Monday, August 27, 2007

हिन्दी पर संस्कृत का प्रभाव


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने पिछली सदी के पहले दशक में हिन्दी भाषा की उत्पत्ति की पड़ताल करनी शुरू की। उस समय हिन्दी-संस्कृत समेत अन्य भारतीय भाषाओ के उद्भव-विकास पर काम कर रहे यूरोपीय विद्वानों के काम पर भी उनकी नज़र रहती थी। १९२७ के आसपास उन्होने हिन्दी भाषा की उत्पत्ति नामक पुस्तक निकाली। इसके कई लेख १९०५ से १९२३ के बीच लिखे गए। इसे इस विषय पर हिन्दी की पहली पुस्तकत माना जाता है। भारत यायावरजी ने द्विवेदीजी के संपूर्ण साहित्य को सामने लाने का बड़ा काम हाथ में लिया है। करीब दस साल पहले यायावर जी के संपादन में उक्त पुस्तक प्रकाशित भी हुई थी। उसके एक लेख के कुछ अंश आज के संदर्भ में देखें। खासतौर पर संचार माध्यमों और साहित्य की भाषा के संर्दभ में द्विवेदी जी के विचार गौरतलब हैं।

जब से इस देश में छापेखाने खुले और शिक्षा में वृद्धि हुई, तब से हिन्दी में संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग बहुत अधिकता से होने लगा। संस्कृत के कठिन-कठिन शब्दो को हिन्दी में लिखने की चाल सी पड़ गई। किसी-किसी पुस्तक के शब्द यदि गिने जाएं तो फीसदी ५० से ज्यादा से भी अधिक संस्कृत के तत्सम शब्द निकलेंगे। बंगला में तो इस तरह के शब्दो की और भी भरमार है। किसी किसी बंगला पुस्तक मे फीसदी ८८ शब्द विशुद्ध संस्कृत के देखे गए हैं। ये शब्द ऐसे नहीं कि इनकी जगह अपनी भाषा के सीधे साधे बोलचाल के शब्द लिखे ही न जा सकते हों। नही, जो अर्थ इन संस्कृत शब्दो से निकलता है उसी अर्थ को देने वाले अपनी निज की भाषा के शब्द आसानी से मिल सकते हैं। पर कुछ चाल ही ऐसी पड गई है कि बोलचाल के शब्द लोगों को पसंद नहीं आते ।
वे यथा संभव संस्कृत के शब्द लिखना ही ज़रूरी समझते हैं। फल इसका यह हुआ है कि हिन्दी दो तरह की हो गई है। एक तो वह जो सर्वसाधारण में बोली जाती है, दूसरी वह जो पुस्तकों , अखबारों और सामयिक पुस्तकों में लिखी जाती है। कुछ अखबारों के संपादक इस दोष को समझते है। इससे वे बहुधा बोलचाल की ही हिन्दी लिखत हैं। उपन्यास की कुछ पुस्तकें भी सीधी सादी भाषा में लिखी गई हैं। जिन अखबारों और पुस्तकों की भाषा सरल होती है उनका प्रचार भी औरों से अधिक होता है। इस बात को जान कर भी लोग क्लिष्ट भाषा लिख कर भाषाभेद बढाना नहीं छोड़ते । इसका अफसोस है।
कोई कारण नहीं कि जब तक बोलचाल की भाषा के शब्द मिलें, संस्कृत के कठिन शब्द क्यो लिखे जायें ? घर शब्द क्या बुरा है जो गृह लिखा जाय ? कलम का बुरा है जो लेखनी लिखा जाय ? ऊंचा क्या बुरा है जो उच्च लिखा जाय ? संस्कृत जानना जरूर हम लोगों का कर्तव्य है । पर उसके मेल से अपनी बोलचाल की हिन्दी को दुर्बोध करना मुनासिब नहीं।
पुस्तकें लिखने का सिर्फ इतना ही मतलब होता है कि जो कुछ उसमें लिखा गया है वह पढ़ने वालों की समझ में आ जाय । जितने ही अधिक लोग उन्हें पढ़ेगे उतना ही अधिक लिखने का मतलब सिद्ध होगा । तब क्या ज़रूरत है कि भाषा क्लिष्ट कर के पढ़ने वालों की संख्या कम की जाय? जो संस्कृत भाषा हज़ारों वर्ष पहले बोली जाती ती उसे मिलाने की कोशिश करके अपनी भाषा के स्वाभाविक विकास को रोकना बुद्धिमानी नही।
स्वतंत्रता सबके लिए एक सी लाभदायक है। कौन ऐसा आदमी है जिसे स्वतंत्रता प्यारी न हो ? फिर क्यों हिन्दी से संस्कृत की पराधीनता भोग कराई जाय ? क्यों न वह स्वतंत्र कर दी जाय ? संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के जो शब्द प्रचलित हो गए है , उनका प्रयोग हिन्दी में होना ही चाहिये। वे सब अब हिन्दी के शब्द बन गए हैं। उनसे घ्रणा करना उचित नहीं।*
डाक्टर ग्रियर्सन की राय है कि काशी के कुछ लोग हिन्दी की क्लिष्टता को बहुत बढ़ा रहे है। वहां संस्कृत की चर्चा अधिक हो गई है। इस कारण संस्कृत का प्रभाव हिन्दी पर पड़ता है काशी में तो किसी किसी को उच्च भाषा लिखने का अभिमान है। यह उनकी नादानी है। यदि हिन्दी का कोई शब्द न मिले तो संस्कृत का शब्द लिखने मे हानि नहीं, पर जान बूझ कर भाषा को उच्च बनाना हिन्दी के पैर में कुल्हाड़ी मारना है।
जिन भाषाओ से हिन्दी की उत्पत्ति हुई है उनमें मन के सारे भावों को प्रकाशित करने की शक्ति थी, वह शक्ति हिन्दी में बनी हुई है । उसका शब्द समूह बहुत बड़ा है। पुरानी हिन्दी मे उत्तमोत्तम काव्य, अलंकार और वेदान्त के ग्रन्थ भरे पड़े है कोई बात ऐसी नहीं , कोई भाव ऐसा नही , कोई विषय ऐसा नहीं जो विशुद्ध हिन्दी शब्दो में न लिखा जा सकता हो। तिस पर भी बड़े अफसोस के साथ कहना प़ता है कि कुछ लोग , कुछ वर्षों से एक बनावटी क्लिष्ट भाषा लिखने लगे है। पढ़नेवालों की समझ में उनकी भाषा आएगी या नहीं उसकी उन्हे परवाह नही रहती ,सिर्फ अपनी विद्वत्ता दिखाने की उन्हें परवाह रहती है। बस कला कौशल और विज्ञान आदि के पारिभाषिक शब्दो का भाव यदि संस्कृत शब्दो में रहने दिया जाय तो हर्ज नहीं । इस बात की शिकायत नहीं। शिकायत साधारण तौर पर , सभी तरह की पुस्तकों में संस्कृत शब्द भर देने की है। इन्हीं बातों के ख्याल से गवर्नमेंट ने मदरसो की प्रारंभिक पुस्तकों की भाषा बोलचाल की कर दी है। अतएव हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखको को भी चाहिए कि संस्कृत के क्लिष्ट शब्दो का प्रयोग यथा संभव कम किया करे।

7 कमेंट्स:

Gyandutt Pandey said...

आचार्य द्विवेदी जी के समय में भी हिन्दी में संस्कृतनिष्ठ शब्द ठूंसक लोग थे और अब ब्लॉग पर भी वही छाने का यत्न करते हैं. :)

अभय तिवारी said...

एक तबके की राय यह भी रही है, जिसे मैं लम्बे समय तक मानता भी रहा, सही जानकारी के अभाव में, कि हिन्दी को संस्कृत की तरफ़ खींच के ले जाने वालों में आचार्य प्रवर भी अग्रणी थे; मगर आप के द्वारा दिए लेख से उस राय की साँसे उखड़ गई हैं.. धन्यवाद..

अनुनाद सिंह said...

ये बहुत ही विवादस्पद विषय है। पहली बात तो ये कि सरल और क्लिष्ट भाषा का मुद्दा केवल हिन्दी में नहीं है। अंगरेजी में १९२१ से ही 'सिम्पल इंग्लिश' और 'प्लेन इंग्लिश' का अन्दोलन चल रहा है। आज की अंगरेजी कितनी सरल है, किसी जी. आर. ई. की तैयारी करने वाले से पूछिये।
तुर्की में बकायदा एक अधिनियम लाकर 'विदेशी' शब्दों का प्रयोग प्रतिबन्धित कर दिया गया। फ़्रान्स आदि देशों में विदेशी शब्दों को लेने या न लेने का निर्णय विशेषज्ञ समितियाँ करतीं है।

आजकल जो भाषा चल रही है वह स्वाभिक रूप ये आयी है, यह मानना नादानी होगी। मुझे अपना ही अनुभव याद है। आठवीं कक्षा पास करने के बाद जब ईण्टर कालेज में गये तो 'विशेष प्रयत्न' करके हिन्दी में अंगरेजी शब्दों को 'घुसेड़ते' थे, ताकि पढ़े-लिखे और जानकार लगें। यही हाल कमोबेस सर्वत्र है। कई महिलाओं को ''गाय' को 'गाय' कहने पर बच्चों को डांटते हुए देखा जा सकता है ( 'काउ' कहो)

रही बात आसानी की, तो हजारों शब्द गिना सकता हूँ जो संस्कृत में सरल हैं किन्तु उनके स्थान पर लोग फारसी या अंगरेजी के शब्द प्रयत्न पूर्वक प्रयोग करते पाये जाते हैं। यह बात सरलता-क्लिष्टता के बजाय अपनी हीनता को दबाने का परोक्ष तरीका भी है, सांस्कृतिक गुलामी की आदत भी है, धौंस देने का एक तरीका भी है।

तुलसीदास ने सोलहवीं शदी में रामचरित मानस लिखा। जरा गिनिये उन्होने कितने अरबी-फारसी शब्द प्रयोग किये हैं। रामचरित मानस शंस्कृत शब्दों (तत्सम और तद्भव) से भरा हुआ है पर एक अनपढ़ भी इसे पढ़कर कभी शिकायत नहीं करता कि बात समझ में नहीं आयी। कहते हैं कि मानस का शब्द-भण्डार बहुत बड़ा है।

क्या आप समझते हैं कि जब कपिलदेव या धोनी अंगरेजी में बोल रहे होते हैं तो इसका मतलब यह है कि उन्हे हिन्दी के बजाय अंगरेजी में अपनी बात कहने में सुविधाजनक लगती है?

अनुनाद सिंह said...

मेरी उपरोक्त टिप्पणी बड़ी हो गयी किन्तु फिर भी उसमें एक बात छूट गयी। सरल भाषा के कांसेप्ट के आलोचकों का एक तर्क है कि किसी गंभीर बात को केवल सरल और आम जनता की शब्दावली में व्यक्त करना कठिन ही नहीं, असंभव भी है। इसके अलावा भाषा में प्रयुक्त शब्द विषय और श्रोता के अनुसार भी तय होते हैं। इसलिये भाषा के लिये एक सरलीकृत नियम पास कर देना ठीक नहीं है।

Anonymous said...

खड़ी बोली संस्कृत से पोषित है।
द्विवेदीजी के सारे उपन्यास क्लिष्टभाषा में हैं। उन्होंने प्रतापनारायणमिश्र की भाषा की आलोचना भी इसी आधार पर की थी। यह्तो अपवाद है।

Udan Tashtari said...

तीन दिन के अवकाश (विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) एवं कम्प्यूटर पर वायरस के अटैक के कारण टिप्पणी नहीं कर पाने का क्षमापार्थी हूँ. मगर आपको पढ़ रहा हूँ. अच्छा लग रहा है.

हरिराम said...

आप शब्दों की बात कर रहे हैं, जबकि अभी तक देवनागरी लिपि भी ठीक नहीं हो पाई है कम्प्यूटिंग के लिए। येन केन प्रकारेण कुछ गद्य व पद्य टाइप करने में समर्थ हो जाना ही वह सबकुछ नहीं है, जिसे 'कम्प्यूटिंग' कहते हैं।

नीचे दिया गया बक्सा प्रयोग करें हिन्दी में टाइप करने के लिए

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