Wednesday, October 31, 2007

रंगे सियार का सफरनामा


दु
नियाभर में धूर्त और चालाक व्यक्ति के संदर्भ में जिस इकलौते पशु को सर्वाधिक प्रतीक माना गया है वह है सियार। संसार की ज्यादातर लोक भभाषाओं में इसके बारें में बोधकथाएं , कहावतें, लोकोक्तियां आदि हैं जो मनुश्य को धूर्त प्रवृत्तियों से आगाह करती हैं। पंचतंत्र और हितोपदेश ने तो सियार की कुख्यात छवि को खूब उभारा है। हितोपदेश में करटक-दमनक की जोड़ी सदियों से मशहूर है। यहां तक कि अरबी फारसी तक में आज से सैकड़ों साल पहले ये पहुंच चुकी थीं। फारसी में तो करटक- दमनक , कलीलाह, दिमनाह बनकर मौजूद हैं।
सियार शब्द का मूल संस्कृत का शृगाल: या शृकाल: है। इसका अर्थ है उचक्का, धूर्त, ठग, डरपोक और दुष्ट प्रकृति का। सियार बहुत तेज भाग भी सकता है इसी लिए शृगाल: के पीछे कुछ विद्वानों को संस्कृत की ‘सृ’ धातु भी नजर आती है जिसका मतलब ही है बहुत तेज भागना या चलना। कुछ लोग इसकी उत्पत्ति ‘शृ’ धातु से भी मानते हैं जिसका अर्थ है फाड़ डालना , टुकड़े टुकड़े कर डालना।
गौरतलब है कि शृगाल: से ही फारसी उर्दू का शगाल बना। फारसी से ये गया तुर्की में जहां इसका रूप हुआ चकाल। इसका अगला पड़ाव बनी अंग्रेजी जहां एक नए रूप जैकाल बन कर यह सामने आया। खास बात यह कि सभी भाषाओं में इसकी शोहरत चालाक-धूर्त प्राणी की है। संस्कृत के बाद प्राकृत में इसका रूप हुआ सिआलो और सियाली। हिन्दी में यह सियार हुआ। सियार पर कई कहवतें भी हैं जिनमें रंगा सियार सबसे प्रसिद्ध है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, October 30, 2007

फ़िराक़ गोरखपुरी साहब के चंद दोहे

नया घाव है प्रेम का जो चमके दिन रात ।
होनहार बिरवान के चिकने चिकने पात।।



जग के आँसू बन गए निज नयनों के नीर ।
अब तो अपनी पीर भी, जैसे पराई पीर।।


कलाकार को चाहिए ,केवल तेरा ध्यान।
कविता का उपहार है , एक मृदुल मुस्कान ।।


निर्धन-निर्बल के लिए ,धन-बल का क्या काम।
निर्धन के धन राम हैं, निर्धन के बल राम ।।


पिया दरस हो जाएगा, सुन मेरे दो बोल।
सर की आंखें बंद कर , मन की आंखें खोल।।





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सोने की चमक और जलन

चन्द्रमा के कई नामों में संस्कृत का ग्लौ भी शामिल है। ग्लौ का अर्थ इसके अलावा कपूर भी है। समझा जा सकता है कि चन्द्रमा के दोनों ही गुण इसमें हैं-चमकीलापन और शीतल होना। जाहिर है इसी वजह से कपूर को भी ग्लौ कहा गया। यह शब्द प्राचीन इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के ghel (गेल या येल) संबंधित है जिसका अर्थ चम, कांति, दमक वगैरह। इसके अलावा कई तरह के रंग और उनकी चमक शामिल है। मसलन गेल से ही बना गोल्ड जिसमें चमकीलेपन के साथ पीला रंग भी प्रमुख है। शरीर के एक हिस्से को पित्ताशय कहते हैं। अंग्रेजी में इसे गौलब्लैडर कहते हैं। यह गौल शब्द जाहिर है इसी गेल से ही बना है। इसी तरह जर्मन भाषा में आग की लपट को ग्लूट कहते हैं। इसमें भी लपट के चमकीलेपन के साथ पीला रंग महत्वपूर्ण है। जर्मन में ही पीले रंग के लिए गल्प शब्द का इस्तेमाल होता है। रूसी भाषा में एक लफ्ज है गारेत जिसका मतलब जलना और चमकना है। पुरानी अंग्रेजी में पीले रंग के लिए geolu शब्द था जिसने आधुनिक अंग्रेजी मे yellow का रूप ले लिया। कुछ भाषा शास्त्री गोल्ड और यलो के पीछे प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की gelwa

जैसी धातु भी देखते हैं जिसके मायने हैं प्रदीप्त होना, जलना, दहकना आदि। गौर करें कि इन सभी शब्दों में पीलेपन का भाव है। संस्कृत की ज्वल धातु से gelwa कर की समानता काबिलेगौर है। इसी से ज्वलन, ज्वाला, प्रज्वलन , जलन जैसे शब्द बने हैं । एक देवी का नाम जालपा भी इसी कड़ी से जुड़ता है। मूलरूप में यह ज्वालप्रभा है। यानी आग में तपकर ही सोना निखरता है वाली बात सौ फीसद सही है। स्वर्ण को अग्नि से ही मिली है पीली चमक । ज्वल् से बने जलन शब्द में ही ईष्या और कुढ़न जैसे भाव भी बाद में शामिल हो गए।

अंग्रेजी के दो अन्य शब्दो ग्लिंप्स और ग्लैड पर पर गौर करें। ग्लिंप्स यानी झलक और ग्लैड यानी खुशी- प्रसन्नता। झलक अपने आप में एक तरह की चमक है और जब कोई खुश होता है तो उसके चेहरे पर चमक भी झलकने लगती है। इसी तरह चमकने या दमकने से जुड़े ग्लेयर, ग्लेज, ग्लीम और ग्लिटर जैसे शब्द भी हैं जो प्राचीन भारतीय- यूरोपीय मूल से ही निकले हैं अंग्रेजी का ग्लास यानी कांच या शीशा शब्द भी इसी से निकला है। यहां भी चमकदार होना ही महत्वपूर्ण है ।

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Monday, October 29, 2007

ख्यात, विख्यात और कुख्यात

शोहरत के अर्थ में हिन्दी में एक शब्द और इस्तेमाल किया जाता है ख्यात् या ख्याति। इसमें उपसर्गों के जुड़ने से विख्यात, प्रख्यात या सुख्यात और कुख्यात जैसे शब्द भी बनते हैं औ ये सब हिन्दी में विख्यात हैं। ख्यात या ख्याति के मूल में है संस्कृत की ख्या धातु जिसमें कहना, घोषणा करना और प्रसिद्ध होना जैसे भाव निहित हैं।

ख्या से ही बने हैं व्याख्या या व्याख्यान जैसे शब्द। व्याख्या का शब्दार्थ हुआ किसी तथ्य का सुविस्तृत भाष्य अथवा टीका । इसके अलावा वृत्तान्त या वर्णन भी इसमें शामिल है। इसी तरह व्याख्यान में भी वृत्तान्त या वर्णन के साथ किसी किसी चीज़ का ज्ञान कराना, समाचार देना, व्याख्या करना आदि है। जाहिर है ये सारे काम जो करता है उसे ही व्याख्याता कहा जाएगा।

हिंदी संस्कृत में पौराणिक कथा के लिए आमतौर पर आख्यान शब्द का प्रयोग होता है जो ख्या से ही निकला है। आख्यान या आख्यायिका ऐसी कहानी होती है जिसमें कहने वाला स्वयं कथा का एक चरित्र होता है।

अब आते हैं उपाख्यान परमराठी समेत हिन्दी की कुछ बोलियों में कहावतों के लिए एक शब्द आमतौर पर प्रचलित है उक्खान जिसे मराठी में इसे उखाणं कहते हैंयह बना है उपाख्यान सेलोक व्यवहार को लेकर कही गई नीतिगत बात ही उक्खान या कहावत बन जाती है जैसे थोथा चना, बाजै घनावे तमाम बातें जो धार्मिक ग्रंथों में आख्यायिका के रूप में मौजूद हैं उन्हीं के रोचक प्रसंग या उक्तियां कहावतों अथवा उक्खानों के रूप में विख्यात हो गए

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Sunday, October 28, 2007

शुक्रिया अरविंदकुमार जी...


साथियों बीते साढे़ तीन महिनों में आपने न जाने कितनी बार अलग-अलग पड़ावों पर शब्दों के सफर की हौसला अफ़जाई की है। इसे शुरू करने से पहले मैं आश्वस्त तो था कि यह एक सार्थक पहल होगी मगर इतने हमसफर भी होगें इसका इल्म न था। इसी कड़ी में आज एक बहुत खास शख्सियत का भी जुड़ना हुआ है। समांतर कोश-हिन्दी थिसारस के सर्जक दंपती अरविंद कुमार-कुसुम कुमार का आशीर्वाद भी शब्दों के सफर को अनायास मिला। श्री अरविंदकुमार इन दिनों हिन्दी ब्लागजगत की प्रवृत्तियों पर गहरी नज़र रखे हुए हैं और इस माध्यम को वे हिन्दी के लिए बहुत शुभ मानकर चल रहे है। मगर जैसा कि हम में से अनेक की चिन्ता है कि क्या हिन्दी ब्लागिंग चाटवाली गली जैसी शोहरत में मुब्तिला होने जा रही है या फिर एक विशुद्ध सूचना माध्यम की गंभीर भूमिका निभाने की तैयारी में है जिसमें पत्रकारिता, साहित्य, संगीत , संदर्भ और इतर विधाओं को अपने भीतर समोने जैसी गहराई भी है । दिलीप मंडल इस संदर्भ में कहते हैं -
''ब्लॉग की सीमाओं को लेकर सोच रहा हूं। लेकिन इस बीच आपकी तरह के कुछ काम दिखते हैं तो उम्मीद बंधती है। सवाल ये है कि क्या टिकाऊ किस्म के काम के लिए ब्लॉग का इस्तेमाल हो सकता है। अगर आप ऐसा कर पा रहे हैं तो बधाई। मुझे अभी इसका रास्ता नहीं मिला है।''

इसी कड़ी में पल्लव बुधकर भी ब्लागिंग को दमदार माध्यम तो मानते हैं पर इसका शानदार तरीके से कैसे उपयोग हो इसे लेकर वे भी ऊहापोह में हैं। मेरी नज़र में इस वक्त करीब बीस-पच्चीस ब्लाग ऐसे हैं जो नियमित हैं और सार्थक हैं। मगर इनमें भी कई ऐसे हैं जो अक्सर उलझ पड़ते हैं। उलझाव से कोई सुलझाव न हो तो उलझना बेकार है। मगर लोग सचमुच गंभीर हैं और फिलहाल तो शुरुआत ही हुई है। अभी तो सचमुच इसका डायरियाना प्रयोग ही चल रहा है। रेसिपी से लेकर दर्शन तक सब कुछ एक साथइसमें भी कुछ बुराई नहीं।

इन सबके बीच अरविंदकुमार जैसे लोग अगर ब्लागिंग में दाखिल होते हैं और उसे परखते हैं तो यह शुभ संकेत है। अरविंदकुमार आजकल केद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, की हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना के प्रधान संपादक हैं।

अपने ब्लाग पर अरविंदजी की जो प्रतिक्रिया मुझे मिली है वह संक्षिप्त रूप में यूं है-

मैं ने पहली बार आप का ब्लाग पढ़ा--पशु और फ़ीस वाला। बघाई!अब इसे फ़ेवरिट की सूची में डाल लिया है। लगातार ज़ारी रखें.. मैनें अपना ब्लाग भी शुरू किया है --अरविंद कोशनामा। आप चाहें तो उस से अपना ब्लाग सहर्ष लिंक कर सकते हैं'
अरविंदकुमार जब माधुरी के संपादक थे तब मैं स्कूल का विद्यार्थी था। शानदार माधुरी की कई छवियां मन में हैं। सर्वोत्तम रीडर्स डाईजेस्ट पर भी अरविंदजी की छाप पड़ी। इन दोनों पत्रिकाओं के अंक पाठकों के पास सुरक्षित हैं।

व्यक्तिशः मैं अरविंदकुमार जी की प्रतिक्रिया पा कर बहुत खुश हूं , अभिभूत भी हूं। आज के दौर के सबसे बड़े कोशकार ने बिन मांगे मुझे वो दे दिया है जो मैं चाहता भी था। हौसला , प्रोत्साहन......

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भेड़ जो बन गई ऊन

प्राचीनकाल से ही मनुश्य ने मौसम की मार से शरीर को बचाने के लिए पहले पेड़ों की छाल को जरिया बनाया। सदियों तक यह सिलसिला चला। बाद में पशुओं के साथ सह-जीवन के दौरान उसे मृत जीवों की खाल को पहनने का विचार आया।
भारतीय भाषाओं का आमफहम शब्द ऊन बना है संस्कृत के ऊर्ण से जिसका अर्थ भी ऊन ही है। संस्कृत में इसके अलावा उरा (भेड़), उरण (भेड़),ऊर्ण (ऊन) ऊर्णायु (ऊनी या भेड़) और ऊर्णु (ढकना ,छिपाना ) तथा ऊर्णम् ( नर्म, ऊन) वगैरह। इन तमाम शब्दो का अर्थ है ढांकना या छिपा कर रखना। एक भेड़ जिस तरह अपने ही बालों से ढकी-छुपी रहती है , उसी तरह अपने शरीर को छुपाना या ढकना। जाहिर सी बात है लाक्षणिक आधार पर शब्दों का निर्माण करनेवाले समाज ने ये तमाम शब्द बनाए होंगे। बाद में भेड़ के अर्थ में उरा या उरण जैसे शब्द सामने आए। गौर करें कि संस्कृत की वस् धातु से बने वास, निवास, या आवास जैसे शब्दों के साथ ही वस्त्र जैसा शब्द भी बना। इसमें भी लक्षण ही प्रधान है अर्थात शरीर जिसमें वास करे वही है वस्त्र । फिलहाल बात ऊन की हो रही है। फारसी में भी इससे मिलता-जुलता शब्द है ऊस जिसका अर्थ है बकरी की एक जाति। निश्चित ही भेड़ के रोंएदार नर्म बालों से ढके शरीर को देखकर ही मनुश्य ने पहले उसकी खाल को धारण किया होगा बाद में सिर्फ उसके बालों का वस्त्र की तरह उपयोग करने का विचार आया होगा।
खास बात यह भी है कि न सिर्फ संस्कृत बल्कि द्रविड़ भाषाओं में भी ढाकना, छुपाना जैसे अर्थ वाले कई शब्द मिल जाएंगे। मिसाल के तौर पर तलवार म्यान में छुपी रहती है इसलिए तमिल में म्यान के लिए उरई शब्द मिलता है। तमिल का ही आळी (छुपना) , आळियल (खाल) जैसे शब्द यही जाहिर करते हैं। इसके अलावा ग्रीक के अरेप्सो जैसा शब्द भी है जिसका मतलब है ढांकना या छत डालना। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, October 27, 2007

रकम यानी लोहा भी , सोना भी

हिन्दी-उर्दू में बड़ी धनराशि के लिए रकम शब्द का प्रयोग किया जाता है। आमतौर पर नकद या सोना-चांदी के अर्थ में इस लफ्ज का इस्तेमाल ज्यादा होता है। हिन्दी का एक मुहावरा है-रकम खड़ी करना जिसके मायने हैं माल का बिकना या नकदी प्राप्त होना वगैरह।
रकम यूं तो अरबी ज़बान का लफ्ज है और फारसी-उर्दू के ज़रिये हिन्दी में दाखिल हुआ मगर इस शब्द का मूल उद्गम संस्कृत है। संस्कृत का एक शब्द है रुक्म जिसका अर्थ है चमकदार , उज्जवल। इससे बने रुक्म: का मतलब होता है सोने के आभूषण या जेवर । इसी तरह रुक्मम् का मतलब होता है सोना या लोहा। श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी और उसके भाई रुक्मिन् का नामकरण भी इसी रुक्म से हुआ है।
यही रुक्म अरबी भाषा में रकम के रूप में नज़र आता है। यहा इसके मायने हैं रुपया-पैसा, धन-दौलत, माल आदि। रकम का एक अन्य अर्थ भी है अंक, लिखना और मदद आदि। इससे बने रकमी शब्द का मतलब होता है कीमती चीज़ या लिखा हुआ कागज। गौरतलब है कि पुराने ज़माने में दस्तावेज़ों की एक किस्म होती थी रकमी दस्तावेज़ अर्थात अंकित प्रपत्र। जाहिर है कि यहां रकमी से मतलब मौद्रिक लेन-देन संबंधी कागजात से ही है मसलन हुंडी, प्रोनोट वगैरह । ये कागजात भी तो धन यानी रकम ही हुए न ? रकम के लिखने संबंधी अर्थ से जुड़ता हुआ हिन्दी – उर्दू का एक और शब्द है रुक्का। यह भी अरबी भाषा का है और इसका सही रूप है रुक़अ: यानी काग़ज की पर्ची, चिट्ठी-पत्री आदि। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, October 25, 2007

टैंट में सुरीली तान और बाहर तुनुकमिज़ाज

संगीत की तान का अंग्रेजी के टैंट यानी तंबू या या शामियाने से क्या संबंध है ? बेशक एक संबंध तो है। संगीत की बड़ी बड़ी महफिलें शामियानों (टैंट) में सजती हैं और फनकार अपनी तानों से समां बाध देते हैं। मगर इन दोनों शब्दों का रिश्ता है खिंचाव से। सुरों और टैंट दोनों को खींचने से ही बात बनती है। इन दोनों ही शब्दों में करीबी रिश्ता है । भारोपीय भाषा परिवार की ten धातु से ही दोनों शब्द जन्में हैं। संस्कृत की तन् धातु का मतलब है खींचना, तानना, विस्तार करना। गौर करें कि धातु को ठोक-पीट कर , विस्तार कर उसके तार बनाए जाते हैं। तार की खासियत होती है उसका लम्बा, पतला होना। यही तन् है। यानी जिसे खींचकर, विस्तारित कर पतला बना दिया जाए। सात सुरों का जो सप्तक होता है उसमें सबसे ऊंचे सप्तक को तार-सप्तक इसीलिए कहते हैं। संगीत में वे स्वर जिन्हें उच्च आवृति पर गाया जाता है तान कहलाते है। पाश्चात्य संगीत में भी उच्च स्वर को tenor कहा जाता है। संगीत सम्राट तानसेन के नाम का आधार तान ही है। इस खिंचाव या तनाव में निहित पतलेपन या सूक्ष्मता पर अगर ध्यान दें तो मालूम होगा कि पतली, तनी हुई चीज़ में नज़ाकत का गुण भी आ ही जाता है। फारसी का एक शब्द है तुनुक। यह तन् से ही बना है जिसका मतलब है नज़ाकत, सूक्ष्म , छोटा वगैरह। इससे बना है तुनुकमिज़ाज जिसका मतलब हुआ, बात बात में तन जानेवाला, चिड़चिड़ा आदि

अब बात tent की । दरअसल ये अंग्रेजी में भी आया फ्रेंच शब्द tente से। फ्रेंच में भी तेरहवीं सदी के आसपास ये आया चलताऊ लैटिन के tendencia से जिसका अर्थ होता है फैलाना या तानना। और लैटिन के चलताऊ यानी देसी रूप ने इसे ग्रहण किया है प्रोटो इंडो यूरोपीय मूल के शबद ten से जिसका मतलब भी किसी चीज को फैलाना, तानना या बिछाना ही था। यही ten संस्कृत में भी सदियों पहले तन् के रूप में अपनी जड़ें जमा चुका था। लैटिन में tenta , tentus आदि कई रूप लेते हुए करीब दो सदी पहले किसी खास ढांचे या फ्रेम पर मोटे कपड़े या चमडे को चढ़ाने या फैलाने की की क्रिया के रूप में इस शब्द चलन शुरू हुआ।

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तनाव के मारे टैंशन हो गया ...

बोलचाल की हिन्दी में सर्वाधिक इस्तेमाल शुदा शब्दों में तनाव शब्द का भी शुमार है। राजनीतिक तनाव, जातीय तनाव,

वैचारिक तनाव, मानसिक तनाव न जाने कितने तनाव। यही नहीं इसके पर्याय रूप में अंग्रेजी के टैंशन शब्द का प्रयोग भी हिन्दी जितनी ही सुविधा के साथ पढ़ेलिखे और अनपढ़ दोनों ही कर लेते हैं। माहौल में खिंचाव को हिन्दी में तनाव कहा जाता है। अंग्रेजी में यही टैंशन है। ये दोनों लफ्ज न सिर्फ एक दूसरे के भाषायी विकल्प है बल्कि एक ही उद्गम से निकले भी हैं। प्रोटो इंडो यूरोपीय मूल के TEN से इनकी उत्पत्ति मानी गई है। संस्कृत में एक धातु है तन् जो इसी कड़ी की है।
संस्कृत शब्द तन् या प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार के TEN का मतलब होता है खींचना, फैलाना, विस्तारित करना या तानना। किसी चीज़ को ओढ़ना या बिछाना। सृजन करना, उत्पन्न करना जैसे अर्थ भी इसमें समाहित हैं। तन् से हिन्दी में भी कई शब्द बने हैं मसलन तन यानी शरीर, तनु यानी सुकुमार , नाजुक, तान यानी स्वरों का उतार चढ़ाव या खिंचाव । भाव-भंगिमा के संदर्भ में भी तनना का प्रयोग होता है। तनातनी भी इससे ही बनी है।
गौर करें कि तन यानी शरीर का खासियत क्या है जाहिर है एक अवस्था तक यह बढ़ता है, फैलता है। इसीलिए यह तन है। शरीर, विस्तार या फैलाव के अर्थ में तनय, तनुल, जैसे शब्द भी है। कालावधि के लिए टैन्योर शब्द भी इसी कड़ी का है।
रेशम या कपास के रेशे के लिए तन्तु शब्द भी इसी लिए बना है क्यों कि इसमें भी फैलाने या तानने का भाव है। जुलाहों को करघे पर काम करते हुए जिन्होंने देखा है वे तानाबाना शब्द के खींचने,
फैलाने जैसे संदर्भों को आसानी से समझ सकते हैं। गौर करें कि यही तन्तु फारसी में तार में भी मौजूद है और सितार के तार में भी। तन्तु को हिन्दी की देसी बोलियों में कह-कहीं ताँत भी कहा जाता है। हिन्दी में तन्तु का लोकप्रिय पर्याय है धागा। कहीं कहीं इसे तागा भी कहा जाता है। दरअसल धागा शब्द तागा का बिगड़ा हुआ रूप है। तन्तु से तागा बनने का सफर दिलचस्प है और इसमें सुई का बड़ा योगदान है। गौर करें कि सुई में पिरोने से पहले धागे के अग्र भाग को ही छेद में डाला जाता है। तागा शब्द इसी आधार पर बना है तन्तु+अग्र के मेल से पहले यह ताग्गअ हुआ , फिर तागा और अगले क्रम में धागा बन गया। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, October 24, 2007

मेघ और मड की रिश्तेदारी


हिन्दी और संस्कृत में बादल के अर्थ में बोला जाने वाला मेघ शब्द का अंग्रेजी के मड यानी कीचड़ शब्द से गहरी रिश्तेदारी है। दरअसल ये दोनों ही शब्द इंडो-यूरोपीय मूल के हैं। संस्कृत में मेघ शब्द की उत्पत्ति मः या धातु से हुई है जिसका अर्थ है नमी या जल। अंग्रेजी के मड शब्द की उत्पत्ति इंडो-यूरोपीय शब्द meu-mu है जिसका मतलब भी नमी, गीलापन या गंदगी ही होता है। जहां तक गंदगी के भाव का सवाल है संस्कृत की मः धातु से ही कुछ अन्य शब्द भी बने हैं जैसे मीढ, मेहनम् और मूत्रम् आदि। ये सभी गंदगी या नमी का बोध कराते हैं। फारसी के प्राचीन रूप अवेस्ता में भी एक शब्द है मुथ्र जो गंदगी विष्ठा के अर्थ समेटे है।

मः मे समाए नमी अथवा जल के भाव वाले कुछ और शब्द भी हिन्दी संस्कृत के अलावा अन्य इंडो-यूरोपीय भाषाओं में हैं जैसे मेह यानी बादल, मही यानि जलराशि, मिहिका यानी हिम या पाला ,लैटिन का मिडोस यानि नमी या आर्द्रता और इसके अलावा ओल्ड जर्मेनिक का मड जिससे अंग्रेजी का मड , मडल या मडी जैसे शब्द बने। पुराणों में इन्द्र को वर्षा का देवता कहा गया है। वर्षा मेघों से होती है इसीलिए संस्कृत में इन्द्र का एक नाम मघवन या मघन भी है।

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Tuesday, October 23, 2007

अम्मा में समाई दुनिया...

हिन्दी का माता शब्द इंड़ो-यूरोपीय भाषा परिवार के सबसे पुराने शब्दों में एक है। इस शब्द की छाप आज भी इस कुनबे की ज्यादातर भाषाओं पर देखी जा सकती है। इसी वजह से संस्कृत का मातृ , जेंद अवेस्ता में मातर, फारसी-उर्दू में मादर, ग्रीक में meter , लैटिन mater यूनानी में जर्मन में muotar स्लाव में mati, डच में moeder और अंग्रेजी में मदर जैसे संबोधनसूचक शब्द देखने को मिलते हैं। विद्वान इस शब्द की उत्पत्ति अलग अलग ढंग से बताते हैं। संस्कृत में इसके जन्म के पीछे निर्माणसूचक ‘मा’ धातु मानी जाती है यानि जो निर्माण करे वह माँ। कुछ इसे मान् धातु से निकला शब्द मानते हैं अर्थात् जिसका मान-सम्मान व पूजा की जाए वह माता। मगर कई भाषाविज्ञानी उत्पत्तियों के इन आधारों को कपोलकल्पना मानते हैं और इसे ‘म’ वर्ण से निकला हुआ नर्सरी शब्द मानते हैं जो ध्वनि-अनुकरण प्रभाव के चलते एक ही आधार से उठकर भारतीय –यूरोपीय भाषा परिवार में फैलता चला गया। गौर करें कि शिशु जिन मूल ध्वनियों को अनायास निकालता है उनमें सर्वाधिक ‘म’ वर्ण वाली ही होती हैं यथा अम् , मम् , हुम्म् आदि।

हिन्दी सहित कई भारतीय भाषाओं में मां के लिए अम्मा सहित इससे मिलते जुलते शब्द चलते है जैसे मराठी में आई, माई, माय, कन्नड़ में अम्ब जैसे शब्द दरअसल संस्कृत के अम्बा से निकले हैं जिसका अर्थ माँ है। भाषा विज्ञानियों के मुताबिक मुस्लिम समाज में बोला जाने वाला अम्मी शब्द भी इससे ही निकला है और अंग्रेजी के मॉम या मम्मी के पीछे भी यही आधार है। अम्बा शब्द का मूलआधार संस्कृत धातु अम्ब् है। अम्बिका, अम्बालिका आदि शब्द भी इससे ही बने हैं जिनका अर्थ भी माता या देवी है। पार्वती को भी अम्बिका कहते हैं। गणेश का एक नाम आम्बिकेयः भी अम्बिकापुत्र होने के अर्थ में ही पड़ा। अम्ब् से ही बने अम्बः शब्द के मायने होते है पिता, आँख, जल आदि। गौर करें त्र्यंबक या त्र्यंबकेश्वर पर । यहां इस शब्द का त्रिनेत्र वाला भाव साफ समझ में आ रहा है अर्थात शिव। इस तरह देखें तो शिव,पार्वती और गणेश में अम्ब् की महिमा समायी हुई है।
एक और मज़ेदार बात बताएं। अम्बः का एक अर्थ स्वीकृतिबोधक ध्वनि भी होता है। जैसे ‘हूँ’ ‘हाँ’ आदि। कहने की ज़रूरत नहीं कि हूँ-हाँ में यही अम्बः झांक रहा है। राजस्थान-हरियाणा में पसरे मेवात क्षेत्र में चले जाइये वहां के ग्रामीणों के मुँह से आपको स्वीकृतिसूचक ‘हम्बै’ की हुंकार अक्सर सुनने को मिलेगी। मैं इसे सुन चुका हूँ। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, October 22, 2007

रिश्ते-नाते और परिवार

रिवार शब्द के मायने है कुटुम्ब, जाति-समूह, आश्रितजन वगैरह। हिन्दी का यह शब्द मूलतः संस्कृत की दो धातुओं - परि+वृ से मिलकर बना है। दरअसल परि संस्कृत-हिन्दी का बहुत लोकप्रिय उपसर्ग है जिसके मायने होते हैं आसपास, चारों ओर , इर्द-गिर्द आदि। इसी तरह वृ धातु का अर्थ हुआ घेरना, लपेटना या जिसे चुना जाए। वाशि आप्टे के कोष में कहा गया है - परिव्रियते अनेन यानी जिसमें व्यक्ति को घेरा जाए वह परिवार है। जाहिर है परिवार नाम का समूह संबंधों का समुच्चय है जिसके मूल में स्त्री-पुरूष हैं। स्त्री-पुरूष संबंध से ही परिवार का निर्माण हुआ और अन्य संबंधों या रिश्तों का जन्म हुआ। यह आश्चर्यजनक है कि विभिन्न संस्कृतियों-समाजों में पारिवारिक शब्दावली में गजब की समानता है।माता-पिता और भाई-बहन के रिश्ते को प्रकट करने वाले शब्द इंडो-यूरोपीय भाषाओं जैसे हिन्दी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रैंच आदि में मिलते-जुलते है। कई समूदायों में रिश्ते तो हैं मगर उनके लिए अलग से शब्दों का अभाव है जैसे हिन्दी में चाचा या मामा जैसे शब्द मिलते हैं मगर अंग्रेजी में यहां दोनों रिश्ते अंकल ही कहे जाते हैं फर्क यही कि एक जगह मैटरनल शब्द जोड़ लिया जाता है। आज जो शब्द हम सुबह से शाम तक सुनते रहते हैं जैसे मां , मम्मी-डैडी, अम्मा, माता-पिता, मादर, मदर-फादर आदि सभी शब्द चाहे अलग-अलग भाषाओं के हों,मगर इनका उद्गम एक ही है और उच्चारण की समानता भी काबिले-गौर है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, October 21, 2007

रावण तो हर दौर में रुलाएगा ही..


रावण
शब्द का कलरव से क्या रिश्ता हो सकता है ? कलरव बहुत सुंदर शब्द है जिसका मतलब है मधुर आवाज़। चिड़ियों का चहचहाना। पक्षियों की कूजनध्वनि । कल यानी चिड़िया और रव यानी ध्वनि, आवाज़। रव बना है संस्कृत की ‘रु’ धातु से जिसके मायने हैं शब्द करना, आवाज़ करना । खास बात यह कि इसमें सभी प्रकार की ध्वनियां शामिल हैं। मधुर भी, तेज़ भी, कर्कश भी और भयावनी भी। और अगर कहीं कोई ध्वनि नहीं है तो इसी रव में ‘नि’ उपसर्ग लगाने से सन्नाटे का भाव भी आ जाता है। यही नहीं, विलाप करते समय जो ध्वनि होती है उसके लिए भी यही ‘रु’ धातु में निहित भाव समाहित हैं। हिन्दी में रोना शब्द ही आमतौर पर विलाप के अर्थ में इस्तेमाल होता है। रोना बना है संस्कृत के रुदन, रुदनम् से जिसका मतलब है क्रंदन करना, शोक मनाना , आँसू बहाना आदि। रुँआसा शब्द इसी कड़ी से जन्मा है।
‘रु’ में शोर मचाना, चिंघाड़ना, दहाड़ना आदि भी शामिल है। इससे ही बना है संस्कृत शब्द रावः जिसका मतलब है भयानक ध्वनि करना। चीत्कार करना। चीखना-चिल्लाना। हू-हू-हू जैसी भयकारी आवाज़ें निकालना आदि। रावः से ही बना है रावण जिसका अर्थ हुआ भयानक आवाजें करने वाला, चीखने-चिल्लाने वाला, दहाड़ने वाला। ज़ाहिर है यह सब संस्कारी मानव के सामान्य क्रियाकलापों में नहीं आता। किसी मनुश्य का अगर
ऐसा स्वभाव होता है तो उसे हम या तो पशुवत् कहते हैं या राक्षस की उपमा देते हैं। ज़ाहिर है कि रावण तो जन्मा ही राक्षस कुल में था इसलिए रावण नाम सार्थक है।
एक दिलचस्प संयोग भी है। रावण को रुद्र यानी शिव का भक्त बताया जाता है और रुद्र की कृपादृष्टि के लिए रावण द्वारा घनघोर तपस्या करने का भी उल्लेख है। रुद्र यानी एक विशेष देवसमूह जिनकी संख्या ग्यारह है। भगवान शिव को इन रुद्रों का मुखिया होने से रुद्र कहा जाता है। रुद्र भी बना है रुद् धातु से जिसका मतलब भयानक ध्वनि करना भी है। इससे रुद्र ने भयानक, भयंकर, भीषण, डरावना वाले भाव ग्रहण किए । यानी रावण और रुद्र दोनों शब्दों का मूल और भाव एक ही हैं। भयानक – भीषण जैसे भावों को साकार करने वाला रौद्र शब्द इसी रुद्र से बना है। रावण ने रुद्र की तपस्या कर किन्ही शक्तियों के साथ रौद्र भाव भी अनायास ही पा लिया। कथाओं में रावण की विद्वत्ता की बहुत बातें कही गई हैं । बताया जाता है कि कृष्णयजुर्वेद रावण द्वारा रचित वेदों पर टिप्पणियों का ग्रंथ है। इसमें इंद्र के स्थान पर रावण ने अपने आराध्य रुद्र की महिमा गाई है। इस ग्रंथ की सामग्री बाद में यजुर्वेद से जुड़ गई जिन्हें शतरुद्री संहिता कहा गया और तभी से रुद्र के साथ शिव नाम भी प्रचलित हुआ। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, October 20, 2007

मसखरे की मसखरी सिर-माथे !

आमतौर पर हंसोड़ और परिहासप्रिय व्यक्ति को समाज में पसंद किया जाता है। ये लोग चूंकि सामान्यत: हर बात में हंसी-ठट्ठे का मौका तलाश लेते हैं इसलिए ऐसे लोगों को अक्सर विदूषक या मसखरा की उपाधि भी मिल जाती है। हालांकि ये दोनों ही शब्द कलाजगत से संबंधित हैं और नाटक आदि में ठिठोलीबाजी और अनोखी वेषभूषा, बातचीत, हावभाव,मुखमुद्रा आदि से परिहास उत्पन्न कर दर्शकों के उल्लास में वृद्धि करनेवाले कलाकार को ही मसखरा या विदूषक कहा जाता है।
हिन्दी में मसखरा शब्द अरबी के मस्खर: से बरास्ता फारसी उर्दू होते हुए आया। में अरबी में भी मस्खर: शब्द का निर्माण मूल अरबी लफ्ज मस्ख से हुआ जिसका मतलब है एक किस्म की खराबी जिससे अच्छी भली सूरत का बिगड़ जाना या विकृत हो जाना। यह तो हुई मूल अर्थ की बात । मगर यदि इससे बने मसखरा शब्द की शख्सियत पर जाएं तो अजीबोगरीब अंदाज में रंगों से पुते चेहरे और निराले नैन नक्शों वाले विदूषक की याद
आ जाती है। हिन्दी के मसखरा शब्द का अरबी रूप है मस्खरः
जिसके मायने हैं हँसोड़, हँसी-ठट्ठे वाला, भांड, विदूषक या नक्काल वगैरह। जाहिर है लोगों को हंसाने के लिए मसखरा अपनी अच्छी-भली शक्ल को बिगाड़ लेता है। मस्ख का यही मतलब मसखरा शब्द को नया अर्थ देता है।
इसी नए अर्थ के साथ अरब के सौदागरों के साथ यह शब्द स्पेन और इटली में मैस्खेरा बन कर पहुंचता है जहां इसका मतलब हो जाता है मुखौटा या नकाब। अरब से ही यह यूरोप की दीगर जबानों में भी शामिल हो गया और इटालियन में मैस्ख और लैटिन में मैस्का बना । फ्रैंच में मास्करैर कहलाया जहां इसका मतलब था चेहरे को काला रंगना। अंग्रेजी में इसका रूप हुआ मास्क यानी मुखौटा। मध्यकाल में मसखरा शब्द ने मेकअप और कास्मैटिक की दुनिया में प्रवेश पाया और इसका रूपांतर मस्कारा में हो गया जिसके तहत मेकअप करते समय महिलाएं काले रंग के आईलाईनर से अपनी भौहों और पलकों को नुकीला और गहरा बनाती हैं।
हालांकि सेमेटिक भाषा परिवार की होने के बावजूद अरबी ज़बान में मस्ख की मौजूदगी मूलभूत नहीं जान पड़ती। संस्कृत में एक धातु है मस् जिसका मतलब है रूप पदलना, पैमाइश करना। इससे बना है मसनम् जिसका मतलब है एक प्रकार की बूटी (चेहरे पर लेपन के लिए ?)। हिन्दी-संस्कृत के मस्तक या मस्तकः या मस्तम् ( सिर, खोपड़ी ) शब्द के मूल में भी यही मस् धातु है। गौर करें कि मस्ख से बने मास्क को मस्तक पर ही लगाया जाता है। मस्तिष्क यानी दिमाग़ का मस्तक से क्या रिश्ता है बताने की ज़रूरत नहीं,ज़ाहिर है इसके मूल में भी यही धातु है। माथा, मत्था जैसे देशज शब्द भी इसी की उपज हैं।
आवारगी, बेचारगी, दीवानगी की तर्ज पर मस्खरः में ‘अगी’ प्रत्यय लगने से अरब,फारसी में बनता है मस्खरगी यानी मस्खरापन या ठिठोलेबाजी। मगर इसके विपरीत इसमें ‘शुदा’ प्रत्यय लगने से बन जाता है विकृत, रूपांतरित आदि। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, October 19, 2007

कृपया मगरमच्छ न खाएं ....

मांसाहार के विरोध में दुनियाभर में अब काफी जागरुकता आ गई है। आदिमकाल से
लगातार कुछ न कुछ सीखते आ रहे मनुश्य के सचमुच संस्कारित होने का वह पहला क्षण रहा होगा जब उसके मन में मांसाहार के विरुद्ध भाव आए होंगे। बहरहाल ये शब्द मैं मांसाहार पर प्रवचन देने के लिए नहीं लिख रहा हूं और न ही मैं मांसाहार निषेध जैसी किसी मुहिम से जुड़ा हूं अलबत्ता सौ फीसद शाकाहारी ज़रूर हूं। दरअसल, मांसाहार का विरोध और समर्थन प्राचीनकाल से ही लोकप्रिय विवाद रहे हैं । शास्त्रों पुराणों मे भी इसके बारे में काफी कुछ लिखा गया है। मूलतः ज्यादातर हिन्दू ग्रंथों में मांसाहार को ग़लत ही ठहराया गया है मगर मांसाहार एकदम वर्जित भी नहीं है। अगर मांसाहार करना हो तो कब करें, और क्या भक्ष्य है इसका भी उसमें उल्लेख है। डा पांडुरंग वामन काणे लिखित भारतीय धर्मशास्त्र का इतिहास पुस्तक में इसी बारे में कुछ दिलचस्प जानकारियां पढ़ीं। लेखक ने आपस्तंबसूत्र,वसिष्टधर्मसूत्र,विष्णुधर्मसूत्र आदि का हवाला देते हुए बताया है कि किन पक्षियों का मांस खाना चाहिये और किन का नहीं इसकी लंबी लंबी सूचियां इन ग्रंथों में हैं। इनमें बताया गया है कि कच्चा मांस खाने वाले पक्षियों (गिद्ध, चील) के अलावा चातक, तोता, हंस, कबूतर, बक या बिलों को खोदकर अपना भोजन ढूंढने वाले पक्षियों का मांस भक्षण वर्जित है। घोड़ा, बैल, बकरा , भेड़ आदि की बलि भी हो सकती है और वे भक्ष्य भी है। जंगली मुर्ग एवं तीतर को भोज्य माना गया है। गौरमृग, ऊँट आदि की न तो बलि हो सकती है और न ही वे खाए जा सकते हैं।
इसी तरह मछली के बारे में भी साफ निर्देश हैं। मकर प्रजाति के मत्स्य (मगरमच्छ या घड़ियाल) के भक्षण के लिए इन ग्रंथों में मनाही है। इसके अलावा सर्प जैसे सिर वाली मीन, शवों को खानेवाली मछली अथवा विचित्राकृति वाली मछली नहीं खानी चाहिए। मनुस्मृति में मछली भक्षण को मांसभक्षण में निकृष्टतम् माना है। इसके बावजूद आनुष्ठानिक कार्यों के निमित्तार्थ पाठीन, रोहित, राजीव के अलावा सिंह की मुखाकृति वाली और शल्क वाली मछलियों को खाने की छूट दी गई है।
इन तमाम निर्देशों के बावजूद मांसाहार के लिए जीवहत्या धर्मशास्त्रों में निकृष्ट कर्म और पाप माना गया है। यह तक कहा गया है कि पशु के शरीर में जितने रोम होते हैं , पशुहंता उतने ही जन्मों तक स्वयं मारा जाता है। अब पुनर्जन्म में यकीन रखने वाले हिन्दूसमाज को अगर इस बात का ज़रा भी भय होता तो भारत भूमि से पशुहत्या बंद हो जाती। मगर बोटियां चबाते हुए
मनुश्य रसना के माध्यम से सिर्फ उदरचिंतन कर रहा होता है ठीक वैसे ही जैसे कफ़न के घीसू-माधव करते हैं। पुनर्जन्म और फिर फिर मरण जैसे चिंतन से ज़ायका बिगड़ता है। बोटी जिंदाबाद... अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

बा-हुनर बेटे शैख़जी के


संजीदा शाइरी से शुरुआत कर व्यंग्य काव्य में अपनी अलग
पहचान रखने वाले अकबर इलाहाबादी के कुछ अशआर पेश हैं। ध्यान रहे
कि ये बातें उन्होनें तब लिखी थीं जब अंग्रेजी राज था और
हिन्दू मुस्लिम रिश्ते उतने ही पेचीदा और संवेदनशील थे जितने
आज भी हैं।





लड़ें क्यूं हिन्दुओं से हम, यहीं के अन्न पे पनपे हैं
हमारी भी दुआ ये है कि गंगाजी की बढ़ती हो


ज़र्रे ज़र्रे से लगावट की ज़रूरत है यहां
आफ़ियत चाहे तो इनसान ज़मींदार न हो
मय भी होटल में पियो, चंदा भी दो मस्जि़द में
शैख़ भी ख़ुश रहें, शैतान भी बेज़ार न हो


शैख़जी के दोनों बेटे बा-हुनर पैदा हुए
एक हैं ख़ुफिया पुलिस में , एक फांसी पा गए

आफ़ियत-भलाई अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, October 18, 2007

अंगुली में अंगूठी, एक मुश्त मुक्का..

अंगूठी एक ऐसा गहना है जो महिलाओं और पुरूषों में समान रूप से प्रचलित है और सभी पारंपरिक गहनों में सर्वाधिक प्रयोग में आने वाला आभूषण है। अंगूठी शब्द भले ही हिन्दी का हो मगर आया यह फारसी से है। फारसी में अंगूठी को अंगुश्तरी कहते हैं और इसी ने संकुचित होकर हिन्दी में अंगूठी का रूप लिया। गौरतलब है कि फारसी के अंगुश्तरी लफ्ज के पीछे संस्कृत का अङ्ग शब्द छुपा हुआ है। संस्कृत के इसी अङ्ग को हिन्दी में अंग लिखा जाता है जिसका अर्थ है शरीर, देह या अवयव। अंग माने किसी संपूर्ण वस्तु का खंड, प्रभाग या अंश। जैसे शेषांग, चतुरंग, नवरंग या अष्टांग आदि। पुराणकालीन एक जनपद, प्रदेश जिसे वर्तमान में बिहार के भागलपुर मंडल के आसपास समझा जा सकता है। इसी प्रदेश का अधिपति था महाभारत का प्रसिद्ध पात्र कर्ण जिसे अंगराज इसी कारण कहा जाता था।
देह के एक अवयव के रूप में ही अङ्ग (या अंगु) शब्द बना जिसका मतलब हुआ हाथ । हाथ के उपांग के रूप में अङ्गुरी: शब्द सामने आया जिसके संस्कृत में अङ्गुल:, अङ्गुलि:, अङ्गुली: ,अङ्गुलिका जैसे रूप भी बने। हिन्दी में भी इसके अंगुलि, अंगुली या उंगली जैसे रूप प्रचलित हैं।

इंसी तरह संस्कृत के अङ्गुष्ठ: शब्द से अंगूठा शब्द बना। यही अङ्गुष्ठ जब फारसी में पहुंचा तो बना अंगुश्त अर्थात अंगुलि या उंगली। संस्कृत-हिन्दी में अंगुलियों के बड़े ही खूबसूरत नाम भी हैं-अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा। गौरतलब है कि संस्कृत का अङ्गुरी: वाला रूप ही फारसी में पहुंच कर अंगुश्तरी के रूप में ढल गया और हिन्दी में अंगूठी बना। मज़ेदार बात यह कि ‘उ’ की मात्रा में सिर्फ ह्रस्व और दीर्घ के फर्क के साथ हिन्दी में अंगूठी अंगुली में पहना जाने वाला गहना है और अंगुठी अंगूठे में पहना जाने वाला। श्रीमंतों की अंगूठी ही उनकी पहचान थी जो मुद्रिका बन कर हुक्मनामों पर मोहर की तरह छपती रही। उधर अनपढों के लिए अंगूठी की जगह उनका अंगूठा ही पहचान बन गया और वे अंगूठाछाप कहलाने लगे।

हथेली की सारी अंगुलियां जब मोड़ ली जाती हैं तो घूंसा बनता है जिसे मुक्का भी कहते हैं। संस्कृत में यही मुक्का मुष्टि: है अर्थात अंगुलियों की विशिष्ट स्थिति। इसी से बना मुष्टिका और फिर हिन्दी में मुट्ठी । फारसी में यही मुष्टि बन गई मुश्त जिसका मतलब भी मुट्ठी , घूंसा , या एक साथ कई चीजें। इसी से बना एकमुश्त शब्द जो एकसाथ के भाव के साथ हिन्दी में भी प्रयोग किया जाता है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, October 17, 2007

तिलोत्तमा यानी दुनिया की पहली मिस यूनिवर्स !

तिल पर पिछली चर्चा के सिलसिले में इस उद्गम से जन्में एक और शब्द का पता चला। तिलोत्तमा नाम की एक अप्सरा का पुराणों में उल्लेख है। इसके बारे में अलग-अलग संदर्भ हैं। कहा जाता है कि इसकी रचना के लिए ब्रह्मा ने तिल-तिल भर संसार भर की सुंदरता को इसमें समाहित किया था इसीलिए इसका नाम तिलोत्तमा पड़ा।

एक कथा के अनुसार हिरण्यकशिपु के कुल में निकुंभ नाम का प्रतापी दैत्य हुआ। उसके दो पुत्र थे सुंद और उपसंद। दोनों एक शरीर दो आत्मा की तरह थे और परस्पर अतुल स्नेह भी रखते थे। उन्होंने त्रिलोक पर राज करने की कामना से विन्ध्याचल पर्वत पर घोर तपस्या की । उनके तप तेज से देवता घबरा गए और हमेशा की तरह ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा स्वयं दोनो भाइयों के सामने गए और उनसे वर मांगने को कहा। दोनों ने अमरत्व मांगा। ब्रह्मा ने साफ इन्कार कर दिया। तब दोनों ने कहा कि उन्हें यह वरदान मिले कि एक दूसरे को छोड़कर त्रिलोक में उन्हें किसी से मृत्यु का भय न हो। ब्रह्मा ने कहा – तथास्तु। जैसा कि होना ही था, सुंद-उपसुंद लगे उत्पात करने जिसे देवताओं ने अत्याचार की श्रेणी में गिना और फिर ब्रह्मा के दरबार में गुहार लगा दी। अब तो दोनो की मौत तय थी, बस उपाय भर खोजा जाना बाकी था। ब्रह्माजी को उनके वरदान की याद दिलाई गई। ब्रह्माजी ने फौरन विश्वकर्मा को तलब किया और एक दिव्य सुंदरी की रचना का आदेश दिया। बस, विश्वकर्मा ने त्रिलोक भर की तिल-तिल भर सुंदरता लेकर एक अवर्णनीय सौंदर्य प्रतिमा साकार कर दी। ब्रह्माजी ने उसमें प्राण फूंक दिये। यह सुंदरी तीनों लोकों में अनुपम थी। ब्रह्माजी ने इसका नाम तिलोत्तमा रखा। -

तिलं तिलं समानीय रत्नानां यद् विनिर्मिता ।
तिलोत्तमेति तत् तस्या नाम चक्रे पितामहः ।।


बस, उसे दोनो भाइयों के पास जाने को कहा गया। तिलोत्तमा का वहां जाना था, दोनों का उसपर एक साथ मोहित होना था और फिर एक दूसरे की जान का प्यासा होना तो तय । ब्रह्माजी का वरदान फलीभूत हुआ। दोनो आपस में ही लड़ मरे।
एक अन्य उल्लेख में तिलोत्तमा कश्यप ऋषि और अरिष्टा की संतान थी। अरिष्टा दक्ष प्रजापति की पुत्री थी। गंधर्वों और अप्सराओं की इसी की संतान माना जाता है। तिलोत्तमा को पूर्व जन्म में कुब्जा कहा गया है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, October 16, 2007

आरामगाह में गधा, रमण और रमणी...

राम शब्द किस भाषा का है? हिन्दी , उर्दू या फारसी का? कुछ लोग इसे बड़ी आसानी से हिन्दी का बता सकते हैं और कुछ इसे उर्दू-फारसी का भी कह सकते हैं। दरअसल यह मूलत: संस्कृत का शब्द है जो आराम: के रूप में प्रयोग होता है। इसका अर्थ है खुशी, प्रसन्नता या इन्द्रिय आनंद। इसके अलावा इसका अर्थ बाग-बगीचा , उद्यान भी है। उद्यान के उपयोग पर गौर करें तो भी आराम शब्द का अर्थ साफ हो जाता है यानी अर्थात ऐसा स्थान जहां जाकर इन्द्रियों को प्रसन्नता का अनुभव हो। संस्कृत में इसीलिए माली के लिए आरामिकः शब्द भी है।
संस्कृत का आराम: भी मूलत: रम् धातु से बना है जिसका अर्थ है सुहावना, आनंदजनक या संतोषप्रद। रम् में आ उपसर्ग लगने से बना आराम:। रम् से हिन्दी के कई अन्य शब्द भी बने हैं जैसे रमण । इसके कई अर्थ हैं जैसे सुहावना, मनोहर, आनंदप्रद आदि। इसके अतिरिक्त प्रेमी, पति, और कामदेव भी होता है। रमण का एक और भी अर्थ है जो चौंकानेवाला है – गधा। मगर कलियुगी यथार्थ पर अगर प्रेमी या पति को देखें तो रमण का पर्याय गधा कुछ ग़लत भी नहीं है। जिन्हें संदेह है वे वाशि आपटे का शब्दकोश देख सकते हैं। इसी तरह रमणी के मायने हुए पत्नी, प्रेयसी या सुंदरी। लक्ष्मी का एक नाम रमा भी इसी से बना है। इसीलिए विष्णु के लिए रमाकांत, रमानाथ और रमापति जैसे नाम भी चल पड़े। रम्य , सुरम्य, मनोरम जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते है
प्राचीनकाल में बौद्ध भिक्षुओं के संघ जिन मठों,
विहारों या उद्यानों में विश्राम करते उसे संघाराम ही कहा जाता था। नालंदा विश्वविद्यालय का संघाराम तत्कालीन भारत का सबसे विशाल संघाराम था ऐसा छठी सदी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रावर्णन में उल्लेख है। मथुरा के संघाराम भी प्रसिद्ध थे और प्रायः सभी प्रसिद्ध विदेशी वृत्तांतों में इनका उल्लेख है।
प्राचीन फारसी यानी अवेस्ता ने आरामः को को ज्यों का त्यों अपना लिया । फिर ये आधुनिक फारसी में भी जस का तस रहा। फारसी से ही ये उर्दू में भी आराम आया। यहां इस शब्द का अर्थ बाग-बगीचा न होकर शुद्ध रूप से विश्राम के अर्थ में है। हिन्दी में भी आराम शब्द का प्रयोग विश्राम के अर्थ में ही होता है। फारसी में तो इससे कई शब्द भी बन गए जैसे आरामतलब, आरामगाह, आरामकुर्सी, आरामपसंद, आरामदेह वगैरह वगैरह। खास बात ये कि ये तमाम शब्द हिन्दी में भी खूब इस्तेमाल किये जाते हैं। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, October 15, 2007

विनय की परख

विनय शब्द में ही किसी को अपने पास ले जाने की भावना है। ‘नी’ (ले जाना) धातु से यह शब्द बना है जिसके पहले विशिष्टता वाचक उपसर्ग ‘वि’ लगा है। डां पाण्डुरंग राव विनय की व्याख्या बहुत सुंदर ढंग से करते हैं । वे कहते हैं कि प्रत्येक जीव को जीवन प्रदान करनेवाले प्राणदाता विनयसूत्र से सबको अपनी ओर खींच लेते हैं। जिस जीव में जितनी विनयशीलता होती है उतना ही वह अपने अंदर के ब्रह्म के निकट पहुंच जाता है। परमात्मा प्रत्येक जीवात्मा को अपनी विशिष्ट पद्धति के अनुसार अपनी ओर आकृष्ट करता है और इस प्रकिया के अंतर्गत वह बार बार यह देखने की चेष्टा करता है कि जीवात्मा कितना अपने निकट पहुंचा है। विनयिता का साक्षी जानता है कि कौन कितना विनम्र है और कितना उद्दंड। महत्ता की मान्यता मानव को महान् बनाती है और यही विनम्रता का पाठ भी सिखाती है। बाहरी ठाठ-बाट और दिखावटी गरिमा से आदमी जितनी दूर रहताहै, उतना वह आत्मा के आंतरिक सौदर्य को हृदयंगम कर पाता है। शारीरिक सौंदर्य, बौद्धिक विकास, आर्थिक समृद्धि, सामाजिक गौरव प्रतिष्ठा आदि से सुसंपन्न जीवन व्यतीत करते हुए भी अगर मनुष्य अपने को एक महती आत्मा का अकिंचन अंश समझ सकता है तो वह सच्ची और सात्विक विनय का अधिकारी बन जाता है। यही विनयिता परमात्मा को अत्यंत प्रिय है। इसलिए भगवान का प्रेम पाने और अपने अंदर की सच्ची सत्ता को पहचानने के लिए सहज सात्विक विनम्रता के सांचे में अपने को ढालना पड़ेगा। विनम्रता का अर्थ भीरुता नही है। सांसारिक सारहीनता की भावना ही विनय है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

पठान की ऊंचाई, बुलंदी और मज़बूती यूं ही नहीं.....

ठान यानी खालिस अफगानिस्तानी लोग। काबुलीवाला के तौर पर जो तस्वीर जेहन मे उभरती है वह दरअसल एक पठान की होती है। भारत के मुस्लिम समाज में बहुत से लोग पठान उपनाम का इस्तेमाल करते है। आज पठान शब्द से एक धर्म या जाति-विशेष का हो कर रह गया है मगर किसी वक्त ऐसा नहीं था। बल्कि पश्चिमोत्तर भारत के एक खास इलाके में रहनेवाले सभी लोग पठान कहलाते थे ठीक वैसे ही जैसे पंजाब निवासी पंजाबी, महाराष्ट्र के लोग मराठी और गुजरातवासी गुजराती ।
दरअसल इस्लाम के जन्म से भी सदियों पहले वैदिककाल में जब अलग-अलग गण हुआ करते थे भारत के उत्तर-पश्चिमी इलाके में पक्थ नाम का एक गण था। इसका क्षेत्र आज के रावलपिंडी से लेकर अफगानिस्तान के दक्षिण-पूर्वी इलाके तक थे। इसमें उत्तर में आज के पेशावर-काबुल से लेकर दक्षिण मे क्वेटा जैसे इलाके आते हैं। खास बात ये कि ये समूचा क्षेत्र पहाड़ी है। पख्त शब्द मूल रूप से पष् धातु से बना है जिसमें ऊंचाई, बुलंदी और मजबूती जैसे अर्थ निहित हैं। समझा जा सकता है कि ये सब विशेषताएं पहाड़ में ही होती है और पहाड़ी क्षेत्र होने से ही इसे पक्थ नाम मिला होगा। इससे बने पठार(हिन्दी ), पुख्ता (फारसी) और पाषाण् ( संस्कृत) जैसे शब्द भी इसी तथ्य को साबित करते हैं। जाहिर है पक्थ गण का एक रूप पहले पश्त या पष्त रहा होगा। क्योंकि आज भी इस इलाके के लोग खुद को पश्तून कहते हैं । इनकी बोली भी पश्तो कहलाती है। पक्थ गणवासी ही पख्तून कहलाए। इन लोगों का इलाका पख्तूनिस्तान कहलाया और पख्तून से ही बना पठान। अविभाजित भारत में पेशावर, सियालकोट, रावलपिंडी के हिन्दू भी पठान ही थे और मुस्लिम भी। भारत में मुस्लिम आक्रमण के वक्त तक इस पूरे क्षेत्र में हिन्दू राजा जयपाल का शासन था पठानकोट जैसे कई रिहायशी इलाकों के नाम के साथ पठान शब्द भी किसी ज़माने में वहां पठानों की बहुतायत होने का संकेत करता है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, October 14, 2007

दीनार का चलता था सिक्का कभी..

दीनार शब्द को ज्यादातर भारतीय हिन्दी में मुस्लिम हमलावरों के साथ आया शब्द मानते हैं। दीनार का मतलब होता है एक स्वर्ण मुद्रा या अशरफी। मूलतः यह शब्द रोमन शब्द जन्मा है और क़रीब तीन सदी ईसा पू्र्व स्वर्ण मुद्रा के तौर पर इसका रोमन गणतंत्र में प्रचलन शुरू हुआ। रोम से ही दिनारियस अरब क्षेत्र मे दीनार के रूप में पहुंचा। किसी ज़माने में यह मुद्रा भारत में चलती थी मगर भारत में मुस्लिम शासन में दीनार का चलन नहीं रहा। मजे की बात यह है कि भारत से गायब होने के बावजूद हिंदी के शब्दकोशों में आज भी दीनार संस्कृत शब्द के रूप में स्वर्ण मुद्रा के अर्थ में विराजमान है, जबकि उर्दू- फारसी शब्दकोश में यह फारसी शब्द के तौर पर अशरफी बन कर जमा है। मगर इसके रोमन मूल का कहीं भी जिक्र तक नहीं है। हिन्दी में इसका एक रूप दिनार भी है।
संस्कृत में दीनार का उल्लेख दीनारः के रूप में मिलता है। भारतीय संस्कृति में दीनार किस हद तक रची-बसी थी इसका उल्लेख आठवी सदी में लिखे गए दशकुमारचरित में मिलता है जिसमें द्यूतक्रीड़ा (जूआ) के संदर्भ में उल्लेख है कि १६००० दीनारों की बाजी में द्यूत अध्यक्ष के निर्णयानुसार आधी राशि जीतनेवाले को और बाकी आधी राशि द्यूत अध्यक्ष व द्यूतसभा के कर्मचारी आपस में बांट सकते हैं।
रोम में भारतीय मसाले और मलमल की बेहद मांग रही थी। करीब पहली सदी ईसापूर्व से लेकर चौथी – पांचवीं सदी तकरोमन साम्राज्य से भारत के कारोबारी रिश्ते रहे। भारत के पश्चिमी समुद्र तट के जरिये ये कारोबार चलता रहा । भारतीय माल के बदले रोमन अपनी स्वर्ण मुद्रा `दिनारियस´ में भुगतान करते रहे। ये कारोबारी रिश्ते इतने फले- फूले की दिनारियस
`दीनार´ के रूप में लंबे अर्से तक लेन-देन का जरिया बनी रही। 98ई.में कनिष्क के जमाने का एक रोमन उल्लेख गौरतलब है:- भारत वर्ष हर साल रोम से साढ़े पांच करोड़ का सोना खींच लेता है । जाहिर है यह आंकड़ा रोमन स्वर्ण मुद्रा दिनारियस के संदर्भ में बताया जा रहा। अपने रोमन रूप में दीनार का मूल्य क़रीब साढ़े चार ग्राम स्वर्ण के बराबर था। आज दुनिया के तमाम मुल्कों में दीनार धातु की मुद्रा की बजाय कागज के नोट के रूप में डटी हुई है।
बाद के सालों में रोम से ऐसे ही कारोबारी रिश्तों के चलते दीनार ईरान और कुछ अरब मुल्कों में भी प्रचलित हुई और अब तक डटी हुई है। यही नहीं अरब मुल्कों समेत दीनार सर्बिया, युगोस्लाविया ,बोस्निया-हर्जेगोविना, अल्जीरिया, यमन, ट्यूनीशिया, सुडान और मोंटेनेग्रो जैसे देशों की भी राजकीय मुद्रा है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, October 13, 2007

पलंगतोड़ के बहाने पालकी का सफर

मतौर पर आलसी और काहिल आदमी को पलंगतोड़ कहते हैं। जानते हैं पलंग के बारे में जिसने हिन्दी को पलंग तोड़ना जैसा शानदार मुहावरा दिया। पलंग शब्द भी उन कई शब्दों में शामिल है जो भारत में पैदा होकर कई मुल्कों भाषाओं के चक्कर लगा कर एक अलग ही रूप में फिर देश लौट आए । अंग्रेजी का एक शब्द है पैलनकीन (palankeen) जिसका मतलब है एक ऐसा खटोला जिसे चार या उससे अधिक लोग कंधों पर उठाएं। हिन्दी मे इसके लिए पालकी या डोली शब्द है। पालकी या डोली आमतौर पर चार लोग मिलकर उठाते हैं जिन्हें कहार कहते हैं। आज के दौर में न पालकी रही , न डोली मगर गीत-संगीत के जरिये ये शब्द आज भी जिंदा हैं । ये पंक्तियां बहुतों ने अपने बचपन में सुनी होंगी और इससे संबंधित खेल भी खेला होगा -

हाथी, घोड़ा , पालकी ।
जय कन्हैयालाल की ।।


गौरतलब है कि पालकी और पैलनकीन का न सिफ अर्थ एक है बल्कि ये जन्में भी एक ही उद्गम से हैं और वह है संस्कृत शब्द पर्यंक: जिसका मतलब होता है शायिका। इसके अलावा इसका अर्थ समाधि मुद्रा या एक यौगिक क्रिया भी है जिसे वीरासन कहते हैं।
संस्कृत में पर्यंक: का ही एक और रूप मिलता है पल्यंक:। खास बात ये कि हिन्दी का पलंग शब्द इसी पर्यंक: से निकला है और संस्कृत मे भी इसका अर्थ चारपाई, शायिका या खाट ही है। संस्कृत से पालि भाषा मे आकर पर्यंक: ने जो रूप धारण किया वह था पल्लको। यही शब्द पलंगडी़ के रूप में भी बोला जाता है। पलंग चूंकि शरीर को
आराम देने के काम आता है और आराम का आधिक्य मनुश्य को आलसी बना देता है लिहाज़ा हिन्दी में आलस से संबंधित कुछ मुहावरों के जन्म में भी इस शब्द का योगदान रहा जैसे पलंग तोड़ना यानी किसी व्यक्ति का काहिलों की तरह पडे रहना, कामधाम न करना, निष्क्रिय रहना आदि। ऐसे लोगों को पलंगतोड़ भी कहते हैं।
खास बात ये कि पूर्वी एशिया में बौद्धधर्म का प्रचार-प्रसार हुआ तो वहां पालि भाषा के शब्दो का चलन भी शुरू हुआ। इंडोनेशिया के जावा सुमात्रा द्वीपो में आज भी पालकी के लिए पलंगकी शब्द चलता है जो पालि भाषा की देन है। जावा सुमात्रा पर पुर्तगाली शासन के दौरान यह शब्द पुर्तगाली जबान में भी पैलनकीन (palangquin) बनकर शामिल हुआ और इसके जरिये योरप जा पहुंचा। अंग्रेजी में इसने जो रूप लिया वह था पैलनकीन। उर्दू फारसी में पलंग शब्द तो है मगर इसका अर्थ चारपाई न होकर तेंदुआ है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, October 12, 2007

रघुकुलतिलक सुजन सुखदाता....

तिल के अर्थविस्तार पर कुछ चर्चा और बाकी है । किसी गोल चिह्न या आकृति अथवा अल्प परिमाण का भाव भी तिल शब्द में निहित है। संस्कृत का तिलकः शब्द इससे ही बना है जो हिन्दी में तिलक के रूप में खूब व्यवहार में आता है और आमतौर पर चंदन, रोली आदि से बने टीके के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यूं सुंदर फूलों के एक वृक्ष का नाम भी तिलकः है जो वसंत में पुष्पित होता है । शरीर पर बने चिह्न यानी मस्से की ही तरह तिलकः का भी एक अर्थ शरीर पर पड़े चकत्ते या ऐसा ही चिह्न है जाहिर है यह भी तिल का विस्तार है ।
तिलक एक शोभाकार चिह्न है जो प्रायः मस्तक पर बनाया
जाता है । धार्मिक संहिताओं में चंदन की लकड़ी को घिस कर बने लेप से मस्तक पर मंगलकारी चिह्न बनाने का प्रावधान है मगर अक्षत् , रोली , हल्दी व अन्य रंगों के लेप भी मस्तक पर लगाने की परम्परा रही है और इसे ही तिलक कहा गया है । तिलक को स्त्री-पुरूष या अन्य कोई भी अपने ललाट पर धारण कर सकता है। इसीलिए माथे के लिए संस्कृत में तिलकाश्रयः जैसा शब्द भी है अर्थात जहां तिलक को आश्रय मिले अर्थात मस्तक ।
तिलक शब्द का प्रयोग पूज्य, प्रमुख या श्रेष्ठ के अर्थ में सम्मान देने के लिए भी होता है जैसे रघुकुलतिलक । आमतौर पर ऱघुकुलतिलक की उपमा भगवान राम के लिए कही जाती है।
रामचरित मानस में कई जगह राम के लिए यह शब्द आया है ।
रघुकुलतिलक सुजन सुखदाता । आयउ कुसल देव मुनि त्राता ।।

तिलक शब्द के सम्मान वाले भाव के चलते ही मराठीभाषियो में एक उपनाम तिलक भी है। बालगंगाधर तिलक के नाम में भी यह शामिल है। राजतिलक जैसे शब्द में भी इसकी मौजूदगी में भी सम्मान प्रतिष्ठा का यही भाव है। विवाह संस्कार से संबंधित एक प्रमुख रस्म भी तिलक कहलाती है क्योंकि इसमें विवाह से पूर्व वर को वधुपक्ष की ओर से माथे पर तिलक लगा कर आदर-मान दिया जाता है और कुछ भेंट भी दी जाती है। तिलक आज भारत की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है और सम्मान देने के लिए माथे पर टीका लगाने की परम्परा रोजमर्रा में निबाही जाती ही है, देशी-विदेशी अतिथियों और अन्य महानुभावों को सम्मानित करने के लिए सरकारी आयोजनों तक में इसे देखा जा सकता है । हमारी संस्कारशीलता की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि पालतू पशुओं खासकर गोवंश के माथे पर भी सम्मानसूचक तिलक लगाया जाता है। ये अलग बात है कि रस्म अदायगी के बाद ये तिलकधारी पशु भी खूब खदेड़े जाते हैं। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

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