Showing posts with label रिश्ते. Show all posts
Showing posts with label रिश्ते. Show all posts

Wednesday, August 17, 2016

अथ “डिकरा-डिकरी” कथा


न्तति के प्रति स्नेह के सम्बोधन खूब लोकप्रिय होते हैं। इनमें अनेक भाषाओं के शब्द समाहित होते हैं। प्रसार माध्यमों के ज़रिये ऐसे अनेक शब्द हिन्दी और अन्य प्रादेशिक भाषाओं में भी प्रचलित हो जाते हैं। लाडेसर, बेटू, बिट्टू, बालू, बाला, बच्चन, गुंडा, गुंडुराव, मुन्ना, मुंडा, छोटू, नन्हा आदि। ऐसा ही एक शब्द है डीकरा जो मराठी में भी है पर अल्पप्रचलित है। खानदेश की तरफ़ अहिराणी बोली में डिकरा, डिकरी का अर्थ होता है पोता या पोती। गुजराती में इसे बेटा बेटी के अर्थ में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। कुछ सिन्धी क्षेत्रों में भी इसकी व्याप्ति है। हमने सबसे पहले इसका प्रयोग मुम्बइया फ़िल्मों में पारसी पात्रों के मुँह से सुना। अब हिन्दी में भी नाटकीय संवाद में इसे बरता जाने लगा है।

डिकरा यानी सेवक
‘डिकरा’ की अर्थवत्ता सेवक से ठीक उसी तरह जुड़ती है जैसे अरबी के गुलाम की, बाक़ी मतलब दोनों का बच्चा ही है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि गुलाम में जहाँ सेवक का भाव रूढ़ हो गया वहीं ‘डिकरा’ में बच्चे का। कृपा कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्तिकोश में डिकरा संस्कृत के ‘डिङ्गर’ से विकसित हुआ है। अमरकोश में ‘डिङ्गर’ का अर्थ सेवक ही है। ‘डिङ्गर’ का एक रूप मराठी में ढिंगर भी होता है। इसका ही परवर्ती विकास डिकरा हुआ। इसी तरह गुजराती में ढिकरा भी बोला जाता है।

रामसेवक और गुलामनबी
गौर करें अरबी में ‘गुलाम’ शब्द सेमिटिक ग़ैन-लाम-मीम غ-ل-م से बना है जिसमें लड़का, ख़ूबसूरत युवती, वासना, लालसा, सीमोल्लघन जैसे भाव हैं। ध्यान रहे, दुनियाभर में पुराने दौर से ही बाल-मज़दूरी भी रही है। अरब देशों में इसका चलन अरब के कारोबारी अतीत के मद्देनज़र भी समझा जाना चाहिए। इसका एक रूप हाल के दिनों में बच्चों की ऊँट दौड़ तक में नज़र आता रहा है। जिस तरह हमारे यहाँ रामसेवक का अर्थ राम के आराधक से है उसी तरह गुलामनबी या गुलाम मोहम्मद का भी हुआ। किन्तु दूसरे अर्थों में गुलामनबी का अर्थ जिसे नबी ने पाला हो अर्थात नबी का पुत्र भी होता है। इस तरह हम रामसेवक या रामदास को नहीं देख सकते। पूर्वी बोली में इस अर्थ में रामबालक अलग व्यक्तिनाम है।

गुलाम जो बच्चा था
दासप्रथा के चलते अरब में बड़े पैमाने पर दासों का कारोबार होता था। ये लोग श्रमिकों से लेकर घरेलु सेवादार तक होते थे। प्रायः हर समाज में मालिक को सेवक का पिता कहा गया है क्योंकि वह उन्हें पालता है। मुमकिन है अरब समाज में गुलाम शब्द का प्रयोग क्रीतदासों के लिए इसी रूप में होने लगा हो और बाद में वह सेवक के अर्थ में ही इतना रूढ़ हो गया कि अब तो नौकर शब्द भी गुलाम से ज्यादा रसूख रखता है। नौकर तो सेवा की एवज में तनख्वाह पाता है मगर गुलाम तो सिर्फ हुक्म बजाता है। जहाँ तक डिङ्गर का प्रश्न है, यह मूलतः सेवक ही था। उपरोक्त गुलाम की व्याख्या के मुताबिक ही बाद में इसमें बच्चे का भाव समा गया होगा, ऐसा लगता है। अपने मराठी-गुजराती रूपों में डिकरा / डिक्रा का मूलार्थ बच्चा, सन्तान, पुत्र या शिशु ही होता है।

मोबेदजीना डिकरा-डिकरी
पारसियों का अल्पप्रचलित कुटुम्ब नाम मोबेदजीना भी है। इसकी कथा में डिकरा-डिकरी का दख़ल है। बताया जाता है इस कुटुम्ब के पूर्वपुरुष का नाम मोबेद था। जिसका अर्थ पुजारी/ पुरोहित (दस्तूर-मोबेद) होता है। मोबेद के वंशज पहले ईरान से चल कर गुजरात आए और फिर अपने कुटुम्ब के साथ मुम्बई आ बसे। उन्हें परम्परानुसार इलाके में ‘मोबेदजी’ कहा जाने लगा। उनकी अनेक सन्तानें थी जिन्हें मोहल्ले में मोबेदजीनां डिकरा-डिकरी, ऐसा कह कर परिचय दिया जाता था। समाज में भाषायी पद जब शब्द का रूप लेते हैं तब संक्षेपीकरण होता जाता है। ज़ाहिर है यहाँ भी वही हुआ। मोबेदजी के बाल-बच्चे" की अर्थवत्ता वाला यह वाक्य सिर्फ मोबेदजीना के अर्थ में पितृपुरुष मोबेद के कुटुम्ब की अभिव्यक्ति देने लगा।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें


अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, January 27, 2016

खातून की खिदमत में...


‘ख़ा
तून’ भी हिन्दी क्षेत्र का जाना-पहचाना लफ़्ज़ है। इसमें भी बेग़म या खानुम की तरह कुलीन,प्रभावशाली स्त्री, साम्राज्ञी, भद्र महिला का भाव है जैसे मध्यकाल की ख्यात कश्मीरी कवयित्री हब्बा ख़ातून। बेग से बेगम और खान से ख़ानुम की तरह ख़ातून का रिश्ता 'क्षत्रप' से है। बात कुछ जमी नहीं। चलिए, बेग़म और ख़ानुम की तरह ख़ातून के जन्मसूत्रों को भी टटोला जाए। वैसे तो ख़ातून फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी में दाखिल हुआ मगर यह तुर्की मूल का शब्द माना जाता है। इसका विकास हुआ है ईरान के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में बोली जाने वाली सोग्दी और खोतानी भाषा के ‘ख्वातवा’ या खाता जैसे शब्दों से जिसमें ज़मींदार का आशय था। गौरतलब है कि तुर्की में खातून का हातून रूप ज्यादा प्रचलित है। इतिहास की किताबों में हम सबने क्षत्रप और महाक्षत्रप जैसे पदनाम पढ़े हैं। ये ईरानी मूल के शब्द हैं और हखामनी साम्राज्य की उपाधियाँ हैं। उस समय तक्षशिला, मथुरा, उज्जयिनी और नासिक इनकी प्रमुख राजधानियां थीं।

गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र भी इनके प्रभुत्व में था। क्षत्रप का चलन आमतौर पर युवराज के लिए होता था जबकि महाक्षत्रप राज्यपाल, सूबेदार या प्रान्तपाल को कहते थे। गौरतलब है शक जाति के लोग सोग्दी ज़बान बोलते थे और उपाधियों उन्हीं के शासनकाल की हैं। इन स्थानों के प्रधान शक शासक महाक्षत्रप कहलाते थे जबकि कनिष्ठ शासक या उप शासक क्षत्रप कहलाते थे।

‘क्षत्रप’ शब्द का प्रसार इतना था कि एशिया में जहां कहीं यूनानी और शक साम्राज्य के अवशेष थे, उन स्थानों के गवर्नर या राज्यपालों का उल्लेख भी सट्रप / खत्रप / ख्वातवा / शत्रप के रूप में ही मिलता है। शक जाति के लोग संभवतः उत्तर पश्चिमी चीन के निवासी थे। वैसे जब ये भारत में आए तब तक इनका फैलाव समूचे मध्य एशिया में हो चुका था। ईरान की पहचान शकों से होती थी।

दक्षिणी पूर्वी ईरान को ‘सीस्तान’ कहा जाता था जिसका अर्थ था ‘शकस्थान’। संस्कृत ग्रंथों में भारत से पश्चिम में सिंध से लेकर अफ़गानिस्तान, ईरान आदि क्षेत्र को शकद्वीप कहा गया है अर्थात यहां शकों का शासन था। ब्राह्मणों की एक शाखा शाकद्वीपीय भी मानी जाती है। शायद यही मागी ब्राह्मण थे जिनका रिश्ता मगध से था, जिन्हें बाद में शाकद्वीपीय कहा गया।

संस्कृत के क्षत्र में भी प्रभुत्व, साम्राज्य, वंश, आधिपत्य के आशय हैं। इसी कड़ी का क्षेत्र शब्द भूमि के अर्थ में भी हम जानते हैं। खेत इसी क्षेत्र का अपभ्रंश है। संस्कृत का क्षत्री भी राजकुल वाले अर्थ से कालान्तर में राजपूत जाति के अर्थ में क्षत्रीय में ढल गया। इसका एक रूप पंजाब में खत्री बना। नेपाली में यह छेत्री होता है। इस तरह क्षत्रप का खत्रप भी हुआ। तो ईरानी क्षत्रप का सोग्दी रूप ख्वातवा हुआ।

हमारा अनुमान है कि यहाँ ‘क्ष’ का रूपान्तर ‘ख्व’ हुआ होगा, ‘त्र’ का सिर्फ़ ‘त’ शेष रहा। भारत-ईरानी भाषाओं में ‘प’ का रूपान्त ‘व’ में हो जाता है। इसे यूँ समझ सकते हैं- क्षत्रप > ख्वतप > ख्वातवा। इसका रूप कहीं कहीं खाता / ख्वाती भी मिलता है जिसका अर्थ प्रमुख, परम, अधिपति, राजा, सामन्त आदि था।

ऐतिहासिक सन्दर्भों में बुम-ख़्वातवा जैसे सन्दर्भ भी मिलते है। यहाँ बुम वही है जो संस्कृत हिन्दी में भूमि है। इस तरह बुम-ख़्वातवा का आशय ज़मींदार, क्षेत्रपाल या क्षेत्रपति हुआ जो आमतौर पर राजाओं की उपाधि है। तो सोग्दी ज़बान के ख्वातवा या खाती का स्त्रीवाची हुआ ख़्वातीन या ख़ातून जिसमें राजा, श्रीमन्त, सामन्त की स्त्री अथवा कुलीन या भद्र महिला का आशय था। उर्दू में ख़ातून का बहुवचन ख़वातीन होता है।

प्रसंगवश संस्कृत के ‘क्ष’ वर्ण में क्षेत्र, भूमि, किसान और रक्षक का अर्थ छुपा है। क्षत्रप शब्द ईरान में शत्रप / खत्रप रूप में प्रसारित था जहाँ से यह ग्रीक में सट्रप बन कर पहुँचा। ग्रीक ग्रंथों में ईरान और भारत के क्षत्रपों का उल्लेख इसी शब्द से हुआ है। इसकी व्युत्पत्ति प्राचीन ईरानी के क्षत्रपवान से मानी जाती है जिसका अर्थ है राज्य का रक्षक। इसमें क्षत्र+पा+वान का मेल है। ‘क्षत्र’ यानी राज्य, ‘पा’ यानी रक्षा करना, पालन करना और ‘वान’ यानी करनेवाला।

गौर करें इससे ही बना है फारसी का शहरबान शब्द जिसमें नगरपाल का भाव है। इसे मेयर समझा जा सकता है। याद रखें संस्कृत के वान प्रत्यय का ही फारसी रूप है बान जैसे निगहबान, दरबान, मेहरबान आदि। संस्कृत वान के ही वन्त या मन्त जैसे रूप भी हैं जैसे श्रीवान या श्रीमन्त। रूपवान या रूपवंत आदि।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें





अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, January 16, 2016

‘उलाहना’ तो प्रेरणा है, भर्त्सना नहीं


ळमा और ‘उरहन’ जैसे शब्दों में कुछ समानता नज़र आती है ? इन दोनों के बीच मारवाड़ और ब्रज के बीच की दूरी ज़रूर है पर दोनों का मूल एक ही है। दरअसल हिन्दी में जिसे उलाहना कहते हैं उसका राजस्थानी रूप ओळमा है और ब्रज, अवधी रूप उरहन या उराहन/ उराहना हैं। इसमें में शिकवा-शिकायत का भाव है या निन्दा का ? दरअसल हिन्दी के शब्दकोश तो ये दोनों ही भाव बताते हैं पर हमारा मानना कुछ और है। उपालम्भ में निन्दा करने, दोष गिनाने, शिकवा करने से ज्यादा उसे प्रेरित करने, प्रवृत्त करने, सचेत करने, समझाने, अनुभव कराने के आशय ज्यादा हैं।

उलाहना शब्द का रिश्ता संस्कृत के उपालम्भ से जोड़ा जाता है। इसका प्राकृत रूप उवालंभ है। इसका विकास ओलंभ होता है। राजस्थानी में यह ओळमा हो जाता है। उपालम्भ का अर्थ है धिक्कार, भर्त्सना, झिड़क, कोसना, घुड़की, आक्षेप, तिरस्कार, निन्दा, दुर्वचन, कुबोल, डाँट या वर्जना, निषेध, रोक, पाबंदी आदि। उपालम्भ बना है उप+आलम्भ से। हिन्दी में आलम्भ शब्द में छूने, स्पर्ष करने, अपनाने जैसे आशय हैं। इसमें ‘उप’ सर्ग जुड़ने से आशय एकदम स्पष्ट होता है।

किसी आश्रय के ज़रिये, किसी बहाने से छूना, स्पर्ष करना या अधिकार जताना-अपना बनाना। ध्यान रहे उपालम्भ के जितने भी अर्थ हमने ऊपर देखे वे सभी नकारात्मक हैं। हालाँकि उनका आशय यह लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति को वास्तविकता का बोध कराने के लिए कहे गए कटुबोल दरअसल उसे अपना बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। किन्तु प्रश्न यही है कि उलाहना का अर्थ सीधे सीधे गाली या दुर्वचन नहीं है। उलाहना में हमेशा तिरस्कार, भर्त्सना या धिक्कार का भाव भी नहीं होता। अलबत्ता उसमें आक्षेप, व्यंग्य ज़रूर होता है।

हमारा मानना है कि हिन्दी के ‘उलाहना’ का विकास प्राकृत के उपलंभणा से हुआ है जिसका संस्कृत प्रतिरूप ‘उपलम्भन’ है। ध्यान रहे उपलम्भना में बोध, समझ, अनुभव के साथ ही देखना, बूझना जैसे भाव भी हैं। उलाहना इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि आप किसी को कोसना चाहते हैं, बल्कि उलाहना उसे दिया जाता है जिससे अपेक्षित प्रतिसाद न मिले, जो अपने कर्तव्य को भूल जाए। उलाहना चेतना जगाता है, जागरुक करता है, जिम्मेदारी की याद दिलाता है। उपलम्भना या उपालम्भ दोनों ही शब्दों के मूल में लभ् धातुक्रिया है जिसमें पाना, सोचना, समझना जैसे भाव हैं। ध्यान रहे ‘ल’ का रूपान्तर ‘र’ में होता है। ‘लभ्’ का अगला रूप ‘रभ्’ होता है। जिस तरह ‘लभ्’ से ‘लम्भ’ होता है उसी तरह ‘रभ्’ से ‘रम्भ’ होता है। ‘रम्भ’ से ही ‘आरम्भ’ भी बनता है जिसका अर्थ है शुरुआत। उलाहना इसी नई शुरुआत के लिए तो दिया जाता है।

तो उलाहना में दरअसल इसी शुरुआत का संकेत है, उत्प्रेरण है। उपलम्भना > उवलम्भना में ज्ञानप्राप्ति भी है और आक्षेपयुक्त प्रेरणा भी। रत्नावली का उलाहना ही तुलसी के लिए मानस-सृजन की प्रेरणा बना। इसलिए हमारा स्पष्ट मानना है कि उलाहना के मूल में उपालम्भ नहीं बल्कि उपलम्भणा है। इसकी पुष्टि हरगोविंददास त्रिकमचंद सेठ के प्राकृत कोश “पाइय सद्द महण्णवो” से भी होती है। हिन्दी के उलाहना का विकास उपलंभणा > उवलंभना > उलांभना > उलाहना के क्रम में हुआ है। राजस्थानी ओळमा भी उपलंभणा से ही उळांभणा >ओळमा के क्रम में सामने आया। ब्रज/ अवधी का उराहना भी इसी कड़ी में उपलंभणा > उराहना > उरहन से विकसित हुआ है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, October 11, 2012

सचमुच घनचक्कर था मेघदूत

cloudburst

नि दा फ़ाज़ली ने बरसात के बादल को उसकी आवारा सिफ़त के मद्देनज़र सिर्फ़ दीवाना क़रार देते हुए बरी कर दिया, शायद इसलिए कि वह नहीं जानता, "किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना है ।" मगर कालीदास का मेघदूत तो यक़ीनन घनचक्कर ही था । ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि उसके अनेक नामों में एक घनचक्र से ज़ाहिर हो रहा है । बोलचाल की भाषा में इधर-उधर भटकने वाले, निठल्ले, आवारा मनुष्य को घनचक्कर की संज्ञा दी जाती है । इसकी अर्थवत्ता में बेकार, सुस्त, आलसी, बेवकूफ़, मूर्ख जैसे आशय भी शामिल हो गए । घनचक्कर में दरअसल मुहावरेदार अर्थवत्ता है । यह तो तय है कि इसका पहला पद तत्सम घन है और दूसरा पद चक्कर, तद्भव है जो तत्सम चक्र से बना है । ज़ाहिर है मूल रूप में यह घनचक्र है । हिन्दी कोशों में घनचक्र का रिश्ता घनचक्कर से तो जोड़ा गया है मगर इसकी व्युत्पत्तिक व्याख्या नहीं मिलती कि हिन्दी वाङ्मय में घनचक्र का क्या सन्दर्भ है । जॉन प्लैट्स जैसे हिन्दी के यूरोपीय अध्येताओं नें घन शब्द के अन्तर्गत घनचक्कर को तो रखा है मगर इसके व्यावहारिक प्रयोग के उदाहरण उनके यहाँ नहीं मिलते साथ ही वे घनचक्कर का रिश्ता घनचक्र से भी स्थापित नहीं करते । उसकी जगह वे घनचक्कर का अर्थ घूमते हुए आकार (A revolving body), चकरीनुमा यन्त्र (a Catherine-wheel) अथवा इसके रूढ़ अर्थ मंदमति, बुद्धू आदि बताते हैं । हिन्दी शब्दसागर में इसका अर्थ एक किस्म की आतिशबाजी भी मिलता है, मगर यह प्लैट्स के शब्दकोश से जस का तस ले लिया गया लगता है । शब्दों का सफ़र में देखते हैं घनचक्कर की घुमक्कड़ी ।
समें कोई संदेह नहीं कि घनचक्कर का मूल घनचक्र है मगर आज हिन्दी से घनचक्र गायब हो चुका है और इसकी जगह मुहावरेदार अर्थवत्ता वाला रूपान्तर घनचक्कर विराजमान है जिसका अर्थ मूर्ख, आवारा, गावदी, निठल्ला आदि है मुश्किल ये है कि यह अर्थवत्ता स्थापित कैसे हुई । हिन्दी की तुलना में घनचक्र शब्द का मराठी वाङ्मय संदर्भ मिलता है । घनचक्र का घणचक्र रूप भी मराठी में है जबकि घनचकर रूप मराठी के अतिरिक्त पंजाबी में भी है । यही नहीं, महाराष्ट्र में घनचकर उपनाम भी मिलता है । घनचक्र का संदर्भ सीधे सीधे बादलों की उमड़-घुमड़ से जुड़ता है । सोलहवीं सदी में श्रीधर स्वामी लिखित “शिवलीलामृत” में “होत युद्धाचे घनचक्र” में इसका संदर्भ आया है जिसका अर्थ है युद्ध के बादल । घनचक्कर में भटकन, यायावरी की अर्थवत्ता पहले स्थापित हुई । इसका घनचक्र अर्थात बादल से रिश्ता ही घुमक्कड़ी, भटकन और यायावरी से इसे जोड़ता है । बादल का प्रतीक सतत भटकन का आदि प्रतीक है । मेघदूत की मज़बूत मिसाल सामने है । आवारा बादल जैसे विशेषण बहुत आम हो चुके हैं । स्पष्ट है कि घनचक्र दरअसल बादल ही है न कि कोई मशीनी संरचना । चक्र का अर्थ किसी यान्त्रिक चक्र से नहीं बल्कि बादलों के वर्तुल से है । भटकन जब बिलावजह हो तो बेनतीजा रहती है । समाज में यूँ भी अकारण फिरने वाले को आवारा ही कहा जाता है । बादल इसीलिए आवारा कहलाते हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता कि कहाँ से गुज़रना है और कहाँ बरसना है । यानी अस्थिरता ही आवारा का मूल चरित्र है । जिसकी बुद्धि स्थिर न हो, वही घनचक्कर ।
नचक्कर शब्द कभी भी आतिशबाजी के अर्थ में हिन्दी में प्रचलित नहीं रहा । जॉन प्लैट्स के कोश में इसका एक अर्थ स्पष्ट रूप से कैथराईन व्हील दिया हुआ है । मध्यकाल में यूरोप में कैथराइन व्हील दुर्दान्त सज़ा देने वाला चकरीनुमा यन्त्र था । बाद के दौर में आतिशबाजी का जब विकास हुआ तो चकरीनुमा आतिबाजी को यूरोप में कैथराईन व्हील नाम दिया गया । भारत में भी जब यूरोपीय ढंग की आतिशबाजी आई तो कैथराइन व्हील को यहाँ चकरी के नाम से लोकप्रियता मिली । भरपूर तलाशने के बावजूद मुझे चकरीनुमा आतिशबाजी के लिए घनचक्कर पर्याय नहीं मिला । इंटरनेट पर जितने भी सन्दर्भ हैं, वे उन शब्दकोशों तक पहुँचाते हैं जिनकी सामग्री हिन्दी शब्दसागर से जस की तस ले ली गई है । ज़ाहिर है, जॉन प्लैट्स के कोश से जो सन्दर्भ शब्दसागर के सम्पादकों ने उठाया, उसका प्रसार अन्य शब्दकोशों तक हुआ मगर उसकी पुष्टि भारतीय वाङ्मय में नहीं की गई । घनचक्र में घन का आशय बादल से है न कि मशीनी घन से । घने काले श्यमवर्णी, एक दूसरे में समाते हुए , लगातार वर्तुल चक्रों में उमड़ते –घुमड़ते, और ज्यादा सघन होते, अपने भीतर के वाष्पकणों से संतृप्त  बरसने को आतुर बादल ही घनचक्र कहलाते हैं ।
नचक्र में बादलों की उमड़-घुमड़ साबित करने वाले अनेक तथ्य मराठी में मिलते हैं । इसके अतिरिक्त संस्कृत, हिन्दी में घन शब्द में भी बादल, मेघ का आशय प्रमुखता से है । बादलों के प्रतीक से ही घनचक्र में प्रचण्ड युद्ध, कठिन संघर्ष या भीषण टकराव का भाव भी उभरता है । कुल मिला कर घन चक्र में भीषण गर्जना के साथ मूसलाधार बारिश लाने वाले बादलों की चक्रगतियों का स्पष्ट संकेत है । संस्कृत के घन शब्द की व्युत्पत्ति हन् से मानी गई है जिसमें आघात, प्रहार, चोट जैसे भाव हैं । हन् से बने घन का अर्थ है ठोस, कठोर, मज़बूत, स्थिर, अटल, चुस्त, सुगठित जैसे भाव है । सघन, सघनता, घनत्व, घनता जैसे शब्द इसी घन से बने हैं । घन का अर्थ हथौड़ा या बेहद मज़बूत शिलाखण्ड से भी है जिसका उपयोग आक्रमण के लिए किया जाए । घनत्व के भाव को उजागर करने वाला शब्द घनघोर है । जैसे घनघोर जंगल, घनघोर अंधेरा, घनघोर बारिश, घनघोर पाप आदि । घनश्याम श्रीकृष्ण का लोकप्रिय नाम है जिसमें उनके मेघवर्णी रूप का संकेत है अर्थात ऐसा काला रंग जैसे कि बरसाती बादल होते हैं । बादलों का संकेत चातक, पपीहा जैसे पक्षी के घनताल नाम से भी मिलता है । पपीहा को घनतोल भी कहते हैं क्योंकि उसे बारिश का अंदाज़ हो जाता है । सबसे निकट का, पास का के अर्थ में घन से बने घनिष्ठ का प्रयोग भी हिन्दी में खूब होता है ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, September 17, 2012

भरोसे की साँस यानी ‘विश्वास’

[पिछली कड़ी- भरोसे की भैंस पाड़ो ब्यावे से आगे ]trust

हि न्दी में यक़ीन ( yaqin ) शब्द का भी खूब प्रयोग होता है । हालाँकि भरोसा, विश्वास, ऐतबार जैसे इसके पर्याय भी खूब प्रचलित हैं और ये सभी शब्द बोलचाल की सहज अभिव्यक्ति का माध्यम हैं । इसके बावजूद यक़ीन शब्द का प्रयोग ज्यादा सुविधाजनक इसलिए है क्योंकि इसमें निहित निश्चयात्मकता की अभिव्यक्ति ज्यादा सुविधाजनक ढंग से होती है । यक़ीन से यक़ीनन जैसा कर्मकारक बन जाने से निश्चित ही, निश्चयपूर्वक या निश्चित तौर पर जैसी अभिव्यक्तियाँ आसान हो जाती हैं । इसी तरह यक़ीन से यक़ीनी रूप भी बनता है । यक़ीन मानिए, यक़ीन जानिए, यक़ीन कीजिए जैसे वाक्यों से भाषा में मुहावरे का असर आ जाता है । फ़ारसी का बे उपसर्ग लगने से बेयक़ीन शब्द भी बनता है । रिश्ते-नाते और समूची दुनियादारी अगर कायमहै तो सिर्फ़ यक़ीन पर ।
क़ीन शब्द सेमिटिक मूल का है और यह अरबी भाषा से फ़ारसी में गया और फिर हिन्दी में आया । अलसईद एम बदावी / मोहम्मद अब्देल हलीम की कुरानिक यूसेज़ डिक्शनरी के मुताबिक यक़ीन के मूल में अरेबिक धातु या-क़ाफ़-नून (y-q-n) है जिसमें निश्चित, पक्का, निस्संदेह, सत्यापन, दृढ़ निश्चय, खास जैसे भाव हैं । इससे बने यक़ीन में निश्चित धारणा, आस्था या विश्वास ( जैसे, मेरा यक़ीन है कि मज़हब से इन्सानियत बड़ी चीज़ है ), आश्वासन( जैसे, उन्होंने यक़ीन दिलाया कि जल्दी ही काम हो जाएगा ), भरोसा ( आपकी बात पर यक़ीन नहीं होता ) आदि के अलावा मत, विचार, मान्यता, सच्चाई जैसे अनेक भावों का इसमें समावेश है ।
हिन्दी की तत्सम शब्दावली का विश्वास शब्द संज्ञा भी है । विश्वास जीवन-क्रिया से जुड़ा शब्द है । इसके मूल में श्वस् धातु है । श्वस् यानी हाँफना, फूँकना, धकेलना, धौंकना, फुफकारना, उड़ाना आदि । इसके अलावा इसमें साँस ( खींचना-छोड़ना ) ब्रीद, कराह, आह, आराम जैसे भाव भी हैं । इससे ही बना है श्वास जिसका अर्थ है छाती में हवा खींचना-छोड़ना, ब्रीदिंग । हिन्दी का साँस शब्द श्वास से ही बना है । श्वसन का अर्थ भी साँस लेना होता है । गौर करें कि मूलतः श्वास लेना जीवन के लिए ज़रूरी क्रिया है । श्वास जीवन का सम्बल है । श्वास के जरिये रक्त में वायुसंचार होता है और यही रक्त हमारे शरीर को पोषण देता है । विश्वास जिसमें यकीन, ऐतबार का भाव है और आश्वासन जिसका अर्थ तसल्ली अथवा सांत्वना होता है, इसी सिलसिले की कड़ियाँ हैं ।
श्वसन में साँस लेना और छोड़ना दोनो शामिल है । दोनों में एक बारीक फ़र्क है । श्वास लेना जहाँ चुस्त होने का लक्षण है वहीं श्वास छोड़ना निढाल होने, क्षीण होने का लक्षण है । इन दोनो ही क्रियाओं में उपसर्गों के ज़रिये फ़र्क़ किया गया है । साँस लेना जहाँ आश्वास है वही साँस छोड़ना निश्वास है । हिन्दी का उपसर्ग में सकारात्मक अर्थवत्ता है । इसमें सब ओर, सब कुछ वाला भाव भी है । श्वास से पहले लगने से आश्वास बनता है जिसका अर्थ होता है खुली साँस लेना, मुक्त साँस लेना, तसल्ली के साथ जीना । आश्वास से ही आश्वासन बना है जिसमें निहित तसल्ली, सांत्वना, दिलासा, प्रोत्साहन जैसे भाव स्पष्ट हैं । वामन शिवराम आप्टे के कोश में आश्वास् का अर्थ साँस देना, जीवन देना, जीवित रखना जैसे अर्थ भी दिए हैं । आपात् स्थिति में मुँह से मुँह मिला कर कृत्रिम साँस देकर किसी को जीवित रखने का प्रयत्न भी इसी आश्वास से अभिव्यक्त होता है ।
य-अशान्ति में निश्वास क्रिया प्रभावी होने लगती है । लम्बी साँस छोड़ना दरअसल दुख, शोक प्रकट करने का लक्षण भी है और आन्तरिक वेदना की अभिव्यक्ति भी । गहरी साँस छोड़ी जाएगी तो लम्बी साँस ली भी जाएगी । आश्वास-निश्वास के इस क्रम को देशी हिन्दी में उसाँस कहते हैं । उसाँस का एक रूप उसास भी है । यह उच्छ्वास से बना है जो मूल संस्कृत का शब्द है और हिन्दी की तत्सम शब्दावली में आता है । उच्छ्वास बना है उच्छ्वस uchvas से । उद् उपसर्ग में छ्वस chvas लगने से बनता है उच्छ्वस । दिलचस्प यह कि संस्कृत के श, क्ष, श जैसे रूप प्राकृत अपभ्रंश में में बदलते हैं जैसे क्षण से छिन । क्षमा का छिमा । यहाँ छ्वस दरअसल श्वस का ही रूप है । वैदिक संस्कृत में अनेक शब्दों के बहुरूप मिलते हैं जो प्राकृत के समरूप लगते हैं । बहरहाल, उद् और छ्वस का अर्थ गहरी या लम्बी साँस होता है । उच्छ्वस > उच्छ्वास > उस्सास और फिर इससे बना उसाँस शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है और दुख-शोक की सामान्य अभिव्यक्ति का ज़रिया है ।
श्वस में वि उपसर्ग लगने से बनता है विश्वस् । गौर करें संस्कृत के वि उपसर्ग की कई अर्थ छटाएँ हैं जिनमें से एक है महत्व प्रदान करना । स्पष्ट करना । अन्तर करना आदि । विश्वस का अर्थ हुआ मुक्त साँस लेना, चैन से साँस लेना । ध्यान रहे कि श्वसन प्रणाली के ज़रिए ही सबसे पहले यह पता चलता है कि रोगी की दशा सही है या नहीं । श्वास प्रणाली पर ही नाड़ी तन्त्र काम करता है । पुराने ज़माने से नब्ज़ देख कर मरीज़ के हाल का अंदाज़ा लगाया जाता रहा है । श्वसन प्रणाली ही वह आधार है जिसके ज़रिये ही शरीर के अवयव सही ढंग से काम करते हैं । इस आधारतन्त्र का मज़बूत होना, कुशल होना, निर्दोष होना ही उसे विश्वसनीय बनाता है । सो, श्वस में वि उपसर्ग लगाकर बनाए गए विश्वस् से जो अर्थवत्ता हासिल हुई वह भरोसा, निष्ठा, ऐतबार जैसे आशयों को प्रकट करती है । विश्वस से ही विश्वास बना है ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, August 8, 2012

जासूस की जासूसी

Spy

न्सान शुरू से बेहद फ़ितनासिफ़त रहा है । उसे सब कुछ जानना है । एक ओर धरती के पेट में क्या है, यह जानने और फिर उसे निकालने में वह दिन-रात एक किए रहता है, दूसरी तरफ़ चांद-सितारों के पार क्या है इसके लिए बेचैन रहता है । जो कुछ छुपा हुआ है, जो कुछ अदृष्ट है वह सब उसे देखना है, जानना है । जानने की यह चाह ही जासूस की राह बनती है । सामान्य जिज्ञासा रखने से समझदारी के दरवाज़े खुलते हैं और किन्हीं निजी दायरों के भेद जानने कोशिश से जासूसी की कहानी बनती है । इन दायरों की सीमा किसी देश की सरकार और राजनीतिक दल से लेकर घरानों, परिवारों और एक व्यक्ति विशेष तक भी सीमित हो सकती है । दुनिया के सबसे पुराना पेशा देहव्यापार कहा जाता है । हमारा मानना है कि जासूसी को भी इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए ।
किसी के भेद लेना, टोह लेना, गुप्तचरी कराना जैसी क्रियाओं के लिए हिन्दी में जासूसी सबसे ज्यादा लोकप्रिय शब्द है । हिन्दी में जासूस शब्द की आमद फ़ारसी के ज़रिये हुई है मगर यह सामी मूल का शब्द है । अल सईद एम बदावी, अरबी-इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ़ कुरानिक यूज़ेज के मुताबिक इसका अर्थ हाथों से परीक्षण करना, जाँच करना, झाँकना, ढूँढना, तलाशना, टोह लेना, भेद लेना, छान-बीन करना जैसी बातें हैं । यह ध्यान देने योग्य है कि ये सभी बातें किसी की निजता के दायरे में करने का आशय इस धातु में निहित है । आज आज जिस अर्थ में जासूस शब्द का प्रयोग होता है निश्चित ही उसका विकास राजनीति के इतिहास के साथ-साथ हुआ । जासूस शब्द अरबी की जीम-सीन-सीन धातु से बना है । बदावी ने इसके लिए j-s-s का प्रयोग किया है जबकि अन्द्रास रज्की इसके लिए g-s-s का प्रयोग करते हैं । हालाँकि दोनों ही स्थानों पर वर्ण का ही संकेत है ।
रबी मूल के जासूस की व्याप्ति कई सेमिटिक और भारोपीय भाषाओं में है जैसे तुर्की में जासुस, अज़रबेजानी में जासूस, स्वाहिली में जासिसी, उज़्बेकी में जोसस है । इसी कड़ी में अरबी का जस्सा शब्द भी है जिसका हिब्रू रूप गिशेश है जिसका अर्थ है परीक्षण करना । मूलतः जासूस शब्द का अर्थ भी छूना, टटोलना, महसूस करना, परीक्षण करना, जाँचना है । मराठी में जासूस को जासूद कहते हैं जिसका मूलार्थ संदेशवाहक, हरकारा या दूत है । जासूस के अर्थ में चोरजासूद शब्द है जो दरअसल गुप्तचर या भेदिया होता है । संदेशवाहकों की जोड़ी जासूदजोड़ी कहलाती है । मराठी में जासूस के लिए हेर, बातमीदार या निरोप्या शब्द भी हैं जबकि संस्कृत-हिन्दुस्तानी में एक लम्बी कतार नज़र आती है जैसे- अपसर्प, हरकारा, अवलोकक, अवसर्प, गुप्तचर, गुरगा, सूचक, गोइंदा, मुखबिर, दूत, चर, चरक, भेदिया, कासिद, जबाँगीर, चारपाल, जरीद, टोहिया, थांगी, पनिहा, प्रणिधि, वनमगुप्त, प्रवृतिज्ञ, वार्तायन, वार्ताहर, प्रतिष्क, संदेशवाहक आदि ।
जासूस के अलावा हिन्दी में भेदिया शब्द भी है जो बना है संस्कृत धातु भिद् से जिसमें दरार, बाँटना, फाड़ना, विभाजित करने जैसे भाव हैं । दीवार के लिए भित्ति शब्द इसी मूल से आ रहा है । कोई भी दीवार दरअसल किसी स्थान को दो हिस्सों में बाँटती है। एक समूचे मकान की दीवारें विभिन्न प्रकोष्ठों का निर्माण करती हैं । भेद, भेदन, भेदना जैसे शब्द भी भिद् से तैयार हुए हैं। रहस्य के अर्थ में जो भेद है उसमें दरअसल आन्तरिक हिस्से में स्थित किसी महत्वपूर्ण बात का संकते है जो उजागर नहीं है । ज़ाहिर है इस बात को रहस्य की तरह माना गया, इसलिए भेद का एक अर्थ गुप्त या रहस्य की बात भी है । भेद को उजागर करने के लिए उस स्थान पर भेदने की क्रिया ज़रूरी है, तभी वह गुप्त बात सामने आएगी । भेदिया शब्द भी इसी धातु से तैयार हुआ है जिसका अर्थ है जासूस, भेदने वाला । कई बार प्रकार, अन्तर, फर्क आदि के अर्थ में भी भेद शब्द का प्रयोग होता है । बात वही विभाजन की है । किसी चीज़ के जितने विभाजन होंगे, उसे ही भेद कहेंगे जैसे नायिका-भेद यानी नायिकाओं के प्रकार । फूट डालने के अर्थ मे भेद डालना मुहावरा भी प्रचलित है । “दीवारों के भी कान होते” हैं जैसी कहावत में दीवारों के पीछे छुपने वाले और वहाँ बसने वाले भेदों का ही तो संकेत मिलता है अर्थात दीवारे भी जासूसी करती हैं ।
संस्कृत का गुप्तचर शब्द हिन्दी की तत्सम शब्दावली में भी जासूस के अर्थ में मौजूद है । यह बना है गुप् धातु से जिसमें रक्षा करना, बचाना, आत्मरक्षा जैसे भाव तो हैं ही, साथ ही इसमें छुपना, छुपाना जैसे भाव भी हैं । गौर करें कि आत्मरक्षा की खातिर खुद को बचाना या छुपाना ही पड़ता है । मल्लयुद्ध के दाव-पेच दरअसल क्या हैं ? दरअसल अपने अंगों को आघात से बचाने की रक्षाविधि ही दाव-पेच है । रक्षा के लिए चाहे युद्ध आवश्यक हो किन्तु वहां भी शत्रु के वार से खुद को बचाते हुए ही मौका देख कर उसे परास्त करने के पैंतरे आज़माने पड़ते हैं। यूँ बोलचाल में गुप्त शब्द का अर्थ होता है छुपाया हुआ, अदृश्य । गोपन, गोपनीय, गुपुत जैसे शब्द इसी मूल से आ रहे हैं। प्राचीनकाल में गुप्ता एक नायिका होती थी जो निशा-अभिसार की बात को छुपा लेने में पटु होती थी । इसे रखैल या पति की सहेली की संज्ञा भी दी जा सकती है। गुप्ता की ही तरह गुप्त से गुप्ती भी बना है जो एक छोटा तेज धार वाला हथियार होता है। इसका यह नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि इसे वस्त्र-परिधान में आसानी से छुपाया जा सकता है ।
गुप्त और चर दोनों से मिलकर बना है गुप्तचर जिसका का शाब्दिक अर्थ हुआ छुप-छुप कर चलने वाला । गुप्तचर में जो मूल भाव है वह है खुद की पहचान को छुपाना न कि चोरी-छिपे चलना । खुद को छुपाने से बड़ी बात है खुद की पहचान को गुप्त रखते हुए लोगों के बीच रहना, उठना-बैठना । ये सब बातें “चर” में निहित हैं । राजनय और कूटनीति के क्षेत्र में गुप्तचरी का महत्व सर्वाधिक होता है जहाँ एक अध्यापक, एक चिकित्सक, एक सिपाही, एक सब्ज़ीवाला, नाई, गृहिणी गर्ज़ यह कि कोई भी जासूस हो सकता है । यही है गुप्तचर का असली अर्थ ।
इसे भी देखें- जासूस की जासूसी

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, June 26, 2012

गुण्डे की नेता से रिश्तेदारी

"कन्नड़ में गण्डा का अर्थ होता है मोटा आदमी । इसका एक अन्य अर्थ है शक्तिशाली पुरुष । ध्यान रहे उभार की अर्थवत्ता के चलते ही गण्ड में नायकत्व का भाव आया है अर्थात जो दूसरों से ऊपर दिखे ।"

प्रा यः सभी भाषाओं में शब्दोंकी अर्थावनति की प्रवृत्ति होती है । प्रभाव और महिमा का बोध कराने वाले शब्द काल के प्रवाह में धीरे धीरे व्यग्यसूचक हो जाते हैं बाद में उनमें विपरीत भाव तक पैदा हो जाता है । शब्दों का सफ़र में ऐसे अनेक उदारहरण मिल जाएँगे जैसे ऐहदी, नौकर, चाकर, पाखण्डी, गुरु आदि। तथाकथित नेता इस बात से नाराज़ रहते हैं कि उन्हें गुण्डा कहा जाने लगा है । अब उन्हें कौन समझाए कि नेता वह है जो किसी समूह को राह दिखाए, अगुवाई करे । नेता शब्द की अभिव्यक्ति वाले न जाने कितने शब्द हैं जैसे-नायक, प्रमुख, प्रधान, सरदार, आक़ा, साहिब, गुरु वगैरह वगैरह । अब गुण्डों का सरदार भी नायक ही होता है । अब अगर गुण्डा शब्द के मूल में ही प्रधान और नेता जैसे भाव हों तो उसमें बुरा मानने की क्या बात है ! और बुरा ही मानना है तो खुद को नेता कहलवाना भी बंद कर दें क्योंकि नेता की अर्थवत्ता ने भी नकारात्मक रूप अपना लिया है । जब कोई व्यक्ति ज्यादा दंद-फद दिखाता है उसे नेता  कहते हैं । नेतागीरी शब्द पूरी तरह से नकारात्मक है जिसका अर्थ है निजी स्वार्थ के लिए लोगों को बरगलाना ।

गुण्डा शब्द की व्याप्ति आर्यभाषा परिवार और द्रविड़ परिवार की भाषाओं में क़रीब क़रीब एक सी है । यह जानना भी दिलचस्प होगा कि इसमें निहित नकारात्मक भाव भी सभी भाषाओं में है किन्तु दक्षिण की मराठी, तमिल जैसी भाषाओं से यह संकेत मिलता है कि मूलतः गुण्डा शब्द का आशय शक्तिशाली, प्रभावशाली, ताक़तवर, नायक जैसी अर्थवत्ता रखता था । तेलुगू में गुण्डुराव या गुण्डूराज आख़िर प्रभावी नाम ही हैं जिसका अर्थ नेता, प्रमुख ही है। आखिर गुण्डा शब्द में इन भावों का विकास किस तरह हुआ होगा ? सबसे पहले बात करते है इसके जन्मसूत्रों और रिश्तेदारियों की । संस्कृत के गुंड, गंड, गुड़, खण्ड, खांड, काण्ड जैसे शब्द एक ही सिलसिले की कड़ियाँ हैं । इन सबमें जो मूल भाव है वह है उभार । ध्यान रहे ये सभी शब्द एक वर्णक्रम में आते हैं अर्थात क-ख-ग आदि । एक ही वर्णक्रम के शब्द आपस में रूपान्तरित भी होते हैं । उभार के अर्थ पर ध्यान दें । समतल पर किसी उठाव का पैदा होना दरअसल उस समतल क्षेत्र को दो भागों में विभाजित करता है । कोई भी पर्वत शृंखला दरअसल पार्थिव उभार है जिसके दोनो  ओर के इलाके पृथक भूक्षेत्र होते हैं ।
गुड़ का जन्म हुआ है गड् से जिसमें पिण्ड का भाव भी है, कूबड़ अथवा गाँठ का भी और रस, राब या शीरा का भी । ये सभी लक्षण गन्ने हैं । गन्ना का मूल काण्ड और गण्ड दो शब्दों से बताया जाता है । ये दोनों एक ही कतार में खड़े हैं । गण्ड का अर्थ उभार या गाँठ होता है । ध्यान रहे, गन्ने पर एक निश्चित दूरी पर उभार होता है जिसे गाँठ कहते हैं । इसी उभार के लिए संस्कृत में काण्ड शब्द भी है । अध्याय, खण्ड, विभाग जैसे अर्थों पर जो मुख्यतः विभाजन को बताते हैं । पौराणिक ग्रन्थों के अध्यायों को काण्ड कहा जाता था पुस्तक के विभिन्न भाग काण्ड कहलाते थे । गन्ने का तना देखें तो इसमें भी यही काण्ड नज़र आता है । इस काण्ड का ही एक रूप खण्ड है । खण्ड यानी विभाग, क्षेत्र, अंश आदि । हमारे इर्दगिर्द खण्ड से जुड़ी कितनी ही संज्ञाएँ हैं जैसे झारखण्ड, उत्तराखण्ड, बघेलखण्ड, बुंदेलखण्ड आदि इसका ही रूप फ़ारसी में कन्द होता है जैसे ताशकन्द, समरकन्द आदि । आप्टे कोश के मुताबिक काण्ड के मूल में संस्कृत का कण् है ।
संस्कृत की कण् धातु में क्षीण, सूक्ष्म और छोटे होते जाने का भाव है। कण् में पीसना, चूरना जैसा भाव भी है । पीसने की क्रिया किसी वस्तु या पदार्थ को लगातार तोड़ना या विभाजित करना ही है । यही है कण् में निहित छोटा होते जाने के भाव की व्याख्या । संस्कृत की कण् धातु में निहित हिस्सा, शाखा, भाग, लघुतम अंश जैसे अर्थों से ही इसमें अध्याय या प्रसंग का भाव विकसित हुआ । घास प्रजाति के पौधे के लिए भी काण्ड शब्द प्रचलित हुआ जिसमें बाँस से लेकर गन्ना भी शामिल है । किसी वृक्ष की शाखा, डाली अथवा तने को भी काण्ड कहा जाता है। इसी कड़ी से जुड़ा है प्रकाण्ड शब्द । संस्कृत का प्र उपसर्ग जब संज्ञा या विशेषण से पहले लगता है तो उस शब्द में सम्पूर्णता का भाव भी समाहित हो जाता है । इस तरह एक नया विशेषण बनता है जिसमें अत्यधिक, आधिक्य या अत्यंत का भाव समाहित है जैसे पेड़ का तना । प्रकांड का दूसरा अर्थ है कोई भी प्रमुख पदार्थ या वस्तु। इसीलिए आमतौर पर किसी विशिष्ट क्षेत्र में प्रवीणता रखनेवाले व्यक्ति को हिन्दी में प्रकांड पंडित कहा जाता है।
संस्कृत के गण्ड में उभार का जो भाव है वह उसे विशिष्ट बनाता है । समतल सतह पर कोई भी उभार विशिष्ट है । समाज में किसी व्यक्तित्व का उभार उसे खास बनाता है । ऐसे लोग नायक कहलाते हैं । गण्ड का एक अर्थ नायक, योद्धा या शूरवीर भी है । संस्कृत के गण्ड का प्रभाव द्रविड़ भाषाओं पर भी है । तमिल में कण्डन का अर्थ भी योद्धा होता है । कन्नड़ में गुण्ड का अर्थ चाकर होता है जो किसी ज़माने में फौज की अग्रिम पंक्ति के नायक होते थे । जे पी फेब्रिसियस के तमिल लैक्सिकन के मुताबिक गण्डा का अर्थ होता है मोटा आदमी । इसका एक अन्य अर्थ है शक्तिशाली पुरुष । तेलुगु में व्यक्तिवाचक संज्ञा के तौर पर गुंडूराव नाम खूब प्रचलित है । इसमें नायक का ही भाव है । ध्यान रहे उभार की अर्थवत्ता के चलते ही गण्ड में नायकत्व का भाव आया है अर्थात जो दूसरों से ऊपर दिखे । पर्वतशृंखलाएँ पृथ्वी का उभार ही हैं और पर्वत शिखरों में नायक भाव स्थापित है । उभार से ही गण्ड के गण्डि, गुण्डी, घुण्डी, गण्डा जैसे रूप सामने आते हैं जिसका अर्थ है कोई ग्नन्थि, गूमड़, रूई या कपड़े का गोला, गेंद या मन्त्र विद्ध ताबीज आदि ।
राठी में एक शब्द है गांवगुंड जिसका अर्थ है ग्रामनायक या ग्रामयोद्धा । अथवा भांड-मीरासी जैसा कोई पात्र जो देखते ही देखते अपने करतबों से भीड़ जुटा लेता है । मराठी में गुंडा शब्द का अर्थ है एक गोल, चिकना पत्थर । यह सालिगराम भी हो सकता है । इसके अलावा एक दुष्ट या कमीन किस्म का व्यक्ति जो हर तरह की चालें चलना जानता है । कुल मिला कर “गुण्ड” जो किसी समूह का नायक था, बाद में अपनी उद्धत, अहंकारी वृत्ति के चलते खल-चरित्र बन गया । नायक शब्द की अर्थवत्ता तो कायम रही मगर नायक की अर्थवत्ता वाले गण्ड, गुण्ड जैसे शब्दों की अर्थावनति हुई । अशिष्ट, अशालीन, उदण्डतापूर्व व्यवहार करने वाले व्यक्ति को गुण्डा की संज्ञा मिली ।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, February 11, 2012

पहचानिए हिन्दी के दो कमीनों को…[कम-2]

पिछली कड़ी-‘काम’ में ‘कमी’ की तलाश [कम-1]

हिन्दी की ज़मीन पर मेरे विचार से दो ‘कमीन’ विराजमान हैं । बोलचाल की भाषा में फ़ारसी के कमीन का चलन बढ़ा और जनमानस में सदियों से प्रचलित(पाली/हिन्दी) का ‘कम्मीं’ भी ‘कमीन’ बन गया

श्रम विभाजन और वर्ग विभाजन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । कार्मिक विभाजन हुआ ही इसलिए था क्योंकि जो पहले से श्रेष्ठ थे वे बेहतर स्थिति में रहें । श्रम से जुड़ी व्यवस्था में मनुष्य ने ‘कर्म’ शब्द के साथ भी भेदभाव बरता । कर्म से जुड़ी सामान्य सामाजिक-पहचान सदियों बाद जातीय पहचान बन गई और फिर उस शब्द को हीन अर्थों में देखा जाने लगा । रोज़मर्रा से जुड़े तमाम कार्यों को सम्पादित करने वाले श्रमिक समाज पर नज़र डालिए, एक नहीं, हज़ारों ऐसे शब्द मिल जाएँगे । दुनियाभर के समाजों में मनुष्य सदियों से जातीय हीनता का दंश सहता रहा है । प्रायः सभी भाषाओं में नस्ली भेदभाव के शब्द मिलते हैं । भारतीय भाषाओं में भी ये हैं । वैदिक साहित्य से ही ये साक्ष्य मिलने लगते हैं । बहरहाल, ‘कमीन’ शब्द के सन्दर्भ में हमेशा ग़लतफ़हमी रही है । हिन्दी में ‘कमीन’ शब्द भी प्रचलित है और ‘कमीना’ भी । दोनो को एक ही समझा जाता है । देखा जाए तो दोनो में बहुत ज्यादा अन्तर भी नहीं है । अपने मूल रूप में ये दोनों ही अपशब्द नहीं थे, मगर आज दोनों की ही अर्थावनति हो चुकी है और इनका प्रयोग अभद्र बोल-व्यवहार समझा जाता है ।

फ़ारसी का कमीना

‘कम’ शब्द की तरह ही ‘कमीन’ शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में भी हिन्दी कोश ज्यादा जानकारी नहीं देते हैं । अलबत्ता यह स्पष्ट है कि हिन्दी में आज गाली की तरह मशहूर ‘कमीना’ शब्द फ़ारसी मूल के ‘कमीनः’ (कमीनह्) से बना है । संस्कृत-फारसी का विसर्ग हिन्दी में स्वर हो जात है । सवाल यह है कि ‘कमीन’ शब्द कहाँ से आया है ? मोटे तौर पर तो ‘कमीन’ और ‘कमीना’ एक ही जान पड़ते हैं मगर ‘कमीना’ जहाँ सौ फ़ीसद फ़ारसी शब्द है, वहीं ‘कमीन’ शब्द का रिश्ता एकाध जगह फ़ारसी से और कुछ जगह हिन्दी से बताया गया है । हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी के कई कोशों में तो ‘कमीन’ शब्द दर्ज़ तक नहीं हुआ है । शायद इसीलिए कि ‘कमीन’ को ‘कमीना’ का पर्याय मान लिया गया । मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश ‘कमीन’ शब्द है ही नहीं और फ़ैलन के कोश में ‘कमीन’ शब्द को तो हिन्दी का बताया गया है मगर उसकी व्युत्पत्ति फ़ारसी ‘कमीनः’ से बताई गई है । ‘कमीन’ का अर्थ फ़ैलन नीच जात बताते हैं और ‘कमीना’ का अर्थ टहलुआ, चाकर, सेवक, नौकर, दास आदि । फैलन ‘कार-कमीन’ और ‘कमीन-कंडु’ शब्दों का उल्लेख भी करते हैं ।

कम्मी से कमीन

‘कमीन’ शब्द प्राचीन भारतीय समाज की जजमानी प्रथा के सन्दर्भ में सामने आता है और इसीलिए मेरे विचार में हिन्दी के ‘कमीन’ और ‘कमीना’ दो अलग अलग शब्द है, दोनों की अलग अलग अर्थवत्ता है और दोनों के जन्मसन्दर्भ भी पृथक है । ‘कमीना’ बना है फ़ारसी के ‘कमीनः’ से जिसके मूल में ‘थोड़ा’, ‘कुछ’, ‘न्यून’ के अर्थवाला फ़ारसी का ‘कम’ शब्द है । इसका रिश्ता पुरानी फ़ारसी और अवेस्ता के ‘कम्ना’ शब्द से है । दूसरी ओर ‘कमीन’ शब्द के मूल में संस्कृत का ‘कर्म’ शब्द है । पाली, अपभ्रंश में ‘कर्म’ का ‘कम्म’ रूप होता है । हिन्दी के विभिन्न रूपों में ‘कार्य’ के अर्थ में प्रचलित ‘काम’ शब्द इसी ‘कम्म’ का अगला रूप है । जिस तरह हिन्दी का ‘काम’ शब्द पाली , अपभ्रंश के ‘कम्म’ का रूपान्तर है उसी तरह पाली के ‘कम्मी’, ‘कम्मिक’ ( पाली हिन्दी कोश, भदन्त आनन्द कौसल्यायन ) का रूपान्तर है हिन्दी का ‘कमीन’ शब्द जिसका आशय है कार्मिक, कर्मी, करने वाला , मज़दूर, श्रमिक आदि । प्रचलित तौर पर वे जातियाँ जो सेवाएँ लेती हैं उन्हें ‘जजमान’ कहते हैं और वे जातियाँ जो सेवाएँ प्रदान करती हैं, उन्हें ‘कमीन’ कहते हैं । सो काम करने वाले ‘कम्मी’ कहलाए । अब यहाँ ‘कमीन’ नीच व्यक्ति नहीं है बल्कि इसका अर्थ है ‘कार्मिक – कर्मकार’ । शोषण का दायरा जब व्यापक हुआ तब निम्नवर्गीय सेवाओं और गौण कृषिकर्म करने वाले तबकों को ‘कम्मी’ कहा जाने लगा । बाद के दौर में तो ब्राह्मणों के सेवाकर्म को छोड़ कर शेष सभी सेवाएँ गौण कर्म समझी जाने लगीं मसलन, खेत-मजूरी, हस्तशिल्प, कुम्हारी, लुहारी जैसे काम, घास छीलना, बाँस छीलना जैसे काम करने वाले समुदाय ‘कमीन’ जाति कहलाने लगे ।

कम्मकर से कमेरा

न्हीं अर्थों में पाली में ‘कम्मकर’, ‘कम्मकार’ जैसे शब्द भी हैं जिनसे हिन्दी का ‘कमेरा’ शब्द बना है । ‘कमेरा’ यानी मज़दूरी करने वाला । ‘कम्मी’ यानी कमाने वाला । चाकर, सहायक, छोटे-मोटे काम करने वाला ही ‘कमेरा’ है । फैलन के कोश में जो ‘कार-कमीन’ है वह दरअसल ‘कारकम्मी’ ही है । इसी तरह हिन्दी – उर्दू कोशों में ‘कमीनकंडु’ शब्द मिलता है जिसका अर्थ पुराने ज़माने में तीर तैयार करना था । गौरतलब है संस्कृत में ‘काण्ड’ शब्द बाँस की गाँठ को कहते हैं । बाँस छील कर तीर बनाने वाला ‘काण्डपाल’ कहलाता है । इससे ही बना है ‘कण्डु’ या ‘कडु’ शब्द । जाहिर यह कर्म से जुड़ा नाम है इसलिए इसके साथ जुड़े ‘कमीन’ शब्द का पूर्वरूप ‘कम्मी’ ही तार्किक है । इसी तरह मुहावरेदार भाषा में ‘कम्मीं-कमीन’ शब्दयुग्म का प्रयोग भी होता है । यहाँ ‘कम्मीं’ और ‘कमीन’ दोनों का अर्थ अलग अलग है । यहाँ ‘कम्मीं’ का आशय छोटी जात या ओछा काम करने वाले से है जबकि कमीन में फ़ारसी वाले ‘कमीना’ ( नीच, धूर्त, क्षुद्र, लफंगा, बदमाश ) का आशय निकलता है । ख्यात लेखक यशपाल ने मेरी तेरी उसकी बात उपन्यास में कमीन का अर्थ “ बेगार, कठिन परिश्रम और अप्रिय काम करने वाले ” बताया है । कम्मी और कम्मा के अवशेष हमें आज भी अपने आसपास मिलते हैं । कमीना में कमीन की तलाश करने वाले ज़रा पहचानें निकम्मा और निकम्मी जैसे शब्दों को । जिसके पास काम नहीं है वह निकम्मा, जो व्यस्था काम न करे वह निकम्मी । ये बेहद प्रचलित शब्द हैं ।  मूल भाव है कर्म का । लोगों को काम करना चाहिए । कम्मी यानी कामगार । बाद में यह हीनकर्म के अर्थ में रूढ़ हो गया ।

कम्मी यानी प्रजा 

‘कमीन’ और ‘कमीना’ शब्द भाव सादृष्य और अर्थ सादृष्य के चलते आपस में कुछ इस तरह घुलमिल गए कि ये एक मूल से जन्मे जुड़वाँ शब्द नज़र आने लगे । ध्यान देने की बात है कि यजमानी प्रथा से जुड़े ‘कम्मी’ शब्द में कामगार के भाव के साथ प्रजा का भाव भी है । अब यह कहने की ज़रूरत नहीं कि संरक्षण और शोषण भी एक चीज़ के दो आयाम हैं । किसी के संरक्षण में जाते ही शोषण का आरम्भ होता है । मगर मूलतः शोषण की शुरुआत पुचकारने से होती है । अतः यह नहीं माना जा सकता कि अपने शुरुआती दौर में ही यजमानी प्रथा का ‘कमीन’ शब्द सचमुच गाली का दर्ज़ा रखता था । समूची प्रजा, रियाया के लिए गाली समान शब्द का प्रचलन भला किसी भी काल की सत्ता-व्यवस्था में क्योंकर सम्भव होगा ? निश्चित ही फ़ारसी ने जब हिन्दुस्तान की धरती पर पैर रखा तब ‘कमीनः’ का ‘कमीना’ रूप भी विकसित हुआ । इसमे निहित कमतरता के दास्यभाव की अवनति हुई । बाद में ओछापन, नीचता, तुच्छता जैसे भावों का स्पष्ट विकास हुआ । शब्दों अर्थावनति के ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं । बोलचाल की भाषा में फ़ारसी के कमीन का चलन बढ़ा और जनमानस में सदियों से प्रचलित पाली का ‘कम्मीं’ भी ‘कमीन’ बन गया । इस तरह हिन्दी की ज़मीन पर मेरे विचार से दो ‘कमीन’ विराजमान हैं । एक फ़ारसी से आया हुआ और दूसरा फ़ारसी के प्रभाव में बना हुआ ।

शायर कमीना, आशिक कमीना

ही बात फ़ारसी के ‘कमीनः’ की तो न्यून, हीन, छोटा, क्षुद्र, ओछा आदि के अर्थ वाला कम ही इसके मूल में है । ‘कमीनः’ शब्द अपने मूल रूप में यह शब्द गाली या अपशब्द नहीं था, मगर बाद में हो गया । ‘कमीन’ का आशय था अपने पालक की तुलना में हीन, क्षीण, दीन आदि । साधक प्रायः खुद को ईश्वर की तुलना में दीन, हीन, कमजोर ही मानता है । मध्यकालीन सधुक्कड़ी भाषा के कवियों नें प्रायः इसी अर्थ में खुद को ‘कमीन’ कहा है । शायरी भी मूलतः सूफ़ीयाना काव्य परम्परा से ही जन्मी है । शायरों ने खुद को हक़ीर माना । इश्को-आशिकी की उनकी रचनाएँ दरअसल आध्यात्मिक अनुभूतियाँ ही हैं जिनमें माशूक का प्रयोग ब्रह्म के रूप में हुआ है । शायरों ने भी इसीलिए खुद को हक़ीर, गुलाम, फ़क़ीर और ‘कमीन’ तक कहा है, सो इसी भावना से । शायर भी कमीना, आशिक भी कमीना । इसका अर्थ लफंगा, बदमाश तो कतई नहीं, बल्कि विनम्रतावश खुद को कमतर मानने का भाव ही है यहा है । पर मेरा मानना है कि जातिवाचक कमीन शब्द का व्युत्पत्तिक आधार चाहे फ़ारसी के कमीन से न जुड़ता हो मगर जातिवाची संज्ञा के तौर पर ‘कमीन’ शब्द का प्रयोग मुस्लिम दौर में ही बढ़ा है । ‘कमीन’ में निहित ओछेपन के भाव का विस्तार ही हीन जाति के अर्थ में हुआ । बाद में इसमें नीच, अधम, धूर्त जैसे भाव समा गए और इस तरह ‘कमीन’ और ‘कमीना’ एक हो गए । अगली कड़ी- किसी कंपेश को जानते हैं आप ?

सम्बन्धित आलेख- 1.ये भी पाखण्डी और वो भी पाखण्डी 2.‘अहदी’ यानी आलसी की ओहदेदारी 3.मदरसे में बैठा मदारी…[संत-8] 4.गुरुघंटाल लवगुरु, हो जा शुरु.... 5.समझदार से बुद्धू की रिश्तेदारी

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, February 5, 2012

झप्पी, झपकी और ऊँघ

angels-embrace

पि छले कुछ बरसों में हिन्दी में झप्पी शब्द चल पड़ा है । मुन्नाभाई फिल्म के माध्यम से इसका प्रसार हुआ हुआ है । झप्पी यानी स्नेहालिंगन । प्यार-दुलार के साथ बाँहों में भर लेना । गले लगाना, आगोश में लेना, सीने से लगाना, चिपटाना जैसे भाव इसमें निहित हैं । मूलतः झप्पी पंजाबी से हिन्दी में आया शब्द है जिसका उर्दू-पंजाबी रूप है जफ्फी । वैसे भी हिन्दी में पंजाबी मूल के जिन शब्दों की रच-बस हुई है उसकी वजह पंजाबी का अनुदित साहित्य नहीं है बल्कि बॉलीवुड की फिल्में रही हैं । फ़िल्मी दुनिया में में पंजाब का वर्चस्व सब पर उजागर है । गीत, संगीत, कहानी, निर्देशन, संवाद और अभिनय आदि तमाम क्षेत्रों को पंजाब की प्रतिभाओं ने खूब समृद्ध किया है । पंजाबी निर्देशकों का अपनी संस्कृति से प्रेम हिन्दी फिल्मों में झलकता रहा है और उसी वजह से फिल्मी गीतों और संवादों पर पंजाबी असर के चलते हिन्दी में भी पंजाबी शब्द चले आए । मुन्नाभाई फिल्म के निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा भी पंजाबी हैं तो जादू की झप्पी को भी हिन्दी वालों में शोहरत मिलनी ही थी। हालाँकि इस झप्पी के पीछे मुन्नाभाई तो साफ़ दिखता है मगर पंजाब को लोग नहीं देख पाते ।
प्पी के मूल में दरअसल झप क्रिया है जिसमें तेज़ी, शीघ्रता, जल्दी का भाव है । झप के मूल में है संस्कृत का झम्प शब्द जिसका अर्थ है कूदना, उछलना । इसमें फुर्ती, त्वरता का भाव भी है । गौरतलब है कि उछलना या कूदना जैसी क्रियाएँ शीघ्रता से ही सम्पन्न होती हैं । देवनागर वर्णमाला के व्यंजन से ध्वनिअनुकरण के आधार पर अनेक शब्दों का निर्माण हुआ है । में संघर्षी ध्वनि के साथ गति का बोध होता है । हवा और पानी का तेज गति से मिला-जुला निनाद झर-झर ध्वनि है । पहाड़ से गिरते पानी के सोते को झरना कहते हैं । ऊपर से नीचे गिरती धारा में नैसर्गिक त्वरा, आवेग होता है । झटपट, झपाटा शब्दों को हम रोज़ सुनते हैं जिनमें गति और शीघ्रता है । झपट्टा, झपटना जैसे शब्दों में आक्रमण, चढ़ाई, धावा बोलने का आशय तो स्पष्ट है ही, सामान्य बोलचाल में किसी वस्तु को शीघ्रता से हस्तगत करने या तेज़ी से किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान को ताबे में लेने के लिए भी इन शब्दों का प्रयोग होता है । झाप, झापना या झापट /झापड़ शब्द भी आम हैं । झाप में शीघ्रता से काबू करने का आशय है । डाँटने, बोलती बन्द करने, चुप कराने के अर्थ में भी इसका प्रयोग होता है । लेकिन मूल भाव स्पष्ट है-तत्काल प्रतिक्रिया । झप्पी में भी झपाटे की क्रिया है । भावावेश में किसी को गले लगा लेना । खींच कर गले लगाना ही मूलतः झप्पी है, मगर अब जो ये जादू की झप्पी है, इसमें बड़ी शाइस्तगी, नफ़ासत और संयम भी है । और तो और, इसे पाने के लिए तो कतार में भी खड़े होना पड़ता है ।
Drowsiness
तेज़ रफ़्तारी या तत्क्षता प्रकट करने के लिए पलक झपकना मुहावरे का प्रयोग होता है अर्थात पलक झपकने की क्रिया जितना वक्त और गति । हद से ज्यादा थकान की अवस्था में या फिर जब मस्तिष्क किसी सोच-विचार की स्थिति में नहीं रहता, अचानक थोड़े समय के लिए नींद के आगोश में चले जाने की स्थिति झपकी कहलाती है । यह झपकी भी इसी मूल से आ रही है । अचानक नींद में गाफ़िल होना और अचानक जागृत अवस्था में आना, यही झपकी है । झपकी वाले आशय से मिलता जुलता एक और शब्द हिन्दी में प्रचलित है-ऊँघना । हालाँकि ऊँघना और झपकी एक दूसरे के पर्याय नहीं है मगर शब्दकोशों में झपकी का अर्थ ऊँघना भी मिलता है । ऊँघना शब्द को लेकर कोशकार एकमत नहीं हैं । जॉन प्लैट्स ऊँघना की व्युत्पत्ति अधो+गमन मानते हैं । ऊँघना क्रिया पर गौर करें । थकान के मारे जब बैठी हुई अवस्था में ही पलकें बोझिल हो जाती हैं तब सिर धीरे धीरे सीने पर आकर टिक जाती है । प्लैट्स इस क्रिया को अधो+गमन कहते हैं । अधोगमन से औंघ और फिर ऊँघ यह क्रम उनके कोश में मिलता है । अधोगमन में सिर के नीचे आने का भाव बहुत ज्यादा स्पष्ट नही है बल्कि यह सामान्य अर्थों में नीचे की ओर गति है । इसकी तुलना में हिन्दी शब्दसागर में ऊँघ की व्युत्पत्ति संस्कृत के अवाङ् से बताते हैं । अमरकोश में यह शब्द मिलता है जिसका अर्थ है- अधोमुख । यह अर्थ ऊँघ के आशय को स्पष्ट करता है । इसका प्राकृत रूप अघई है । मुझे लगता है कि अ-ई मिलकर बनते हैं और ङ् की नासिक्य ध्वनि को मिलती है । इस तरह हमारे हाथ ऊँघ लगता है । यह व्युत्पत्ति कही अधिक तार्किक लगती है ।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, January 25, 2012

आम आदमी, बाज़ारू आदमी-1

people-chad-vice

र्वसाधारण, सर्वसामान्यजन आदि के अर्थ में हिन्दी का ख़ासोआम पद बहुत प्रचलित रहा है । ख़ासोआम शब्द सेमिटिक मूल का है और अरबी के दो शब्दों ख़ास + आम् से मिल कर बना है । गौरतलब है कि हिन्दी में ये दोनों शब्द भी इतने आमफ़हम है कि दिन भर में न जाने कितनी दफ़ा हम इनका प्रयोग करते हैं । इसकी तुलना में इन दोनों के मेल से बने समास “ख़ासोआम” का प्रयोग अपेक्षाकृत कम होता है । ख़ासोआम शब्द का प्रयोग “खासो-आम” और “आमो-खास” की तरह भी होता है । सर्वसाधारण के अर्थ में ही “आमख़ास” शब्द भी है। हिन्दी में अब यह अल्पप्रचलित है, क़रीब एक सदी पहले तक उर्दू, फ़ारसी, हिन्दुस्तानी में इसका चलन था । हिन्दी गद्य के शुरुआती दौर में आमख़ास शब्द नज़र आता है । राजकाज की फ़ारसी में यह पद इतना रचाबसा था कि धुर पंजाब से लेकर सुदूर महाराष्ट्र तक मुस्लिम साम्राज्य के ज़रिये यह टर्म किंचित अन्तर के साथ अलग-अलग समान रूप से प्रचलित रही । धीरे धीरे पश्चिमी क्षेत्रों की बोलियों तक इसका दायरा सिमट गया । “आमख़ास” शब्द पंजाबी में खूब इस्तेमाल होता है । हिन्दी की कई बोलियों में यह अब भी ज़िन्दा है । मराठी का हमख़ास दरअसल “आमख़ास” का ही रूपान्तर है। नेट पर भी मुझे सर्वसाधारण, सब पर उजागर के भाव के साथ “आमख़ास” के कुछ प्रयोग नज़र आए और अपने निजी सन्दर्भ कोशों में भी इनका हवाला मिला। आज की नागरी हिन्दी में तो “आमख़ास” का प्रयोग विरल ही है।
बसे पहले अरबी के “आम” की बात । ज्यादातर लोग इस आम को सिर्फ़ “आम” यानी साधारण तक सीमित मानते हैं, दरअसल वह सेमिटिक भाषा परिवार का इतना महत्वपूर्ण शब्द है कि इस “आम” की अर्थवत्ता के एक छोर पर माँ है, दूसरे पर अवाम है तो तीसरे पर मुल्क । यही नहीं, इस शब्द से आर्य भाषा परिवार और सामी भाषा परिवार की रिश्तेदारी पता चलती है । “आम्” शब्द का मूल ढाई हज़ार साल ईसा पूर्व प्राचीन सुमेरियाई अक्कद भाषा का अम्मु ammu शब्द है यह समूहवाची शब्द है जिसमें सुरक्षा और संरक्षण का भाव भी है । “अम्मु” का अर्थ है राष्ट्र या अवाम । दिलचस्प बात यह कि सेमिटिक भाषा परिवार की कई भाषाओं में “अम्मु” शब्द का वर्ण विपर्यय होकर माँ के आशय वाले शब्द बने हैं जैसे अक्कद में “उम्मु” ummu, अरबी में “उम्म”, हिब्रू में “एम”, सीरियाई में “एमा” आदि ।
वैश्विक स्तर सभी भाषाओं में माँ, ममत्व और जननि भाव वाले शब्दों का जन्म एक जैसे नर्सरी शब्दों से हुआ है, यह गौरतलब है । मेरी नज़र में शिशु जिन मूल ध्वनियों को अनायास निकालता है उनमें सर्वाधिक ‘म’ वर्ण वाली ही होती हैं यथा अम् , मम् , हुम्म् आदि । शिशु के मुँह से जब “मम्-मम्” जैसी ध्वनियाँ निकलती है तो हम इसे भूख लगने का संकेत मानते हैं । इस ध्वनि संकेत की महिमा देखिये कि समूचे जीवजगत में स्तनपायियों के लिए अंग्रेजी में “मैमल” शब्द प्रयोग किया जाता है जो बना है लेटिन कि “मैम्मा” से जिसका मतलब ही है स्तन अथवा पोषणग्रंथि। जो स्तनपान कराए, पालन करे वह माँ । इसलिए अंग्रेजी में माँ के लिए मॉम, मम्मा, मम्मी जैसे शब्द है । ध्यान रहे कि प्रकृति में, पृथ्वी में मातृभाव है क्योंकि ये हमें संरक्षण देते हैं, हमारा पालन-पोषण करते हैं। अक्कद भाषा के “अम्मु” और “उम्मु” दरअसल पालन-पोषण वाले भावों को ही व्यक्त कर रहे हैं। राष्ट्र के रूप में “अम्मु” समूहवाची है, अवाम यानी जनता तो अपने आप में समूह ही है। कोई भी समूह मूलतः आश्रयदाता ही है। मनुष्य तो क्या, पशु भी सबसे पहले समूह में ही आश्रय तलाशते हैं, फिर किसी छत की खोज करते हैं। राष्ट्र के आगे तो सभी शरणागत हैं इसलिए सभी प्राचीन संस्कृतियों में राष्ट्र, मातृभूमि, जन्मभूमि को माँ का दर्ज़ा दिया गया है। पुरुषवाची होने के बावजूद भारतदेश को हम भारतमाता कहते हैं। राष्ट्र में संरक्षण के साथ साथ जननिभाव भी है । राष्ट्र ही हमारी पहचान है ।
प्रकृति के जननिभाव पर गौर करें। पानी भी हमें पोषण देता है। हम जल पर पलते हैं। पानी के “पा” में ही पालने का भाव है। वैदिकी में, संस्कृत में “अप्” का अर्थ पानी है। “अप्” से बरास्ता अवेस्ता, फ़ारसी का “आब” बना है जिसका अर्थ भी पानी है। गौरतलब है कि अधिकांश संस्कृतियाँ जलस्रोतों के किनारे ही पनपी हैं, सो “आब” से ही “आबादी” बना। “आबादी” यानी समूह की रचना, संस्कृति का निर्माण, राष्ट्र का जन्म । इसी कड़ी में फ़ारसी का” अब्र”, संस्कृत का “अभ्र” और मराठी का “आभाळ” आते हैं। सभी का अर्थ है बादल, मेघ। कहने की ज़रूरत नहीं कि इन नामों के पीछे पानी छुपा है। जल के लिए संस्कृत में एक शब्द है “अम्बु” । इसका जन्म हुआ है “अम्ब्” नामक धातु से । ध्यान रहे कि आर्यभाषाओं में एक वर्णक्रम की ध्वनियाँ एक

indian_flag... “अम्मु” का अर्थ है राष्ट्र या अवाम । दिलचस्प बात यह कि सेमिटिक भाषा परिवार की कई भाषाओं में “अम्मु” शब्द का वर्ण विपर्यय होकर माँ के आशय वाले शब्द बने हैं ...क्त तमाम सन्दर्भों से गुज़रते हुए अरबी के “आम्” शब्द में सार्वत्रिक, सर्वसाधारण, सामान्य की अर्थवत्ता स्थापित हुई।

दूसरे से बदलती हैं। “प” वर्णक्रम की ध्वनियाँ यहाँ आपस में बदल रही हैं। “अम्बु” के दो ही अर्थ हैं। एक तो शब्द करना (अम्, मम्, हुम् ) दूसरा है जाना। इस जाना में “अम्बु” अर्थात जल का प्रवाही भाव भी छुपा है। अम्ब् से ही बने हैं “अम्बा”, “अम्बिका”, “अम्बालिका” जैसे शब्द जिसमें माता, दुर्गा, भवानी, देवी जैसे अर्थ समाये हैं। समझा जा सकता है कि जल और अम्बु में क्या रिश्ता है, पानी का, प्राण का, जन्मदायी जननि का। अरबी में भी जल के लिए “मा”, “माउ”, “माइ” जैसे शब्द हैं।
वैदिकी और संस्कृत के “अम्बु”, “अप्” और अक्कद भाषा के “अम्मु”, “उम्मु” में अन्तर्सम्बन्ध के ये संकेत बहुत साफ़  हैं। इससे मिलते जुलते शब्दों का जलवाची, जननिवाची भाव साबित करता है कि इन शब्दों का विकास भौगोलिक भिन्नता के बावजूद एक जैसा रहा है। “अम्मु” में निहित राष्ट्र, नेशन, आबादी के आशय की तुलना प्राचीन भारतीय “जन” से कर के देखें। जन समूहवाची भी है और व्यक्तिवाची भी। यही बात संस्कृत के लोक में भी है। समस्त दृष्यजगत लोक में समाहित है, जो सार्वत्रिक है, वह “लोक” है। इसी “लोक” से समूहवाची लोग शब्द भी बना है जिसका आशय मनुष्यों से है। इसी नज़रिए से प्राचीन अक्कद के “अम्मु” से विकसित अरबी के “अम्म / आम्” को देखना चाहिए जिसका अर्थ है सार्वत्रिक, सार्वलौकिक, सर्वव्यापक आदि। इसमें ही सर्वसाधारण या सर्वसामान्य जैसे भावों की स्थापना हुई है। “लोक” में निहित दृष्यजगत का भी यही भाव है अर्थात वह जो सब पर उजागर है। अरबी के “आम” में निहित साधारण, सामान्य सर्वसाधारण का अर्थ भी सब पर उजागर है। अरबी का “अम्मा amma” शब्द इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है जिसमें घेराव, आवरण, शरण, आच्छादन, संरक्षण जैसे भाव हैं ।
क्त तमाम सन्दर्भों से गुज़रते हुए अरबी के “आम्” शब्द में सार्वत्रिक, सर्वसाधारण, सामान्य की अर्थवत्ता स्थापित हुई। इसी कड़ी में हिन्दी में बहुप्रयुक्त अमूमन शब्द का भी ज़िक्र करना चाहिए। “अमूमन” अरबी के आम शब्द का ही बहुवचन है। सामान्यतः, साधारणतः जैसे आशय को व्यक्त करने के लिए हिन्दी में इसका खूब इस्तेमाल होता है। अरबी का “उम्मः” या “उम्मा” शब्द भी अपरिचित नहीं है जिसका अर्थ है धार्मिक समुदाय । हिब्रू में इसका अर्थ राष्ट्र ही होता है । प्राचीन उग्रेटिक भाषा में इसका अर्थ परिवार था । आमखास के मराठी में “हमखास” बनने के सन्दर्भ में ध्यान रहे है कि फ़ारसी के “आमरास्तः” को मराठी में हमरस्ता कहा जाता है। विधायक के लिए मराठी ने इसी आम से आमदार शब्द बनाया । कालान्तर में “आम” शब्द में निहित सर्वसाधारण का अरबी में भी इतना साधारणीकरण हुआ कि इससे बने “आमी” शब्द का अर्थ आम आदमी और प्रकारान्तर से नीच, लोफ़र और बाज़ारू आदमी हो गया । खाँचों में बँटे समाज में अन्ततः यह होता है ही। जो सर्वसुलभ है, साधारण है, अन्ततः उसे स्तरहीन समझ लिया जाना तो तय है।
अगली कड़ी “दीवानेख़ास और आमख़ास” में समाप्त

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, January 17, 2012

महारत और महारथ

mahabharat1
लग-अलग मूल से जन्में एक से शब्दों का भाषा में बर्ताव होता है। हिन्दी में महारत और महारथ दो ऐसे शब्द हैं जिनका प्रयोग आम हिन्दीभाषी बतौर कुशलता, प्रवीणता, दक्षता या निपुणता के पर्याय की तरह से करता है। महारत और महारथ अपनी प्रकृति और व्युत्पत्ति के आधार पर दो नितान्त अलग अलग शब्द हैं मगर ध्वनिसाम्य के चलते भ्रमवश इनकी एक दूसरे से अर्थसाम्यता अनजाने में स्थापित होती चली गई। महारत फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी में आया तो महारथ संस्कृत मूल का शब्द है । महारत-महारथ के पर्यायी प्रयोगों के मामले में नामीगिरामी लेखक-पत्रकारों की कलम भी बेपरवाह रही है । कुछ लोगों नें अनजाने में इन शब्दों का प्रयोग किया तो कुछ लोगों ने शुद्धतावादी आग्रह के चलते महारत को विदेशज मानते हुए बड़ी आसानी से इसका ध्वन्यार्थ महारथ में तलाश लिया ।

बसे पहले ‘महारत’ की बात। मूल रूप से ‘महारत’ हिन्दी में बजरिया फ़ारसी आया और यह फ़ारसी का ही शब्द भी है, मगर इसके जन्मसूत्र सेमिटिक भाषाओं में छिपे हैं । ‘महारत' बना है सेमिटिक धातु म-ह-र से। हिब्रू, इजिप्शियन अरेबिक, आम्हारिक, अरबी, फ़ारसी, उर्दू आदि भाषाओं में इस धातु से बने कई शब्दों की व्याप्ति है । अरबी में इससे बनता है माहर जिसमें निष्णात, चतुर, ज्ञानी, विलक्षण, निपुण, प्रवीण, बुद्धिमान जैसे भाव हैं । हिब्रू और फ़ारसी में इसका ‘माहिरत रूप प्रचलित हुआ जिसमें तेज़, चतुर और कुशल का भाव है। हुनरमन्द होना भी माहिर होने की निशानी है । सीरियाई में इसका माहेर रूप है तो आम्हारिक में तेमारे जिसका अर्थ है सीखना। मूलतः म-ह-र धातु में सीखने, जानने का भाव ही प्रमुख है। माहर से बने माहिर की व्याप्ति जब फ़ारसी में हुई तो वहाँ अत् प्रत्यय लग कर इससे महारत शब्द बनाया गया जिसमें प्रावीण्य, कौशल, हुनर, गुणसम्पन्नता, दक्षता जैसे भाव उजागर होते हैं । माहिर संज्ञा है और व्यक्तिनाम भी होता है । हिब्रू में जहाँ इस धातु मूल में तेजी, चपलता का भाव है वहीं इथियोपिया में इसका अर्थ सीखना, सिखाना है । हिन्दी में ‘महारत’ से महारती शब्द भी बनता है जो मूलतः माहिर का हिन्दीकरण ही है । महारती का अर्थ हुआ कुशलता से काम करनेवाला । सम्भवतः इसे महारथी की तर्ज़ पर बनाया गया है। माहिर का भी यह अर्थ होता है।
हिन्दी का ‘महारथ’ शब्द तत्सम शब्दावली का हिस्सा है। महा + रथ से मिल कर यह बना है जिसका अर्थ हुआ बड़ी गाड़ी या रथ अथवा बड़ा योद्धा या नायक। गौर करें कि अरबी स्रोत से बने ‘महारत' शब्द की जो अर्थवत्ता है, संस्कृत के ‘महारथ’ में वैसा कोई भाव नहीं है। हिन्दी शब्द सागर के मुताबिक महारथ संज्ञा का अर्थ है बहुत भारी योद्धा जो अकेला दस हजार योद्धाऔं से लड़ सके । बहुत बड़ा रथ । विशाल रथ । आकांक्षा । मनोरथ । स्पष्ट है कि कुशल, चतुर, निष्णात जैसे भावों का यहाँ योद्धा के अर्थ में ही सन्दर्भ जुड़ता है। प्रवीण, निपुण जैसे स्वतंत्र अर्थ इस शब्द में नहीं हैं। महाभारत के शिशुपाल वध प्रसंग में महारथ  की परिभाषा बताई गई है जिसके मुताबिक “एको दशसहस्राणि योधयद्यस्तु धन्विनां शस्त्रशास्त्र प्रवीणश्च विज्ञेयः स महारथः” अर्थात महारथ वह है जो शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण होता है। जो योद्धा दस हजार योद्धा धनुर्धारियों के साथ अकेला युद्ध करने में सक्षम, समर्थ हो, उसे ‘महारथ’ कहते हैं।
हारथ शब्द में क्षत्रियत्व के साथ ब्राह्मणत्व का समावेश भी है। योद्धा सिर्फ़ वही नहीं है जो शस्त्रास्त्रों के साथ युद्धभूमि में शौर्यप्रदर्शन करे। योद्धाओं में महारथ वह है जो नीति, कर्त्तव्य, सिद्धान्त आदि के शास्त्रीय पक्ष से भी अवगत हो तथा युद्धभूमि में इन शिक्षाओं का नीतिगत और व्यवहारगत परीक्षण करते हुए शूरवीरता दिखाए। सामान्यतः योद्धा सिर्फ़ शस्त्री होता है और विद्वान सिर्फ़ शास्त्री। मगर महाभारत के पंच पाण्ड इन तमाम अर्थों में शस्त्र और शास्त्रनिपुण थे। अर्थात वे महारथ हैं। उनके मुख में चारों वेद और पीठ पर शर सहित धनुष है। यह क्षत्रियत्व और ब्राह्मणत्व का संगम है। शत्रु जब सामने हो तो उसे शास्त्र के ज़रिये अर्थात वाक्चातुरी से पराजित किया जा सकता है। अगर इसमें विलम्ब हो रहा हो तो शरसंधान से उसे पराजित किया जा सकता है। दरअसल महाभारत का जो केन्द्रीय भाव है उसके मूल में महारथ का चरित्र ही है।
हाभारत में युद्ध के समय कौरवों और पाण्डवों के पक्ष में लड़ने वाले महारथियों का हवाला है। कौरव पक्ष के सात महारथी-द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, शल्य और जयद्रथ । इसके अलावा किन्हीं संदर्भों में कौरव पक्ष के बारह महारथियों का उल्लेख मिलता है जिनमें दुर्योधन, भीष्म,  भूरिश्रवा, विकर्ण, और दुशासन के भी नाम शामिल हैं । पाण्डवों के तेरह महारथी- अर्जुन, सात्यिकी, धृष्टद्युम्न, घटोत्कच, शिखण्डी, अभिमन्यु, भीम, नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर, विराट, उत्तर और द्रुपद । इसके अलावा कुछ अन्य संदर्भों में पाण्डव पक्ष के अठारह महारथियों का उल्लेख है जिसमें भीम,  धृष्टकेतु, काशिराजस पुरुजित, कुंतिभोज, शैव्य युधामन्यु, उत्तमौजा, प्रतिविन्ध्य, श्रुतसोम, श्रुतकीर्ति, शतानीक और श्रुतवर्मा जैसे वीरों के नाम भी शामिल हैं । महाभारत के परम नायक अर्जुन नहीं, कृष्ण हैं। उन्होंने युद्ध में शस्रास्त्र ग्रहण नहीं करने की प्रतिज्ञा की थी, इसलिए उनका नाम यहाँ नहीं है, अन्यथा उनसे बड़ा महारथ / महारथी कौन हुआ है?
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 23, 2011

...लेकिन अपना अपना दामन

पिछली कड़ियाँ-1.दम्पती यानी घर के मालिक 2.घरबारी होना, गिरस्तिन बननाOLYMPUS DIGITAL CAMERA

न्धन को लोग नकारात्मक भाव से लेते हैं जबकि इसमें सकारात्मकता है। बन्धन में हमेशा सुरक्षा और जुड़ाव का भाव होता है। वैवाहिक स्थिति के सन्दर्भ में भी विवाह-बन्धन शब्द का जो प्रयोग है वह एक सूत्र में बन्धने के साथ सह-जीवन का अनुबन्ध भी होता है। दाम्पत्य में एक दूसरे के अधीन होने का जो भाव है वह इसीलिए है। “दाम्पत्य” बना है संस्कृत के दम से जिसका अर्थ है घर, आश्रय, निवास आदि। दम में बांधने का, रोकने का, थामने का, अधीन करने का भाव भी है। ज़ाहिर है ये सारे गुण जिस चीज़ में होते हैं उसे घर भी कहते हैं और बन्धन भी। घर भी बन्धन है, परिवार भी बन्धन है। हर वह व्यवस्था बन्धन है जिसके न रहने से हम बिखरने लगते हैं। बन्धन में सुरक्षा है, भरोसा है, विश्रान्ति है और आनंद है। “दम” की कड़ी में ही इंडो-ईरानी परिवार का एक अन्य शब्द भी है “दामन”। फ़ारसी से हिन्दी में आए कुछ विशिष्ट शब्दों में “दामन” भी एक है। दामन का प्रयोग बोलचाल की हिन्दी में भी होता है और साहित्यिक हिन्दी में भी, खासतौर पर शायरी में खूब होता है। दम से जुड़े सभी बन्धनकारी, आश्रयसूचक भावों का समावेश दामन में है। “फूल खिले हैं, गुलशन गुलशन। लेकिन अपना अपना दामन।।” जिगर मुरादाबादी के इस मशहूर शेर का भाव यही है कि खुदा की बनाई यह दुनिया गुणों की खान है। इसमें से कितना कुछ अपनी झोली में भर पाते हैं, यह देखने की बात है।
दामन का अर्थ होता है साड़ी का पल्ला, पल्लू, आँचल, अंगवस्त्र का निचला झूलता हिस्सा जिसे किसी अन्य के कंधे पर भी डाला जा सकता है या खुद के सिर को भी ढँका जा सकता है। दामन में छाया का भाव भी है। हवाओं से चलते वाले जहाज़ों के बादबान को भी दामन कहा जाता है। पर्वतीय उपत्यका को भी दामन कहते हैं क्योंकि वह चारों ओर से सुरक्षित होती है। पहाड़ी के दामन में ही बसाहट होती है। मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश के मुताबिक मैदान या समतल भूमि को भी दामन कहा जाता है। साड़ी के पल्लू के लिए आँचल शब्द भी खूब इस्तेमाल होता है। अंचल या आँचल में भी सुरक्षा का भाव है। आँचल पल्ला भी है, छाया भी और बन्धन भी। अंचल का अर्थ इलाका, क्षेत्र भी होता है। प्रायः क्षेत्र के नामों के साथ अंचल शब्द का इस्तेमाल होता है जैसे वनांचल, अरुणांचल आदि। दामन शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता भी है और पल्ले से जुड़े जितने भी मुहावरे हैं वे सब दामन के साथ इस्तेमाल होते हैं जैसे “दामन थामना” यानी संकट में भरोसा करना, “दामन छुड़ाना’ यानी पीछा छुड़ाना, “दामन में छिपाना” यानी आश्रय में लेना आदि। हाँ, उर्दू में “दामन साफ़ होना”, “पाक दामन होना” जैसे लोकप्रिय मुहावरे भी हैं। पाक-दामन या दामन साफ़ होना का अर्थ है किसी भी बुराई से खुद को बचा कर रखना। दामन के निवास या घर जैसे अर्थों पर गौर करें। “मेरा दामन साफ़ है” का अर्थ खुद के चरित्र, घर, ज़मीन या आधार को पवित्र बताना ही है। उर्दू में दामने-मरियम मुहावरा है। सतीत्व, साधुता के सन्दर्भ में इसका प्रयोग होता है। गौरतलब है कि मरियम का दामन बेदाग़ था।
इंडो-ईरानी परिवार का होने के नाते दम, दामन, दाम के उर्दू, फ़ारसी में समान आशय के बावजूद अर्थवत्ता में कुछ अन्तर है। जैसे दाम का एक अर्थ पालतू मवेशी भी होता है। भाव यहाँ भी जंगली, वनचर को अपना सहचर बना लेने का है। गौर करें कि पालतू बनाने के लिए पशुओं को जाल में फाँसना पड़ता है। फाँसने का फन्दा रस्सी से ही बनता है। जाल भी बिछाया जाता है जो रस्सी से ही बनता है। फाँसना क्रिया के मूल में ही दरअसल खुद पशु है। पशु है इसीलिए वह फँसता है। पशु शब्द की उत्पत्ति भी दिलचस्प है। आदिमकाल से ही मनुष्य पशुओं पर काबू करने की जुगत करता रहा। अपनी बुद्धि से उसने डोरी-जाल आदि बनाए और हिंसक जीवों को भी काबू कर लिया। संस्कृत में एक शब्द है पाश: जिसका अर्थ है फंदा, डोरी, शृंखला, बेड़ी वगैरह। जाहिर है जिन पर पाश से काबू पाया जा सकता था वे ही पशु कहलाए। पाश: शब्द से ही हिन्दी का पाश शब्द बना जिससे बाहूपाश, मोहपाश जैसे लफ्ज बने। प्राचीनकाल में पाश एक अस्त्र को भी कहा जाता था। पाश: शब्द के जाल और फंदे जैसे अर्थों को और विस्तार तब मिला जब बोलचाल की भाषा में इससे फाँस, फाँसी, फँसा, फँसना, फँसाना जैसे शब्द भी बने।
पौराणिक सन्दर्भों में दम का अर्थ पाश, रस्सी, माला, हार, कमरबन्द आदि के तौर पर भी मिलता है। कृष्ण का एक नाम दामोदर भी है। माँ यशोदा ने कृष्ण को एक बार कमरबन्द के ज़रिए पेड़ के तने से बान्ध दिया था। इसीलिए उन्हें दामोदर (दाम + उदर जिसका पेट रस्सी से बन्धा हो) कहा जाने लगा। यह तो हुआ दाम का बन्धनकारक यानी रस्सी के आशय वाला भाव। आश्रय सूचक भाव वाली व्याख्या भी है। दाम का अर्थ विश्व या लोक से ग्रहण करते हुए इसका अर्थ-जिसके उदर में सारा विश्व हो, यह भी बताया जाता है। हिन्दी में अदवान, अदवाइन जैसे शब्द भी हैं जिनसे रस्सी का आशय निकलता है। अदवाइन या अदवान चारपाई के पैंताने की ओर वाली रस्सी की उस बुनावट को कहते हैं जिसके जरिए चारपाई के झोल को कसा जाता है। टर्नर के अनुसार यह बना है अन्तदमनी से जबकि शब्दसागर के मुताबिक यह अधःदाम से बना है। दोनों में ही दाम शब्द का महत्व है। बाकी अन्त और अधः का भाव भी एक ही है। प्रायः सभी कोशों में दामनी को एक रस्सी या वह आवरण बताया जाता है जिसे घोड़ों के पुश्त पर धूप से बचाव के लिए डाला जाता है। दामनी का एक अर्थ मद्दाह साहब के कोश में महिलाओं की ओढ़नी भी बताया गया है। दामनगीर उस व्यक्ति को कहते हैं जिसने आश्रय के लिए साथ पाया हो, दामन पकड़ा हो। वह साया, छाया अथवा आश्रय जिसकी छत्रछाया में हम महफ़ूज़ रहें, उसे दामने-दौलत कहते हैं। मित्र का साथ ही दामने-यार है और रात का आखिरी पहर दामने-शब है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, December 17, 2011

घरबारी होना, गिरस्तिन बनना

landlord पिछली कड़ी-दम्पती यानी घर के मालिक
रो टी, कपड़ा और मकान, नून, तेल, लकड़ी या आटा-दाल का भाव जैसे मुहावरों में क्या समानता है? मोटे तौर पर इन मुहावरों में पदार्थों का उल्लेख है और जिस क्रम और जोड़े के साथ उल्लेख है, उसका महत्व तो गृहस्थी में ही है। गृहस्थ उसे कहते हैं जो घर में रहता हो। गृह+स्थ्  से बना है यह शब्द अर्थात जो घर में स्थिर हो। भारतीय परम्परा में गृहस्थाश्रम चार वर्णाश्रमों में दूसरा अधिष्ठान है। गृहस्थ में विवाहित, बाल-बच्चेदार, गृहपति जैसे भाव हैं। घर और मकान दरअसल एक से शब्द लगते हैं मगर इनमें फ़र्क है। ‘घर’ एक व्यवस्था है जबकि ‘मकान’ एक सुविधा है। ‘घर’ बनता है रिश्तों से, प्रेम से और व्यवहार से जबकि ‘मकान’ बनाता है ईंट-गारे से। सो घर जैसी व्यवस्था में रिश्तों के अधीन होना ज़रूरी होता है। इसीलिए आमतौर पर घर होना, किसी रिश्ते में बंधने जैसा है। शादी-शुदा व्यक्ति को इसीलिए घरबारी कहा जाता है क्योंकि वह रिश्ते के अधीन हो चुका है। किसी स्त्री को गिरस्तिन तभी कहा जाता है जबकि वह विवाहिता हो। मकान को घर का दर्जा यूँ ही नहीं मिल जाता। ‘घर’ बनवाया नहीं, बसाया जाता है। सो गृहस्थ, घरबारी जैसे शब्दों के मूल में जो बात उभर रही है वह है रहने का ठिकाना होना। यानी रहने का ठिकाना ही किसी व्यक्ति को समाज में सम्मान दिलाता है। 

शालीन वही है जो शाल् अर्थात घर में रहता है। आज चाहे शालीन का अर्थ शीलयुक्त हो मगर किसी ज़माने में शालीन का अर्थ घर में रहने वाला यानी घरबारी ही था।  दाम्पत्य में बंधा व्यक्ति दम्पती सिर्फ़ इसलिए नहीं है क्योंकि वह विवाहित अवस्था में है, बल्कि वह गृहस्थ है, गृहपति है। गृहस्थ के लिए ‘घरबारी’ शब्द बना है घर + द्वार से। घरद्वार एक सामासिक पद है जिसमें द्वार भी घर जैसा ही अर्थ दे रहा है। द्वार से ‘द’ का लोप होकर ‘व’ बचता है जो अगली कड़ी में ‘ब’ में तब्दील होता है। इस तरह घरद्वार से घरबार प्राप्त होता है जिससे बनता है घरबारी। गिरस्तिन भी दम्पति के अर्थ में असली घरमालकिन है। घर शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के गृह से मानी जाती है। संस्कृत का गृह और प्राकृत घर एक दूसरे के रूपान्तर हैं। यहाँ ‘र’ वर्ण ‘ग’ से अपना दामन छुड़ा कर आज़ाद होता है और ‘ह’ खुद को ‘ग’ से जोड़ कर ‘घ’ में तब्दील होता है इस तरह ‘गृह’ से ‘घर’ बनता है। मगर घर को अग्निपूजा अनुष्ठान से जोड़ कर भी देखना होगा। प्राचीन अग्निपूजक समाज में प्रत्येक आवास के भीतर एक अग्निस्थान अवश्य होता था। उससे भी पहले कबीलाई दौर में समूह के लिए अग्निग्रह होता था अग्निपीठ का महत्व उपासनास्थल जैसा था और उसी के आस-पास पूरा कुनबा बसता था। उस दौर में अग्नि की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण थी। अग्नि की दैवी महत्ता तो आज भी जनमानस में कायम है। वेदों में अग्नि चुराने का उल्लेख कई बार है। बाद में विकासशील समाज ने पृथक आवासों का निर्माण किया तब भी अग्निस्थान निश्चित रहता था। डॉ रामविलास शर्मा लिखते हैं कि प्राचीन समाजों में अग्निस्थान और आवास दोनों के लिए अग्नि सम्बन्धी शब्दावली देखने को मिलती है।

गृह का पूर्व रूप गृभ् हो सकता है। ‘घृ’ धातु में चमक, कान्ति का भाव है जो अग्नि का विशिष्ट गुण है। गृह के अर्थ में आवास अर्थ बाद का विकास है। रामविलासजी के मुताबिक संस्कृत के गृह का ‘गृ’, ग्रीष्म के ‘ग्री’ के समान मूलतः अग्निवाचक है। गृह, गृध व अग्नि रखने के स्थान हर्म्य का अर्थ अग्निस्थान भी है और भवन भी है। मोनियर विलियम्स ने ठीक सुझाव दिया है कि इसका सम्बन्ध ‘घृ’ और हर्म्य से होगा जिसका मूलार्थ है पारिवारिक अग्निस्थान। हर्म्य के पूर्वरूप घर्म्य के ‘घर्’ से हिन्दी का ‘घर’ बना। घर्म्य वह स्थान है जहाँ ‘घर्’ अर्थात अग्नि रखी जाती है। प्राचीन काल से घर में अग्नि का होना, अग्नि अनुष्ठान अर्थात अग्नि के आह्वान के साथ भोजन निर्माण होने से ही घर को ‘घर’ का महत्व मिलता था। जिस घर में रसोई न हो, वह ‘घर’ नहीं होता। फ़ारसी का गर्म, वैदिक घर्म का प्रतिरूप है। घर्म से ही गर्मी के लिए ‘घाम’ शब्द बना है। वैदिक ‘हर्म्य’ की रिश्तेदारी संस्कृत के ‘होम’ से है। संस्कृत के ‘होम’ और अंग्रेजी के ‘होम’ में ध्वनिसाम्य तो है पर अर्थसाम्य नहीं। संस्कृत के होम में जहाँ मूल अग्नि का अर्थ प्रधानता के साथ बना हुआ है वहीं अंग्रेजी के होम में वैदिक भाषा के निवास के आशय वाला गौण अर्थ प्रमुख हो जाता है। यहाँ यह उल्लेख ज़रूरी है कि पाश्चात्य भाषा विज्ञानियों नें अंग्रेजी के होम को भारोपीय भाषी परिवार का शब्द तो माना है मगर उसकी व्युत्पत्ति को लेकर उनके पास अलग तर्क हैं।
houseइंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु kam या कम् में भी मुख्यतः झुकाव या टेढ़ापन है जिससे फारसी में कमान या कमानी शब्द बने। संस्कृत की कुट् धातु में भी टेढ़ेपन का भाव है। प्राचीन मकानों की छतें प्रायः दोतरफ़ा ढलानवाली होती थीं। आदिम आश्रयों का निर्माण टहनियों को दोहरा मोड़ने की तरकीब से हुआ। मोड़ी हुई टहनियाँ दीवारों पर टिकाई जाती थीं जिस पर पत्ते, फूस आदि डालकर बनाए छप्पर को छत कहा जाता था। संस्कृत के स्कम्भ और फ़ारसी के खम पर गौर करें। खम का अर्थ है झुकाव या टेढ़ापन। स्कम्भ में झुकाव या टेढ़ापन न होकर मुख्य स्तम्भ का भाव है। खम का ही रूप है कमान। कमान, मेहराब को ही कहते हैं जिस पर मुख्यतः मकान की छत डाली जाती है। अंग्रेजी का होम शब्द भी इसी श्रंखला की कड़ी है। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का होम शब्द पोस्ट जर्मनिक के khaim ख़ैम से आया है जिसका गोथिक रूप होता है हैम haim जिसने अंग्रेजी में home का रूप लिया।
 ग्निस्थान के आश्रय वाले गौण अर्थ को बाद के दौर में प्रधानता मिली और अग्नि को सुरक्षित रखने वाले सुरक्षित, घिरे हुए स्थान का भाव इसमें खास हो गया। पाश्चात्य भाषा विज्ञानियों ने इसी घिरे हुए सुरक्षित स्थान वाले अर्थ को निवास के सन्दर्भ में प्रमुखता देते हुए इससे मिलते-जुलते शब्दों को एक वर्ग में रखा। पकोर्नी की भारोपीय धातु तालिका में घेर् gher- का रिश्ता संस्कृत के गृह् से जोड़ा गया है। हिन्दी के घिरना, घेरना का सम्बन्ध प्राचीन क्रिया घर् से अगर बनता है, जैसा कि पकोर्नी बताते हैं, तो यह उत्तर वैदिक विकास कहा जा सकता है जब घर् में निहित अग्निसूचक भाव गौण होकर निवास, आश्रय प्रमुख हो गया। प्रकारान्तर से यह घेर, घेरा जैसे सुरक्षात्मक भावों की वजह से हुआ है। घेर् gher-में भी घिरने, घेरने, बाड़ा, वाटिका, प्रांगण, परिसर, जैसे भाव हैं। अंग्रेजी का यार्ड शब्द इसी मूल का है जिसका अर्थ है किसी घर का अहाता या उससे सटा हुआ खाली स्थान। आवास से जुड़े परिसर को भी यार्ड yard कहते हैं। अंग्रेजी का गार्डन शब्द हिन्दी में भी बहुत प्रचलित है। यह इसी मूल का है। अल्बानी में इसका रूप गर्थ है जिसका अर्थ है बाड़, लैटिन में बगीचे के अर्थ में यह होर्तुस है, जर्मन में यह गार्तेन है। यूरोपीय भाषाओं में बस्तियों के नामों के बाद ग्राद, ग्रेड जैसे प्रत्यय लगे हुए मिलते हैं। ठीक वैसे, जैसे हिन्दी में पुर, नगर, नेर, वाड़ा (जबलपुर, जामनगर, बीकानेर, विजयवाड़ा) होते हैं। लेनिनग्राद या बेलग्रेड से इसे समझा जा सकता है। यह ग्राद, ग्रेड इसी मूल के हैं जिनका अर्थ है नगर, किला, बस्ती वगैरह। प्राचीन फ्रीसियन में इसका रूप गोर्दुम  था। रूसी में यह गोरद gorod या ग्राद grad होता है। अगली कड़ीः ...लेकिन अपना अपना दामन
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


Blog Widget by LinkWithin