Wednesday, December 19, 2007

प्यून का पदयात्रा अभियान [किस्सा-ए-यायावरी 6]


हिन्दी के अभियान शब्द का मतलब होता है खोज-यात्रा, मुहिम आदि। संस्कृत की या धातु से बने यानम् में अभि उपसर्ग लगने से बना है यह शब्द । यानम् का मतलब आगे बढ़ना, आक्रमण करना भी होता है। अभि का मतलब होता है - की दिशा में। मतलब हुआ युद्ध के लिए आगे बढ़ना।


अभियान या एक्सपिडिशन

प्राचीन संदर्भों में अभियान शब्द का अर्थ युद्ध से संबंधित ही था बाद में इसमें मुहिम, खोजयात्रा जैसे अर्थ जुड़ते चले गए। आज रोमांचक खोज-यात्राओं के लिए ही यह शब्द अक्सर प्रयुक्त होता है। जो भी हो , मनुश्य ने इसी अर्थ में अत्यंत प्राचीनकाल से ही अपने अभियान अर्थात खोज यात्राएं की हैं। यायावरी का इसमे विशेष योग रहा। उस दौर में ऐसे सभी अभियान पदयात्रा के जरिये ही सम्पन्न होते थे। अभियान का निकटतम अंग्रेजी पर्याय है एक्सपिडिशन जिसका का मतलब है निकल पड़ने को तैयार या तेजी से आगे बढ़ना। अपने प्राचीन रूप में यह भी फौजी कार्रवाई से जुड़ा हुआ शब्द ही था जैसा कि अभियान। दिलचस्प बात यह है कि यह प्रोटो इंडो-यूरोपीय मूल का शब्द है जिसकी व्युत्पत्ति प्राचीन भारोपीय मूल की धातु पॉड या पेड से मानी गई जिसका मतलब है पैर । संस्कृत की धातु पद से इसकी समानता गौरतलब है जिसका मतलब भी पैर ही होता है। जाहिर सी बात है कोई भी अभियान प्राचीनकाल में पैदल ही सम्पन्न होता था इसीलिए ये शब्द बने। पद, पेड या पॉड से ही ज्यादातर यूरोपीय भाषाओं में मसलन लैटिन में पेस, ग्रीक में पोस, लिथुआनी में पदास और अंग्रेजी में फुट जैसे शब्द जन्में हैं।

प्यादा, प्यून , पायोनियर

स पद की पदचाप हिन्दी में घुले मिले अंग्रेजी के कई अन्य शब्दों में भी सुनाई पड़ती है मसलन शतरंज का प्यादा और अंग्रेजी में इसका पर्याय पॉन , साइकल का पैडल और प्यून अर्थात चपरासी। प्यून की बात भी दिलचस्प है । इसका मतलब होता है पैदल चलनेवाला अनुचर , सैनिक या संदेशवाहक। बाद में यह नौकर के अर्थ में रूढ़ हो गया। गौर करें हिन्दी संस्कृत के पदातिन पर जिसका मतलब भी ठीक यही होता है।इसके लिए पायिकः शब्द भी है जो हिन्दी में पायक हो गया है जिसका अभिप्राय भी पैदल संदेशवाहक से ही है। अंग्रेजी के पायोनियर शब्द का मतलब है आगे चलने वाला, अग्रणी, मार्गदर्शक। ये सभी भाव यायावर से भी जुड़ रहे हैं, अभियान से भी जुड़ रहे है, एक्सपिडिशन से भी जुड़ रहे है और सबसे पहले जुड़ रहे हैं पद यानी पैरों से।

आपकी चिट्ठी
सफर के पिछले पड़ाव और बुद्ध को ईश्वर बना दिया पर मीनाक्षी, बालकिशन, बोधिसत्व और पुनीत ओमर की टिप्पणियां मिलीं। आप सबको यायावरी में आनंद आ रहा है और इसमें आपका साथ पाकर मैं भी आनंदित हूं। बोधिभाई, आप और मैं दोनों एक ही व्यसन के शिकार हैं।

ये पड़ाव आपको कैसा लगा , ज़रूर बताएं। पैरों से सफर की पड़ताल अगली कड़ी में भी जारी ....
Sanjay said...

काश सारा जीवन किसी परिंदे की भांति परवाज करते बिताया जा सकता. यायावरी से अच्‍छा इस दुनिया में और कोई शगल है क्‍या. चले चलिए सफर में हम हर पड़ाव पर आपको मिलने आते रहेंगे. यान की महत्ता के बहाने बुद्ध के बारे में पिछली पोस्‍ट में अच्‍छा ज्ञान दिया.
December 19, 2007 5:01 AM

4 कमेंट्स:

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

पैदल चलने वाला जितनी तेजी से चलता है; शायद उससे तेजी से शब्द अपना स्वरूप बदलता है। :-)

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप का अभियान रोचक और ज्ञान वर्धक है। सभी पड़ाव संजो कर रखने होंगे।

Srijan Shilpi said...

'शब्दों का सफर' एक अभियान की तरह आगे बढ़ रहा है। इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए हर बार आप किसी शब्द के सफर के सिलसिले को जानने के लिए पीछे की तरफ यात्रा करते हैं और शुरुआत से लेकर उसके हर पड़ाव से गुजरते हुए वर्तमान तक की गवेषणा का यत्न करते हैं। इस अभियान में सहयात्री बनकर हमें भी शब्दों के सरोवर में गोते लगाने का मौका मिल जाता है।

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत खूब, सर. शब्दों का सफर ज़रा भी नहीं थकाता.....अद्भुत प्रयास.

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