Friday, August 24, 2007

मगध की माया और अग्निपूजा


रीब डेढ़ सदी पहले जब मशीनी क्रांन्ति हो चुकी थी और हैरतअंगेज कामों को अंजाम दे रही थीं तब उन कामों को माया अथवा जादू से कम नहीं समझा जाता था। और तो और आज के दौर में भी जादूगर मायावी प्रभावों के लिए मशीनों का ही सहारा लेते हैं। इस तरह देखें तो काम के नतीजों के आधार पर माया-मैजिक और मशीन में तो समानता है ही इन तीनों शब्दों का जन्म भी पूर्ववैदिक समाज के शब्द मघ से हुआ है। इसका अर्थ शक्ति, बल, सामर्थ्य है , किशोर अथवा युवा है। प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा में इसके लिए मघन शब्द है जिसका अर्थ हुआ कार्यसाधक अथवा उपाय। इसी से युनानी मे मेकोस और इतालवी में मैशिना शब्द बने । संस्कृत मे मघवन शब्द का अर्थ है इन्द्र। जाहिर है मघ मे निहित बल और सामर्थ्य जैसे अर्थों के चलते ही वैदिक काल में इन्द्र के लिए यह नाम भी सामने आया होगा। प्राचीन भारतीय समाज मे मग एक प्रमुख और शक्तिशाली गण था। इस गण के लोग मग कहलाते थे और इसी से मगध नाम भी प्रचलित हुआ। गौरतलब है कि वैदिक समाज मे सूर्योपासना प्रचलित थी । प्राचीन ईरानी समाज भी अग्निपूजक ही था। ईरान में कई वर्षो तक मगध से पुरोहित अग्नि उपासना मन्त्रों और ज्योतिष ज्ञान के लिए बुलाए जाते रहे। इनकी पीढ़ियां वहीं बसती भी रहीं। बाद में (करीब नवी सदी में) इन्हीं लोगो से निकला एक समूह भारत लौटा और पारसी कहलाया । ग्रीक लोगों ने ईरान के इन मग पुरोहितों का उल्लेख मगास के रूप में किया है । अपनी विद्वत्ता और ज्योतिषीय भविष्यवाणियों के चलते यूरोप में इन मागियों को जादूगर के तौर पर प्रस्तुत किया गया । इसी से अंग्रेजी के मैजिक और मैजिशियन शब्द चलन मे आए । मघ का ही एक रूप मय होता है। इसी ने माया , मायावी जैसे कई शब्द बने। पुराणों में भी अलौकिक शक्तियों के स्वामी मय दानव का उल्लेख मिलता है। यही नहीं मघवन यानी इन्द्र के मायाजाल का भी पुराणो में खूब उल्लेख है।

5 कमेंट्स:

Gyandutt Pandey said...

परीक्षा से पहले पढ़ने या रटने को मग्घा (मघ्घा) लगाना कहते हैं. वह भी क्षमता का पावर पैक्ड कैप्स्यूल ही है और शायद आपके मघ से जुड़ा हो!

अभय तिवारी said...

क्या बात है..

अनूप शुक्ला said...

बहुत खूब!

Lavanyam -Antarman said...

अजित जी,
आप किस पुस्तक से ये जानकारी ले रहे हैँ ?
क्या बहुत वर्षोँ की शोध का परिणाम है ?
बधाई !
स स्नेह
--लावण्या

अजित वडनेरकर said...

प्रणाम
सबसे पहले आपका आभार कि आप मेरे ब्लाग पर आईं और किन्हीं जिज्ञासाओं के साथ इसे सराहा।
आपने सही कहा , ये वर्षों के शोध का परिणाम है मगर मेरे नहीं बल्कि उन देशी-विदेशी विद्वानों के जो भाषा विज्ञान के क्षेत्र में काम करते रहे हैं। ये सामग्री जस की तस किसी एक पुस्तक से नहीं ली गई है। भाषाविज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते में बीते करीब पच्चीस वर्षों से शब्दों की उत्पत्ति में दिलचस्पी रखता हूं। नौकरी के बाद समाज, संस्कृति, इतिहास और भाषा संबंधी साहित्य के अध्ययन के लिए जितना हो सकता है समय जुटाता हूं और शब्दों के सफर पर पर निकल पड़ता हूं। जैसा कि मैने अपने ब्लाग में कुछ अपनी में लिखा है, भाषा विज्ञानी भी किसी शब्द की उत्पत्ति पर ज़रूरी नहीं कि एकमत हों। यूं हिन्दी-संस्कृत शब्दों के क्षेत्र में उत्पत्ति को लेकर जर्मन, अंग्रेज विद्वानों ने काफी काम किया है। भारतीय विद्वानों ने उन्ही के काम पर आधारित नवीन शोध किये। मगर ये सब काफी दूरूह और विषय विशेष से संबंधित ग्रंथों में ही कैद हैं।
मराठीभाषी होने के बावजूद मैं हिन्दी प्रेमी हूं और हिन्दी पत्रकारिता कर रहा हूं। आम हिन्दीवालों को शब्दों की उत्पत्ति को आसान ढंग से समझा सकूं यह बात छात्र जीवन से मन में थी। ब्लाग के ज़रिये इसका अवसर मिला है सो अब उसमें जुटा हूं। हिन्दी , संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू , गोंडी आदि डिक्शनरियों की मदद से शब्दों के उत्स को तार्किक परिणति तक पहुंचाने का मेरा प्रयास रहता है। विद्वानों के मतभेदों के बीच जो एक पक्ष मुझे सही लगता है वही मेरे लेख का आधार होता है। किन्ही शब्दों की उत्पत्ति का कोई आधार जब मन में कौंधता है तो सबसे पहले मैं उसे शब्दकोशों में ही सत्यापित करने का प्रयास करता हूं, फिर भाषाविज्ञान , धर्म-संस्कृति की पुस्तकों में संदर्भ तलाशता हूं और फिर रोचक शैली में उसे लिखने का प्रयास रहता है। इसमें मैं कितना सफल हूं, ये तो आप जैसे सुधिजन ही बता सकते हैं। पत्रकारिता में यही सीखा है कि आमजन को आसान शब्दों में जानकारियां दी जाए।
एक बार फिर स्नेह और सराहना के लिए आभार।

सादर,
अजित वडनेरकर

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