिव्यक्ति वाला ‘बन्द’ फ़ारसी। ‘बरदाश्त’ भी फ़ारसी का है। यहाँ तक कि राष्ट्रीय / जातीय पहचान वाले हिंदी, हिंदी, हिंद जैसे शब्दोच्चार भी इधर के नहीं, उधर के ही हैं। बहरहाल, हम एक असमाप्त बहस की नई शुरुआत नहीं कर रहे बल्कि ‘इस्तेमाल’ को हिन्दी का अपना शब्द मानते हुए इसकी जन्मकुंडली बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

फ़ारसी शब्दावली के बहुत से शब्दों में अमल, आमिल, अमला, अमली, मामला, मामूली, तामील जैसे अनेक शब्द हैं जो हिन्दी में भी बरते जा रहे हैं। जानकर ताज्जुब हो सकता है कि हमारी ज़बान पर चढ़े ये तमाम शब्द अरबी भाषा के हैं और फ़ारसी के ज़रिये हिन्दुस्तान में दाखिल हुए और डेढ़ सदी पहले से हिन्दी के अपने हो चुके हैं। खास बात यह भी कि ये सभी इस्तेमाल के नज़दीकी रिश्तेदार हैं। चलिए, जानते हैं।

अरबी का एक उपसर्ग है इस्त- जिसमें कुछ करने की इच्छा, कारण, अभिप्राय या हेतु जैसे भाव हैं। हिन्दी का एक आम शब्द है अमल जिसमें कार्य, कर्म, कृत्य जैसे अर्थ हैं। किसी काम को करने का व्यावहारिक आशय अमल से प्रकट होता है जो बना है सेमिटिक धातु ऐन-मीम-लाम यानी ع-م--ل से। इसके पहले इस्त- उपसर्ग जुड़ने से अरबी में बनता है इस्तमाल मगर हिन्दी ने इसका फ़ारसी वाला रूप इस्तेमाल استعمال ग्रहण किया है। इस्तेमाल का अर्थ है लगातार उपयोग करना, प्रयोग में लाना, काम मे लाना आदि। इसमें किसी चीज़ का सेवन करना उसे बरतना जैसी बातें भी शामिल हैं।

अमल में कारोबारे-दुनिया का आशय है यानी तमाम अच्छे बुरे कर्म। लोकाचार के तहत आने वाली बातें। अमल से बने अनेक शब्द भी चलन में हैं जैसे अमलदारी यानी सत्ता, शासन, हुकूमत। कार्यरूप में परिणत करने के लिए अमल से अमली बना है। हिन्दी में अमलीजामा मुहावरा बहुत चलता है। अमल का बहुवचन आमाल है जिसका आशाय आचार-व्यवहार से है। हालाँकि यह शब्द हिन्दी में प्रचलित नहीं है। कार्यान्वयन करवाने वाले सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों के दल के लिए अमला शब्द का प्रयोग भी आम है। इसका अरबी रूप है अमलः। इसी कड़ी में आते हैं अमलदार और आमिल जिनका अर्थ एक ही है शासक, सत्ताधीश, अधिकारी, हुक्मराँ। फ़र्क़ यही है कि अमलदार फ़ारसी ज़मीन पर तैयार हुआ है और आमिल मूलतः अरबी शब्द है। आमिल इन अर्थों में हिन्दी में कम चलता है मगर बतौर संज्ञानाम हम इससे परिचित हैं।

इसी कड़ी में आता है मामूल यानी वे तमाम कार्यव्यवहार जो रोज़मर्रा में किए जाते हैं। नित्याचार, नियम, दस्तूर आदि। हस्बे-मामूल यानी नियमानुसार। दस्तूरन। इस सन्दर्भ में मामूली शब्द पर गौर करें। मामूली यानी रोज़मर्रा का, रस्मी, प्रचलित आदि। किन्तु हिन्दी में इन अर्थों में मामूली शब्द का प्रयोग अब कोई नहीं करता। साधारण, सामान्य, आसान अथवा हीन अर्थों में इसका प्रयोग अब आम है।

मुआमला को भी इसी सिलसिले की कड़ी है। हिन्दी में इसका बरताव मामला के रूप में होता है और सम्भवतः रोज़मर्रा की हिन्दी में बोले जाने वाले सर्वाधिक शब्दों में इसका भी शुमार है। मूल रूप में यह मुआमलः (मुआमलह्) है। फ़ारसी-अरबी में (और कहीं कहीं हिन्दी में भी) जिन शब्दों के आगे विसर्ग स्वर लगता है वहाँ ‘ह्’ ध्वनि ‘आ’ स्वर में तब्दील हो जाती है इसलिए मुआमलः का उच्चार मुआमला हो जाता है। इसका प्रचलित रूप मामला है। हिन्दी में मामला से तात्पर्य विषय-वस्तु, कोई बात, कोई घटना की तरह ज़्यादा होता है। वैसे इसका अर्थ व्यवसाय, कारोबार, लेन-देन से लेकर घटना, हादसा, मुकदमा अथवा विवाद भी होता है। इस कड़ी का एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द तामील है। हिन्दी में यह सरकारी-अदालती कार्रवाई से जुड़ा हुआ मगर बेहद प्रचलित शब्द है। इसका प्रयोग किसी आदेश का पालन करने के आशय से होता है।

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//कुल्फ़ी और क़ाफ़िला//


कु ल्फ़ी /कुलफी का ताले से क्या रिश्ता हो सकता है ? दरअसल अरबी में एक क्रिया है क़फ़ाला जिसमें ताला डालने, बान्धने, जमाने, एकजुट करने, जोड़ने, बन्द करने जैसे आशय हैं। इसके मूल में है अरबी की त्रिवर्णी धातु क़ाफ़-फे-लाम [ل-ف-ق] जिससे ये प्रकट होते हैं। अरबी में ताले के लिए एक शब्द है ‘क़ुफ़्ल’ जो इससे ही बना है। किसी ज़माने में हिन्दुस्तानी में इसका चलन था पर 1947 के बाद की हिन्दी में इस शब्द की तक़दीर में निर्वासन लिखा था। बहरहाल, मराठी में आज भी यह शब्द बतौर ‘कुलुप’ प्रचलित है। ध्यान रहे, कुफ़्ल से कुलुप बनते हुए मराठी में वर्णविपर्यय हो रहा है। जिस तरह हिन्दी में ‘ताला-चाबी’ समास प्रचलित है वैसे ही मराठी में ‘कुलुप-किल्ली’ युग्म प्रचलित है। कुलुप की तरह हिन्दी से किल्ली शब्द भी प्रचलन से बाहर हो गया। अलबत्ता मराठी समेत उर्दू और पंजाबी में भी ‘किल्ली’ शब्द है। ‘किल्ली’ यानी चाबी। मराठी के एक मुहावरे ‘गुरुकिल्ली’ को भी याद करते चलें जिसका अर्थ है सौ तालों की एक चाबी या हर मर्ज़ की एक दवा। कांशीराम अक्सर बहुजन समाज के हितों के लिए सत्ता को ‘गुरुकिल्ली’ कहते थे जिसका मतलब था सत्ता वह चाबी है जिसके जरिये ही दलितों का भला हो सकता है। ख़ैर, बात तो कुल्फ़ी /कुलफी की चल रही थी।

कच्चा दूध जब बासी हो जाता है तो गर्म करते हुए उसमें थक्का जम जाता है और पानी अलग हो जाता है। इसे दूध फटना कहते हैं। दूध फट सकता है तो क्या सिला भी जा सकता है ! जवाब है फटे दूध सिला तो नहीं जा सकता अलबत्ता गर्म ताज़ा दूध को ठण्डा कर जमाया जा सकता है। ये न समझ लें कि हम दही की बात कर रहे हैं। दूध से दही का बनना तो दरअसल दूध की सीरत का बदलना है जिसमें जमना लाज़िमी हो जाता है। दही को पिघलाया नहीं जा सकता जबकि जमा हुआ दूध पिघला कर फिर काम में लिया जा सकता है। दूध का जमना यानी कुल्फ़ी जमना। कुल्फ़ी दरअसल फ़ारस की देन है मगर कुल्फ़ी लफ़्ज़ सेमेटिक भाषा परिवार का है और अरबी से बरास्ता फ़ारसी होते हुए हिन्दी ज़बानों में दाखिल हुआ।

कुल्फ़ी में भी क़ुफ़्ल का खेल है। हिन्दी शब्दसागर में क़ुफ़्ल शब्द की प्रविष्टि है जबकि ज्ञानमंडल हिन्दी कोश में इसका कुलुफ रूप मिलता है जो मराठी के कुलुप का काफ़ी नज़दीक है। अल सईद एम बदावी के कुरान कोश के मुताबिक अरबी धातु क़ाफ़-लाम-मीम में बान्धने, जमाने, एकजुट करने, जोड़ने, बन्द करने, संयुक्त होने, लौटने, वापसी के साथ पुनरागमन जैसे भाव भी शामिल हैं। गौर करें दूध का जमना किस क्रिया की और इंगित कर रहा है ! दूध दरअसल वसामिश्रित पानी ही है जो सामान्य पानी की तुलना में थोड़ा धीरे जमता है। जमने की क्रिया घनीभूत होना है। इसे संघनन भी कह सकते हैं। यह एकजुट होना है। यहाँ प्रत्येक इकाई संगठित होती है। एक दूसरे से सटती है, संयुक्त होती है। यह जोड़ना-जुड़ना-सटना-लौटना-पास आना ही जमाव है। कहते हैं अरब के फ़ातमिद घराने के बादशाह अलमहदी ने आज से ग्यारह सौ साल पहले जब सिसली पर फ़तह पायी तभी अरबवासियों को कुल्फ़ी की नेमत भी मिली। अलमहदी के ऊँट सिसली के पहाड़ों से बर्फ़ लादकर अरब तक लाते थे। दोहरी परत वाले एक ख़ास बर्तन में इस बर्फ़ की तह जमाई जाती थी। इस बर्तन को नाम मिला क़ुफ़ली अर्थात वो जिसमें जमाया जाए। हिन्दुस्तान आते-आते कहाँ पर क़ुफ़ली के फ़ और ल में जगह की अदला-बदली हो गई, कहा नहीं जा सकता। सच यही है कि क़ुफ़ली से ही कुल्फ़ी की पैदाइश है।

यात्रादल, मंडली या कारवाँ मूलतः जन-जमाव होता है। हिन्दी में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला काफिला / क़ाफ़िला शब्द के मूल में भी अरबी क्रिया कफ़ाला है। गौर करें की काफिला यात्रियों के समूह को कहते हैं। संयुक्त होने, जुड़ने का भाव यहा स्पष्ट हो रहा है। कोई भी यात्री दल या कारवाँ दरअसल लोगों का समूह होता है। आमतौर पर रास्तों पर लोग छितराकर कर चलते हैं। हर व्यक्ति का अपना अलग मुक़ाम होता है। अलग मक़सद। किसी ख़ास मक़सद से एकत्रित हो कर साथ-साथ कूच करने वाले लोगों का समूह ही काफ़िला है। क़ुफ़्ल में शामिल पुनरागमन के भाव पर गौर करें तो ताले यानी कुलुप में उसकी भी तार्किकता नजर आती है। दरअसल आश्रय की सुरक्षा इसीलिए की जाती है क्योंकि उसे निर्जन छोड़ने की

परिस्थिति बनती है। लौटने पर हर चीज़ सुरक्षित मिले इसी सोच के तहत ताला लगाया जाता है। अर्थात ताले के साथ लौटने या वापसी का भाव जुड़ा हुआ है।
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॥नाम में क्या रखा है...॥

भा रतीय समाज में नामों को लेकर नवाचार बीते पाँच-छह दशकों से जोरों पर है। पिछली सदी के चौथे दशक के फैशनेबल जोड़े हरिवंश राय बच्चन-तेजी सूरी ने अपनी सन्तति को जब अमिताभ-अजिताभ नाम दिए तो यह फ़ैशन और भी ज़ोर पकड़ गया। हालाँकि बच्चन जी के आग्रह पर उनके बेटों के नाम कविवर सुमित्रानन्दन पन्त ने रखे थे। बाद के दौर में इस देश में जितने भी अमिताभ हुए वे बच्चन वाले अमिताभ से प्रभावित थे। किसी माँ-बाप ने अगर गौतम बुद्ध की नामावलि से प्रेरित होकर अपनी सन्तान को अमिताभ नाम दिया तो वे धन्य हैं।

नामों के प्रति आग्रह बेहद सरल सा है। अपनी सन्तान का सुन्दर सलोना नाम आज के पढ़े-लिखे और नवाचारी दिखने की होड़ में शामिल समाज में हर कोई चाहता है। पिछले दिनों तो बारिश, सुहानी, मासूमी जैसे नाम भी सुनने में आए। कुछ दिनों पहले एक सज्जन ने ये कहते हुए पुर्जा हाथ पर पकड़ा दिया कि "देखिए ज़रा इसका क्या अर्थ होता है". उस पर लिखा था- रकसित। "भतीजे के लिए ये नाम कैसा रहेगा ?" उन्हें बताया कि ये अर्थहीन है। सम्भव है ये रक्षित हो। पर वे नहीं माने। बोले 'क्ष' नहीं चाहिए, 'ख' हो जाता है। सही है किन्तु लक्ष्मण का लखन बन जाने से बात बिगड़ी तो नहीं, बन ही गई। कुछ दिनों बाद फिर मिलना हुआ तो पूछा कि क्या रहा? बोले वही रख दिया रकसित, पर आपका वाला। हम चौंके, हमारा वाला? बोले हाँ, ‘क्ष’ बदल कर x कर दिए हैं यानि raxit. "पर इससे तो अर्थ नहीं निकलता!!" परम सन्तोष से उन्होंने कहा, आजकल x का फैशन है। सब चलता है। तो तीन अक्षरी ‘रक्षित’ को ‘रकसित’ बना कर वे खुश थे जिसका कोई अर्थ नहीं था पर वे सबको इसका अर्थ ‘रक्षित’ ही बता रहे थे। क्योंकि मूलतः उनके ज़ेहन में तो रक्षित ही है।

एक गुजराती आत्मीय ने अपनी सन्तान का नाम ‘जयमिन’ रखा। अर्थ पूछने पर साफ़गोई से उन्होंने बताया था कि बस, ये ध्वनियाँ अच्छी लगी सो रख दिया। किसी के लिए अर्थ महत्वपूर्ण है तो किसी के लिए ध्वनि-उच्चार। किसी के लिए शुभाशुभ लक्षण महत्वपूर्ण है तो किसी के लिए ज्योतिषिय फलित। कोई माँ-बाप की इच्छा का सम्मान करता है तो कोई अन्य परिजनो के नवाचारी विचारों का। नाम रखने के यही महत्वपूर्ण आधार होते हैं। बाद में सब रूढ़ हो जाता है। मंगल का मांगीलाल हो जाता है और मंगला का मंगू। हमने तो उदिता जैसे नाम को प्यार से उद्दू होते भी देखा है और प्रदीप को पद्दी होते हुए रोते देखा है।

अभी एक और मित्र Partap Sehgal की वाल पर ‘रिशान’ शब्द पर चर्चा चल पड़ी। उन्होंने इस समस्या को बड़े भाई Om Thanvi जी से साझा किया था। अमेरिका वासी मित्र Dipak Mashal नें यह समस्या हमें भी टैग कर दी। हमें मालूम था कि रिशान शब्द डिक्शनरी में ढूंढने निकलेंगे तो नहीं मिलने वाला। यह भी 'रकसित' जैसा ही मामला है। शब्दकोशों में या तो रिश् मिलेगा या ऋष्। अगर रिश् मूल से विवेचना करेंगे तो ‘रिशण्य’ शब्द मिलता है जिसका मुखसुख आधार पर उच्चार ‘रिशान’ हो सकता है। पर इसका अर्थ होता है गिरा हुआ, असफल या गर्भपात। अब भला यह नाम कोई क्यों रखेगा? ‘ऋष्’ मूल से अगर विवेचना करें तो ‘रिशान’ उच्चार का करीबी ‘ऋषिन्’ होता है जिसका (भ्रष्ट) उच्चार रिशान सम्भव है। जिस तरह ऋचा को अब ‘रिचा’ लिखा जाने लगा है। ‘रितिक’ लिखा जाने लगा है। उसी तरह ऋषिन् का रिशान सम्भव है। ऋषिन् यानी योग्य, महर्षि, ज्ञानी, दानिश, बुद्धिमान, विचारशील, विवेकी आदि। बाकी तो हम भी यही कहेंगे की नाम में क्या रखा है !!!
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//बीबी और बीवी...//


हि न्दी में पत्नी के अर्थ में अक्सर 'बीबी' और 'बीवी' के बीच घालमेल है। हालाँकि भाषा का अपना संस्कार होता है जिसके तहत सावाधानी से भाषा-बर्ताव करने वाले स्त्री के लिए आदरार्थी सम्बोधन के तौर पर 'बीबी' का इस्तेमाल करते हैं जैसे बीबी परमजीत कौर अथवा चांदबीबी। दूसरी ओर 'बीवी' शब्द का इस्तेमाल अक्सर पत्नी के तौर पर होता है। कोशों में इन दोनों ही शब्दों में घालमेल है अर्थात 'बीबी' का अर्थ कुलीन स्त्री तो है ही साथ ही कुलवधु और पत्नी भी दिया गया है। उसी तरह 'बीवी' प्रविष्टि के आगे कुलीन स्त्री और पत्नी दोनो ही अर्थ बताए गए हैं। यह ठीक है कि आज से छह-सात दशक पहले यह घालमेल ठीक था। तब से अब तक न जाने कितने नए शब्दकोश सामने आ चुके हैं और पुराने कोशों के नए संस्करण निकाले जा चुके हैं किन्तु आज की हिन्दी में 'बीवी' शब्द पत्नी के अर्थ में स्थिर हो चुका है, ऐसा कोई कोश नहीं कहता जबकि बतौर कुलीन स्त्री, बीवी शब्द का प्रयोग बिरले ही कोई करता होगा। बहरहाल हिन्दी में बीवी / शब्द का प्रयोग फ़ारसी के रास्ते ही शुरु हुआ। यह जानना दिलचस्प होगा कि बीबी शब्द आया कहाँ से।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बीबी और बीवी दोनों एक ही मूल से निकले हैं। यही नहीं दोनों की अर्थवत्ता भी एक ही थी। मूल 'बीबी' है, उसका दूसरा रूप 'बीवी' है। दोनों ही रूप फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी में आए। फ़र्क़ इतना हुआ कि आदरार्थी स्त्रीवाची के तौर पर 'बीबी' शब्द का प्रयोग चूँकि भारत की पश्चिमी बोलियों तक ही सीमित रहा। बीबी में निहित पत्नी का अर्थ हिन्दी में व्यापक तौर पर लोकप्रिय हुआ। यही नहीं, बीबी के बीवी रूप को इस अर्थ में प्रधानता भी मिली। हालाँकि दोनों ही शब्द हिन्दी में बने रहे। बहरहाल, बीबी के मूल में जो भाव है उसमें स्नेह और प्रेम का स्पर्श है।

हिन्दी में मुहब्बत / महब्बत शब्द खूब प्रचलित है। यह अरबी से फ़ारसी होते हुए हिन्दी / उर्दू में दाख़िल हुआ। मुहब्बत के मूल में अरबी भाषा की त्रिवर्णी धातु है हा-बा-बा ب- ب-خ जिसमें बीज का भाव भी है और मित्र, प्रिय, स्नेही जैसे भाव भी हैं। अरब के रेगिस्तान में बीजों के बिखरने की क्रिया को 'हिब्बत' कहते हैं। बीज यानी 'हब्ब' और बीजों का बिखरना यानी 'हिब्बत'। एक बीज को धरती के गर्भ में स्थान मिलता है। धरती का स्नेह-स्पर्श पा कर उसमें अंकुरण होता है और बीज से हटकर धीरे-धीरे एक समूचा पृथक अस्तित्व नजर आने लगता है। जीवन का स्पंदन आकार लेने लगता है। बिना प्रेम के जीवन संभव नहीं है। यह अरबी प्रत्यय (अत) संज्ञा-सर्वनाम को क्रियारूप में बदलता है।

हिब्बत में अरबी उपसर्ग 'म' जुड़ने से बनता है महब्बत जिसे हिन्दी में मुहब्बत कहा जाता है। अरबी में मित्र को 'हबीब' कहते हैं जो इसी धातुमूल से जन्मा है। 'हबीबी' का मतलब होता है प्रियतम, सुप्रिय, प्यारा, दुलारा। महब्बत का मतलब होता है स्नेह-स्पर्श अथवा प्रेमाभिव्यक्ति। प्यार जताना। जिससे प्यार किया जाता है वह पुरुष पात्र कहलाता है महबूब और स्त्री पात्र कहलाती है महबूबा। 'हब्ब' में मित्र का भाव है इसीलिए इसका बहुवचन हुआ 'हुबूब'। इसमें 'म' उपसर्ग लगने से बनता है महबूब या महबूबा।

अरबी में पत्नी को यूँ तो ज़ौजा कहते हैं किन्तु रफ़ीक़ा शब्द भी है जबकि रफ़ीक़ का अर्थ होता है मित्र। स्वाभाविक है मित्र अगर प्रिय है तो प्रियतमा भी हो सकती है। इस नज़रिये से पत्नी के अर्थ में अरबी, फ़ारसी में बीबी शब्द भी प्रचलित है। हबीबा का अर्थ होता है मित्र, मित्रवत। मुमकिन है हबीबा / हबीबी का ही संक्षिप्त रूप बीबी है जिसका एक रूप बीवी ज्यादा प्रचलित हुआ जिसका अर्थ है पत्नी जबकि बीबी आमतौर पर भद्र महिला के लिए सम्बोधन है। हब्बाखातून पर गौर करें। बीबी फात्मा, बीबी नाजरा, बीबी अख़्तरी जैसे नामों पर ध्यान दें। ये सम्बोधन समाज के दिए हुए हैं। इनमें पत्नी का भाव नहीं। अलबत्ता सामान्य तौर पर बीवी लिखने के स्थान पर पत्नी के लिए बीबी भी लिख दिया जाता है। अच्छी हिन्दी लिखने वालों को इस ग़लती से बचना चाहिए और पत्नी के लिए बीवी वर्तनी का प्रयोग ही करना चाहिए।
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//हस्ती मिटती नहीं हमारी//

हि न्दी में दो हस्ती है पर इनमें से एक का ही इस्तेमाल ज्यादा होता है। पहला ‘हस्ती’ वह है जिसका अर्थ है हाथी। गौर करें ‘हस्त’ से बना है ‘हस्तिन’ और फिर ‘हस्ती’। चूँकि हाथी की सूँड भुजा जैसी होती है और उससे वे सारे काम वह करता है जो मनुष्य अपने हाथ से करता है इसलिए उसका लाक्षणिक नाम पड़ा ‘हस्तिन’ यानी हाथ जैसा, हाथ वाला या हस्तयुक्त। पर बोलचाल की हिन्दी में हाथी चलता है, हस्ती नहीं। हम उस ‘हस्ती’ की बात कर रहे हैं जो बड़ी शख़्सियत के लिए इस्तेमाल होता है। मूल रूप से ये ‘हस्ती’ हिन्दी का अपना न होकर फ़ारसी का है मगर और इसकी रिश्तेदारियाँ संस्कृत, जेंद-अवेस्ता, उर्दू, फ़ारसी, ईरानी, पोलिश, चेक, इंग्लिस समेत समेत योरपीय भाषाओं में तलाशी गई हैं।

“कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी”। यह न समझ लें कि इस प्रसिद्ध पंक्ति के बहाने हम पुरातनता का अरण्यगान शुरू करने जा रहे हैं। अलबत्ता यह मशहूर इबारत शब्द ब्रह्म के सन्दर्भ में भी सार्थक हो रही है। हमारा आशय ‘हस्ती’ से है। उसी ‘हस्ती’ से जिसे आमतौर पर बड़े आदमी, महान व्यक्तित्व या खास शख़्सियत का दर्जा मिला हुआ है। इसके अलावा ‘हस्ती’ का एक अर्थ और है- होने का भाव। इसका प्रयोग अस्तित्व, महत्व, रसूख़, बिसात, प्रभाव, सामर्थ्य आदि के सन्दर्भ में आमफ़हम है। “तुम्हारी क्या हस्ती है?” से यह स्पष्ट है।

बात दरअसल यह है कि वैदिक क्रियारूप ‘अस्’ में होने का भाव है। उपस्थिति, विद्यमानता, जीवन आदि के अर्थ में इसके विभिन्न रूपों का प्रयोग होता है। ‘अस्ति’, ‘अस्तु’ जिससे होने, हो जाने का पता चलता है। ‘अस्तित्व’ एक सामान्य प्रचलित शब्द है जिससे किसी चीज़ होने का बोध होता है। हिन्दी वर्तमानकालिक वाक्य रचनाओं के अन्त में ‘हूँ’, ‘है’, ‘हो’ जैसी सहायक क्रियाएँ अवश्य लगती हैं। ये सभी ‘हो’ या ‘होना’ से सम्बद्ध हैं। विभिन्न व्याकरणाचार्यों ने ‘होना’ के विभिन्न रूपों का विकास संस्कृत की ‘अस्’ धातु या ‘भू’ धातु से माना है। हालाँकि अब यह स्थापित है कि इनका विकास ‘भू’ से हुआ है।

वैदिक संस्कृत का ही एक रूप अवेस्ता थी जिससे पहलवी, फ़ारसी का विकास हुआ। कुछ भाषाविज्ञानियों का मानना है कि अवेस्ता में इस ‘अस्’ का रूप अह हो जाता है। लेकिन यह बहुत विश्वसनीय मान्यता नहीं है। मैकेंजी को पहलवी कोश में ‘अस्त’ और ‘हस्त’ को समानार्थक दर्ज़ करते हुए ‘हस्त’ को उत्तरी पहलवी रूप बताया गया है। जो भी हो, पहलवी और फ़ारसी में ‘अस्त’ और ‘हस्त’ दोनों रूप चलते हैं अलबत्ता दोनों ही रूपों का महीन फ़र्क़ के साथ अलग-अलग इस्तेमाल होता है।

संस्कृत के ‘अस्ति’ में वर्तमानकालिक विद्यमानता का भाव है। यही ‘अस्तित्व’ है और फ़ारसी के ‘हस्ती’ का आशय भी यही है। चाहें तो फ़ारसी के ‘हस्ती’ में निहित होने के भाव को पूरी तरह समझने के लिए संस्कृत के ‘अस्ति’ से बने अस्तित्व की तर्ज पर हस्ति से ‘हस्तित्व’ की कल्पना कर भी समझा जा सकता है। इसी तरह अस्तित्व से व्यक्तिपरक ‘हस्ती’ बनता है जिसका अर्थ है विशिष्ट व्यक्ति या बड़ा आदमी। यह बड़ा आदमी कौन होता है ? किन्ही निजी गुणों, स्वभाव, रोब-दाब, रुआब, ठसक और ऐश्वर्य के प्रभाव के साथ अपने अस्तित्व का बोध कराने वाला व्यक्ति ही हस्ती है। यानी अस्तित्व से ‘हस्ती’ का पता चलता है।
‘अस्’ और ‘हस्त’ की रिश्तेदारी यूरोपीय भाषाओं में भी है। अंग्रेजी होने की सामान्य क्रिया का ‘is’ से पता चलता है। भाषाविज्ञानियों ने ग्रीक का एस्ती, लैटिन का एस्त, संस्कृत का अस्त, लिथुआनी का एस्ती, स्लोवानी का जेस्टी आदि शब्द सजातीय माने हैं। मिसाल के तौर पर फ़ारसी में ‘हस्त’ के हस्तम (मैं हूँ), हस्तिम (हम हैं) और हस्तन्द (वे हैं) जैसे रूप बनते हैं। ‘हस्तम’ यानी मैं हूँ कि तर्ज़ पर पोलिश भाषा में ‘यस्तेम’ या ‘जेस्तेम’ और चेक भाषा में ‘यशेम’ रूप मिलते हैं जो सजातीय है।
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//मोम में 'मधु' की तलाश//


से शब्द जिनका कोई समानार्थी या पर्याय नहीं मिलता, उनमें ‘मोम’ भी है। मोम यानी क्या? यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि मोम भी हिन्दी का अपना नहीं बल्कि बरास्ता फ़ारसी हिन्दी में समाया है। ऐसा नहीं कि वैदिक अथवा संस्कृत शब्दावली में मोम के लिए शब्द नहीं हैं किन्तु हिन्दी में इनकी छाया भी नज़र नहीं आती। फ़ारसी में मोम शब्द की व्युत्पत्ति मूम से मानी जाती है। इस मूम का मूल क्या है इसके आगे रास्ता बन्द मिलता है। हिन्दी में इस कड़ी में मोमजामा, मोमबत्ती, मोमिया जैसे कुछ पद प्रचलित हैं। जानते हैं मोम के जन्मसूत्रों को और इस फ़ारसी शब्द के संस्कृत-वैदिक रिश्तों को।

मोम के जितने भी विकल्प संस्कृत में मिलते हैं उन सबका रिश्ता मधु से जुड़ता है। संस्कृत में मधु का अर्थ फूलों का रस यानी शहद होता है, यह सब जानते हैं। इसी का विस्तार मदिरा या मद्य भी है जिसका अर्थ है शराब। मदिरा और मद्य भी मधु से ही विकसित है। फ़ारसी में शराब को मय कहते हैं। संस्कृत के मद्य से द का लोप करें तो फारसी का मय प्राप्त होता है। इसी के साथ मधु में मोम का भाव भी है। मधु का एक अन्य अर्थ है मधुमक्खियों का छत्ता।  जाहिर है कि मोम से अभिप्राय मधुमक्खियों द्वारा बनाए गए छत्ते से ही है। संस्कृत में ‘मधुकाश्रयम्’ का अर्थ भी मोम होता है और मधु भी। ‘मदना’ का अर्थ भी वही है जो अंग्रेजी में wax का होता है। इसी तरह एक अन्य शब्द है सिक्थक जिसका अर्थ भी मधुमक्खियों के छत्ते से प्राप्त मोम है। यूँ सिक्थ का अर्थ मोम भी होता है और पकाया हुआ चावल भी।

गौरतलब है कि मराठी में मोम के स्थान पर मेण शब्द प्रचलित है। मोमबत्ती की जगह वहाँ मेणबत्ती शब्द का इस्तेमाल होता है। इसी तरह सिन्धी में भी मेण शब्द प्रचलित है। ध्यान रहे, प्राचीनकाल में दुनियाभर में पशुओं की वसा या चर्बी का इस्तेमाल रात में उजाले के लिए किया जाता रहा है। इसके लिए संस्कृत में मिद्, मिन्द, मिन्न जैसे शब्द हैं जिसमें फूलने का भाव है। इसका एक अर्थ चर्बी या वसा भी होता है।

राजनिघण्टु में मोम के अनेक नाम दिए गए हैं- सिक्थकम्, मधुजम्, विघसम्, मधसम्भवम्, मोदनम्, काचम्, उच्छिष्टमोदनम्, मक्षिकामलम्, क्षौद्रेयम्, पीतरागम्, स्निग्धम्, माक्षिकजम्, क्षौद्रजम्, मधुशेषम्, द्रावकम्, मक्षिकाश्रमयम्, मधूत्थितम् और मधूत्थम् आदि। मोम को संस्कृत में मधुज भी कहा गया है अर्थात शहद से बना हुआ या जिसे शहद के छत्ते से प्राप्त किया गया हो।

मधुजम् शब्द पर गौर करें। मधु से जन्मा यानि मोम। मधुजम् से मउअम, मऊम और फिर मूम प्राप्त होता है। इसी तरह फ़ारसी की ओकारान्त प्रवृत्ति को ध्यान रखें तो मधुजम् > मउअम > मऊम > मूम > मोम के विकासक्रम से बात सुलझ जाती है। बेशक मोम फ़ारसी लफ़्ज़ है किन्तु उसका मूल इंडो-ईरानी है। यह कहने की ज़रूरत नहीं कि मधु शब्द की जड़ें समूचे भारोपीय परिवार की अनेक भाषाओं में व्याप्त हैं। इस पर फिर कभी।

‘ममी’ यानी संरक्षित मृतदेह से भी इस मोम का रिश्ता है। अरबी के ‘ममियाह’ शब्द का लैटिन रूप हुआ ममिया जो बिटुमिन या डामर के अर्थ में ही रहा और लैटिन से यह अंग्रेजी में ममी हुआ। अरबी का ममियाह भी फ़ारसी मोम का ही रूपान्तर है। प्राकृतिक परिवर्तनों के तहत भूमि के भीतर दफ्न हो गई जीवधारियों की देह तो फॉसिल अथवा जीवाश्म कहलाईं। मगर पुनर्जन्म की कल्पना के चलते दुनियाभर की संस्कृतियों में मृतदेह को इस आशा में संरक्षित करने की परंपरा रही है कि पुनर्जन्म के वक्त आत्मा को फिर पुराना शरीर मिल जाए। इसके लिए प्रचलित शब्द है ममी।

यह शब्द मिस्र की संस्कृति से आया है मगर है अरबी का जिसका मूल फारसी है। समझा जाता है कि प्राचीन प्राचीन मिस्र में इसी भूगर्भीय काले पदार्थ, जो गोंद, टार, वैक्स या राल से मिलता जुलता था, मृत देह के परिरक्षण के लिए इसका शरीर पर लेपन किया जाता था। इस देह के लिए ही ममी शब्द प्रचलित हुआ।
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//छाजन, बिस्तर और बिछौना//


हि न्दी में व्युत्पत्ति के नज़रिये सेबहुत भ्रम की स्थिति है। शब्दकोशों से बहुत ज़्यादा मदद नहीं मिलती। इस दृष्टि से बने हिन्दी के पहले कोश हिन्दी शब्दसागर को महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ है। मगर जैसा कि हिन्दी में शब्दकोशों को अद्यतन और संशोधित करने की परिपाटी नहीं के बराबर है इसलिए अनेक शब्दों की भ्रामक व्युत्पत्तियाँ भी मिलती हैं। शब्दों का सफर में प्रसंगवश उनका उल्लेख होता रहा है। ऐसा ही एक शब्द है बिछौना। हिन्दी शब्दसागर इसका रिश्ता बिछाना क्रिया से मानता है। बिछाना की व्युत्पत्ति विस्तरण बताई गई है। हिन्दी में बिछौना का अर्थ सीधे सीधे सोने का गद्दा है। जबकि इसी कड़ी में आने वाले बिछावन या बिछायत में बिस्तर, चांदनी, दरी, फर्श सब आ जाता है।

गौरतलब है हिन्दी में गद्दे के लिए बिस्तर शब्द भी आमफ़हम है और जिसकी आमद फ़ारसी से हुई है। फ़ारसी के बिस्तर का विकास पहलवी के विस्तर (संस्कृत विस्तरण) से माना जाता है जिसका अर्थ है बिछौना। समझा जा सकता है कि वैदिक विस्तर जिसमें फैलाव, खिंचाव, व्याप्ति, प्रसार जैसे भाव हैं, अवेस्ता और फिर पहलवी में भी उसका रूप यथावत रहा। पहलवी में एक क्रिया बनती है विस्तरदन जिसमें फैलाव या प्रसार का भाव है। फ़ारसी में इसका ही एक रूप गुस्तरदन हो जाता है। ध्यान रहे हिन्दी में संस्कृत शब्दों के रूपान्तर क्रम में ‘च्च’ या ‘च्छ’ जैसे रूप त्स से बनते हैं जैसे वत्स का वच्च या बच्छ हो जाता है। विस्तरम में त्स नहीं स्त है। स्त का रूपान्तर त्त या त्थ और फिर थ बनेगा। जैसे हस्त से हत्थ > हत्था > हाथ या हस्ती > हत्थी > हाथी। ज़ाहिर है विस्तरण से बिछौना बनने की बात भ्रामक है। विस्तरण से बिथरन/ बिथरना तो बन सकता है जिसका अर्थ है छितराना, अलग-अलग करना या होना, तितर-बितर होना, विच्छिन्न होना, बिखर जाना आदि। आम तौर पर बिजों के परागण या बुआई के सन्दर्भ में बिथराना ज्यादा प्रयुक्त होता है।

बिछौना चाहे बिस्तर का प्रतिरूप हो मगर शब्द निर्माण प्रक्रिया वह नहीं है जो विस्तर से बिस्तर में नज़र आती है। कालीन, फर्श, गलीचा आदि बिछाने की प्रक्रिया पर गौर करें तो विस्तर / विस्तरण का भाव समझ में आता है। इन सभी को आमतौर पर गोल लपेट कर रखा जाता है। बिछाते समय गोला खुलता जाता है और बिछावन का विस्तार होता जाता है। मगर बिछाने में विस्तरण के साथ-साथ आच्छादन का भाव भी है। भारतीय भाषाओं में ‘द’ का रूपान्तर ‘ज’ में आमतौर पर होता है। मिसाल के तौर पर वाद्य, वादन से ही बाजा, बजाना बनता है। छादन से ही बना है छाजन जिसका अर्थ है सायबान या छप्पर। छाने, छुपाने, छाया करने की क्रिया भी छाजन है। छाजन का एक अर्थ वस्त्र भी है। आच्छादन बना है ‘छद्’ क्रिया से जिसमें छा जाने या छिपाने का बोध होता। छत, छत्र, छत्री आदि की इसी ‘छद्’ से रिश्तेदारी है। ‘छद्’ में ‘आ’ उपसर्ग लगने से बनता है आच्छद अर्थात ढकना, छाना या छिपाना। विकास की शुरुआती प्रक्रिया में फर्श पर बिछाने वाला बिस्तर बाद में आता है। वह स्थिति तब आई जब मनुष्य ने अपने रहने का सुरक्षित स्थान बना लिया। इससे पहले तो ऊँची चट्टान, पेड़ों की डाल आदी पर छाजन तान कर ही शायिका बनाई जाती रही। यानी चट्टान या खुरदुरी सतह पर नर्म घास-फूस, पत्ती का आवरण जिस पर लेटा जा सके।

हिन्दी के ‘वि’ उपसर्ग में दूर, पास, खिंचाव, अलगाव, दूर करने जैसे भाव भी हैं। ‘आच्छद’ अगर छप्पर है तो ‘विच्छद’ में भी ढकने, फैलाने, दूर करने जैसे भाव हैं। आशय बिछाने का ही है। हिन्दी में ‘व’ का रूपान्तर ‘ब’ में होता है। विच्छादन से बिच्छअन > बिछऊन > बिछौन होते हुए बिछौना बनने की प्रक्रिया तार्किक लगती है। रॉल्फ़ लिली टर्नर भी बिछौना कि व्युत्पत्ति विच्छादन से मानते हैं। इसी तरह मराठी में बिछौना / बिछाना दोनों शब्द गद्दे के अर्थ में हैं। मराठी व्युत्पत्ति कोश में कृ.पा. कुलकर्णी भी विच्छादन से ही बिछाना की व्युत्पत्ति मानते हैं। भारतीय भाषाओं में बिछाउन, बिछउना, बिछाना, बिछोन, बिछाउनू, बिसाना, बिछाउना, बिछावन जैसे शब्दरूप गद्दे, बिस्तर के अर्थ में प्रचलित हैं।
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//डेढ़ पसली या ज़िला //


बा ज़ार और सरकार की ज़ुबान का असर किसी भी समाज की भाषा पर पड़ता है। हिन्दी में अरबी-फ़ारसी शब्दों की रचबस के पीछे यह दो कारण रहे हैं। डिस्ट्रिक्ट के लिए हिन्दी में जनपद शब्द है किन्तु उसका इस्तेमाल कम होता है। इस अर्थ में अरबी का ज़िला शब्द ही काबिज है। बड़ी अजीब बात है कि भारतीय उपमहाद्वीप में डिस्ट्रिक्ट के अर्थ में ज़िला शब्द जितना प्रचलित है, अरबी में इस रूप में इसे बहुत कम इस्तेमाल किया जाता है। हालाँकि वहाँ बतौर प्रशासनिक इकाई- ज़िला, क्षेत्र या इलाक़ा आदि के लिए कम से कम दो दर्जन शब्द हैं। हिन्दी वाले चूँकि नुक़ता नहीं लगाते तो ज़िले का उच्चार जिला करते हैं। हिन्दी में नुक़तों के न होने से अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ समस्या हो जाती है। क्योंकि अनेक शब्द ऐसे हैं जिनमें वर्तनी के नाम पर सिर्फ़ नुक़ता ही फ़र्क़ पैदा कर देता है। यही बात ज़िला के साथ भी है। अरबी में बिना नुक़ते का जिला भी है जिसका अर्थ होता है आभा, प्रभा, कान्ति अथवा चमक। बहरहाल जानते हैं ज़िले की जन्मकुंडली को।

ज़िला सामी परिवार का है और इसका मूल इच्चारण ज़िल्अ है और यह अरबी की त्रिवर्णी धातु दाद-लाम-ऐन (ل ع ض) से मिलकर बना है। अरबी का दाद अक्षर दरअसल द्साद की तरह उच्चारा जाता है। इस तरह ज़िला का उच्चार Dsila या Dzila होता है। अरबी द्साद के लिए फ़ारसी में ज़ाद ﺽ और उर्दू में ज़ुआद ض अक्षर हैं। फ़ारसी उर्दू के रास्ते हिन्दी में इसका उच्चार ज़ ही होगा। ज़िला का मूलार्थ है पार्श्वास्थि यानी पसलियाँ। इसके अलावा इसमें जनपद, मंडल अथवा प्रान्त का आशय भी है। ऐसा इलाका जो किसी सरकारी अहलकार के अधीन हो। ज़िला का एक अर्थ तालिका या लिखने का लम्बवत खाना भी होता है जिसे स्तम्भ या कॉलम कहते हैं। हालाँकि अरबी में ऐसे अनेक शब्द हैं जिनसे क्षेत्रवार प्रशासनिक इकाई को पता चलता है जैसे- इकलिम, बलादिया, बन्दर, बनादिर, कुत्त, कित्ता, दायरा, मरकज़, सन्जाक़, शुक़, अश्क़ा, मुतसर्रिफ़, अमल, अमाला, कुत्र, मुकाता, मक़ामिया, कूरा, लीवा, मिन्तक़ा, मनातिक़, जीहा, मवातिन और विलाया और फ़लाज़ा।

ज़िला के पसली या RIB वाले अर्थ की जनपद वाले अर्थ से तार्किक साम्यता स्थापित नहीं होती। सामी परिवार का होने की वजह से ज़िला हिब्रू में भी है और इसके समरूप हैं ज़ेला या ज़ेलाह। जिस तरह अरबी में दाद का उच्चार द्साद या द्ज़ाद की तरह है उसी तरह हिब्रू में इसका समरूप त्सा या त्ज़ा है। इस तरह इसका हिब्रू रूप हुआ Tsela या Tzela. बाइबल में ज़ेलाह नाम के एक शहर का भी उल्लेख हैं। अनेक सामी सन्दर्भों को देखने के बाद पता चलता है कि इसमें पहलू, पार्श्व, साइड, आजू-बाजू, क्षेत्र, फ़लक जैसे अर्थ भी हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि मूलतः ज़िला में परिधि, हदबंदी या दायरा का भाव है और ये सभी शब्द मूलतः सुरक्षा से जुड़े हैं। किन्तु अरबी में इसका आशय सिर्फ़ रिब या पसली के अर्थ तक सीमित रहा जबकि फ़ारसी में आकर इसका क्षेत्र या इलाका के अर्थ में विस्तार हुआ। गौर करें जनपद जैसे अर्थ के साथ पार्श्वास्थि या पसली जैसा अर्थ मेल क्यों नहीं खा रहा है। पार्श्वास्थियों या पसलियों की संरचना देखें। कुदरत ने इसे दिल और फेंफड़ों की हिफ़ाज़त के लिए बनाया है। गोल दायरे में यह सीने के दोनो तरफ़ और आगे-पीछे से इन नाज़ुक अंगों की रक्षा करती हैं। स्पष्ट है कि ज़िला का मूलार्थ एक ख़ास दायरे, एक खास हद वाले क्षेत्र से है।

एंग्लो इंडियन डिक्शनरी हॉब्सन-जॉब्सन के मुताबिक शायद 1776 में ज़िला को कम्पनी राज में जनपदीय ईकाई की तरह बरता जाने लगा था। हालाँकि मुस्लिम दौर में इसका प्रयोग दो सदियों पहले से देश में शुरू हो चुका था। मराठी में ज़िला का उच्चार जिल्हा होता है तो सिन्धी में इसे जिल्ओ कहते हैं। गौर करें यह जिल्ओ ज़िला के सही उच्चार जिल्अ के ज़्यादा क़रीब है। किसी ज़माने में ज़िला प्रमुख को ज़िलादार कहा जाता था। अंग्रेजों ने राजस्व वसूली के लिए जो व्यवस्था बनाई उसमें एक मंडल या जनपद के लिए कलेक्टर का पद होता था। कलेक्टर यानी जो लगान वसूली करे और सरकारी ख़ज़ाने में जमा कराए। आज ज़िलादार कहीं कलेक्टर कहीं ज़िला कलेक्टर या डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट यानी डीएम कहलाता है।
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।।हसन को मेहंदी न लगाओ।।


हिन्दी वाले अक्सर मेंहदी और मेहदी (महदी) में घालमेल कर जाते हैं। बतौर व्यक्तिनाम मेहदी को भी वे हिना के अर्थ में मेंहदी या मेहँदी लिखते और उच्चारते हैं। यानी में हिन्दी में महदी या मेहदी को बिना अनुनासिकता के उच्चारा ही नहीं जाता। ऐसा सिर्फ़ अज्ञानतावश होता रहा है। दरअसल व्यक्तिनाम वाले मेहदी का प्रयोग उतना नहीं होता जितना महावर मेंहदी का होता है। सो लोकप्रिय उच्चार ही मेहदी के साथ भी चस्पा हो गया। जानते हैं दोनों के फ़र्क़ को।

दरअसल प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक मेहदी हसन के नामोच्चार के साथ ही समस्या रही है। हिन्दी वाले इसे मेंहदी मेहंदी की तरह ही लिखते बोलतेे आ रहे हैं। मेहदी का सही रूप महदी है और सामी परिवार की भाषाओं में इसका प्रयोग होता है। बरास्ता फ़ारसी भारतीय भाषाओं में भी यह चला आया है। बहरहाल मेहदी या महदी का अभिप्राय है सही राह दिखाना, नेतृत्वकर्ता, उपदेशक, निर्देशक आदि । महदी का अर्थ है दीक्षित जिसे कुछ निर्देश मिला हो। जो निर्देशित हो। बतौर धर्मप्रमुख भी इसका प्रयोग होता है। मेहदी का संक्षिप्त रूप हादी भी है। जदीद उर्दू कोश के अनुसार शिया सम्प्रदाय के बारहवें इमाम को भी इसी रूप में पुकारा जाता है। विश्वास है कि क़यामत के दिन वे फिर प्रकट होंगे। महदी शब्द के मूल में है अरबी की हदा धातु- ي د هـ (हा-दा-या) जिसमें निर्देश, मार्गदर्शन, संस्कार, राह, स्पष्टता, व्याख्या, देना, भेट, प्रकार, तरीका जैसे भाव हैं। गौर करें निर्देश के लिए हिदायत शब्द भी खूब प्रचलित है जो मूलतः अरबी का शब्द है और और महदी का रिश्तेदार है।

दूसरी तरफ़ हाथ-पैरों पर गहरे लाल रंग के बेलबूटे बनाने के लिए एक खास कँटीली झाड़ी की पत्तियों का इस्तेमाल होता है उसे मेंहदी कहते हैं। संस्कृत में इसके लिए मेन्धि या मेन्धिका शब्द है। मोनियर विलियम्स इसे लासोनिया इनर्मिस का समरूप बताते हैं जो मेंहदी या हिना का वानस्पतिक नाम है। मेन्धि से मेंहदी की व्युत्पत्ति सम्भव है क्योंकि ध वर्ण में समाहित द + ह ध्वनियाँ मेंहदी में स्पष्ट हो रही हैं। मेन्धि या मेन्धिका से मेंहदी बनने में वर्णविपर्यय भी हो रहा है। मेंहदी के लिए अरबी का ही हिना शब्द हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है। अंग्रेजी का हेना भी अरबी के हिना से ही बना है। अरबी हिना का अर्थ है रंगीन बेलबूटे बनाना।
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//क्या हाल भिड़ू //


राठी के अनेक शब्द हिन्दी में घुलमिल चुके हैं। जैसे हलकट, वास्तव, वापरना, बिन्दास आदि। इसी कड़ी में भिड़ू शब्द भी आता है। अनेक लोग अनजाने में इसका प्रयोग बीडू करते हैं जो सही नहीं है। मराठी ‘भिड़ू’ में मूलतः संगी, साथी, स्नेही, मित्र, यार जैसे भाव हैं। किसी ज़माने में इसमें प्रतिस्पर्धी का भाव था और मित्र, दोस्त, यार जैसे ये तमाम भाव प्रतिस्पर्धी का ही अर्थविस्तार हैं। हिन्दी की ‘भिड़ना’ क्रिया का मराठी रूप होता है ‘भिड़णे’ और इससे ‘भिड़ू’ का गहरा रिश्ता है। हिन्दी में भिड़न्त, भिड़ना, भेड़ना (दरवाज़ा), भिड़ाना जैसे शब्द इसी कड़ी में आते हैं। और तो और, भीड़ जैसा आमफ़हम शब्द भी इसी परिवार का सदस्य है। जानते हैं मराठी भिड़ू के उत्तर-भारतीय सजातीय बन्धुओं की जन्मकुंडली को।

मराठी की भिड़णे क्रिया का अर्थ है एक दूसरे के सम्मुख आना, पास-पास आना आदि। अर्थात सहचर-जोड़ीदार भी भिड़ू है और दूसरे पाले में खड़ा प्रतिस्पर्धी भी भिड़ू है। कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश (पृ.611) में भिड़णे क्रिया के अन्तर्गत ही भिड़ू शब्द का उल्लेख है और इसका अर्थ “खेळांतील गडी” अर्थात जोड़ीदार, साथी, कम्पैनियन, संगी आदि होता है। कुलकर्णी इस सिलसिले में कुछ भ्रम पैदा करते हैं। वे भिड़ू की व्युत्पत्ति प्राकृत ‘आब्भिड’ से बताते हुए इसका रिश्ता संस्कृत के ‘आद्भिद’ शब्द से जोड़ते हैं। गड़बड़ यह है कि संस्कृत कोशों में आद्भिद की प्रविष्टि नहीं है। कुलकर्णी भी इस शब्द का जिक्र करते हुए इसका सन्दर्भ नहीं बताते। इसी तरह प्राकृत ‘आब्भिड’ का उल्लेख भी अशुद्ध रूप से करते है। सही रूप है ‘अब्भिड’।

पण्डित हरगोविन्ददास त्रिकमचंद सेठ रचित प्राकृत भाषा के सम्मान्य कोश पाइअ सद्द महण्णवो (प्राकृत शब्द महार्णव) में 'अब्भिड' शब्द की प्रविष्टि है जिसका अर्थ है संगति करना, मिलना आदि। अगर हम भिड ध्वनि पर विचार करेंगे तो बात नहीं बनती। कुलकर्णी जिस आद्भिद का ज़िक्र करते हैं उसमें मूलतः 'भिद्' है। भिद् में भेदने, छेदने, फाड़ने का भाव है। इससे भिड नहीं बनता साथ ही सम्मुख, संग या साथ जैसे अर्थ भी विकसित नहीं होते। प्राकृत का ही एक शब्द है अब्भिट्ठ। प्राकृत शब्द महार्णव में जिसका अर्थ है संगत, सामने आकर भिड़ा हुआ। इसमें भिट्ठ या भिट पर गौर करने से राह निकलती है।

हिन्दी शब्दसागर के सम्पादक भिड़ना क्रिया के मूल में ‘भड़’ जैसा अनुकरणात्मक शब्द देखते हैं। कोश के मुताबिक भिड़ना में - “1. एक चीज का दूसरी चीज से टक्कर खाना। टकराना। 2. लड़ना । झगड़ना । लड़ाई करना। 3. समीप पहुँचना। पास पहुँचना। नजदीक होना। सटना।” जैसे भाव है। ‘भड़’ जैसी काल्पनिक ध्वनि पर विचार करें तो भिड़ना क्रिया में हर बार भौतिक टकराहट नहीं है। हर चीज़ टकराने पर ‘भड़’ आवाज़ नहीं करती। इसलिए भड़ से भिड़ना दूर की कौड़ी है। भिड़ाना क्रिया में सटाने, साथ लाने का भाव है। भिड़ना में टकराना कम और सम्मुख होने, जोर-आज़माइश करने या कशमकश का भाव है। जोर-आज़माइश सट कर भी होती है और संवाद से भी होती है। मूल रूप से इस शब्द के दायरे में दो चीज़ो का साथ होना है। चाहे सम्मुख हों या अगल-बगल में। सम्मिलन का भाव है। सटने का भाव है। दरवाज़ा भेड़ना या भिडाना इसी अर्थ में है। इन्ही भावों का अर्थ विस्तार लड़ाई, ज़ोर-आज़माइश, मिलाना, मिलना, गाँठना, पास आना, साथ चलना, निकटता आदि में होता है।

एक बार फिर से आते हैं प्राकृत के अब्भिट्ठ और अब्भिड पर। अब्भिड़ में भिड़ साफ पकड़ में आता है। अब्भिट्ठ का अगला विकास अब्भिड़ है। मिलने, पाने के अर्थ में हिन्दी के भेट शब्द पर विचार करें। भिट्ट> भिट्ठ> भिड इस भेट के प्राकृत रूप हो सकते हैं। इसकी पुष्टि होती है रॉल्फ लिली टर्नर के भारतीय-आर्य भाषाओं के तुलनात्मक कोश में भिट् प्रविष्टि से। टर्नर प्राकृत की ‘भिट्’ धातु का उल्लेख करते हैं। वे प्राकृत- भिडई (मिलना), सिन्धी- भैड़नूं (मिलना), मराठी- भिड़णे (पास आना, कशमकश), हिन्दी-भिड़ना (जोर-आजमाइश) का उल्लेख करते हुए भीड़ (जन-जमाव) और भेट यानी मिलना, भेला, भिल्ल (मिलना, समूहन, बन्धन, मिश्रण), सिन्धी- भेटणूँ (आलिंगन) जैसे शब्दों का उल्लेख भी करते हैं जो इसी कड़ी में आते हैं।

गौर करें, भेट शब्द में जो मिलने का भाव है। मालवी में भेट से भेटना क्रिया बनती है और मराठी में भेट से भेटणे। संस्कृत में निकटता, पास जाना, समीप आना जेसे भाव ‘अभ्ये’ से प्रकट होते हैं। कुलकर्णी ‘अभ्येति’ से प्राकृत भिट्ट का रिश्ता बताते हैं जो तार्किक है। मोनियर विलियम्स के कोश में अभ्येत्य की प्रविष्टि है। अभ्येत्य > अब्भिट्ठ
>अभिट्ठ > भिट्ट से हमें भिट मिलता है जिससे भेट बनता है या अभ्येत्य> अब्भिड >; भिड़ के विकासक्रम में हमें भिड़ना, भेड़ना प्राप्त होते हैं। मराठी का भिड़ू यानी संगी, साथी, प्रतिस्पर्धी या हिन्दी के भीड़भाड़, भिड़न्त जैसे अनेक शब्दों में रिश्तेदारी इससे साबित होती है।
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