Wednesday, January 2, 2008

बहुत कुछ है हिन्दू सभ्यता में ...

आदर्श हिन्दू उस चूहे की तरह होगा...दिलीप मंडल का एक विचारणीय लेख है जो मौहल्ला पर प्रकाशित हुआ है। इस आलेख की अंतिम पंक्तियां कुछ सवाल खड़े करती हैं, देखें -
विधवा विवाह का निषेध, अंतर्जातीय विवाह पर पाबंदी और रक्त शुद्धता की अवधारणा, अस्पृश्यता, कर्म और जाति का संबंध यानी हर जाति के लिए खास कर्म का प्रावधान, बेटी का पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार का निषेध, कर्मकांड की प्रधानता, वैश्यों, शूद्रों और अंत्यजों के साथ औरतों की अवमानना - क्या इन सारे तत्वों को निकाल देने के बाद भी हिंदू सभ्यता में कुछ बचता है?


इन नकारात्मक तत्वों के होने मात्र से क्या हिन्दुत्व या हिन्दू संस्कृति की पहचान कायम है ? चौथी सदी में भारत आए पहले चीनी यात्री फाह्यान और उसके बाद ह्वेनसांग, सुंगयुन जैसे दो दर्जन से भी ज्यादा पौर्वात्य देशों के अध्येताओं की भारत यात्राएं इस महादेश की किन खूबियों के चलते हुईं? धर्म, राजनीति , संस्कृति-समाज, कृषि, उद्योग , चिकित्सा आदि क्षेत्रों में संचित ज्ञान का उद्गम कभी यही भूक्षेत्र था। यहां जन्में बौद्धधर्म के सहारे भारतीय (हिन्दू!)सभ्यता के न जाने कितने संस्कार जाने-अनजाने दुनियाभर में प्रचलित हो गए। करबद्ध नमस्कार उनमें से एक है। यही नहीं ,इस्लामी पूजा पद्धति नमाज़ शब्द के मूल में भी इसी नमस्कार में निहित नम् यानि शीश झुकाने वाला भाव शामिल है। देखें।
भारतीय हिन्दू समाज की कुरीतियां समय समय पर ताकतवर वर्ग द्वारा समाज को अपने अनुरूप चलाने के प्रयासों या किन्हीं व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप का नतीजा थीं। ताकतवर वर्ग कहीं कसर नहीं छोड़ता है। जाहिर है कि राज्यसत्ता द्वारा नियमबाधित करने से लेकर लिखित एवं मौखिक धार्मिक विधि-विधानों में इनका पालन सुनिश्चित करवाने की चेष्टाएं इस वर्ग ने की और इसके प्रमाण अतीत में साफ नज़र आती है।समाज के अन्य वर्ग इसे मानने को बाध्य क्यों हुए इसके मूल में भी कहीं न कहीं हिन्दू सोच रही है।

हिन्दू विचार पद्धति सत्ता मात्र के प्रति उदार है क्योंकि उसके द्वारा ईश्वर खुद को व्यक्त कर सकता है।
(श्रीकृष्ण वेंकटेश पुणतांबेकर-एशिया की विकासोन्मुख एकता)

बस, इसी के चलते ही वैदिक युग में उदारवादी सोच के तहत प्रकृति को परम सत्ता माना गया और उसे बचाए रखने के लिए तरह तरह के प्रबोधन मनीषियों ने रचे। बाद के दौर में प्रकृति से हटकर अन्य सत्ता केन्द्र के रूप में ईश्वर का आविष्कार हुआ। फिर ईश्वर के प्रतिनिधि के तौर पर समय समय पर धर्माचार्य और शासक समेत अन्य ताकतवर तबके सत्ता सुख लेते रहे। जाति व्यवस्था के मूल में ये बाते हैं। कर्मआधारित समाज को सीधे सीधे जाति आधारित समाज मामानने का कोई अर्थ नहीं है। घृणित जातीय व्यवस्था तो आक्रमणों के दौर में पनपी है, जब समाज को उस दौर के झंझावात ने हर तरह की चेतना से वंचित रखा। ज्ञान तक को सीमित कर दिया गया।

अलबत्ता भारतीयता (प्रकारांतर से हिन्दुत्व ) की पहचान की बात की जाए तो इस महादेश ने कभी किसी एक चुने हुए ईश्वर, एक चुनी हुई जाति, एक चुनी हुई व्यवस्था और एक चुनी हुई जीवनचर्या में विश्वास रखने जैसी कट्टरता नहीं दिखाई है।
सुदूर पूर्व से पश्चिम तक ईसा से भी सदियों पहले से भारतीयों के रिश्ते क्या साबित करते हैं? आठवीं सदी में बल्ख बुखारा के विहारों में निवास करने वाले बौद्ध श्रमणों के प्रसिद्ध परिवार परमकों का जिक्र है। वहां जब बौद्धों का दमन हुआ तो इन पारमिको नें इस्लाम कुबूल किया और बरमक कहलाए। अपने संचित ज्ञान के आधार पर ही वे ख़लीफा हारूं अल रशीद के दरबार में वजीर के ओहदे तक पहुंचे।
इससे भी सदियों पहले ईरान के अग्निपूजकों द्वारा मगध के पुरोहितों को सूर्योपासना पद्धतियों के प्रचार प्रसार के लिए ईरान बुलवाना और वहां बसाना क्या जाहिर करता है ? इतिहास में उल्लेख है कि ये मग पुरोहित ही पश्चिमी इतिहास में मागी के रूप में दर्ज है। इसी शब्द से बाद में मैजिक या मैजिशियन शब्द भी बने।
पुत्री को पितृसंपत्ति से दाय की व्यवस्था हिन्दू धर्मशास्त्रों में रही है। बात वही ताकतवर वर्ग की आती है जिसने तमाम षड्यंत्रों के साथ सत्ता की भागीदारी में बहुजन समाज को ज्ञान से वंचित रखा। धर्म को समझने लायक ज्ञान अगर बहुजन समाज में आ जाए तब आज की ज्यादातर समस्याएं सुलझ जाएं। इन हालात में कल्पना करें कि देश के कितने मुस्लिम हैं जो कुरआन को पढ़ना जानते हैं। उसकी व्याख्या के लिए वे मौलवी ( जो सत्ता का प्रतीक है ) पर निर्भर न रहें तो बेहतर होगा मगर क्या ऐसा हो पा रहा है ? अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

छमक छल्लो और छैल चिकनिया [ छवि-2]

( संदर्भ के लिए कृपया पिछली पोस्ट ज़रूर पढ़ें। )
छैल छबीला, छैला, छैल बिहारी जैसे शब्दों की कड़ी में ही आता है एक और शब्द छमक छल्लो। छबीली, नखराली और नाजों-अंदाज वाली महिला के लिए छमक छल्लो शब्द की उत्पत्ति भी इसी
छवि > छइल्ल > छल्लो वाले क्रम से हुई है। बस, इसमें घुँघरू की छम-छम और जुड़ गई है। इस छम-छम से जो नाज़ो-अंदाज पैदा हो रहा है उसे किसी व्याख्या की ज़रूरत नहीं है।

चिकना, चॉकलेटी, प्लेबॉय

बदलते वक्त में छबीला या छैल छबीला जैसे शब्दों के साथ कुछ नकारात्मक भाव भी जुड़े और पुरुषों में कमनीयता, स्त्रैणता जैसे अर्थ भी इसमें समाहित हो गए। दरअसल यह हुआ एक अन्य शब्द के जन्म से। पूरबी हिन्दी में छैल-छबीला जैसा ही एक और शब्द प्रचलित है -छैल चिकनिया। इस शब्द का अर्थ भी सजीला, बना-ठना रहने वाला बांका जवान ही होता है। बस, चिकनिया शब्द उसमे इसलिए जुड़ गया क्यों कि सजीला दिखने के लिए क्लीन शेव्ड दिखना ज़रूरी है। अब दाढ़ी -मूंछ में मर्दानगी तलाशने वाले समाज में क्लीन-शेव्ड लोगों को हिकारत से तो देखा जाना ही था। कुलीनों की बात अलग थी, मगर आम समाज में उन्हें चिकनिया कहा जाने लगा। चिकनिया या चिकना शब्द बना है संस्कृत के चिक्कण से जिसका मतलब चमक, स्निग्ध, चर्बीला है। आज भी हिन्दी में चाकलेटी हीरो के लिए मुंबईया ज़बान में चिकना शब्द खूब सुनने को मिलता है। । आमतौर पर अंग्रेजी में जिस पुरूष को चाकलेट या चाकलेटी या प्लेबॉय कहा जाता है छैल-छबीला कुछ इन्हीं अर्थों में प्रचलन में आया था। हिन्दी के यशस्वी साहित्यकार पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र ने एक उपन्यास लिखा था चाकलेट। इसे अश्लील माना गया था । बताया जाता है कि गांधीजी ने भी इसे पढ़ा और उन्हें कहना पड़ा कि इसमें कुछ भी अश्लील नहीं है।

आपकी चिट्ठिया

नए साल के शुभारंभ पर लिखी पोस्ट बारिश के मौसम में आया नया साल पर कई साथियों की शुभकामनाएं मिलीं। सर्वश्री विजयशंकर, नीरज गोस्वामी, महर्षि, रजनी भार्गव, ज्ञानदत्त पाण्डेय , डिवाइन इंडिया , अफलातून, संजय, दर्द हिन्दुस्तानी, महावीर , लावण्या , प्रत्यक्षा , संजीत, मीनाक्षी और विमल वर्मा का हम शुक्रिया अदा करते हैं हौसला अफजाई और नए साल की बधाई के लिए । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, January 1, 2008

छैलाबाबू और छबीली नार [छवि-1]

भाषा मे विविधता या लालित्य लाने के लिए समाज में अपने आप प्रयोग होते हैं जो प्रचलन बन जाते है। इन शब्दों की पड़ताल करें तो पाएंगे कि जैसे एक ही चेहरे में कई भाव समाए होते है वैसे ही एक ही शब्द से बने शब्दों के भी कई रूप होते हैं। सफर की इस कड़ी में परखते हैं शब्दों की ऐसी ही छवि को। छैला, छैल-छबीला, छैल बिहारी, छैलाबाबू, जैसे शब्दों के मूल में आखिर है क्या....

छवि में समायी राजनीति

संस्कृत का एक शब्द है छवि जिसे बोलचाल की हिन्दी में भी खूब समझा जाता है। यह एक शृंगारिक शब्द है और ज्यादातर काव्य में प्रयुक्त होता आया है। इसका अर्थ होता है रूप, सुंदरता, चमक आदि। मध्यकालीन कवियों जैसे सूर,तुलसी , मीरा आदि ने न जाने शृंगार और वात्सल्य के प्रसंगों में इस शब्द का प्रयोग किया है। मगर दिलचस्प बात यह कि बोलचाल की हिन्दी में किसी के रूप की प्रशंसा में इस शब्द का प्रयोग कम और राजनीतिक रूप की चर्चा में ज्यादा होता है, मसलन राजनीतिक छवि । यह एक मुहावरा सा बन चुका है। छवि बना है संस्कृत की धातु छो से जिसका मतलब होता है अंश या खंड। छो से ही बने हैं छाया अथवा छवि जैसे शब्द । इसका अर्थ होता है रंग-रूप, चेहरे की आभा, कांति, चमक, सौन्दर्य आदि। इसी तरह छाया का अर्थ होता है प्रतबिंब, अक्स, समरूप आदि। इसके अतिरिक्त छवि शब्द में निहित रंगरूप और चमक जैसे भाव भी इसमें शामिल हैं। गौर करें कि प्रतिबिंब या अक्स मूल वस्तु या आकृति का खंड या अंश जैसा ही होता है इसलिए इसकी मूल धातु छो में निहित भाव एकदम साफ है।

छैलाबाबू, छैलबिहारी

बांके-सजीले युवा अथवा युवती के लिए हिन्दी में छैल-छबीलाया छैल-छबीली जैसे शब्द कहावत की तरह इस्तेमाल होते आए हैं। मज़े की बात यह कि छैल और छबीला ये दोनों ही
शब्द छवि से ही बने हैं। संस्कृत से प्राकृत में क्रमशः छवि > छइल्ल > छइल्लो > छैला के रूप में ढल गया। इसी तरह छवि से छबि रूप बना और फिर उससेछबीला या छबीली जैसे रूप विकसित हो गए। ये शब्द दशकों पहले तक समाज में खूब लोकप्रिय थे। गौर करें महारानी लक्ष्मीबाई का नाम छबीली ही था। छबीली अर्थात् रूपवती। सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी कविता में लिखा है-

कानपुर के नाना की
मुँहबोली बहन छबीली थी
लक्ष्मीबाई नाम , पिता की
वह संतान अकेली थी


छबीला शब्द ऐसे नौजवानों के लिए इस्तेमाल होता था जो न सिर्फ रूपवान थे बल्कि चुस्त, खुशमिजाज़, रसिक बातूनी और खूब बन-ठनकर रहने के आदि होते थे। तो इन्हीं गुणों के आधार पर हिन्दी के शब्द भंडार को समाज ने एक नया शब्द दे दिया छैल-छबीला । छैलाबाबू जैसे शब्द भी चल पड़े। भगवान श्रीकृष्ण के लिए भी छैलबिहारी शब्द कहा जाता है। ....अगले पड़ाव पर भी जारी अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, December 31, 2007

बारिश के मौसम में आया नया साल

शब्दों के सफर में मेरे सभी हमराहियों को नए साल की शुभकामनाएं ...
कण-कण में समृद्धि मिले, क्षण-क्षण में मंगल हो...

नया साल, नववर्ष या नवसंवत्सर ऐसे शब्द हैं जिन्हें हर बरस दुहराने का मौका मिल जाता है। वर्ष शब्द का जन्म संस्कृत के वर्ष: या वर्षम् से हुआ। इन दोनों शब्दो का अर्थ है बरसात, बौछार या मेघवृष्टि।
जीवेत् शरदः शतम्
शरद ऋतु को भी प्राचीनकाल में साल से जोड़कर देखा जाता था। शरद का अर्थ संस्कृत में पतझड़ के अलावा वर्ष भी है। प्रसिद्ध वैदिक उक्ति जीवेत् शरद: शतम् में सौ बरस जीने की बात ही कही गई है। ऋतुबोध से कालगणना का एक और उदाहरण हेमन्त से मिलता है जिसका मतलब है जाड़े का मौसम। यह बना हिम् या हेम् से जिसका अर्थ ही ठंडक या बर्फ है। वैदिक युग में वर्ष के अर्थ में हिम् शब्द भी प्रयोग में लाया जाता था। संस्कृत उक्ति-शतम् हिमा: यही कहती है। लेकिन वर्ष, संवत्सर और बरस से भी ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द है साल जो हिन्दी में खूब इस्तेमाल किया जाता है पर हिन्दी का नहीं है। साल शब्द फारसी से हिन्दी -उर्दू में आया जिसका अर्थ पुरानी फारसी में जो बीत गया था। फारसी में इसका अर्थ वर्ष ही है और इससे बने सालगिरह-सालाना जैसे लफ्ज खूब बोले जाते हैं।
संवत् , संवत्सर, नवसंवत्सर
उर्दू-हिन्दी में प्रचलित बच्चा संस्कृत के वत्स से ही बना है जिसके मायने हैं शिशु। वत्स के बच्चा या बछड़ा बनने का क्रम कुछ यूं रहा है-वत्स>वच्च>बच्च>बच्चा या फिर वत्स>वच्छ>बच्छ>बछड़ा। संस्कृत का वत्स भी मूल रूप से वत्सर: से बना है जिसका अर्थ है वर्ष, भगवान विष्णु या फाल्गुन माह। इस वत्सर: में ही सं उपसर्ग लग जाने से बनता है संवत्सर शब्द जिसका मतलब भी वर्ष या साल ही है। नवसंवत्सर भी नए साल के अर्थ में बन गया। संवत्सर का ही एक रूप संवत् भी है।
नए साल का वात्सल्य
वत्सर: से वत्स की उत्पत्ति के मूल में जो भाव छुपा है वह एकदम साफ है। बात यह है
कि वैदिक युग में वत्स उस शिशु को कहते थे जो वर्षभर का हो चुका हो। जाहिर है कि बाद के दौर में (प्राकृत-अपभ्रंश काल) में नादान, अनुभवहीन, कमउम्र अथवा वर्षभर से ज्यादा आयु के किसी भी बालक के लिए वत्स या बच्चा शब्द चलन में आ गया। यही नहीं मनुश्य के अलावा गाय–भैंस के बच्चों के लिए भी बच्छ, बछड़ा, बाछा, बछरू, बछेड़ा जैसे शब्द प्रचलित हो गए। ये तमाम शब्द हिन्दी समेत ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मालवी आदि भाषाओं में खूब चलते है। फारसी में भी बच्च: या बच: लफ्ज के मायने नाबालिग, शिशु, या अबोध ही होता है। ये सभी शब्द वत्सर: की श्रृंखला से जुड़े हैं। इन सभी शब्दों में जो स्नेह-दुलार-लाड़ का भाव छुपा है, दरअसल वही वात्सल्य है।
आपकी चिट्ठी

सफर के पिछले पड़ावों -डंडे का धर्म और धर्म का दंड व डंडापरेड,दंडवत की महिमा पर संजय , अशोक पांडे,ज्ञानदत्त पांडेय ,मीनाक्षी और दिनेशराय द्विवेदी की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 30, 2007

डंडे का धर्म और धर्म का दंड

दंड धारण करने वाले सन्यासी को दंडीस्वामी कहा जाता है। दंड धारण करने की परंपरा प्रायः दशनामी सन्यासियों में प्रचलित है। शंकराचार्य परंपरा के ध्वजवाहक मठाधीश भी दंडधारण करते है। प्राचीन धर्मशास्त्र मे दंड का महत्व इतना अधिक था कि मनुस्मृति में तो दंड को देवता के रूप में बताया गया है। एक श्लोक है-
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।।

( दंड ही शासन करता है। दंड ही रक्षा करता है। जब सब सोते रहते हैं तो दंड ही जागता है। बुद्धिमानों ने दंड को ही धर्म कहा है।)
राजनीतिशास्त्र का ही दूसरा नाम दंडनीति भी है। पुराणों में उल्लेख है कि अराजकतापूर्ण काल मे ही देवताओं के आग्रह पर ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों वाला दंडनीति शास्त्र रच डाला था।
दंड और डंडे की तरह ही लाठी शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है लाठी का मतलब है बांस की लंबी लकड़ी जो चलने के लिए सहारे का काम करे या हथियार के रूप में काम आए। मुहावरा भी है कि बुढ़ापे की लाठी होना। गौर करें की दण्ड का निर्माण प्राचीनकाल से आज तक ज्यादातर बांस से ही किया जाता रहा है। साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे मुहावरा भी खूब मशहूर है।
यही लाठी शब्द बना है संस्कृत के यष्टिः या यष्टी से जिसका मतलब होता है झंडे का डंडा, सोटा, गदा, शाखा या टहनी आदि। इससे बने यष्टिका का प्राकृत रूप हुआ लट्ठिआ जो लाठी में बदल गया । लाठी के यष्टि रूप से बना एक शब्द हम खूब परिचित हैं वह है देहयष्टि । कदकाठी के अर्थ में देहयष्टि शब्द प्रयोग में भी लाया जाता है। संस्कृत मूल से जन्मे लाठी शब्द से अंग्रेजी राज में एक नया शब्द जन्मा लाठीचार्ज। यह आज भी पुलिसिया जुल्म के तौर पर ही जब-तब सामने आता है।
डंडे से बना डंड बैठक शब्द व्यायाम के अर्थ में प्रयुक्त होता है उसी तरह उत्साह, खुशी आदि के प्रदर्शन के लिए बांसों उछलना या बल्लियों उछलना जैसे मुहावरा भी आम है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 28, 2007

पिंजरे में मुनिया

आज से एक सदी से भी पहले जनाब अकबर इलाहाबादी साहब ने
उस दौर की राजनीति का एक दृष्य लिखा था । देखें , कि आज के दौर
से मिलती-जुलती सी लगती है या नहीं वो सूरत ।


मुंशी कि क्लर्क या ज़मींदार
लाज़िम है कलेक्टरी का दीदार

हंगामा ये वोट का फ़क़त है
मतलूब हरेक से दस्तख़त है

हर सिम्त मची हुई है हलचल
हर दर पे शोर है कि चल-चल

टमटम हों कि गाड़ियां कि मोटर
जिस पर देको, लदे हैं वोटर

शाही वो है या पयंबरी है
आखिर क्या शै ये मेंबरी है

नेटिव है नमूद ही का मुहताज
कौंसिल तो उनकी है जिनका है राज

कहते जाते हैं, या इलाही
सोशल हालत की है तबाही

हम लोग जो इसमें फंस रहे हैं
अगियार भी दिल में हंस रहे हैं

दरअसल न दीन है न दुनिया
पिंजरे में फुदक रही है मुनिया

स्कीम का झूलना वो झूलें
लेकिन ये क्यों अपनी राह भूलें

क़ौम के दिल में खोट है पैदा
अच्छे अच्छे हैं वोट के शैदा

क्यो नहीं पड़ता अक्ल का साया
इसको समझें फ़र्जे-किफ़ाया

भाई-भाई में हाथापाई
सेल्फ़ गवर्नमेंट आगे आई

पांव का होश अब फ़िक्र न सर की
वोट की धुन में बन गए फिरकी

-अकबर इलाहाबादी(1.दर्शन.2.वांछित.3.तरफ.4.पैगंबरी.5.वस्तु.6.सामने आना.7.गैर लोग.8.दीवाने.9.किफ़ायत का फ़र्ज़) अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, December 27, 2007

हूर और मुहावरा - एक जड़, दो शाखाएँ

दो जुदा शब्दों की रिश्तेदारी

भाषा की दुनिया रहस्यों और आश्चर्यों से भरी है। पहली नज़र में, 'मुहावरा', जो हमारी रोज़मर्रा की बातचीत और साहित्यिक अभिव्यक्ति का एक अभिन्न अंग है, और 'हूर', जो पारलौकिक सौंदर्य और धार्मिक कल्पनाओं से जुड़ा एक शब्द है, के बीच कोई भी संबंध खोजना असंभव सा लगता है। एक का संबंध भाषा की विशिष्ट शैली से है, तो दूसरे का संबंध स्वर्ग की अलौकिक परिकल्पना से। लेकिन दोनों का डीएनए एक है यानी एक तीन अक्षरों वाला क्रियापद ह-व-र यानी अरबी में हा-वाव-रा /  ح -و-ر । अरबी क्रियापद ह-व-र के बुनियादे मायने हैं 'लौटना', 'मुड़ना', 'चक्कर लगाना' या 'वापस आना'। इससे ही आगे और भी अर्थ विकसित हुए। इस धातु का केंद्रीय भाव 'वापस आने' या 'लौटने' की क्रिया से जुड़ा है।


लौटने की अवधारणा

ध्यान रहे, ह-व-र गतिवाची क्रिया है जिसमें किसी बिंदु से शुरू होकर वापस उसी बिंदु पर लौटने की बात है। जैसे एक वृत्ताकार परिपथ पर चलते हुए फिर से उसी बिंदु पर लौटना या सतत गतिशील रहना। आसानी के लिए हम कह सकते हैं कि किसी विचार विमर्श में अथवा बातचीत के कई दौरों के मूल विषय की बात है। चर्चा या संवाद में बार बार मूल मुद्दे पर लौटना होता है। एक शब्द है राऊंड टेबल कान्फ्रेंस। इसमें न सिर्फ़ किसी गोल टेबल के इर्द-गिर्द बैठ कर मन्त्रणा करने का भाव है बल्कि उस विषय पर कई दौर (राऊंड) की चर्चा का आशय भी निहित है। ध्यान रहे, दौर, दौरान शब्द भी किसी निश्चित कालअवधि की बात करते हैं। जैसे एक घंटे की चर्चा। एक वर्ष की घटनाएँ। एक दशक के प्रयास अथवा एक सदी का आंदोलन। 

 

'संवाद' या मुद्दे की बात

धातु ह व र ح-و-ر से विकसित प्रमुख आशय मानवीय संवाद और भाषा से है। यहाँ 'लौटने' या 'मुड़ने' की भौतिक क्रिया एक शक्तिशाली रूपक में बदल जाती है। जब दो या दो से अधिक लोग बात करते हैं, तो विचारों का, भाषा का, शब्दों का, व्यंजना का आदान-प्रदान होता है। यह भाषा और विचार का मुड़ना और लौटना है। इसी वैचारिक आदान-प्रदान ने ह-व-र क्रियापद से हावर शब्द बना जिसमें 'किसी से बात करना' या 'संवाद करना' जैसे आशय थे। इसी क्रिया से मुहावरा जैसी संज्ञा बनी, जिसका सीधा अर्थ है 'संवाद', 'वार्तालाप' या 'बहस' । क़ुरान में भी संवाद के लिए इसी जड़ से बने शब्दों का प्रयोग हुआ है, जैसे तहावुर (तहव्वुर) जिसका अर्थ 'बहस' या 'संवाद' है और  युहाविर  जिसका अर्थ है 'संवाद करना'।


'आम बोलचाल' से 'विशिष्ट प्रयोग' तक

हिन्दी में 'मुहावरा' शब्द फ़ारसी भाषा के माध्यम से आया, जिसने इसके अर्थ में एक नया आयाम जोड़ा। फ़ारसी ने अरबी के  मुहावरा को तो अपनाया मगर फ़ारसी की भाषिक संस्कृति में मुहावरे का अर्थ विस्तार हो गया और इसमें वाक्-व्यवहार, आम बोलचाल, अथवा व्यंजनापूर्ण शैली का आशय समाने लगा जो आगे चलकर आज वाले मुहावरे के तौर पर रूढ़ हो गया। इसमें शैली भी है, प्रयोग भी है, आदत या अभ्यास भी है, रफ़अत भी है, व्यंजना भी है और इडिअम वाली बात भी है।  यह एक स्वाभाविक विकास था। जैसे हम कहें कि आजकल हिन्दी में अरबी-फ़ारसी का मुहावरा छूट रहा है। यहाँ सिर्फ़ यही आशय है कि हिन्दी में अरबी-फ़ारसी शब्द कम बरते जा रहे हैं, न कि 'idiom' का प्रयोग कम होने की बात है।


लाक्षणिक अर्थ की पराकाष्ठा

आज हम 'मुहावरा' को एक ऐसे वाक्यांश के रूप में जानते हैं जिसका अर्थ उसके शब्दों के शाब्दिक अर्थ से भिन्न, यानी लाक्षणिक होता है। उदाहरण के लिए, 'लाठी खाना' का अर्थ लाठी को भोजन के रूप में ग्रहण करना नहीं, बल्कि 'लाठी का प्रहार सहना' है । इसी तरह 'गुल खिलाना' का अर्थ फूल उगाना नहीं, बल्कि 'कोई उपद्रव करना' है। ध्यान से देखें तो, इन सभी प्रयोगों में शब्द अपने शाब्दिक अर्थ से 'मुड़ गए' हैं या 'हट गए' हैं। इस प्रकार, 'मुहावरा' शब्द का मूल अर्थ ('मुड़ना' या 'लौटना') उसके आधुनिक पारिभाषिक अर्थ की सटीक व्याख्या करता है। यह भाषा के विकास का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसी तरह किसी लेखक की भाषा या शब्द प्रयोग की शैली भी मुहावरेदारी कहलाती है। तो मुहावरा शब्द का अर्थक्षेत्र व्यापक है, मगर हिन्दी में अब इसका आशय सिर्फ़ व्यंजना अथवा इडिअम ही रह गया है।


पवित्रता: सफ़ेदी से सौंदर्य तक

अब हम ح-و-ر (ह-व-र) धातु से निकली दूसरी शाखा की ओर बढ़ते हैं, जो संवाद और भाषा से बिल्कुल अलग, पवित्रता और सौंदर्य की दुनिया में ले जाती है। यह वैचारिक छलांग जितनी अप्रत्याशित है, उतनी ही तर्कसंगत भी है। 'लौटने' की अवधारणा को जब कपड़ों की धुलाई पर लागू किया जाए, तो इसका अर्थ हुआ उन्हें उनकी मूल स्वच्छ अवस्था में 'वापस लाना'। इस प्रक्रिया के कारण ह-व-र में 'स्वच्छता', 'पवित्रता' और परिणामस्वरूप 'श्वेत' या 'धवल' वाले भाव भी समा गए । तो स्वच्छता, पवित्रता का विस्तार आगे चलकर अध्यात्म और अंततः सौंदर्य की अवधारणा तक पहुँचा।


'हूर' की वैश्विक यात्रा

स्वच्छता और सफ़ेदी की इसी अवधारणा को जब मानवीय सौंदर्य पर लागू किया गया, तो 'हूर' (حُور) शब्द का जन्म हुआ। 'हूर' शब्द का विशेष संबंध आँखों के सौंदर्य से है। अरबी में इसका अर्थ है "ऐसी आँखें जिनमें सफ़ेद भाग की अत्यधिक सफ़ेदी और पुतली के गहरे काले रंग के बीच एक तीव्र और आकर्षक कंट्रास्ट हो"। क़ुरान ने इस शब्द को चुना और इसे पारलौकिक सौंदर्य का प्रतीक बना दिया। इस प्रयोग ने 'हूर' शब्द के अर्थ को इस्लामी परिकल्पना में स्वर्ग की सुंदर साथियों के रूप में स्थापित कर दिया।  'हूर' शब्द की यात्रा अरब और इस्लाम की दुनिया तक ही सीमित नहीं रही। फ़ारसी भाषा के माध्यम से यह फ्रैंच ज़बान में 'हुरी'बन गया। 18वीं शताब्दी में यह  अंग्रेजी में 'houri' के रूप में जा पहुँचा । पश्चिमी समाज में 'हूर' ने अपना विशिष्ट धार्मिक संदर्भ कुछ हद तक खो दिया और इसका प्रयोग अक्सर पूर्व की किसी भी अत्यंत सुंदर और आकर्षक महिला के लिए किया जाने लगा।


'हवारी' और निष्ठा का नाता

इस शब्द के 'पवित्रता' वाली शाखा का एक और महत्वपूर्ण विस्तार 'हवारी' है, जिसका अर्थ है 'शिष्य', 'समर्पित अनुयायी' या 'प्रेरित'।  इस शब्द का मूल भाव भी 'शुद्ध' या 'स्वच्छ' साथी से है । क़ुरान में इस शब्द का प्रयोग विशेष रूप से ईसा मसीह के शिष्यों  के लिए किया गया है। जहाँ 'हूर' शब्द बाहरी और शारीरिक पवित्रता (सौंदर्य, सफ़ेदी) का प्रतीक है, वहीं 'हवारी' शब्द आंतरिक और आध्यात्मिक पवित्रता (निष्ठा, विश्वास, समर्पण) का प्रतीक है। ये दोनों शब्द एक ही जड़ से निकले दो पूरक विचार हैं। एक सौंदर्य की पवित्रता का और दूसरा आस्था की पवित्रता का। 'लौटने' या 'घूमने' की एक साधारण क्रिया ने दो विशाल और भिन्न अर्थ-क्षेत्रों को जन्म दिया। एक ओर, इसने संवाद, आम बोलचाल, और अंततः भाषा की उस विशिष्ट शैली को परिभाषित किया जहाँ अर्थ अपने मूल रूप से 'मुड़' जाते हैं। दूसरी ओर, इसी जड़ ने स्वच्छता, पवित्रता, और उस अलौकिक सौंदर्य को जन्म दिया।

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

बक-बक वकील की , अधिवक्ता के वचन....

अंग्रेजी का एडवोकेट शब्द वकील के अर्थ में हिन्दी में भी खूब समझा और प्रयोग किया जाता है। हिन्दी में इसके लिए अधिवक्ता शब्द बनाया गया है जबकि अरबी, फारसी और उर्दू में इसके लिए वकील शब्द पहले से मौजूद है। यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि एकदम समान अर्थ वाले इन तीनों शब्दों का जन्म भारतीय यूरोपीय मूल से हुआ है। इंडो-यूरोपीय मूल की एक धातु है वेक, जिसका मतलब है मनुश्य के मुंह से निकलने वाली ध्वनि। इसी तरह संस्कृत में एक धातु है वच् जिसका मतलब होता है कहना, बोलना, व्याख्या करना आदि।
वच् से ही बना है वक्तृ यानी बोलनेवाला। हिन्दी का वक्ता और वकील के अर्थ में अधिवक्ता शब्द इससे ही बना है। कही गई बात के लिए वक्तव्य शब्द इसी कड़ी में आता है। वचनम् का अर्थ जहां भाषण, उद्गार है वहीं वचन का अर्थ वादा यानी कही गई बात पर खरा उतरना है। बोलने, कहने वाले के लिए वाचक (कथावाचक) जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। ज्यादा बोलने वाले के लिए वाचाल शब्द खूब प्रचलित है। देसी हिन्दी में तिरस्कार के साथ कहने के लिए एक शब्द खूब मशहूर है- बकना जो वच् से ही जन्मा है। इससे ही निकला है बक-बक करना जैसा लोकप्रिय मुहावरा । देवताओं के गुरू बृहस्पति का एक नाम है वाचस्पति जो वाचः और पतिः यानी वाणी का स्वामि अर्थ में प्रयुक्त होता है।
इसी कडी में आते हैं अंग्रेजी के वॉईस, वोकल, वोकेब्युलरी जैसे शब्द जिनका मतलब कहना, शब्द अथवा ध्वनि करना है। पुरानी फारसी में भी बोलने के लिए वाक् शब्द है जिससे वकील शब्द बना। अरबी में भी यह शब्द है जिसका मतलब है भरोसे का आदमी। जिसके कहे पर भरोसा किया जा सके। अंग्रेजी का एडवोकेट शब्द बना है लैटिन के एडवोकेट्स से। यह लैटिन के ही वोकेयर शब्द में एड उपसर्ग लगने से बना है। एडवोकेट का मतलब हुआ अदालत में पक्ष रखनेवाला।

आपकी चिट्ठी

सफर की पिछली कड़ी इडियट बॉक्स नहीं है टेलीविज़न पर सर्वश्री राजेन्द्र त्यागी, अभय तिवारी, ज्ञानदत्त पाण्डेय, संजीत त्रिपाठी , संजय और परमजीत बाली की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार। अभयजी, आपने एकदम सही कहा, वेदना भी विद् से ही निकली है जो प्रत्यक्ष ज्ञान जैसे अर्थों के साथ-साथ भावना,पीड़ा जैसे अर्थों में भी उजागर होती है और संवेदना जैसे शब्दरूप भी इससे ही निकले हैं। यज्ञभूमि के लिए वेदिः या वेदिका भी विद् से ही निकले हैं। ज्ञानजी, विधाता शब्द विद् की देन नहीं है अलबत्ता ज्ञानी कभी कभी खुद को विधाता समझने का भ्रम पाल लेता है। इस पर फिर कभी। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, December 26, 2007

इडियट बॉक्स तो नहीं है टेलीविज़न ..

महाभारत के प्रसिद्ध पात्र , पांडु के छोटे भाई और दासीपुत्र विदुर को
मनीषी और बुद्धिमान मनुश्य के तौर पर दर्शाया गया है। उनकी कार्यशैली पांडवों के लिए फायदेमंद रहती थी। विदुरनीति शब्द से भी बुद्धिमानीपूर्ण बात ही स्पष्ट होती है। यह शब्द बना है संस्कृत की विद् धातु से। संस्कृत के विद् का मतलब होता है जानना , समझना, सीखना और खोजना। महसूस करना, प्रदर्शन करना, दिखाना आदि भाव भी इसमें समाहित हैं। गौर करें कि अत्यधिक ज्ञान भी घातक होता है। इसलिए संस्कृत में धूर्त और षड्यंत्रकारी को भी विदुर कहा गया है।
गौर करें विद् शब्द के उपसर्ग के रूप में प्रयोग पर। विद् का यहां अर्थ होता है जानकार,समझदार । विद्वान शब्द की उत्पत्ति इसी विद् से हुई है। विद्या में यही विद् समाया हुआ है जाहिर है कि विद्यार्थी भी इसी कड़ी का शब्द है। किसी शब्द के साथ विद् इसे लगा दिए जाने पर मतलब निकलता है जाननेवाला, मसलन भाषाविद् यानि भाषा का जानकार। इसी तरह जाननेवाले के अर्थ में उर्दू-फारसी में दां लगाया जाता है जैसे कानूनदां। यह दां भी इसी विद् का रूप है।
यह जानना दिलचस्प होगा अंग्रेजी के विज़न शब्द के पीछे भी यही विद् है। बोल चाल की हिंदी में टेलीविजन और वीडियो के लिए कोई आमफहम हिंदी शब्द नहीं है(दूरदर्शन शब्द गढ़ा तो गया था टेलीविज़न के लिए ही मगर अब सिर्फ सरकारी चैनल के लिए प्रयोग होता है। )चूंकि इन उपरकरणों की खोज पश्चिमी दुनिया में हुई इसलिए इनका नामकरण अंग्रेजी-लैटिन मूल के शब्दों से हो गया। खास बात यह कि टेलीविज़न को पश्चिमीजगत ने ही सबसे पहले इडियट बॉक्स कहा । मगर इसके असली नामकरण के पीछे अगर विज़न जैसा शब्द है तो जाहिर है मूर्खता नहीं बल्कि बुद्धिमानी का भाव ही छुपा है। इसी तरह किसी अनोखी सूझ, विचार, तरकीब के अर्थ में हिंदी भाषी बड़ी सहजता से अंग्रेजी के आइडिया ,आईडियल या शब्दों का इस्तेमाल कर लेते हैं। ये तमाम शब्द प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार से ही जन्में हैं और भाषाशास्त्री इनके पीछे weid जैसी किसी धातु की कल्पना करते हैं जिसका मतलब भी बुद्धिमानी, जानना और समझना ही है। इसकी संस्कृत विद् से समानता गौरतलब है। जाहिर है संस्कृत इनकी जन्मदात्री नहीं मगर बहन तो अवश्य ही है।
केवल अंग्रेजी में ही करीब दो दर्जन से ज्यादा शब्दों की इसी विद् से रिश्तेदारी हैं। अन्य योरपीय भाषाओं में भी इसका योगदान है । इसी से बना है वेद जो भारतीय जीवनदर्शन, धर्म-परंपरा के ज्ञान का भंडार है। यही वेद अवेस्ता(फारसी का प्राचीनतम् रूप) मे वैद , प्राचीन स्लाव मेंवेडे, लैटिन में वीडियो या वीडेयर, अंग्रेजी में वाइड या वाइस ,विज़न,(टेलीविज़न में यही विज़न समाया है ), जर्मन में वेस्सेन के रूप में भी अपनी खास पहचान बनाए हुए हैं। ये तमाम शब्द अपनी इन भाषाओं में भी देखना, जानना, ज्ञान या परखना जैसे अर्थ बतलाते है। विद् ने ही ग्रीक में आईडेन का रूप लिया जिसका मतलब था देखना। वहां से यह अंग्रेजी के आईडिया, आईडियल जैसे अनेक शब्दों में ढल गया।
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आपकी चिट्ठी

पिछली पोस्ट आह पुलाव, वाह पुलाव सफर के हमराहियों ने काफी पसंद की । सर्वश्री राजेन्द्र त्यागी, पल्लव बुधकर, प्रत्यक्षा, संजीत त्रिपाठी, मीनाक्षी,अनुराधा श्रीवास्तव, सौमित्र बुधकर , ममता , और रवीन्द्र प्रभात जी को पुलाव का स्वाद पसंद करने के लिए शुक्रिया। सफर में खान-पान न हो तो हिन्दुस्तानी सफर में बहुत कुछ सफर करने लगता है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 23, 2007

आह, पुलाव..... वाह, पुलाव

दुनिया में सर्वाधिक पसंद किए जाने वाला खाद्यान्न संभवतः चावल ही है । चावल से बननेवाले हजारों तरह के व्यंजन है मगर पुलाव को खास शोहरत हासिल है । वजह है , ग़ज़ब की लज्जत और ज़ायका। भारतीय उपमहाद्वीप से चलकर आज खुशनुमा पुलाव कांटिनेंटल डिश बन चुका है।

आनंदम् आनंदम्

विश्व का शायद ही कोई कोना ऐसा होगा जहां लोगों ने इसका नाम न सुना होगा। पुलाव के प्रति इसी ललक ने हिन्दी-उर्दू में एक खास मुहावरा बना डाला है - ख़याली पुलाव पकाना अर्थात् कल्पनालोक में घूमना, हवाई किले बनाना आदि। पुलाव को किस ज़बान का शब्द माना जाए ? फारसी, उर्दू या हिन्दी का? यह फारसी भाषा में भी है और उर्दू हिन्दी में भी। दरअसल पुलाव की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है। आइये जानते हैं कैसे।
हर्ष, खुशी संचार का भाव जब मन में संचारित होता है तो उसे पुलक या पुलकित होना कहते हैं। संस्कृत की एक धातु है पुल् जिसका मतलब है रोमांच होना। इससे बना पुलकः जिसका मतलब भी रोमांच के साथ आनंदित होना, गदगद होना, हर्षोत्फुल्ल होना आदि है। गौर करें कि अत्यधिक रोमांच कि अवस्था में शरीर में सिहरन सी होती है। त्वचा के बाल खड़े हो जाते हैं। इसे ही रोंगटे खड़े होना कहते हैं। इसे यूं समझें कि इस अवस्था में एक एक बाल स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही पुलक है। यही पुलक जब चेहरे पर दिखती है तो खुशी, उत्साह, आवेग नुमांयां हो रहा होता है। यानी खिला खिला चेहरा। एक तरह की सरसों अथवा राई को भी पुलकः ही कहा जाता है वजह वही है खिला खिला दिखना । राई के दाने पात्र में रखे होने के बावजूद खिले खिले ही नज़र आते हैं।

रोम-रोम में पुलक

पुल् से ही बना है पुलाकः या पुलाकम् जिसका मतलब है सुखाया गया अन्न, भातपिंड, संक्षेप या संग्रह और चावल का मांड। इससे ही बना पुलाव जो बरास्ता फारस , अरब मुल्कों में गया जहां से स्पेन होकर यूरोप में भी इसने रंग जमा लिया । पुलाव की सबसे बड़ी खासियत है इसकी सुगंध और चावल का दाना दाना खिला होना। अब जब भी पुलाव खाएं तो उसके दाने-दाने में पुलक महसूस करें और तब इसके नाम की सार्थकता आपको समझ में आ जाएगी।
अपनी पसंद - हरा पुलाव पकाना सीखें
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आपकी चिट्ठी

सफर की पिछली कड़ी पसीने की माया और स्वेटर का बुखार पर सर्वश्री दिलीप मंडल, अनूप शुक्ल, संजय, ज्ञानदत्त पाण्डेय, शिवकुमार मिश्र और आलोक पुराणिक की टिप्पणियां मिलीं। ज्ञानजी , स्वेटर की स्कूटर से रिश्तेदारी करानेवाली बात मज़ेदार है। संजय भाई, ब्लाग की शक्ल बीते एक महिने से अचानक बिगड़ गई थी। हैडर के आसपास अनावश्यक स्पेस कायम हो गया है। छोटे भ्राताश्री पल्लव बुधकर इसे समझने में लगे हुए हैं कि कैसे ठीक किया जाए। वैसे आपको पसंद आया ,ये बड़ी बात है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

पसीने की माया और स्वेटर का बुखार

खांचों में बंटी इस दुनिया में इन्सान के एक होने का तर्क गले उतारने के लिए समाजवादी तरीके से बात समझाई जाती है और अक्सर खून-पसीने का जिक्र किया जाता है। यानी खून सबका लाल होता है और पसीने में मेहनत ही चमकती नज़र आती है वगैरह वगैरह। भाषा विज्ञान के नज़रिये से भी यही साबित होता है कि हम सब एक हैं। पसीने के लिए अंग्रेजीके स्वेट और इसके हिन्दी पर्याय स्वेद की समानता पर गौर करें। दरअसल यह शब्द भी प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार का है और भाषाविज्ञानियों ने इसकी मूल धातु sweid मानी है जो हिन्दी-संस्कृत के स्वेद के काफी करीब है। स्वेद की उत्पत्ति स्विद् धातु से हुई है। । यूरोपीय भाषाओं में इससे बने शब्दों की बानगी देखें मसलन स्पैनिश में यह sudore है तो जर्मन में schweib है। डच ज़बान में यह zweet है और लात्वियाई में sviedri के रूप में मौजूद है। तमाम यूरोपीय भाषाओं में इसी तरह के मिलते जुलते रूप मिलते है पसीने के अर्थ वाले शब्द के लिए ।

बात पसीने की

मोटे तौर पर तो पसीना शब्द इस कड़ी का हिस्सा नहीं लगता । बोलचाल की हिन्दी उर्दू में स्वेद के अर्थ में सर्वाधिक यही लफ्ज प्रचलित है। ज्यादा मेहनत करने के संदर्भ में पसीने-पसीने होना जैसा मुहावरा भी इससे ही निकला है। दिलचस्प बात ये कि पसीना भी संस्कृत के स्विद से ही निकला है। स्विद में प्र उपसर्ग लगने से प्रस्वेदः बना । इसके प्रस्विन्नः जैसे रूप भी बने जिसका मतलब हुआ बहुत ज्यादा पसीना। इससे ही बना पसीना।

डॉक्टर कहे तो स्वेटर पहनो

स्वेटर यानी सर्दियों का एक आम पहनावा। यह शब्द भी अंग्रेजी से हिन्दी में आया और आज गांवों से शहरों तक बेहद आमफहम है।
सर्दियां आते ही आज तो दुकानें गर्म कपड़ों से सज जाती हैं और घर के बक्सों से स्वेटर भी निकल आते है। यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि किसी जमाने में डाक्टर की सलाह के बाद स्वेटर पहना जाता था। जैसा कि नाम से पता चलता है स्वेटर अंग्रेजी के स्वेट शब्द से बना है । जाहिर है स्वेटर के मायने हुए पसीना लाने वाला। पहले लोगों को जाड़े का बुखार आने पर पसीना लाने के लिए डाक्टर एक खास किस्म के ऊनी वस्त्र को पहनने की सलाह देते थे। तब इसे कमीज के अंदर पहना जाता था। बाद में जब सर्दियों से बचाव के लिए कमीज से ऊपर पहने जाने वाले पहनावे भी चलन में आए तो भी उनके लिए स्वेटर शब्द ही चलता रहा। सर्दियों में ही पुलोवर भी पहना जाता है। इस पर गौर करें तो पता चलता है इसका यह नाम गले की तरफ से खीच कर पहनने से (पुल-ओवर) पड़ा होगा।
यह पड़ाव कैसा लगा , ज़रूर बताएं।

आपकी चिट्ठी

गंदुमी रंगत और ज़ायके की बात पर ज्ञानदत्त पाण्डेय, संजीत त्रिपाठी, बालकिशन और सचिन लुधियानवी की टिप्पणियां मिलीं। आपका आभार। सचिन , आपको गो के बारे में जो याद आ रहा है वह सही है। सही संदर्भों के साथ यह सफर के अगले किसी पड़ाव में आप देखेंगे।
किस्सा ए यायावरी की आखिरी कड़ी -संत की पतलून को संजय, ज्ञानदत्त पाण्डेय, शास्त्री जेसी फिलिप, रजनी भार्गव, संजीत त्रिपाठी और दिनेश राय द्विवेदी ने पसंद किया । आपका आभार सहयात्री बने रहने के लिए। ज्ञान जी, पतलून का पायजामें से रिश्ता है , यही तो पिछली कड़ी में हमने बताया था। संजय जी, ट्राऊज़र के बारे में इसीलिए नहीं लिखा क्योंकि आलेख काफी लंबा हो गया था। इसकी उत्पत्ति स्काटिश भाषा से हुई है । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, December 22, 2007

संत की पतलून [किस्सा-ए-यायावरी -8 ]

दुनियाभर में पुरुषों के अधोवस्त्र के तौर पर सर्वाधिक लोकप्रिय पोशाक पेंट या ट्राऊजर ही है। इस विदेशी शैली के वस्त्र से भारत के लोग पंद्रहवी सदी के आसपास यूरोपीय लोगों के आने के बाद ही परिचित हुए। अठारहवी-उन्नीसवीं सदी में भारत के पढ़े-लिखे तबके ने इसे अपनाया और शहरी समाज में इसे स्वीकार कर लिया गया । इसकी लोकप्रियता के पीछे अंग्रेजी शिक्षा और फैशन का हाथ था तो दूसरी ओर धोती की तुलना में इसका आरामदेह होना भी था। गौरतलब है कि भारतीय समाज में अंग्रेजों के आने से पहले धोती ही पुरुषों की आम पोशाक थी। आज भी गांवों में
इसे पहना जाता है। पेट का देशी रूप हो गया पतलून। पतलून उच्चारण दरअसल उर्दू की देन है। आखिर इस शब्द के मायने क्या हैं?
यह बात अजीब लग सकती है कि जिस पेंट या पतलून को नए ज़माने की चीज़ कहकर किसी ज़माने में बुजुर्ग नाक भो सिकोड़ा करते थे, उसके पीछे एक यूरोपीय यायावर- संत का नाम जुड़ा है। चौथी सदी के वेनिस में पेंटलोन नाम के एक रोमन कैथोलिक संत रहा करते थे । वे अपने शरीर के निचले हिस्से में ढीला-ढाला वस्त्र पहनकर यहां वहां घुमक्कड़ी करते थे। कुछ कथाओं के मुताबिक ये संत बाद में किसी धार्मिक उन्माद का शिकार होकर लोगों के हाथों मारे गए। कहा जाता है कि जब वेनिसवासियों को अपनी भूल का एहसास हुआ तो पश्चाताप करने के लिए कुछ लोगों ने संत जैसा बाना धारण कर लिया। बाद मेइस निराली धज को ही पेंटलोन का नाम मिल गया जो बाद में पेंट क रूप में संक्षिप्त हो गया।
पेंटलोन शब्द का रिश्ता इटली के पॉपुलर कॉमेडी थिएटर का एक मशहूर चरित्र रहा है जिसे अक्सर सनकी, खब्ती बूढ़े के तौर पर दिखाया जाता रहा। यह अजीबोगरीब चरित्र भी अपने चुस्त अधोवस्त्र की वजह से मशहूर था। जो भी होसंत पेंटलोन सच्चे यायावर थे।
यायावर की कथा का फिलहाल यहां अंत होता है।

आपकी चिट्ठी

सफर की पिछली कड़ी अजब पाजामा, ग़ज़ब पाजामा पर सर्वश्री दिनेशराय द्विवेदी, आलोक पुराणिक, संजय , संजीत त्रिपाठी और बालकिशन जी की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार। संजय जी नेताओं की कुलीनता पर न जाइये, आजकल की शादियों को देखिये और फैशन जगत पर निगाह दौड़ाइये तो ये लफ्ज सही मालूम होंगे। दिनेश जी , सफर में साड़ी, धोती सब बनेंगे पड़ाव। बस, आप साथ बने रहें। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 21, 2007

अजब पाजामा, ग़ज़ब पाजामा [किस्सा-ए-यायावरी -7]

दु निया की सबसे आरामदेह पोशाकों में पायजामे का शुमार है। किसी ज़माने में भद्दा माना जाने वाला पायजामा आज कुलीन और आभिजात्य पहनावा बन गया है। इस पायजामें का भी रिश्ता है यायावरी से बल्कि इसका जन्म ही बेहतर यायावरी के लिए हुआ है। याद करें रेल में भी सोने से पहले कई लोग इसे पहनना नहीं भूलते।

पाएजामः, पाजामः, पाजामा
संस्कृत और प्रोटो इंडोयूरोपीय भाषाओं के बहनापे वाली शब्दावली में ही आते हैं अंग्रेजी के फुट, पैड और हिन्दी के पद, पैर, पांव जैसे शब्द । पायजामा भी इसी श्रंखला की कड़ी है। यह बना है फारसी के पाए+जामः से मिलकर । फारसी में पैर के लिए पा शब्द है जो अवेस्ता के पद से बना है। जामः यानी वस्त्र । यह शब्द हिन्दी में जामा के अर्थ में भी प्रचलित है । याद करें , जामा तलाशी वाला मुहावरा। गौरतलब है कि इंडो-इरानी भाषा परिवार की संस्कृत और अवेस्ता सगी बहनें हैं। संस्कृत के पद से इसकी समानता से यह जाहिर है। फारसी में पाएजामः का मतलब है एक खास किस्म का अधोवस्त्र। फारसी में ही इसका एक अन्य रूप पाजामः भी मिलता है। हिन्दी में इसके पजामा, पाजामा, पायजामा जैसे रूप चलते हैं।

शक हमलावरों का बेहतरीन तोहफा

गौरतलब है कि भारत मे पायजामा शकों के द्वारा तीन सदी ईसा पूर्व ही लाया जा चुका था। शक मूलतः मध्यएशिया के घुमक्कड़ , खानाबदोश लड़ाके थे जो अक्सर अपने शानदार घोड़ों पर अभियानों के लिए निकलते थे। यहां अभियान के खोजयात्रा और चढ़ाई दोनों अर्थों को आप समझ सकते हैं। घोड़ों पर लंबी लंबी यात्राओं के लिए शकों की यह बेहद दूरदर्शितापूर्ण खोज थी कि ऐसा वस्त्र बनाया जाए जिसे पहन कर घोडे की पीठ पर सवार हुआ जा सके।
अधिकांश सभ्यताओं के आदिकाल में वस्त्र संस्कृति के नाम पर शरीर को कपड़े के एक ही टुकड़े से ढकने का चलन था। बाद में शरीर के निचले हिस्से को अधोवस्त्र के रूप में एक अलग कपड़े से ढंकने की परिपाटी सुविधानुसार शुरू हुई। रोमन स्कर्ट, भारतीय साड़ी या धोती जिसे स्त्री-पुरुष दोनों ही धारण करते हैं , इसी का प्रमाण हैं। धोती को जब देवता, ब्राह्मण या गुणीजन धारण करते है तो उसे पीतांबर कहते हैं।
तो घुड़सवारी के लिए यह धोती अनुपयुक्त थी। शकों ने इतना ही किया कि एक ही कपड़े से दोनों पैरों को ढंकने की तरकीब को थोड़ा आधुनिक बना दिया और उसे दो हिस्सों में बांट कर सिलाई कर दी जिससे ट्राऊजर या पायजामा बन गया।

अंग्रेजी राज की देन नहीं

मध्यएशिया के इन दुर्दान्त यायावरों की इस अनोखी सूझ ने उनकी यात्राओं को कुछ सुविधाजनक बनाया। ये शक ईरान होते हुए भारत में दाखिल हुए और पायजामें समेंत भारतीयों ने थोड़ी नानुकर के बाद शकों को भी अपना लिया। सदियों बाद तक आज भी भारतीयों का विदेशी हमलावरों के साथ यही रवैया है। भारतीय संस्कृति में सबको समो लेने की अद्भुत क्षमता है।
आज से एक सदी पहले अंग्रेजी राज के प्रभाव में आने वाले भारतीय युवाओं के चालचलन पर जो बुजुर्ग कुढ़ा करते थे उसकी खास वजह पेंट-शर्ट जैसा पहनावा थी। वे नहीं जानते थे कि वो पतलून या पेंट खुद यूरोपीय लोगों की भी नहीं थी। सदियों पहले शकों ने ही यूरोपीय लोगों को भी यह पायजामा या ट्राऊजर पहनाना सिखा दिया था वर्ना वहां तो अर्से तक स्कर्टनुमा पोशाक ही अधोवस्त्र के तौर पर जानी जाती थी।

बिछौना धरती को कर ले, अरे आकाश ओढ़ ले...

लोग कहते हैं कि यायावरी के लिए पोशाक मायने नहीं रखती , सिर्फ इरादा चाहिए। प्राचीन भारत में तो सन्यासियों , भिक्षुओं को ही यायावर कहा गया और पोशाक के नाम पर उन्हें कम से कम वस्त्र पहनने की पाबंदी थी। दिगंबर जैन पंथ में तो एक भी वस्त्र धारण नहीं किया जाता है। दिगंबर बना है दिक्+अंबर अर्थात् दिशाएं ही जिसका वस्त्र हो-इसीलिए दिगंबर श्रमण , मुनि निर्वस्त्र रहते हैं। मगर तारीफ करनी चाहिए उन शक यायावरों की जिन्होने अपनी घुमक्कड़ी को और सुविधाजनक बनाने के लिए दुनिया को पायजामे जैसा शानदार वस्त्र दे दिया।

आपकी चिट्ठी

यायावरी की पिछली कड़ी-प्यून का पदयात्रा अभियान पर सर्वश्री ज्ञानदत्त पाण्डेय, सृजनशिल्पी, दिनेशराय द्विवेदी और शिवकुमार मिश्र की उत्साहवर्धक टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभारी हूं।

कैसा लगा ये पड़ाव , ज़रूर बताएं । यायावरी अभी जारी है।




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Thursday, December 20, 2007

गंदुमी रंगत और ज़ायके की बात

रोजमर्रा की जिंदगी में रोटी सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला खाद्य पदार्थ है और इसमें भी अगर अनाज की बात की जाए तो ज्यादातर लोग गेहूं को पसंद करने वाले मिल जाएंगे।
वैदिक साहित्य में एक शब्द मिलता है गोधूम । इसी से बना है गेहूं । गोधूम यानी गो+धूम यानी गाय को धुंआं देना। स्पष्ट है कि प्राचीनकाल में गेहूं के पौधे का धुंआं गायों को मच्छरों व अन्य कीटों से बचाने के लिये दिया जाता रहा होगा। गौरतलब है कि गांवों में मवेशियों को आज भी सूखे चारे का धुंआं दिया जाता है।
एक अन्य शब्द भी गेहूं के विकल्प के रूप में संस्कृत में मिलता है-बहुदुग्ध । जाहिर है बाद में यही गोधूम यानी गेहूं चारे के रूप में गायों को भी दिया जाने लगा होगा जिसकी पौष्टिकता से उनके दूध में बढ़ोतरी होने पर यह नाम चल पड़ा होगा। जा़हिर है प्राचीन आर्य संस्कृति में गेहूं का उपयोग मनुश्य के लिये कम और पशुओ के लिए ज्यादा था। खाद्यान्नों मे इसे बहुत बाद मे सामाजिक स्वीकृति मिली होगी ।
हिन्दू पूजा विधि-विधानों में जो महत्व जव या जौ और धान यानी चावल का है वह गेंहूं को नहीं मिला है । फारसी में भी यही गोधूम, गंदुम बनकर विद्यमान है। इस शब्द का हिन्दी में भी गेहुंआ रंग के अर्थ में गंदुमी रंग कहकर प्रयोग होता है। जो भी हो, जिस गेहूं अर्थात गोधूम की आज धूम है किसी ज़माने में उससे सिर्फ धुंआं ही किया जाता था। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


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