Thursday, March 26, 2009

मुंबईया चाल का जायज़ा [आश्रय-8]

 
जिस दौर में मुंबई में चालें आकार ले रही थीं, कमोबेश उन्हीं हालात में उससे कुछ अर्सा पहले सुदूर पूर्व में बीजिंग, शंघाई, ढाका, कोलकाता, चेन्नई, से लेकर बोस्टन, न्यूयार्क तक ऐसी ही आवासीय व्यवस्थाएं बन चुकी थीं मगर शोहरत चाल को ही मिलीomkarmhsdharavi-sकोलीवाड़ा, धारावी की एक चाल चित्र साभार airoots.org

मुं बई की विश्वप्रसिद्ध चाल के बारे में ज्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। संभवतः इन्हें अब वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा भी मिलने वाला है। जो लोग मुंबई नहीं गए हैं, फिल्मों के जरिये ही ज्यादातर भारतीयों का परिचय चालों से हुआ। मुंबई के जीवन पर बनी फिल्म में चाल न हो, ऐसा हो नहीं सकता। लोकल ट्रेन की तरह ही मुंबई की आत्मा भी चालों में बसती है। एक जिज्ञासा अर्से से  रही कि चाल का मतलब क्या होता है। चाल शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में मुझे कोई ठोस जानकारी नहीं मिली। मुंबई से जुड़े जितने भी संदर्भों को मैने टटोला है वहां चाल के सामाजिक संदर्भों पर तो लिखा गया है मगर बसाहट के तौर पर इस शब्द का खुलासा नहीं मिलता। मेरे अपने कुछ अनुमान, कुछ निष्कर्ष यहां प्रस्तुत हैं।
मुंबई चाल की व्युत्पत्ति पर चर्चा करने से पहले चाल की बसाहट-बनावट को समझ लें। आज से करीब डेढ़ सदी पहले अंग्रजी राज में मुंबई तेजी से बड़े आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित होने लगी थी। देशभर के विभिन्न हिस्सों से यहां कामगार आने लगे थे जो मुख्यतः निर्माण मजदूर थे। राजस्थान से मारवाड़ी समुदाय के हजारों लोग सट्टा, हुंडी, व अन्य व्यवसायों के लिए मुंबई को अपनी कर्मभूमि बना चुके थे। चाल जैसी रिहायशी व्यवस्था भारी तादाद में मुंबई आने वाले आप्रवासियों के आश्रय की वजह बनी जिसमें निम्नमध्यमवर्गीय और मध्यमवर्गीय परिवारों ने मिल-जुल कर एक ऐसे आत्मीय परिवेश का निर्माण किया जिसने इसे दुनियाभर में मशहूर कर दिया। हालांकि जिस दौर में मुंबई में चालें आकार ले रही थीं, कमोबेश उन्हीं हालात में उससे कुछ अर्सा पहले सुदूर पूर्व में बीजिंग, शंघाई, ढाका, कोलकाता, चेन्नई, से लेकर बोस्टन, न्यूयार्क तक ऐसी ही आवासीय व्यवस्थाएं बन चुकी थीं मगर शोहरत चाल को ही मिली। अनुमान है मुंबई में पिछली सदी की शुरूआत से चालें बनने लगी थीं। यह वही दौर था जब मुंबई में लगातार मिलें खुल रही थीं जिनमें काम करने वाले लोगों को लिए मिल क्षेत्र के आसपास ही चालों के निर्माण का क्रम शुरु हुआ।
चाल दरअसल भूमि के चौरस टुकड़े पर बनी चार पांच मंजिला इमारत को कहते हैं। इसके हर तल पर कतार में एक दूसरे से जुडे दो कमरों की दस से पंद्रह इकाइयां होती हैं। कुछ इमारतों में चारों तरफ ऐसी ही आवासीय इकाइयां होती थीं और बीच में विशाल दालान होता था जिसमें कुआ, हैंडपम्प होते। हर मंजिल पर सार्वजनिक शौचालय होता। कुछ इमारतों में अंग्रेजी के सी आकार में तीन तरफ निर्माण होता है। ऐसी इमारतों में चाल का स्वरूप बाहर से ही साफ नजर आता है। सभी आवासीय इकाईयां  अगले और पिछले हिस्से में लंबी बालकनी से जुड़ी रहती है। हालांकि ऐसी चालों का निर्माण अब बंद हो गया है मगर सत्तर-अस्सी साल पुरानी कई चाले हैं जो अभी भी आबाद है। औद्योगिक विकास के साथ जब झोपड़पट्टी का विस्तार हुआ तो कतारनुमा मकानों को
88209853_3ea70e6d1d फोटो सौजन्य फ्लिकरmunicipalchawl धारावी की म्यूनिसिपल चाल.चित्र साभार airoots.org
भी चाल का नाम मिल गया।
क बात जो पकड़ में आ रही है वह है चाल के साथ कतार में बने आश्रयस्थल का भाव। मुंबई की विश्वप्रसिद्ध चाल की व्युत्पत्ति के मूल में संभवतः संस्कृत का शालः शब्द है जिसका अर्थ होता है कतार, पंक्ति, क्यारी, बाड़ा आदि। चाल शब्द संस्कृत शाल का ही रूप है। मगर इसका चाल रूपांतर दक्षिणी भाषाओं में ही हुआ है। तमिल चाल् का अर्थ है खेत में बुवाई करने के लिए बनाई गई लंबी क्यारी अथवा नाली। खेत की मेड, जिस पर चल कर किसान आते-जाते है, भी चाल् कहलाती है। संस्कृत में धान के नन्हें रोपों की कतार को शालि ही कहते हैं जिसमें पंक्ति या सरल रेखा का ही भाव है। सीधी रेखा वाला यही भाव खेत में हल जोतने से बनी सरल बुवाई पंक्ति से भी जुड़ता है। इसी का सजातीय समर्थी शब्द है शील जिसका अर्थ भी सीधा, सरल, अग्रगामी, चिन्तन-मनन, अभ्यास या कृषिकर्म आदि है।

 कन्नड़ में इसका रूप साल है। दक्षिणी भाषाओं में मराठी के बाद कन्नड़ पर संस्कृत का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। शाल् का कन्नड़ में साल रूप यही दर्शाता है। तेलुगू चालु और मलयालम चाल् में भी यही भाव हैं। वैसे यह तमिल चाल् का परिवर्तन भी हो सकता है पर दोनों में भाव वही है। बांग्ला में कतार के लिए सारि शब्द है। एक पंक्ति में बने मकानों की गली को सरणि कहा जाता है। जैसे रवीन्द्र सरणि। यह सारि या सरणि शब्द भी शालः का ही रूपांतर है। चाल भी एक कतार वाले आवासों को ही कहते हैं।
गौर करें कि मुंबई में कई चालों का समूह वाड़ी या वाड़ा कहलाता है। शालः का एक अर्थ घिरा हुआ स्थान या बाड़ा भी यही साबित कर रहा है कि चाल के लिए यह विशेषण भी प्राचीन शालि या शालः से ही निकला है। संस्कृत का शालः बना है शल् धातु से जिसमें तीक्ष्ण, तीखा, हिलाना, हरकत देना, गति देना, उलट-पुलट करना जैसे भाव है। ये सभी भाव भूमि में हल चला कर खेत जोतने की क्रिया से मेल खाते हैं। हल की तीक्ष्णता भूमि को उलट-पुलट करती है। शालः शब्द के मूल में बाड़ा अथवा घिरे हुए स्थान का अर्थ भी निहित है। भूमि में शहतीरों को गाड़ कर प्राचीन काल में उसके चारों और बाड़ बनाकर आश्रय का निर्माण किया जाता था। उत्तर भारत से पहले मुंबई में बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय मजदूर पहुंचते रहे हैं। यूं भी मराठी पर दक्षिणी बोलियों का भी असर है तो ताज्जुब नहीं कि कोंकण क्षेत्र में कतारनुमा बसाहट के लिए चाल शब्द पहले से प्रचलित रहा हो। यह भी संभव है कि दक्षिणी आप्रवासियों ने जब कतारनुमा आशियानों में रहना शुरू किया तब उनकी बोली के जरिये इनके लिए चाल शब्द प्रचलित हो गया।            -जारी
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20 कमेंट्स:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

शायद चाल का ही एक रूप है वाडी . पुणे मे ऐसे मकानों को वाडी कहते है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

इस बार भी शब्दों के सफर में आपकी चाल सफल रही है।
शाल और चाल की विवेचना अच्छी बन पड़ी है।
हमारे समीपवर्ती देश नेपाल में देशी घी को चिल्लू कहते हैं।
इस पर भी प्रकाश डालें।
अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते रहें ।
बधाई।

sanjay vyas said...

अनूठा शब्द चुना इस बार आपने.मैं तो आपके निष्कर्ष से संतुष्ट हूँ पर कई बार कुछ शब्द ठेठ स्थानीय मूल के भी हो सकते है.खासकर तब जब शब्द मछुआरों की बस्ती के पास से निकला हो.तटवर्ती लोगों की संस्कृति कई मायनों में मुख्य भूमि से बिलकुल भिन्न होती है.कृपया शाल भंजिका का अर्थ बताये.साभार.

अभिषेक ओझा said...

सच में 'चाल' से कई फिल्में याद आती हैं. इनमें नसीरुद्दीन शाह और फारूक शेख की 'कथा' तुरत याद आई ! वैसे कल 'जुगराफिया' वाली चर्चा आज ही देख पाया... धन्यवाद !

Dr. Chandra Kumar Jain said...

क्या बात है साहब !
माना की चाल की शोहरत है
पर आजकल शोहरत की
जो चाल चल निकली है,
वह भी काबिले गौर है न ?
=======================
सच, फिल्मों में जिसे देखा था
उसे आज सही माने में जाना.

सफ़र में आपका दीवाना...
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

आलोक सिंह said...

चाल का अर्थ तो हम समझते थे की जहाँ हर कोई चलता रहे मतलब कभी दिन-रात का पता न चले, हर समय एक ही चाल से गुजर रहा हो .
अच्छी जानकारी धन्यवाद

Anonymous said...

Kiran Rajpurohit Nitila
sadar
shabdo ki kadi kaha ki kaha le jati hai .achha laga chal ke ab tak
ki chal padhkar. vese Rajasthan ke rajwado or gavo me bade kamrae
ko aaj bhi sal kaha jata hai jiske andar or andar ya dono taraf chaote
darwajo vale chote kamre jo kimti saman ke liye hote hai. ex.
Jooni sal, Badi sal, Baisa ri sal.
Kiran Rajpurohit Nitila

अजित वडनेरकर said...

@किरण राजपुरोहित
आपने बिल्कुल सही संबंध जोड़ा है किरणजी। शुक्रिया। चाल की अगली कड़ी में हम इन्हीं कुछ शब्दों की चाल से रिश्तों पर चर्चा करनेवाले हैं। आभार।

रंजन said...

चाल की चाल तो बहुत लम्बी निकली..

अजित वडनेरकर said...

@संजय व्यास,
शुक्रिया भाई। अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृतियों में फर्क होता है। पर ज्यादातर मामलों में गहराई से देखें तो यह रूपांतर ही सिद्ध होता है। चाल की अगली कड़ी का इंतजार करें। कुछ और रूपांतर आपको आनंदित करेंगे।

रंजना said...

चाल शब्द मस्तिष्क में आते ही क्रमबद्ध कतार में खड़ी वे रिहाइशी मुम्बैया इमारतें स्मृति पटल में उभर जाती हैं.
मुंबई और चाल दोनों ही एक दूसरे की पहचान हैं.

आनंददायी सफ़र के लिए आभार.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बढिया जानकारी मिली चाल के बारे मे. शुभकामनाएं.

रामराम.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | G.D.Pandey said...

कई बोलियों में च उच्चारण श से या इसका उलट किया जाता है। चाल में शायद वही घालमेल है।

Vidhu said...

भाई अजीत जी नमस्कार,चाल शब्द पर ये शोध और विश्लेषण रोचक और जान कारी भरा है शब्द-शब्द पर इतनी मेहनत आप करतें हैं उसके लिए नमन...लेकिन चाल -वाडे के साथ जिस अपनत्व -भाईचारे और प्रेम की संस्कृति जुड़ी हुई है ,पोश कालोनी मैं रहने वाली बनावटी जीवन शैली मैं कहाँ,आपकी पिछली पोस्ट भी जरा फुरसत मैं पढूंगी...

अजित वडनेरकर said...

विधुजी को जैजै,

सही कहा आपने। सामाजित समरसता का सही अर्थ इन्हीं बसाहटों में रचा-बसा है। समरसता का पुण्य भी यहीं मिलता है। बाकी सब आधुनिकता और भौतिकता के यज्ञ की आहुति बन गया

चाल पर अभी एक कड़ी और बाकी वह भी दिलचस्प लगेगी। एक - दो दिन में छापता हूं।

आभार

Bezardehlvee said...

चाँदनी की पलकों पर किसके ख्वाब ठहरे हैं।
झील के किनारों से आओ पूछ कर देखें।।
मौत की तमन्ना को किस तरह सजाया है।
जिन्दगी के मारों से आओ पूछ कर देखें।।

cmpershad said...

चाल की शुरुआत शायद झोपड-पट्टी से हुई पर अब वहां भी पूरी सुविधाएं उपलब्ध है। चाल में परिवार की सुख-सुविधा की चीज़ें[फ्रिज, टीवी आदि] भी उपल्ब्ध है पर एक चीज़ जो खलती है वो है गंदगी। यही लोग जो औरों के घर साफ करने जाते हैं, अपने ही परिवेश की चिंता नहीं करते! इसे विडम्बना ही कहेंगे!!

सौमित्र बुधकर said...

मुंबई में रहता हूँ, तो चाल तो काफी देखी हैं.... मज़े की बात ये है की मुझे एक चाल में रहने का मौका भी मिला है.. जब मुंबई आया तो शुरूआती दिनों में अपने बड़े भाई के साथ रहता था, फिर वो वक़्त आया जब मुझे अपने पैरों पर खडा होना था .. और इसलिए, उनका बड़ा सा घर छोड़ का कर, अपने लिए एक घर की तलाश में निकला, और फिर जा पहुंचा एक चाल में. हालाकि कई बार चाल की तस्वीर बहुत अच्छी नहीं दिखाई देती ख़ास तौर पर फिल्मों में... लेकिन मैं ये बताना चाहता था की जिस चाल में मैं ९ महीने रहा वो बहुत ही मस्त थी... मैं तीसरे फ्लोर पर था, और मेरी लाइन में कुछ बधुत ही अच्छे परिवार रहते थे... आपकी इस पोस्ट ने मुझे मुंबई में मेरे शुरूआती दिन याद दिलवा दिए..
शुक्रिया
सौमित्र

बालसुब्रमण्यम said...

अहमदाबाद में भी, और शायद गुजरात के अन्य भागों में भी, चाल से मिलती-जुलती बस्तियां हैं, जिन्हें यहां पोल कहते हैं। ये भी कतार में पतली गली के दोनों बने मकानों से बने होते हैं, पर ये चाल से कुछ भिन्न होते हैं। प्रत्येक मकान में एक संयुक्त परिवार रहता है, चाल की तरह दो-दो कमरे वाले युनिटों में अलग-अलग परिवार नहीं। पोल में भी लोगों के बीच बहुत ही आत्मीय संबंध होते हैं। ये पोल सुरक्षा की दृष्टि से भी बने होते हैं। इनके चारों ओर घेरा होता है, और प्रवेश एक मुख्य द्वार से होता है, जिसे रात को बंद किया जा सकता है।

पोल के मकानों में भवन-निर्माण की अनेक उन्नत तकनीकें देखने में आती हैं, जैसे बारिश के पानी को संचित करने के लिए कुंड, इत्यादि। ये मुख्यतः लकड़ी से बने होते हैं और हवादार और रोशनदार होते हैं। अहमदाबाद की गरमी के लिए बिलकुल उपयुक्त हैं, क्योंकि गरम हवा ऊपर की ओर निकल जाती है। पोल के मकान दो-तीन मंजिलें ऊंचे होते हैं। चूंकि ये पतली गली के दोनों ओर बने होते हैं, एक की परछाई दूसरे पर गिरती है और इस तरह सीधी धूप से बची रहती हैं। अभी जब 2001 में गुजरात में जो बड़ा भूचाल आया था, उसमें अहमदाबाद में सिमेंट-कंक्रीट की कई बहुमंजिली इमारतें जो पिछले दस-बीस साल में बनी थीं, धराशाई हो गईं, पर पोल के 200-300 साल पुराने मकान ज्यों के त्यों खड़े रहे।

मैंने पोल का इसलिए जिक्र किया क्योंकि हो सकता है कि चाल शब्द से इसका कोई संबंध हो।

आशीष said...

मुंबई में इतने दिनों रहने के बावजूद जो शब्द मैं नहीं समझ पाया , उसे आपने दो मिनट में समझा दिया। मुझे लग रहा है आपके पास कोई अलादिन की चिराग है। जो आपको यह सब जानकारी मुहैया कराता है। खैर एक बात और, मुंबई में रहने के दौरान मैने महसूस किया है कि चाल में रहने वालों को थोड़ा हेयदृष्टि से भी देखा जा रहा है। ऐसा क्यों? मैं आज तक समझ नहीं पाया। लेकिन चाल का किराया कोई कम नहीं होता है।


जय हो

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