Tuesday, September 25, 2012

‘वापसी’ का भेद

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पू र्ववत अथवा ‘पहले जैसा’ वाले भाव को विभिन्न आशयों में व्यक्त करने के लिए हिन्दी में सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाला शब्द कौन सा है ? इस सिलसिले में वापस या वापसी जैसी अर्थवत्ता वाला कोई और शब्द हिन्दी में नज़र नहीं आता अलबत्ता ‘लौट’ के क्रियारूपों का वापसी के अर्थ में प्रयोग ज़रूर होता है । कहा जा सकता है कि वापसी जैसी अभिव्यक्ति ‘फिर’ या ‘पुनः’ में भी है । मगर ध्यान रहे, ये पूरी तरह वापस के पर्याय नहीं हैं । “मैं वापस आया हूँ” इस वाक्य को ‘फिर’ या ‘पुनः’ लगाकर “मैं फिर आया हूँ” अथवा “मैं पुनः आया हूँ” भी प्रयोग किया जा सकता है किन्तु “मेरी किताब वापस करो” इस वाक्य में वापस के स्थान पर फिर या पुनः लगाने से मतलब हासिल नहीं होता । हाँ, वापस के स्थान पर ‘लौट’ के रूप लौटा का प्रयोग करते हुए “मेरी किताब लौटा दो” जैसा वाक्य बनाया जा सकता है । हिन्दी की विभिन्न शैलियों और अन्य कई भारतीय भाषाओं में खूब चलने वाले इस शब्द का प्रयोग करते हुए कभी ऐसा नहीं लगता कि इसकी आमद बाहर से हुई है । बोलचाल की हिन्दी में फ़ारसी के जिन शब्दों ने रवानी पैदा की है, उनमें वापस शब्द का भी शुमार है ।
वापस के कुछ प्रयोग देखें- लौट आने के अर्थ में “वापस आना”, गुमशुदा चीज़ मिलने के अर्थ में “वापस पाना”, दोबारा अपने अधिकार में लेने के अर्थ में “वापस लेना”, किसी को लौटाने के अर्थ में “वापस करना” या “वापस देना” जैसे कई वाक्य हम दिन-भर बोलते हैं । वापस से ही वापसी भी बना है । वापसी में भी लौटने, फिर मिलने, दोबारा प्राप्त करने जैसे भाव हैं । जॉन प्लैट्स के कोश में वापस को फ़ारसी मूल का बताया गया है और इसे फ़ारसी के दो पदों- ‘वा’-‘पस’ के मेल से बना बताया गया है । भाषाविदों के मुताबिक ‘वा’ का मूल वैदिक भाषा का प्रसिद्ध उपसर्ग ‘अप’ है जिसमें लौटने का भाव है । ध्यान रहे ईरान की भाषाएँ अवेस्ता, पहलवी जैसे रास्तों से गुज़रती हुई विकसित हुई हैं । फ़ारसी इनमें सबसे प्रमुख और सर्वमान्य है । प्राचीन ईरान में पारसिकों (जरतुश्ती) के धर्मग्रन्थ अवेस्ता में लिखे गए जिसका वेदों की भाषा से बहुत साम्य है । वेदों की भाषा और संस्कृत को लेकर लोगों में भ्रम है और वे उसे संस्कृत कहते हैं । वैदिकी और अवेस्ता को सहोदर माना जाता है, हालाँकि अवेस्ता वैदिक भाषा जितनी पुरातन नहीं है । संस्कृत के ‘अप’ उपसर्ग के समकक्ष अवेस्ता के ‘अप’, लैटिन के ‘अब’-ab, गोथिक के ‘अफ़’-af, अंग्रेजी के ‘ऑफ़’ of के मद्देनज़र भाषाविज्ञानियों ने प्रोटो भारोपीय भाषा की ‘अपो’ apo- धातु की कल्पना की है । फ़ारसी उपसर्ग ‘वा’ में लौटने, फिरने, खुलने, अलग, खिन्न जैसे भाव हैं । अंग्रेजी का पोस्ट post
‘पश्च’ में भी लौटने का भाव है । संस्कृत के पश्च का फ़ारसी समरूप पस है । कावसजी एडुलजी कांगा लिखित अवेस्ता डिक्शनरी के मुताबिक इसका अवेस्ताई रूप भी पश्च ही है । संस्कृत के पश्च शब्द का अर्थ है ‘बाद का’, ‘पीछे का’, आदि । पश्च से ही हिन्दी कई शब्द बने हैं जैसे पीछे, पिछाड़ी, पीछा आदि । पश्च भारोपीय परिवार का एक महत्वपूर्ण शब्द है और इससे अनेक शब्द बने हैं जिन विस्तार से एक अलग आलेख में चर्चा की गई है । वापस में लौटने के भाव में लौटने, फिरने के भाव के पीछे अप से बने फ़ारसी के वा और पश्च से बने पस [अप-wa + पश्च-pas = वापस ] के मेल से जन्मी अर्थवत्ता है । वापस से बना वापसी दरअसल लौटने की क्रिया है जैसे उसकी वापसी हो गई । अब इस वापसी में लौट आने और फिर अपने स्थान पर लौट जाने दोनो तरह के भाव हैं ।

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Friday, September 21, 2012

मुनीमजी की खोजखबर

nawabसंबंधित शब्द-1.तहसीलदार. 2.वजीर. 3.वायसराय. 4.जागीरदार. 5.कानूनगो. 6.श्रीमंत. 7.नौकर. 8.चाकर. 9.मुसद्दी. 10.एहदी. 11.अमीर. 12.फौजदार. 13.क्षत्रप 

हि न्दी की खूबी है कि उसने अन्य भाषाओं से ख़ासतौर पर अरबी-फ़ारसी से आए शब्दों को उनके शुद्धतम रूप में स्वीकार किया है । बहुत कम शब्द ऐसे हैं जिनके देसी रूपों को बोल-चाल और लिखत-पढ़त में जगह मिली है अन्यथा अरबी-फ़ारसी के शब्दों को अलग से पहचाना जाता है । मुनीम भी ऐसे ही दुर्लभ शब्दों में है जिससे यह अंदाज़ नहीं लगता कि यह हिन्दी में अरबी से आयात हुआ है । आज़ादी के बाद सिनेमा और साहित्य ने मुनीम के ज़रिए ही औपनिवेशिक काल के संघर्षशील और शोषित समाज की तकलीफ़, बदक़िस्मती, दुश्वारी और दुर्दशा को उजागर किया । सामन्ती समाज के निरंकुश चरित्र को सामने लाने वाला कारिन्दा था मुनीम जिसकी संवेदना सिर्फ़ वसूली, कब्ज़ा और दोहन से जुड़ी थी । आम आदमी के लिए बुरे सपने समान था का मुनीम । कम्पनीराज में जब सामन्तों को नवाब की उपाधियाँ रेवड़ियों की तरह बँट रही थीं, तब उनके नायब की ज़िम्मेदारी इन्हीं मुनीमों ने बखूबी सम्भाली । मौकापरस्ती इनकी खूबी थी और वह दौर भी आया जब नवाबों की बदचलनी का फ़ायदा उठा कर कुछ मुनीम खुद नवाब बन बैठे । आख़िर नवाब, नायब और मुनीम में रिश्तेदारी जो ठहरी ।
सेमिटिक भाषा परिवार की एक धातु है नून-वाव-बा (n-w-b) । मूल रूप से इसमें घूमना, मुड़ना, परिवर्तन, लौटना, फिरना, बारी, बदली जैसे भाव हैं । अल सईद एम बदावी की अरेबिक इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ कुरानिक यूज़ेज़ में जिसके कब्ज़ा, वसूली, अधिग्रहण, दुर्दशा, विपत्ति, निरीक्षण जैसे अर्थ दिए गए हैं । सहायक या डिप्टी के अर्थ में हिन्दी में अरबी मूल का नायब शब्द भी प्रचलित है जो इसी धातु से जन्मा है । इसका अरबी रूप नाइब है । ध्यान दीजिए नून-वाव-बा की अर्थवत्ता पर जिसमें मूल रूप से स्थानापन्न का भाव उभर रहा है । कब्ज़ा या अधिग्रहण क्या है ? किसी ओर का काबिज हो जाना । सहायक, नायब या डिप्टी कौन है ? जो प्रमुख व्यक्ति के स्थान पर काम करे । किसी बदले काम करने वाला व्यक्ति ही नायब होता है । नायब का अर्थ है प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा तैनात अफ़सर । वरिष्ठ अधिकारी । नून-वाव-बा (n-w-b) घूमने, लौटने, मुड़ने के भावों का विस्तार मुआइना, निरीक्षण, बारी, अवसर, पाली, बदली में होता है और नायब की ड्यूटी में ये सभी काम शामिल हैं । किसी ज़माने में तहसील ही रियासतों की सबसे बड़ी ईकाई होती थी । तब तहसीलदार का रुतबा कलेक्टर का होता था । तहसीलदार का प्रमुख सहकारी नायब तहसीलदार कहलाता था । आज़ादी के बाद तहसील से ऊपर ज़िला बना और कलेक्टर, तहसीलदार से ऊपर हो गया । इस तरह तहसीलदार को डिप्टी कलेक्टर कहा जाने लगा । मगर नायब तहसीलदार अपनी जगह कायम रहा ।
सी तरह नवाब शब्द भी इसी कड़ी में आता है । नवाब की व्युत्पत्ति भी n-w-b से हुई है और इसका एक रूप नव्वाब भी है । आमतौर पर नवाब शब्द को हिन्दी में शासक, राजा या बादशाह का पर्याय समझा जाता है पर ऐसा नहीं है । नवाब दरअसल एक उपाधि है और यह नाइब (नायब) का रूपान्तर है । इस्लामी शासकों की मान्यता के मुताबिक दुनिया पर खुदा की बादशाहत है और वे महज़ उसके प्रतिनिधि हैं । नवाब इसी रूप में शासक शब्द का प्रतिनिधित्व करता है । नवाब में भी प्रतिनिधि, नुमाइंदा, अहलकार, मुख्तार जैसे भाव हैं । मुस्लिम शासकों ने कई सूबेदारों को नवाब की इज़्ज़त बख़्शी क्योंकि वे उस सूबे में केन्द्रीय सत्ता के प्रतिनिधि थे । राज्यपाल के अर्थ में भी नवाब शब्द प्रचलित रहा । अंग्रेजों ने भी नवाब की पदवियाँ बाँटीं । कई घरानों ने नवाब शब्द को पैतृक उपाधि की तरह अपने नाम के साथ जोड़ लिया । नवाबजादा, नवाबजादी जैसे शब्दों में मुहावरेदार अर्थवत्ता कायम हुई जिसका अर्थ था शानशौकत, दिखावापंसद औलादें । कुल आशय बिगड़ैल संतान से है ।
नून-वा-बा से बने मूल नाब शब्द में प्रतिनिधित्व, सूचना जैसे भाव हैं । उर्दू फारसी का नौबत शब्द हिन्दी में भी सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में शामिल है । नौबत आना, नौबत पहुँचना, या नौबत बजना जैसे मुहावरे खूब प्रचलित हैं। नौबत का सीधा सीधा मतलब है घड़ी, अवसर, बारी, दशा इत्यादि । इसका अन्यार्थ सचेत होना, सतर्क होना भी है क्योंकि बारी, घड़ी या अवसर एक तय आवृत्ति के बाद आता है जिसके लिए हम तैयार रहते हैं । इसी तरह नबाहा शब्द भी इसी कड़ी में आता है । नौबत वैसे अरबी ज़बान के नौबा से बना है जिसमें बारी, अवसर जैसे ही भाव थे मगर बाद में इसमें ईश्वर की आऱाधना (बारंबार), धार्मिक कर्तव्यों का पालन करना जैसे भाव भी शामिल हो गए । इस रूप में समय का बोध कराने के नियत समय पर लिए नक्कारा बजाया जाता था जिसे नौबत कहा जाने लगा । आमतौर पर यह परंपरा ईश्वरआराधना के लिए सावधान करने के लिए थी मगर ऐसा लगता है कि राज्यसत्ता ने बाद में इसे अपना लिया। फिर समाज के प्रभावशाली व्यक्ति अपने घर के दरवाजे पर किसी भी किस्म की सूचना करने के लिए नौबत बजवाने लगे और बजानेवाला नौबती या नौबतचीं कहलाने लगा ।
मय चक्र पर गौर करें । सूरज का उगना, ढलना, फिर उगना । यह चक्र है । समय सूचक घड़ी के काँटे भी गोल घूमते हैं । यानी निरन्तर गति । हर बार उसी स्थान पर लौटना । स्थानापन्न होना । अरबी में घड़ी के लिए मुनब्बिह शब्द है । ‘मु’ उपसर्ग लगने से मुनीब शब्द बनता है । जॉन प्लैट्स की अ डिक्शनरी ऑफ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश डिक्शनरी के अनुसारी मुनीब का अर्थ “to make (one) supply the place (of another),' iv of ناب (for نوب) 'to supply the place (of another)'), s.m. One who appoints a deputy; a patron; master; client; constituter; constituent;—one appointed to conduct a business, foreman, factor, agent, headman.” दिया गया है । ज़ाहिर है मुनीब सहायक भी है, मातहत भी है, नायब भी है । कार्यपालन अधिकारी की शक्तियाँ उसमें निहित होने के चलते वही सरपरस्त है, मालिक और प्रशासक भी है । मुस्लिम शासन के दौरान मुनीब ये सब काम करते थे । मूलतः राजस्व अधिकारी की तरह ये काम करते थे और दौरा करते थे । धीरे-धीरे इनका काम हिसाब-किताब देखने तक सीमित हो गया और इनकी हैसियत सामान्य बाबू की हो गई । मोहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश में मुनीब का अर्थ है प्रतिनिधि, नुमाइदः, अभिकर्ता, एजेंट या गुमाश्ता । जहाँ तक मुनीब के मुनीम में तब्दील होने का सवाल है, तो हमें अम्मा शब्द पर विचार करना चाहिए । हिन्दी में अन्त्य वर्ण में अनुनासिकता की वृत्ति है । अम्मा का एक रूप अम्ब भी है । यहाँ का लोप होकर ध्वनि शेष है । यही बात मुनीब के मुनीम रूप में भी हो रही है ।

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Monday, September 17, 2012

भरोसे की साँस यानी ‘विश्वास’

[पिछली कड़ी- भरोसे की भैंस पाड़ो ब्यावे से आगे ]trust

हि न्दी में यक़ीन ( yaqin ) शब्द का भी खूब प्रयोग होता है । हालाँकि भरोसा, विश्वास, ऐतबार जैसे इसके पर्याय भी खूब प्रचलित हैं और ये सभी शब्द बोलचाल की सहज अभिव्यक्ति का माध्यम हैं । इसके बावजूद यक़ीन शब्द का प्रयोग ज्यादा सुविधाजनक इसलिए है क्योंकि इसमें निहित निश्चयात्मकता की अभिव्यक्ति ज्यादा सुविधाजनक ढंग से होती है । यक़ीन से यक़ीनन जैसा कर्मकारक बन जाने से निश्चित ही, निश्चयपूर्वक या निश्चित तौर पर जैसी अभिव्यक्तियाँ आसान हो जाती हैं । इसी तरह यक़ीन से यक़ीनी रूप भी बनता है । यक़ीन मानिए, यक़ीन जानिए, यक़ीन कीजिए जैसे वाक्यों से भाषा में मुहावरे का असर आ जाता है । फ़ारसी का बे उपसर्ग लगने से बेयक़ीन शब्द भी बनता है । रिश्ते-नाते और समूची दुनियादारी अगर कायमहै तो सिर्फ़ यक़ीन पर ।
क़ीन शब्द सेमिटिक मूल का है और यह अरबी भाषा से फ़ारसी में गया और फिर हिन्दी में आया । अलसईद एम बदावी / मोहम्मद अब्देल हलीम की कुरानिक यूसेज़ डिक्शनरी के मुताबिक यक़ीन के मूल में अरेबिक धातु या-क़ाफ़-नून (y-q-n) है जिसमें निश्चित, पक्का, निस्संदेह, सत्यापन, दृढ़ निश्चय, खास जैसे भाव हैं । इससे बने यक़ीन में निश्चित धारणा, आस्था या विश्वास ( जैसे, मेरा यक़ीन है कि मज़हब से इन्सानियत बड़ी चीज़ है ), आश्वासन( जैसे, उन्होंने यक़ीन दिलाया कि जल्दी ही काम हो जाएगा ), भरोसा ( आपकी बात पर यक़ीन नहीं होता ) आदि के अलावा मत, विचार, मान्यता, सच्चाई जैसे अनेक भावों का इसमें समावेश है ।
हिन्दी की तत्सम शब्दावली का विश्वास शब्द संज्ञा भी है । विश्वास जीवन-क्रिया से जुड़ा शब्द है । इसके मूल में श्वस् धातु है । श्वस् यानी हाँफना, फूँकना, धकेलना, धौंकना, फुफकारना, उड़ाना आदि । इसके अलावा इसमें साँस ( खींचना-छोड़ना ) ब्रीद, कराह, आह, आराम जैसे भाव भी हैं । इससे ही बना है श्वास जिसका अर्थ है छाती में हवा खींचना-छोड़ना, ब्रीदिंग । हिन्दी का साँस शब्द श्वास से ही बना है । श्वसन का अर्थ भी साँस लेना होता है । गौर करें कि मूलतः श्वास लेना जीवन के लिए ज़रूरी क्रिया है । श्वास जीवन का सम्बल है । श्वास के जरिये रक्त में वायुसंचार होता है और यही रक्त हमारे शरीर को पोषण देता है । विश्वास जिसमें यकीन, ऐतबार का भाव है और आश्वासन जिसका अर्थ तसल्ली अथवा सांत्वना होता है, इसी सिलसिले की कड़ियाँ हैं ।
श्वसन में साँस लेना और छोड़ना दोनो शामिल है । दोनों में एक बारीक फ़र्क है । श्वास लेना जहाँ चुस्त होने का लक्षण है वहीं श्वास छोड़ना निढाल होने, क्षीण होने का लक्षण है । इन दोनो ही क्रियाओं में उपसर्गों के ज़रिये फ़र्क़ किया गया है । साँस लेना जहाँ आश्वास है वही साँस छोड़ना निश्वास है । हिन्दी का उपसर्ग में सकारात्मक अर्थवत्ता है । इसमें सब ओर, सब कुछ वाला भाव भी है । श्वास से पहले लगने से आश्वास बनता है जिसका अर्थ होता है खुली साँस लेना, मुक्त साँस लेना, तसल्ली के साथ जीना । आश्वास से ही आश्वासन बना है जिसमें निहित तसल्ली, सांत्वना, दिलासा, प्रोत्साहन जैसे भाव स्पष्ट हैं । वामन शिवराम आप्टे के कोश में आश्वास् का अर्थ साँस देना, जीवन देना, जीवित रखना जैसे अर्थ भी दिए हैं । आपात् स्थिति में मुँह से मुँह मिला कर कृत्रिम साँस देकर किसी को जीवित रखने का प्रयत्न भी इसी आश्वास से अभिव्यक्त होता है ।
य-अशान्ति में निश्वास क्रिया प्रभावी होने लगती है । लम्बी साँस छोड़ना दरअसल दुख, शोक प्रकट करने का लक्षण भी है और आन्तरिक वेदना की अभिव्यक्ति भी । गहरी साँस छोड़ी जाएगी तो लम्बी साँस ली भी जाएगी । आश्वास-निश्वास के इस क्रम को देशी हिन्दी में उसाँस कहते हैं । उसाँस का एक रूप उसास भी है । यह उच्छ्वास से बना है जो मूल संस्कृत का शब्द है और हिन्दी की तत्सम शब्दावली में आता है । उच्छ्वास बना है उच्छ्वस uchvas से । उद् उपसर्ग में छ्वस chvas लगने से बनता है उच्छ्वस । दिलचस्प यह कि संस्कृत के श, क्ष, श जैसे रूप प्राकृत अपभ्रंश में में बदलते हैं जैसे क्षण से छिन । क्षमा का छिमा । यहाँ छ्वस दरअसल श्वस का ही रूप है । वैदिक संस्कृत में अनेक शब्दों के बहुरूप मिलते हैं जो प्राकृत के समरूप लगते हैं । बहरहाल, उद् और छ्वस का अर्थ गहरी या लम्बी साँस होता है । उच्छ्वस > उच्छ्वास > उस्सास और फिर इससे बना उसाँस शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है और दुख-शोक की सामान्य अभिव्यक्ति का ज़रिया है ।
श्वस में वि उपसर्ग लगने से बनता है विश्वस् । गौर करें संस्कृत के वि उपसर्ग की कई अर्थ छटाएँ हैं जिनमें से एक है महत्व प्रदान करना । स्पष्ट करना । अन्तर करना आदि । विश्वस का अर्थ हुआ मुक्त साँस लेना, चैन से साँस लेना । ध्यान रहे कि श्वसन प्रणाली के ज़रिए ही सबसे पहले यह पता चलता है कि रोगी की दशा सही है या नहीं । श्वास प्रणाली पर ही नाड़ी तन्त्र काम करता है । पुराने ज़माने से नब्ज़ देख कर मरीज़ के हाल का अंदाज़ा लगाया जाता रहा है । श्वसन प्रणाली ही वह आधार है जिसके ज़रिये ही शरीर के अवयव सही ढंग से काम करते हैं । इस आधारतन्त्र का मज़बूत होना, कुशल होना, निर्दोष होना ही उसे विश्वसनीय बनाता है । सो, श्वस में वि उपसर्ग लगाकर बनाए गए विश्वस् से जो अर्थवत्ता हासिल हुई वह भरोसा, निष्ठा, ऐतबार जैसे आशयों को प्रकट करती है । विश्वस से ही विश्वास बना है ।

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Friday, September 14, 2012

भरोसे की भैंस, पाडो़ ब्यावै

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मा लवी ज़बान में एक कहावत है, “भरोसे की भैंस, पाड़ो ब्यावै” अर्थात गाभन भैंस से अगर मादाशिशु की उम्मीद रखेंगे तो वह नरशिशु को जन्म देती है । यानी भैंस का काम ‘रामभरोसे’ चलता है । मज़े की बात यह की शुरुआत में ‘रामभरोसे’ में सकारात्मक अर्थवत्ता थी और इसका अर्थ तो ‘रामआसरे’ यानी राम की कृपा के सहारे है मगर अविश्वास के दौर में इसमें नकारात्मक अर्थवत्ता समा गई । अर्थात ऐसी व्यवस्था या तन्त्र जिसमें कुछ भी सुचारू होने की संभावना न हो । इसी तर्ज़ पर भरोसीराम जैसा संज्ञानाम भी बन गया ।  शब्द निर्माण प्रक्रिया ईंट-ईंट जोड़ कर दीवार बनने से अलग, कहीं गूढ़ और रहस्यमय होती है । विश्वास, यक़ीन अथवा एतबार के अर्थ में ‘भरोसा’ शब्द का प्रयोग बोलचाल की हिन्दी में खूब होता है । इतना कि इसमें फ़ारसी का ‘मन्द’ प्रत्यय लगाकर दौलतमन्द, हौसलामन्द की तर्ज़ पर भरोसेमन्द जैसा शब्द भी बना लिया गया जिसका अर्थ होता है विश्वसनीय । मगर ‘भरोसा’ शब्द की अर्थवत्ता विश्वास अथवा यक़ीन की तुलना में कहीं व्यापक है । इसके बारे में बाद में चर्चा करेंगे, पहले जानते हैं इसकी व्युत्पत्ति कैसे हुई ।
‘भरोसा’ शब्द की व्युत्पत्ति पर भाषाविद् एकमत नहीं हैं और हिन्दी-इंग्लिश-मराठी के प्रमुख कोशकारों ने भरोसा शब्द की व्युत्पत्ति तलाशते हुए कल्पना के घोड़े खूब दौड़ाए हैं । हिन्दी शब्दसागर में भरोसा की व्युत्पत्ति वर + आशा दी हुई है । संस्कृत के ‘वर’ में चाह, इच्छा, मांग, पसंद, मनोरथ, चुनाव का भाव है । इस तरह ‘वर’ और आशा के मेल से इच्छापूर्ति का आशय उभरता है । इस व्युत्पत्ति का दोष यह है कि वर+आशा से वराशा > भरोसा बनने की क्रिया अटपटी लगती है । आमतौर पर ‘व’ की प्रवृत्ति ‘ब’ में बदलने की है और ‘ब’ का रूपान्तर ‘भ’ में होता है । ‘व’ वर्ण सीधे ‘भ’ में नहीं बदलता । हिन्दी की किसी भी बोलियों में अगर वरोसा, बरोसा जैसे शब्द भी मिलते तो वर + आशा से भरोसा की व्युत्पत्ति को भरोसेमन्द माना जा सकता था ।
जॉन प्लैट्स के प्रसिद्ध कोश “अ डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश” में भरोसा की व्युत्पत्ति भद्र + आशा दी हुई है । यहाँ भद्र + आशा से ‘भद्राशा’ होते हुए कल्पना की गई लगती है कि ‘द’ वर्ण का लोप हुआ होगा और ‘र’ शेष रहा होगा और ‘श’ वर्ण ‘स’ में तब्दील हुआ होगा । इस तरह ‘भराशा’ से ‘भरोसा’ बना होगा । शब्द रूपान्तर की प्रवृत्ति के हिसाब से यह व्युत्पत्ति भी त्रुटिपूर्ण लगती है । ‘भद्र’ शब्द का अपभ्रंश रूप भद्द, भद्दा बनते हैं । भद्र के साथ जुड़ने वाले ‘आशा’ का आद्यक्षर ‘आ’ है जो स्वर है, व्यंजन नहीं सो भद्र + आशा से भद्राशा बनेगा । इसका अगला रूप ‘भद्दासा’ या ‘भदासा’ हो सकता है, ‘भराशा’ नहीं, जिससे भरोसा बनने की कल्पना की जा रही है । भद्र का ‘द’ तभी भेदखल हो सकता था जब आशा के ‘आ’ के स्थान पर कोई व्यंजन होता, क्योंकि दूसरे पद के आद्यक्षर का स्वर तो प्रथम पद के अन्त्याक्षर के व्यंजन से जुड़ जाएगा ।
र रॉल्फ़ लिली टर्नर भी काल्पनिक व्युत्पत्ति का सहारा लेते हैं मगर उनकी व्युत्पत्ति को तार्किक साबित करते कुछ प्रमाण हमारे पास हैं । टर्नर अपने ‘अ कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ़ इंडो-आर्यन लैग्वेजेज़’ नामक कोश में भरोसा की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘भारवश्य’ bharavashya से बताते हैं । इसी तरह रामचन्द्र वर्मा भी ‘भरोसा’ का रिश्ता ‘भार’ से जोड़ते हैं जिसमें सहारे का भाव है । परिमाणवाची अर्थवत्ता से हट कर ‘भार’ शब्द में निर्वहन, कर्तव्य, जिम्मेदारी जैसी मुहावरेदार अर्थवत्ता है, उसका प्रयोग भाषा में ज्यादा होता है । यह भाव भार की मूल धातु ‘भृ’ से आ रहा है जिसमें उठाना, थामना, अवलम्बन, सम्भालना, पालना जैसे आशय निहित हैं मोनियर विलियम्स के कोश में भी ‘भार’ शब्द की अर्थवत्ता के विविध आयामों के अन्तर्गत- “task imposed on any one” भी दर्ज़ है । वज़न के अर्थ में भार शब्द का प्रयोग व्यवहार में विरल है । “इस वस्तु का भार कितना है ” जैसे वाक्य की बजाय “इस चीज़ का वज़न कितना है ” यही वाक्य सुनाई पड़ता है । भार शब्द की मुहावरेदार अभिव्यक्ति “काम करने”, “जिम्मेदारी निभाने”, “कर्तव्यपालन” जैसे सन्दर्भों में “भार डालना”, “भार उठाना”, “भार सम्भालना” जैसे मुहावरे हिन्दी में खूब प्रचलित हैं ।
कार्यभार, कार्यभारित जैसे शब्दों से भी जिम्मेदारी और कर्त्तव्य-निर्वाह के सन्दर्भ उभरते हैं । ‘भारवश्य’ शब्द के सन्दर्भ में विचार करें तो ‘भार’ अर्थात जिम्मेदारी, यह स्पष्ट है । इसका दूसरा पद है “वश्य” । मोनियर विलियम्स वश्य का अर्थ बताते हैं-“ obedient to another's will” अर्थात किसी के प्रति जिम्मेदार होना । इसमें सेवक या मातहत का भी भाव है । यह स्पष्ट है कि भरोसा ‘भार’ महत्वपूर्ण है । इसमें वर, भद्र या आशा नहीं है । जो व्यक्ति ‘भार’ के अधीन हो उसे ‘भारवश्य’ कहा जाएगा । गौर करें निर्भर या निर्भरता शब्द के भीतर भी ‘भृ’ या ‘भार’ है । निर्भरता यानी अलम्बन, सहारा, सपोर्ट । सेवक के लिए हिन्दी की तत्सम शब्दावली में ‘भृत्य’ शब्द मिलता है । भृत्य bhritya वह है जो अलम्बित हो, सपोर्टेड हो । अर्थात जिसका भरण किया जाता हो । जिसे काम की एवज में भृति यानी मजदूरी मिलती हो और इसी वजह से जो ‘भारवश्य’ (भार के वश में यानी कार्य के अधीन ) हो यानी दूसरे के द्वारा दिया गया काम करने के लिए पाबन्द हो । अधीन के अर्थ में ‘वश’ या ‘वश्य’ से ही हिन्दी, उर्दू में ‘बस’ शब्द बना है जैसे “यह बात मेरे बस में नहीं है” या “मैं तो आपके बस में हूँ” ।
राठी में भरोसा को “भरवसा” कहते हैं । विद्वानों ने चाहे भरोसा में वर + आशा या भद्र + आशा देखी हो मगर मराठी के “भरवसा” को देख कर टर्नर के ‘भारवश्य’ पर भरोसा होने लगता है । सिन्धी के ‘भरवसो’ का भी क़रीब क़रीब ऐसा ही रूप है । निश्चित ही ‘भरवसा’ और ‘भरवसो’ का विकास किसी काल में ‘भारवश्य’ जैसे संज्ञारूप से हुआ होगा । हालाँकि यह जानना दिलचस्प होगा कि मराठी व्युत्पत्ति कोश के रचनाकार कृ.पा. कुलकर्णी संस्कृत के ‘विश्रम्भ’ में भरोसा की व्युत्पत्ति देखते हैं । वा.शि. आप्टे के संस्कृत कोश में ‘विश्रम्भ’ में विश्वास, भरोसा, पूर्ण घनिष्ठता, अन्तरंगता के साथ आराम, विश्राम जैसे आशय भी बताए गए हैं । कुलकर्णी के अलावा अन्य किसी कोश में यह व्युत्पत्ति नहीं बताई गई है । कुलकर्णी यह संकेत भी नहीं करते हैं कि ‘विश्रम्भ’ से भरोसा के रूपान्तर का क्रम क्या रहा होगा क्योंकि अर्थसाम्य तो यहाँ है मगर ध्वनिसाम्य नज़र नहीं आता । ‘विश्रम्भ’ को तोड़कर देखा जाए तो जो ध्वनियाँ हाथ लगती हैं वे हैं : व-श-र-म-भ । यह विचारणीय है कि जो ‘भरवसा’ बड़ी आसानी से ‘भारवश्य’ से बन रहा है उसे व-श-र-म-भ (विश्रम्भ) से हासिल करने में कितनी कठिनाई हो रही है । इसे हम वर्णविपर्ययका उदाहरण मानते हुए उल्टे क्रम में चलते हुए अन्तिम वर्ण ‘भ’ को सबसे पहले लाते हैं । फिर अनुनासिक ‘म’ का लोप करते हैं । उसी क्रम में हम ‘भ’ के बाद ‘र’ को रखते हैं फिर एकदम आदिस्थानीय व्यंजन ‘व’ को तीसरे क्रम पर रखते हैं और अन्त में ‘श’ को ‘स’ में बदलते हुए ‘भरवसा’ का निर्माण करते हैं । यह अव्यावहारिक लगता है । हालाँकि प्राचीन मराठी में ‘भरवसा’ के स्थान पर ‘र’ में अनुनासिकता थी अर्थात यह भरंवसा था । इसके बावजूद वर्णविपर्यय के जरिये इस शब्द के निर्माण की बात गले नहीं उतरती । भरवसा के आगे कुलकर्णी ने सिर्फ़ विश्रम्भ लिखने के अलावा और कोई संकेत नहीं दिया है ।
मतौर पर भरोसा को विश्वास का पर्याय ही समझा जाता है पर दोनों की अर्थवत्ता में अन्तर है ।‘भरोसा’ का मुख्य भाव है किसी पर जिम्मेदारी आयद कर उस पर निर्भर रहना । इसमें किसी उद्धेश्य की कार्यसिद्धि ज़रूरी है । किन्हीं परिस्थितियों में इससे विश्वास का भावबोध भी होता है । ज़ाहिर है पुरातन समाज में भरोसा के भीतर नैतिक बाध्यता थी कि काम होना ही है । मगर बाद के दौर में भरोसा परनिर्भरता का पर्याय बन गया तब ‘रामभरोसे’ जैसी कहावतें सामने आईं यानी भरोसे पर नहीं रहना चाहिए । रामचंद्र वर्मा शब्दार्थ विचार कोश में हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा का उद्धरण देते हैं “ भट्टिनी मेरे ऊपर विश्वास भले ही रखती हो, भरोसा नहीं रखती ” भाव यही है कि उसे मेरे चरित्र और सज्जनता पर कोई संदेह नहीं, मगर मैं सहारा या अवलम्ब बनूंगा, इसकी आशा नहीं है ।  नए सन्दर्भ में इसे यूँ समझ सकते हैं – “मनमोहन सिंह पर विश्वास तो है, मगर भरोसा नहीं ।

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Friday, September 7, 2012

नाम में ही धरा है सब-कुछ !!

things

ना म में क्या रखा है ? शेक्सपीयर के प्रख्यात प्रेम-कथानक की नायिका जूलियट के मुँह से रोमियो के लिए निकला यह जुमला इस क़दर मक़बूल हुआ कि आज दुनियाभर में इसका इस्तेमाल मुहावरे की तरह किया जाता है । चूँकि ये बात इश्क के मद्देनज़र दुनिया के सामने आई और इश्क में सिवाय इश्क के कुछ भी ज़रूरी नहीं होता...तब रोमियो के इश्क में मुब्तिला जूलियट के इस जुमले को ज्यादा तूल नहीं दिया जाना चाहिए । दुनियादारी में तो नाम ही सबकुछ है । यानी “बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ” जैसा नकारात्मक आशावाद आज ज्यादा चलन में है । ये नाम की महिमा है कि हर आशिक रोमियो, फरहाद, मजनू जैसे नामों से नवाज़ा जाता है और हर माशूक को जूलियट, शीरीं, लैला का नाम मिल जाता है । नाम दरअसल क्या है ? हमारी नज़रों के सामने, समूची सृष्टि में जितने भी पदार्थ हैं उनका परिचय करानेवाला शब्द ही नाम है । इसे संज्ञा भी कहा जाता है । संज्ञा हिन्दी का जाना पहचाना शब्द है । प्राथमिक व्याकरण के ज़रिए हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति इससे परिचित है । संज्ञा के दायरे में हर चीज़ है । जड-गतिशील, स्थूल-सूक्ष्म, दृष्य-अदृष्य, वास्तविक-काल्पनिक, पार्थिव-अपार्थिव इन सभी वर्गों में जो कुछ भी हमारी जानकारी में है, उसे संज्ञा कहा जा सकता है । संज्ञा के मूल में सम + ज्ञा है । सम अर्थात बराबर, पूरी तरह, एक जैसा आदि । अर्थात जिससे किसी पदार्थ के रूप, गुण, आयाम का भलीभाँति पता चले, वही संज्ञा है । संज्ञा यानी नाम ।
संस्कृत की ज्ञा धातु में जानने, समझने,बोध होने, अनुभव करने का भाव है । बेहद लोकप्रिय और बहुप्रचलिशब्द नाम के मूल में यही ज्ञा धातु है । अंग्रेजी के नेम name का भी इससे गहरा रिश्ता है । संस्कृत में ज्ञ अपने आप में स्वतंत्र अर्थ रखता है जिसका मतलब हुआ जाननेवाला, बुद्धिमान, बुध नक्षत्र और विद्वान। ज्ञा क्रिया का मतलब होता है सीखना, परिचित होना, विज्ञ होना, अनुभव करना आदि । संज्ञा में चेतना का भाव है और होश का भी । ये दोनो ही शब्द बोध कराने से जुड़े हैं । अचेत और बेहोश जैसे शब्दों में कुछ भी जानने योग्य न रहने का भाव है । संज्ञाशून्य, संज्ञाहीन यानी जिसे कुछ भी बोध न हो । ज्ञ दरअसल संस्कृत में ज+ञ के मेल से बनने वाली ध्वनि है । इसके उच्चारण में क्षेत्रीय भिन्नता है । मराठी में यह ग+न+य का योग हो कर ग्न्य सुनाई पड़ती है तो महाराष्ट्र के ही कई हिस्सों में इसका उच्चारण द+न+य अर्थात् द्न्य भी है। गुजराती में ग+न यानी ग्न है तो संस्कृत में ज+ञ के मेल से बनने वाली ञ्ज ध्वनि है। दरअसल इसी ध्वनि के लिए मनीषियों ने देवनागरी लिपि में ज्ञ संकेताक्षर बनाया मगर सही उच्चारण बिना समूचे हिन्दी क्षेत्र में इसे ग+य अर्थात ग्य के रूप में बोला जाता है । भाषा विज्ञानियों ने प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार में इसके लिए जो धातु ढूंढी है वह है gno यानी ग्नो । 
ज़रा गौर करें इस ग्नों से ग्न्य् की समानता पर । ये दोनों एक ही हैं। अब बात इसके अर्थ की । ज्ञा से बने ज्ञान का भी यही मतलब होता है। ज+ञ के उच्चार के आधार पर ज्ञान शब्द से जान अर्थात जानकारी, जानना जैसे शब्दों की व्युत्पत्ति हुई। अनजान शब्द उर्दू का जान पड़ता है मगर वहां भी यह हिन्दी के प्रभाव में चलने लगा है । मूलतः यह हिन्दी के जान यानी ज्ञान से ही बना है जिसमें संस्कृत का अन् उपसर्ग लगा है । ज्ञा धातु में ठानना, खोज करना, निश्चय करना, घोषणा करना, सूचना देना, सहमत होना, आज्ञा देना आदि अर्थ भी समाहित हैं । यानी आज के इन्फॉरमेशन टेकनोलॉजी से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें अकेले इस वर्ण में समाई हैं । इन तमाम अर्थों में हिन्दी में आज अनुज्ञा, विज्ञ, प्रतिज्ञा और विज्ञान जैसे शब्द प्रचलित हैं। ज्ञा से बने कुछ अन्य महत्वपूर्ण शब्द ज्ञानी, ज्ञान, ज्ञापन खूब चलते हैं। गौर करें जिस तरह संस्कृत-हिन्दी में वर्ण में बदल जाता है वैसे ही यूरोपीय भाषा परिवार में भी होता है। प्राचीन भारोपीय भाषा फरिवार की धातु gno का ग्रीक रूप भी ग्नो ही रहा मगर लैटिन में बना gnoscere और फिर अंग्रेजी में ‘ग’ की जगह ‘क’ ने ले और gno का रूप हो गया know हो गया । बाद में नालेज जैसे कई अन्य शब्द भी बने। रूसी का ज्नान ( जानना ), अंग्रेजी का नोन ( ज्ञात ) और ग्रीक भाषा के गिग्नोस्को ( जानना ), ग्नोतॉस ( ज्ञान ) और ग्नोसिस (ज्ञान) एक ही समूह के सदस्य हैं । गौर करें हिन्दी-संस्कृत के ज्ञान शब्द से इन विजातीय शब्दों के अर्थ और ध्वनि साम्य पर ।
ब आते हैं नाम पर । संस्कृत में भी नाम शब्द है । इसका आदिरूप ज्ञाम अर्थात ग्नाम ( ग्याम नहीं ) रहा होगा, ऐसा डॉ रामविलास शर्मा समेत अनेक विद्वानों का मत है । ग्नाम से आदि स्थानीय व्यंजन का लोप होकर सिर्फ नाम शेष रहा । ज्ञाम से नाम के रूपान्तर का संकेत संस्कृत रूप नामन् से भी मिलता है । अवेस्ता में भी यह नाम / नामन् है । फ़ारसी में यह नाम / नामा हो जाता है । इसका लैटिन रूप नोमॅन है जो संस्कृत के नामन के समतुल्य है । नामवाची संज्ञा के अर्थ में अंग्रेजी का नेम name का विकास पोस्ट जर्मनिक के नेमॉन namon से हुआ । वाल्टर स्कीट के मुताबिक इसका सम्बन्ध लैटिन के नोमॅन और ग्रीक ग्नोमेन से है । लैटिन नोमॅन, ग्रीक ग्नोमेन gnomen से निकला है । मोनियर विलियम्स नामन् के मूल में ज्ञा अथवा म्ना धातुओं की संभाव्यता बताते हैं । विलियम व्हिटनी जैसे भारोपीय भाषाओं के विद्वानों के मुताबिक म्ना चिन्तन, मनन, दर्शन का भाव है । गौर करें कि ज्ञा और म्ना दोनो की अनुभूति एक ही है । नाम शब्द ज्ञा और ग्ना शब्दमूल से बना है ऐसा डॉ रामविलास शर्मा का मानना है । ज्ञा अर्थात gna । इसका एक रूप jna भी बनता है और kna भी (know में ) । ख्यात प्राच्यविद थियोडोर बेन्फे संस्कृत नामन् का एक रूप ज्नामन भी बताते हैं जो पूर्व वैदिक ग्नामन की ओर संकेत करता है । नाम का पूर्व रूप ग्नाम रहा होगा, यही बात डॉ रामविलास शर्मा भी कह रहे हैं । वाल्टर स्कीट की इंग्लिश एटिमोलॉ डिक्शनरी में भी ये दोनों रूप मिलते हैं । रूसी में इसका रूप ज्नामेनिए है ।
पनाम के लिए हिन्दी में सरनेम शब्द अपना लिया गया है । इसमें नेम वही है जो नाम है और अंग्रेजी के सर उपसर्ग में ऊपर, परे, उच्च वाला आशय है । सरनेम से आशय कुलनाम या समूह की उपाधि से है जो उसके सदस्यों की पहचान होती है । नाम से बने अनेक शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं मसलन नामक  का भी खूब इस्तेमाल होता है जिसमें नामधारी का भाव है । नामधारी यानी उस नाम से पहचाना जाने वाला । नाम रखने की प्रक्रिया नामकरण कहलाती है । गौर करें, संज्ञाकरण का अर्थ भी नाम रखना होता है । किसी सूची या दस्तावेज़ में नाम लिखवाने को नामांकन कहते हैं । मनोनयन के लिए नामित शब्द भी प्रचलित है । इसका फ़ारसी रूप नामज़द है । नामराशि शब्द भी आम है यानी एक ही नाम वाला । नामवर यानी प्रसिद्ध । नाममात्र यानी थोड़ी मात्रा में । नाम शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता भी बोली-भाषा में सामने आती है । नामकरण तो नवजात का नाम रखने की क्रिया है पर नाम धरना या नाम रखना में नकारात्मक अर्थवत्ता है जिसका अर्थ होता है बुराई करना, निंदा करना आदि । नाम उछालना या नाम निकालना में भी ऐसे ही भाव हैं । नाम रोशन करना यानी अच्छे काम करना । कीर्ति बढ़ाना । प्रसिद्ध होना । नाम बिकना यानी खूब प्रभावी होना । नामो-निशां मिटना यानी सब कुछ खत्म हो जाना । नाम जपना यानी किसी का नाम रटना । किसी के प्रति आस्था जताना ।

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Wednesday, September 5, 2012

मतलबी तालिबान

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कु छ शब्द ऐसे होते हैं जो सामान्य बातचीत का अभिन्न हिस्सा होते हैं । ऐसे शब्दों के बिना कोई संवाद हो ही नहीं सकता । ऐसा ही एक शब्द है मतलब । “ क्या मतलब ?” “ मतलब ये कि...” गौर करें कि सुबह से शाम तक इन दो छोटे वाक्यों का साबका हमसे कितनी बार पड़ता है और क्या इनके बिना हमारा अभिप्राय और उद्धेश्य सिद्ध हो सकता है ? कई लोगों को 'मतलब' की 'तलब' इतनी ज्यादा होती है कि उनका तकियाकलाम ही “मतलब कि…” बन जाता है । “मतलब कि…” वाली बैसाखी का इस्तेमाल किए बिना उनकी बात पूरी हो ही नहीं सकती । मतलब के ज़रिए हमारी कितनी तरह की बातों को अभिव्यक्त करते हैं जैसे- इरादा, उद्धेश्य, प्रयोजन, इष्ट, मनोरथ, अभिप्राय, अर्थ, मुराद, हेतु, इरादा, विचार, लक्ष्य, बात, विषय आदि । सामान्य तौर पर मतलब का प्रयोग अर्थ जानने के संदर्भ में होता है ।
तलब की व्याप्ति मराठी, गुजराती से लेकर उत्तर भारत की लगभग सभी भाषाओं मे है और उद्धेश्य, अर्थ, अभिप्राय अथवा प्रयोजन जानने के संदर्भ में इसका प्रयोग होता है । सेमिटिक मूल का मतलब अरबी से बरास्ता फ़ारसी, भारतीय भाषाओं में दाखिल हुआ । सेमिटिक धातु त-ल-ब / ṭā lām bā यानी ( ب ل ط ) से जन्मा है । अल सईद एम बदावी की कुरानिक डिक्शनरी के मुताबिक इसमें तलाश, खोज, चाह, मांग, परीक्षा, अभ्यर्थना, विनय और प्रार्थना जैसे भाव हैं । इससे ही जन्मा है 'तलब' शब्द जो हिन्दी का खूब जाना पहचाना है । तलब यानी खोज या तलाश । तलब के मूल मे 'तलाबा' है जिसमें रेगिस्तान के साथ जुड़ी सनातन प्यास का अभिप्राय है । आदिम मानव का जीवन ही न खत्म होने वाली तलाश रहा है । दुनिया के सबसे विशाल मरुक्षेत्र में जहाँ निशानदेही की कोई गुंजाइश नहीं थी । चारों और सिर्फ़ रेत ही रेत और सिर पर तपता सूरज । ऐसे में सबसे पहले पानी की तलाश, आसरे की तलाश, भटके हुए पशुओं की तलाश...अंतहीन तलाशों का सिलसिला थी प्राचीन काल में बेदुइनों की ज़िंदगी । तलब शब्द का रिश्ता आज भी प्यास से जुड़ता है । ये अलग बात है कि अब पीने-पिलाने या नशे की चाह के संदर्भ में तलब शब्द का ज्यादा प्रयोग होता है ।
लब समेत इससे बने कुछ और शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे तलबगार यानी इच्छुक, चाहनेवाला, मांगनेवाला आदि । आरामतलब यानी सुविधाभोगी । इसका प्रयोग आलसी के अर्थ में भी होता है । तलब में मुहावरेदार अर्थवत्ता है जैसे तलब करना । इसका अर्थ है किसी को बुलाना । अक्सर इसमें आदेशात्मक भाव ही होता है । यह भाव और स्पष्ट होता है तलबनामा से । अदालती शब्दावली में इसका इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ है न्यायालय में हाज़िर होने का आज्ञापत्र । इसे समन भी कह सकते हैं । पूर्वी उत्तरप्रदेश में तलबाना वह रकम है जो गवाहों को अदालत में बुलवाने के खर्च के तौर पर (रसीदी टिकट या स्टाम्प पेपर ) वसूला जाता है । कुल मिलाकर चाह, इच्छा के अलाव इसमें बुलाहट, बुलावा का भाव भी है । तलब में ही अरबी का ‘म’ उपसर्ग लगने से मतलब बना है । इसमें भी चाह, इच्छा, तलाश, प्रार्थना, कामना, लालसा, मांग जैसे भाव हैं जो सीधे सीधे तलब से जुड़ते हैं ।
तलब की विशिष्ट अर्थवत्ता दरअसल चाह, कामना, मांग से आगे जा कर अर्थ, अभिप्राय, आशय, उद्धेश्य, मंशा या वजह से जुड़ती है और ज्यादातर भारतीय भाषाओं में इन्हीं अर्थों में मतलब का प्रयोग होता है । “मेरा मतलब ये है” और “मैं यह कहना चाहता हूँ” दोनों का अभिप्राय एक ही है । मतलब और चाह एक दूसरे के आसान पर्याय हैं । मतलब का कई तरह से प्रयोग होता है । खुदगर्ज़, स्वार्थी इन्सान को मतलबी कहा जाता है । अर्थात वह सिर्फ़ अपनी मंशा साधने या इच्छापूर्ति के प्रयास में लगा रहता है । यही आशय मतलबपरस्त का भी है । मतलब की दोस्ती, मतलब की यारी जैसे मुहावरेदार प्रयोग भी आम हैं । मराठी में स्वार्थी का पर्याय आपमतलबी भी होता है । मतलबदार और मतलबीयार जैसे प्रयोग भी मराठी में हैं ।
लब से ही 'तालिब' बनता है जिसका अर्थ है ढूंढनेवाला, खोजी, अन्वेषक, जिज्ञासु । तालिब-इल्म का अर्थ हुआ ज्ञान की चाह रखनेवाला अर्थात शिष्य, चेला, विद्यार्थी, छात्र आदि । इस तालिब का पश्तो में बहुवचन है तालिबान । तालिब यानी जिज्ञासु का बहुवचन पश्तो में आन प्रत्यय लगा कर बहुवचन तालिबान बना । उर्दू में अंग्रेजी के मेंबर में आन लगाकर बहुवचन मेंबरान बना लिया गया है । आज तालिबान दुनियाभर में दहशतगर्दी का पर्याय है । तालिबान का मूल अर्थ है अध्यात्मविद्या सीखनेवाला । हम इस विवरण में नहीं जाएंगे कि किस तरह अफ़गानिस्तान की उथल-पुथल भरी सियासत में कट्टरपंथियों का एक अतिवादी विचारधारा वाला संगठन करीब ढाई दशक पहले उठ खड़ा हुआ । खास बात यह कि उथल-पुथल के दौर में नियम-कायदों की स्थापना के नाम पर मुल्ला उमर ने अपने शागिर्दों की जो फौज तालिबान के नाम से खड़ी की, उसने तालिब नाम की पवित्रता पर इतना गहरा दाग़ लगाया है कि तालिबान शब्द शैतान का पर्याय हो गया ।
इन्हें भी देखें-1.औलिया की सीख, मुल्ला की दहशत .2.मुफ्ती के फ़तवे.3.ये मतवाला, वो मस्ताना.4.दरवेश चलेंगे अपनी राह.5.इश्क पक्का, मंजिल पक्की6.दमादम मस्त कलंदर7.करामातियों की करामातें.8.बेपरवाह मस्त मलंग.9.ऋषि कहो, मुर्शिद कहो, या कहो राशिद.10.मदरसे में बैठा मदारी.11.ख्वाजा मेरे ख्वाजा.12.सब मवाली… गज़नवी से मिर्ची तक.13.बावला मन… करे पिया मिलन.14.पीर-पादरी से परम-पिता तक

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Tuesday, September 4, 2012

बेफजूल आलिम-फ़ाज़िल

teaching

हमारे आस-पास जो दुनिया है वह दरअसल बाज़ार है और ये बाज़ार ही भाषा की टकसाल भी है । आए दिन न जाने कितने शब्दों की यहाँ घिसाई, ढलाई होती है । न जाने कितने शब्दों का यहाँ रूप, रंग, चरित्र बदल जाता है । भोलानाथ तिवारी के शब्दों में कहें तो कुछ मोटे हो जाते हैं तो कुछ दुबले । यहाँ तक कि कुछ शब्द तो यहाँ गुम भी हो जाते हैं । हिन्दी में अरबी-फ़ारसी शब्दों की बड़ी रेलमपेल लगी रहती है । कई शब्द जस के तस हमने अपना लिए तो कई का चेहरा बदल दिया  जैसे व्यर्थ, निरर्थक की अर्थवत्ता वाला ‘फिजूल’ शब्द । दरअसल अरबी का मूल शब्द ‘फ़ुज़ुल’ है मगर मोहम्मद मुस्तफ़ा खाँ मद्दाह साहब ने अपने कोश में इसका एक रूप फ़िज़ूल भी दिया है । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक इसका हिन्दी रूप ‘फुजूल’ है,मगर आज़ादी के बाद की हिन्दी ने ‘फुजूल’ नहीं, फिजूल / फ़िज़ूल को अपनाया है । हाँ, देहाती अंदाज़ में इसे फजूल भी कहा जाता है । फ़ारसी के ‘बे’ उपसर्ग में रहित का भाव होता है सो ग्रामीण समाज ने फिजल को और ज़ोरदार बनाने के लिए ‘बेफजूल’ शब्द भी बना डाला । हमारा मानना है कि नुक़ते के बिना अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ न्याय नहीं हो पाता । ‘फ़ुज़ूल’ बोलना हिन्दी में नाटकीय लगेगा इसलिए प्रचलित ‘फुजूल’ या ‘फजूल’ की बजाय ‘फिजूल’ ही चलना चाहिए । चाहें तो नुक़ता लगा कर इसे ‘फ़िज़ूल’ लिख सकते हैं ।
किसी व्यक्ति की विद्वत्ता का उल्लेख करते हुए हम ‘आलिम-फ़ाज़िल’ पद का प्रयोग भी करते हैं । यह हिन्दी साहित्य में भी मिलता है और बोलचाल बोलचाल की भाषा में भी इसका प्रयोग होता है । ‘आलिम-फ़ाज़िल’ में मूलतः खूब पढ़े-लिखे होने का भाव है । शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से देखें तो ‘आलिम’ यानी शिक्षक, जानकार । जिसने बुनियादी तालीम ली हो । इस तरह आलिम का अर्थ स्नातक होता है । ‘फ़ाज़िल’ में उत्कृष्टता का भाव है ज़ाहिर है ‘फ़ाज़िल’ यानी उच्चस्नातक । इस तरह आलिम-फ़ाज़िल की मुहावरेदार अर्थवत्ता बनी खूब पढ़ा-लिखा, विद्वान, काबिल आदि । जहाँ तक आलिम-फ़ाज़िल वाले फ़ाज़िल का प्रश्न है, यह सेमिटिक धातु f-z-l (फ़ा-ज़ा-लाम) का शब्द है इसका सही रूप ‘फ़ज़्ल’ है जिसमें मेहरबानी, कृपा, दया, योग्यता, क़ाबिलियत, गुणवत्ता के साथ साथ आधिक्य, श्रेष्टत्व, अत्युत्तम जैसे भाव हैं । '”खुदा के फ़ज़ल से” या “अल्लाह के फ़ज़ल” से जैसे वाक्यों में हम इसे समझ सकते हैं । f-z-l के भीतर सम्मानित करना, विभूषित करना जैसे भाव हैं । ‘फ़ज़्ल’ की कड़ी में ही आता है ‘अफ़ज़ल’ जो चर्चित व्यक्तिनाम है जिसका अर्थ है आदरणीय, सम्मानित, मेहरबान, कृपालु, गुणवान, सर्वोत्तम आदि । स्पष्ट है कि आलिम यानी होने के बाद फ़ाज़िल होना भी ज़रूरी है । यह उससे ऊँची उपाधि है । इल्म की तालीम लेने के बाद आप आलिम बनते हैं । यह ज्ञान जब चिन्तन की ऊँचाई पर पहुँचता है तो ‘आलिम’ आगे जाकर  ‘फ़ाज़िल’ बनता है ।
सी कड़ी में ‘फ़ुज़ूल’ भी आता है । ‘फ़िज़ूल’ का सबसे ज्यादा प्रयोग अत्यधिक खर्च सम्बन्ध में होता है जैसे ‘फ़िज़ूलखर्च’ या ‘फ़िज़ूलखर्ची’ आदि । दिलचस्प यह है कि यह फ़िज़ूल दलअसल फ़ज़ल या फ़ज्ल के पेट से निकला है जिसका अर्थ है कृपा, दया, सम्मान, मेहरबानी, विद्वत्ता, श्रेष्ठत्व आदि । फ़ज़्ल में निहित तमाम सकारात्मक भावों से फ़ुज़ूल / फ़िज़ूल में निहित अनावश्यक, अत्यधिक, बेकार, बेमतलब, बेकार, निकम्मा जैसे भावों से साम्य नहीं बैठता । जान प्लैट्स के अ डिक्शनरी ऑफ उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एंड इंग्लिश के मुताबिक यह फ़ज़्ल का बहुवचन है । फ़ज़्ल में निहित अत्यधिक के भाव पर गौर करें । हर पैमाने पर जो अपने चरम पर हो, उसका बहुवचन कैसा होगा ? अति सर्वत्र वर्जयेत । अत्यधिक मिठास दरअसल कड़ुआ स्वाद छोड़ती है । फ़ज़्ल के फ़ुज़ूल बहुवचन का लौकिक प्रयोग दरअसल इसी भाव से प्रेरित है । अत्यधिक श्रेष्ठत्व दम्भ पैदा करता है । दम्भ के आगे श्रेष्ठत्व फ़िज़ूल हो गया । बहुत सारी चीज़ों का संग्रह भी बेमतलब का जंजाल हो जाता है । फ़िज़ूल में यही भाव है ।
लिम शब्द का ‘इल्म’ से रिश्ता है । अन्द्रास रज्की के अरबी व्युत्पत्ति कोश में आलिम के मूल में ‘अलामा’ शब्द है जिसमें ज्ञान का भाव है । जिस तरह विद्वत्ता का विद्या से रिश्ता है और विद्या के मूल में ‘विद्’ धातु है जिसमें मूलतः ज्ञान का भाव है । वह बात जो उजागर हो, पता चले । इसीलिए ‘ज्ञानी’ को ‘जानकार’ कहते हैं । ‘ज्ञान’ का ही देशी रूप ‘जान’ है जिससे ‘जानना’, ‘जाना’ (तथ्य), ‘जानी’ (बात) या ‘जानकारी’ जैसे शब्द बने हैं । अरबी मूल का है इल्म जिसमें जानकारी होना, बतलाना, ज्ञान कराना, विज्ञापन जैसे भाव है । सेमिटिक धातु अलीफ़-लाम-मीम (a-l-m) में जानना, मालूम होना, अवगत रहना, ज्ञान देना या सूचित करना जैसे भाव हैं । इससे बने कई शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं । ‘आलिम’ का मूल अर्थ है अध्यापक, पंडित, अध्येता, विद्वान आदि । महाकवि सर मोहम्मद इक़बाल की ख्याति एक दार्शनिक कवि की थी और इसीलिए उन्हें ‘अल्लामा’ की उपाधि मिली हुई थी जिसका अर्थ है सर्वज्ञ, सर्वज्ञाता, पंडित आदि । इसी कतार में आता है ‘उलेमा’ जिसका अर्थ भी ज्ञानी, जानकार, शिक्षक होता है । इसका सही रूप है ‘उलमा’ ulama मगर हिन्दी में इसे उलेमा ही लिखा जाता है । बहुत सारे आलिम यानी उलमा यानी विद्वतजन । मगर हिन्दी के बड़े-बड़े ज्ञानी भी का बहुवचन ‘उलेमाओं’ लिखते हैं । यह ग़लत है । उलेमा अब धार्मिक शिक्षक के अर्थ में रूढ़ हो गया है ।
हिन्दी में ‘तालीम’ talim शब्द भी शिक्षा के अर्थ में खूब चलता है । ‘तालीम’ भी ‘इल्म’ से जुड़ा है और इसके मूल में अरबी का ‘अलीमा’ है । अन्द्रास रजकी के कोश के मुताबिक अरबी के ‘अलामा’ और ‘अलीमा’ शब्दों में मूलतः ज्ञान का आशय है । तालीम शब्द के मूल में अलीमा है जिसमें अलिफ़-लाम-मीम ही है मगर ‘ता’ उपसर्ग लगा है जिसमें परस्परता, सहित या तक का भाव है । कृपा कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश के मुताबिक इसका अर्थ अध्यापन, अनुशासन, नियम, व्यायाम और प्रशिक्षण है । इसका मूल रूप तअलीम t’alim है । इधर मराठी में शारीरिक व्यायाम के अर्थ में तालीम शब्द रूढ़ हो गया है । मराठी में तालीमखाना यानी व्यायामशाला या अखाड़ा होता है और तालीमबाज यानी व्यायामप्रिय । जबकि हिन्दी में तालीम से बने तालीमगाह यानी पाठशाला और तालीमयाफ़्ता यानी पढ़ा-लिखा जैसे शब्द हिन्दी के जाने-पहचाने हैं । आजकल हमारे शिक्षा संस्थानों में भी दरअसल दाव-पेच ज्यादा होते हैं । उन्हें तालीमगाह की बज़ाय तालीमखाना यानी अखाड़ा कहना  बेहतर होगा ।
झंडे को अरबी में अलम alam कहा जाता है । सेमिटिक धातु a-l-m में निहित जानकारी कराने के भाव पर गौर करें । कोई भी ध्वज दरअसल किसी न किसी समूह या संगठन की पहचान होता है । अलम का अर्थ चिह्न, निशान इस मायने में सार्थक है । ध्वजवाहक के लिए हिन्दी में झंडाबरदार शब्द है जिसकी मुहावरेदार अर्थवत्ता है । यह हिन्दी के झंडा के साथ फ़ारसी का बरदार लगाने से बना है । मुखिया, नेता या अगुवा के अर्थ में भी झंडाबरदार शब्द प्रचलित है । ध्यान रहे किसी संगठन या समूह की इज़्ज़त, पहचान उसके मुखिया से जुड़ी होती है । उसे बरक़रार रखने वाला ही झंडाबरदार कहलाता है । हालाँकि इसमें भाव ध्वज थामने वाले का ही है । अरबी के अलम के साथ फ़ारसी का बरदार लगाने से बना है जिसका ‘वाला’ का भाव है । इस तरह अलमबरदार का अर्थ भी पताका थामने वाले के लिए प्रचलित है ।
जिस तरह अलीमा अर्थात ज्ञान में ‘ता’ उपसर्ग लगने से तालीम बनता है उसी तरह ‘मा’ उपसर्ग लगने से ‘मालूम’ बनता है । अवगत रहने, पता रहने, जानकारी होने के अर्थ में मालूम शब्द रोज़मर्रा की हिन्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त शब्दों में शुमार है । मालूम में ज्ञात अर्थात known का भाव है । अलीमा में know का भाव है तो ‘मा’ उपसर्ग लगने से यह ज्ञात में बदल जाता है । उत्तर प्रदेश के देवबंद में इस्लामी शिक्षा का विख्यात केन्द्र ‘दारुलउलूम’ है जिसका अर्थ है विद्यालय यानी वह स्थान जहाँ ज्ञान मिलता हो । इसमें जो उलूम है उसका अर्थ है विविध विद्याएँ, विषय अथवा ज्ञान की बातें । दरअसल यह इल्म यानी ज्ञान का बहुवचन है । जिस तरह आलिम का बहुवचन उलमा हुआ वैसे ही इल्म का बहुवचन उलूम हुआ अर्थात विविध आयामी सांसारिक और आध्यात्मिक ज्ञान । हमें जिस चीज़ का भी इल्म है, दरअसल वह सब संसार और भवसंसार से सम्बन्धित है इसलिए इसी कड़ी में आता है आलम यानी संसार । जो कुछ भी ज्ञात है, वही संसार है ।

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Friday, August 24, 2012

सपड़-सपड़ सूप

soup

चु स्की के लिए हिन्दी में सिप शब्द बेहद आसानी से समझा जाता है । सिप करने, चुसकने की लज़्ज़त जब ज्यादा ही बढ़ जाती है तब बात सपड़-सपड़ तक पहुँच जाती है जिसे अच्छा नहीं समझा जाता है । कहने की ज़रूरत नहीं की सिप करना, चुसकना और सपड़-सपड़ करने का रिश्ता किसी सूप जैसे पतले, तरल, शोरबेदार पदार्थ का स्वाद लेने की प्रक्रिया से जुड़ा है । सिप से सपड़ का सफर शिष्टता से अशिष्टता की ओर जाता है । सिप और सपड़-सपड़ तरल पदार्थ को सीधे बरास्ता होठ, जीभ के ज़रिये उदरस्थ करने की क्रिया है। सिप के ज़रिये ज़ायक़ा सिर्फ़ पीने वाले को महसूस होता है वहीं सपड़-सपड़ का चटखारा औरों को भी बेचैन कर देता है । गौरतलब है कि सूप शब्द आमतौर पर अंग्रेजी का समझा जाता है । हकीक़त यह है कि पाश्चात्य आहार-शिष्टाचार का प्रमुख हिस्सा सूप मूलतः भारतीय है । सूप, सिप, सपर, सपड़, सापड़ जैसे तमाम शब्द आपस में रिश्तेदार हैं । यही नहीं, इस शब्द शृंखला के शब्द विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में भी हैं जिनमें चुसकने, सुड़कने, सिप करने का भाव है ।
चुस्की के लिए सिप शब्द याद आता है । सूप शब्द भारोपीय मूल का है और इसका मूल भी संस्कृत का सूप शब्द ही माना जाता है । जिसे सिप किया जाए, वह सूप। इसी कड़ी में सपर भी है । द्रविड़ में सामान्य भोजन सापड़ है और इंग्लिश में सिर्फ़ रात का भोजन सपर है। ध्वनिसाम्य और अर्थसाम्य गौरतलब है । यह सामान्य बात है विभिन्न भाषिक केन्द्रों पर अनुकरणात्मक ध्वनियों से बने शब्दों का विकास एक सा रहा है। अंग्रेजी में रात के भोजन को सपर इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें हल्का-फुल्का, तरल भोजन होता है। कई लोग रात में सिर्फ़ सूप ही लेते हैं । सपर का मूल सूप है । आप्टे और मो.विलियम्स के कोश में सूप का अर्थ रस, शोरबा, झोल, तरी जैसा पदार्थ ही कहा गया है । अंग्रेजी में यह तरल भोजन है । आप्टे कोश में सू+पा के ज़रिए इसे तरल पेय कहा गया है । यानी पीने की क्रिया से जोड़ा गया है । पकोर्नी इसकी मूल भारोपीय धातु सू seue बताते हैं जिसमें पीने की बात है । संस्कृत का सोम भी सू से ही व्युत्पन्न है । इसका अवेस्ता रूप होम है जिसमें पीने का आशय है । आदि-जर्मन रूप सप्प है । ज़ाहिर है प्राकृत, अपभ्रंश के ज़रिए हिन्दी का सपड़ रूप अलग से विकसित हुआ होगा और द्रविड़ सापड़ रूप अलग ।
वाशि आप्टे और मोनियर विलियम्स के कोश में सूप शब्द का अर्थ सॉस, तरी, शोरबा या झोलदार पदार्थ बताया गया है । हिन्दी शब्दसागर में इसे मूल रूप से संस्कृत शब्द बताते हुए इसके कई अर्थ दिए हैं जैसे मूँग, मसूर, अरहर आदि की पकी हुई दाल । दाल का जूस । रसा । रसे की तरकारी जैसे व्यंजन । संस्कृत में सूपक, सूपकर्ता या सूपकार जैसे शब्द हैं जिनका आशय भोजन बनाने वाला, रसोइया है । एटिमऑनलाईन के मुताबिक चौदहवीं सदी के उत्तरार्ध में अंग्रेजी में सिप शब्द दाखिल हुआ । संभवतः इसकी आमद चालू जर्मन के सिप्पेन से हुई जिसका अर्थ था सिप करना । पुरानी अंग्रेजी में इसका रूप सुपेन हुआ जिसमें एकबारगी मुँह में कुछ डालने का भाव था । रॉल्फ़ लिली टर्नर के मुताबिक महाभारत में आहार के तरल रूप में ही सूप शब्द का उल्लेख हुआ है । हिन्दी शब्दसम्पदा में एक अन्य सूप भी है । बाँस से बनाए गए अनाज फटकने के चौड़े पात्र के रूप में इसकी अर्थवत्ता से सभी परिचित हैं । आम भारतीय रसोई के ज़रूरी उपकरणों में इसका भी शुमार है । अनाज फटकने का मक़सद मूलतः दानों और छिलकों को अलग करना है । भक्तियुगीन कवियों ने सूप शब्द का दार्शनिक अर्थों में प्रयोग किया है । कबीर की “सार सार सब गहि लहै, थोथा देहि उड़ाय ” जैसी इस कालजयी सूक्ति में सूप की ओर ही इशारा है ।
चूसना, चुसकना बहुत आम शब्द हैं और दिनभर में हमें कई बार इसके भाषायी और व्यावहारिक क्रियारूप देखने को मिलते हैं। यही बात चखना शब्द के बारे में भी सही बैठती है। ये लफ्ज भारतीय ईरानी मूल के शब्द समूह का हिस्सा हैं और संस्कृत के अलावा फारसी, हिन्दी और उर्दू के साथ ज्यादातर भारतीय भाषाओं में बोले-समझे जाते हैं। चूसना, चुसकना, चुसकी शब्द बने हैं संस्कृत की चुष् या चूष् धातु से जिसका क्रम कुछ यूँ रहा- चूष् > चूषणीयं > चूषणअं > चूसना। इस धातु का अर्थ है पीना, चूसना । चुष् से ही बना है चोष्यम् जिसके मायने भी चूसना ही होते हैं । मूलत: चूसने की क्रिया में रस प्रमुख है । अर्थात जिस चीज को चूसा जाता वह रसदार होती है । जाहिर है होठ और जीभ के सहयोग से उस वस्तु का सार ग्रहण करना ही चूसना हुआ । चुस्की, चुसकी, चस्का या चसका जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं । गौरतलब है कि किसी चीज का मजा लेने, उसे बार-बार करने की तीव्र इच्छा अथवा लत को भी चस्का ही कहते हैं । एकबारगी होठों के जरिये मुँह में ली जा चुकी मात्रा चुसकी / चुस्की कहलाती है । बर्फ के गोले और चूसने वाली गोली के लिए आमतौर पर चुस्की शब्द प्रचलित है। बच्चों के मुंह में डाली जाने वाली शहद से भरी रबर की पोटली भी चुसनी कहलाती है। इसके अलावा चुसवाना, चुसाई, चुसाना जैसे शब्द रूप भी इससे बने हैं ।
सी कतार में खड़ा है चषक जिसका मतलब होता है प्याला, कप, मदिरा-पात्र, सुरा-पात्र अथवा गिलास । एक खास किस्म की शराब के तौर पर भी चषक का उल्लेख मिलता है । इसके अलावा मधु अथवा शहद के लिए भी चषक शब्द है। इसी शब्द समूह का हिस्सा है चष् जिसका मतलब होता है खाना । हिन्दी में प्रचलित चखना इससे ही बना है जिसका अभिप्राय है स्वाद लेना । अब इस अर्थ और क्रिया पर गौर करें तो इस लफ्ज के कुछ अन्य मायने भी साफ होते हैं और कुछ मुहावरे नजर आने लगते हैं जैसे कंजूस मक्खीचूस अथवा खून चूसना वगैरह । किसी का शोषण करना, उसे खोखला कर देना, जमा-पूंजी निचोड़ लेना जैसी बातें भी चूसने के अर्थ में आ जाती हैं । यही चुष् फारसी में भी अलग अलग रूपों में मौजूद है मसलन चोशीद: या चोशीदा अर्थात चूसा हुआ । इससे ही बना है चोशीदगी यानी चूसने का भाव और चोशीदनी यानी चूसने के योग्य ।

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Wednesday, August 22, 2012

‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’ [माया-2]

landscape1पिछली कड़ी-सरमायादारों की माया [माया-1] से आगे  

जॉ न प्लैट्स फ़ारसी के ‘मायः’ का रिश्ता संस्कृत के ‘मातृका’ से जोड़ते हैं पर यह बात तार्किक नहीं लगती । अमरकोश के मुताबिक ‘माया’ शब्द के मूल में वैदिक धातु ‘मा’ है जिसमें सीमांकन, नापतौल, तुलना, अधीन, माप, सम्पन्न, समाप्त, प्रसन्नता, खुशी, आनंद, कटि-प्रदेश, उलझाना, बांधना, ज्ञान, प्रकाश, जादू, तन्त्र, कालगणना आदि भाव हैं । इससे ही बना है ‘माप’ शब्द । किसी वस्तु के समतुल्य या उसका मान बढ़ाने के लिए प्रायः ‘उपमा’ शब्द का प्रयोग किया जाता हैं । यह इसी कड़ी का शब्द है । इसी तरह ‘प्रति’ उपसर्ग लगने से मूर्ति के अर्थ वाला ‘प्रतिमा’ शब्द बना। प्रतिमा का मतलब ही सादृश्य, तुलनीय, समरूप होता है । दिलचस्प बात यह कि फारसी का ‘पैमाँ’, ‘पैमाना’ या ‘पैमाइश’ शब्द भी इसी मूल से जन्मा है । संस्कृत उपसर्ग ‘प्रति’ का समतुल्य फ़ारसी का ‘पैति’ है । प्रति+मान से ‘प्रतिमान’ बनता है उसी तरह ‘पैति+मा’ से ‘पैमाँ’ (पैमान, पैमाना) बनता है । जो हिन्दी में प्रतिमान है वही फ़ारसी में पैमाना है । आयाम का कुछ अप्रचलित पर्याय ‘विमा’ भी इसी ‘मा’ से जन्मा है ।
लैटिन के ‘मेट्रिक्स’ matrix में भी अंतरिक्ष की परिमाप, विस्तार और मातृ सम्बन्धी भाव है । संस्कृत ‘मातृ’ और ‘मेट्रिक्स’ में रिश्तेदारी है । इसका रिश्ता भारोपीय धातु मे ‘me’ से जुड़ता है जिसके लिए संस्कृत मे ‘मा’ धातु है । मेट्रिक्स में स्त्री योनि, उर्वरता, गर्भ जैसे भाव हैं । यहाँ माँ के अर्थ में जननिभाव प्रमुख है और निरन्तर उर्वरता पर गौर करना चाहिए । वैदिक मा में इसके अलावा भी माता, उर्वरता, पृथ्वी, काल, मांगल्य, स्वामित्व, माया, जल जैसे आशय हैं । गौर करें ‘अम्मा’ के मूल में ‘अम्बा’ और प्रकारान्तर से ‘अम्बु’ यानी जल ही है । जल समृद्धि का प्रतीक है । प्रकृति के जलतत्व से ही जीवन सिरजा है । जल में ही जीवन है । इन दोनों मूल धातुओं में नाप, माप, गणना आदि भाव हैं । यानी बात खगोलपिंडों तक पहुँचती है ।
भारतीय परम्परा में ‘मा’ धातु की अर्थवत्ता भी व्यापक है । ‘मा’ धातु में चमक, प्रकाश, माप का भाव है जो स्पष्ट होता है चन्द्रमा से । प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ । स्पष्ट तो नहीं, मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए ‘मा’ शब्द रहा होगा । ‘मा’ के अंदर चन्द्रमा की कलाओं के लिए घटने-बढ़ने का भाव भी अर्थात उसकी ‘परिमाप’ भी शामिल है । गौर करे कि फारसी के माह, माहताब, मेहताब, महिना शब्दों में ‘मा’ ही झाँक रहा है जो चमक और माप दोनों से सम्बन्धित है क्योंकि उसका रिश्ता मूलतः चांद से जुड़ रहा है जो घटता बढ़ता रहता है और इसकी गतियों से ही काल यानी माह का निर्धारण होता है । अंग्रेजी के मंथ के पीछे भी यही ‘मा’ है और इस मंथ के पीछे अंग्रेजी का ‘मून’ moon है ।
गौरतलब है कि सम्पत्ति का सबसे आदिम पैमाना भू-सम्पदा और पशु-सम्पदा ही रहे हैं । दौलत या सरमाया के अर्थ में बाकी चीजें तो सभ्यता के विकास के साथ-साथ शामिल होती चली गईँ । मुद्रा के आविष्कार के बाद सम्पत्ति में गणना की क्रिया भी शामिल हुई । प्राचीन काल में तो ज़मीन ही सम्पदा थी जिसका माप लिया जाता था, पैमाइश होती थी । बसाहट, खेती और अन्ततः आवास के लिए भूमि की नापजोख ज़रूरी थी ।  तो फ़ारसी के ‘सरमाया’ में जो ‘मायः’ है और संस्कृत-हिन्दी में जो ‘माया’ है उसका अभिप्राय धन-दौलत, सम्पदा से ही है । उसी अर्थ में ‘सरमाया’ शब्द का विकास ‘मायः’ से हुआ है । इन दोनो ही ‘माया’ के मूल में वैदिक ‘मा’ है । मनुष्य के पास प्रकृति को समझने लायक बुद्धि का विकास होने तक और उसके बाद भी प्रकृति उसके लिए अजूबा ही रही है । मनुष्य के ज्ञान का विकास प्रकृति को समझते हुए ही हुआ है । दुनिया को समझना ही ज्ञानी होना है । इसीलिए दुनियादारी शब्द में व्यावहारिक बुद्धि का संकेत है । दुनिया का ही व्यापक स्वरूप प्रकृति है ।
'मा' में मूलतः प्रकृति का ही भाव है । संस्कृत में ‘प्रमा’ का अर्थ होता है समझना, जानना, सच्चा ज्ञान, सही धारणा आदि । ‘प्रमा’ का एक अन्य अर्थ मातामही भी होता है । किसी चीज़ की पैमाइश करना, मापना आदि क्रियाएँ जानने-समझने का ही आयाम हैं । सो प्रकृति अपने आप में सम्पदा है । प्रकृति का निरीक्षण, माप-जोख की अभिव्यक्ति मा से होती है । मा की महिमा अपरम्पार है और इसकी अर्थवत्ता की वैविध्यपूर्ण विमाएँ ( आयाम ) ही इसे माया साबित करती है । ‘मा’ में निहित वैविध्यपूर्ण भावों से अर्थमाया की सृष्टि होती है । साफ़ है कि फ़ारसी का ‘मायः’ संस्कृत माया का समतुल्य ही है अलबत्ता मातृका, माया और ‘मायः’ तीनों के मूल में वैदिक ‘मा’ धातु ही है । [समाप्त]

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Tuesday, August 21, 2012

सरमायादारों की माया [माया-1]

अगली कड़ी-‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’ [माया-2]wealth

ला लित्यपूर्ण और प्रभावी भाषा प्रयोग करते हुए अक्सर कुछ लोग धन-दौलत के अर्थ में 'सरमाया' शब्द का इस्तेमाल करते हैं । दुनिया का मूल चरित्र हमेशा पूंजीवादी समाज रहा है । पैसे के दम पर क्या नहीं हो सकता । दौलतमंद सर्वशक्तिमान होता है । इसीलिए ‘सरमाया’ शब्द की अर्थवत्ता में असर की अर्थवत्ता भी शामिल है । ‘सरमाया’ यानी पूंजी, दौलत, धन, कैपिटल इसलिए सरमायादार का अर्थ हुआ पूंजीपति, मालदार, धनी, दौलतमंद आदि । सियासत और ‘सरमाया’ का चोली-दामन का साथ है । ‘मायः’ से बने सरमाया, सरमायादार, सरमायादाराना, सरमायादारी जैसे शब्द लिखत-पढ़त की भाषा में प्रचलित हैं । इसके अलावा ‘मायादार’ जैसा शब्द भी है जिसका अर्थ भी धनी, मालदार ही है ।
हिन्दी में ‘सरमाया’ शब्द फ़ारसी से आया है । ‘सरमाया’ को अरबी का समझा जाता है पर यह भारोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है और फ़ारसी के सर + ‘मायः’ से मिल कर बना है । गौरतलब है कि फ़ारसी का विकास बरास्ता अवेस्ता (वैदिक संस्कृत की मौसेरी बहन), पहलवी हुआ है । संस्कृत की तरह ही अवेस्ता में भी विसर्ग लगता रहा है और वहीं से यह फ़ारसी में भी चला आया । फ़ारसी के ‘मायः’ का उच्चारण माय’ह होना चाहिए मगर विसर्ग का उच्चार अक्सर स्वर की तरह होता है इस तरह फ़ारसी का ‘मायः’ भी माया उच्चारा जाता है । हिन्दी शब्दसागर में ये दोनों ही रूप दिए हुए हैं । ‘सरमाया’ में जो ‘सर’ है वह सरदार, सरपरस्त, सरज़मीं, सरकार वाला सर ही है जिसका इस्तेमाल उपसर्ग की तरह होता है । सर का प्रयोग प्रमुख, खास, सर्वोच्च आदि की तरह होता है । यह जो फ़ारसी का ‘सर’ है उसका रिश्ता वैदिक संस्कृत के ‘शिरस्’ से है जिसका अर्थ है किसी भी वस्तु का उच्चतम हिस्सा, कपाल, खोपड़ी, मस्तक, चोटी, शिखर, शुरुआत, पीक, बुर्ज़, पराकाष्ठा, चरम आदि ।
संस्कृत में ‘शीर्ष’ का मूल भी यही है । इससे ही हिन्दी का ‘सिर’ बना है । शिरस् के समतुल्य जेंद में ‘शर’ शब्द बना जिसका पहलवी रूप ‘सर’ हुआ । फ़ारसी में यह ‘सर’ चला आया । अलबत्ता जॉन प्लैट्स की “अ डिक्शनरी ऑफ उर्दू, क्लासिकल हिन्दुस्तानी एंड इंग्लिश” के मुताबिक फ़ारसी का सर संस्कृत के ‘सिरस्’ से आ रहा है । ध्यान रहे, ‘सिर’ यानी मस्तक के अर्थ में संस्कृत के किसी कोश में ‘सिरस्’ की प्रविष्टि नहीं मिलती । प्लैट्स के ऑनलाईन कोश में सम्भवतः वर्तनी की चूक है । जहाँ तक ‘माया’ का सवाल है, जान प्लैट्स इसके जन्मसूत्र संस्कृत के ‘मातृका’ में देखते हैं । ‘माया’ की व्युत्पत्ति का ठोस संकेत ‘मातृका’ से नहीं मिलता । ध्यान रहे मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में ‘मातृका’ का अर्थ सिर्फ माँ सम्बन्धी, धात्री, माँ, जन्मदात्री अथवा पालनकर्त्री है । जबकि प्लैट्स धन-दौलत के संदर्भ में इसके अर्थ मूल, व्युत्पन्न, स्रोत दिए गए हैं साथ ही दौलत, पूंजी, नगद, भंडार, कोश, निधि जैसे अर्थ भी दिए गए हैं । समझा जा सकता है कि प्लैट्स शायद यह कहना चाहते हैं कि ‘मातृ’ शब्द में उद्गम या स्रोत का भाव है । ज़ाहिर है स्रोत अपने आप में एक कोश या भण्डार होता है । यह तर्कप्रणाली गले नहीं उतरती और खींच-तान कर मातृका का रिश्ता धन-दौलत से जोड़ने वाली कवायद जान पड़ती है ।
गौरतलब है कि संस्कृत का ‘मातृका’ स्त्रीवाची है जबकि फ़ारसी का ‘मायः’ पुरुषवाची है । उधर हिन्दी-संस्कृत में ‘माया’ की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है और इसमें न सिर्फ़ धन-दौलत का भाव है बल्कि भ्रम, छलावा, धोखा, अतीन्द्रिय शक्ति, कला, जादूविद्या, भूत-प्रेत सम्बन्धी अथवा टोना जैसे अभिप्राय भी इसमें हैं । संस्कृत में ‘माया’ का एक अर्थ दुर्गा भी है मगर यह इसमें जन्मदात्री का आशय न होकर पराशक्तियों की स्वामिनी देवी का भाव है । इसी तरह ‘माया’ का दूसरा अर्थ लक्ष्मी है जो धन-वैभव की देवी हैं । इसी भाव का विस्तार माया के धन, दौलत, रोकड़ा, रुपया-पैसा, वैभव, सम्पत्ति, निधि, माल-मत्ता आदि में होता है । धन की महिमा अपरंपार है । इसके ज़रिये सुखोपभोग का कल्पनातीत संसार रचा जा सकता है । यहाँ ‘माया’ का अर्थ अवास्तविक लीला, कल्पनालोक या छलावा सार्थक होता है क्योंकि धन के रहने पर इन सबका भी लोप हो जाता है । इसीलिए कबीर ने धन-सम्पदा के अर्थ में ही “माया महा ठगिनी हम जानि” जैसी प्रसिद्ध उक्ति कही है ।
मायाजीवी शब्द भी धन-दौलत में रुचि रखने वाले का अर्थबोध कराता है जबकि मायावी का अर्थ जालसाज़, कपटी, छली, धोखेबाज, जादूगर आदि है । यह बात समझनी मुश्किल है कि प्लैट्स फ़ारसी के ‘मायः’ का रिश्ता धन-दौलत के अर्थ में संस्कृत के मातृक से क्यों जोड़ रहे हैं जबकि संस्कृत के ही ‘माया’ शब्द में धन-दौलत, पूंजी, सम्पदा के साथ माप-जोख, देवीदुर्गा, शक्ति जैसे भाव है । अगली कड़ी में समाप्त

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Monday, August 13, 2012

षड्यन्त्र का पर्दाफ़ाश

SKULL
हि न्दी की तत्सम शब्दावली के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्दों में ‘षड्यन्त्र’ का शुमार होता है । षड्यन्त्र के साथ सबसे खास बात यह है कि अपनी मूल प्रकृति में यह शब्द तत्सम शब्दावली का होते हुए भी इसका इन्द्राज संस्कृत के किसी कोश में नहीं मिलता । षड्यन्त्र यानी साजिश, भेद, अहितकर्म, फँसाना, अनिष्ट साधन, साँठगाँठ, कपट, भीतरी चालबाजी, दुरभिसन्धि, कुचाल, जाल बिछाना, दाँवपेच या कांस्पिरेसी इत्यादि । सभ्यता के विकास के साथ-साथ समाज में पेचीदापन बढ़ता रहा है । हर चीज़ में राजनीति का दखल नज़र आता है । राजनीति के साथ ही षड्यन्त्रों का चक्र शुरू हो जाता है । जिस तरह वक्त के साथ राजनीति का अर्थ भी बदलता चला गया उसी तरह सदियों पहले षड्यन्त्र का जो अभिप्राय था, आज उससे भिन्न है । आज तो राजनीति और षड्यन्त्र एक दूसरे के पर्याय हो गए हैं । बल्कि यूँ कहें कि राजनीति शब्द धीरे-धीरे बोलचाल की हिन्दी से षड्यन्त्र को बेदखल कर देगा । “ज्यादा राजनीति मत करो”, “मेरे साथ राजनीति हो गई”, “वो बहुत पॉल्टिक्स करता है” जैसे वाक्यों का प्रयोग अक्सर षड्यन्त्र को व्यक्त करने में भी होता है ।

ड्यन्त्र हिन्दी शब्दसम्पदा की षट्वर्गीय शब्दावली का हिस्सा है जैसे षट्कर्म, षट्कार, षट्कोण आदि । षड्यन्त्र मूलतः ‘षट्’ + ‘यन्त्र’ से बना है । ‘षट्’ का अर्थ तो स्पष्ट है अर्थात छह । हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक संस्कृत के ‘षट्’ से ही षट् > षष् > छ (प्राकृत) और छह (अपभ्रंश) के क्रम में हिन्दी के ‘छह’ का विकास हुआ है । संस्कृत में ‘ट’ का ‘य’ के साथ मेल होने पर अक्सर ‘ट’ ध्वनि , ‘ड’ में बदल जाती है । जैसे ‘जाट्य’ का ‘जाड्य’ ( जो जड़ है ) रूप भी प्रचलित है । संस्कृत के यन्त्र शब्द की बहुआयामी अर्थवत्ता है । ऐसा उपकरण जिससे उठाने, धकेलने, ठेलने, खोदने, काटने जैसी विविध क्रियाएँ सम्पन्न हो सकें । मूलतः यन्त्र में बल, शक्ति, साधन के भाव के साथ किन्ही वस्तुओं, क्रियाओं अथवा लोगों को काबू में करने के उपकरण, प्रणाली या विधि का आशय निहित है । काबू पाने, वश में करने जैसे भावों की अभिव्यक्ति होती है ‘नियन्त्रण’ शब्द से । इसमें छुपे यन्त्र को हम आसानी से पहचान सकते हैं । ‘यन्त्रण’ में रहित के भाव वाला ‘निः’ उपसर्ग लगाने से बनता है ‘नियन्त्रण’ जिसमें स्वयंचालित या किसी अन्य व्यवस्था के अधीन काम करने वाली वस्तु या व्यक्ति को अपने अधीन करने का आशय है ।
गौरतलब है कि प्रणाली या सिस्टम के अर्थ में मराठी का ‘यन्त्रणा’ शब्द ‘यन्त्रण’ से ही आ रहा है जबकि हिन्दी के ‘यन्त्रणा’ का प्रयोग कष्ट, संत्रास, दुख, पीड़ा, व्यथा को अभिव्यक्त करने में होता है न कि किसी व्यवस्था या प्रणाली के अर्थ में । ‘यन्त्र’ में ‘अन’ प्रत्यय लगने से बहुआयामी अर्थवत्ता वाला ‘यन्त्रण’ शब्द बना जिसमें प्रणाली, विधि या व्यवस्था के साथ-साथ पीड़ा, वेदना या व्यथा का भाव भी है । आशय ऐसी चीज़ से है जो एक खास तरीके से संचालित हो रही है । प्रश्न है यन्त्र से बने यन्त्रणा में संत्रास, पीडा या वेदना के भाव की क्या व्याख्या है । दरअसल यन्त्र में दबाव, काबू, जकड़न, कसना, बांधना जैसे भाव हैं । मशीन वाली यान्त्रिकता के तहत ये सभी भाव एक व्यवस्था से जुड़ते हैं या यूँ कहें कि यन्त्र किन्हीं कलपुर्जों, उपकरणों का समुच्चय है जो आपसे में गुँथे हैं, बन्धे हैं, कसे हैं, जकड़े हैं । किन्तु जब इन्हीं भावों के साथ यन्त्रणा शब्द बनता है तो उसका अर्थ जहाँ मराठी में जहाँ मशीनी व्यवस्था से लिया जाता है वहीं हिन्दी में यह सचमुच यातना से जुड़ता है । कोई भी बन्धन, कसाव, जकड़न या दबाव संत्रास, पीड़ा या कष्ट का कारण बनते हैं ।
न्त्र में भौतिक उपकरण के अलावा तान्त्रिक वस्तु या चिह्न का भाव भी है जैसे गंडा, ताबीज या यौगिक रेखाचित्र । कल्पित अतीन्द्रिय शक्तियों की आराधना के लिए तन्त्र-योग आदि शास्त्रों में कई तरह के प्रतीकों का प्रयोग होता है । ऐसा माना जाता है कि इनमें निहित शक्तियों के ज़रिये दूर स्थित शत्रुओं या विपरीत ताक़तों पर काबू पाया जा सकता है । बौद्धधर्म का अवसानकाल भारत में तन्त्र-मन्त्र और योगिक शक्तियों के अभूतपूर्व उभार का था । ‘षड्यन्त्र’ दरअसल मध्यकाल के इसी परिवेश से उपजा शब्द है । पूरवी बोली में षड्यन्त्र को ‘खड्यन्त्र’ भी कहते हैं । ‘ष’ का रूपान्तर ‘ख’ में होता है । ‘षड्यन्त्र’ अर्थात छह तरह की विधिया, प्रणाली या तरीके जिनके ज़रिये शत्रु को वश में किया जा सके । सीधी से बात है, यौगिक तन्त्र-मन्त्र का विस्तार ही जादू-टोना में हुआ । अलग-अलग पंथों के मान्त्रिकों के अपने अपने नुस्खे, मन्त्र और यन्त्र थे । हर कोई इनके ज़रिये बस षड्यन्त्रों में लगा रहता था । आज षड्यन्त्र को जिस अर्थ में प्रयोग किया जाता है उसमें बदले हुए परिवेश में कुचाल, दुरभिसन्धि या कांस्पिरेसी जैसे भाव हैं जबकि पुराने ज़माने में शत्रु पर विजय पाने के टोटके जैसा भाव इसमें था ।
ड्यन्त्र के तहत जिन छह विधियों का हवाला दिया जाता है वे हैं- 1.जारण 2. मारण 3. उच्चाटन 4. मोहन 5. स्तंभन और 6. विध्वंसन । ‘जारण’ का अर्थ जलाना या भस्म करना है । यह संस्कृत के ‘ज्वल्’ से निकला है । टोटका के रूप में हम झाड़-फूँक से परिचित हैं । यह जो फूँक है दरअसल इसमें अनिष्टकारी शक्तियों को भस्म करने का आशय है । ‘मारण’ यन्त्र का आशय एकदम स्पष्ट है । शत्रु का अस्तित्व समाप्त करने, उसे मार डालने के लिए जो जादू-टोना होता है वह ‘मारण’ कहलाता है । ‘उच्चाटन’ का अर्थ है स्थायी भाव मिटाना । वर्तमान परिस्थिति को भंग कर देना । उखाड़ना, हटाना आदि । विरक्ति, उदासीनता या अनमनेपन के लिए आम तौर पर हम जिस उचाट, दिल उचटने की बात करते हैं उसके मूल में संस्कृत का ‘उच्चट’ शब्द है जो ‘उद्’ और ‘चट्’ के मेल से बना है । उद्-चट् की संधि उच्चट होती है । ‘उद’ यानी ऊपर ‘चट्’ यानी छिटकना, अलग होना, पृथक होना आदि । ‘उच्चाटन’ भी इसी उच्चट से बना है जिसका अर्थ हुआ उखाड़ फेंकना, जड़ से मिटाना, निर्मूल करना आदि ।
ब ‘जारण’, ‘मारण’, ‘उच्चाटन’ जैसे यन्त्रों से काम नहीं बनता तो ‘मोहिनी विद्या’ काम आती है । ‘मोहन’ का अर्थ है मुग्ध होना । इसके मूल में ‘मुह्’ धातु है जिसका अर्थ है सुध बुध खोना, किसी के प्रभाव में खुद को भुला देना । अक्सर नादान लोग ऐसा करते हैं और इसीलिए ऐसे लोग ‘मूढ़’ कहलाते हैं । मूढ़ भी ‘मुह्’ से ही निकला है और ‘मूर्ख’ भी । ‘मोहन यन्त्र’ का मक़सद शत्रु पर ‘मोहिनी शक्ति’ का प्रयोग कर उसे मूर्छित करना है । श्रीकृष्ण की छवि में ‘मोहिनी’ थी इसलिए गोपिकाएँ अपनी सुध-बुध खो बैठती थीं इसलिए उन्हें ‘मोहन’ नाम मिला । पाँचवी विधि है ‘स्तम्भन’ जिसका अर्थ है जड़ या निश्चेष्ट करना । यह ‘स्तम्भ’ से बना है । जिस तरह से काठ का खम्भा कठोर, जड़ होता है उसी तरह किसी सक्रिय चीज़ को स्तम्भन के द्वारा निष्क्रिय बनाया जाता था । षड्यन्त्र की छठी और आखिरी प्रणाली है ‘विध्वंसन’ अर्थात पूरी तरह से नाश करना ।
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Saturday, August 11, 2012

तिलस्मी दुनिया

talism
मत्कारी, जादुई, रहस्यम और अबूझ किस्म की बात, घटना या वस्तु के संदर्भ में तिलस्म हिन्दी का जाना-पहचाना शब्द है । यह भी दिलचस्प है कि हिन्दी साहित्य की शुरुआती रचनाओं का आधार भी यही शब्द यानी तिलस्म था । उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जो महानुभाव हिन्दी गद्य में आज़माईश कर रहे थे, उसके कथानकों का सफल फार्मूला तिलस्मी दुनिया का ही था । राजा-रानी की पारम्परिक प्रेम-कथा अब गौण थी और राजा-रानी के किस्से अब राजनीति के प्रपंच का हिस्सा बनते थे जिन्हें तिलस्मी दुनिया के तहखानों, ऐयारों के कारनामों और जासूसी दाव-पेचों से गुज़रते हुए दिलचस्प अंदाज़ में परोसा जाता था । इस विधा के सिद्धहस्त लेखक बाबू देवकीनंदन खत्री थे । जासूसी और तिलस्मी लेखन करने वाले वे पहले ही लेखक हैं जिनकी रचनाओं को साहित्य का दर्जा मिला । उनकी लिखी चन्द्रकान्ता संतति आज भी खूब बिकती है । बहरहाल, तिलस्म शब्द से प्रायः हर हिन्दी प्रेमी का परिचय खत्री जी के उपन्यासों के ज़रिये होता है ।

तिलस्म शब्द की आमद हिन्दी में फ़ारसी के ज़रिये हुई है । तिलस्म शब्द के दायरे में मायालोक, इंद्रजाल, जादू, चमत्कार, अद्भुत कार्य-व्यापार, क़रामाती बातें आती हैं । यह तावीज भी हो सकता है, गंडा भी हो सकता है या अभिमंत्रित पत्थर भी । इसका इस्तेमाल कई तरह से होता है जैसे समूचा स्थान यानी तिलस्मी तहखाना, कोई मार्ग जैसे तिलस्मी रास्ता, कोई वस्तु जैसे तिलस्मी हार आदि । ई. जे. ब्रिल्स के फर्स्ट इन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम के मुताबिक इसके तिलसम, तिलस्म, तिलसिम, तालिस्म और तिलिस्म जैसे रूप भी अरबी में प्रचलित हैं । हिन्दी में तिलस्माती, तिलस्मानी, तिलस्मात, तिलस्मी जैसे रूप प्रचलित हैं । प्राचीनकाल से ही प्रायः हर संस्कृति में परस्पर विरोधी पक्ष एक-दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए ओझाओं और नजूमियों के ज़रिये एक दूसरे के खिलाफ तंत्र-मंत्र, जादू-टोना आदि शक्तियों का प्रयोग करते रहे हैं जिनका मक़सद विरोधी का सर्वनाश ही था ।
गौरतलब है कि ताबीज के अर्थ वाला अंग्रेजी का टेलिस्मन अरबी के तिलस्म से प्रभावित है जबकि खुद अरबी में तिलस्म शब्द के पीछे बाइजेंटीनी-ग्रीक का तेलेस्मा ( telesma ) है । तुर्की की वर्तमान राजधानी इस्ताम्बुल का प्राचीन नाम कुस्तुन्तुनिया Kostantiniyye था जिसे ग्रीक भाषा में कांस्टेंटिनोपल कहते थे । किसी ज़माने में प्राचीन ग्रीक साम्राज्य का विस्तार वर्तमान इस्ताम्बुल तक था । भूमध्यसागर की धुर पूर्वी सीमा अरब क्षेत्रों को छूती है । ग्रीस और अरब के बीच व्यापारिक संबंध भी रहा है इसलिए अरब और ग्रीस में भाषायी अन्तर्सम्बन्ध भी गहरा है । इस क्षेत्र को तब बाइजेंटाइन कहते थे और यहाँ बोली जाने वाली भाषा बाइजेंटीनी-ग्रीक कहलाती थी जिसका खासा असर तुर्की और अरबी भाषाओं पर पड़ा है । ग्रीक भाषा के टेलिन telein शब्द से तेलेस्मा बना जिसमें धार्मिक अनुष्ठान, समापन, पूर्णाहुति जैसे भाव थे । भाषाविज्ञानियों का मानना है कि टैलेन के मूल में टेलोस शब्द है जिसमें जिसका अर्थ है खात्मा, सर्वनाश, परिणति, निजात, अन्त, अंजाम या मृत्यु आदि । यह जो टेलोस है, इसका रिश्ता ग्रीक भाषा की प्रसिद्ध धातु टेली tele- से है जिसमें दूर, सिरा, अन्तराल जैसे आशय हैं और इससे टेलीविज़न, टेलीफोन, टेलीपैथी, टेलीकास्ट जैसे बोलचाल के कई आमफ़हम शब्द बने हैं । कई भाषाओं में इसके रूपान्तर प्रचलित हैं जैसे ग्रीक में टेलेस्मा, हिन्दी में तिलस्म, स्वाहिली में तलासिमु, हिब्रू में तिलस्म आदि ।
तिलस्म यानी कोई जादुई चिह्न या रहस्यमय व्यवस्था मूलतः किसी अलौकिक शक्ति के असर को बताती है । तिलस्म का सृजन जो भी करता है, यह उसके हित में असरदार होता है । इसमें सौभाग्य चिह्न का भाव है । मंत्र शक्ति, जादुई करामात, गंडा, ताबीज़ आदि का प्रयोग किसी मुश्किल हालात से निजात पाने अथवा मनोवांछित फल पाने के लिए किया जाता है । मूल भाव है मनचाहा हो जाना, जो सामान्य प्रयासों से होना सम्भव नहीं है । तिलिस्म शब्द का हिब्रू रूप तालिस्म होता है । “द डिक्शनरी दैट रिवील द हिब्रू सोर्स ऑफ इंग्लिश’ में इसाक ई. मोज़ेस तालिस्म की दिलचस्प व्युत्पत्ति बताते हैं जो ग्रीक टेलोस पर आधारित ही हैं । मोजेज के अनुसार हिब्रू तालिस्म, अरबी तिलस्म से ही आया है । वे बाइजेंटीनी-ग्रीक के तैलिस्मा telesma को टेलिन और स्लैम मिलन का नतीजा मानते हैं । अंग्रेजी के slam में मूलतः पटाक्षेप या चरम परिणति का ही भाव है । खेल स्पर्धाओं में ग्रैंडस्लैम के रूप में इसे देखा जा सकता है । हालाँकि भाषाविद् स्लैम की व्युत्पत्ति पर स्थिर नहीं हैं और इसे उत्तरी यूरोप के प्राचीन नॉर्स परिवार का शब्द मानते हैं ।
अंग्रेजी के स्लैम से सेमिटिक धातु सलम का रिश्ता तार्किक भी लगता है और भाषायी अन्तर्सम्बन्ध यहाँ भी नज़र आता है । सेमिटिक भाषा परिवार की धातु स – ल - म ( अरबी लिपि में सीन –लाम- मीम ) जिसमें समर्पण, स्वीकार जैसे भावों के साथ अन्ततः शान्ति का आशय प्रकट होता है । नमस्कार या सेल्यूट के अर्थ वाले प्रसिद्ध अभिवादन “अस्सलाम अलैकुम” और “वालैकुम अस्सलाम” में यही सलम है जिसका एक रूप सलाम हुआ । कुशल, मंगल का प्रतीक यह अभिवादन मूलतः शान्ति कामना ही है । हिब्रू में इसका रूप शॉलोम shalom होता है । मोज़ेस के अनुसार बाइबल में शॉलाम शब्द का आशय भी पूर्णत, परमत्व और शान्ति ही है । अपने अभीष्ट की कामना में प्राचीनकाल से ही मनुष्य किन्ही अनुष्ठानों का आयोजन करता रहा है जिनमें से कुछ ऐसे होते हैं जो वह सामान्य पुरोहितो से हट कर ओझा, बैगा, तान्त्रिक, मान्त्रिक आदि से सम्पन्न कराता है । कुल मिला कर किसी मायावी शक्तियों से इष्टफल प्राप्ति का प्रयास ही तिलस्म है ।  इसका हासिल भी चित्त की शान्ति ही होता है । मगर इसमें अहंभाव की तुष्टि भी होती है ।
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