Sunday, July 3, 2011

जीहुजूरिया, यसमैन और जीमैन

gman

र भाषा में विविध भावों को व्यक्त करने वाले विभिन्न उच्चार या संबोधन होते हैं। किसी का संबोधन सुनने या कही गई बात को आत्मसात करने वाली ध्वनि है “हुँ” या “हूँ”। इसी तरह स्वीकार के भाव को व्यक्त करने वाला उच्चार है “हाँ”। नकार के लिए “ना” है। इसी तरह का एक उच्चार है “जी”। इस “जी” की व्याप्ति हिन्दी में जबर्दस्त है। यही नहीं, इस “जी” में शायराना सिफ़त भी है। रूमानी अंदाज़ वाली बात हो या उस्तादाना तबीयत वाली नसीहत, इस “जी” की मौजूदगी से रंगत आ जाती है। मिसाल के तौर पर अनपढ़ फिल्म में राजा मेंहदी अली खान के लिखे गीत की यह पक्ति – “जी” हमें मंजूर है आप का हर फैसला / कह रही है हर नज़र बंदापरवर शुक्रिया....।  “जी” की अभिव्यक्ति मुहावरेदार भी होती है जैसे किसी की हाँ में हाँ मिलाने को उर्दू में ‘जीहुज़ूरी’ कहा जाता है। इस ‘जी’ की मौजूदगी यहाँ बखूबी पहचानी जा सकती है।
जी कहाँ से आया इसकी बात इसी “जीहुज़ूरी” से करते हैं। “जीहुज़ूरी” का अर्थ जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है “हाँ में हाँ मिलाना” है। “जीहुजूरी” में “जी हुज़ूर” को साफ़ पहचाना जा सकता है। “हाँ में हाँ मिलाना” का अर्थ है किसी की बात के अंत में “हाँ हाँ” कहते चले जाना। साफ़ है कि सुनने वाला व्यक्ति सभी बातों को स्वीकार कर रहा है। स्वाभाविक है कि “हाँ हाँ” कहने वाला व्यक्ति सामने वाले की सत्ता के आगे नतमस्तक है। अंग्रेजी में इस “हाँ” की जगह ‘यस’ कहने का प्रचलन है। जब सामने वरिष्ठ वयक्ति हो तो ‘यस’ के आगे ‘सर’ जुड़ जाता है अर्थात ‘यस सर’। गौर करें यह ‘यस सर’ दरअसल “जी हुज़र” ही है। हुज़ूर यानी श्रीमान, मान्यवर, मालिक, श्रीमंत, हुकुम आदि। अंग्रेजी में इसे “सर” कहते हैं। समाज ने अंग्रेजी में “यस सर“ कहने वाले के लिए “यसमैन” टर्म विकसित कर ली और हिन्दुस्तानी में इसे “जीहुज़ूरिया” कहा जाने लगा। सरकारी भाषा में श्रीमान शब्द भी सर के लिए प्रचलित है और कई लोग वरिष्टों की बात सुनने के बाद हर बार श्रीमान श्रीमान कहते हैं।
स्पष्ट है कि “जी” दरअसल सामने वाले के लिए आदरयुक्त संबोधन या उच्चार है जिसमें उस व्यक्ति का रुतबा उभरता है। राजस्थान में हुकुम कहने का चलन है। वहाँ के सामंती समाज में वरिष्ठ व्यक्ति के लिए हुकुम, होकम जैसे संबोधन प्रचलित हुए। आज भी वहाँ ‘यस सर’ की तरह सिर्फ़ हुकुम या होकम कहने का प्रचलन है। यह अलग बात है कि होकम कहने में सचमुच जो आत्मीयता और आदर का भाव है वह “यस सर” में निहित जीहुज़ूर वाली चाटूकारिता से नहीं आ रहा है। संस्कृत हिन्दी में श्रीमान, श्रीमन्त, मान्यवर जैसे संबोधन हैं किन्तु प्राचीन भारत में बलशाली, सम्भ्रान्त, शिष्ट, कुलीन, शालीन, माननीय, अमीर व्यक्ति के लिए “आर्य” संबोधन प्रचलित था। मुझे लगता है यह “जी” इसी “आर्य” का अपभ्रंश है। भारोपीय भाषाओं में अक्सर संस्कृत की “य” ध्वनि का प्राकृत रूप “ज” हो जाता है। “युवन्” का “जवान”, “जुवनाइल”, “युवा” का “जुवा”, “यौवन” का “जोबन”, “यव” का “जौ” जैसे कई उदाहरण हैं। आर्य > आर्य्य > आज्ज > अज्ज > जी कुछ यह क्रम रहा होगा इस “जी” के विकास का।
“आर्य” शब्द की विस्तृत अर्थवत्ता पर हम अगली किसी कड़ी में चर्चा करेंगें फिलहाल हम इससे बने जी पर ही बात कर रहे हैं। प्राचीनकाल में श्रेष्ठिजनों के लिए “आर्य” शब्द आम था। सामान्य कार्यव्यवहार में जैसे आजकल “यस सर”, या “हुकुम” जैसे संबोधन होते हैं वैसे ही “आर्य” शब्द भी प्रचलित था अर्थात हर वाक्य के बाद सुनने वाला उसी तरह “आर्य” कहता था जैसे अब “सर”, “बॉस” या “हुकुम” कहा जाता है। गौर करें हिन्दी की विभिन्न बोलियों में दादी या नानी के लिए “आजी” शब्द है। यह दरअसल “आर्यिका” से आ रहा है। आर्य का स्त्रीवाची हुआ आर्यिका। आर्य अर्थात श्रेष्ठ, कुलीन इसी तरह आर्य स्त्री के लिए आर्यिका शब्द रूढ़ हुआ। प्राकृत / अपभ्रंश में इसका रूप है “अज्जिका” और आज की बोलियों में यह “आजी” हुआ। मराठी में दादी को “आजी” और दादा को “आजोबा” कहते हैं और परदादा को “पंजोबा”। आर्यिका से बने “आजी” शब्द में निश्चित ही घर की मुखिया, प्रमुख और प्रभावशाली महिला का भाव है। जाहिर है “आजोबा” की पत्नी भी उसी सम्मान की हकदार हुई। संस्कृत ग्रंथों में “आर्या” शब्द का भी उल्लेख है जिसमें भी सम्मानजनक उक्त सभी भाव निहित हैं।
कुल मिला कर “जी” शब्द संबोधनसूचक है प्राचीन भारतीय परम्परा से आ रहा है। हिंग्लिश के इस दौर में “यस मैन” की तर्ज पर हम “जीमैन” जैसी टर्म भी चला सकते हैं। इससे पहले ही हम सरजी और ओकेजी जैसी टर्म तो बना ही चुके हैं। स्वीकारसूचक भाव के लिए हाँ के साथ भी जी जुड़ गया और हाँजी बन गया। याद रखें इस के पीछे “हाँ आर्य” अर्थात सही है श्रीमान ही छुपा हुआ है। प्रश्नवाचक भाव के रूप में क्यों शब्द के साथ भी जी जुड़ा हुआ नज़र आता है यानी क्योंजी। इसमें पूछने वाले के प्रति सम्मान या आदर का भाव है। आर्य से बने अज्ज का एकदम प्राकृत रूप तो अजी में नज़र आता है जो रोजमर्रा की बातचीत के औपचारिक सम्बोधन में आमतौर पर शुमार होता है। इसके अलावा जी साहबजी, जी सरजी में भी इसे देख सकते हैं और व्यक्तिनाम के पीछे, सम्बोधनों के पीछे जैसे रमेशजी, सुरेशजी, ताईजी, भाईजी, पिताजी, माताजी के साथ भी इसके आदरसूचक भाव प्रकट हो रहे हैं।
आर्य और इससे बने अन्य शब्दों की बाबत अगली कड़ी में

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Friday, June 24, 2011

स्मरण, सुमिरन से मेमोरंडम तक

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दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे होय।। कबीरवाणी का यह दोहा जगप्रसिद्ध है। इसमें जो सुमिरन शब्द है वह महत्वपूर्ण है। सुमिरन शब्द में आई ध्वनियां बड़ी मधुर हैं और इसके मायने भी लुभावने हैं। सुमिरन में ईश्वर को याद करने का भाव है। अनंतशक्ति के प्रति अगाध शृद्धा रखते हुए ध्यान केन्द्रित करना ही सुमिरन है। सुमिरन शब्द बना है संस्कृत के स्मरण से। स्मरण > सुमिरण > सुमिरन के क्रम में इसका विकास हुआ। हिन्दी की विभिन्न बोलियों में यह सुमरन, सुमिरण के रूप में मौजूद है और पंजाबी में इसका रूप है सिमरन जहाँ प्रॉपर नाऊन की तरह भी इसका प्रयोग होता है। व्यक्तिनाम की तरह स्त्री या पुरुष के नाम की तरह सिमरन का प्रयोग होता है। बहुतांश हिन्दीवाले पंजाबी के सिमरन की संस्कृत के स्मरण से रिश्तेदारी से अनजान हैं क्योंकि सुमिरन की तरह से पंजाबी के सिमरन का प्रयोग हिन्दीवाले नहीं करते हैं बल्कि उसे सिर्फ व्यक्तिनाम के तौर पर ही जानते हैं।
स्मरण शब्द बना है संस्कृत की स्मर् धातु से। मोनियर विलियम्स के संस्कृत इंग्लिश कोश के मुताबिक स्मर् में याद करना, न भूलना, कंठस्थ करना, याददाश्त जैसे भाव हैं। संस्कृत हिन्दी का स्मृति शब्द भी इसी मूल से आ रहा है। भाषा की खासियत है लगातार विकसित होते जाना। मनुष्य ने भाषायी विकास के दौर में लगातार उपसर्ग और प्रत्यय जैसे उपकरण विकसित किए हैं जिनके ज़रिए नए नए शब्दों का सृजन होता गया है। स्मर् में निहित याद रखने का भाव ही इसके उलट भूलनेवाली क्रिया के लिए भी इसी स्मर् धातु से नया शब्द बना लिया गया। संस्कृत का प्रसिद्ध उपसर्ग है वि जिससे रहित, कमी या हीनता का बोध होता है। स्मरण में वि उपसर्ग लगने से बनता है विस्मरण जिसका अर्थ है भूल जाना, याद न रहना। आए दिन इस्तेमाल होने वाला हिन्दी का विस्मृत शब्द इसी मूल से आ रहा है। विस्मरण क्रिया  का ही देशी रूप है बिसरना अर्थात भूलना। इसी तरह बना है बिसराना यानी भूलाना या भूल जाना। मराठी में इसी विस्मरण का रूप होता है विसरणें जिससे यहां और भी कई शब्द बने हैं।
स्मरण से ही बना है सुमिरनी शब्द। सुमिरनी यानी वह माला जिसमें मनका, मोती या रुद्राक्ष के दाने होते हैं। हिन्दू संस्कृति में 108 की संख्या का खास महत्व है। वैसे यह संख्या कुछ भी हो सकती है। सुमिरनी का उपयोग नाम स्मरण के लिए होता है। विश्व की कई प्राचीन संस्कृतियों में नाम स्मरण की परम्परा रही है। इस्लाम में भी नाम स्मरण का रिवाज़ है। सुमिरनी को अरबी में तस्बीह कहा जाता है। किसी शायर ने फ़रमाया है- मोहतसिब तस्बीह के दानों पे ये गिनता रहा/ किनने पी, किनने न पी, किन किन के आगे जाम था। परम्परा के अनुसार सुमिरनी को हाथ में पकड़ कर उस पर एक छोटी सफेद थैली डाल ली जाती है। तर्जनी उंगली और अंगूठे की मदद से नाम स्मरण करते हुए सुमिरनी के दानों को लगातार आगे बढ़ाया जाता है। सुमिरनी दरअसल एक उपकरण है जो नामस्मरण की आवृत्तियों का स्मरण भक्त को कराती है।
tasbihअंग्रेजी के मेमोरी शब्द का रिश्ता भी इस शब्द शृंखला से जुड़ता है।  हालाँकि डगलस हार्पर की एटिमॉनलाईन के मुताबिक मेमोरी शब्द का रिश्ता प्रोटो भारोपीय धातु *men-/*mon से  है जिसमें चिंतन या विचार का भाव निहित है। यह वही धातु है जिसकी रिश्तेदारी हिन्दी के मन और अंग्रेजी के mind से है। स्पष्ट है कि मन या माइंड में ही सोच, विचार या चिन्तन की प्रक्रिया सम्पन्न होती है। रामविलासजी के अनुसार स्मर् और मेमोरी एक ही मूल के हैं। मेमोरी यानी याददाश्त। पश्चिम की ओर गतिशील गण समाजों में स्मर् की ध्वनि का लोप हुआ और वर्ण विपर्यय के जरिए मेमोरी शब्द बना। संस्कृत में सोचने के लिए मन् धातु है और अन्तर्मन के रूम में मन के लिए मनस् है। दरअसल ध्यान, चिन्तन और मनन में प्रकाशवाची भाव है क्योंकि मनन चिन्तन दरअसल मन्थन की प्रक्रिया है और मन्थन के बाद प्रकटन, उद्घाटन होता है विचार का। इस प्रकटन में प्रकाशित होने का भाव प्रमुख है। इसीलिए चन्द्रमा के लिए संस्कृत में जो चन्द्रमस् शब्द है, इसका मस् में भी आधारभूत रूप में मन् ही है। प्रकाश, चमक या कान्ति का गुण ही चन्द्रमा में सौन्दर्य की स्थापना करता है।
डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार यह मन्स है। इससे जब का लोप हुआ तब जाकर मस् प्रचारित हुआ। ग्रीक मेनस् और मेने में विद्यमान है। इन सभी धातुओं के मूल में ध्वनि प्रमुख है जिसमें प्रकाशित होने के भाव का विस्तार चिन्तन से भी जुड़ता है और चमक से भी। मति, मत आदि भी इसी कड़ी में आते हैं। मन, मिन्, मेने, मेन्सिस जैसे अनेक रूप इन्हीं अर्थों में ग्रीक व लैटिन में हैं। यह तय है कि मन् का प्राचीन रूप मर् था। लैटिन के मैमॉर् अर्थात स्मृति में मर् के स्थान पर मॉर है। संस्कृत के स्मर, स्मरण, स्मृति में स-युक्त यही मर्  है। अंग्रेजी के मेमोरंडम शब्द का रिश्ता भी इसी मेमॉर से है जिसके लिए हिन्दी में स्मरणपत्र बनाया गया है। बुध के लिए मरकरी नाम में मर् की यही आभासिता प्रकाशमान है। गौरतलब है मरकरी के संस्कृत नाम बुध की मूल धातु बुध् है जिससे प्रकाश, ज्ञान, बुद्धि संबंधी शब्दावली के अनेक शब्द बने हैं। इस पर शब्दों का सफर की पिछली कड़ियों में लिखा जा चुका है।

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Wednesday, June 22, 2011

हाल कैसा है जनाब का….?

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हिए, क्या हाल हैं? अमूमन हर हिन्दीभाषी का एक दूसरे से संवाद इसी वाक्य से शुरू होता है। इसके जवाब में ज्यादातर लोग यही कहना चाहते हैं कि-हाल तो बेहाल हैं मगर शर्माशर्मी में "ठीक है" कहकर काम चला लेते हैं। चंद संतोषीजनों का जवाब कुछ यूँ होता है-जिस हाल में भी ऱखे है, ये बंदापरवरी है/ और यूँ भी वाह वाह है, और यूँ भी वाह वाह है। हिन्दी में हाल से अभिप्राय है परिस्थिति, अवस्था या दशा से। क्या हाल हैं में इन्ही सब बिन्दुओं के बारे में जानकारी लेने का भाव है। अवस्था के संदर्भ में हाल का भाव स्वास्थ्य से भी जुड़ता है। ग़ालिब साहब फ़र्माते हैं कि- उनके देखे से जो आजाती है मुँह पे रौनक / वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है। हिन्दी की खासियत है कि इसे बोलनेवाले जब दूसरी संस्कृतियों के सम्पर्क में आते हैं तो सबसे पहले वे नई भाषा से जुड़ते हैं। अरबी फारसी का हिन्दी पर बहुत प्रभाव है और हाल शब्द भी अरबी ज़बान से हिन्दी में आया है जो खूब इस्तेमाल होता है। प्रत्ययों और उपसर्गों के जरिए इससे बने शब्द भी खासी तादाद में प्रचलित हैं। फारसी के बद् या बे उपसर्गों के जरिए हाल से बेहाल, बदहाल जैसे शब्द भी बनते हैं जिनका अभिप्राय बुरी परिस्थिति या दुरवस्था से होता है। तंगहाली यानी ग़रीबी। यह हाल मुहावरों भी खूब इस्तेमाल होता है मसलन-वो हाल करेंगे कि याद रखोगे। क्या हाल कर दिया है। हाल-बेहाल हैं वगैरह वगैरह।

रबी का हाल-haal बना है सेमिटिक धातु hwl जिसमें बदलाव, परिवर्तन, अदलाबदली जैसे भावों के साथ साथ मंडल,  घेरा, परिधि, दायरा का आशय भी है। इसके अलावा इसमें वार्षिक चक्र की अर्थवत्ता भी समायी हुई है।  इसके अलावा इसमें हस्तक्षेप, अवरोध, प्रयास आदि आशय भी हैं। hwl से बने हाल शब्द में परिस्थिति, अवस्था या दशा का भाव है। यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी है कि इसमें अतीत से वर्तमान के बदलाव का भाव है अर्थात हाल क्या है में किसी वस्तु, मनुष्य या स्थान की अवस्था में आए परिवर्तन या बदलाव की बाबत जानने का भाव निहित है। आज हाल यह है कि हाल शब्द के विकल्प के तौर पर अधिकांश हिन्दीदाँ परिस्थिति, दशा या अवस्था का प्रयोग नहीं करते हैं। बोलचाल की हिन्दी में इन सभी शब्दों के विकल्प के तौर पर हाल शब्द को ही हरहाल में अपनाया गया है। हाल की कड़ी का दूसरा शब्द है हालत जिसका सीधा सा अर्थ भी दशा या परिस्थिति ही है। हालत का बहुवचन होता है हालात और यह शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है। अक्सर हिन्दी वाले हालत और हालात को एक ही मानते हूए हालात का भी बहुवचन हालातों के तौर पर करते हैं जो ग़लत है। हिन्दी-उर्दू के हवाला शब्द की रिश्तेदारी भी हाल से है जिसमें अदला-बदली, परिवर्तन जैसे भाव हैं।
रअसल हाल का ही एक रूप हवाल है जिसका फ़ारसी उर्दू रूप हवाला होता है। बिहारी की प्रसिद्ध पंक्ति-अलि कलि ही सो बिन्ध्यो, आगे कवन हवाल में इस हवाल की शिनाख्त हो रही है। गौरतलब है कि बिहारी ने यह पंक्ति क़रीब चार सदी पहले लिखी थी। हवाल का ही बहुवचन अहवाल है जिसका अर्थ होता है सूचना, समाचार, वृतांत रिपोर्ट आदि। गौरतलब है कि हवाल में जहाँ दशा, परिस्थिति का भाव है वहीं इसके बहुवचन अहवाल में सूचना, समाचार या वृतांत के भाव से स्पष्ट है कि कोई समाचार या सूचना दरअसल स्थान, वस्तु या व्यक्ति के बारे में किन्हीं परिवर्तनों या बदलाव के बारे में ही सूचित करती है। हवाल में निहित परिवर्तन का भाव बहुत व्यापक है और इसके अनेक मुहावरेदार प्रयोग हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे हवाले करना किसी के सिपुर्द करना। यहाँ परिवर्तन की बात स्पष्ट है। मराठी में रिपोर्ट के संदर्भ में अहवाल शब्द आमतौर पर चलता है। यूँ कहें कि सामान्य मराठीभाषी अहवाल शब्द से अरबी के जरिए नहीं बल्कि मराठी के जरिए ही परिचित है।
मौद्रिक लेनदेन के संदर्भ में हवाला कारोबार जैसी टर्म आज बहुत प्रचलित है। गैरकानूनी आर्थिक लेन-देन के संदर्भ में यह शब्द खूब सुनने को मिलता है। कालेधन को देश से बाहर भेजने में इसी हवाला व्यवस्था का सहारा कालाबाजारिए और जमाखोर लेते हैं। हवाला शब्द आज दुनियाभर में इसी अर्थ में इस्तेमाल होता है। वैसे लेन-देन की इस प्रणाली का जन्म भारत में ही  उस वक्त हुआ था जब आज की तरह बैंकिंग की नियमबद्ध कानूनी व्यवस्था अस्तित्व में नहीं थी। मुस्लिम दौर की प्रशासनिक व्यवस्था का एक आम हिस्सा था यह हवाला शब्द। हवलदार शब्द हिन्दी, मराठी, गुजराती जैसी भाषाओं में खूब प्रचलित है। आज की पुलिस व्यवस्था में भी कांस्टेबल को हवलदार कहा जाता है। पुराने ज़माने में हवलदार / हवालदार दरअसल शासन की ओर से नियुक्त कर वसूली करनेवाला कारिंदा या छोटा अफ़सर होता था। हवालदार उस फौजी अफ़सर को भी कहते थे जिसके सिपुर्द सिपाहियों की छोटी टुकड़ी होती थी। हवाला व्यवस्था में हवाला लेनदेन करानेवाला व्यक्ति हवालादार कहलाता है।
हाल या हवाल का रिश्ता अरबी की प्रसिद्ध उक्ति लाहौल विला कुव्वत से भी है। दरअसल यह इश्वर की प्रशंसा में कही गई उक्ति है जिसका उल्लेख कुर्आन के हदीस hadith में है। अरबी में इसका पूरा रूप है- ला हौल वा ला कुव्वता इल्ला बी अल्लाह। हिन्दी का ठेठ देसीपन इसमें भी घालमेल करता चलता है और इसका रूपांतर लाहोल बिला कूवत इल्ला बिल्ला हो जाता है। भाव यही है कि ईश्वर की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं हो सकता। न तो किसी चीज़ अपने आप सामर्थ्यवान हो सकती है और न ही उसका रूप बदल सकता है। इस सृष्टि में कोई भी हेर-फेर, परिवर्तन सिर्फ़ और सिर्फ़ खुदा की मर्ज़ी से ही हो सकता है। यहाँ जो ला हौल है दरअसल उसका रिश्ता ही हाल, हवाला आदि से है अर्थात कोई परिवर्तन नहीं हो सकता, ईश्वर की मर्जी के बिना। हाल दरअसल साधना की वह उच्चतम अवस्था भी है जिसे समाधि या ध्यान भी कहते हैं। सामान्य जागृत अवस्था की तुलना समाधि अवस्था अपने आप में एक परिवर्तन है। सूफ़ी दार्शनिक शब्दावली में यही हाल है अर्थात ध्यानावस्था या तंद्रा है जिसमें योगी सीधे ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करता है। इसे ही कहते हैं हाल आना अर्थात समाधिस्थ होना।

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Thursday, June 16, 2011

शब्दजन्मांच्या सुरस कथा

आंतरभारतीय
सुजय शास्त्री मुख्य उपसंपादक/ दिव्य मराठी
[ भास्कर समूह का मराठी मराठी अखबार दैनिक दिव्य मराठी महाराष्ट्र में लांच हो चुका है। प्रसिद्ध पत्रकार कुमार केतकर इसके प्रधान संपादक हैं। मेरा सौभाग्य कि राजेन्द्र माथुर, एसपी सिंह जैसे ख्यात संपादकों के साथ काम करने के बाद अब मुझे मराठी के सबसे बड़े नाम कुमारजी के साथ काम करने का मौका मिला है। शब्दों का सफर को कुमार जी ने भी सराहा है। दिव्य मराठी के रविवारीय परिशिष्ट रसिक में उन्होंने इस प्रयास के बारे में खासतौर पर एक आलेख प्रकासित किया। मूल मराठी आलेख सफ़र के पाठकों के लिए यहां पेश है। ]
का गज’ हा शब्द अनेकांना फारसी, उर्दू कुलातील वाटतो. पण त्याचे मूळ आहे ते चिनी भाषेतले. पोर्तुगीज पाणी भरण्याच्या भांड्याला ‘बाल्डे’ म्हणत. बंगाली भाषेने ‘बाल्डे’ला ‘बालटी’ म्हणून आपल्यात सामावून घेतले .नंतर हिंदीने ‘बालटी’ शब्द आहे तसा उचलला. हिंदी भाषक पत्रकार अजित वडनेरकर अशाच शब्द व्युत्पत्तींच्या शोधात गेली २५ वर्षे प्रवास करत आहेत...
राठीत ‘बादली’ हा शब्द आला तो हिंदीतील ‘बालटी’ या शब्दांतून. पण हिंदीत तो कसा आला? १६व्या शतकात पोर्तुगीज वसाहती बंगालमध्ये वसल्यानंतर ते पाणी भरण्याच्या भांड्याला ‘बाल्डे’ असे म्हणत. त्या काळात बंगाली भाषेने ‘बाल्डे’ला ‘बालटी’ म्हणून आपल्यात सामावून घेतले आणि नंतर हिंदीने ‘बालटी’ शब्द आहे तसा उचलला. अशीच कथा आहे महाभारतातील व्यक्तिरेखा अर्जुनाची आणि दक्षिण अमेरिकेतील देश अर्जेटिना यांच्यातील नामसाधर्म्याची. संस्कृतमध्ये चांदीला ‘रजत’ म्हणतात. तर प्राचीन इराणी अवेस्ता भाषेत त्याला ‘अर्जत’ म्हणतात. ग्रीक भाषेत चांदीला ‘अर्जाेस’, ‘अर्जुरोस’ व ‘अर्जुरोन’ म्हणतात. संस्कृतमध्ये ‘अर्जुन’ म्हणजे चमचमणारा. लॅटिनमध्ये ‘अर्जेंटम’ या शब्दाचा अर्थ चांदी आहे. १५व्या शतकात द. अमेरिकेत चांदीच्या खाणींचा शोध लागला, तेव्हा त्यावरून ‘अर्जेंटिना’ हे एका देशाचे नाव पडले. शब्द व्युत्पत्ती ही संस्कृत भाषेची परंपरा आहे. मराठीमध्ये कृ. पां. कुलकर्णी यांनी मराठी व्युत्पत्ती कोश संपादित केला आहे. शब्दांच्या जन्माच्या शोधात अनेक मनोरंजक सफरी घडतात. या प्रवासात भाषांवर झालेले संस्करण, त्यावर निसर्गासह राजकीय आक्रमणे, धार्मिक चालीरिती, रिवाज यांचा पडलेला प्रभाव आढळून येतो. अनेकदा आपण आपल्याच भाषेतला शब्द वेगळ्याच भाषेतून आल्याचे लक्षात येताच चकित होतो. मग शब्दाच्या व्युत्पत्तीविषयी वाचायला गेले, की हजारो वर्षांचा इतिहास डोळ्यांसमोर उलगडत जातो. हिंदी पत्रकार अजित वडनेरकर अशाच शब्द व्युत्पतींच्या शोधात गेली २५ वर्षे प्रवास करत आहेत. ‘ऋषीचे कूळ आणि शब्दांचे मूळ शोधू नये’ असे म्हणतात. पण वडनेरकरांनी याकडे साफ दुर्लक्ष करत १० ग्रंथांपैकी पहिला ग्रंथ ‘शब्दों का सफर’ या नावाने प्रसिद्ध केला आहे.
5 june rasikया ग्रंथात वडनेरकर पूर्व भारतातील भाषांपासून पश्चिम युरोपीय देशामधील भाषांचा वेध घेतात. हा वेध घेता-घेता त्यांनी काही वेळा सेमेटिक (प. आशिया आणि उ. आफ्रिकेतील) भाषांच्या खिडक्या किलकिल्या केल्या आहेत. तर गरज पडल्यावर चिनी भाषेतही डोकावून पाहिले आहे. पण वाचकांसमोर शब्दांची उत्पत्ती मांडताना त्यांनी कोणतीही कसूर ठेवलेली नाही. एकीकडे वाचकांची जिज्ञासा शमवण्याचा त्यांचा प्रयत्न आहे, पण त्याचबरोबर चाणाक्ष वाचकाला इतिहासाची शिदोरीही ते देतात. प्राचीन काळापासून व्यापाराच्या निमित्ताने विभिन्न देशांदरम्यान वस्तूंचे जेवढे आदान-प्रदान झालेले आहे, त्याच्या कित्येक पट शब्दांचा व्यापार झालेला आहे. व्यापाराच्या निमित्ताने हजारो ज्ञात-अज्ञात व्यापारी, फिरस्ते, दर्यावर्दींनी जगातील अनेक प्रदेश, भाषिक समूहांशी संपर्क साधला. या संपर्कातून त्यांनी आपली भाषा, संस्कृती, चालीरिती देऊ केल्या. अशा अनेक मुसाफिरांना लोक विसरले पण त्यांनी देऊ केलेली भाषा, शब्द मात्र तसेच राहिले. काही शब्द जेते-जिते संबंधांतून लादले गेले तर काही शब्द सहजपणे परक्या भाषेत सामावले गेले. शब्दांचा हा व्यापार आजच्या आधुनिक युगातही तसाच सुरू आहे. अजित वडनेरकर शब्दांच्या प्रवासाचा मोठा ऐतिहासिक दस्तावेज डोळ्यांसमोर उभा करतात. अगदी नेहमीचा हिंदी शब्द ‘कागज’ची व्युत्पत्ती ते अत्यंत मनोरंजकपणे आणि प्रसंगी धक्का देत सांगतात. ‘कागज’ हा शब्द अनेकांना फारसी, उर्दू कुलातील वाटतो. पण त्याचे मूळ आहे ते चिनी भाषेतले. इसवी सन पूर्व पहिल्या शतकात कागदाचा शोध चीनमध्ये लागला. कागदाला चिनी भाषेत ‘गू-झी’ व ‘कोग-द्ज’ असे दोन शब्द सापडतात. कागद निर्मितीचे तंत्रज्ञान गुप्त ठेवल्याने त्याची माहिती कित्येक शतके उर्वरित जगाला नव्हती. पण सातव्या-आठव्या शतकात उजबेकिस्तानमध्ये ‘कोग-द्ज’ हा शब्द तुर्कीत ‘काघिद’ म्हणून पोहोचला. नंतर अरबी, फारसी व उर्दूत तो ‘कागज’ झाला. भारतात मराठी, राजस्थानीत तो ‘कागद’, तर तामिळमध्ये ‘कागिदम्’, मल्याळममध्ये ‘कायितम्’ व कन्नडमध्ये ‘कायिता’ असा झाला.
‘शब्दों का सफर’ हा एका अर्थी विश्वकोश लेखनाच्या जवळ जाणारा ग्रंथ वाटतो. कारण या ग्रंथात प्रत्येक शब्द ‘प्रिझम’मधून पाहिल्यासारखा भासतो. शब्दाचा इतिहास, त्याचा देश, त्याची जातसंस्कृती, सामाजिकता, राजकीय इतिहास यांना स्पर्श करणारा हा व्यापक संग्रह आहे. अजित वडनेरकर मध्य प्रदेशचे असले तरी त्यांचे मूळ मराठी आहे. त्यांचा जन्म मध्य प्रदेशातील सिहोर येथे झाला. आजोबा पं. लक्ष्मणराव बुधकर व आई विजया वडनेरकर यांच्या प्रभावामुळे ते साहित्याकडे वळले. हिंदी साहित्यात एम.ए. करताना त्यांचा हिंदीतील श्रेष्ठ साहित्यिक व भाषातज्ज्ञ डॉ. सुरेश वर्मा यांच्याशी संपर्क आला. त्यांच्या मौल्यवान शिकवणुकीतून हा ग्रंथ साकार झाला आहे. आजूबाजूचे वातावरण हिंदी असले तरी त्यांच्या लिखाणात मराठीत सापडणारा विनोद आहे. या विनोदाच्या माध्यमातून त्यांनी अत्यंत रुक्ष वाटणाºया शब्दांचे कुळ अगदी सहजतेपणाने, सोप्या भाषेत, नर्म विनोदी शैलीत मांडले आहे. शब्दांची व्युत्पत्ती सांगण्याच्या ओघात ते ‘शाब्बाश’ या शब्दाचे कूळ इराणचा बादशहा ‘शाह अब्बास’ असे सांगतात तेव्हा हसू येते. तसेच ‘पायजमा’ हा शब्द शक राज्यकर्त्यांची देणगी आहे हे वाचल्यावर धक्का बसतो. तर ‘कमीज’ या शब्दाच्या मागे धावताना ते आपल्याला अरबस्तानातून ग्रीस, अल्बानिया, इजिप्त, नेपाळ, इंडोनेशिया, फ्रान्स, इंग्लंड अशा देशांची सफर घडवून आणतात. देश-विदेशाची सफर, त्यांचा इतिहास, रितीरिवाज, लोकसंस्कृती हे या ग्रंथाचे विशेष आहेत, पण शब्दाला सीमेची, संस्कृतीची, भाषेची बंधने नसतात हे ते ठासून सांगतात. शब्दांची सत्ता ही राजकीय सत्तेपेक्षा मोठी आहे. भाषेच्या शुद्धीकरणाच्या नावाखाली किंवा परकीय भाषेच्या आक्रमणाच्या नावाने गळा काढणाºया अनेकांना ते शब्दाचे सामर्थ्य सांगतात. भाषेमुळेच विविध मानवी समूहांमध्ये न तुटणारे संबंध निर्माण झाले आहेत, हे या ग्रंथामुळे लक्षात येते. 
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Tuesday, May 31, 2011

शब्दों के साथ संस्कृतियों का सफर

शब्दों का सफ़र की प्रस्तुत समीक्षा ख्यात कवि और वरिष्ठ पत्रकार अरुण आदित्य ने की है। अरुण जी अमर उजाला दैनिक में एडिटर मैगजींस हैं और दिल्ली में रहते हैं।
नुष्य जब एक जगह से दूसरी जगह जाता है तो अपने साथ शब्द भी ले जाता है | इस तरह मनुष्य के साथ-साथ शब्द भी देश-काल की यात्रा करते रहते हैं | दो भिन्न समाज जब एक दूसरे के संपर्क में आते हैं, तो खान-पान, रहन-सहन के साथ-साथ भाषा के स्तर पर भी एक दूसरे को प्रभावित करते हैं | इसी के चलते विभिन्न भाषाओं में अनेक ऐसे शब्द प्रचलन में आते हैं, जो ध्वनि और अर्थ के स्तर पर एक दूसरे से काफी समानता रखते हैं | पत्रकार अजित वडनेरकर ने अपनी पुस्तक 'शब्दों का सफर' में शब्दों के जन्मसूत्र से सेकर विभिन्न भाषाओं में उनकी यात्रा को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है |
जित बिल्कुल आम बोल चाल की भाषा में किसी एक शब्द को उठाते हैं, उसकी जन्मकथा बताते हैं| फिर अन्य भाषाओं में उस शब्द के भाव को व्यक्त करने वाले उससे मिलते-जुलते अन्य शब्द का संधान करते हैं और भाषा विज्ञान के सिद्धांतों का सहारा लेकर इन शब्दों के निर्माण की अंतर्प्रक्रिया का खुलासा करते हैं | जैसे बैंगन शब्द की यात्रा को देखिए - 'दुनिया भर की भाषाओं में बैंगन के लिए अलग-अलग रूप मिलते हैं, मगर ज्यादातर के मूल में संस्कृत शब्द वातिंगमः ही हैं संस्कृत से यह शब्द फारसी में बादिंजान बनकर पहुंचा, वहां से अरबी जुबान में इसका रूप हुआ अल-बादिंजान| अरबी के जरिए ये स्पेनी में अलबर्जेना हुआ, वहां से केटलान में ऑबरजीन और फिर अंग्रेजी में हुआ ब्रिंजल| अजित की इस किताब की एक विशिष्टता यह भी है कि वे पाठक को शब्दों के साथ सफर कराते-कराते विभिन्न संस्कृतियों की भी सैर करा देते हैं| मसलन ख्वाजा शब्द की व्याख्या करते हुए वे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और ख्वाजा नसरुद्दीन तक की अंतर्कथाएं भी बताते चलते हैं|
viewerविभिन्न भाषाओं के बीच एक्य की तलाश करते हुए वे बताते हैं कि संस्कृत का ऋषि किस तरह फारसी के रशद या रुश्द (जिसका अर्थ है सन्मार्ग, दीक्षा या गुरु की सीख) का भाईबंद है| रुश्द से ही बना है रशीद जिसका मतलब है ज्ञान पाने वाला | यही शब्द अरबी में जाकर मुर्शिद का रूप ले लेता है| शब्दों के जन्मसूत्र की तलाश मुख्यतः व्युत्पत्ति विज्ञान का विषय है, लेकिन अजित न सिर्फ भाषाविज्ञान की अन्य प्रशाखाओं को हिलाते-डुलाते हैं, बल्कि बात को सिरे चढाने के लिए अन्य विषयों का भी दरवाजा खटखटाने से गुरेज नहीं करते हैं | यही वजह है कि यह किताब आपको भाषाविज्ञान, समाजविज्ञान, भूगोल और इतिहास जैसे विविध विषयों से रूबरू कराती है | शाबाश की चर्चा करते हुए वे इतिहासकार की तरह ईरान के शाह अब्बास तक पहुंचते हैं, तो महिला और मेहतर जैसे शब्दों की व्याख्या करते हुए उनका समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण प्रमुखता से नजर आता है कि किस तरह एक ही धातु से बने ये दोनो शब्द कालांतर में अपनी महत्ता खो बैठे| दोनो ही शब्द मह धातु से बने हैं, जिसमें गुरुता का भाव हैं | एक ही धातु से उपजे ये दोनो महान शब्द विषमतामूलक-समाज व्यवस्था में इतने अवनत हुए कि अपना मूल अर्थ ही खो बैठे |
ब्द-दर-शब्द सफर करते हुए स्पष्ट होता है कि लेखक की दृष्टि बहुआयामी है और वह शब्दों के बहाने आपको बहुत कुछ दिखाना चाहता है | दरअसल अजित वडनेरकर इस प्रयास के जरिए दुनिया के विभिन्न मानव समूहों में सांस्कृतिक वैभिन्य के बीच एकता के सूत्रों की तलाश करते हैं | ख्यात कोशकार अरविंद कुमार ने बिल्कुल ठीक ही कहा है कि यह मानवता के विकास का महासफर है | गहन शोधपरक इस सफरनामे के पहले पडाव में ही अजित ने 52 किताबों, 49 वेब संदर्भों का हवाला दिया है | पर अजित की मेहनत इससे भी कहीं बहुत ज्यादा है | शोध और श्रम से तैयार यह किताब शोधकर्ताओं और आम पाठक के लिए समान रूप से उपयोगी है |

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Thursday, April 28, 2011

अबे ढक्कन! अड़ियल टट्टू!! उल्लू!!!

पिछली कड़ी-ढपोरशंख की पोल...brahmi9_cons

दे वनागरी के ढ वर्ण में निहित ढोल की पोल का भाव तो ढपोरशंख की विवेचना से कुछ स्पष्ट होता है, मगर इस “ढ” की महिमा ही कुछ ऐसी है कि मूर्खता, अपरिपक्वता, अज्ञानी जैसे भाव इसमें समाए हुए हैं। हमारे कहने का यह अर्थ कतई नहीं है प्रत्येक अक्षर या व्यंजन का एक विशिष्ट अर्थ भी होता है, फिर “ढ” के साथ ऐसा क्यों है, इसकी वजह दूसरी है। सबसे पहले देखते हैं ढ की अर्थवत्ता में समाए नकारात्मक भाव की व्याप्ति बोलचाल की हिन्दी में कितनी है। हिन्दी में आमतौर पर किसी व्यक्ति को मूर्ख या अज्ञानी कहने के लिए बीते कुछ दशकों से ढक्कन कहने का चलन बढ़ा है। व्यंग्यस्वरूप “ अबे ढक्कन ” जैसे संबोधन युवापीढ़ी को इस्तेमाल करते हुए सुना जा सकता है। यह ढक्कन दरअसल देवनागरी का ककहरा पढ़ाते वक्त अ-अमरूद का, आ-आम का और ढ-ढक्कन का से आ रहा है। किसी को बेवकूफ़ कहने के लिए अ से बने अमरूद का प्रयोग क्यों नहीं होता अर्थात अबे अमरूद ! या फिर अबे आम ! यह सम्मान सिर्फ़ “ढ”से बने ढक्कन के हिस्से क्यों आया? इसकी वजह ढक्कन शब्द नहीं बल्कि ढक्कन का “ढ” ही है।
मतौर पर माना जाता है कि परिवर्तन ही विकास का चिह्न है। मोटे तौर पर माना जा सकता है कि विकास का अर्थ परिवर्तन भी होता है। किसी व्यक्ति के सोचने-समझने के ढंग में बदलाव से ही उसके बौद्धिक विकास का पता चलता है। वक्त के साथ बदलाव ज़रूरी होता है। अगर कोई चीज़ अपरिवर्तनीय है तो इसका अर्थ यह है कि उसमें विकास की संभावना नहीं है। स्थावर या भौतिक पदार्थों के संदर्भ में यह तथ्य मज़बूती और स्थिरता जैसे गुणों के रूप में देखा जाता है मगर किसी मनुष्य का बौद्धिक विकास नहीं हो रहा है अर्थात उसकी समझ में बदलाव की गुंजाईश नहीं है तो यह माना जाता है कि वह या तो मंदबुद्धि है या मूर्ख है। ऐसे लोगों की एक किस्म को अड़ियल टट्टू भी कहा जाता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि मूर्खता के चिर सनातन प्रतीकों में परिंदों में उल्लू और चौपायों में गधे को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। उल्लू भी बिना पलक झपकाए एकटक ताकता रहता है। यह मूर्खता की निशानी है। इसीलिए मुहावरा बना है-घुग्घू की तरह ताकना। गधे की एक किस्म टट्टू होती है। यह कहीं भी अड़कर खड़ा हो जाता है, यह जानते हुए की इसके बाद धोबी उस पर डण्डे बरसाएगा।
हाराष्ट्र से सटते हिन्दी भाषी प्रदेशों में तो ढक्कन के स्थान पर सिर्फ़ “ढ” से भी काम चला लिया जाता है। मिसाल के तौर पर परीक्षा लगातार फेल होने वाले छात्र के लिए कहा जा सकता है कि वह तो पढ़ाई-लिखाई में शुरू से ही “ढ” है। मराठी में इस “ढ” की महिमा कहीं ज्यादा व्यापक है और अर्थपूर्ण है। मराठी में गधे को गाढव कहते हैं। गधा और गाढ़व दोनों के ही मूल में संस्कृत का गर्दभ है। गर्दभ > गढ्ढभ > गढ्ढअ > गधा और गर्दभ > गढ्ढभ > गढ्ढव > गाढव यह विकासक्रम रहा।“ढ” की महिमा समझाने के लिए मराठी लोकमानस ने इसी गाढव का सहारा लिया। मूर्ख के संदर्भ में मराठी मुहावरा है- गावातील “ढ” अर्थात गा और के बीच का “ढ”। किसी मूर्ख व्यक्ति को इंगित कर इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है कि फलाँ आदमी गावातील “ढ” है। यानी वह व्यक्ति तो गा और के बीच का “ढ” अर्थात मूर्ख है। इसका दूसरा अर्थ होता है कि फलाँ व्यक्ति तो गाढव यानी गधा है। सीधे सीधे उसे गधा न कह कर वक्रोक्ति का यह तरीका काफी दिलचस्प है। तीसरा अर्थ है गावातील अर्थात गाँव का “ढ” है अर्थात यह तो गाँव का गँवार है।
brahmi_consराठी की इस व्यापक अर्थवत्ता से भी “ढ” की पहेली नहीं सुलझती। इस पहेली का उत्तर मिलता है ब्राह्मी लिपि में। प्रसिद्ध प्राच्यविद्याओं के प्रसिद्ध विद्वान-भाषाविद् महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीरानंद ओझा ने ब्राह्मी लिपि का करीब सवासौ साल पहले व्यवस्थित अध्ययन कर उसे पढ़ने में सफलता प्राप्त की थी। गौरतलब है कि भारत की प्रचीनतम लिपियों में ब्राह्मी लिपि को विद्वानों ने एशिया की एक दर्जन से भी ज्यादा लिपियों की जननी बताया है। करीब ढाई से तीन हजार वर्ष पुरानी ब्राह्मी लिपि से ही देवनागरी का भी विकास हुआ। इस अवधि में ब्राह्मी के ध्वनिसंकेतों में बहुत बदलाव हुए किन्तु “ढ” अक्षर का रूप वही रहा जो अशोक के शिलालेखों में ढाई हजार साल पहले था। “ढ” वर्ण की बनावट में ढाई हजार वर्षों में भी बदलाव न होना एक अलग भाषा वैज्ञानिक अध्ययन का विषय है किन्तु अड़ियल, मूर्ख और ढीठ के चरित्र को व्यक्त करने के लिए विद्वानों को “ढ” से बढ़िया प्रतीक और क्या मिल सकता था? ब्राह्मी की वर्ण माला को देखें तो समझ में आता है कि ढ को छोड़कर प्रायः सभी ध्वनिसंकेतों की आकृतियों में भारी बदलाव आया, पर ढ जस का तस रहा। इसकी एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि प्रायः सभी आर्यभाषाओं में “ढ” व्यंजन का अत्यल्प प्रयोग होता है और संभवतः इसीलिए इस ध्वनिचिह्न में बदलाव की आवश्यकता कम पड़ी।
“ढ” से मूर्ख का रिश्ता महज़ संयोग नहीं है। मूर्ख शब्द के मूल में है संस्कृत का ‘मूढ’ शब्द। मूढ में निहित “ढ” को सहज ही पहचाना जा सकता है। मूढ बना है संस्कृत की मुह् धातु से जिससे हिन्दी के कई अन्य जाने पहचाने शब्द भी बने हैं जैसे मोहन, मोहिनी, मोहक, मोह, मोहाविष्ट आदि। आपटे कोश के मुताबिक मोह यानी किसी पर मुग्ध होना, जड़ होना, घबरा जाना या गलती करना आदि । इसके अलावा अज्ञान, भ्रान्ति, अविद्या, भूल होना जैसे अर्थ भी हैं । गौरतलब है कि मोह और मुग्ध और मूढ ये तीनों शब्द ही संस्कृत की मुह् धातु से बने हैं जिसमें ऊपर लिखे तमाम अर्थ निहित हैं और इससे स्पष्ट है कि विवेक, बुद्धि और ज्ञान के विपरीत अर्थ वाले भाव इनमें समाहित हैं। दिलचस्प बात यह कि उपरोक्त सभी भाव मूर्ख शब्द में समा गए हैं क्योंकि यह लफ्ज़ भी इसी धातु से निकला है जिसका अर्थ हुआ नासमझ, अज्ञानी और बेवकूफ। मुह् धातु में मूलत: चेतना पर किसी के प्रभाव में आकर ज्ञान अथवा बुद्धि पर परदा पड़ जाने अथवा ठगे से रह जाने, जड़ हो जाने, मूढ़ बन जाने का भाव है। यही बात मोह अथवा मुग्ध में हैं। नकारात्मक छाप के साथ मूर्ख शब्द भी यही कहता नज़र आता है। मूर्ख वह जो कुछ न समझे, जड़ हो। इसीलिए मूर्ख के साथ कई बार जड़बुद्धि , जड़मूर्ख या वज्रमूर्ख शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। अपनी सुंदरता के लिए पुराणों में मशहूर कामदेव का एक नाम है मुहिर पर मजे़दार बात यह भी कि इसका एक अन्य अर्थ बुद्धू और मूर्ख भी है। श्रीकृष्ण का मोहन नाम भी इसी से निकला है जाहिर है उनकी मोहिनी के आगे सब ठगे से रह जाते थे। इसके अलावा मुग्धा, मोहिनी, मोहित, मोहित जैसे नाम इसी से चले हैं। अब इस ठगा सा रह जाने वाले भाव की तुलना अड़ने, जड़ होने, स्थिर होने, बुद्धि पर परदा पड़ने, टट्टू की तरह अड़ने या उल्लू की तरह ताकने जैसे मुहावरों में निहित भावों से की जा सकती है और तब इस “ढ” की विविध रिश्तेदारियाँ उभरती हैं।

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Friday, April 15, 2011

ढपोरशंख की पोल...

MadLibsसंबंधित कड़ियां-1.भोंपू, ढिंढोरची और ढोल2.ढोल की पोल, नगाड़े की क्यों नहीं ?3.लाऊडस्पीकर और रावण4.मुनादी, एलान और घोषणा5.तूती तो बोलेगी, नक्कारखाने में नहीं....6.भांडाफोड़, भड़ैती और भिनभिनाना-2

पोरशंख हिन्दी का आम मुहावरा है और हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय समाज में आज भी इसका प्रयोग होता है। ढपोरशंख की निगाहबीनी करने से पहले ढोल की पोल कहावत को भी याद कर लेना चाहिए। गौर करें कि ढोल एक ऐसा वाद्य होता है जिसके दोनों सिरों पर चमड़ा मढ़ा होता है और इसे दोनों हाथों से बजाए जाने पर यह बहुत तेज़ आवाज़ करता है। ढोल की आकृति पर ध्यान दें। मूलतः यह अंदर से खोखला होता है। ढोल की पोल कहावत का अर्थ यह हुआ कि दिखने में बहुत बड़ा और तेज़ आवाज़वाला होने के बावजूद ढोल में भीतर कुछ भी ठोस नहीं है अर्थात वह भीतर से खोखला और पोला होता है। भाव यही है कि बाहरी प्रदर्शन और दिखावा करने से भीतरी खामियाँ दूर नहीं हो जातीं। ढोल बना है संस्कृत के ढौलः से। एक ही बात को बार बार दोहराने को ढोल-पीटना भी कहते हैं और इसे ढिंढोरा-पीटना पके अर्थ में भी प्रयोग किया जाता है। ढोल बजानेवाले को ढोली कहा जाता है। हिन्दू समाज में ढोली एक जाति भी होती है। यह एक श्रमजीवी तबका है जो पुराने वक्त से ही श्रीमंतों के यहां मांगलिक अवसरों पर मंगलध्वनि का काम करता रहा है अर्थात द्वाराचार के दौरान ढोल बजाना। इसके अलावा ये लोग कृषि कर्म व दस्तकारी की कला में भी प्रवीण होते हैं।
पोरशंख अर्थात वह व्यक्ति जो ऊँची ऊँची  हाँकने में माहिर है। क्षमता न होने के बावजूद बड़ी बड़ी बातें करना। बोलचाल में ये लोग “फैंकू” भी कहलाते हैं। मूर्खों की कई क़िस्में होती हैं, जिनमें से एक किस्म ढपोरशंख भी है। शब्दकोशों में इसका पर्याय गप्पी भी दिया है, पर गप्पी मूर्ख नहीं होता, हाँ कुछ गप्पी मूर्ख भी होते हैं। जानते हैं ढपोरशंख की व्युत्पत्ति क्या है, कौन हैं इसके कुनबे के जाने-अनजाने रिश्तेदार। दरअसल ढपोरशंख का शुद्ध रूप है ढपोलशङ्ख अर्थात ढपोलशंख। ढपोल शब्द का ही रूपान्तर ढपोर हो गया। वृहत् हिन्दी शब्दकोश के अनुसार ढपोल शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के दर्पवत् से हुई है। दर्पवत् में शंख जुड़ने से ढपोलशंख समास बनता है। दर्पवत् का प्राकृत रूप होता है दप्पुल्ल > दपुल्ल > दपोल > और फिर ढपोल यह रूपान्तर सामने आता है। इस तरह बनता है ढपोरशंख या ढपोलशंख। दर्पवत् शब्द के मायने हुए फूला हुआ। यूँ हिन्दी में संस्कृत के दर्प शब्द के मायने हैं घमण्ड, अभिमान, अहंकार। इससे पैदा होनेवाले अन्य दुर्गुणों का भाव भी इसमें समाहित है जैसे अक्खड़पन, उद्दण्डता आदि।
संस्कृत की दृप् धातु से बना है यह दर्प शब्द जिसमें एकतरफ़ जहाँ प्रकाशित करना, आलोकित करना जैसे भाव हैं तो साथ ही इनका विस्तार प्रज्वलित करना या सुलगाना भी है। दृप् का एक अन्य अर्थ है घमण्ड करना, अहंकार करना। संस्कृत के दर्प में इस तरह एक नया अर्थ भी जुड़ा अभिमान से फूलना, फैलना, चौड़ा होना। गौर करें इस चौडेपन के भाव पर। अभिमानी व्यक्ति खद को सिर्फ़ अपने ही आईने में देखता है, मन में निर्मित अपनी छवि पर वह मुग्ध होता है। जाहिर है, एक ही वक्त में वह दो छवियों को जीता है। इसी वजह से वह दर्पवत् अर्थात फूला रहता है। यहाँ फूलना में भौतिक आकार कम और हाव-भाव पर अधिक जोर है। काल्पनिक और प्रभावशाली छवि को वास्तविक जीवन में जीनेवाले व्यक्ति के हावभाव के लिए घमण्ड से फूलना जैसी उक्ति उभरती है। शीशा या आईना शब्द के लिए हिन्दी का दर्पण शब्द इसी दृप धातु से बने दर्प से बना है। वह वस्तु जिसमें छवि नज़र आती है अर्थात प्रकाशित होती है, आभासित होती है, दर्पण कहलाई। स्वयं की नज़रों में खुद को बड़ा समझने की बात यहाँ समझी जा सकती है।
शंख यूँ तो भारतीय संस्कृति में एक मांगलिक चिह्न है। यह एक प्राचीन वाद्य भी है जिसका प्रयोग विश्व की विभिन्न संस्कृतियों में होता रहा है। शंखनाद एक चिरपरिचित शब्द है जिसमें मुहावरे की अर्थवत्ता है। इसका अर्थ होता है किसी संकल्प की घोषणा, युद्ध की घोषणा आदि। शंख आकार में छोटा हो या बड़ा, उसकी मूल बनावट एक सी होती है अर्थात उसका मध्यांग बेहद फूला हुआ होता है जिसमें से होकर गूँजती हुई तेज़ आवाज निकलती है, मगर इस संरचना के भीतर सिर्फ खाली स्थान ही होता है। वही ढोल की पोल। मराठी में किसी शठ या मूर्ख व्यक्ति को भी शंख की उपमा दी जाती है अर्थात जो सिर्फ़ बातें करना जानता है, या जिसके भीतर दिमाग़ नहीं होता। स्पष्ट है कि ढपोरशंख ऐसा व्यक्ति है जो मूलतः अज्ञानी है, मगर ज्ञान बघारता नज़र आता है, जिसकी बातों में सार नहीं है, पर वह अंतहीन बोलता है। ऐसे व्यक्ति भी मूर्ख की श्रेणी में गिने जाते हैं।
अगली कड़ी में भी “ढ” महिमा

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Sunday, March 27, 2011

पापड़ बेलने की मशक्कत

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कि सी वृक्ष या शरीर के ऊपरी हिस्से के उस स्तर को परत कहते हैं जो सूखने के बाद अपने मूल आधार को छोड़ देता है। इसी परत को पपड़ी भी कहा जाता है। पपड़ी आमतौर पर किसी पदार्थ की अलग हो सकनेवाली ऊपरी परत के लिए प्रयुक्त शब्द है किन्तु सामान्य तौर पर कोई भी परत, पपड़ी हो सकती है। भूवैज्ञानिक नज़रिये से धरती के कई स्तर हैं। धरती के सबसे ऊपरी स्तर को भी पपड़ी कहा जाता है। पपड़ी से मिलता जुलता एक अन्य शब्द है पापड़। चटपटा-करारा मसालेदार पापड़ भूख बढ़ा देता है और हर भोजनथाल की शान है। पपड़ी पापड़ सरीखी भी होती है, मगर पापड़ पपड़ी नहीं है। अर्थात पापड़ किसी चीज़ की परत नहीं है। स्पष्ट है कि पपड़ी के रूपाकार और लक्षणों के आधार पर पपड़ीनुमा दिखनेवाले एक खाद्य पदार्थ को पापड़ कहा गया। चना, उड़द या मूँग की दाल के आटे से बनी लोई को बेलकर खास तरीके से बनाई अत्यंत पतली-महीन चपाती को पापड़ कहते हैं। पापड़ बनाने की प्रक्रिया बहुत बारीक, श्रमसाध्य और धैर्य की होती है इसीलिए हिन्दी को इसके जरिए पापड़ बेलना जैसा मुहावरा मिला जिसमें कठोर परिश्रम या कष्टसाध्य प्रयास का भाव है। किसी ने भारी मेहनत के बाद अगर कोई सफलता पाई है तो कहा जाता है कि इस काम के लिए उसे बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं। पापड़ में हालाँकि मशक्कत बहुत है और यह देश का यह प्रमुख कुटीर उद्योग है।
पड़ी और पापड़ शब्द का मूल एक ही है। संस्कृत के पर्पट, पर्पटक या पर्पटिका से पापड़ की व्युत्पत्ति मानी जाती है। हिन्दी समेत विभिन्न बोलियों में इसके मिलते-जुलते रूप मिलते हैं जैसे सिन्धी में यह पापड़ु है तो नेपाली में पापड़ो, गुजराती, हिन्दी, पंजाबी में यह पापड़ है। बंगाली में यह पापड़ी है। दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी इससे मिलते  जुलते नामों से इसे पहचाना जाता है। मलयालम में यह पापडम् pappadam है तो कन्नड़ में इसे हप्पाला happala है। तमिल में इसे अप्पलम और पप्पपतम् pappaṭam कहते हैं। तेलुगू में इसे अप्पादम कहते हैं। भारतीय भाषाओं में प्रचलित पापड़ के 19 तरह के नाम  विकीपीडिया में दर्ज हैं। मराठी में छोटे पापड़ को पापड़ी कहा जाता है। पापड़ हमेशा मसालेदार तीता ही नहीं होता बल्कि मीठा भी होता है। महाराष्ट्र मे चावल या अनाज के आटे से एक विशेष चपाती बनाई जाती है जिसे पापड़ी कहते हैं। इसकी एक किस्म को गूळपापड़ी भी कहते हैं। पपड़ी की व्युत्पत्ति पर्पटिका से ज्यादा तार्किक है। रोटी की ऊपरी परत को मराठी में पापुद्रा कहते हैं जिसमें आवरण, कवच, रक्षापरत का भाव है। यह पापुद्रा भी पर्पट का विकास है कुछ इस तरह-पर्पटिका > पप्पड़िआ > पापुद्रा आदि। इसी तरह पर्पटक > पप्पटक > पप्पड़अ > पापड़ के क्रम में हिन्दी व्यंजनों की शब्दावली में एक नया शब्द जुड़ा।
र्पटक के मूल में संस्कृत की पृ धातु है जिसमें रखना, आगे लाना, काम कराना, रक्षा करना, जीवित रखना, उन्नति करना, पूरा करना, उद्धार करना, निस्तार करना जैसे भाव हैं। ध्यान रहे देवनागरी के वर्ण में ही रक्षा, बचाव जैसे भाव हैं। इसके साथ का मेल होने से बना पृ। याद रहे देवनागरी का अक्षर दरअसल संस्कृत भाषा का एक मूल शब्द भी है जिसका अर्थ है जाना, पाना। जाहिर है किसी मार्ग पर चलकर कुछ पाने का भाव इसमें समाहित है। इसी तरह के मायने गति या वेग से चलना है जाहिर है मार्ग या राह का अर्थ भी इसमें छुपा है। ऋ की महिमा से कई इंडो यूरोपीय भाषाओं जैसे हिन्दी, उर्दू, फारसी
fafdaमालवा, निमाड़, गुजरात और महाराष्ट्र में एक से डेढ़ फुट लम्बा, और कुछ कुछ गोलाई लिए हुए एक व्यंजन का नाम भी फाफड़ा है जो इसी पापड़ का रिश्तेदार होता है।
अंग्रेजी, जर्मन वगैरह में दर्जनों ऐसे शब्दों का निर्माण हुआ जिन्हें बोलचाल की भाषा में रोजाना इस्तेमाल किया जाता है। में राह दिखाने, पथ प्रदर्शन का भाव भी है। इसी से बना है ऋत् जिसका अर्थ है घूमना। वृत्त, वृत्ताकार जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं। संस्कृत की ऋत् धातु से भी इसकी रिश्तेदारी है जिससे ऋतु शब्द बना है। गोलाई और घूमने का रिश्ता ऋतु से स्पष्ट है क्योंकि सभी ऋतुएं बारह महिनों के अंतराल पर खुद को दोहराती हैं अर्थात उनका पथ वृत्ताकार होता है। दोहराने की यह क्रिया ही आवृत्ति है जिसका अर्थ मुड़ना, लौटना, पलटना, प्रत्यावर्तन, चक्करखाना आदि है। खास बात यह कि किसी चीज़ को सुरक्षित रखने के लिए उसके इर्दगिर्द जो सुरक्षा का घेरा बनाया जाता है उसे भी आवरण कहते हैं। आवरण बना है वृ धातु से जिसमें सुरक्षा का भाव ही है।
सी तरह प में के मेल से पृ धातु बनी। इसमें प में निहित पालने पोसनेवाला अर्थ तो सुरक्षा से सबंद्ध है ही साथ ही इसके साथ ऋ में निहित चारों ओर से घिरे रहनेवाली सुरक्षा भाव भी पर्पट या पर्पटिका में जाहिर हो रहा है। पपड़ी मूलतः एक शल्क या छिलका ही होती है जिससे तने की या शरीर की सुरक्षा होती है। पपड़ी जैसा पदार्थ ही पापड़ है। मालवा, निमाड़, गुजरात और महाराष्ट्र में एक से डेढ़ फुट लम्बा, और कुछ कुछ गोलाई लिए हुए एक व्यंजन का नाम भी फाफड़ा है जो इसी पापड़ का रिश्तेदार होता है। मालवा में सेव-पपड़ी का भी खूब चलन है। हिन्दी शब्दसागर में पापड़ा या पापड़ी नाम के एक वृक्ष का भी उल्लेख है जो मध्यप्रदेश, बंगाल, मद्रास और पंजाब में होता है। इसकी पत्तियाँ खूब झड़ती है और इसकी खाल पीलापन लिए सफ़ेद होती है।

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Tuesday, March 22, 2011

कृति सम्मान की कुछ छवियाँ, कुछ बातें

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न दिनों शब्दों का सफ़र लगभग अनियमित है क्योंकि मैं सचमुच दूरियाँ नाप रहा हूँ। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के बीच। छह माह से यह क्रम जारी है। पहले सफ़र के पुस्तकाकार आने की तैयारी की व्यस्तता और अब दफ्तरी व्यवस्तता। छह साल के सतत सफ़र का प्रकाशित रूप सामने आया। किताब का विमोचन भोपाल में हुआ। सबने इसे सराहा। इस बीच पुस्तक के अगले खण्ड की पाण्डुलिपि के लिए राजकमल प्रकाशन का प्रतिष्ठित कृति सम्मान भी बीती अट्ठाईस फरवरी को मिला। कई साथियों को शिकायत थी कि इस आयोजन की विस्तार से ब्लॉगजगत में चर्चा नहीं हुई। अब इसके पीछे भी मेरी व्यस्तता ही वजह बनी। हालांकि कुछ अखबारों में इसके समाचार छपे। पुरस्कार के चयनकर्ताओं में ख्यात आलोचक नामवरसिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी और प्रसिद्ध कोशकार अरविन्द कुमार थे। नामवरसिंह का वक्तव्य तो जानकी पुल ब्लॉग पर एक अलग संदर्भ में प्रकाशित हो चुका है। बाकी दोनों महानुभावों के वक्तव्य हमें कल ही प्राप्त हुए हैं जिन्हें सफ़र के साथियों से यहाँ साझा कर रहा हूँ। नुक्कड़ पर श्री अविनाश वाचस्पति ने समारोह की चित्रमय झाँकी पहले ही दिखा दी है। उससे भी पहले महाखबर के जरिए इस सम्मान पर ही प्रश्न भी खड़े हो चुके थे। यहाँ पेश हैं चंद और छवियाँ-

 

002कमलकान्त बुधकर, हरिकृष्ण देवसरे, विभा देवसरे के साथ 020पल्लव बुधकर तस्वीर लेते हुए
028लेले साहब, अशोक वाजपेयी और कमलकान्त बुधकर 033ख्यात आलोचक विश्वनाथ मिश्र के साथ
037पंकज बिष्ट और राजेन्द्र यादव 056अशोक माहेश्वरी और नामवरसिंह के साथ
005कृति-पाण्डुलिपि  के साथ 014पल्लव बुधकर के साथ
151समारोह से पहले-त्रिवेणी सभागार, दिल्ली 046मंच पर....
060अपनी बात 040नामवरसिंह, अविनाश वाचस्पति और राजेन्द्र यादव
156समारोह से पहले गपशप 170अनामिका, कमलकान्त बुधकर, अनिता ताटके व विश्वनाथ त्रिपाठी
177विश्वनाथ त्रिपाठी, वसंत बुधकर व कमलकान्त बुधकर 164रवीन्द्र शाह, नीलाभ मिश्र, मैत्रेयी पुष्पा व अन्य
उपन्यास का आनंद है सफ़र में
मैं श्री अजित वडनेरकर की पुस्तक शब्दों का सफर हाथ में आते ही उसे रुचिपूर्वक पढ़ गया। पुस्तक यद्यपि भाषा शास्त्र से सम्बन्धित है लेकिन पढ़ने में उपन्यास का आनन्द देती है। कहते हैं कि सच्चा ज्ञान आनन्द के द्वारा प्राप्त होता है। इस पुस्तक के पाठक भी मनोरंजन और कथा रस के आस्वाद की प्रक्रिया से ज्ञान-लाभ करेंगे। ऐसी पठनीय पुस्तकें आए दिन पढ़ने को नहीं मिलती जिसमें इतने सहज और अनायास पाठकों को जानकारी काखजाना मिले और यह समझने का मौका मिले कि भाषा में देश जाति धर्म आदि का बन्धन नहीं रहता। और वे मुक्त भाव से परस्पर आदान-प्रदान करते हुए विकसित और समृद्ध होती हैं। हमारी भाषा हिन्दी भी इसी प्रक्रिया से फलती-फूलती हुई हमें प्राप्त हुई हैं। शब्दों का सफर निःसन्देह एक उल्लेखनीय प्रकाशित पुस्तक है जो पाठकों को पसन्द आएगी।
-विश्वनाथ त्रिपाठी
अपने से लगते हैं वडनेरकर
ब से पहले राजकमल पुरस्कार पाने पर भाई अजित वडनेरकर को बधाई। मैंने अजित को कभी देखा नहीं है, लेकिन वह बहुत जाने-पहचाने से, अपने से लगते हैं। कारण हिन्दी विमर्श पर उनका शब्दों कासफर मैं नियमित पढ़ता रहा हूं। उनकी हर मेल अपने कम्प्यूटर पर सेव कर के संजो कर रखता रहा हूं। नम्बर दो पर - राजकमल प्रकाशन के अशोकजी को बधाई कि उन्हें अजित की किताब छापने को मिली। साथ ही धन्यवाद भी कि उन्होंने यह किताब छापी। छापी में कोई अनोखपन नहीं है। अब तक जितना मैंने उन्हें जाना है। उनकी नज़र बढ़ी पारखी है। वह देखते ही ताड़ लेते हैं कि असली माल कहां है। उनके पास शब्दों कासफर कैसे पहुंची यह मैं तो नहीं जानता, लेकिन उसमें भरे असली माल को पहचानने में देर नहीं लगी।
प्रसंगवश एक और उदाहरण। 1990 के आसपास हंस पत्रिकामें शब्दों पर मेरी लेखमाला छप रही थी। एक सुबह एक अनजान नौजवान मेरे घर आ पहुंचा, मेरी आने वाली किताब को छापने काप्रस्ताव लिए। तब उसके पास लगभग कुछ नहीं था। बस भविष्य था। वह था। अशोक माहेश्वरी। मैंने उससे वादा किया कि पूरा होने पर मेरा कोश उसे मिलेगा। ऐसा नहीं हुआ इसके कारण विचित्र थे। यह सबूत है कि अशोक दूर तक देख पाते हैं।
कुछ ऐसा ही गुण अजित वडनेरकर में भी है। वह दूर तक देख पाते हैं। न केवल भविष्य में बल्कि भूत में भी। एक संस्कृति से दूसरी तक शब्दों का सफर में। पता नहीं कैसे वह इतनी गहराई से देख पाते हैं। फिर इस सफर काबयान हाल बेहद आसान भाषा में रोचक तरीके से, कमाल है। आप लोग कई जाने-माने विदेशी कोश देखिए। कई में शब्दों के बारे में अलग से बॉक्स बना होता है। अजित उन से आगे, बहुत आगे जाते हैं। व्युत्पति बताते हैं, कई देशों, समाजों में कोई शब्द कैसे पहुंचा, बदला, रंगा, संवरा सब दिखाते हैं। कुल तीन-चार हद से हद पांच-छह पैरों में। पाठक के ऊबने से पहले विदा हो जाते हैं। जाते-जाते शब्दों में पैठने की हमारी रुचि, हमारी तमन्ना जगा जाते हैं।
उन के शब्दों के सफर केतीन खण्ड तैयार हैं। ऐसा मुझे बताया गया है। पर मैं कल्पना कर सकता हूं की उनके पास अभी और तीस खण्डों का मसाला तैयार होने को होगा। मैं उन सब लोगों को, जिन्हें हिन्दी डूबती नज़र आती है और आप सबको आश्वस्त करना चाहता हूं, भरोसा दिलाना चाहता हूं कि मेरा दावा 125 प्रतिशत सही निकलेगा कि 2050 तक हिन्दी संसार कीसमृद्धतम भाषा में होगी। आंखें खोलकर देखिए, हिन्दी पढ़ने वाले बढ़ रहे हैं, हिन्दी वालों के पास पैसा बढ़ रहा है। हाल ही में मुझे पता चला कि अकेले एक प्रमुख हिन्दी दैनिक के पास देशभर में फैला पांच हजार कम्प्यूटर से जुड़ा पत्रकारों कामहाजाल है। आज कम से कम 50 हजार हिन्दी पत्रकार तो हैं ही, पांच लाख भी हो सकते हैं। और लेखक गांव-गांव में, अनजाने अनचीन्हे लोग हिन्दी लिखने में लगे हैं। अन्त में बस इतना ही... हिन्दी रुकेगी नहीं, बढ़ती रहेगी। अजित वडनेरकर और उन की यह किताब इस बात काएक और सबूत है। दूसरा सबूत है राजकमल कीयह पुरस्कार योजना। मुझे भरोसा है, और आप को भी यह भरोसा दिलाता हूं कि धीरे-धीरे अशोक माहेश्वरी इस पुरस्कार को हिन्दी कानहीं भारत का सबसे बड़ा अवॉर्ड बनाकर रहेंगे। हिन्दी के और भारत के बढ़ते रहने का यह दूसरा सबूत होगा।
-अरविन्द कुमार, 26 फरवरी, 2011

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Wednesday, March 9, 2011

भाड़े की देन हैं भड़ुआ और भाड़ू

pimp016संबंधित पोस्ट-मियां करे दलाली, ऊपर से दलील!![मध्यस्थ-2]

देशज बोलियों में ऐसे कई आम शब्द हैं जिनका इस्तेमाल बोलचाल की हिन्दी में अशोभनीय माना जाता है। ऐसे कई शब्द गाली समझे जाते हैं। हालाँकि इन शब्दों के मूल में किसी तरह का अशोभनीय संकेत नहीं होता है। ऐसा ही एक शब्द है भाड़ू। परिनिष्ठित हिन्दी में यह शब्द निषिद्ध है किन्दु आंचलिक बोलियों में इसका खूब प्रयोग होता है साथ ही बोलचाल की ज़बान में भी यह ज़िन्दा है। गली मोहल्लों में आज भी ठसके से लोग इसका प्रयोग करते हैं। हालाँकि भाड़ू शब्द की अर्थवत्ता विशाल है मगर इसका इस्तेमाल बहुत सीमित अर्थ में किया जाता है। भाड़ू का आज सीधा सा अर्थ है वेश्या की कमाई खानेवाला यानी दलाल या दल्ला। भाड़ू वह भी है जो रूपजीवाओं का सौदा कराता है और उसके बदले में पैसे लेता है। इसी तरह भाड़ू उसे भी कहते हैं जो अपने घर की स्त्रियाँ किसी ओर को उपभोग के लिए सौंपता है और बदले में कोई राशि प्राप्त करता ।
लाली या कमीशन पर पलते व्यक्ति को समाज में हमेशा ही नीची निगाह से देखा जाता है। इस नज़रिये से देखें तो भाड़ू का रिश्ता स्त्री, वेश्या अथवा देहव्यापार से बाद में जुड़ता है, सबसे पहले आता है कमीशन, दलाली या किराया। भाड़ू शब्द बना है भाड़ा शब्द से जिसका अर्थ है किराया। भाड़ा शब्द बना है संस्कृत के भाटकः से जिसका रूपान्तर भाटक > भाड़अ > भाड़ा हुआ। भाड़े पर काम करनेवाले के अर्थ में हिन्दी में एक अन्य शब्द भी प्रचलित है-भाड़ैती या भाड़ौती मगर इसकी अर्थवत्ता में नकारात्मक कुछ नहीं है। मराठी में तो किराएदार के लिए भाड़ैती शब्द प्रचलित है। दरअसल दलाली या कमीशनखोर के अर्थ में ही भाड़ा से बने भाड़ शब्द में जब खाऊ प्रत्यय लगा तब इसकी अर्थवत्ता बदली। भाड़खाऊ > भाड़ऊ > भाड़ऊ > भाड़ू कुछ इस क्रम में भाड़खाऊ से भाड़ू का विकास हुआ है।
राठी और हिन्दी दोनों में ही भाड़खाऊ शब्द चलता था, अब सिर्फ़ भाड़ू रह गया है। इसी शृंखला का शब्द है भड़वा या भड़ुआ जो भाड़ू या भाड़खाऊ से हटकर घोषित गाली है और इसका अर्थ रण्डी का दलाल ही होता है। दलाली या कमीशनखोरी के दायरे में देखें तो कोई नेता, कमीशनएजेंट, आयकर-विक्रयकर सलाहकार, हथियारों का दलाल, किसी चेन से जुड़े सभी डॉक्टर, अध्यापक, पत्रकार, वकील सब भाड़ू हैं क्योंकि किसी न किसी स्तर पर ये सब दलाली कर रहे हैं, दलाली कमा रहे हैं और दलाली खा रहे हैं। मगर इन्हें भाड़ू कहा नहीं जा सकता। भाटक शब्द से और भी कई शब्द बने हैं जैसे भू-भाटक अर्थात ज़मीन का किराया अथवा ज़मीन का सालाना लगान। भाटक से बना है मराठी का भाटि शब्द जिसका अर्थ स्पष्टतः व्यभिचार का पैसा है।

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Friday, March 4, 2011

तस्करी यानी चोर की जोरू!!!

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हि न्दी में तस्करी शब्द बहुत आम है जिसका अर्थ है चोरी-छिपे या गैरक़ानूनी तरीके से सामान इधर से उधर भेजना। इसमें प्रतिबंधित सामान भी शामिल है और ऐसा सामान भी जिसके परिवहन पर सरकारी शुल्क का भुगतान बकाया हो और बिना शुल्क चुकाए उसे इधर से उधर भेजा जा रहा हो। प्रतिबंधित वस्तुओं का व्यापार या चोरी छिपे इधर से उधर भेजना भी तस्करी में शामिल होता है। तस्करी शब्द बना है तस्कर से जो मूलतः संस्कृत से हिन्दी में आया है। इसका सामान्य सा अर्थ है चोर जबकि तस्कर शब्द सुनते ही दिमाग़ में अंग्रेजी का स्मगलर शब्द घुमने-फिरने लगता है। वैसे स्मगलर शब्द भी अब हिन्दी में आमतौर पर इस्तेमाल होता है।
स्कर शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में विद्वान एकमत नहीं है। आप्टे कोश के मुताबिक तस्कर शब्द के मायने हैं चोर, लुटेरा आदि। आप्टे के मुताबिक तस्कर की व्युत्पत्ति है- (तद् + कृ + अच्, सुट्, दलोपः) जबकि अमरकोश के मुताबिक इसकी व्युत्पत्ति “तत् करोति इति अच्, सुट्तलोपौ च” बताई गई है। ऑर्थर एंथोनी मैकडॉनेल के शब्दकोश में भी तस्कर के बारे में यही कहा गया है। कृ.पा.कुलकर्णी के कोश में तत् + कर इसकी व्युत्पत्ति बताई गई है साथ ही यह भी कहा गया है कि पाणिनी सूत्र के अनुसार यहाँ त का लोप होकर स का आगम होता है। इस तरह तस्कर शब्द बना। कुलकर्णी को यह व्युत्पत्ति स्वीकार नहीं है। उनके मुताबिक ठक्कर, ठाकर या ठाकरले जैसे शब्दों से तस्कर शब्द का कुछ न कुछ संबंध होना चाहिए।
मारे विचार में मोनियर विलियम्स के कोश में तस् धातु का उल्लेख है जिसमें धुंधलाने, कम होने, मुरझाने, गायब होने, नष्ट होने जैसे भाव हैं। स्पष्ट है कि यहाँ किसी चीज़ के लोप होने या मिटने का भाव ही उभर रहा है। तस् से अगर तस्कर की व्युत्पत्ति पर विचार करें तो बात कुछ आसान होती लगती है। वस्तुओं के चोरी जाने का संदर्भ उनके मूल स्थान से लोप होने से जुड़ता है। यूँ भी माल गायब करना, माल उड़ाना यानी चोरी करना जैसे मुहावरों में लोप का यह भाव उजागर हो रहा है। तस्कर का एक अर्थ छुईमुई या पीले फूलों वाला एक पेड़ भी है। हिन्दी शब्दसागर में इसे मैनफल या मदनवृक्ष कहा गया है। हिन्दी मे चाहे तस्कर का क्रिया रूप तस्करी बना लिया गया है मगर संस्कृत में तस्करी का अर्थ है चोर की बीवी। जाहिर है यहाँ तस्कर का स्त्रीवाची तस्करी है। तस्कर अगर चोर है तो तस्करी उसकी बीवी। यही नहीं, चोरनी या स्त्री ठग को भी तस्करी के दायरे में रखा जा सकता है।
रतितस्कर वह है जो किसी स्त्री से रति का आनंद छीन ले। यहाँ भाव बलात्कार से है। इसी तरह नवनीततस्कर अर्थात वह जो दही को चुराए। जाहिर सी बात है यह कृष्ण का विशेषण हुआ।
इस ढंग से सोचें तो नौकर की बीवी को नौकरी नौकरी कहा जा सकता है। शब्दसांगर में वृहत्संहिता के हवाले से यह भी पता चलता है कि तस्कर केतुओं का नाम भी है जो लंबे और सफेद होते हैं और इनकी 51 हैं। केतु बुध के पुत्र माने जाते हैं।
स्कर से तस्करता, तस्करवृत्ति, तस्करी, तस्करत्व जैसे शब्द भी बने हैं मगर इनका चलन हिन्दी में नहीं होता है। तस्कर का एक अर्थ कान भी होता है सो तस्करता के मायने हुए सुनना। किसी की जेब से बटुआ उड़ाने जैसा काम भी तस्करता की श्रेणी में ही आता है। हालाँकि आज के संदर्भ में उसे तस्करी नहीं कहा जाएगा बल्कि पॉकेटमारी, जेबतराशी आदि कहा जाएगा। यूँ देखा जाए तो तस्करी शब्द संस्कृत में खूब इस्तेमाल होता रहा है। संस्कृत में रतितस्कर या नवनीततस्कर जैसे शब्द के जरिए इसकी अर्थवत्ता का अंदाज़ा लगता है। रतितस्कर वह है जो किसी स्त्री से रति का आनंद छीन ले। यहाँ भाव बलात्कार से है। इसी तरह नवनीततस्कर अर्थात वह जो दही को चुराए। जाहिर सी बात है यह कृष्ण का विशेषण हुआ। इन तमाम अर्थों का सादृश्य तस्कर के आज प्रचलित अर्थ से मेल नहीं खाता। प्राचीनकाल में तस्कर सिर्फ एक सामान्य चोर भर है जबकि आज तस्कर का दर्जा चोर से कुछ ऊंचा है। चोर जहाँ सिर्फ़ माल को चुराता है वहीं तस्कर करों की अदायगी से बचने और प्रतिबंधित सामग्री के व्यापार के लिए उसका परिवहन करता है।

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Wednesday, March 2, 2011

बेपेंदी का लोटा और लोटा-परेड

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र्तन भाण्डों में लोटा एक ऐसा पात्र है जो पुराने ज़माने से ही बहुउपयोगी है। लोटा दरअसल धातु से बना ऐसा पात्र है जो घड़े जैसा दिखता है मगर आकार में उससे बेहद छोटा होता है। लोटा कलसी से छोटा पात्र है। लोटा का भी एक छोटा रूप होता है-लुटिया जो प्रायः वृद्धों के हाथों में होती है। पुराने ज़माने जब उनके हाथों से यह लुटिया पानी में डूब जाती थी तो मानो मुश्किलों की शुरुआत ही हो जाती थी। वानप्रस्थी हो या सन्यासी, पानी की लुटिया सबके लिए ज़रूरी थी। दिशा मैदान यानी प्रातःकालीन संस्कारों से लेकर सन्ध्यावंदन के समय तक यह लुटिया जीवनसंगिनी की तरह न जाने कितने कर्तव्य निभाती थी। सुबह का मुख प्रक्षालन, स्नान, जाप, सूर्य को अर्घ्य, कलेवा के वक्त यज्ञोपवीत के कर्तव्य। फिर सन्ध्यावन्दन आदि। अब स्नान के वक्त कुएं या नदी में जिसकी लुटिया डूबी, समझो उस पर तो आफ़त का पहाड़ टूट पड़ता था। इसीलिए सर्वनाश, नुकसान आदि के अर्थ में लुटिया डूबना जैसा मुहावरा आज तक प्रचलित है।
 लोटा शब्द की व्युत्पत्ति कुछ लोग संस्कृत की लुट् धातु से जोड़ते हैं जिसमें लोटना, लुढ़कना जैसे भाव शामिल हैं। लुट् धातु में मूलतः प्रतिकार या प्रतिरोध मूलक भाव हैं जिसका अर्थ मुकाबला करना, पीछे धकेलना है। इससे मिलती जुलती धातु है लुठ् जिसमें स्पष्टतः प्रहार के साथ पछाड़ने का भाव है। यहाँ साफ हो रहा है कि प्रतिस्पर्धी को धराशायी कराने की क्रिया प्रमुख है। धराशायी होना अर्थात भूमि पर लोट-पोट होना। लुठ् से ही लुठनम् बना है जिसका अर्थ है लोटना, लोटा हुआ आदि। लुट्, लुठ् के बाद लुड् धातु भी है जिसमें भी मूलतः गोलगोल घूमने का भाव ही है मगर इसकी क्रिया लोड़न अर्थात विलोड़न की है जैसे दही बिलोना। बेपेंदी का लोटा जैसी कहावत पर अगर गौर करें और लुट् में निहित लुढ़कने की क्रिया को महत्वपूर्ण मानें तो लुट् से लोटा की व्युत्पत्ति सही नज़र आती है। हालाँकि एक पात्र के रूप में विचार करने पर लुट् से लोटा के जन्मसूत्र की कल्पना गले नहीं उतरती। लोटा एक पात्र है जिसमें किसी तरल को आश्रय पाना है। लोटे के लुढ़कने से बर्तन के रूप में लोटा अपने इस्तेमाल की गुणवत्ता पर सौ फ़ीसद खरा नहीं उतरता। दूसरी बात, लोटा ही क्यों, प्राचीनकाल में अधिकांश बर्तन जैसे बटलोई, देगची, कढ़ाही, घड़ा, मटका आदि बेपेंदी के ही होते थे। तब इन सबको भी लोटा ही कहा जाना चाहिए था। मगर इनके लिए अलग अलग नाम प्रचलित हुए।
कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश के अनुसार मराठी के लोटा या लोटके जैसे शब्दों की व्युत्पत्ति संस्कृत के लोष्ट से हुई है। आपटे कोश के अनुसार लोष्ट् क्रिया का अर्थ है ढेर लगा, अंबार लगाना। इसी तरह लोष्टु का अर्थ है ढेला, मिट्टी का लौंदा। स्पष्ट है कि ये दोनों ही अर्थ लोटा शब्द से ध्वनिसाम्य तो बना रहे हैं, मगर इससे अर्थस्थापना नहीं होती। लोटा महज़ एक ढेर या लौंदा नहीं है। अगर कल्पना करें कि यहाँ अभिप्राय कुम्हार के चाक पर रखे मिट्टी के उस लौंदे से है जिससे लोटा गढ़ा जाना है, तब भी कुछ सिद्ध नहीं होता क्योंकि लोष्ट से लोटा बनने की क्रिया दरअसल मिट्टी से पात्र बनने की क्रिया है। तब लोष्ट के भौतिक रूपान्तर को भी लोष्ट ही कहना तार्किक नहीं लगता। दूसरी खास बात यह भी कि लोटा हमेशा धातु का ही बनता रहा है, मिट्टी का नहीं। बड़े बड़े घड़े ज़रूर मिट्टी के बनते रहे। बात दरअसल यह थी कि बड़े घड़े तो पानी के स्थायी इंतजाम के लिए थे, जिन्हें साथ लेकर चलना नहीं पड़ता था। इसके विपरीत साथ ले जानेवाले छोटे पात्र के रूप में धातु के लोटे इसलिए उपयोगी थे क्योंकि लगातार गतिशील रहते मनुष्य के साथ इनके साथ टूट-फूट का खतरा नहीं था।
राठी के विद्वान द.ता. भौंसले लोटा के मराठी रूप लोटका की व्युत्पत्ति के संदर्भ में कन्नड़ भाषा के लोटो का उल्लेख किया है, मगर यह स्पष्ट नहीं है कि कन्नड़ का लोटो कहाँ से आया। हालाँकि भौंसले लोटा शब्द की व्युत्पत्ति लौहघट से बताते हैं मगर उस पर कन्नड़ के लोटो को वरीयता देते हैं। उनका मत है कि लौहघट में तो सभी तरह के धातु के बर्तन आ जाते हैं। हमारा मानना है कि यह कमजोर तर्क है। लौहघट में लोटा की व्युत्पत्ति के अर्थसाम्य और ध्वनिसाम्य वाले उपकरण भी काम कर रहे हैं साथ ही यह व्युत्पत्ति तार्किक भी है। लौहघट में लोटे के घट की आकृति का ब्योरा छुपा है। लोटे से जुड़े भी कुछ मुहावरे हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे बेपेंदी का लोटा यानी अस्थिर चित्त व्यक्ति। अपने मत पर दृढ़ न रहनेवाले शख्स के लिए यह मुहावरा अक्सर सुना जाता है। लोटा थाली बिकना एक ऐसा मुहावरा है जिसमें निर्धनता और दारिद्र्य का भाव है। सीधी सी बात है। न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य को दो वक्त का भोजन चाहिए और इस इच्छा की पूर्ति के लिए लोटा-थाली की ज़रूरत पड़ती है। यही मनुष्य की सर्वाधिक ज़रूरी निजी सम्पत्ति भी कहलाती है। अगर धन की व्यवस्था के लिए भोजन और दैनन्दिन कर्म से जुड़े ये उपकरण भी बिक जाएं तो निश्चित ही दुर्भाग्य के बादल उस व्यक्ति को निर्धन बनाने के लिए उमड़ पड़े हैं। पेचिश या दस्त लगने के संदर्भ में भी यही लोटा मरीज को तक़लीफ़ का नाम लेने से उबारता है। समझदार लोगों ने दस्त लगने के  संदर्भ में लोटा-परेड उक्ति बना कर दस्त शब्द के प्रयोग से मुक्ति पा ली। दस्त पेचिश के शिकार व्यक्ति को  बार बार हाज़त होने की अभिव्यक्ति लोटा-परेड में बखूबी हो रही है। 

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