Monday, December 27, 2010

कॉमरेड का कमरा और कम्पनी

abook-002_thumb1दिल्ली के प्रगति मैदान में शनिवार से पुस्तक मेला शुरू हो चुका है। सफ़र के जो पाठक इस मौके पर वहाँ जाने की सोच रहे हैं, वे कृपया राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर ज़रूर जाएं और शब्दों का सफ़र के प्रकाशित क़िताबी रूप को भी ज़रूर देखें। हो सके तो ख़रीदें भी।
Companion_Shop_Logo_2
कॉ मरेड शब्द का शुमार भी उन शब्दों मे होता है जो विदेशी मूल से उठकर हिन्दी मे समा गए हैं। मोटे तौर पर कॉमरेड का अर्थ होता है साथी। कॉमरेड के दायरे में मित्र, सहचर, संगी यानी जो साथ रहे या साथ चले, सब आ जाते हैं। कॉमरेड में साथ रहने का भाव महत्वपूर्ण है। हिन्दी समेत दुनियाभर की भाषाओं में अब कॉमरेड साम्यवादी विचारधारी से जुड़ी शब्दावली का हिस्सा है कॉमरेड यानी ग़रीबों, किसानों, शोषितों, वंचितों, मेहनतकशों और सर्वहारा वर्ग का साथी। उनके हित में लड़नेवाला, उनके साथ संघर्ष के मोर्चे पर सबसे आगे खड़ा रहनेवाला दोस्त, हमदम, हमदर्द, रहनुमा ही कामरेड है। साम्यवादी विचारधारा के लोग एक दूसरे से कामरेड सम्बोधन के साथ ही संवाद स्थापित करते हैं।  अंग्रेजी का कॉम्पैनियन शब्द भी संगी, साथी या सहचर का भाव व्यक्त करता है। हालाँकि बोलचाल की हिन्दी में यह शब्द आम नहीं है अलबत्ता शहराती हिन्दी में अंग्रेजीदाँ लोगों की ज़बान से झरती हिंग्लिश का हिस्सा यह शब्द बन चुका है। कॉमरेड और कॉम्पैनियन के मूल में लैटिन है मगर अरबी और संस्कृत मूल से भी इनकी रिश्तेदारी है। जानते है इनकी हकीक़त क्या है।
रूम मेट या चैम्बर मेट शब्दों का जो अर्थ है वही किसी ज़माने में कॉमरेड शब्द का भी अर्थ था यानी कमरे में साथ साथ रहनेवाला। अंग्रेजी में कॉमरेड शब्द मध्यकालीन फ्रैंच शब्द केमेरादे camarade का रूपान्तर है। फ्रैंच में यह स्पैनी भाषा के कामारेडा camarada से आया है जिसका मूल है लैटिन का कैमेरा camera जिसका मतलब है छोटा कक्ष, मेहराब, कमानीदार या तोरण जैसी रचना जिस पर छत टिकी होती है। इसी मूल से निकला है कक्ष, कोठरी के अर्थ में कमरा शब्द। फोटो खींचनेवाले उपकरण को भी कैमेरा ही कहते हैं क्योंकि इसके भीतर भी कक्ष ही होता है। फ्रैंच का चैम्बर CHAMBER का रिश्ता भी इस सिलसिले से है। हिन्दी में रचा – बसा कमरा दरअसल हिन्दी का नहीं है। भाषाविज्ञानी इसकी आमद पुर्तगाली से मानते है मगर आधुनिक पोर्चगीज़ में कमरा शब्द का उल्लेख स्पष्ट रूप से नहीं मिलता। हो सकता है पाँच सदी पहले जब पुर्तगालियों की इस सरज़मीं पर आमद हुई हो तब देशज रूप में कक्ष या कोठरी के लिए इसका इस्तेमाल होता रहा हो। कमरा शब्द चाहे यूरोपीयों की देन हो मगर यह है इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द और इससे मिलते-जुलते शब्द हिन्दी और उसकी पड़ौसी ईरानी शाखा में साफ़ दिखते हैं।
ग्रीक भाषा का एक शब्द है kamara यानी कमरा जिसका मतलब था छोटा, बंद कक्ष। लैटिन में इसका रूप हुआ camera यानी कैमरा मतलब तब भी वही रहा। ग्रीक और लैटिन से होते हुए पुर्तगाली में इस शब्द ने फिर kamara का देशज रूप लिया होगा। बहरहाल, छवियाँ लेने वाले उपकरण के तौर पर कैमरा शब्द लैटिन भाषा के कैमरा ऑब्स्क्योरा जिसका मतलब होता है अंधेरा कक्ष, के संक्षिप्त रूप में सामने आया। पुराने ज़माने के कैमरे किसी कोठरी से कम नहीं होते थे और उनके नामकरण के पीछे यही वजह थी। मूलतः ग्रीक शब्द kamara बना है इंडो-यूरोपीय धातु kam से जिसका मतलब होता है महराब, वक्र, कोना, झुका हुआ वगैरह।  उर्दू फारसी का एक शब्द है ख़म जो इसी श्रंखला से जुड़ा है, जिसका मतलब भी वक्रता, टेढ़ापन, झुकाव ही होता है। पुराने ज़माने के मकानों में छत दोनो तरफ से ढलुआं होती थी क्योंकि बीच में खम देना ज़रूरी होता था। पेचोख़म शब्द भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है। गौर करें संस्कृत की कुट् धातु पर। kam से ध्वनिसाम्य वाली इस धातु में भी वक्रता, झुकाव का भाव है जो छप्पर डालने पर आता है। जाहिर है कुटि, कुटीर या
ancient-burial-chamberएक तरफ़ जब कम्पनी जैसी व्यवस्था जन्म ले रही थी, तभी उस व्यवस्था से लड़ने के लिए कॉमरेड जैसा शब्द भी नया चोला पहन कर तैयार हो रहा था। फिर चाहे ये दोनों शब्द एक ही कोख से चाहे क्यों न जन्में हों। कम्पनी और कॉमरेड की लड़ाई जारी है। हालाँकि अब काफी हद तक यह नूराकुश्ती में तब्दील हो गई है।
कुटिया जैसे शब्द इससे बन गए जो कक्ष, कमरा या कोठी के पर्याय है। इन शब्दों का अंतर्संबंध यहां स्पष्ट हो रहा है और विकासक्रम के साथ इनकी रचना प्रक्रिया भी उजागर हो रही है। लैटिन camera का फ्रैंच रूप हुआ chamber यानी चैम्बर जिसका मतलब भी छोटा कमरा या न्यायाधीश का कक्ष था। अब तो चैम्बर के कई तरह से प्रयोग होने लगे हैं।
कुछ अन्य शब्द भी q-a-m क़ अ म धातु मूल से ही निकले हैं। जैसे क़ियाम जिसे हिन्दी में कयाम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। क़ियाम शब्द में अस्थायी निवास, रहना, थोड़े दिनों का वास जैसे भाव भी हैं। क़ियाम या क़याम में निश्चय, भरोसा, यक़ीन का भाव भी है। नमाज़ में खड़े होने की मुद्रा भी क़याम कहलाती है। रहने की जगह को क़यामगाह भी कहते हैं। q-a-m में निहित स्थिरता के भाव ही इसे आश्रय से भी जोड़ते हैं। इस धातु की रिश्तेदारी संभव है किसी काल में प्रोटो इंडो-यूरोपीय धातु k-a-m से भी रही होगी जिससे ही कमरा, कैमेरा, कमान, कमानी जैसे शब्द बने हैं। क़याम में जो q की ध्वनि है अर्थात नुक्ते का प्रयोग वह इसे देवनागरी वर्ण ख के करीब पहुंचाता है। क़ाम में स्थिरता के भाव से ही बनता है अरबी का क़ाइम शब्द जिसका हिन्दी रूप कायम है और यह खूब इस्तेमाल होता है। कायम का अर्थ भी स्थिर होना, मज़बूती से डटे रहना, दृढ़ रहना आदि। किसी भी भवन को स्तम्भ ही आधार प्रदान करते है। स्तम्भ का एक अन्य रूप संस्कृत में स्कम्भ होता है। खम्भा इससे ही बना है अर्थात पाया। गौरतलब है कि पाया अर्थात पैर ही स्थिरता प्रदान करते हैं।
अरबी, फारसी का खम (खम ठोकना) इसी स्कम्भ से जुड़ रहा है। खम्भे से ही बना है खेमा क्योंकि वह स्तम्भ पर टिका आश्रय होता है। स्कम्भ की रिश्तेदारी अगर खम्भे को देखते हुए खेमा से जोड़ी जा सकती है तब तम्बू के मूल में स्तम्भ भी हो सकता है। अरबी के कमान या कमानी का मतलब होता है वह आधार जिस पर छत डाली जाए। कोई ताज्जुब नहीं कि सेमिटिक भाषा परिवार की धातु q-a-m से उपजे इस शब्द समूह की रिश्तेदारी प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार k-a-m से हो। यह साबित होता है अरबी शब्द काइमाह से जिसका अर्थ होता है स्तम्भ, पाया, नब्बे अंश का कोण क्षैतिज रेखा से मिलकर नब्बे अंश का कोण बनाती हुई खड़ी लकीर को भी क़ाइमाह कहते हैं। स्थिरता का, खड़े होने का यह भाव जबर्दस्त है। इस काइमाह का ही रूपांतर है कायम, जिसमें टिकने, स्थिर होने, खड़े रहने जैसे भाव समाए हैं।
हिन्दी में कम्पनी या कंपनी शब्द खूब आम है और इस कम्, q-a-m या k-a-m से इसकी भी रिश्तेदारी है। कम्पनी का अर्थ है लोगों का समूह, जत्था, साथ या साथी, सोहबत आदि। कम्पनी शब्द बना है अंग्रेजी के कॉम्पैनियन से जिसका अर्थ है संगी साथी, हिस्सेदार, साझेदार, जोड़ीदार, हमराही आदि। कम्पैनियन बना है लैटिन के कॉम्पैनियो से जिसमें एक थाली में खाने का भाव है और अर्थ है रोटी का हिस्सेदार अर्थार ब्रैडफैलो। यह बना है कॉम- साथ + पैनिस- रोटी से। जाहिर है साथ रहनेवाले ही साथ साथ खाएंगे भी। यही भाव है कैमेरा से बने कामरेड में जिसका अर्थ हुआ कमरे में साथ रहनेवाला अर्थात साथी, सहचर।  बाद के दौर में इसमें गरीबों का हिमायती, सर्वहारा का साथी जैसे भाव विकसित हो गए। लैटिन का कॉम com बना है भारोपीय धातु kom से जिसका रिश्ता निश्चित तौर पर कम् यानी kam से जुड़ता है। कॉम में साथ, साहचर्य। सहकार या सह के अर्थ में अंग्रेजी के प्रसिद्ध उपसर्ग co- का जन्म भी इसी कॉम से हुआ है। स्पष्ट है कि kam धातु में निहित कमानी, कमान, कमरा, महराब जैसे भावों का विकास जब आश्रय को अभिव्यक्त करनेवाला कमरा में हुआ उसके बाद साथ या साहचर्य के तौर पर कॉम com धातु सामने आई। बाद में सभ्यता के विकास के साथ साथ कॉम्पैनियन शब्द से एक नया शब्द बना कम्पनी जिसका अर्थ हुआ समूह, जत्था आदि। बाद में औद्योगिक और व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एकत्र लोगों के समूह को कम्पनी कहा जाने लगा। यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति का दौर शुरु होने के वक्त ही कम्पनी शब्द भी सामने आया। गौरतलब है कि एक तरफ़ जब कम्पनी जैसी व्यवस्था जन्म ले रही थी, तभी उस व्यवस्था से लड़ने के लिए कॉमरेड जैसा शब्द भी नया चोला पहन कर तैयार हो रहा था। फिर चाहे ये दोनों शब्द एक ही कोख से चाहे क्यों न जन्में हों। कम्पनी और कॉमरेड की लड़ाई जारी है। हालाँकि अब काफी हद तक यह नूराकुश्ती में तब्दील हो गई है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 26, 2010

सुयेनच्वांग की भारत-यात्रा

logo_thumb202_thumb6रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार शामिल किया है छठी सदी में चीन से भारत याए प्रसिदध बौद्ध श्रमण सुयेनच्वांग के यात्रावर्णन पर लिखी जगमोहन वर्मा की पुस्तक सुयेनच्वांग की भारतयात्रा को। इसे पिलग्रिम्स पब्लिशिंग हाऊस, बनारस ने प्रकाशित किया है। इसके पैपरबैक, पॉकेटबुक साईज के संस्करण का मूल्य 75 रु है और पृष्ठ संख्या 210 है । ...

वृ हत्तर भारत की सभ्यता संस्कृति का अपने पड़ोसी
abook 002दिल्ली के प्रगति मैदान में शनिवार से पुस्तक मेंला शुरू हो चुका है। सफ़र के जो पाठक इस मौके पर वहाँ जाने की सोच रहे हैं, वे कृपया राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर ज़रूर जाएं और शब्दों का सफ़र के प्रकाशित क़िताबी रूप को भी ज़रूर देखें। हो सके तो ख़रीदें भी।
देशों जैसे चीन, भूटान, नेपाल, मंगोलिया, अफ़गानिस्तान, ईरान के जन-जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है। इसके पीछे महान बौद्ध धर्म भी एक बड़ी वजह रहा। बौद्ध धर्म देखते ही देखते पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया था जिसकी वजह थी कुरीतियों और कर्मकांडों पर उसकी शिक्षाओं की चोट। संस्कृति के चार अध्याय में रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा है कि बौद्ध धर्म कोई नया धर्म नहीं, बल्कि हिन्दुत्व का ही संशोधित रूप है। समाज में जो वर्ण ब्राह्मण से जितना दूर था, वह बौद्ध धर्म की ओर उतनी ही तेजी से खिंचा। बौद्ध धर्म की इसी सहजता से एक सामाजिक संकट भी उत्पन्न हुआ कि समाज के हर वर्ग से लोग घरबार छोड़कर सन्यासी बनने लगे। हालांकि संन्यास की व्यवस्था हिन्दू धर्म में प्राचीनकाल से ही रही किन्तु वह आश्रम व्यवस्था के तहत क्रमिक रूप से थी जबकि बुद्ध ने क्या बालक, क्या युवा और क्या वृद्ध, सभी को संन्यास लेने का मार्ग प्रशस्त किया। पूरा देश मठों और विहारों से भर गया था। यह प्रवृत्ति चीन जैसे देश में भी थी जहाँ बुद्ध से प्रभावित भिक्षुक ज्ञान पिपासा में भारत आने लगे। चीन से भारत आने वाला ऐसा ही एक भिक्षुक था सुयेनच्वांग।
चीन देश से बौद्ध श्रमणों के भारत आने की लम्बी परम्परा रही है जिनमें फाह्यान, सुंगयुंन, इत्सिंग तथा सुयेनच्वांग विशेष रूप से प्रसिद्ध चीनी यात्री हैं। इन सभी यात्रियों ने अपने देश लौटकर दीर्घ यात्रा वृत्तांत लिखे जो आज से सैकड़ों वर्ष पहले के भारत की सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक दशा बताते हैं। संन्यास परम्परा में देशाटन का महत्व है और प्रायः सभी यात्रियों ने देश के सुदूर अंचलों तक पदयात्रा की और विभिन्न प्रान्तों, वनस्पतियों, smita ajit 010जनपदों के जनजीवन और राजनीतिक परिस्थितियों का वर्णन किया है। सुयेनच्वांग आज से करीब डेढ़ हजार साल पहले यानी छठी सदी ईस्वी में भारत आया था। इन सभी में सुयेनच्वांग का विवरण सबसे विशद है जिसका नाम चीनी भाषा में सी-यू है यानी पश्चिम देशों की पुस्तक। इसके विभिन्न रूपान्तर अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुके हैं जगमोहन वर्मा ने आम हिन्दी पाठक को ध्यान में रखते हुए सुयेनच्वांग का यात्रा वृत्त लिखा है जिसे पिलग्रिम्स ने प्रकाशित किया है। पुस्तक में बौद्ध श्रमण के जीवन से मृत्यु तक का वृत्तांत समेटा गया है। सुयेनच्वांग के पितामह का नाम कोंग था और वे पांचवीं-छठी सदी के चीन में माने हुए विद्वान थे और तत्कालीन पेकिंग के विश्वविद्यालय के प्रधान आचार्य थे। तत्कालीन चीन में राजाज्ञा से सर्वसाधारण के बीच से सर्वश्रेष्ठ भिक्षुक का चयन होता था। सर्वप्रथम भिक्षुक बनने के ले लिए परीक्षा देनी होती थी फिर भिक्षुक के लिए चयन होता था उसके बाद राजकीय खर्च पर उनका भरण-पोषण होता था। इस परीक्षा में सुयेनच्वांग अल्पवय में ही चुन लिए गए थे।
युवावस्था में ही सुयेनच्वांग के मन में भारत यात्रा की इच्छा जागी। राजाज्ञा न मिलने के बावजूद वे छुपते हुए भारत के लिए रवाना हो गए। जगमोहन वर्मा ने उनकी यात्रा के अधिकांश विवरणों को कुशलता से एक सूत्र में पिरोया है। उन्होंने अफ़गानिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश किया फिर कश्मीर, पंजाब, सिंध आज का हरियाणा, कन्नौज, प्रयाग, अयोध्या और काशी होते हुए वे पाटलिपुत्र पहुंचे जहाँ बोधगया और नालंदा में उन्होने दर्शन का गहन अध्ययन किया। देशाटन के दौरान सुयेनच्वांग महाराष्ट्र और द्विड़ क्षेत्रों की यात्रा पर भी निकले। इसी क्रम में वे गुजरात, मालवा और नर्मदातटीय क्षेत्रों में भी खूर रहे। यह दौर हर्षवर्धन का था। चीन लौटकर उन्होंने प्राप्त ज्ञान के आधार पर वहाँ प्रचलित बौद्धधर्म की मान्यताओं और परम्पराओं का परिष्कार किया। वे अपने साथ सैकड़ों महत्वपूर्ण ग्रन्थ ले गए थे। प्राचीन यात्रावृत्तों में दिलचस्पी रखनेवालों के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 24, 2010

दरजन, दिसम्बर और बारहमासा

Two Dozen Red Roses

हिन्दी की हर भाषा में दरजन शब्द खूब प्रचलित है जिसमें बारह अंकों है। दरजन हिन्दी-उर्दू के उन बेहद प्रचलित और खूबसूरत शब्दों में हैं जो विदेशी मूल के होने के बावजूद हिन्दुस्तानी संस्कारों में ढल गए जैसे लैन्टर्न से लालटेन या हास्पिटल से हस्पताल और फिर अस्पताल। इसी तरह अंग्रेजी के डज़न dozen से हिन्दुस्तानी में दरजन बन गया। भाषायी रूपान्तर की यह बेहद खूबसूरत मिसाल है। हिन्दी में दर्जन भर आम से लेकर दर्जन भर ख़ास लोग तक शामिल होते हैं। वस्तु से लेकर इन्सान तक दरजन भर के दायरे में आ जाते हैं। आमतौर पर लोगों को यह ग़लतफ़हमी है कि दरजन शब्द का इस्तेमाल सिर्फ जिन्सों अर्थात वस्तुओं के सदर्भ में होता है इसीलिए मनुष्यों के सदर्भ में दरजन शब्द का इस्तेमाल ठीक नहीं जैसे-वहाँ दो दर्जन लोग भी नहीं जुटे थे। दरअसल दरजन शब्द में बारह के समूह का ही भाव है। बारह वस्तुएँ, बारह लोग, बारह गाँव, बारह महिने, बारह राशियाँ ये सब दरजन में आते हैं। अंग्रेजी का डज़न मराठी में डझन हो जाता है जिसका अर्थ है बारह का समूह।
दरजन की व्युत्पत्ति हुई है अंग्रेजी के डज़न से। अंग्रेजी में डज़न का विकास हुआ है लैटिन के duodecim से। एटिमऑनलाईन के अनुसार अंग्रेजी में क़रीब बारहवीं सदी में डज़न का रूप था डोज़ जिसका ही विकास duodecim से हुआ। यह शब्द भी दरअसल भारोपीय मूल का ही है और दो शब्दों से मिलकर बनी शब्दसन्धि का उदाहरण है जिसका अंग्रेजी रूपान्तर डज़न हुआ। इसके हिज्जे हैं- duo+ decem अर्थात दो +दस। ध्यान रहे लैटिन का ड्युओ और संस्कृत का द्वि एक ही है। ड्युओ से ही अंग्रेजी के टू का विकास हुआ है। हिन्दी का दो भी इसी मूल का है। इसी तरह संस्कृत दशन्/दशम् और लैटिन डेसिम भी स्वजातीय हैं। ग्रीक में यह डेका है तो आईरिश में डेख, रूसी में देस्यात है, लिथुआनी में इसका रूप देश्मित और लात्वियाई में देस्मित है। अंग्रेजी महिने डिसेम्बर/दिसम्बर के मूल में भी लैटिन का डेसिम ही है जिसका अभिप्राय दस है। गौरतलब है कि प्राचीन रोमनकाल में दस महिनों का ही प्रचलन था जिसके आधार पर दसवाँ महिना दिसम्बर कहलाया। बाद में जब ग्रेगोरियन कैलेण्डर के आधार पर वर्ष विभाजन बारह माह का हुआ और वर्षारम्भ जनवरी से हुआ तब दिसम्बर अपने दसवें स्थान से खिसक कर अपने आप बारहवाँ महिना बना। इससे पहले तक प्राचीन रोमन कैलेण्डर की शुरुआत मार्च से होती थी।
हिन्दी के बारह अंक का विकास भी कुछ इसी तरह हुआ है। द्वि + दशन् = द्वादशन् > द्वादश > वारस > बारस > बारह। ध्यान रहे संस्कृत हिन्दी की व ध्वनि ब में तब्दील होती है। इसी तरह श का रूपान्तर स

2238630980_1c86d04ce0... पुराने ज़माने में बड़ी हवेलियों को बारहदरी कहा जाता था क्योंकि इनमें बारह दरवाज़े होते थे। इसका एक रूप बारादरी भी है। वर्णमाला के लिए सबसे प्रचलित शब्द है बारहखड़ी जो बना है द्वादश-अक्षरी से।...

में होता है और स कई बोलियों में ह के रूप में उच्चारित होता है। इस तरह अंग्रेजी के डज़न और हिन्दी के बारह का विकास एक जैसा ही रहा है। बारह के समूह का महत्व प्राचीन भारतीय संस्कृति में भी रहा है। कालगणना में यह स्पष्ट है। भारतीय ज्योतिष में बारह राशियाँ हैं। बारह माह हैं। बारह संक्रान्तियाँ हैं। हिन्दुओं में बारह ज्योतिर्लिंगों का महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जिन स्थानों पर शिव प्रकट हुए थे वहाँ ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई जैसे- सोमनाथ, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, घृष्णेश्वर, केदारनाथ, रामेश्वर, नागेश्वर, वैद्यनाथ, त्र्यंबकेश्वर, काशी विश्वनाथ और भीमाशंकर। इन ज्योतिर्लिंगों का संबंध बारह राशियों से भी जोड़ा जाता है। इसी तरह ज्योतिष में बारह भाव हैं जैसे- तनु, धन, सहज, सुहृद, पुत्र, रिपु, स्त्री, आयु, धर्म, कर्म, आय, व्यय आदि। जैन धर्म में भी बारह भावनाओं का महत्व है-अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आश्रव, संवर, निर्जरा, लोक और धर्म भावना। बारह वर्षों में एक बार कुम्भ पर्व आता है। पाण्डवों की वनवास अवधि भी बारह वर्ष की थी। गणेश के बारह नाम भी प्रसिद्ध हैं- सुमुख, एकदंत,कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्न-नाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन। रात दिन को बारह बारह घण्टों में ही विभाजित किया गया है। धर्म-संस्कृति और लोकाचार में तलाशने पर बारह के ऐसे कई अन्य समूह भी मिलेंगे।
हिन्दी में एकादशी को ग्यारस और द्वादशी को बारस कहा जाता है। सभी मौसम में एक समान भाव रखनेवाले को बारहमासी भी कहा जाता है जैसे बारहमासी फूल। बारहमासी सब्जी। मध्यकालीन कविता में बारहमासा या बारहमासी की परम्परा थी। ज्यादातर शृगाररस के कवियों नें बारहमासे रचे हैं जिनमें नायिका अपने वियोग वर्णन में वर्ष की सभी ऋतुओं की खासियत बखान करते हुए अपनी पीड़ा को उजागर करती है। कालिदास का मेघदूत एक किस्म का बारहमासा ही है। पुराने ज़माने में बड़ी हवेलियों को बारहदरी कहा जाता था क्योंकि इनमें बारह दरवाज़े होते थे। इसका एक रूप बारादरी भी है। वर्णमाला के लिए सबसे प्रचलित शब्द है बारहखड़ी जो बना है द्वादश-अक्षरी से। मूलतः इसमें वर्णमाला के 12 स्वरों के साथ व्यंजनों को संयुक्त कर लिखने के अभ्यास का भाव है। संस्कृत वर्ण द में मूलतः विभाजन का भाव है। एकत्व का द्वित्व होना ही विभाजन है। इसीलिए द्वि का अर्थ दो हुआ अर्थात एक का न्यूनतम विभाजन। इसके आगे की संख्याएं लगातार विभाजन ही हैं। दिशाओं की संख्या लगातार बढ़ीं, महिनों की संख्या लगातार बढ़ी। अगर एकत्व सुविधा है तो विभाजन भी सुविधा ही है। मगर विभाजन दुविधा भी है। दुविधा यानी अनिर्णय, असमंजस। हिन्दी में बारहबाट होना जैसे मुहावरा प्रचलित है जिसका अर्थ है एक के अनेक होना, तितर-बितर होना, अलग अलग होना आदि। बारहबाट में बारह टुकड़ों या हिस्सों की बात है। बाट को राह से भी जोड़ सकते हैं। एक साथ कई विकल्प खुलना दरअसल सुविधा नहीं दुविधा का आरम्भ है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, December 18, 2010

“सफ़र” का विमोचन...खरीदें और पढ़ें

book realese 056

आ ख़िरकार किताब आ ही गई। शब्दों का सफ़र नाम के ब्लॉग का परिष्कृत रूपान्तर पुस्तक की शक्ल में आए यह साध सफ़र के सभी साथियों समेत हमारे मन में भी अर्से से थी।

book realese 006इस तरह बना है कवर…कारवाँ बने हैं शब्दों के सफ़र का जरिया  book realese 012लेखक से परिचय करवाया डॉ सविता भार्गव ने book realese 025और लीजिए पुस्तक विमोचन हो गया...book realese 031...अब बारी है मंजूर साहब की...क्या बोले? book realese 070 अपन भी बोल लेते हैं...book realese 074 श्रोता झेल रहे हैं...book realese 106 जैसे ही बात समझ में आई...book realese 093...और श्रीमती जी ने सिर पकड़ लिया...कहाँ फँस गए...book realese 099श्रोताओं मे संवाद जारी रखा...book realese 110अंत में मामा कमलकांत बुधकर ने खाकसार की पोल खोली...चलिए, जो हुआ, अच्छा हुआ...

शुक्रवार शाम भोपाल के हिन्दी भवन में चल रही राजकमल प्रकाशन की पुस्तक प्रदर्शनी में ही शब्दों का सफ़र का विमोचन हिन्दी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मंज़ूर एहतेशाम ने किया। इस मौके पर ख्यात नाटककार अलखनंदन, कवि-कहानीकार गीत चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विजय मनोहर तिवारी, ख्यात ब्लॉगर-लेखिका मनीषा पाण्डे, ख्यात शिल्पी देवीलाल पाटीदार, कवयित्री डॉ सविता भार्गव और हरिद्वार से पधारे विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार-प्राध्यापक डॉ कमलकांत बुधकर भी मौजूद थे। डॉ सविता ने कार्यक्रम का संचालन किया। अध्यक्षता की अलखनंदन ने। करीब डेढ़ घंटे चले इस कार्यक्रम में सबसे पहले मंजूर एहतेशाम के हाथों पुस्तक की प्रतियों का विमोचन हुआ। इसके बाद लेखक से आमंत्रितों को मिलाने और पुस्तक का संक्षिप्त परिचय देने की जिम्मेदारी डॉ सविता ने निभाई। ख़ाकसार ने शब्दों का सफ़र से जुड़ी याद आने लायक और क़ाबिले ज़िक्र बातें श्रोताओं से साझा की। फिर संत शृंखला पर लिखे एक आलेख का पाठ किया गया। पाठ-सत्र के बाद श्रोताओं और लेखक के बीच सीधा संवाद हुआ। श्रोताओं में ज्यादातर शब्दों का सफ़र के किसी न किसी रूप में पाठक ही थी। चाहे वे दैनिक भास्कर के नियमित स्तम्भ के पाठक थे या चर्चित ब्लॉग शब्दों का सफ़र के। पेश है दिवाकर पाण्डेय की रिपोर्ट
यायावर हैं शब्द, माँ जाई बहने हैं भाषाएं
हिन्दी भवन में पुस्तक मेले केदौरान लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित
भाषाओें का रिश्ता बहनों जैसा है और शब्द यायावर होते हैं। भाषा में शब्दकोष तो हैं पर उनकी व्युत्पति का कई कोश मुझे नहीं दिखाई दिया। इसी ने मुझे एक ऐसा कोश तैयार करने के लिए प्रेरित किया। यह बात लेखक-पत्रकार अजित वडनेरकर ने अपनी किताब शब्दों के सफर के लोकार्पण के दौरान कही।  शुक्रवार को हिन्दी भवन में राजकमल प्रकाशन की ओर से आयोजित पुस्तक मेले में लेखक से मिलिए कार्यक्रम के दौरान लोकार्पण किया गया। पुस्तक में शब्दों की रिश्तेदारी, उनका जन्म और वर्तमान स्वरूप के लंबे इतिहास की तर्कसंगत तरीके से पड़ताल की गई है। श्री वडनेरकर ने पुस्तक से संत शृंखला में लिखे आलेख कलंदर का पाठ भी किया। उन्होंने बताया कि इस पहले खण्ड में 10 पर्व और करीब 1500 शब्द शामिल हैं। उनकी योजना बोलचाल की भाषा क दस हजार शब्दों की व्युत्पत्ति और विवेचना कोश बनाना है। इस पुस्तक का दूसरा और तीसरा खण्ड भी लगभग तैयार हैं। लोकापर्ण करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार मंजूर एहतेशाम ने कहा कि इस पुस्तक में जिस तरह सभी भाषाओं को एक दूसरे के करीब बताया गया है, यह बहुत दिलचस्प है। हिन्दी-उर्दू को मिलाने का भी यह एक सकारात्मक प्रयास है। अध्यक्षीय भाषण में वरिष्ठ रंगकर्मी-नाटककार अलखनन्दन ने कहा कि जुदा करने वाली किताबें बहुत हैं और जोड़ने वाली कम। जो लोग साहित्य में शब्द की स्वतन्त्र सत्ता में विश्वास करते हैं वे इससे जान सकेंगे कि शब्दों के इतिहास के कितने आयाम हैं। उन्होंने पुस्तक में शब्दों के जन्मसूत्र और उनकी विवेचना शैली से प्रभावित होते हुए कहा कि इसके जरिए शब्दों के अलग अलग क़िरदार सामने आ रहे हैं, वे इसमें नाट्यतत्व की तलाश कर रहे हैं। संचालन कर रहीं कवयित्री सविता भार्गव ने पुस्तक के विभिन्न अंशों का उल्लेख करते हुए उनके रोचक इतिहास पर प्रकाश डाला। इस दौरान गीत चतुर्वेदी, विजय मनोहर तिवारी, मनीषा पाण्डेय, रवि रतलामी सहित कई साहित्य रसिक लोग उपस्थित थे। प्रकाशन के जनसम्पर्क अधिकारी रमण भारती ने बताया पुस्तक मेले में शनिवार क शाम 4 बजे मनोज सिंह के उपन्यास हॉस्टल के पन्नों सें पर गोष्ठी आयोजित की जा रही है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, December 15, 2010

शिमला में हिम की खोज

ज़रूर पढ़े-1.धरती का दुर्ग बचाएं... 2.लीला, लयकारी और प्रलय….3.काश ! चलते पहाड़...The_ridge
श ब्दों के बदलते प्रतिरूप आश्चर्यजनक तरीके से चौंकाते हैं। स्थाननामों की रचना में अक्सर वहाँ की भौगोलिक खूबियाँ महत्वपूर्ण होती हैं। पूर्वांचल के एक प्रांत का नाम मेघालय इसलिए है क्योंकि यहाँ अक्सर बादलों का डेरा रहता है। मेघ अर्थात बादल और आलय अर्थात घर। आलय यानी आश्रय। संस्कृत के लय का अर्थ है आराम करने की जगह जाहिर है दुनियाभर के आरामगाहों में घर को सबसे ऊँचा दर्ज़ा मिला हुआ है। इसी तर्ज़ पर हिमालय को देखें। हिम + आलय = हिमालय अर्थात वह स्थान जहाँ बर्फ़ का बसेरा हो। जहाँ हिम को आश्रय मिले वह है हिमालय। ठेठ पूर्वोत्तर का ही एक और प्रान्त है अरुणाचल प्रदेश। पूर्व दिशा सूर्योदय का प्रतीक है। अरुण का अर्थ होता है प्रातः की लालिमा, लाल रंग। अरुण सूर्य के सारथी का नाम भी है क्योंकि सूर्योदय से पहले उसकी लाल रश्मियों को थामने वाले अरुण के दर्शन होते हैं। यही नहीं, आप्टेकोश में सूर्य का एक पर्याय अरुण भी बताया गया है। संस्कृत में अचल का अर्थ होता है पर्वत। चल् धातु में गति का भाव है। निषेध या नकार की अर्थवत्त वाले अ उपसर्ग के लगने से अचल का अर्थ हुआ जो चलता न हो अर्थात जो स्थिर हो। इस तरह अचल में पर्वत या पहाड़ का भाव स्थिर होता है और अरुण + अचल = अरुणाचल का मतलब हुआ सूर्यपर्वत, सूर्योदय का प्रान्त अथवा वह स्थान जहाँ सबसे पहले सूर्य उगता है।
इसी कड़ी में आता है हिमाचल प्रदेश। अरुणाचल की तरह ही हिमाचल का अन्वय हुआ हिम + अचल = हिमाचल यानी वह प्रदेश जहाँ हमेशा बर्फ़ जमी रहती हो। यह आश्चर्य की बात है कि इस हिमप्रान्त की राजधानी शिमला के नाम के साथ बर्फ़ जैसा कोई शब्द चस्पा नहीं है। शिमला की व्युत्पत्ति श्यामला ( देवी ) से जोड़ी जाती है। श्यामला देवी दुर्गा का एक नाम-रूप है। भारत के ज्यादातर पर्वतीय शहरों की तरह ही शिमला का विकास भी अंग्रेजी राज में हुआ, मगर उनके आने से पहले भी यहाँ बस्ती हुआ करती थी जिसका नाम शिमला था। अठारहवीं सदी के दूसरे दशक में सतलुज घाटी के विस्तृत सर्वेक्षण कार्य के दौरान स्कॉटिश सर्वे दल ने पहाड़ियों से घिरे शिमला ग्राम को खोजा था। आमतौर पर शिमला का नाम श्यामलादेवी से जोड़ा जाता है जिनका प्राचीन मंदिर यहाँ है। 1822 में स्कॉटिश सिविल अफ़सर चार्ल्स केनेडी ने यहाँ अंग्रेज अधिकारियों के लिए पहली आरामगाह बनवाई थी। संस्कृत के श्याम शब्द का अर्थ काला, धूसर, गहरा भूरा या नीला होता है। श्याम यानी बादल भी और श्याम यानी शिव भी। श्याम से ही बना है श्यामा अर्थात काली रात, काली नदी, काली गाय, तुलसी का पौधा, मादा कोयल आदि। हिन्दी का साँवला शब्द भी इसी कड़ी का है और श्यामल > शामल > साँवल > के क्रम में साँवला हुआ। इसका स्त्री रूप साँवली होता है। श्यामल का स्त्री रूप श्यामला बनेगा। दुर्गा पर्वतवासिनी हैं और इसीलिए इन्हें पहाड़ाँवाली कहा जाता है। पर्वतीय स्थानों पर दुर्गा के विभिन्न नामोंवाले धाम मिलते हैं जैसे कालका जो हरियाणा में है। कालका शिमला रेलमार्ग प्रसिद्ध है। कालका भी देवी दुर्गा का ही रूप है जो श्यामवर्णी है। इसी तरह कई जगह चण्डीदेवी के मंदिर होते हैं। चण्डिका रौद्ररूपधारिणी दुर्गा हैं जिनका वर्ण श्यामल है। इसी तरह दुर्गा का सबसे प्रसिद्ध रूप काली का है। इन्हें कालिका भी कहते हैं जिसका अपभ्रंश ही कालका है। स्पष्ट है कि श्यामला में काले वर्णवाली कालिका का भाव ही है। 
भाषा वैज्ञानिक व्युत्पत्ति के हिसाब से डॉ रामविलास शर्मा शिमला के शिम में हिम देखते हैं। बर्फ़ के लिए कश्मीरी में शीन है जो हिमा का रूपान्तर ही है। उनका कहना है कि पूर्ववैदिक भाषाओं में हिम का रूप घिम था। स्लाव और केल्त भाषाओं के ध्वनिरूपों से तुलना करते हुए वे यह स्थापना देते हैं। लात्वियाई भाषा में हिम का एक रूप जीअँम है, लिथुआनी में यह झीअँम है। इसी तरह जब ज का अघोषीकरण हुआ तो पुरानी प्रशियाई में यह सॅमॉ हो जाता है। हिम का पूर्व रूप घिम है इसकी जानकारी इसके ग्रीक रूप खॅइम से होती है। सॅमॉ जैसे रूप से ही शिमला के शिम का विकास समझ में आता है। कश्मीरी में हिमभण्डार के लिए मॉन / मोनू शब्द भी है। संस्कृत में सर्दी के मौसम को हेमन्त कहा जाता है। यह हेम भी हिम् से ही आ रहा है। हेमन्त से त का लोप होकर पहाड़ी बोलियों में हिमन्, हेमन्, हिमान्, खिमान् जैसे रूप भी बनते हैं। सर्दी का, बर्फ़ीला  या शीत सम्बन्धी अर्थों में इन शब्दों का प्रयोग होता है। स्पष्ट है कि हिमालय से हिमाल रूप तो हिमाचली और नेपाली में भी बनते हैं। हिमाल का शिमाल और फिर शिमला रूपान्तर दूर की कौड़ी नहीं है। 

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 12, 2010

या इलाही ये मचाया क्या है?

logo_thumb20[2][8]इस बार रविवारी पुस्तक चर्चा में हमने विलियम डब्ल्यू हंटर के प्रसिद्ध दस्तावेज को शामिल किया है। यह पुस्तक क़रीब डेढ़ साल पहले हमने पढ़ी। वरिष्ठ पत्रकार और हमारे मित्र विजय मनोहर तिवारी वृहत्तर भारत के भूगोल, समाज व संस्कृति को मिली इस्लाम की नेमतों की पड़ताल में लगे रहते हैं, सो हमने तय किया कि इसकी समीक्षा वे ही लिखेंगे। पेश है विलियम हंटर की क़लम से निकला भारतीय मुसलमान का लेखाजोखा। किताब- भारतीय मुसलमान प्रकाशक-प्रकाशन संस्थान, 4715/21, दयानंद मार्ग, दरियागंज, नईदिल्ली-110002 फोन- 01123253234/65283371 अनुवादक-नरेश नदीम...

विजय मनोहर तिवारी

प हले किताब के बारे में। ‘भारतीय मुसलमान’-विलियम डब्ल्यू. हंटर का 190 पेज का जबर्दस्त दस्तावेज है। हंटर 1871 में बंगाल में आईसीएस अफसर थे। ङ्क्षहदी में किताब की शक्ल में आई उनकी इस रिपोर्ट का शीर्षक है-भारतीय मुसलमान।
WilliamWilsonHunter1Hunter, Sir William Wilson (1840-1900) a member of the Indian Civil Service, a great statistician and compiler, an imperial historian, and a man of letters with a wide range of interests in race, religion, philology, diplomacy and journalism.
तब के बंगाल-बिहार से लेकर पेशावर-काबुल तक के मुसलमानों की ब्रिटिश राजद्रोही गतिविधियों का एक लाइव दस्तावेज। इस बहाने मुस्लिम समुदाय के आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की पैनी पड़ताल। हंटर लिखता है-अंग्रेजों के राज में भारत मुसलमानों के लिए दारुल-हरब बन चुका था। हर दीनदार मुसलमान का फर्ज था कि वह इस हुकूमत को छोडक़र इस्लामी सल्तनत में चला जाए और बगावत करे। किताब का मूल विषय वहाबी आंदोलन के इर्दगिर्द है। बेशक इस किताब में पश्चिमी श्रेष्ठता का दंभ है लेकिन इस्लाम की मान्यताओं का बेबाक विश्लेषण भी। जब आप इस किताब में दर्ज राजद्रोही मुस्लिम किरदारों के क्रियाकलापों के बारे में पढ़ेंगे तो लगेगा कि बदला कुछ नहीं है।
आज के लश्करे-तोयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और सिमी जैसे संगठन कुछ अलग अंदाज में तब भी पूरी ताकत से हुकूमत और अवाम के सिर दर्द बने हुए थे। मुहर्रिर जाफर और इमाम याहया अली ऐसे ही दो किरदार हैं, जो लगातार मुस्लिमों को भडक़ाते रहते थे। इनके बारे में हंटर लिखता है-‘ये संजीदा और जमीर वाले लोग थे, जिन्होंने खुद को जहर भरे हथियार चुभो लिए थे, जिन्हें एक झूठे धर्म ने उनके हाथों में थमा दिया था।’ बंगाल-बिहार पर केंद्रित इस किताब से उस समय के मुसलमानों की मानसिक स्थिति का भी अंदाजा होता है। एक ऐसी कौम जो सात सौ सालों से हुकूमत में थी। अब अंग्रेजों के हाथों बेदखल हो चुकी थी। अग्रेजों के आने से सदियों से गुलामों सी जिंदगी जी रहे हिंदुओं को जैसे ऑक्सीजन मिली थी। बहुसंख्यक आबादी को नई तालीम, नए तरीके और नई उम्मीद पैदा हुई थी। हिंदु कौम को जैसे लंबी नींद से जागने और मजहब के नाम पर थोपी जाती रही बंदिशों से बाहर आने का मौका मिला। मुसलमानों को लगा कि हिंदू अंग्रेजों से मिल गए हैं। दूरियां तो दोनों के बीच पहले दिन से ही थीं। हिंदुओं को अंग्रेजों का आसरा मिलते ही और बढ़ गईं। हंटर कहता है-वे काफिर हिंदुओं को एक हलाल के रूप में देखते हैं। उनके अस्तित्व का औचित्य ही काफिरों के खिलाफ जेहाद छेडऩा है। उनमें यह भाव पैदा हो हुआ है कि उनकी सारी नेमतें हिंदुओं के हाथों में चली गई हैं।
1793 में अंग्रेजों ने प्रशासनिक बदलाव तेज किए। मुसलमान मालगुजारों की जगह कलेक्टर आ गए। इससे शाही मुस्लिम घरानों की दबंग दुकानों पर ताले डलने लगे। यह उनके आर्थिक हितों पर सबसे बड़ी चोट थी। लेकिन मुस्लिम बदलते वक्त की जरूरतों को न समझ सके, न अपना सके। अवसाद ने उन्हें आक्रामक बनाया। वे अंग्रेजों के खिलाफ उबलते रहे। कर वसूली की सात सौ साल पुरानी मनमानी व्यवस्था से बेदखल होने से भूखों मरने की नौबत आ गई। रस्सी जल चुकी थी। ऐंठन बरकरार थी। पहले क्या व्यवस्था थी? राजस्व वसूलने वाले मालगुजार मुसलमान, फौज और पुलिस के सिपाही मुसलमान, जेलों के अफसर मुसलमान और इंसाफ की अदालतें भी काजियों के हाथ में। प्रशासन का हर काम ddwivedi 10.11.2010 024उन्हीं की भाषा में पर अब वे सब तरह के शाही हकों से महरूम हो चुके थे। इनकी जगह अंग्रेज आते जा रहे थे। इस वर्चस्ववादी व्यवस्था को हंटर कहता है-अपमानयोग्य लूटपाट के विशेषाधिकारों की सदियों से अभ्यस्त रह चुकी एक नस्ल। पहले 50 साल तक तो अंग्रेजों ने फारसी से ही अपना कामकाज चलाया। बाद में जनता की भाषा में सार्वजनिक कार्य करने का फैसला लेकर ङ्क्षहदी-अंग्रेजी को बढ़ावा दिया। दस सालों में ही नजारा बदल गया। बड़े पदों पर सदियों बाद हिंदुओं की ताजपोशी देखी गई।
1869 के आंकड़े किताब में इस दिलचस्प फर्क का खुलासा करते हैं। सरकारी विभागों में मुसलमानों की तुलना में हिंदू कई गुना बढ़ गए थे। ङ्क्षहदुओं ने अपने लिए इस अवसर को हाथोंहाथ लिया और आगे बढ़ गए। हंटर ये आंकड़े पेश करते हुए चुटकी लेता है-हिंदुओं की बुद्धि ऊंचे दरजे की है। इसके ठीक सौ साल पहले हालत उलटी थी। राज्य के सभी अहम ओहदों पर मुसलमानों का सुरक्षित एकाधिकार था। पिछले विजेता अपनी मेज से जो टुकड़ा गिरा देते थे उन्हीं को हिंदू आभार भाव से स्वीकार करते थे। हंटर इस सामाजिक बदलाव का श्रेय खुद लेते हुए लिखता है-हमारी लोकशिक्षण प्रणाली ने हिंदुओं को सदियों की नींद से जगाया है। पुरानी विजेता नस्ल खुमारी में बरबाद होती गई। ङ्क्षहदुओं को संभलने का एक मौका मिल गया। हिंदुओं ने अंग्रेजी सीखी, लेकिन मुसलमानों ने इससे परहेज किया। मुसलमानों ने बुतपरस्तों की भाषा में तालीम हासिल करने से इंकार कर दिया। यह फर्क इतना बड़ा था कि 1860-62 में सरकारी स्कूलों में सौ ङ्क्षहदू विद्यार्थियों के मुकाबले सिर्फ एक मुसलमान बच्चा देखा गया।
आपस में बटे हुए, सामने मंडराते खतरों से बेखबर और अपने ऐशो-आराम में मस्त तब के भारत के स्वदेशी राजाओं को महलों और राजसत्ताओं से बेदखल किया गया था। बंगाल-बिहार में यह सिलसिला बख्तियार खिलजी के समय शुरू होता है, जिसने 1193 में दुनिया भर में बेजोड़ नालंदा विश्वविद्यालय को आग लगाकर मिट्टी में मिला दिया था। तब बंगाल और बिहार अलग नहीं थे। बख्तियार यहां का पहला मुस्लिम सुलतान हुआ। पूरे हिंदुस्तान की तरह यहां भी बख्तियार ने सिर्फ सत्ता पर ही कब्जा नहीं किया। तलवार और आतंक के जोर पर जबरिया धर्म परिवर्तन की कहानी यहां भी उसी जोर से दोहराई जाती रही, जैसी बाकी ङ्क्षहदुस्तान ने भोगी। बख्तियार के बाद बंटवारे के साथ भारत को मिली आजादी तक आते-आते यहां 587 सालों में 110 सुलतानों और नवाबों की लंबी सूची है। इनमें 1717 से 1887 तक रहे 17 नवाब शामिल हैं। मुमकिन है बख्तियार के सौ-दो सौ साल बाद यहीं की धर्मांतरित नस्लों के लोग नए नामों और नई पहचान से हुकूमत में आते रहे और अपनी वंश बेल अरब और तुर्क से जोडक़र खुद गुमराह होते रहे। मीर कासिम और मीर जाफर जैसे नाम बहुत बाद के हैं। इनके समय अंग्रेज अपनी जड़ें जमा चुके थे।
इतने फैलारे के बाद ऐसे मुश्किल हालातों में 1786 में रायबरेली में सैयद अहमद नाम का एक शख्स पैदा होता है। लुटेरों के गिरोह में खान पिंडारी का एक सैनिक बनकर वह सामने आता है। 1816 में लूटमार का पेशा छोडक़र वह दिल्ली में शरियत की तालीम लेने जा पहुंचता है। तीन साल बाद इस्लाम का प्रचारक बनकर अपने चेलों के एक झुंड के रूप में प्रकट होता है। वह दक्षिण भारत की सैर करता है। पटना में ठौर बनाता है। अपना नेटवर्क आज के लश्कर, हिजबुल, जैश और सिमी की तरह फैलाता जाता है। 1822 में वह हज का सफर तय करता है। बंबई लौटकर अपने नए समर्थक तैयार करता है। 1824 में ब्रिटिश हुकूमत उसे पेशावर में सिखों के खिलाफ जेहाद करते देखती है। वह पठान कबीलों में जेहाद का जोश भरने में अपनी पूरी ताकत लगा देता है। उसका दावा है कि काफिरों को खत्म करने के लिए उसे अल्लाह ने नियुक्त किया है। बाकायदा 21 दिसंबर 1826 को वह जेहाद शुरू भी कर देता है।
a1884हंटर का यह दस्तावेज पढ़ते हुए लगता नहीं कि यह 140 साल पुराने हिंदुस्तान के एक दौर की बात हो रही है। वही ताकतें कुछ दूसरे अंदाज में और ज्यादा जोर से हमारे आसपास अब भी हमारी आस्तीनों में रेंग रही हैं। खंडित होकर मिली आजादी के बाद बचे-खुचे भारत में काश्मीर को देखिए और उत्तर-पूर्व में बढ़ते घुसपैठियों की गतिविधियों पर गौर कीजिए।
पांच साल तक उसके कत्लेआम के किस्से रोंगटे खड़े करते रहते हैं। आखिरकार 1831 में सिखों की एक जांबाज फौज उसे उसी अल्लाह के पास भेज देती है, जिसने उसे काफिरों के खात्मे के लिए धरती पर भेजा था।
हंटर की किताब ऐसे तमाम किरदारों से रूबरू कराती है। इनमें पटना के इनायत अली और विलायत अली भी शामिल हैं। ये पंजाब में गाजियों के नाम से मशहूर थे। बंगाल में इनकी जिहादी गतिविधियों ने 1850-51 में ब्रिटिश हुकूमत की नाक में दम कर रखा था। इन्हें वापस पटना भेज दिया गया। पटना मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट में इनके क्रियाकलाप दर्ज हैं। यह रिपोर्ट पटना के किन्हीं अहमदुल्ला साहब के बारे में फरमाती है कि इन हजरत ने अपने घर में करीब 17 सौ लोगों को पनाह दे रखी थी। ये सभी हथियार बंद लोग थे और अदालत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष के लिए रखे गए थे। यह नेटवर्क मुस्लिम आबादी को फिरंगियों के खिलाफ दारुल-हरब के नाम पर लगातार भड़ाकाता रहता था और नौजवानों को सरहदों की तरफ जारी लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित करता था। गुमराह लोगों के जत्थे मजहब के नाम पर रास्तों में लगातार नजर आते थे। इनसे निपटने के लिए सरहदी सूबों पर अंग्रेजों को 1850-1863 के बीच एक लाख सैनिक जुटाने पड़े थे। इस फौज ने तब के इन इस्लामी पहरेदारों के खिलाफ 36 बड़े अभियान चलाए थे।
जुलाई 1864 में अम्बाला के जज हरबर्ट एडवर्ड्स ने 11 राजद्रोही मुसलमानों के एक लंबित प्रकरण का फैसला सुनाया था। इनमें संपन्न मुस्लिम परिवारों के ठेकेदार, फौजी, इमाम, प्रचारक और किसान सभी थे। आठ को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी। बंगाल, बिहार से लेकर पंजाब और पेशावर तक फैले इन असंतोषी मुस्लिम नेटवर्क ने लंबी-लंबी जोशीली कविताएं रचीं थीं। इनका हर अलफाज जिहाद के जज्बे और जोश से भरा हुआ है। ये रचनाएं मुस्लिम आबादियों में बांटी जाती थीं। इनमें ब्रिटिश सत्ता के पतन की कामनाएं और इस्लामी झंडे के फिर से फहराने की उम्मीदें भरी होती थीं। हंटर ने ऐसी कुछ रचनाओं का अनुवाद पेश किया है। थानेश्वर का मुहर्रिर जाफर एक ऐसा ही शख्स था, जो जिहादी प्रचारक बन गया था। उसने बाकायदा जिहाद के सिद्धांत दर्ज किए। यह दस्तावेज तब जाफर के मशविरे के नाम से मशहूर हुआ था। इस नेटवर्क में खुफिया कोड वर्ड भी प्रचलित थे। पटना का मौलवी याहया अली प्रचार केंद्रों को छोटा गोदाम और इस्लामी हुकूमत की सरहदों को बड़ा गोदाम कहा करता था। हंटर इन किरदारों और उनके क्रियाकलापों के जरिए इनकी जड़ों में भी जाता है। वह कहता है-इस्लामी शासन बहुतों की रक्षा करने का नहीं बल्कि कुछ को अमीर बनाने का साधन था। दौलत के तीन धारे उनके कब्जे में थे। फौजी कमान, राजस्व वसूली, अदालतें और सरकारी नौकरियां। इन पर मुस्लिमों के कब्जे थे। वित्त विभाग के ऊंचे पदों पर मुसलमान हर जगह काबिज थे। किसानों से सीधा ताल्लुक रखने का जमीनी काम जरूर हिंदू कारिंदों के हाथ में था।
हंटर का यह दस्तावेज पढ़ते हुए लगता नहीं कि यह 140 साल पुराने हिंदुस्तान के एक दौर की बात हो रही है। वही ताकतें कुछ दूसरे अंदाज में और ज्यादा जोर से हमारे आसपास अब भी हमारी आस्तीनों में रेंग रही हैं। खंडित होकर मिली आजादी के बाद बचे-खुचे भारत में काश्मीर को देखिए और उत्तर-पूर्व में बढ़ते घुसपैठियों की गतिविधियों पर गौर कीजिए। संसद, मुंबई, जयपुर, वनारस पर हुए आतंकवादी हमलों की तह में जाने की कोशिश करिए और लश्कर, जैश, हिजबुल व सिमी जैसे संगठनों के नेटवर्क पर भी नजर दौड़ाइए। यह सवाल आपके जेहन में जोर मारेगा कि या इलाही ये मचाया क्या है?

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 10, 2010

कुलचे की कुलाँचें

onion_kulcha

रो टियों की जितनी भी क़िस्में हैं उनमें कुलचा का अपना अलग रुतबा है। सामान्य चपाती, नान या तंदूरी रोटी की बनिस्बत इसका आकार थोड़ा छोटा होता है मगर ज़ायका लाजवाब। कुलचा मैदे को थोड़े दही और पानी के साथ गूंधे हुए आटे से बनी एक क़िस्म की ख़मीरी रोटी है जिसका स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें कुचले हुए उबले आलू भी भर लिए जाते हैं। कुलचा मूलतः ईरान की देन है। कई लोग मानते हैं कि इस्लामी दौर में भारतीय खान-पान के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया मगर कुलचा जैसी खान पान की और भी कई चीज़े हैं जो भारत में इस्लाम के आगमन से पहले से प्रचलित थीं क्योंकि भारत और ईरान के बीच धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक रिश्तेदारी की जड़ें बहुत गहरी हैं पंजाब में कुलचा खूब खाया जाता है वजह है किसी ज़माने में वृहत्तर भारत के इस हिस्से से फ़ारस की सीमा शुरू हो जाती थी। पश्चिमोत्तर भारत से लेकर ठेठ अरब तक तंदूरी खाने का चलन रहा है।
जिसे भारतीय भाषाओं में कुलचा कहा जाता है दरअसल फ़ारसी ज़बान में वह कुलीचः या कुलीचा है। मूल आहार के रूप में वृहत्तर भारत में जो भी पदार्थ खाए जाते हैं उनका संबंध गोलाई से रहा है चाहे वह रोटी हो या बाटी। कुलचा भी इसी श्रेणी में आता है। संस्कृत-हिन्दी के वृत्त, रोटी और अंग्रेजी के रोटेशन, राऊंड या रोटरी जैसे शब्दो पर गौर करें तो इनमें दिलचस्प रिश्तेदारी सामने आती है। न सिर्फ ये सभी शब्द गोलाई का भाव लिए हुए हैं बल्कि ये सभी इंडो-यूरोपीय आधार से निकले हैं। गौरतलब है कि घूमने-फिरने, चक्कर लगाने या गोलाकार आदि भावों के लिए संस्कृत में वृत् धातु है जिससे वृत्त बना। इसका रिश्ता ऋ से है जिसमें चक्रगति का भाव है। ऋतुओं के क्रमविन्यास में यह चक्र पूरी तरह समझ में आता है। ऋ का रिश्ता ही वृ से है जिससे वृत्त बनता है। रित् का एक रूप रट्ट् भी रहा होगा जिसमें भी गोलाई का भाव होगा। इसका ही विकास संस्कृत के रोटिका में हुआ जिसका अर्थ आटे से बनी गोल आकार की टिकिया है। रोटिका यानी अनाज के आटे से तवे पर सेंकी गई गोल गोल पतली, चपटी टिकिया।
वृत्-वर्त-रथ के ही क्रम में ही थोड़े ध्वनि परिवर्तन के साथ वल्, वल, वलनम वेल्लन, वेल्लनम् जिनमें मुड़ना, घूमना, सरकना, लुढ़कना आदि भाव आते हैं। इन्हीं में कहीं हम बेलन को सहजता से पहचान सकते हैं जिसमें गोल घूमने का भाव है और इसी घूमाव से रोटी गोल होती है। जब इसे चपटा बनाया जाने लगा तो इसे चर्पटी कहा गया जिसका रूपान्तर है चपाती जिसे परखने में स्वाद का जितना महत्व है उससे कहीं कमतर नहीं है उसकी गोलाई का परीक्षण। यही बात फुलका में है। जैसा कि नाम से जाहिर है यह कि तवे या सीधीं आंच पर सिंकने की वजह से गर्म भाप भर जाने से रोटी फूल जाती है इसी वजह से इसे फुलका भी कहते हैं। जाहिर है जबतक इसमें भाप है तब तक ही यह फुलका है, बाद में यह सामान्य चपाती या रोटी ही कहलाएगी। गर्मागर्म खाने में ही फुलके का आनंद है। फुलका शब्द का जन्म हुआ है संस्कृत की फु धातु से जिसका मतलब है फुलाना, फूंक मारना आदि। सीधी सी बात है फूलने की क्रिया चारों तरफ़ होती है जिसका रिश्ता गोलाई से ही है।
संस्कृत के गोलः का अर्थ होता है पिंड, गेंद, खंड आदि। प्राचीनकाल से ही मनुष्य प्रकृति चिंतन करता था। पृथ्वी, आकाश, अंतरिक्ष आदि के बारे में मौलिक विचार वह रखता था। इसीलिए गोलः शब्द में अंतरिक्ष, आकाश अथवा भूगोल जैसे अर्थ भी समाहित हैं। गोलः शब्द बना है गुडः से जिसका मतलब भी होता है पिंड या पिंड बनाना, गोल आकार देना। गुड का एक अन्य अर्थ गुड़ भी होता है जो अपनी निर्माण प्रक्रिया के दौरान गोल पिण्ड के रूप में सामने आता है। इस गोल की व्याप्ति ईरानी परिवार में भी हुई। फारसी में संस्कृत की तरह ही गोलः विद्यमान है। इसे चाहें तो गोलह् या गोला कह सकते हैं जिसका अर्थ है गोल, घुमावदार वस्तु जिसमें तोप में भरा जाने वाली बारूदी सामग्री भी शामिल है। । फारसी-ईरानी की
paneer-kulcha-recipe33फ़ारसी के कुलीचः की व्याप्ति हिन्दी-पंजाबी के अलावा कई अन्य भाषाओं में भी हुई है जिसमें पूर्वी यूरोप की कुछ भाषाएं भी हैं। चंगेज़ख़ान ने एशिया की सरहदें लांघते हुए पूर्वी यूरोप तक अपना साम्राज्य फैलाया था।
विभिन्न शैलियों में बरास्ता अवेस्ता के गुडे से बने कुछ रूप देखिये-गुलूले, गुल्ले, गोरूक, गुल्लू, गुला आदि। इंडो-ईरानी और इंडो-यूरोपीय भाषा परिवारों में क और ग वर्ण आपस में बदलते हैं। फ़ारसी में ग वर्ण से जुड़े गोल के विभिन्न रूपों के साथ ऐसे शब्द भी हैं जिनमें क वर्ण है और उनमें गोलाई का भाव है जैसे कुलालः या कुलीचः। इस कुलीचः के कुल में मूलतः गोलः को झाँकते साफ़ पहचाना जा सकता है। हिन्दी शब्द सागर में कुलीचः का एक अन्य अर्थ भी बताया गया है- तंबू या खेमे के डंडे के ऊपर का गोल लट्टू। यहाँ भी गोलाई वाला भाव या गुण ध्यान देने लायक है।
फ़ारसी के कुलीचः की व्याप्ति हिन्दी-पंजाबी के अलावा कई अन्य भाषाओं में भी हुई है जिसमें पूर्वी यूरोप की कुछ भाषाएं भी हैं। चंगेज़ख़ान ने एशिया की सरहदें लांघते हुए पूर्वी यूरोप तक अपना साम्राज्य फैलाया था और उसी के साथ कुलाँचे भरता कुलचा भी वहाँ तक जा पहुँचा था।  आज के हंगरी तक उसका कब्ज़ा था। हंगारी भाषा में डबलरोटी जैसी एक चीज़ का नाम है कुलाश जिसमें कुलचा को साफ़ पहचाना जा सकता है। सर्बियाई, क्रोशियाई और लात्वियाई में यह कोलाच्श है जिसका अर्थ है सफ़ेद ब्रेड। इसी तरह पर्शियन में इसका रूप गुलीचा या गुलज भी मिलता है जिसका अर्थ है शहद, तिल के तेल और अण्डे के साथ मिलाकर बनाई गई ख़मीरी रोटी। इसी तरह विश्व मानचित्र में साइबेरिया के धुर पूर्वी छोर पर उत्तर ध्रुवीय सागर के कामचट्का क्षेत्र जहाँ साल भर बर्फ़ रहती है और तापमान शून्य से तीस डिग्री तक नीचे होता है वहाँ की चुक्ची भाषा में भी भाषा वैज्ञानिकों ने किज़लात शब्द की पहचान की है जिसका अर्थ है गुंधा हुआ आटा। इसकी रिश्तेदारी कुलीचः से जोड़ी गई है। पर्शियन में कुलीचा ए सिम का अर्थ है पूर्णचंद्र यानी पूनम का चांद। इसी तरह कुलीचापाज का मतलब है कुलचे बनाने वाला रसोइया।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, December 8, 2010

तेल की बोतल से गंगाजली तक

db_Leather_Bottle_10249

आ मतौर पर हिन्दी का कुप्पी शब्द सबने सुना होगा। इसका दो तरह से प्रयोग होता है। फनल या कीप को भी कुप्पी कहते हैं जिसका एक सिरा चौड़ा होता है तथा दूसरा सिरा पतला होता है। शंक्वाकार आकृति का यह उपकरण आमतौर पर संकरे मुंह वाले बर्तनों या शीशियों में द्रव पदार्थ भरने के काम आता है। इसी तरह कुप्पी का दूसरा अर्थ है तरह पदार्थ (आमतौर पर तेल) का भंडारण करनेवाला पात्र। मिट्टी के तेल की कुप्पी समेत गंगाजल की कुप्पी भी होती है। कुप्पी शब्द की निरुक्ति कूप से जोड़ा जाता है। हिन्दी का कुँआ इसी कूप से बना है। संस्कृत का कूप शब्द बना है कु धातु से। यह वही धातु है जो संस्कृत-हिन्दी का प्रसिद्ध उपसर्ग भी है। आप्टे कोश के मुताबिक खराबी, ह्रास, अवमूल्यन, पाप या ओछापन जैसे भावों को अभिव्यक्त करने के लिए इस उपसर्ग का प्रयोग होता है जैसे कुरीति, कुलटा, कुमार्ग, कुचाल, कुतर्क, कुरूप, कुदृष्टि आदि। कूप में इसी कु की छाया इसमें निहित कमी वाले भाव से उपजी है। कूप में गहराई होती है जिसमें नीचाई, ह्रास, गिरावट, अवतल होने का भाव है।
कूप शब्द का अर्थ है गहरा चौड़ा छिद्र, एक चौड़ा गड्ढा, गह्वर, नाभिछिद्र आदि। कूप से हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में कई शब्द बने हैं जैसे कुइयां, कुई, कुआं आदि। हमारे यहां कहावत है- बहता पानी निर्मला यानी पानी में अगर धार है, गति है तो वह शुद्ध रहता है, उसकी जीवनदायिनी शक्ति सुरक्षित रहती है। रुके हुए जल को अशुद्ध समझा जाता है। इस तरह देखें तो कुएं का पानी तो बहता नहीं, फिर भी कुओं का पानी पिया जाता है। दरअसल कुओं से लगातार पानी उलीचने से उसके भीतर भूगर्भीय जलस्त्रोत से ताजा पानी लगातार आता रहता है। कूप में निहित चौड़ेपन का भाव कुप्पा शब्द में उजागर हो रहा है। पुराने ज़माने में चमड़े से बना चौड़े आधार वाला एक पात्र होता था जिसमें तेल रखा जाता था। फूल कर कुप्पा होना हिन्दी का एक आम मुहावरा है जिसमें अत्यंत खुशी से मुदित होने और आत्मप्रशंसा के वचन कहने का भाव है। इसी तरह कुप्पा होना में मोटा होना, या शरीर पर चर्बी बढ़ने का भी भाव है। कुआं से जुड़े कुछ और मुहावरे हैं जैसे कुआं खोदना यानी किसी को हानि पहुंचाने की योजना बनाना या नुकसान करना। इधर कुआं, उधर खाई का मतलब होता है चारों तरफ से आफत आना या समस्याओं से घिर जाना। सीमित किन्तु मनोनुकूल विकल्प न होने के
cw_leather_water_bottleकुप्पी का प्रयोग निश्चित ही प्राचीनकाल में खाद्य तेल के बर्तन की तरह ही होता रहा होगा। आधुनिक काल में जब मिट्टी के तेल का पता चला तो केरोसिन की कुप्पी या मिट्टी के तेल की कुप्पी जैसे प्रयोग भी होने लगे।
अर्थ में भी इसका इस्तेमाल होता है। कुएं में गिरना या कुए में धकेलना यानी मुसीबन में पड़ना या मुसीबत में डालना।
यूँ कुप्पी का कूप से रिश्ता चाहे आसान लगता हो मगर इसकी एक अन्य  व्युत्पत्ति भी सम्भव है। क़रीब दो हज़ार साल पूर्व विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक अमरसिंह कृत अमरकोश में कुतुपः नाम के एक पात्र का उल्लेख मिलता है जिसका प्रयोग तेल रखने के लिए किया जाता था। गौरतलब है कि कुप्पी शब्द का प्रयोग आज के दौर में भी तेल रखने के पात्र के रूप में ही होता है। तेल की कुप्पी जैसा पद इसे सिद्ध करता है। अमरकोश के वैश्यवर्गीय शब्दों में कुतूः का उल्लेख है जिसका अर्थ स्नेहपात्रम् बताया गया है। संस्कृत में स्नेह या स्नेहक का अर्थ चिकनाई भी होता है और तेल भी। दोनों के गुण एक ही हैं। यह पात्र चमड़े से बना होता था। अमरकोश में इसे बड़ा तैलपात्र बताया है। कुतूः से ही बना कुतुपः  जिसका अर्थ भी चमड़े का तैलपात्र या कुप्पा है मगर इसका आकार छोटा होता है।  इस कुतुपः में त का लोप होने से भी कुप्पी का विकास सम्भव है। कुप्पी का प्रयोग निश्चित ही प्राचीनकाल में खाद्य तेल के बर्तन की तरह ही होता रहा होगा। आधुनिक काल में जब मिट्टी के तेल का पता चला तो केरोसिन की कुप्पी या मिट्टी के तेल की कुप्पी जैसे प्रयोग भी होने लगे। बाद में तीर्थयात्रियों को धातु के बड़े पात्रों में गंगाजल लाना महँगा और श्रमसाध्य होने लगा तो प्लास्टिक की गंगाजलियाँ भी बनने लगीं जिन्हें गंगाजल की कुप्पी भी कहा जाता है। गाँवों में इन्हें सिर्फ़ पानी की कुप्पी ही कहते हैं।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, December 6, 2010

क़िबला की क़ाबिलियत और क़बीला


हि न्दी चाहे भारोपीय भाषा परिवार की भाषा हो पर इसमें दीगर भाषा परिवारों के शब्दों की आमद भी भारी तादाद में हुई है। द्रविड़ भाषा परिवार हालाँकि भारत में बोली जाने वाली बोलियों से संबंधित ही है फिर भी हिन्दी में तमिल, तेलुगू, कन्नड़ अथवा मलयालम भाषा की तुलना में सेमिटिक भाषा परिवार की अरबी भाषा से आए शब्दों की तादाद कहीं ज्यादा है। हिन्दी का क़ाबिल शब्द भी ऐसा ही एक शब्द है जो बोलचाल की भाषा में बीती कई सदियों से हिन्दी का अपना शब्द बन चुका है। क़ाबिल यानी योग्य, कुशल, दक्ष, विद्वान, होशियार, बुद्धिमान और समझदार। हिन्दी में नुक़तों का चलन नहीं है मगर अरबी क़ाबिल में नुक़ता लगता है। क़ाबिल से ही बनता है क़ाबिलियत जिसका अर्थ विद्वत्ता, बुद्धिमानी, योग्यता, समझदारी है। इसी तरह स्वीकार, मंजर या किसी बात की अनुमति मिलने के संबंध में हिन्दी में क़बूल शब्द भी हिन्दी में प्रचलित है। इसका क़ुबूल रूप भी चलता है। क़ाबिल और क़ुबूल में रिश्तेदारी है और ये दोनों सेमिटिक धातु क़-ब-ल q-b-l से जन्में हैं।
क़-ब-ल q-b-l में मूलतः स्वीकार का भाव है। अरबी में इससे क़बूलियत भी बना है जिसका अर्थ है स्वीकृति अथवा मंज़ूरी मगर यह हिन्दी में कम चलता है। हिन्दी ने कबूल से कबूलना जैसा शब्द भी बना लिया है। स्वीकार के अलावा इस धातु में निकटता, सामीप्य, विनम्रतापूर्वक लेना या पाना जैसे भाव भी हैं। इन भावों का विस्तार क़ाबिल में नज़र आता है। बिना ज्ञानार्जन के योग्यता नहीं आती। ज्ञान को सविनय हासिल करना पड़ता है। जिसे मन, वचन और कर्म से सिद्ध कर लिया जाए, वही विद्या सार्थक होती है। सो क़ाबिल में क़-ब-ल धातु के सभी भाव निहित हैं। क़ाबिलियत के लिए क़बूलियत ज़रूरी है। जो योग्य है वही समर्थ है। सामर्थ्यवान व्यक्ति का समाज में मान-सम्मान होता है। क़ाबिल आदमी का यश होता है। इस धातु से कुछ अन्य शब्द भी निकले हैं जैसे इक़बाल जिसे हिन्दी में इकबाल कहा जाता है जिसे हिन्दी-
क़ाबाउर्दू में दो तरह से बरता जाता है। इकबाल का एक अर्थ है प्रसिद्धि, तेजस्विता, समृद्धि, प्रताप आदि। हुज़ूर का इकबाल बुलंद हो जैसी मुहावरेदार अभिव्यक्ति में इसे हम सबने जाना-समझा है। इसी तरह इकबाल का एक अर्थ स्वीकृति, मंजूरी भी है जिसे भारतीय अदालतों के प्रसिद्ध वाक्य इकबाल ऐ जुर्म के जरिए समझा जा सकता है जिसका मतलब है दोष या अपराध की स्वीकारोक्ति। इकबालिया बयान भी ऐसा ही पद है जिसका अर्थ भी स्वीकारोक्ति ही है।
क़बीला भी इसी कड़ी का शब्द है और सभी हिन्दी भाषी इससे परिचित हैं और इसका इस्तेमाल करते हैं। क़बीला यानी जनजातीय समूह। इसका अर्थ वंश, कुल या जाति संघ भी होता है जो कहीं निवास करता हो। स्थापन, आबादी, मानव समूह, डेरा, वासस्थान आदि।  कबीला के तौर पर जो कल्पना उभरती है वह आदिम संस्कृति वाले सामाजिक समूह या जंगली समुदायों की होती है। मगर ऐसा नहीं है। कबीला दरअसल एक जनजातीय समूह है। प्राचीन अरब में इसका यही अर्थ था जब सुदूर रेगिस्तानी अंचलों में बेदुइनों के समूह अपने मवेशियों के साथ विचरण करते थे। अपनी विशिष्ट जातीय और सांस्कृतिक पहचानों के साथ इधर से इधर घूमनेवाले समूहों को क़बीला कहा जाता था। क़बीला का बहुवचन है क़बाइल। इसी से बना है क़बायली या क़बाइली। भारत में आमतौर पर पश्चिमोत्तर पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों को क़बायली कहा जाता रहा। ये इलाके अब पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में आते हैं। भाषा विज्ञानी क़बीला शब्द की व्युत्पत्ति भी क-ब-ल धातु से मानते हैं मगर वे क़बीला मे निहित समूहवाची भाव की तार्किकता इस धातु में निहित मूलार्थ अर्थात स्वीकार में नहीं देखते। मुझे लगता है यह कठिन नहीं है।
क़बीला शब्द में भी क़-ब-ल q-b-l धातु में निहित स्वीकार्यता के भाव का विस्तार हुआ है। एक ऐसा समूह जहाँ सब एक दूसरे से रक्त संबंध, आचार-व्यवहार और रिश्तों से जुड़े हैं वहाँ वास्तव में एक दूसरे के प्रति व्यापक स्वीकार्यता का भाव सहज ही विकसित होता है। व्यापक स्वीकार्यता के बिना मनुष्य में सामाजिक प्राणी होने का गुण विकसित नहीं हो सकता था। समूह का अस्तित्व ही स्वीकार्यता पर निर्भर है। शब्दकोशों में भी जनजातीय मनुष्यों के ऐसे समूह को क़बीला कहा गया है जहाँ एक व्यक्ति को अपना सरदार मानते हों। यहाँ भी स्वीकार्यता का भाव है। मगर समूह के तौर पर क़बीला का अर्थ है ऐसा समूह जहाँ आचार-विचार और विशिष्ट सांस्कृतिक बंधन में सब बंधे हों अर्थात जनजातीय नियमों की स्वीकार्यता पर टिका समूह ही क़बीला है।
इसी मूल से जन्मा एक और शब्द है किबला जो अरबी में किब्लः है। अरबी किबला का प्रयोग हिन्दी उपन्यासों, कहानियों, नाटकों और फिल्मों में आदरणीय व्यक्ति के प्रति नाटकीय अभिव्यक्ति करने के सिलसिले में हमने इसका इस्तेमाल खूब देखा है। किबला में काबा का भाव है अर्थात वह स्थान जिस ओर मुँह करके इस्लाम को माननेवाले अल्लाहताला की आराधना करते हैं। अरबी में इसे किबलाह भी लिखा जाता है। q-b-l धातु से जन्में क़िबला के मूल भाव को समझने के लिए भी q-b-l के स्वीकार वाले भाव को याद रखना होगा। अरब के क़बीलों में इस्लाम के जन्म से पहले भी ईश्वर की मौजूदगी थी जिसे अरबी में ही अल्लाहताला कहा जाता था। पहले ये तमाम क़बीले मूर्तिपूजक थे और सबके अपने अपने, विशिष्ट मुखाकृति वाले देवी-देवता थे। इसके बावजूद इस समाज में एक सर्वोच्च देवता की भी कल्पना थी जिसे ये अल्लाहताला कहते थे। अरबी क़बीलों में साल में एक बार मक्का स्थित काबा जाना ज़रूरी था। दरअसल यह तीर्थयात्रा थी। यह काबा उसी सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक था। मुहम्मद साहब ने नया मज़हब चलाने के बावजूद, इस्लाम क़बूल कर चुके अरबी क़बीलों की आस्था का ख्याल करते हुए काबा जाने की रिवायत को ख़त्म नहीं किया और खुद भी वहाँ की यात्राएँ कीं।
क़बीरबानी में किबला का उल्लेख आया है। कबीर ने कहा है- मन करि मका कबिला करि देही… अर्थात अपने मन को मक्का और शरीर को किबला मानने में ही भलाई है। क़-ब-ल में निहित स्वीकार्यता का भाव किबला में स्पष्ट होता है। किबला वह जिसे सब स्वीकार करें। सर्वशक्तिमान, स्वामी, सर्वोच्च और स्वयंभू। काबा का पत्थर भी  किबला है और काबा की दिशा भी क़िबला। दुनियाभर में मुस्लिम जिस स्थान पर मक्का की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ते हैं, उसे किबला कहते हैं। मस्ज़िद के भीतर वह मेहराब जिसकी ओर मुँह करके अल्लाह को याद किया जाता है,  किबला कहलाती है। समाज का हर वह व्यक्ति जो बुजुर्ग है, जिसका मान है, वह व्यक्ति जो अधिकारसम्पन्न है किबला सम्बोधन के लायक़ है। पहले मुस्लिमों और यहूदियों में मधुर संबंध थे। यहूदियों के आदरणीय रब्बी इब्राहीम को ही काबा का संस्थापक माना जाता है। प्राचीन काबा मे लात-मनात- सुवाअ-उज्जा, यउक-यगुस-नस्र जैसे देवी-देवताओं की मूर्तियाँ थीं जिन्हें बुतपरस्त बेदुइन क़बीलों में पूजा जाता था। इसके अलावा हज़रत इब्राहीम के साथ हज़रत इस्माइल, हज़रत मूसा, ईसा मसीह और मरियम के चित्र भी काबा में थे। बाद में इन्हें वहाँ से हटा दिया गया।
कहते हैं कि शुरुआत में जब इस्लाम और यहूदियों के बीच विवाद नहीं थे, तब मुहम्मद ने यहूदी परम्परा से यरुशलम को किबला बताया मगर बाद में क़िबला की दिशा बदल कर मक्का की ओर कर दी। हालाँकि कुरआन में यह स्पष्ट किया है कि इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि नमाज़ पढ़ते वक़्त आपका मुँह पूरब की तरफ़ है या पच्छिम की ओर। महत्वपूर्ण ये है कि आप अल्लाह को सर्वोपरि मानें। पश्चिम दिशा की ओर संकेत करनेवाले एक उपकरण को किब्लानुमा भी कहते हैं। कुल मिलाकर स्वीकार्यता के मूल भाव वाली धातु क-ब-ल ने जितने भी शब्द अरबी को दिए हैं, उनमें से ज्यादातर हिन्दुस्तानी में भी कमोबेश मिलते-जुलते अर्थों में प्रचलित हैं। यही है शब्दों का सफर।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, December 2, 2010

दूर की कौड़ी या कौड़ी की इज्ज़त…

cowrie_little_donkey

कि सी ज़माने में घर घर में कौड़ी देखने को मिल जाती थी। आखिर क्यों न मिलती, प्रमुख मुद्रा जो थी। व्यापार व्यवसाया का जो काम बाद के दौर में सिक्कों और नोटों के जरिए होने लगा, अत्यंत प्राचीनकाल में पहले कौड़ियों के जरिए ही होता था। कुछ दशक पहले तक ठेठ ग्रामीण अंचलों में कौड़ियों के बदले लेन-देन हो जाता था। धार्मिक पर्वों पर ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं को कौड़ियों की माला पहनाई जाती है जो इसी बात का प्रतीक है कि किसी ज़मानें में कौड़ी को मूल्यवान समझा जाता था। कहते हैं कि इसके पीछे उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा का भाव भी था। कौड़ी का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि इससे बने मुहावरे आज भी हिन्दी भाषियों की ज़बान पर ताज़ा हैं मसलन दो कौड़ी का आदमी, कौड़ी की इज्ज़त, कौड़ियों के मोल बिकना, दूर की कौड़ी आदि। कंगाली की परिस्थिति बतानेवाले मुहावरे पाई पाई को मोहताज होना की तरह ही हिन्दी में कौड़ी कौड़ी का मोहताज हो जाना मुहावरा भी प्रचलित है जिसमें कौड़ी का मौद्रिक महत्व साफ़ पता चल रहा है। कौड़ी मुद्रा के चलन के पीछे मुख्य वजह निश्चित ही सबसे प्रमुख वजह यही थी कि उसमें एक आदर्श मुद्रा के तत्कालीन समाज की ज़रूरत को पूरा करनेवाले अधिकांश गुण उपस्थित थे। इन्हें गिनने में आसानी थी और न ही ये खराब होती थीं।
बतौर मुद्रा कौड़ी का सबसे पहले चीन ने प्रयोग शुरु किया । ईसा से करीब डेढ़ हजार वर्ष पूर्व चीन के हिन्द महासागरीय क्षेत्रो में कौड़ी का मुद्रा के तौर पर चलन शुरू होने के प्रमाण मिले हैं। कौड़ी शब्द बना है संस्कृत के कपर्दिका से जिसका क्रम कुछ यूँ रहा- कपर्दिका > कअडिका> कअडिआ > कौडिआ > कौड़ी । कौड़ी मुद्रा चीन के बाद भारत से होते हुए लगभग समूची दुनिया में प्रचलित हो गई और तब तक कायम रही जब तक संसार भर में उपनिवेशकाल का अंत नहीं हो गया। कपर्दिका शब्द यूं संस्कृत का है मगर इसे द्रविड़ मूल का माना जाता है। आप्टे कोश मे इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत धातु पर्व् से बताई गई है जिसका अर्थ होता है पहाड़,गांठ,जोड़ आदि। कौड़ी के उभार को देखते हुए इसे समझा जा सकता है। महादेव के लिए कपर्दिन् विशेषण भी इसी मूल से निकला है। अंग्रेजी का काउरी cowrie शब्द भी इसी मूल से निकला है। कौड़ी मुख्यत घोंघा, शंख प्रजाति का जलीय जीव होता है। यह पेट के बल रेंगता है और इसका पृष्ठभाग बेहद कठोर आवरण से मढ़ा रहता है। जलीय जीवों की मौत के के बाद ये कठोर आवरण लहरों के साथ बह कर समुद्र तट पर आ जाते हैं। प्राचीनकाल से ही इनका प्रयोग आभुषणों और मुद्रा के तौर पर होता रहा है। मुद्रा के तौर पर एक खास आकार वाली कौड़ियों का ही प्रयोग होता रहा है । एक अन्य जलीय जंतु के आवरण को सीप कहते हैं। यह भी सजावटी वस्तुओं और आभुषणों के काम आता है। गौरतलब है कि सीप से ही बेशकीमती मोती बनते हैं।  गौरतलब है कि सीप से ही बेशकीमती मोती बनते हैं। हिन्दी उर्दू का सीप शब्द बना है संस्कृत के शुक्ति से।
कौड़ी प्राचीन मौद्रिक व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई थी । हालांकि इसकी यह स्थिति तभी बनी जब मुद्रा के रूप में धातु के सिक्के प्रचलित हो गए। पूरी दुनिया में इसकी क्रय शक्ति अलग अलग थी। अगर कौड़ी के मौद्रिक संदर्भों
IMG_3413-38qराजस्थान के बाड़मेर अंचल की कौड़ी कला का बड़ानाम है। यहां रंगबिरंगी झालरों में बड़ी खूबसूरती से कौड़ियों को टाँका जाता है।
की जानकारी हो तो भी दूर की कौड़ी मुहावरे की अर्थवत्ता तक पहुंच पाना आसान नहीं है। इस मुहावरे का मतलब है बहुत दूर की बात से रिश्ता जोड़ना या असम्भव सी बात से चर्चित विषय का संबंध स्थापित करना। कौड़ियों की सर्वव्यापी उपस्थिति की वजह से ही इसके प्रयोग में खतरे भी थे। इसीलिए प्राचीन मुद्रा विशेषज्ञों ने विशेष आकार-प्रकार एवं वज़न वाली कौड़ियों को ही मुद्रा के रूप में परखा था और राज्य व्यवस्था ने उन्हें लेन-देन के लिए मान्यता प्रदान की थी। दुनिया के कई इलाकों में कौड़ी मुद्रा का प्रचलन था। समुद्रद्वीपीय कौड़ियाँ की गुणवत्ता उत्कृष्ट मानी जाती थी। शोभनाथ पाठक की भारतीय सास्कृतिक प्रतीक कोश के मुताबिक मालदीव कौड़ी व्यापार का बड़ा केन्द्र था, जहाँ से दूर देशों की मुद्रा के रूप में कौड़ियों की लदान होती थी। इसी प्रकार वेस्ट इंडीज़, थाईलैंड, अफ्रीका, चीन, सूडान, कांगो, अरब एवं मिस्र में कौड़ियों का प्रचलन था। दूर देशों के व्यापारी जब उस देश की मुद्रा के रूप में कुछ भिन्न आकार की कौड़ियाँ लाते और धीरे धीरे उनका प्रचलन भी बाज़ार में हो जाता तब आमजन में कौतुहलवश दूर की कौड़ी लाना मुहावरा प्रचलित हुआ होगा। यह ठीक उसी तरह है जैसे आज भी नया सिक्का या नोट जारी होने के बाद उसकी व्याप्ति होने में समय लगता है। ऐसे में जिसके पास नई मुद्रा पहले पहुँचती है, वह थोड़े समय के लिए सही, एक सीमित समूह में कुछ खास तो हो जाता है।
कौड़ी की मौद्रिक महत्ता आज भी पर्वों के अवसर पर सामने आती है। विभिन्य समाजों में लक्ष्मी पूजन की शुभ सामग्रियों में कौड़ी का भी समावेश होता है। लक्ष्मीपूजन के थाल में सिक्कों के साथ कौड़ियाँ भी रखी जाती हैं। मालवांचल में कुँआरी लड़कियां संझा का त्योहार मनाती है। इसके तहत वे दीवार पर गोबर से आकृतियाँ उकेरती हैं और कौड़ियों से उसकी सज्जा करती हैं। हालाँकि अब इसका स्थान रंगबिरंगे काग़ज की पन्नियों ने ले लिया है। लोकाँचलों में कौड़ियों से बने आभूषण आज भी पहने जाते हैं और इन्हें मूल्यवान समझा जाता है। राजस्थान के बाड़मेर अंचल की कौड़ी कला का बड़ानाम है। यहां रंगबिरंगी झालरों में बड़ी खूबसूरती से कौड़ियों को टाँका जाता है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


Blog Widget by LinkWithin