Friday, December 31, 2010

अमेरिकी पंजाबी पत्रिका में शब्दों का सफ़र

baljeet-basi_thumb6... सफ़र के पाठक बलजीत बासी को सिर्फ़ एक साथी के तौर पर जानते हैं। बासी जी मूलतः पंजाबी के कोशकार हैं। पंजाब विश्वविद्यालय के अंतर्गत पंजाबी अंग्रेजी कोश की एक बड़ी परियोजना से दो दशकों तक जुड़े रहे। ज़ाहिर है शब्द व्युत्पत्ति में उनकी गहन रुचि है।बाद में वह प्रोजेक्ट पूरा हो जाने पर वे अमेरिका के मिशिगन स्टेट में जा बसे। अब कभी कभार ही इधर आना होता है। वहाँ भी वे अपना शौक बरक़रार रखे हैं। अमेरिका में खासी तादाद में पंजाबीभाषी बसे हैं और इसीलिए वहाँ कई अख़बार, मैग़ज़ीन आदि इस भाषा में निकलते हैं। इनमें से एक है शिकागो, न्यूयॉर्क और सैनफ्रान्सिस्को से प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक पंजाब टाइम्स, जिसमें वे नियमित स्तम्भ लिखते हैं। बासी जी ने इसके ताज़ा अंक में सफ़र के पुस्तकाकार आने के संदर्भ में एक परिचयात्मक आलेख लिखा है जिसका गुरुमुखी से देवनागरी में किया मशीनी अनुवाद खुद उन्होंने हमें भेजा है। उन्होंने ताक़ीद किया है कि इसमें से हम जो चाहें काट सकते हैं, सिवाय उन अल्फ़ाज़ के जो उन्होंने हमारी तारीफ़ में कहे हैं। हम पूरा आलेख दो किस्तों में छाप रहे हैं। आप समझ ही गए होंगे क्यों। अब सेल्फ प्रमोशन और मार्केटिंग का ज़माना है, सो हम भी पूरी बेशर्मी से अपने ही ब्लॉग पर मियाँ मिट्ठू बनने की हिमाक़त दिखा रहे हैं।

शब्दों का मुसाफ़िर-1/-बलजीत बासी
ह बुनियादी तौर पर हिंदी का पत्रकार है। पिछले पच्चीस वर्षों से प्रिंट और टीवी के साथ जुड़ा हुआ है। जन्म से मराठीभाषी है, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रहता है, ननिहाल हरिद्वार में हैं। बचपन में कुछ अर्सा पंजाब के होशियारपुर जिले के टांडा कस्बे में रहकर यहाँ के राजमा और चना-सरसों के साग का स्वाद चख चुका है। हरिद्वार में उसके ननिहाल घर के पड़ोस में गुरुद्वारा होता था, जहाँ से बचपन में  गुरबानी के कीर्तन का रस उसके कानों में दिन रात घुलता  रहता थी। वह हिंदी अख़बार दैनिक  भास्कर के भोपाल एडीशन में न्यज़ एडिटर के तौर पर काम कर रहा है,  परन्तु शब्दों की तितलियाँ पकड़ना उसका चस्का है। शब्दों की निरुक्ति दर्शाता शब्दावली नाम का उसका चिट्ठा  ( हिंदी वाले ब्लाग को चिट्ठा कहते हैं ) लगभग हर रोज़ अपडेट होता है, जिसके पाठकों की संख्या एक हज़ार पार कर चुकी है। 15000 के आसपास हिंदी के ब्लॉगों में से पाठकों की तादाद के पक्ष से उसका नंबर दूसरे स्थान पर है। यह एक चमत्कार ही है कि निपट  शब्दों के आसपास घूमते एक ब्लॉग के इतने सारे रसिया हैं।
पंजाबी के किसी मासिक त्रैमासिक की इतनी संख्या नहीं है जितने पाठक रोज़ाना इस ब्लॉग पर आते हैं। इतना ही बस नहीं, कई बड़े हिन्दी अख़बार, ब्लॉग तथा वेबसाइटें उसके आलेखों को लगातार प्रकाशित करते रहते हैं। हर रोज़ बेसब्री के साथ सफ़र की नई पोस्ट का इंतजार करनेवाले उसके पाठकों में हिंदी के साहित्यकार, भाषाविज्ञानी, प्राध्यापक, कंप्यूटर विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी शामिल हैं। उसने अपने विशाल ज्ञान, तार्किक विवेचना और क़िस्सागो शैली के साथ पाठकों के पल्ले यह बात डाल दी है कि सामान्य शब्दों के आवरण नीचे हमारी संस्कृति, इतिहास और पुरातत्व आदि का कितना कुछ छिपा पड़ा है। इस प्रतिभाशाली शब्दार्थी का नाम है अजित वडनेरकर। क़रीब दो साल पहले मुझे किसी लेख के लिए साग-सब्जी के चित्र की ज़रूरत थी। चित्र ढूँढने के लिए मैं ने गुग्गल बाण छोड़ दिया और नतीजे में अजित वडनेरकर के ब्लॉग का हवाला मेरे सामने आ खड़ा हुआ। तब हिंदी मुझसे झोली झोली ही पढ़ी जाती थी परन्तु उसकी लेखनी इतनी रोचक, जानकारीपूर्ण और तार्किक थी कि मुझे पता ही न लगा, कब हिंदी मेरे लिए एकदम सरल-सहज हो गई।punjab-times8 और तो और, मैं ने उसकी पोस्टों पर टिप्पणियाँ देनीं शुरू कर दीं। अजित भाई ने गंभीरता के साथ मेरा नोटिस लेना शुरू कर दिया। कभी कभी हमारे में नोक-झोंक भी होने लगी। वह मेरे से नाराज़ हो जाता और झीकता - “ मैं हड़बडी में रहता हूँ, ध्यान के साथ नहीं पढ़ता” वगैरह वगैरह। उस की बात अक्सर ठीक होती परन्तु मैं ने भी शब्दों पर दो दशक से ज्यादा वक्त लगाया है। वह मेरी टिप्पणियों का विस्तृत जवाब देता -ईमेल के द्वारा, निजी तौर पर भी और ब्लाग के द्वारा भी। कोश महकमों के लंबे तजुर्बो ने मुझे सिखाया था कि शब्दों के अर्थ को बहुत सावधानी के साथ खोजना चाहिए। गाँव देहात की गलियों, बोलियों में टहलते डोलते शब्दों का बाहरी चोला चाहे देशी हो, उनकी आत्मा अंतरराष्ट्रीय होती है। इन के मर्म तक पहुँचने के लिए अंतरराष्ट्रीय दृष्टि अपेक्षित है। वडनेरकर कई बारी मेरी बात मानकर अपने लेख का संशोधन कर लेता। परन्तु मुझे भी बहुत बार उलाहने झेलने पड़े। आखिरकार हमारे तेज़-तुर्श और नोक-झोक वाले रिश्तों में मधुरता आ ही गई।
डनेरकर की शब्द निभाने की ख़ूबसूरती इस बात में है कि वह निरुक्ति सुलझाने के लिए शब्द के मूल में गहरा उतर जाता है। उस का शब्द-ज्ञान सीमित नहीं बल्कि विस्तृत अध्ययन से उपजा है जिस में वेद, शास्त्र, पुराण और विश्व भर का किताबी घसमाण शामिल है। बहुत से भाषाविज्ञानी विराट जीवन से निखुट्टे शब्द जाल में ही घुसे रहते हैं, जिससे भाषा विज्ञान संबंधी लेखन खुश्क और नीरस जान पड़ता है। सुलझे हुए वडनेरकर की शैली बोझिल नहीं बल्कि सधी हुई, प्रौढ़, दुनियादार और अक्सर उदात्त है, जिस में से एक निराली विधा उदयमान हो रही प्रतीत होती है। वह भारत की तकरीबन सभी, ख़ास तौर पर उत्तरी भाषाओ की निराली रूह का वाकिफ है। मेरे देखते-देखते ही वह कहीं का कहीं पहुँच गया है ; अब तो दुनिया भर की बोलियों को सहज भाव से ही अपने मूल सफ़र के कलेवर में ले लेता है। लगातार गतिशील शब्दों के सफ़र में अब वह ग़ैर-भारोपीय भाषाओं की भारोपीय भाषाओँ के साथ साझेदारी भी प्रमाणित करने लगा है।
 -जारी

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, December 28, 2010

जिन्न का जनाज़ा और जीनियस

abook-002_thumb1_thumb6दिल्ली के प्रगति मैदान में शनिवार से पुस्तक मेला शुरू हो चुका है। सफ़र के जो पाठक इस मौके पर वहाँ जाने की सोच रहे हैं, वे कृपया राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर ज़रूर जाएं और शब्दों का सफ़र के प्रकाशित क़िताबी रूप को भी ज़रूर देखें। हो सके तो ख़रीदें भी।
aladdin-wallpaper-aladdin-6615033-1024-768
भूत वह नहीं है जो आमतौर पर समझा जाता है। हिन्दी में भूत का आम अर्थ है प्रेत, पिशाच, मृतात्मा, अतृप्त आत्मा, पारलौकिक शक्ति आदि। हिन्दी मे एक अन्य शब्द भी चलता है जिन्न जिसका अर्थ भी भूत-प्रेत, पिशाच या अदृष्य आत्मा होता है। ऐसा माना जाता है कि सत्कर्म करनेवाले मनुष्य को मृत्यु के उपरान्त मोक्ष प्राप्त हो जाता है मगर पापी मनुष्य की आत्मा मायाजाल से मुक्त नहीं हो पाती और संसार चक्र में ही भटकती रहती है जिन्हें मोटे तौर पर भूत, पिशाच, प्रेत या जिन्न कहा जाता है। जिन्न मूल रूप से सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है और बरास्ता अरब-फ़ारसी यह हिन्दी में दाखिल हुआ। जिन्न बना है j-n-n या g-n-h से जिसमें छिपना, ढकना, गुप्त, अदृष्य होने जैसे भाव है। इसके साथ ही इसमें आवरण या खाल का भाव भी है। इस धातु से कई सेमिटिक परिवार की भाषाओं में बहुत से शब्द बने हैं। गौरतलब है कि सेमिटिक परिवार में मूलरूप से वर्ण में बदलता है। फ़ारसी-उर्दू-हिन्दी में जिसे हम जमाल उच्चारते हैं वह दरअसल अरबी में गमाल है सो जिन्न के बारे में बात करते हुए हम इसके j-n-n या g-n-h दोनों रूपों को ध्यान में रखें। j-n-n या g-n-h हालाँकि सेमिटिक धातु है मगर कहीं न कहीं इसका रिश्ता भारोपीय भाषा परिवार से भी जुड़ता है।
नाज़ा हिन्दी का जाना-पहचाना और खूब इस्तेमाल होने वाला लफ़्ज़ है। मूल रूप में यह जनाजः है। विसर्ग का रूपान्तर अक्सर की मात्रा में होता है अतः हिन्दी उर्दू में यह जनाजा हो जाता है। इसका एक अन्य रूप जिनाजः भी है जिससे इसकी जिन्न से रिश्तेदारी प्रकट होती है। गौर करें j-n-n धातु में निहित भावों पर जिसमें ढकने, अदृष्य होने या आवरण का भाव है। जनाज़ा का अर्थ होता है कफ़न में लिपटा शव या कपड़े में लिपटी लाश। उस ताबूत को भी जनाज़ा कहते हैं जिसमें रखकर शव को दफ़नाने ले जाया जाता है। आवरण का भाव यहाँ स्पष्ट हो रहा है। अक्सर हिन्दी क्षेत्रों में जनाज़ा का अर्थ शवयात्रा से लगाया जाता है। जनाज़ा निकलना यानी शवयात्रा। दरहक़ीक़त इसमें शव को कब्रस्तान ले जाने का भाव है यानी कफ़न या ताबूत में बंद शव को दफ़न करने के लिए ले जाने की क्रिया। इसी तरह j-n-n से बने जिन्न के पीछे जो धार्मिक भाव है उसके अनुसार जिन्न वह प्राणी है जिसका जन्म अग्नि से होता है और जो अदृष्य है। अरबी पौराणिक कथाओं के अनुसार यह देवदूतों या शैतानों से निचले क्रम की आत्माएं होती हैं जो आग या हवा से जन्म लेती हैं और इन्सानी रूप ले सकती हैं। इसके बावजूद ये हैं अलौकिक ही और इन्हें मूलतः मनुष्य की शरीर से निकली अनिष्टकारी शक्ति या आत्मा के रूप में ही देखा जाता है। अदृष्य होने के भाव पर गौर करें। वैसे आत्मा के शरीर रूपी आवरण में ढके होने से भी इसके धातु आधार की पुष्टि होती है। अरबी में इसके जिन्न, जिन्नी या जिन रूप भी प्रचलित हैं। जिन का बहुवचन जिन्न या जिन्नात होता है। भूत-प्रेतों से सम्बन्धित के लिए जिन्नाती शब्द है और जिन्नी का अर्थ है भूत-प्रेतों को वश में रखनेवाला। जनाज़ा शब्द कई भाषाओं में है जैसे इंडोनेशियाई में यह जेनाज़ाह है तो स्वाहिली में जेनेजा, तुर्की में सेनेज़े है। जिन्न अब अंग्रेजी में भी जिनी के रूप में है।
रब समाज में जिन्नों को प्रेरक आत्माओं के तौर पर भी देखा जाता है और माना जाता है कि कवि-कलाकारों से अपूर्व कार्य कराने में जिन्नी ताक़तों का हाथ होता है। अलिफ़लैला की कथाओं के जरिए जिन्नों को अरबी लोककथाओं का हिस्सा बनने का मौका मिला और फ़ारस से लेकर अरब और सीरिया तक के लोकसाहित्य में जिन्न विशिष्ट पात्रों के रूप में रूबरू
Genius... अवतारी पुरुष का रिश्ता लोक और परलोक दोनों से होता है इसलिए उसमें असामान्य शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं जिन्हें दैवीय शक्ति कहते हैं। किसी समस्या का निदान दरअसल कठिनाई से आवरण का हटना ही है। बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा से समाज को संकटों से उबारते रहे हैं। इनकी बुद्धि से हल हुए कार्यों को लोग चमत्कार समझते थे। ...
होते हैं। अलादीन के पास जो चिराग़ था, अगर उसमें जिन्न बंद न होता तो दुनिया आनेवाली पीढ़ियों में जिन्न एक गै़बी दुनिया के एक दिलचस्प क़िरदार के तौर पर इतना मक़बूल हरगिज़ न हुआ होता।  हिन्दी में भूत चढ़ना का अर्थ भूताविष्ट होना होता है। इसमें बुरी आत्मा से ग्रस्त होना भी शामिल है और अतिमानवीय ऊर्जा से किसी काम में जुटना भी है। भूत की तरह काम करना का अर्थ ही सामान्य व्यक्ति से ज्यादा काम करनेवाला होता है। निश्चित ही कलाकार की कला ही उसे सामान्य से अलग करती है। अगर विशिष्ट कर्म को जिन्नों या भूतों की देन मान लिया गया तो आश्चर्य क्या? यूँ भी मनुष्य की इच्छा अतिमानवीय कार्य करने की रही है और इसी वजह से वह तंत्र मंत्र के जरिए भूत-पिशाच सिद्धि के जतन करता है। क़िस्से कहानियों में प्रतापी सम्राटों नें अतींद्रिय शक्तियों के लिए शिव की सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। शिव को भूतनाथ इसीलिए कहते हैं क्योंकि वे स्थूल और सूक्ष्म जगत के स्वामी है। मनुष्य स्थूल जगत का जीव है जबकि आत्माएँ सूक्ष्म जगत के जीव हैं।
अंग्रेजी का एक शब्द है जीनियस जिसका अर्थ है किसी कार्य में प्रवीण, अत्यधिक प्रतिभावान, कुशाग्र, तीक्ष्ण बुद्धिवाला वगैरह। इस जीनियस का रिश्ता भी जिन्न से जुड़ता है। अंग्रजी का जीनियस मूलतः भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और लैटिन के genius से बना है जिसमें एक ऐसी अलौकिक आत्मा का भाव है जो सर्वव्यापी, सर्वज्ञ है। इसमें संरक्षक, ईश्वर, विधाता आदि का भाव है। इसी अर्थ में कालांतर में ईश्वरीय गुणों से युक्त व्यक्ति को अवतारी पुरुष कहा जाने लगा। अवतारी पुरुष का रिश्ता लोक और परलोक दोनों से होता है इसलिए उसमें असामान्य शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं जिन्हें दैवीय शक्ति कहते हैं। किसी समस्या का निदान दरअसल कठिनाई से आवरण का हटना ही है। बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा से समाज को संकटों से उबारते रहे हैं। इनकी बुद्धि से हल हुए कार्यों को लोग चमत्कार समझते थे। आमतौर पर हवा से कुछ पैदा करना ही सबसे बड़ा चमत्कार रहा है। इसे ही ग़ैबी या दैवी ताक़त कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल किन्हीं कलाबाजोयों के ज़रिए चतुर लोग बाद में करने लगे। ज्ञान, बुद्धि और बल के जरिए ही व्यक्ति किसी समूह में नेतृत्व प्राप्त करता है। जीनियस की अर्थवत्ता पहले इसी रूप में थी। बाद में सर्वज्ञ अथवा कुशाग्र के रूप में इसके मायने सिमट गए।
भारोपीय मूल धातु gen से बना है जीनियस जिसमें पैदा करने, होने, उत्पन्न करने का भाव है। जीनियस में यही पैदा करने का भाव पहले था। एक ऐसा व्यक्ति जो नैसर्गिक प्रतिभा का धनी हो। यानी जो किसी भी समस्या का हल ढूंढ निकाले। इस gen का रिश्ता ही संस्कृत धातु जन् से जुड़ता है। जिन्न में जिस तरह अदृष्य होने का भाव प्रमुख है, वही बात कुछ अलग ढंग से शून्य से कुछ उत्पन्न करने में, पैदा होने में, जन्म लेने में नज़र आती है। देवनागरी के वर्ण में उत्पन्न, वंशज, अवतीर्ण या पैदा होने का भाव है। संस्कृत की जन् धातु में पैदा होना, उत्पन्न होना, उगना, उठना, फूटना, होना, बनना, निर्माण-सृजन ( जन्म के संबंध में ), रचा जाना, परिणत होना जैसे अर्थ छुपे हैं। जन् से ही बना है जीव अर्थात प्राणी। जीव वह है जिसका जन्म हुआ है। जन् धातु रूप का ही रूपांतर अवेस्ता में ज़ात होता है। हिन्दी का जन, जनता जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। अंग्रेजी के जेनरेशन, जेनरेटर, जेनरिक जैसे शब्दों समेत यूरोपीय भाषाओं की शब्दावली को इस धातु ने समृद्ध किया है। हिन्दी का जीवन और फारसी का ज़िंदगी इसी शृंखला में हैं। अरबी-फारसी में महिला के लिए एक अन्य शब्द है ज़न जिसकी रिश्तेदारी इंडो-ईरानी भाषा परिवार के जन् शब्द से है जिसमें जन्म देने का भाव है। ज़नानी या ज़नान जैसे रूप भी प्रचलित हैं। संस्कृत में उत्पन्न करने, उत्पादन करने के अर्थ में जन् धातु है। इससे बना है जनिः, जनिका, जनी जैसे शब्द जिनका मतलब होता है स्त्री, माता, पत्नी। जिससे हिन्दी-उर्दू के जन्म, जननि, जान, जन्तु जैसे अनेक शब्द बने हैं। जन् में उगने, उत्पन्न होने के भाव पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि उगना या उत्पन्न होना अपने आप में किसी छाया, पृष्ठभूमि या आंतरिकता से बाहर आना है।  
अगली कड़ी-मजनूँ की औलाद और दीवाना 
-जारी
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, December 27, 2010

कॉमरेड का कमरा और कम्पनी

abook-002_thumb1दिल्ली के प्रगति मैदान में शनिवार से पुस्तक मेला शुरू हो चुका है। सफ़र के जो पाठक इस मौके पर वहाँ जाने की सोच रहे हैं, वे कृपया राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर ज़रूर जाएं और शब्दों का सफ़र के प्रकाशित क़िताबी रूप को भी ज़रूर देखें। हो सके तो ख़रीदें भी।
Companion_Shop_Logo_2
कॉ मरेड शब्द का शुमार भी उन शब्दों मे होता है जो विदेशी मूल से उठकर हिन्दी मे समा गए हैं। मोटे तौर पर कॉमरेड का अर्थ होता है साथी। कॉमरेड के दायरे में मित्र, सहचर, संगी यानी जो साथ रहे या साथ चले, सब आ जाते हैं। कॉमरेड में साथ रहने का भाव महत्वपूर्ण है। हिन्दी समेत दुनियाभर की भाषाओं में अब कॉमरेड साम्यवादी विचारधारी से जुड़ी शब्दावली का हिस्सा है कॉमरेड यानी ग़रीबों, किसानों, शोषितों, वंचितों, मेहनतकशों और सर्वहारा वर्ग का साथी। उनके हित में लड़नेवाला, उनके साथ संघर्ष के मोर्चे पर सबसे आगे खड़ा रहनेवाला दोस्त, हमदम, हमदर्द, रहनुमा ही कामरेड है। साम्यवादी विचारधारा के लोग एक दूसरे से कामरेड सम्बोधन के साथ ही संवाद स्थापित करते हैं।  अंग्रेजी का कॉम्पैनियन शब्द भी संगी, साथी या सहचर का भाव व्यक्त करता है। हालाँकि बोलचाल की हिन्दी में यह शब्द आम नहीं है अलबत्ता शहराती हिन्दी में अंग्रेजीदाँ लोगों की ज़बान से झरती हिंग्लिश का हिस्सा यह शब्द बन चुका है। कॉमरेड और कॉम्पैनियन के मूल में लैटिन है मगर अरबी और संस्कृत मूल से भी इनकी रिश्तेदारी है। जानते है इनकी हकीक़त क्या है।
रूम मेट या चैम्बर मेट शब्दों का जो अर्थ है वही किसी ज़माने में कॉमरेड शब्द का भी अर्थ था यानी कमरे में साथ साथ रहनेवाला। अंग्रेजी में कॉमरेड शब्द मध्यकालीन फ्रैंच शब्द केमेरादे camarade का रूपान्तर है। फ्रैंच में यह स्पैनी भाषा के कामारेडा camarada से आया है जिसका मूल है लैटिन का कैमेरा camera जिसका मतलब है छोटा कक्ष, मेहराब, कमानीदार या तोरण जैसी रचना जिस पर छत टिकी होती है। इसी मूल से निकला है कक्ष, कोठरी के अर्थ में कमरा शब्द। फोटो खींचनेवाले उपकरण को भी कैमेरा ही कहते हैं क्योंकि इसके भीतर भी कक्ष ही होता है। फ्रैंच का चैम्बर CHAMBER का रिश्ता भी इस सिलसिले से है। हिन्दी में रचा – बसा कमरा दरअसल हिन्दी का नहीं है। भाषाविज्ञानी इसकी आमद पुर्तगाली से मानते है मगर आधुनिक पोर्चगीज़ में कमरा शब्द का उल्लेख स्पष्ट रूप से नहीं मिलता। हो सकता है पाँच सदी पहले जब पुर्तगालियों की इस सरज़मीं पर आमद हुई हो तब देशज रूप में कक्ष या कोठरी के लिए इसका इस्तेमाल होता रहा हो। कमरा शब्द चाहे यूरोपीयों की देन हो मगर यह है इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द और इससे मिलते-जुलते शब्द हिन्दी और उसकी पड़ौसी ईरानी शाखा में साफ़ दिखते हैं।
ग्रीक भाषा का एक शब्द है kamara यानी कमरा जिसका मतलब था छोटा, बंद कक्ष। लैटिन में इसका रूप हुआ camera यानी कैमरा मतलब तब भी वही रहा। ग्रीक और लैटिन से होते हुए पुर्तगाली में इस शब्द ने फिर kamara का देशज रूप लिया होगा। बहरहाल, छवियाँ लेने वाले उपकरण के तौर पर कैमरा शब्द लैटिन भाषा के कैमरा ऑब्स्क्योरा जिसका मतलब होता है अंधेरा कक्ष, के संक्षिप्त रूप में सामने आया। पुराने ज़माने के कैमरे किसी कोठरी से कम नहीं होते थे और उनके नामकरण के पीछे यही वजह थी। मूलतः ग्रीक शब्द kamara बना है इंडो-यूरोपीय धातु kam से जिसका मतलब होता है महराब, वक्र, कोना, झुका हुआ वगैरह।  उर्दू फारसी का एक शब्द है ख़म जो इसी श्रंखला से जुड़ा है, जिसका मतलब भी वक्रता, टेढ़ापन, झुकाव ही होता है। पुराने ज़माने के मकानों में छत दोनो तरफ से ढलुआं होती थी क्योंकि बीच में खम देना ज़रूरी होता था। पेचोख़म शब्द भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है। गौर करें संस्कृत की कुट् धातु पर। kam से ध्वनिसाम्य वाली इस धातु में भी वक्रता, झुकाव का भाव है जो छप्पर डालने पर आता है। जाहिर है कुटि, कुटीर या
ancient-burial-chamberएक तरफ़ जब कम्पनी जैसी व्यवस्था जन्म ले रही थी, तभी उस व्यवस्था से लड़ने के लिए कॉमरेड जैसा शब्द भी नया चोला पहन कर तैयार हो रहा था। फिर चाहे ये दोनों शब्द एक ही कोख से चाहे क्यों न जन्में हों। कम्पनी और कॉमरेड की लड़ाई जारी है। हालाँकि अब काफी हद तक यह नूराकुश्ती में तब्दील हो गई है।
कुटिया जैसे शब्द इससे बन गए जो कक्ष, कमरा या कोठी के पर्याय है। इन शब्दों का अंतर्संबंध यहां स्पष्ट हो रहा है और विकासक्रम के साथ इनकी रचना प्रक्रिया भी उजागर हो रही है। लैटिन camera का फ्रैंच रूप हुआ chamber यानी चैम्बर जिसका मतलब भी छोटा कमरा या न्यायाधीश का कक्ष था। अब तो चैम्बर के कई तरह से प्रयोग होने लगे हैं।
कुछ अन्य शब्द भी q-a-m क़ अ म धातु मूल से ही निकले हैं। जैसे क़ियाम जिसे हिन्दी में कयाम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। क़ियाम शब्द में अस्थायी निवास, रहना, थोड़े दिनों का वास जैसे भाव भी हैं। क़ियाम या क़याम में निश्चय, भरोसा, यक़ीन का भाव भी है। नमाज़ में खड़े होने की मुद्रा भी क़याम कहलाती है। रहने की जगह को क़यामगाह भी कहते हैं। q-a-m में निहित स्थिरता के भाव ही इसे आश्रय से भी जोड़ते हैं। इस धातु की रिश्तेदारी संभव है किसी काल में प्रोटो इंडो-यूरोपीय धातु k-a-m से भी रही होगी जिससे ही कमरा, कैमेरा, कमान, कमानी जैसे शब्द बने हैं। क़याम में जो q की ध्वनि है अर्थात नुक्ते का प्रयोग वह इसे देवनागरी वर्ण ख के करीब पहुंचाता है। क़ाम में स्थिरता के भाव से ही बनता है अरबी का क़ाइम शब्द जिसका हिन्दी रूप कायम है और यह खूब इस्तेमाल होता है। कायम का अर्थ भी स्थिर होना, मज़बूती से डटे रहना, दृढ़ रहना आदि। किसी भी भवन को स्तम्भ ही आधार प्रदान करते है। स्तम्भ का एक अन्य रूप संस्कृत में स्कम्भ होता है। खम्भा इससे ही बना है अर्थात पाया। गौरतलब है कि पाया अर्थात पैर ही स्थिरता प्रदान करते हैं।
रबी, फारसी का खम (खम ठोकना) इसी स्कम्भ से जुड़ रहा है। खम्भे से ही बना है खेमा क्योंकि वह स्तम्भ पर टिका आश्रय होता है। स्कम्भ की रिश्तेदारी अगर खम्भे को देखते हुए खेमा से जोड़ी जा सकती है तब तम्बू के मूल में स्तम्भ भी हो सकता है। अरबी के कमान या कमानी का मतलब होता है वह आधार जिस पर छत डाली जाए। कोई ताज्जुब नहीं कि सेमिटिक भाषा परिवार की धातु q-a-m से उपजे इस शब्द समूह की रिश्तेदारी प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार k-a-m से हो। यह साबित होता है अरबी शब्द काइमाह से जिसका अर्थ होता है स्तम्भ, पाया, नब्बे अंश का कोण क्षैतिज रेखा से मिलकर नब्बे अंश का कोण बनाती हुई खड़ी लकीर को भी क़ाइमाह कहते हैं। स्थिरता का, खड़े होने का यह भाव जबर्दस्त है। इस काइमाह का ही रूपांतर है कायम, जिसमें टिकने, स्थिर होने, खड़े रहने जैसे भाव समाए हैं।
हिन्दी में कम्पनी या कंपनी शब्द खूब आम है और इस कम्, q-a-m या k-a-m से इसकी भी रिश्तेदारी है। कम्पनी का अर्थ है लोगों का समूह, जत्था, साथ या साथी, सोहबत आदि। कम्पनी शब्द बना है अंग्रेजी के कॉम्पैनियन से जिसका अर्थ है संगी साथी, हिस्सेदार, साझेदार, जोड़ीदार, हमराही आदि। कम्पैनियन बना है लैटिन के कॉम्पैनियो से जिसमें एक थाली में खाने का भाव है और अर्थ है रोटी का हिस्सेदार अर्थार ब्रैडफैलो। यह बना है कॉम- साथ + पैनिस- रोटी से। जाहिर है साथ रहनेवाले ही साथ साथ खाएंगे भी। यही भाव है कैमेरा से बने कामरेड में जिसका अर्थ हुआ कमरे में साथ रहनेवाला अर्थात साथी, सहचर।  बाद के दौर में इसमें गरीबों का हिमायती, सर्वहारा का साथी जैसे भाव विकसित हो गए। लैटिन का कॉम com बना है भारोपीय धातु kom से जिसका रिश्ता निश्चित तौर पर कम् यानी kam से जुड़ता है। कॉम में साथ, साहचर्य। सहकार या सह के अर्थ में अंग्रेजी के प्रसिद्ध उपसर्ग co- का जन्म भी इसी कॉम से हुआ है। स्पष्ट है कि kam धातु में निहित कमानी, कमान, कमरा, महराब जैसे भावों का विकास जब आश्रय को अभिव्यक्त करनेवाला कमरा में हुआ उसके बाद साथ या साहचर्य के तौर पर कॉम com धातु सामने आई। बाद में सभ्यता के विकास के साथ साथ कॉम्पैनियन शब्द से एक नया शब्द बना कम्पनी जिसका अर्थ हुआ समूह, जत्था आदि। बाद में औद्योगिक और व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एकत्र लोगों के समूह को कम्पनी कहा जाने लगा। यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति का दौर शुरु होने के वक्त ही कम्पनी शब्द भी सामने आया। गौरतलब है कि एक तरफ़ जब कम्पनी जैसी व्यवस्था जन्म ले रही थी, तभी उस व्यवस्था से लड़ने के लिए कॉमरेड जैसा शब्द भी नया चोला पहन कर तैयार हो रहा था। फिर चाहे ये दोनों शब्द एक ही कोख से चाहे क्यों न जन्में हों। कम्पनी और कॉमरेड की लड़ाई जारी है। हालाँकि अब काफी हद तक यह नूराकुश्ती में तब्दील हो गई है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 26, 2010

सुयेनच्वांग की भारत-यात्रा

logo_thumb202_thumb6रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार शामिल किया है छठी सदी में चीन से भारत याए प्रसिदध बौद्ध श्रमण सुयेनच्वांग के यात्रावर्णन पर लिखी जगमोहन वर्मा की पुस्तक सुयेनच्वांग की भारतयात्रा को। इसे पिलग्रिम्स पब्लिशिंग हाऊस, बनारस ने प्रकाशित किया है। इसके पैपरबैक, पॉकेटबुक साईज के संस्करण का मूल्य 75 रु है और पृष्ठ संख्या 210 है । ...

वृ हत्तर भारत की सभ्यता संस्कृति का अपने पड़ोसी
abook 002दिल्ली के प्रगति मैदान में शनिवार से पुस्तक मेंला शुरू हो चुका है। सफ़र के जो पाठक इस मौके पर वहाँ जाने की सोच रहे हैं, वे कृपया राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर ज़रूर जाएं और शब्दों का सफ़र के प्रकाशित क़िताबी रूप को भी ज़रूर देखें। हो सके तो ख़रीदें भी।
देशों जैसे चीन, भूटान, नेपाल, मंगोलिया, अफ़गानिस्तान, ईरान के जन-जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है। इसके पीछे महान बौद्ध धर्म भी एक बड़ी वजह रहा। बौद्ध धर्म देखते ही देखते पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया था जिसकी वजह थी कुरीतियों और कर्मकांडों पर उसकी शिक्षाओं की चोट। संस्कृति के चार अध्याय में रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा है कि बौद्ध धर्म कोई नया धर्म नहीं, बल्कि हिन्दुत्व का ही संशोधित रूप है। समाज में जो वर्ण ब्राह्मण से जितना दूर था, वह बौद्ध धर्म की ओर उतनी ही तेजी से खिंचा। बौद्ध धर्म की इसी सहजता से एक सामाजिक संकट भी उत्पन्न हुआ कि समाज के हर वर्ग से लोग घरबार छोड़कर सन्यासी बनने लगे। हालांकि संन्यास की व्यवस्था हिन्दू धर्म में प्राचीनकाल से ही रही किन्तु वह आश्रम व्यवस्था के तहत क्रमिक रूप से थी जबकि बुद्ध ने क्या बालक, क्या युवा और क्या वृद्ध, सभी को संन्यास लेने का मार्ग प्रशस्त किया। पूरा देश मठों और विहारों से भर गया था। यह प्रवृत्ति चीन जैसे देश में भी थी जहाँ बुद्ध से प्रभावित भिक्षुक ज्ञान पिपासा में भारत आने लगे। चीन से भारत आने वाला ऐसा ही एक भिक्षुक था सुयेनच्वांग।
चीन देश से बौद्ध श्रमणों के भारत आने की लम्बी परम्परा रही है जिनमें फाह्यान, सुंगयुंन, इत्सिंग तथा सुयेनच्वांग विशेष रूप से प्रसिद्ध चीनी यात्री हैं। इन सभी यात्रियों ने अपने देश लौटकर दीर्घ यात्रा वृत्तांत लिखे जो आज से सैकड़ों वर्ष पहले के भारत की सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक दशा बताते हैं। संन्यास परम्परा में देशाटन का महत्व है और प्रायः सभी यात्रियों ने देश के सुदूर अंचलों तक पदयात्रा की और विभिन्न प्रान्तों, वनस्पतियों, smita ajit 010जनपदों के जनजीवन और राजनीतिक परिस्थितियों का वर्णन किया है। सुयेनच्वांग आज से करीब डेढ़ हजार साल पहले यानी छठी सदी ईस्वी में भारत आया था। इन सभी में सुयेनच्वांग का विवरण सबसे विशद है जिसका नाम चीनी भाषा में सी-यू है यानी पश्चिम देशों की पुस्तक। इसके विभिन्न रूपान्तर अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुके हैं जगमोहन वर्मा ने आम हिन्दी पाठक को ध्यान में रखते हुए सुयेनच्वांग का यात्रा वृत्त लिखा है जिसे पिलग्रिम्स ने प्रकाशित किया है। पुस्तक में बौद्ध श्रमण के जीवन से मृत्यु तक का वृत्तांत समेटा गया है। सुयेनच्वांग के पितामह का नाम कोंग था और वे पांचवीं-छठी सदी के चीन में माने हुए विद्वान थे और तत्कालीन पेकिंग के विश्वविद्यालय के प्रधान आचार्य थे। तत्कालीन चीन में राजाज्ञा से सर्वसाधारण के बीच से सर्वश्रेष्ठ भिक्षुक का चयन होता था। सर्वप्रथम भिक्षुक बनने के ले लिए परीक्षा देनी होती थी फिर भिक्षुक के लिए चयन होता था उसके बाद राजकीय खर्च पर उनका भरण-पोषण होता था। इस परीक्षा में सुयेनच्वांग अल्पवय में ही चुन लिए गए थे।
युवावस्था में ही सुयेनच्वांग के मन में भारत यात्रा की इच्छा जागी। राजाज्ञा न मिलने के बावजूद वे छुपते हुए भारत के लिए रवाना हो गए। जगमोहन वर्मा ने उनकी यात्रा के अधिकांश विवरणों को कुशलता से एक सूत्र में पिरोया है। उन्होंने अफ़गानिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश किया फिर कश्मीर, पंजाब, सिंध आज का हरियाणा, कन्नौज, प्रयाग, अयोध्या और काशी होते हुए वे पाटलिपुत्र पहुंचे जहाँ बोधगया और नालंदा में उन्होने दर्शन का गहन अध्ययन किया। देशाटन के दौरान सुयेनच्वांग महाराष्ट्र और द्विड़ क्षेत्रों की यात्रा पर भी निकले। इसी क्रम में वे गुजरात, मालवा और नर्मदातटीय क्षेत्रों में भी खूर रहे। यह दौर हर्षवर्धन का था। चीन लौटकर उन्होंने प्राप्त ज्ञान के आधार पर वहाँ प्रचलित बौद्धधर्म की मान्यताओं और परम्पराओं का परिष्कार किया। वे अपने साथ सैकड़ों महत्वपूर्ण ग्रन्थ ले गए थे। प्राचीन यात्रावृत्तों में दिलचस्पी रखनेवालों के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 24, 2010

दरजन, दिसम्बर और बारहमासा

Two Dozen Red Roses

हिन्दी की हर भाषा में दरजन शब्द खूब प्रचलित है जिसमें बारह अंकों है। दरजन हिन्दी-उर्दू के उन बेहद प्रचलित और खूबसूरत शब्दों में हैं जो विदेशी मूल के होने के बावजूद हिन्दुस्तानी संस्कारों में ढल गए जैसे लैन्टर्न से लालटेन या हास्पिटल से हस्पताल और फिर अस्पताल। इसी तरह अंग्रेजी के डज़न dozen से हिन्दुस्तानी में दरजन बन गया। भाषायी रूपान्तर की यह बेहद खूबसूरत मिसाल है। हिन्दी में दर्जन भर आम से लेकर दर्जन भर ख़ास लोग तक शामिल होते हैं। वस्तु से लेकर इन्सान तक दरजन भर के दायरे में आ जाते हैं। आमतौर पर लोगों को यह ग़लतफ़हमी है कि दरजन शब्द का इस्तेमाल सिर्फ जिन्सों अर्थात वस्तुओं के सदर्भ में होता है इसीलिए मनुष्यों के सदर्भ में दरजन शब्द का इस्तेमाल ठीक नहीं जैसे-वहाँ दो दर्जन लोग भी नहीं जुटे थे। दरअसल दरजन शब्द में बारह के समूह का ही भाव है। बारह वस्तुएँ, बारह लोग, बारह गाँव, बारह महिने, बारह राशियाँ ये सब दरजन में आते हैं। अंग्रेजी का डज़न मराठी में डझन हो जाता है जिसका अर्थ है बारह का समूह।
रजन की व्युत्पत्ति हुई है अंग्रेजी के डज़न से। अंग्रेजी में डज़न का विकास हुआ है लैटिन के duodecim से। एटिमऑनलाईन के अनुसार अंग्रेजी में क़रीब बारहवीं सदी में डज़न का रूप था डोज़ जिसका ही विकास duodecim से हुआ। यह शब्द भी दरअसल भारोपीय मूल का ही है और दो शब्दों से मिलकर बनी शब्दसन्धि का उदाहरण है जिसका अंग्रेजी रूपान्तर डज़न हुआ। इसके हिज्जे हैं- duo+ decem अर्थात दो +दस। ध्यान रहे लैटिन का ड्युओ और संस्कृत का द्वि एक ही है। ड्युओ से ही अंग्रेजी के टू का विकास हुआ है। हिन्दी का दो भी इसी मूल का है। इसी तरह संस्कृत दशन्/दशम् और लैटिन डेसिम भी स्वजातीय हैं। ग्रीक में यह डेका है तो आईरिश में डेख, रूसी में देस्यात है, लिथुआनी में इसका रूप देश्मित और लात्वियाई में देस्मित है। अंग्रेजी महिने डिसेम्बर/दिसम्बर के मूल में भी लैटिन का डेसिम ही है जिसका अभिप्राय दस है। गौरतलब है कि प्राचीन रोमनकाल में दस महिनों का ही प्रचलन था जिसके आधार पर दसवाँ महिना दिसम्बर कहलाया। बाद में जब ग्रेगोरियन कैलेण्डर के आधार पर वर्ष विभाजन बारह माह का हुआ और वर्षारम्भ जनवरी से हुआ तब दिसम्बर अपने दसवें स्थान से खिसक कर अपने आप बारहवाँ महिना बना। इससे पहले तक प्राचीन रोमन कैलेण्डर की शुरुआत मार्च से होती थी।
हिन्दी के बारह अंक का विकास भी कुछ इसी तरह हुआ है। द्वि + दशन् = द्वादशन् > द्वादश > वारस > बारस > बारह। ध्यान रहे संस्कृत हिन्दी की ध्वनि में तब्दील होती है। इसी तरह का रूपान्तर

2238630980_1c86d04ce0... पुराने ज़माने में बड़ी हवेलियों को बारहदरी कहा जाता था क्योंकि इनमें बारह दरवाज़े होते थे। इसका एक रूप बारादरी भी है। वर्णमाला के लिए सबसे प्रचलित शब्द है बारहखड़ी जो बना है द्वादश-अक्षरी से।...

में होता है और कई बोलियों में के रूप में उच्चारित होता है। इस तरह अंग्रेजी के डज़न और हिन्दी के बारह का विकास एक जैसा ही रहा है। बारह के समूह का महत्व प्राचीन भारतीय संस्कृति में भी रहा है। कालगणना में यह स्पष्ट है। भारतीय ज्योतिष में बारह राशियाँ हैं। बारह माह हैं। बारह संक्रान्तियाँ हैं। हिन्दुओं में बारह ज्योतिर्लिंगों का महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जिन स्थानों पर शिव प्रकट हुए थे वहाँ ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई जैसे- सोमनाथ, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, घृष्णेश्वर, केदारनाथ, रामेश्वर, नागेश्वर, वैद्यनाथ, त्र्यंबकेश्वर, काशी विश्वनाथ और भीमाशंकर। इन ज्योतिर्लिंगों का संबंध बारह राशियों से भी जोड़ा जाता है। इसी तरह ज्योतिष में बारह भाव हैं जैसे- तनु, धन, सहज, सुहृद, पुत्र, रिपु, स्त्री, आयु, धर्म, कर्म, आय, व्यय आदि। जैन धर्म में भी बारह भावनाओं का महत्व है-अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आश्रव, संवर, निर्जरा, लोक और धर्म भावना। बारह वर्षों में एक बार कुम्भ पर्व आता है। पाण्डवों की वनवास अवधि भी बारह वर्ष की थी। गणेश के बारह नाम भी प्रसिद्ध हैं- सुमुख, एकदंत,कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्न-नाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन। रात दिन को बारह बारह घण्टों में ही विभाजित किया गया है। धर्म-संस्कृति और लोकाचार में तलाशने पर बारह के ऐसे कई अन्य समूह भी मिलेंगे।
हिन्दी में एकादशी को ग्यारस और द्वादशी को बारस कहा जाता है। सभी मौसम में एक समान भाव रखनेवाले को बारहमासी भी कहा जाता है जैसे बारहमासी फूल। बारहमासी सब्जी। मध्यकालीन कविता में बारहमासा या बारहमासी की परम्परा थी। ज्यादातर शृगाररस के कवियों नें बारहमासे रचे हैं जिनमें नायिका अपने वियोग वर्णन में वर्ष की सभी ऋतुओं की खासियत बखान करते हुए अपनी पीड़ा को उजागर करती है। कालिदास का मेघदूत एक किस्म का बारहमासा ही है। पुराने ज़माने में बड़ी हवेलियों को बारहदरी कहा जाता था क्योंकि इनमें बारह दरवाज़े होते थे। इसका एक रूप बारादरी भी है। वर्णमाला के लिए सबसे प्रचलित शब्द है बारहखड़ी जो बना है द्वादश-अक्षरी से। मूलतः इसमें वर्णमाला के 12 स्वरों के साथ व्यंजनों को संयुक्त कर लिखने के अभ्यास का भाव है। संस्कृत वर्ण में मूलतः विभाजन का भाव है। एकत्व का द्वित्व होना ही विभाजन है। इसीलिए द्वि का अर्थ दो हुआ अर्थात एक का न्यूनतम विभाजन। इसके आगे की संख्याएं लगातार विभाजन ही हैं। दिशाओं की संख्या लगातार बढ़ीं, महिनों की संख्या लगातार बढ़ी। अगर एकत्व सुविधा है तो विभाजन भी सुविधा ही है। मगर विभाजन दुविधा भी है। दुविधा यानी अनिर्णय, असमंजस। हिन्दी में बारहबाट होना जैसे मुहावरा प्रचलित है जिसका अर्थ है एक के अनेक होना, तितर-बितर होना, अलग अलग होना आदि। बारहबाट में बारह टुकड़ों या हिस्सों की बात है। बाट को राह से भी जोड़ सकते हैं। एक साथ कई विकल्प खुलना दरअसल सुविधा नहीं दुविधा का आरम्भ है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, December 23, 2010

अंधेरी ज़िदगी की दास्तान [बकलमखुद-142]

पिछली कड़ी- दिल्ली में डेरे की शुरुआत [141]

…गोपाल जी ने मुझे जेल में रहने का पूरा शास्त्र समझाया। बताया कि किस तरह यहां अकारथ जाती जिंदगी की जबर्दस्ती बनाई हुई लय आपकी आत्मा का खून चूस जाती है। आप सोचते हैं कि हर किसी से उसके स्तर पर बात करके, हैंडपंप पर चार लोगों के साथ नहाके या बिना दरवाजे के लैट्रिन में निपटान करके आप इन्हीं में एक हो चुके हैं। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 141 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का इकतीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chand3_thumb का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
तनी डेस्परेट किस्म की तनहाई पहले कभी महसूस नहीं हुई थी। महानगर का अकेलापन और उमर के एक खास पड़ाव के अलावा इसकी एक बड़ी वजह जेल की जिंदगी भी थी। डेढ़-दो महीनों में ही ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे जैसे एक पूरा युग पार हो गया था। जेल में आपके हर काम की एक धीमी, सुस्त, एकरस लय बनती जाती है, जिसमें जरा भी व्यतिक्रम, छोटी सी भी झल्लाहट आपको भयंकर संकटों में डाल देती है। ऐसे ही किसी असावधान क्षण में वहां मेरा एक डकैत से भयंकर झगड़ा हो गया था। उसी की जाति का उसका एक सहायक गला टीप कर मार देने वाला खांटी हत्यारा था और झगड़े के दौरान वह मेरे बहुत करीब पहुंच गया था। वह तो ऐन मौके पर गोपाल जी बैरक के बंद गेट से अपने करख्त लहजे में बोले और समय रहते सरगना को ध्यान आ गया कि मैं कौन हूं। बेवजह का झगड़ा। आज तक समझ में नहीं आया कि मैं क्यों उससे उलझ पड़ा था। आम तौर पर वह मेरा बहुत सम्मान करता था लेकिन एक अन्य नक्सली ग्रुप के नेता के साथ उठने-बैठने के चलते, जो संयोगवश भूमिहार जाति से आते थे, वह मुझे पराये खेमे का मानने लगा था और बिना कुछ कहे-सुने थोड़ी खटास बननी शुरू हो गई थी। उस दिन अपनी किसी डकैती का किस्सा सुनाते हुए वह बोल बैठा कि हर किसी की अपने-अपने इलाके में ही चलती है। जैसे अगर मैं बाहर होऊं और रात में सोन नदी के किनारे अकेले में आपसे ही मेरा सामना हो जाए तो जो करना होगा मैं ही करूंगा, आप वहां मेरा क्या कर लेंगे। चुपचाप हुंकारा भरते रहने के बजाय पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकला- पटक के छतिया पे चढ़ जाऊंगा। गरदन झुकाकर हकीकतबयानी की तरह वह बोला- कुछ नहीं कर पाएंगे, और दूर से उसका सहायक फुंफकारते हुए बढ़ा- तैं कइसन टेंटियात हए।
मामला जैसे-तैसे शांत हुआ तो अगले दिन मैंने गोपाल जी से पूछा कि मेरी तो किसी से जोर से बात करने की आदत भी नहीं है, यह मुझे क्या हो गया था। फिर गोपाल जी ने मुझे जेल में रहने का पूरा शास्त्र समझाया। बताया कि किस तरह यहां अकारथ जाती जिंदगी की जबर्दस्ती बनाई हुई लय आपकी आत्मा का खून चूस जाती है। आप सोचते हैं कि हर किसी से उसके स्तर पर बात करके, हैंडपंप पर चार लोगों के साथ नहाके या बिना दरवाजे के लैट्रिन में निपटान करके आप इन्हीं में एक हो चुके हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। यहां हर समय आपको ऊपर से ही नहीं, भीतर से भी सहज रहने की कोशिश करनी होती है। कोई गाली दे, या लगने वाली बात कहे तो भी खुद को कमजोर मानकर नहीं, यह सोचकर गम खा जाना होता है कि वह नहीं, उसकी हताशा यह बात बोल रही है। ऐसे कितने सारे सबक जेल में सीखने को मिले, जिनका मतलब बाहर आकर कुछ नहीं रह जाता।
Picture-10पको बता दूं कि यह गोपाल जी वह नहीं थे, जिनका परिचय मैं किन्हीं पिछली किस्तों में आपसे रिक्शा यूनियन के अध्यक्ष के रूप में करा चुका हूं। ये हमारी पार्टी के बहुत पुराने योद्धा और एक इलाके के संगठक भी थे। न जाने कब दर्ज हुए एक भूले-बिसरे केस में दो साल पहले उन्हें यहां ला पटका गया था। बिल्कुल सांवले गोपाल जी की एक आंख समेत उनका आधा चेहरा बहुत पहले हुए एक बम विस्फोट में उड़ गया था। उस साइड से देखने पर वे किसी को भयानक लग सकते थे, बल्कि बहुत लोगों को लगते भी थे। लेकिन उनमें भीतर-बाहर एक योद्धा की विचित्र दीप्ति थी। किसी बरसाती दोपहर में जब वे जेल में मिली टीन की थाली या आटा मांड़ने की परात बजाकर गाते हुए बीच-बीच में टेक की तरह हंसते थे तो जैसे बहार आ जाती थी- मजदूर-किसान के बड़की फउजिया झुमत आवे, जइसे ललकी किरिनियां हंसत आवे।
जेल में मुझे राजबलम यादव उर्फ तिवारी जी भी मिले, जिनकी ख्याति हमारी पार्टी में किसी पुराण पुरुष जैसी थी। भोजपुर के नक्सली आंदोलन की स्थापना में जिन तीन लोगों ने केंद्रीय भूमिका निभाई थी, उनमें राम ईश्वर यादव उर्फ साधूजी की गिनती कॉमरेड राम नरेश राम और मास्टर जगदीश महतो के साथ एक त्रयी के रूप में होती थी। राम ईश्वर यादव डकैत से क्रांतिकारी बने थे और 1976 में गोलियों से घायल होने और दोनों हाथों में हथकड़ियां पड़ी होने के बावजूद पुलिस से बाजुओं की लड़ाई लड़ते हुए मारे गए थे। तिवारी जी उनके छोटे भाई और कम्युनिस्ट क्रांति के लिए समर्पित एक सीधे-सादे किसान थे। जेल में अपनी पहली ही रात में अचानक मेरी नींद टूटी तो लगा कि कोई धीरे-धीरे मेरा सिर दबा रहा है। आंख खुली तो देखा तिवारी जी थे। मैंने कहा, साथी आप यह क्या कर रहे हैं तो तिवारी जी सिर्फ इतना बोले कि सो जाइए, कल बात होगी। जेल में जब भी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर या क्रांतिकारी रणनीति पर बात होती थी, तिवारी जी कभी कुछ बोलते नहीं थे। सिर्फ ध्यान से सुनते रहते थे। आंदोलन की पुरानी घटनाओं के बारे में खोद-खोद कर पूछने पर बताते थे, लेकिन बिना किसी महिमामंडन के, बिल्कुल प्लेन ढंग से, ताकि पहले जो कुछ हो चुका है, उसके अच्छे-बुरे का फैसला सुनने वाला उनके कहे मुताबिक नहीं, बल्कि अपने ढंग से कर सके।
हां बुरे लोग भी खूब मिले, लेकिन जेल में जिस तरह अच्छे लोगों की अच्छाई धुलती है, उसी तरह बुरे लोगों की बुराई भी धुल जाती है। जेबकतरों के उस्ताद चौबेजी के बारे में मैं दो-तीन साल पहले अपने ब्लॉग पहलू पर अथ पॉकेटमार उवाच करके डाली गई एक पोस्ट में बता चुका हूं और उस किस्से को यहां दोहराने का मेरा मन mixedनहीं है। एक झपटमार, जिसका नाम अब मुझे याद नहीं आता, हमारी सांस्कृतिक इकाई युवानीति के डाइरेक्टर सुनील के मौसेरे भाई का उस्ताद हुआ करता था। सुनील का मौसेरा भाई भी तब जेल में ही था, लेकिन जुवेनाइल वार्ड में, जिसके बंदियों को समलैंगिकता के डर से आम बंदियों के साथ घुलने-मिलने नहीं दिया जाता। इस झपटमार ने हमें अपने टॉर्चर के किस्से काफी रस लेकर सुनाए थे। सेंध फोड़ने में माहिर समझा जाने वाला तीस-बत्तीस साल का एक चोर पता नहीं कैसे जेल में आकर अचानक अंधा हो गया था और सूखी दुपहरियों में पीपल के नीचे बैठकर चिलम पी लेने के बाद थालियों के ताल पर लौंडा नाच नाचते हुए बाकी लोगों के अलावा खुद भी अपने अंधेपन के मजे लेता था।
जेल में हम बाईस लोग आए थे लेकिन बीस दिन बाद दो ही बचे रह गए थे- मैं और धनंजय। पता नहीं क्यों मेरे साथ धनंजय को भी अदालत ने जमानत देने से मना कर दिया था। वह पूरी तरह सांस्कृतिक लड़का था- ढोलक, नाल वगैरह ताल वाद्यों का रसिया। हिंसक तो क्या अहिंसक राजनीति से भी उसका कोई लेना-देना नहीं था। जब तक बाकी लोग थे, तब तक जल्दी रिहाई की उम्मीद भी थी। जेल के लिए ये दिन घटनाओं भरे थे- आंदोलन, अनशन, प्रदर्शन। लेकिन उनके जाने के बाद मेरे और धनंजय के पास जेल की जीवन-लय में ढलने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। बाहर से आए संदेशों से पता चलता था कि हम दोनों के ऊपर टाडा या तो लगा दिया गया है, या लगाया जाने वाला है। ऐसे ही संदेशों के बीच किसी दिन वह झगड़ा हुआ था। आगे ऐसी कोई स्थिति न बने, इसके लिए गोपाल जी की शिक्षा के अलावा जेल की लाइब्रेरी में मौजूद किताबों का सहारा लेना सबसे ज्यादा मुफीद लगा। गॉडफादर और ड्रैक्युला और चौरंगी। आधी रात के बाद शुरू होने वाली अंधेरी जिंदगियों की अनूठी दास्तानें, जो अन्यथा मेरी जिंदगी में शायद कभी नहीं आतीं।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, December 18, 2010

“सफ़र” का विमोचन...खरीदें और पढ़ें

book realese 056

ख़िरकार किताब आ ही गई। शब्दों का सफ़र नाम के ब्लॉग का परिष्कृत रूपान्तर पुस्तक की शक्ल में आए यह साध सफ़र के सभी साथियों समेत हमारे मन में भी अर्से से थी।

book realese 006इस तरह बना है कवर…कारवाँ बने हैं शब्दों के सफ़र का जरिया  book realese 012लेखक से परिचय करवाया डॉ सविता भार्गव ने book realese 025और लीजिए पुस्तक विमोचन हो गया...book realese 031...अब बारी है मंजूर साहब की...क्या बोले? book realese 070 अपन भी बोल लेते हैं...book realese 074 श्रोता झेल रहे हैं...book realese 106 जैसे ही बात समझ में आई...book realese 093...और श्रीमती जी ने सिर पकड़ लिया...कहाँ फँस गए...book realese 099श्रोताओं मे संवाद जारी रखा...book realese 110अंत में मामा कमलकांत बुधकर ने खाकसार की पोल खोली...चलिए, जो हुआ, अच्छा हुआ...

शुक्रवार शाम भोपाल के हिन्दी भवन में चल रही राजकमल प्रकाशन की पुस्तक प्रदर्शनी में ही शब्दों का सफ़र का विमोचन हिन्दी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मंज़ूर एहतेशाम ने किया। इस मौके पर ख्यात नाटककार अलखनंदन, कवि-कहानीकार गीत चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विजय मनोहर तिवारी, ख्यात ब्लॉगर-लेखिका मनीषा पाण्डे, ख्यात शिल्पी देवीलाल पाटीदार, कवयित्री डॉ सविता भार्गव और हरिद्वार से पधारे विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार-प्राध्यापक डॉ कमलकांत बुधकर भी मौजूद थे। डॉ सविता ने कार्यक्रम का संचालन किया। अध्यक्षता की अलखनंदन ने। करीब डेढ़ घंटे चले इस कार्यक्रम में सबसे पहले मंजूर एहतेशाम के हाथों पुस्तक की प्रतियों का विमोचन हुआ। इसके बाद लेखक से आमंत्रितों को मिलाने और पुस्तक का संक्षिप्त परिचय देने की जिम्मेदारी डॉ सविता ने निभाई। ख़ाकसार ने शब्दों का सफ़र से जुड़ी याद आने लायक और क़ाबिले ज़िक्र बातें श्रोताओं से साझा की। फिर संत शृंखला पर लिखे एक आलेख का पाठ किया गया। पाठ-सत्र के बाद श्रोताओं और लेखक के बीच सीधा संवाद हुआ। श्रोताओं में ज्यादातर शब्दों का सफ़र के किसी न किसी रूप में पाठक ही थी। चाहे वे दैनिक भास्कर के नियमित स्तम्भ के पाठक थे या चर्चित ब्लॉग शब्दों का सफ़र के। पेश है दिवाकर पाण्डेय की रिपोर्ट
यायावर हैं शब्द, माँ जाई बहने हैं भाषाएं
हिन्दी भवन में पुस्तक मेले केदौरान लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित
भाषाओें का रिश्ता बहनों जैसा है और शब्द यायावर होते हैं। भाषा में शब्दकोष तो हैं पर उनकी व्युत्पति का कई कोश मुझे नहीं दिखाई दिया। इसी ने मुझे एक ऐसा कोश तैयार करने के लिए प्रेरित किया। यह बात लेखक-पत्रकार अजित वडनेरकर ने अपनी किताब शब्दों के सफर के लोकार्पण के दौरान कही।  शुक्रवार को हिन्दी भवन में राजकमल प्रकाशन की ओर से आयोजित पुस्तक मेले में लेखक से मिलिए कार्यक्रम के दौरान लोकार्पण किया गया। पुस्तक में शब्दों की रिश्तेदारी, उनका जन्म और वर्तमान स्वरूप के लंबे इतिहास की तर्कसंगत तरीके से पड़ताल की गई है। श्री वडनेरकर ने पुस्तक से संत शृंखला में लिखे आलेख कलंदर का पाठ भी किया। उन्होंने बताया कि इस पहले खण्ड में 10 पर्व और करीब 1500 शब्द शामिल हैं। उनकी योजना बोलचाल की भाषा क दस हजार शब्दों की व्युत्पत्ति और विवेचना कोश बनाना है। इस पुस्तक का दूसरा और तीसरा खण्ड भी लगभग तैयार हैं। लोकापर्ण करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार मंजूर एहतेशाम ने कहा कि इस पुस्तक में जिस तरह सभी भाषाओं को एक दूसरे के करीब बताया गया है, यह बहुत दिलचस्प है। हिन्दी-उर्दू को मिलाने का भी यह एक सकारात्मक प्रयास है। अध्यक्षीय भाषण में वरिष्ठ रंगकर्मी-नाटककार अलखनन्दन ने कहा कि जुदा करने वाली किताबें बहुत हैं और जोड़ने वाली कम। जो लोग साहित्य में शब्द की स्वतन्त्र सत्ता में विश्वास करते हैं वे इससे जान सकेंगे कि शब्दों के इतिहास के कितने आयाम हैं। उन्होंने पुस्तक में शब्दों के जन्मसूत्र और उनकी विवेचना शैली से प्रभावित होते हुए कहा कि इसके जरिए शब्दों के अलग अलग क़िरदार सामने आ रहे हैं, वे इसमें नाट्यतत्व की तलाश कर रहे हैं। संचालन कर रहीं कवयित्री सविता भार्गव ने पुस्तक के विभिन्न अंशों का उल्लेख करते हुए उनके रोचक इतिहास पर प्रकाश डाला। इस दौरान गीत चतुर्वेदी, विजय मनोहर तिवारी, मनीषा पाण्डेय, रवि रतलामी सहित कई साहित्य रसिक लोग उपस्थित थे। प्रकाशन के जनसम्पर्क अधिकारी रमण भारती ने बताया पुस्तक मेले में शनिवार क शाम 4 बजे मनोज सिंह के उपन्यास हॉस्टल के पन्नों सें पर गोष्ठी आयोजित की जा रही है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, December 15, 2010

शिमला में हिम की खोज

ज़रूर पढ़े-1.धरती का दुर्ग बचाएं... 2.लीला, लयकारी और प्रलय….3.काश ! चलते पहाड़...The_ridge
ब्दों के बदलते प्रतिरूप आश्चर्यजनक तरीके से चौंकाते हैं। स्थाननामों की रचना में अक्सर वहाँ की भौगोलिक खूबियाँ महत्वपूर्ण होती हैं। पूर्वांचल के एक प्रांत का नाम मेघालय इसलिए है क्योंकि यहाँ अक्सर बादलों का डेरा रहता है। मेघ अर्थात बादल और आलय अर्थात घर। आलय यानी आश्रय। संस्कृत के लय का अर्थ है आराम करने की जगह जाहिर है दुनियाभर के आरामगाहों में घर को सबसे ऊँचा दर्ज़ा मिला हुआ है। इसी तर्ज़ पर हिमालय को देखें। हिम + आलय = हिमालय अर्थात वह स्थान जहाँ बर्फ़ का बसेरा हो। जहाँ हिम को आश्रय मिले वह है हिमालय। ठेठ पूर्वोत्तर का ही एक और प्रान्त है अरुणाचल प्रदेश। पूर्व दिशा सूर्योदय का प्रतीक है। अरुण का अर्थ होता है प्रातः की लालिमा, लाल रंग। अरुण सूर्य के सारथी का नाम भी है क्योंकि सूर्योदय से पहले उसकी लाल रश्मियों को थामने वाले अरुण के दर्शन होते हैं। यही नहीं, आप्टेकोश में सूर्य का एक पर्याय अरुण भी बताया गया है। संस्कृत में अचल का अर्थ होता है पर्वत। चल् धातु में गति का भाव है। निषेध या नकार की अर्थवत्त वाले उपसर्ग के लगने से अचल का अर्थ हुआ जो चलता न हो अर्थात जो स्थिर हो। इस तरह अचल में पर्वत या पहाड़ का भाव स्थिर होता है और अरुण + अचल = अरुणाचल का मतलब हुआ सूर्यपर्वत, सूर्योदय का प्रान्त अथवा वह स्थान जहाँ सबसे पहले सूर्य उगता है।
सी कड़ी में आता है हिमाचल प्रदेश। अरुणाचल की तरह ही हिमाचल का अन्वय हुआ हिम + अचल = हिमाचल यानी वह प्रदेश जहाँ हमेशा बर्फ़ जमी रहती हो। यह आश्चर्य की बात है कि इस हिमप्रान्त की राजधानी शिमला के नाम के साथ बर्फ़ जैसा कोई शब्द चस्पा नहीं है। शिमला की व्युत्पत्ति श्यामला ( देवी ) से जोड़ी जाती है। श्यामला देवी दुर्गा का एक नाम-रूप है। भारत के ज्यादातर पर्वतीय शहरों की तरह ही शिमला का विकास भी अंग्रेजी राज में हुआ, मगर उनके आने से पहले भी यहाँ बस्ती हुआ करती थी जिसका नाम शिमला था। अठारहवीं सदी के दूसरे दशक में सतलुज घाटी के विस्तृत सर्वेक्षण कार्य के दौरान स्कॉटिश सर्वे दल ने पहाड़ियों से घिरे शिमला ग्राम को खोजा था। आमतौर पर शिमला का नाम श्यामलादेवी से जोड़ा जाता है जिनका प्राचीन मंदिर यहाँ है। 1822 में स्कॉटिश सिविल अफ़सर चार्ल्स केनेडी ने यहाँ अंग्रेज अधिकारियों के लिए पहली आरामगाह बनवाई थी। संस्कृत के श्याम शब्द का अर्थ काला, धूसर, गहरा भूरा या नीला होता है। श्याम यानी बादल भी और श्याम यानी शिव भी। श्याम से ही बना है श्यामा अर्थात काली रात, काली नदी, काली गाय, तुलसी का पौधा, मादा कोयल आदि। हिन्दी का साँवला शब्द भी इसी कड़ी का है और श्यामल > शामल > साँवल > के क्रम में साँवला हुआ। इसका स्त्री रूप साँवली होता है। श्यामल का स्त्री रूप श्यामला बनेगा। दुर्गा पर्वतवासिनी हैं और इसीलिए इन्हें पहाड़ाँवाली कहा जाता है। पर्वतीय स्थानों पर दुर्गा के विभिन्न नामोंवाले धाम मिलते हैं जैसे कालका जो हरियाणा में है। कालका शिमला रेलमार्ग प्रसिद्ध है। कालका भी देवी दुर्गा का ही रूप है जो श्यामवर्णी है। इसी तरह कई जगह चण्डीदेवी के मंदिर होते हैं। चण्डिका रौद्ररूपधारिणी दुर्गा हैं जिनका वर्ण श्यामल है। इसी तरह दुर्गा का सबसे प्रसिद्ध रूप काली का है। इन्हें कालिका भी कहते हैं जिसका अपभ्रंश ही कालका है। स्पष्ट है कि श्यामला में काले वर्णवाली कालिका का भाव ही है। 
भाषा वैज्ञानिक व्युत्पत्ति के हिसाब से डॉ रामविलास शर्मा शिमला के शिम में हिम देखते हैं। बर्फ़ के लिए कश्मीरी में शीन है जो हिमा का रूपान्तर ही है। उनका कहना है कि पूर्ववैदिक भाषाओं में हिम का रूप घिम था। स्लाव और केल्त भाषाओं के ध्वनिरूपों से तुलना करते हुए वे यह स्थापना देते हैं। लात्वियाई भाषा में हिम का एक रूप जीअँम है, लिथुआनी में यह झीअँम है। इसी तरह जब ज का अघोषीकरण हुआ तो पुरानी प्रशियाई में यह सॅमॉ हो जाता है। हिम का पूर्व रूप घिम है इसकी जानकारी इसके ग्रीक रूप खॅइम से होती है। सॅमॉ जैसे रूप से ही शिमला के शिम का विकास समझ में आता है। कश्मीरी में हिमभण्डार के लिए मॉन / मोनू शब्द भी है। संस्कृत में सर्दी के मौसम को हेमन्त कहा जाता है। यह हेम भी हिम् से ही आ रहा है। हेमन्त से का लोप होकर पहाड़ी बोलियों में हिमन्, हेमन्, हिमान्, खिमान् जैसे रूप भी बनते हैं। सर्दी का, बर्फ़ीला  या शीत सम्बन्धी अर्थों में इन शब्दों का प्रयोग होता है। स्पष्ट है कि हिमालय से हिमाल रूप तो हिमाचली और नेपाली में भी बनते हैं। हिमाल का शिमाल और फिर शिमला रूपान्तर दूर की कौड़ी नहीं है। 

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 12, 2010

या इलाही ये मचाया क्या है?

logo_thumb20[2][8]इस बार रविवारी पुस्तक चर्चा में हमने विलियम डब्ल्यू हंटर के प्रसिद्ध दस्तावेज को शामिल किया है। यह पुस्तक क़रीब डेढ़ साल पहले हमने पढ़ी। वरिष्ठ पत्रकार और हमारे मित्र विजय मनोहर तिवारी वृहत्तर भारत के भूगोल, समाज व संस्कृति को मिली इस्लाम की नेमतों की पड़ताल में लगे रहते हैं, सो हमने तय किया कि इसकी समीक्षा वे ही लिखेंगे। पेश है विलियम हंटर की क़लम से निकला भारतीय मुसलमान का लेखाजोखा। किताब- भारतीय मुसलमान प्रकाशक-प्रकाशन संस्थान, 4715/21, दयानंद मार्ग, दरियागंज, नईदिल्ली-110002 फोन- 01123253234/65283371 अनुवादक-नरेश नदीम...

विजय मनोहर तिवारी

हले किताब के बारे में। ‘भारतीय मुसलमान’-विलियम डब्ल्यू. हंटर का 190 पेज का जबर्दस्त दस्तावेज है। हंटर 1871 में बंगाल में आईसीएस अफसर थे। ङ्क्षहदी में किताब की शक्ल में आई उनकी इस रिपोर्ट का शीर्षक है-भारतीय मुसलमान।
WilliamWilsonHunter1Hunter, Sir William Wilson (1840-1900) a member of the Indian Civil Service, a great statistician and compiler, an imperial historian, and a man of letters with a wide range of interests in race, religion, philology, diplomacy and journalism.
तब के बंगाल-बिहार से लेकर पेशावर-काबुल तक के मुसलमानों की ब्रिटिश राजद्रोही गतिविधियों का एक लाइव दस्तावेज। इस बहाने मुस्लिम समुदाय के आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की पैनी पड़ताल। हंटर लिखता है-अंग्रेजों के राज में भारत मुसलमानों के लिए दारुल-हरब बन चुका था। हर दीनदार मुसलमान का फर्ज था कि वह इस हुकूमत को छोडक़र इस्लामी सल्तनत में चला जाए और बगावत करे। किताब का मूल विषय वहाबी आंदोलन के इर्दगिर्द है। बेशक इस किताब में पश्चिमी श्रेष्ठता का दंभ है लेकिन इस्लाम की मान्यताओं का बेबाक विश्लेषण भी। जब आप इस किताब में दर्ज राजद्रोही मुस्लिम किरदारों के क्रियाकलापों के बारे में पढ़ेंगे तो लगेगा कि बदला कुछ नहीं है।
ज के लश्करे-तोयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और सिमी जैसे संगठन कुछ अलग अंदाज में तब भी पूरी ताकत से हुकूमत और अवाम के सिर दर्द बने हुए थे। मुहर्रिर जाफर और इमाम याहया अली ऐसे ही दो किरदार हैं, जो लगातार मुस्लिमों को भडक़ाते रहते थे। इनके बारे में हंटर लिखता है-‘ये संजीदा और जमीर वाले लोग थे, जिन्होंने खुद को जहर भरे हथियार चुभो लिए थे, जिन्हें एक झूठे धर्म ने उनके हाथों में थमा दिया था।’ बंगाल-बिहार पर केंद्रित इस किताब से उस समय के मुसलमानों की मानसिक स्थिति का भी अंदाजा होता है। एक ऐसी कौम जो सात सौ सालों से हुकूमत में थी। अब अंग्रेजों के हाथों बेदखल हो चुकी थी। अग्रेजों के आने से सदियों से गुलामों सी जिंदगी जी रहे हिंदुओं को जैसे ऑक्सीजन मिली थी। बहुसंख्यक आबादी को नई तालीम, नए तरीके और नई उम्मीद पैदा हुई थी। हिंदु कौम को जैसे लंबी नींद से जागने और मजहब के नाम पर थोपी जाती रही बंदिशों से बाहर आने का मौका मिला। मुसलमानों को लगा कि हिंदू अंग्रेजों से मिल गए हैं। दूरियां तो दोनों के बीच पहले दिन से ही थीं। हिंदुओं को अंग्रेजों का आसरा मिलते ही और बढ़ गईं। हंटर कहता है-वे काफिर हिंदुओं को एक हलाल के रूप में देखते हैं। उनके अस्तित्व का औचित्य ही काफिरों के खिलाफ जेहाद छेडऩा है। उनमें यह भाव पैदा हो हुआ है कि उनकी सारी नेमतें हिंदुओं के हाथों में चली गई हैं।
1793 में अंग्रेजों ने प्रशासनिक बदलाव तेज किए। मुसलमान मालगुजारों की जगह कलेक्टर आ गए। इससे शाही मुस्लिम घरानों की दबंग दुकानों पर ताले डलने लगे। यह उनके आर्थिक हितों पर सबसे बड़ी चोट थी। लेकिन मुस्लिम बदलते वक्त की जरूरतों को न समझ सके, न अपना सके। अवसाद ने उन्हें आक्रामक बनाया। वे अंग्रेजों के खिलाफ उबलते रहे। कर वसूली की सात सौ साल पुरानी मनमानी व्यवस्था से बेदखल होने से भूखों मरने की नौबत आ गई। रस्सी जल चुकी थी। ऐंठन बरकरार थी। पहले क्या व्यवस्था थी? राजस्व वसूलने वाले मालगुजार मुसलमान, फौज और पुलिस के सिपाही मुसलमान, जेलों के अफसर मुसलमान और इंसाफ की अदालतें भी काजियों के हाथ में। प्रशासन का हर काम ddwivedi 10.11.2010 024उन्हीं की भाषा में पर अब वे सब तरह के शाही हकों से महरूम हो चुके थे। इनकी जगह अंग्रेज आते जा रहे थे। इस वर्चस्ववादी व्यवस्था को हंटर कहता है-अपमानयोग्य लूटपाट के विशेषाधिकारों की सदियों से अभ्यस्त रह चुकी एक नस्ल। पहले 50 साल तक तो अंग्रेजों ने फारसी से ही अपना कामकाज चलाया। बाद में जनता की भाषा में सार्वजनिक कार्य करने का फैसला लेकर ङ्क्षहदी-अंग्रेजी को बढ़ावा दिया। दस सालों में ही नजारा बदल गया। बड़े पदों पर सदियों बाद हिंदुओं की ताजपोशी देखी गई।
1869 के आंकड़े किताब में इस दिलचस्प फर्क का खुलासा करते हैं। सरकारी विभागों में मुसलमानों की तुलना में हिंदू कई गुना बढ़ गए थे। ङ्क्षहदुओं ने अपने लिए इस अवसर को हाथोंहाथ लिया और आगे बढ़ गए। हंटर ये आंकड़े पेश करते हुए चुटकी लेता है-हिंदुओं की बुद्धि ऊंचे दरजे की है। सके ठीक सौ साल पहले हालत उलटी थी। राज्य के सभी अहम ओहदों पर मुसलमानों का सुरक्षित एकाधिकार था। पिछले विजेता अपनी मेज से जो टुकड़ा गिरा देते थे उन्हीं को हिंदू आभार भाव से स्वीकार करते थे। हंटर इस सामाजिक बदलाव का श्रेय खुद लेते हुए लिखता है-हमारी लोकशिक्षण प्रणाली ने हिंदुओं को सदियों की नींद से जगाया है। पुरानी विजेता नस्ल खुमारी में बरबाद होती गई। ङ्क्षहदुओं को संभलने का एक मौका मिल गया। हिंदुओं ने अंग्रेजी सीखी, लेकिन मुसलमानों ने इससे परहेज किया। मुसलमानों ने बुतपरस्तों की भाषा में तालीम हासिल करने से इंकार कर दिया। यह फर्क इतना बड़ा था कि 1860-62 में सरकारी स्कूलों में सौ ङ्क्षहदू विद्यार्थियों के मुकाबले सिर्फ एक मुसलमान बच्चा देखा गया।
पस में बटे हुए, सामने मंडराते खतरों से बेखबर और अपने ऐशो-आराम में मस्त तब के भारत के स्वदेशी राजाओं को महलों और राजसत्ताओं से बेदखल किया गया था। बंगाल-बिहार में यह सिलसिला बख्तियार खिलजी के समय शुरू होता है, जिसने 1193 में दुनिया भर में बेजोड़ नालंदा विश्वविद्यालय को आग लगाकर मिट्टी में मिला दिया था। तब बंगाल और बिहार अलग नहीं थे। बख्तियार यहां का पहला मुस्लिम सुलतान हुआ। पूरे हिंदुस्तान की तरह यहां भी बख्तियार ने सिर्फ सत्ता पर ही कब्जा नहीं किया। तलवार और आतंक के जोर पर जबरिया धर्म परिवर्तन की कहानी यहां भी उसी जोर से दोहराई जाती रही, जैसी बाकी ङ्क्षहदुस्तान ने भोगी। बख्तियार के बाद बंटवारे के साथ भारत को मिली आजादी तक आते-आते यहां 587 सालों में 110 सुलतानों और नवाबों की लंबी सूची है। इनमें 1717 से 1887 तक रहे 17 नवाब शामिल हैं। मुमकिन है बख्तियार के सौ-दो सौ साल बाद यहीं की धर्मांतरित नस्लों के लोग नए नामों और नई पहचान से हुकूमत में आते रहे और अपनी वंश बेल अरब और तुर्क से जोडक़र खुद गुमराह होते रहे। मीर कासिम और मीर जाफर जैसे नाम बहुत बाद के हैं। इनके समय अंग्रेज अपनी जड़ें जमा चुके थे।
तने फैलारे के बाद ऐसे मुश्किल हालातों में 1786 में रायबरेली में सैयद अहमद नाम का एक शख्स पैदा होता है। लुटेरों के गिरोह में खान पिंडारी का एक सैनिक बनकर वह सामने आता है। 1816 में लूटमार का पेशा छोडक़र वह दिल्ली में शरियत की तालीम लेने जा पहुंचता है। तीन साल बाद इस्लाम का प्रचारक बनकर अपने चेलों के एक झुंड के रूप में प्रकट होता है। वह दक्षिण भारत की सैर करता है। पटना में ठौर बनाता है। अपना नेटवर्क आज के लश्कर, हिजबुल, जैश और सिमी की तरह फैलाता जाता है। 1822 में वह हज का सफर तय करता है। बंबई लौटकर अपने नए समर्थक तैयार करता है। 1824 में ब्रिटिश हुकूमत उसे पेशावर में सिखों के खिलाफ जेहाद करते देखती है। वह पठान कबीलों में जेहाद का जोश भरने में अपनी पूरी ताकत लगा देता है। उसका दावा है कि काफिरों को खत्म करने के लिए उसे अल्लाह ने नियुक्त किया है। बाकायदा 21 दिसंबर 1826 को वह जेहाद शुरू भी कर देता है।
a1884हंटर का यह दस्तावेज पढ़ते हुए लगता नहीं कि यह 140 साल पुराने हिंदुस्तान के एक दौर की बात हो रही है। वही ताकतें कुछ दूसरे अंदाज में और ज्यादा जोर से हमारे आसपास अब भी हमारी आस्तीनों में रेंग रही हैं। खंडित होकर मिली आजादी के बाद बचे-खुचे भारत में काश्मीर को देखिए और उत्तर-पूर्व में बढ़ते घुसपैठियों की गतिविधियों पर गौर कीजिए।
पांच साल तक उसके कत्लेआम के किस्से रोंगटे खड़े करते रहते हैं। आखिरकार 1831 में सिखों की एक जांबाज फौज उसे उसी अल्लाह के पास भेज देती है, जिसने उसे काफिरों के खात्मे के लिए धरती पर भेजा था।
हंटर की किताब ऐसे तमाम किरदारों से रूबरू कराती है। इनमें पटना के इनायत अली और विलायत अली भी शामिल हैं। ये पंजाब में गाजियों के नाम से मशहूर थे। बंगाल में इनकी जिहादी गतिविधियों ने 1850-51 में ब्रिटिश हुकूमत की नाक में दम कर रखा था। इन्हें वापस पटना भेज दिया गया। पटना मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट में इनके क्रियाकलाप दर्ज हैं। यह रिपोर्ट पटना के किन्हीं अहमदुल्ला साहब के बारे में फरमाती है कि इन हजरत ने अपने घर में करीब 17 सौ लोगों को पनाह दे रखी थी। ये सभी हथियार बंद लोग थे और अदालत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष के लिए रखे गए थे। यह नेटवर्क मुस्लिम आबादी को फिरंगियों के खिलाफ दारुल-हरब के नाम पर लगातार भड़ाकाता रहता था और नौजवानों को सरहदों की तरफ जारी लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित करता था। गुमराह लोगों के जत्थे मजहब के नाम पर रास्तों में लगातार नजर आते थे। इनसे निपटने के लिए सरहदी सूबों पर अंग्रेजों को 1850-1863 के बीच एक लाख सैनिक जुटाने पड़े थे। इस फौज ने तब के इन इस्लामी पहरेदारों के खिलाफ 36 बड़े अभियान चलाए थे।
जुलाई 1864 में अम्बाला के जज हरबर्ट एडवर्ड्स ने 11 राजद्रोही मुसलमानों के एक लंबित प्रकरण का फैसला सुनाया था। इनमें संपन्न मुस्लिम परिवारों के ठेकेदार, फौजी, इमाम, प्रचारक और किसान सभी थे। आठ को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी। बंगाल, बिहार से लेकर पंजाब और पेशावर तक फैले इन असंतोषी मुस्लिम नेटवर्क ने लंबी-लंबी जोशीली कविताएं रचीं थीं। इनका हर अलफाज जिहाद के जज्बे और जोश से भरा हुआ है। ये रचनाएं मुस्लिम आबादियों में बांटी जाती थीं। इनमें ब्रिटिश सत्ता के पतन की कामनाएं और इस्लामी झंडे के फिर से फहराने की उम्मीदें भरी होती थीं। हंटर ने ऐसी कुछ रचनाओं का अनुवाद पेश किया है। थानेश्वर का मुहर्रिर जाफर एक ऐसा ही शख्स था, जो जिहादी प्रचारक बन गया था। उसने बाकायदा जिहाद के सिद्धांत दर्ज किए। यह दस्तावेज तब जाफर के मशविरे के नाम से मशहूर हुआ था। इस नेटवर्क में खुफिया कोड वर्ड भी प्रचलित थे। पटना का मौलवी याहया अली प्रचार केंद्रों को छोटा गोदाम और इस्लामी हुकूमत की सरहदों को बड़ा गोदाम कहा करता था। हंटर इन किरदारों और उनके क्रियाकलापों के जरिए इनकी जड़ों में भी जाता है। वह कहता है-इस्लामी शासन बहुतों की रक्षा करने का नहीं बल्कि कुछ को अमीर बनाने का साधन था। दौलत के तीन धारे उनके कब्जे में थे। फौजी कमान, राजस्व वसूली, अदालतें और सरकारी नौकरियां। इन पर मुस्लिमों के कब्जे थे। वित्त विभाग के ऊंचे पदों पर मुसलमान हर जगह काबिज थे। किसानों से सीधा ताल्लुक रखने का जमीनी काम जरूर हिंदू कारिंदों के हाथ में था।
हंटर का यह दस्तावेज पढ़ते हुए लगता नहीं कि यह 140 साल पुराने हिंदुस्तान के एक दौर की बात हो रही है। वही ताकतें कुछ दूसरे अंदाज में और ज्यादा जोर से हमारे आसपास अब भी हमारी आस्तीनों में रेंग रही हैं। खंडित होकर मिली आजादी के बाद बचे-खुचे भारत में काश्मीर को देखिए और उत्तर-पूर्व में बढ़ते घुसपैठियों की गतिविधियों पर गौर कीजिए। संसद, मुंबई, जयपुर, वनारस पर हुए आतंकवादी हमलों की तह में जाने की कोशिश करिए और लश्कर, जैश, हिजबुल व सिमी जैसे संगठनों के नेटवर्क पर भी नजर दौड़ाइए। यह सवाल आपके जेहन में जोर मारेगा कि या इलाही ये मचाया क्या है?

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 10, 2010

दिल्ली में डेरे की शुरुआत [141]

पिछली कड़ी- एक अहिंसक जीत…[बकलमखुद-140]

…तीसवां साल मुझे लग चुका था। जिंदगी किधर जा रही है, कुछ अंदाजा नहीं था। एक जगह जड़ जमाने की कोशिश की तो अब वह भी छूट गई थी। ऐसे में एक शाम मयूर विहार फेज-1, पॉकेट-5 की सड़क पर कोई बारात देखकर पता नहीं क्यों मन में हुड़क सी उठी …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 140 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का तीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chand[3] का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
रीब तीन महीने बाद यह सिलसिला दोबारा शुरू करने का फायदा मैं इस रूप में उठाना चाहता हूं कि जिंदगी का एक महत्वपूर्ण मोड़ सीधे फलांग जाऊं। यह सोच की दृष्टि से उलझा हुआ लेकिन तजुर्बे के लिहाज से बहुत ही दिलचस्प मोड़ है। छोटे शहर के बड़े आदमी से अचानक बड़े शहर का छोटा आदमी बन जाना कितनी रेतने वाली घटना होती है, इसका एहसास इसका केंद्रीय पहलू है। यह वह मोड़ है, जहां सामूहिकता का भरोसा छिन जाता है और अकेली जिंदगी की मुश्किलों की अपरेंटिसशिप शुरू होती है। आरा के चर्चित फील्ड एक्टिविस्ट से दिल्ली में एक अनजानी पत्रिका का अनजाना पत्रकार बनना एक ऐसा संक्रमण है, जिसे फिलहाल मैं दो अलग-अलग ढांचों में ही रख कर देख सकता हूं। अगस्त 1993 में एक खतरनाक केस में गिरफ्तार हुआ था। चर्चा थी कि टाडा लगेगा और शायद कई साल भीतर ही रहना पड़े। लेकिन संयोग कुछ ऐसा बना कि अक्टूबर में ही जमानत मिल गई। जेल जीवन के अनुभवों पर मैं वापस लौटना चाहूंगा, लेकिन अगले हफ्ते, या शायद कभी बाद में। कुल पंद्रह लोगों की बिहार स्टेट कमिटी में से दो स्टेट कमिटी मेंबर अकेले भोजपुर जिले में नहीं रखे जा सकते थे, लिहाजा वहां से मुझे कहीं और भेजने की बात पहले से ही चल रही थी। मुंगेर और लोहरदगा जिलों के प्रस्ताव स्टेट कमिटी की पिछली मीटिंग में मेरे सामने रखे गए थे। मुझे दोनों प्रस्ताव समान रूप से स्वीकार्य थे, हालांकि दोनों ही जगह तब तक मैंने न तो पहले कभी कदम रखा था, न ही उनके बारे में कुछ जानता था। जेल जाने के बाद स्थिति तेजी से बदली। रिहाई मिलते ही पार्टी के जिला सचिव कुणाल जी ने मुझे बताया कि पटना में पार्टी को एलआईयू (लोकल इंटेलीजेंस यूनिट) के कुछ लोगों से सूचना प्राप्त हुई है कि आरा में सुदामा जी के बाद अब मुझे मेन टारगेट मान कर चला जा रहा है। मेन टारगेट यानी हत्या का मुख्य निशाना।
मेरे देखते-देखते इस जिले में मेरे न जाने कितने साथी मारे गए थे। कोई हफ्ता नहीं गुजरता था जब इलाज या पोस्ट मॉर्टम के लिए किसी न किसी को लेकर जिला अस्पताल का चक्कर न लगाना पड़े। ऐसे में अब तक मेरा मेन टारगेट न होना ही आश्चर्य की बात थी। लेकिन इस बार की सूचना में कोई इतनी ठंडी बात थी कि पार्टी अब आरा में मुझको एक दिन भी रखने के लिए तैयार नहीं थी। मैंने कुणाल जी से कहा कि जब जाना ही है तो इस ठीहे का एक सदुपयोग यह कर लूं कि एक बार दिल्ली जाकर भैया से मिलता आऊं। अपने माता-पिता की कुल चार जवान हुई संतानों में हम दो ही बचे थे। मेरा घर जाना दो-तीन साल में कभी एकाध बार ही हो पाता था और भाई से मिले तो कई साल हो गए थे। कुणाल जी ने कहा कि अभी तो आपका दिल्ली जाना और भी अच्छा रहेगा क्योंकि जनमत वाली आपकी टीम फिलहाल दिल्ली में ही है और पत्रिका को वहीं से एक नए रूप में निकालने की तैयारी कर रही है। दिल्ली पहुंचकर मैं सीधा भाई के पास गया, जो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बहुत दूर रिज वाले इलाके में दसघरा गांव में रहते थे। दो-तीन दिन उनके साथ रह लेने के बाद जनमत की टीम की खोजबीन शुरू की। इस शहर में स्थायी पते के नाम पर मुझे सिर्फ 40, मीनाबाग की जानकारी थी। संयोगवश, यह जगह अब भी पार्टी के पास बची हुई थी। रामेश्वर जी पार्टी के सांसद मात्र एक साल चार महीने रहे थे, लेकिन 1991 में उनके चुनाव हारने के बाद असम से पार्टी के साथी जयंत रोंगपी एमपी चुन कर आ गए थे और वह फ्लैट उनके नाम एलॉट हो गया था। यहां रामजी भाई, इरफान और पार्टी महासचिव विनोद मिश्र (वीएम), सबसे एक साथ मुलाकात हो गई।
हां वीएम ने छूटते ही मुझसे कहा कि आप अब बिहार वापस मत जाइए, यहीं रहकर जनमत निकालिए। अगर भोजपुर और दिल्ली में चुनना होता तो बिना झिझक मैं भोजपुर के लिए अड़ जाता। लेकिन मेरे मन में दिल्ली के विकल्प के रूप में अब मुंगेर और लोहरदगा के नाम आ रहे थे। फिर भी मैंने वीएम से कहा कि मैं बिहार स्टेट कमिटी का बाकायदा सम्मेलन के जरिए चुना हुआ सदस्य हूं। मुझे वहां बात करनी होगी कि उनकी मेरे बारे में क्या योजना है। वीएम एक हंसमुख, व्यवस्थित और अकाट्य संकल्प वाले व्यक्ति थे और पार्टी में उनकी बात का वजन नीचे से ऊपर तक समूची पार्टी के सामूहिक फैसले जितना ही हुआ करता था। उन्होंने कहा, स्टेट कमिटी से मैं बात कर लूंगा, जनमत का काम बहुत बड़ा है, 3dआप इसी में जुटिए मेरे लिए यह बहुत ही अकेलेपन और निरीहता से भरा हुआ समय था। पिछले तीन सालों में मेरी भाषा, मेरा जीवन व्यवहार, मेरी कार्यशैली, सब कुछ बदल चुका था। शिक्षा से वंचित मेहनतकश जनता और थोड़ी-बहुत पढ़ाई करके निकले स्थानीय कार्यकर्ताओं से ही मिलकर इस दौर में मेरी दुनिया बनी थी। दिन में दस किलोमीटर से कम जिस दिन चलता था, उस दिन लगता था कि खाना नहीं पचेगा, लेकिन दिल्ली में जिंदगी एक छोटे दायरे में सिमटने जा रही थी। सबसे बड़ी बात यह कि आरा की गली-गली में मेरे जानने वाले थे, मेरा नाम सुनकर लड़ने-मरने के लिए निकल पड़ने वाले थे, लेकिन दिल्ली एक ऐसा शहर था, जहां कोई सड़क पर मर रहे आदमी को हाथ भी नहीं लगाने जाता।
क दिन जेएनयू से मैं और रामजी भाई आ रहे थे। बस में ली मेरिडियन होटल से जरा पहले एक शराबी ने मंगोलॉइड शक्ल वाली दो लड़कियों से बदतमीजी शुरू कर दी। पता नहीं वे नॉर्थ-ईस्ट की थीं या कहीं थाईलैंड वगैरह की। मैंने उसे डांटा तो वह तेरे की-मेरे की पर उतारू हो गया। इससे ज्यादा जुबान पर भरोसा करना मुझे ठीक नहीं लगा। वहीं बस में उसे मैंने उठाकर पटक दिया और दिए दो-चार हाथ। ली मेरिडियन पर बस रुकी तो उतरते वक्त वह देख लेने जैसा कुछ बोला। मैं मामला वहीं आर या पार कर देने के लिए उसके पीछे उतरने लगा तो रामजी भाई ने हाथ पकड़ लिया। बोले, संयत रहिए, भोजपुर को भूल जाइए, यह दिल्ली है- यहां सामने रेप हो जाएगा और कोई सीट से भी नहीं हिलेगा। यह मेरे लिए एक लंबे डिप्रेशन की शुरुआत थी। संसार में सिर्फ एक बिंदु, एक व्यक्ति था, जो इससे निकलने में मेरी मदद कर सकता था। मैंने इंदु को लिखा, तुम किसी तरह दिल्ली आ जाओ। पीछे किसी पोस्ट में मैं इंदु के बारे में बता चुका हूं। वह संयोगवश मेरे परिचय में आई थीं, फिर काफी समय तक कोई मुलाकात नहीं रही। बाद में धीरे-धीरे मित्र बनीं और मेरी कविताओं की एकमात्र पाठक, जो लगभग सारी की सारी कच्ची कॉपी के तौर पर पहले मेरी डायरी में और फिर पक्की कॉपी के रूप में उन्हें भेजे जाने वाले पत्रों में लिखी जाती थीं। दो साल पहले एक बार लखनऊ में मैंने उनसे विवाह करने की इच्छा भी जताई थी, लेकिन मेरे सवाल का कोई जवाब उन्होंने नहीं दिया था- बस टाल दिया था, सोचेंगे कह कर।
 खनऊ युनिवर्सिटी में उनका एमए पूरा हो गया था। डॉक्टरेट और एलएल. बी. दोनों में एक साथ दाखिला ले रखा था, लेकिन घर में आर्थिक मुश्किलें शुरू हो गई थीं, लिहाजा ट्यूशन वगैरह के जरिए अपने खर्चे निकालने की कोशिश भी कर रही थीं। मैंने उन्हें लिखा कि एक बार दिल्ली आकर कुछ महिला पत्रिकाओं वगैरह से भी बात कर लें। जाहिर है, इसके पीछे मेरा असल मकसद अपने रूमानी रिश्ते का वजन आंकना था। तीसवां साल मुझे लग चुका था। जिंदगी किधर जा रही है, कुछ अंदाजा नहीं था। एक जगह जड़ जमाने की कोशिश की तो अब वह भी छूट गई थी। ऐसे में एक शाम मयूर विहार फेज-1, पॉकेट-5 की सड़क पर कोई बारात देखकर पता नहीं क्यों मन में हुड़क सी उठी कि जिंदगी का बिल्कुल नया अध्याय शुरू करने वाली ऐसी कोई घटना मेरे साथ शायद कभी न हो।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


Blog Widget by LinkWithin