Saturday, September 6, 2008
एंकर पर अंकुश नहीं
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अजित वडनेरकर
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1:10 AM
Friday, September 5, 2008
मिर्जा एडमिरल उर्फ अमीरुल बह्र...
अमीर खुसरो,मिर्ज़ा ग़ालिब और मीर तकी मीर जैसे कई और नाम हैं जिनके आगे लगे ये शब्द न होते तो वे इतने रसूख़दार न लगते
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अजित वडनेरकर
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2:57 AM
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Thursday, September 4, 2008
एक शायर का बड़बोलापन- ग़ालिब और मीर मुझसे जलते...
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अजित वडनेरकर
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1:45 AM
Wednesday, September 3, 2008
सबका भाग्यविधाता कौन...[भगवान-2]
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अजित वडनेरकर
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4:07 AM
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Tuesday, September 2, 2008
बड़े-बड़े सपने [बकलमखुद-68]
| ये तमाम फोटो स्वित्जर्लैंड में प्रोफेसर के घर की रसोई के हैं। उनके शाकाहारी बनने के दौरान की. |
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अजित वडनेरकर
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12:56 AM
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Monday, September 1, 2008
कमबख़्त को बख़्श दो ! [भगवान-1]
| आपकी चिट्ठियां |
| सफर की पिछली चार पोस्टों पर सर्वश्री Sanjay Tarun कुश एक खूबसूरत ख्याल Anil Pusadkar Pankaj Parashar Radhika Budhkar Swati अविनाश वाचस्पति sidheshwer Lavanyam - Antarman महेद्र मिश्रा महेन डा. अमर कुमार GIRISH BILLORE MUKUL makrand जितेन्द़ भगत Mrs. Asha Joglekar अनूप शुक्ल और Gyandutt Pandey की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका तहेदिल से शुक्रिया । @लावण्या शाह न वो ख़म है जुल्फे अयाज़ में कभी ऐ हक़ीक़ते मुंतजर.... आपने इस गीत की याद दिला कर ग़ज़ब कर दिया... जब ये गीत अपने उरूज़ पर था तब मैं बच्चा था, मगर इसकी शोख़ धुन तब भी ग़ज़ब करती थी और आज भी। |
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अजित वडनेरकर
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2:59 AM
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Sunday, August 31, 2008
अरे यार क्या मस्त टांगें हैं ![बकलमखुद-67]
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अजित वडनेरकर
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Saturday, August 30, 2008
सिक्काः कहीं ढला , कहीं चला [सिक्का-1]
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अजित वडनेरकर
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Friday, August 29, 2008
बंद कमरे में कैमरे की कारगुज़ारियां
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अजित वडनेरकर
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Thursday, August 28, 2008
कानून का डंडा या डंडे का कानून
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अजित वडनेरकर
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4:03 AM
Wednesday, August 27, 2008
सोने की रंगत, सोने का मोल...
मोटे अनुमान के मुताबिक ज़ाफ़रान के करीब दो लाख फूलों से सिर्फ आधा किलो केसर प्राप्त होता है। ज़ाफ़रान दरअसल फूलो के सुनहरे – पीले तंतु होते हैं जिनके निराले रंग, अनोखी महक और अनमोल औषधीय गुणों की वजह से इस वनस्पति को बेशकीमती सोने का रुतबा मिला हुआ है।
| आपकी चिट्ठियां |
| शब्दों के सफर की पिछली दो कड़ियों-ज़रूरी है नापजोख और मापतौल...और ज्ञ की महिमा - ज्ञान, जानकारी औरनॉलेज पर कई साथियों की प्रतिक्रियाएं मिलीं। खासतौर पर ज़रूरी है नापजोख और मापतौल...पर अभय तिवारी, स्मार्ट इंडियन और कात्यायान की प्रतिक्रियाएं बेहद ज़रूरी थीं। स्मार्ट इंडियन Rama Myfreetvsite.com Lavanyam - Antarman कुश एक खूबसूरत ख्याल रंजना [रंजू भाटिया] Dr. Chandra Kumar Jain अनुराग अभिषेक ओझा अभय तिवारी katyayan अनूप शुक्ल Udan Tashtari दिनेशराय द्विवेदी Arvind Mishra सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी हर्षवर्धन Gyandutt Pandey Mrs. Asha Joglekar. |
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अजित वडनेरकर
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Tuesday, August 26, 2008
आगे भगवान मालिक है....[बकलमखुद-66]
ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने
गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी और प्रभाकर पाण्डेय को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के बारहवें पड़ाव और चौसठवें सोपान पर मिलते हैं अभिषेक ओझा से । पुणे में रह रहे अभिषेक प्रौद्योगिकी में उच्च स्नातक हैं और निवेश बैंकिंग से जुड़े हैं। इस नौजवान-संवेदनशील ब्लागर की मौजूदगी प्रायः सभी गंभीर चिट्ठों पर देखी जा सकती है। खुद भी अपने दो ब्लाग चलाते हैं ओझा उवाच और कुछ लोग,कुछ बातें। तो जानते हैं ओझाजी की अब तक अनकही।
इन्टर्नशिप और डब्बे का लकी होना:
बंगलोर से जिंदगी की पहली इन्टर्न करके लौटा था, प्रोफेसर की शाबाशी और ८,००० रुपये मिले थे २५ दिन के काम के. खुशी खूब थी प्रोफेसर साहब ने ऐसा लैटर लिख के दिया था की लोग बोलते क्या खिला के पटाया:-) कुछ और पैसे मिलकर ३५००० में हम कम्प्यूटर (डब्बा) ले आए. अपने कम्प्यूटर से ऍप्लिकेशन भेजा और ९ वें दिन स्विस से लैटर आ गया, खूब पैसे मिलेंगे ये भी लिखा हुआ था. यहाँ तक तो ठीक लेकिन इसके बाद अजीब घटना हुई, जिसकी भी इन्टर्न की काल आती सब ऍप्लिकेशन मेरे डब्बे से ही गई होती. और किसी ने ये भी हल्ला कर दिया की कवर लैटर और रिज्यूमे ओझा से ही लिखवाओ. तो डब्बे के साथ-साथ हम भी रिज्यूमे-गुरु बन निकले. यहाँ तक भी ठीक पर कुछ लोगों को तो इतना भरोसा था (खासकर एक मेरे करीबी मित्र गुप्ता को) की इस डब्बे से असाइंमेंट बना के भेजो तो कभी कम नंबर नहीं आ सकते, एक बार उनके टर्म पेपर को बेस्ट घोषित कर दिया गया तब से बेचारे कुछ भी करते मेरे डब्बे से ही, उनका डब्बा बेचारा तरसता रह जाता. कुछ इसी तरह की घटना हुई प्लेसमेंट के टाइम पर मेरा बेल्ट चल निकला, हाल ये था की मुझे नहीं मिल पाता था पहनने को :-) मेरा रूम वैसे ही अड्डा था चर्चा का, मैं सो रहा होता तो भी रूम में २-४ लोग होते ही. अब ये एक और कारण हो गया भीड़ का.
मेरी बेटी कैसी रहेगी:
हम्म... इसका शीर्षक ही रोचक है. तो चलिए बता ही देता हूँ, आईआईएम बंगलोर में दोबारा काम करने गया. पहली बार जिस प्रोफेसर के साथ काम किया वो भारत के जाने माने विद्वान् हैं. ज्यादा नहीं बता सकता, बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं मेरे उनसे, और वो जानी-मानी हस्ती हैं, सब बंटाधार हो जायेगा. जब दूसरी बार गया तो उनसे फ़िर मिलना हुआ. एक दिन गया तो खूब देर तक बात हुई, मैं क्या कर रहा हूँ, भविष्य के क्या प्लान है उन्होंने भी अपने बेटे की तस्वीर दिखाई जो अभी लन्दन में पढ़ाई कर रहा था. सब कुछ ढंग से चलता रहा, फिर उन्होंने मेरी उम्र और घर वालो के बारे में बात चालु की मुझे कुछ भनक नहीं लगी. बात होते-होते अंत में उन्होंने कहा की 'Actually I have a daughter to marry and she is as old as you are.' अब चालु हुई बात... अपनी बेटी के बारे में भी बताया उन्होंने, जो उन्हें चाहिए था सब मुझमे और मेरे परिवार में था बस उम्र कच्ची थी मेरी और पढ़ाई बाकी. मेरे पसीने छूट गए. मैं क्या कहूँ कुछ समझ में नहीं आया, मैंने कहा की ये काम मेरे माता-पिता का है मेरा नहीं. और वैसे भी अभी मुझे बहुत दिनों पढ़ाई करनी है. अभी कैसे कुछ कह सकता हूँ. जो भी हो चर्चा होती रही और ये फैसला लिया गया की मैं अपनी पढ़ाई पूरी करुँ और बाद में कभी मिलना हुआ तो मैं अपने माता-पिता का नंबर उन्हें दूंगा. (मैं लड़कियों को पसंद क्यों नहीं आता, उनके पिताओं को आता हूँ.. बहुत समस्या है !) फिलहाल वो बात उसके बाद बस एक बार और छिडी तब से नहीं... आगे भगवान मालिक है !
अन्तिम वर्ष:
आईआईटी के यादगार दिनों में आया अन्तिम वर्ष. वो सब कर डाला जो अब तक नहीं किया था... फाइनल परीक्षा के एक दिन पहले रात के २ बजे तक सिनेमा हॉल में, रात के २ बजे गंगा किनारे हो या जीटी रोड के ढाबे. घुमने का मन किया तो उत्तर पूर्व भारत घूम आए. चार साल में जितना पैसा खर्च नहीं किया था आखिरी सेमेस्टर में उडा दिया. मेस में खाना खाए हुए १५ दिन हो जाते. एक भी फ़िल्म रिलीज़ हो और हम सिनेमा हॉल में देख के न आयें ऐसा कभी नहीं हुआ. कानपुर के मित्र और उनकी बाइक... खूब एन्जॉय किया. इस बीच क्लास बंक करने का सिलसिला भी खूब चला. आईआईटी कानपुर की एक अच्छी बात है कि अटेंडेंस जरूरी नहीं है. कुछ प्रोफेसर इसके लिए कुल अंक का प्रतिशत निर्धारित कर देते हैं तो उन क्लास्सेस में जाना पड़ जाता था... उसमें भी अगर ये पता चल जाता की ५-१०% वेटेज है तो फिर यही कोशिश होती की ये ५-१०% कहाँ से लाये जाएँ अपने को तो वैसे भी नहीं मिलने. दो कोर्स ऐसे भी किए जिनमें कुल मिला कर दो बार ही गया. एक कोर्स में तो हद हो गई जब दुसरे मिड सेमेस्टर कि परीक्षा हो रही थी और मैं इंस्ट्रक्टर को ही नहीं पहचानता था. पर दोस्तों का साथ उनके नोट्स और रात भर की पढ़ाई इन दोनों कोर्स में अच्छे ग्रेड लगे. [जारी]
| गांव में बच्चों के बीच यूं बच्चा बन जाने में कितना आनंद है ! हां, जब मनचाहे तब बड़प्पन झाड़ने से भी कौन रोकता है ! | |
| आईआईटी ,कानपुर में साथियों के साथ कुछ यादगार पल... |
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अजित वडनेरकर
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3:17 AM
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बकलमखुद
Monday, August 25, 2008
राधिका ने कहा , शुक्रिया आपका ...
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अजित वडनेरकर
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3:33 AM
Sunday, August 24, 2008
इश्क की मुंडेर पर , पहुंचे स्विट्जरलैंड [बकलमखुद-65]
ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने
गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी और प्रभाकर पाण्डेय को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के बारहवें पड़ाव और तिरेसठवें सोपान पर मिलते हैं अभिषेक ओझा से । पुणे में रह रहे अभिषेक प्रौद्योगिकी में उच्च स्नातक हैं और निवेश बैंकिंग से जुड़े हैं। इस नौजवान-संवेदनशील ब्लागर की मौजूदगी प्रायः सभी गंभीर चिट्ठों पर देखी जा सकती है। खुद भी अपने दो ब्लाग चलाते हैं ओझा उवाच और कुछ लोग,कुछ बातें। तो जानते हैं ओझाजी की अब तक अनकही।
इस बीच इस सोने की घटना में बहुत खोया... प्रोफेसर साहब कई जगह क्लास लेते तो जिस दिन ऑफिस नहीं जाते मैं बस से जाता, एक दिन ७ बजे की बस से गया तो एक लड़की मिली... ओह क्या हसीन थी, छोडिये ज्यादा नहीं लिखूंगा, उसके फिगर के बारे में तो बिल्कुल नहीं. पर इतना बता दूँ की किस्मत पहली बार इस मामले में काम कर रही थी अक्सर लोग अकेली सीट पर बैठते हैं पर वो आकर बैठी ही नहीं बातें भी करने लगी, उसकी रूचि हिन्दुइस्म और हिन्दुस्तान में बहुत थी और इस मामले में लपेटने में मैं माहिर. पर २-३ दिन के बाद लाख कोशिश कर के भी उठ नहीं पाता ठंड में सोता ही रह जाता, रोज़ कोशिश करता पर ७.२० वाली बस ही मिल पाती... जो सोता है सो खोता है
| यादे-स्विस प्रो. ब्राइट की पत्नी मेरिलिन के साथ | |
| प्रोफेसर ब्राइट के साथ ब्रेकफास्ट का मज़ा |
प्रस्तुतकर्ता
अजित वडनेरकर
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2:16 AM
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बकलमखुद








































