Friday, January 21, 2011

लाहोल बिला कूबत इल्ला बिल्ला...

flower2
इ स्लाम के तहत ईश्वर के प्रति अपने भाव अभिव्यक्त करने के अनेक वाक्यांश हिन्दी में भी प्रचलित हैं जिनका प्रयोग हिन्दी में भी खूब होता है। एक भाषा का शब्द या मुहावरा जब दूसरी भाषा में दाखिल होता है तो उसकी अभिव्यक्ति में कुछ न कुछ फ़र्क़ ज़रूर आता है। लाहौल विला कुव्वत ऐसा ही एक वाक्यांश है जो हिन्दी में भी नाटकीय भावाभिव्यक्ति की शैली में खूब इस्तेमाल होता है। फिल्मों में, किताबों में और नाटकों में इस उक्ति का प्रयोग खूब किया जाता रहा है। ख़ासतौर पर मुस्लिम क़िरदारों के मुँह से या ऐसे हिन्दू पात्रों की ज़बानी जो उर्दू या ठेठ हिन्दुस्तानी ज़बान बोलते हैं जिस पर उर्दू-फ़ारसी का गाढ़ा रंग चढ़ा है। लाहौल विला कुव्वत को अलग अलग ढंग से हिन्दी में इस्तेमाल किया जाता है जैसे लाहोल बिला कूवत, लाहौल बिला कूवत, लाहौल बिला कूबत और लाहौल विला कुव्वत। असल में यह उक्ति या वाक्यांश अधूरा है। अरबी में इसका पूरा रूप है- ला हौल वा ला कुव्वता इल्ला बी अल्लाह। हिन्दी का ठेठ देसीपन इसमें भी घालमेल करता चलता है और इसका रूपांतर लाहोल बिला कूवत इल्ला बिल्ला हो जाता है।
दरअसल यह इश्वर की प्रशंसा में कही गई उक्ति है जिसका उल्लेख कुर्आन के हदीस hadith में है। गौरतलब है कि शरीयत के चार प्रमुख स्रोतों में कुरान kuraan हदीस hadith , इज्मा ijma और कियास qiyas आते हैं। शरीयत में कुरान और हदीस को ही सर्वोपरि माना गया है। हदीस पैगंबर के वचनों का संग्रह है और कुरान में उनके हवाले से कही गई बातें लिखी हैं। बहरहाल हदीस में पैग़म्बर साहब के हवाले से इस शानदार उक्ति का कई बार उल्लेख होता है जो उन्होंने ईश्वर की प्रशंसा में कही है। मूलतः आज जिस रूप में लाहौल विला कुव्वत का उल्लेख होता है उसका इस्तेमाल उन हालात में होता है मानो कोई काम बिगड़ जाए, अच्छी भली बात बिगड़ जाए, किसी की शान के ख़िलाफ़ हिमाक़त हो जाए, बेशर्मी की हदें टूट जाएं वगैरह वग़ैरह। मिसाल के तौर पर लज़ीज़ पुलाव खाते हुए दाँतों के बीच कंकर आने पर इस उक्ति का इस्तेमाल मुमकिन है। मूलतः यह इसका सही इस्तेमाल नहीं है पर आज की भाषा में यही प्रचलित मायने है।
सबसे पहले जानते हैं लाहौल विला कुव्वत अर्थात ला हौल वा ला कुव्वता इल्ला बी अल्लाह के सही मायने। मोटे तौर पर इसका भाव यही है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। शब्दशः इसका अर्थ हुआ ईश्वर के सिवाए दुनिया में दूसरी कोई शक्तिमान और सामर्थ्यवान नहीं है। यहाँ कुव्वता शब्द का इस्तेमाल हुआ है जो कूवत के तौर पर रोज़मर्रा की हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमालशुदा शब्दो में शामिल है। कुव्वता बना है मूलरूप से अरबी के क़ाविया से जिसका अर्थ है कठोर, मज़बूत। इसका धातुरूप है q-w-y जिसका अर्थ है शक्ति देना, मज़बूती देना। इसी मूल से जन्मा है तकावी या तकाबी शब्द जो भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक आम शब्द है। तकावी का मोटा मोटा अर्थ है अकाल, ग़रीबी जैसे कारणों से उबरने के लिए किसान को राज्य की ओर से मिलनेवाली मदद। भाव है उसे सामर्थ्यवान बनाना। बाद के दौर में la ilaतकावी एक कर्ज़ भी हो गई। एक राज्य में ऋण की व्यवस्था भी उसे आदर्श होने का दर्जा देती है। यह व्यवस्था भी बहुत प्राचीन है। राजा की तरह वणिकों ने भी तकावी शुरू कर दी और यह किसान के शोषण का औज़ार हो गया। बहरहाल बात कुव्वत की हो रही थी। क़ुव्वत का बहुवचन है क़ावा। स्पष्ट है कि कुव्वत यानी हिन्दी के कूवत / कूबत में सामर्थ्य का भाव विद्यमान है। हौल शब्द की विस्तृत व्याख्या किसी अन्य कड़ी में की जाएगी फ़िलहाल इतना ही कि हिन्दी के हवाला शब्द की रिश्तेदारी इससे ही है जिसमें अदला-बदली, परिवर्तन जैसे भाव हैं। कुल मिलाकर अभिप्राय यही है कि ईश्वर की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं हो सकता। न तो कोई चीज़ अपने आप सामर्थ्यवान हो सकती है और न ही उसका रूप बदल सकता है। इस सृष्टि में कोई भी हेर-फेर, परिवर्तन सिर्फ़ और सिर्फ़ खुदा की मर्ज़ी से ही हो सकता है।
कल्पना करें कि किसी का कोई काम बिगड़ जाता है, कुछ अनहोनी हो जाती है, जिसे होना कुछ था और हो कुछ जाता है ऐसे प्रसंगों में आमतौर पर हिन्दी की भावाभिव्यक्ति कुछ यूँ होती है- होई वही जो राम रचि राखा। ईश्वर जो करता है, अच्छा करता है। प्रभु की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं खड़क सकता। ईश्वर सर्वशक्तिमान है। स्पष्ट है कि लाहौल विला कुव्वत का इस्तेमाल मूल रूप से इन्हीं परिस्थितियों के मद्देनज़र होना चाहिए। मगर भाषा लगातार विकसित होती चलती है। इस्लामी शासन के दौर और शेरो-शायरी वाले सामंती समाज की यह देन रही कि नवाबों से नवाज़े गए तमाम लोग फ़ारसीदाँ बनने की होड़ में शामिल हो गए, ठीक वैसे ही जैसी होड़ बाद में अंग्रेजों के चप्पू-चापलूसों में लगी थी। अपने फ़ारसी बोलनेवाले आक़ाओं के अंदाज़ फ़ारसी की मिसालें और मुहावरे इस्तेमाल करने का शग़ल उन्हें तो रुतबा दिला गया, साथ ही हिन्दी को भी ठेठे भारतीय अंदाज़ वाली एक उक्ति मिल गई, जिसका इस्तेमाल अपने मूल से हटकर भावाभिव्यक्तियों के लिए सहायक बना। इसका फ़ायदा हिन्दीभाषियों ने ही नहीं, खाँटी उर्दूदाँ लोग भी आज तक उठा रह हैं।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, January 20, 2011

सम्पादक, एडिटर और मुदीरे-आला

editor400

हि न्दी में सम्पादक शब्द से सभी परिचित हैं। किसी अख़बार, पत्र-पत्रिका की सामग्री का चुनाव करनेवाले व्यक्ति को सम्पादक कहते हैं। और ज्यादा स्पष्ट करें तो वह व्यक्ति जो किसी पत्र-पत्रिका, पुस्तक या ग्रंथ की सामग्री का चयन करे, विषयवार उसे व्यवस्थित रूप दे, उसकी भाषा से लेकर सज्जा तक हर काम का संयोजन-नियोजन जिसके जिम्मे हो और इसके बाद उसे वह प्रकाशन योग्य बनाए, वही सम्पादक है। सम्पादक शब्द बना है संस्कृत पद में सम् उपसर्ग लगने से के [ सम् + पद् + णिच् + ण्वुल ] । बृहत हिन्दी शब्दकोश में सम्पादक का जो अर्थ दिया है उसके मुताबिक किसी भी काम को पूरा करनेवाला, पूर्ण करनेवाला, तैयार करनेवाला सम्पादक कहलाता है। किसी समाचार पत्र-पत्रिका, ग्रंथ की सामग्री को प्रकाशन योग्य बनानेवाला या उसका सम्पादन करनेवाला सम्पादक होता है। संस्कृत में पद का अर्थ है पंक्ति, लकीर, कतार, कविता की पंक्ति, हासिल करना, पाना, पास जाना, पहुंचना, पालन करना आदि। संस्कृत का सम् उपसर्ग बहुत व्यापक अर्थवत्ता रखता है पर मोटे तौर पर इसमें समान करना, साथ-साथ, एक जैसा, बराबर आदि। सम् में पद् मिलकर बनता है सम्पादक। सम्पादन वह क्रिया है जो सम्पादक करता है। मूलतः लिखित सामग्री को ठीक करने के काम के संदर्भ में देखें तो सम्पादक का अर्थ स्पष्ट होता है। पद अर्थात किसी लिखित पंक्ति को वर्तनी, व्याकरण की दृष्टि से ठीक करना अर्थात सभी पदों को सम् यानी ठीक करना। सम् पदन् की यह क्रिया ही सम्पादन कहलाती है।
अखबारों-पत्रिकाओं में सम्पादक का पद महत्वपूर्ण होता है। सम्पादक वह है जो मुद्रित सामग्री के प्रकाशन से जुड़े सभी पक्षों की गुणवत्ता के लिए उत्तरदायी होता है। सम्पादक शब्द बना है सम्पादः से जिसका रिश्ता भी इसी पद से है। सम + पदन् के योग से बने इस शब्द में किसी कार्य के उचित ढंग से करने अर्थात निष्पादन का भाव है जो इसी मूल का शब्द है। सम्पादन अर्थात एडिटिंग के संदर्भ मे देखें तो लिखी हुई इबारतों को सुधारना ही सम्पादन है अर्थात पदों को समान करना, उन्हें सही करना। संस्कृत में सम्पादनम् का अर्थ है सही करना, साफ करना, तैयार करना, पूरा करना आदि। एडिटिंग के संदर्भ में मूल भाव पदों अर्थात लिखित सामग्री में सुधार करना ही है। बोल-व्यवहार में सम्पादन शब्द की अर्थवत्ता ज्यादा व्यापक है। “वह अपने काम का सम्पादन ठीक से नहीं कर पाया” जैसा वाक्य किसी सम्पादक के लिए नहीं कहा गया है बल्कि जिम्मेदारी ठीक से न निभा पाने के सन्दर्भ में कहा गया बेहद सामान्य वाक्य है। आप्टे कोश के मुताबिक सम्पादन का अर्थ है निष्पादन, कार्यान्वयन, पूरा करना, उपार्जन करना, प्राप्त करना, स्वच्छ करना, साफ़ करना आदि। इन सभी अर्थों में पद को सम करने की बात स्पष्ट हो रही है। सम्पादक के साथ उप, सहायक, कार्यकारी, प्रबंध या प्रधान जैसे शब्दों के जुड़ने के साथ सम्पादक शब्द का रुतबा भी बढ़ता जाता है।
अंग्रेजी में सम्पादक को एडिटर कहते हैं और यह शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो लिखित सामग्री को प्रकाशन योग्य बनाए। एडिटर भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है। ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के अनुसार यह लैटिन मुहावरे e ditus से बना है जिसका मतलब है आगे बढ़ाना। मूलतः इसमें भाव प्रस्तुत करने या समुचित रूप से तैयार करने से है। यहाँ डिटस का रिश्ता तिथि के लिए अंग्रेजी शब्द डेट date से है। डिटस बना है डेटस datus से जिसका अर्थ है प्रदत्त, दिया हुआ आदि। इसकी मूल भारोपीय धातु है do- जिसकी समानार्थक संस्कृत धातु दा है जिसमे देने का भाव है। भारत में उर्दू पत्र-पत्रिकाएं भी निकलती हैं। उर्दू में सम्पादक को मुदीर कहते हैं। यह सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है। फ़ारसी में इसका रूप मोदीर, तुर्की में मुदुर और अज़रबैजानी में मूदिर हो जाता है। यह बना है सेमिटिक धातु dwr से जिसमें भ्रमण, घुमाना, चक्कर देना, इर्द-गिर्द जैसे अर्थ निहित हैं। इसकी अर्थवत्ता में किसी तथ्य पर सम्यक विचार करना, चिन्तन-मनन करना जैसे भाव शामिल हैं। इस तरह मुदीर का अर्थ हुआ संचालक, निर्देशक, नियंत्रक आदि। सम्पादक जैसी व्यवस्था बीती कुछ सदियों की देन है जिसके लिए यह शब्द चुना गया तब से मुदीर शब्द सम्पादक के लिए रूढ़ हो गया है। प्रधान सम्पादक को मुदीरे-आला कहा जाता है। महिला सम्पादक या सम्पादिका के लिए मुदीरः या मुदीरा शब्द प्रचलित है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, January 17, 2011

टैक्सी की तकनीक, टैक्स की दक्षता

पिछली कड़ियाँ--1.हाथों की कुशलता यानी दक्षता 2.दक्षिणापथ की प्रदक्षिणा

आ ज का दौर तकनीक का है और कामयाबी के लिए मनुष्य को तकनीकी रूप से दक्ष होना बेहद ज़रूरी है। इस वाक्य में आए तकनीक और दक्ष शब्दों का न सिर्फ जन्म एक ही मूल से हुआ है बल्कि अर्थ में भी काफी समानता है। सबसे पहले बात तकनीक की। दरअसल यह शब्द अंग्रेजी के टेक्नीक से लिया गया है और tax-dayपिछले पाँच छह दशकों से हिन्दी में खूब प्रयोग किया जा रहा है। इसका अर्थ है सूझ बूझ, चातुर्य, शिल्प, कौशल, यांत्रिक हुनर अथवा कारीगरी।  तकनीक शब्द का मुख्य आधार यह अंग्रेजी शब्द ग्रीक मूल का है और तेख्ने से बना है। टेक्निकल, टेक्नो, टैक्नोक्रेट, टेक्नोलाजी जैसे कई शब्द भी इसी मूल आधार से जन्मे हैं। दरअसल संस्कृत की धातु दक्ष से ही ग्रीक तेख्ने, संस्कृत हिन्दी के ही दक्ष और तक्ष जैसे शब्द बने। संस्कत हिन्दी में जहाँ दक्ष का अर्थ किसी काम में निपुण. योग्य, चतुर और कुशल होता है, वहीं तक्ष का अर्थ किसी चीज़ को बनाना, निर्माण करना और रचना है। इसके अलावा छीलना, काटना, तोड़ना व तराशना जैसे अर्थ भी इसमें समाहित हैं। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक बढ़ई का काम कुछ गणसमाजों में बहुत महत्वपूर्ण रहा होगा, इसलिए इस शब्द का प्रयोग कारीगर विशेष के लिए होने लगा। ग्रीक भाषा में उसका सम्बन्ध सामान्य कौशल से है। तैख़्ने अर्थात कौसल और तैख़्नितेस यानी कलाकार, कारीगर। यह शब्द फ्रैंच से होता हुआ अंग्रेजी में टेक्नीक बना। हिन्दी में इसने तकनीक, तकनीकी जैसे रूप ग्रहण किए। टैक्नीशियन यानी दस्तकार, शिल्पी। अब इस शब्द का प्रयोग इंजीनियर या मशीनी काम जाननेवाले के संदर्भ में होता है।
गौरतलब है कि तक्ष के छीलना, चीरना, काटना, छेनी से तराशना, गढ़ना, बनाना जैसे अर्थ काष्ठकला के संदर्भ में हैं इसीलिए संस्कृत में बढ़ई को तक्षन् या तक्षक भी कहा जाता है। तक्षक यानी किसी भी कार्य का सूत्रधार, देवताओं का वास्तुकार। इसीलिए देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा का नाम तक्षक भी है। तक्षक एक प्रतिष्ठित नाग का नाम भी है जो नागलोक अर्थात पाताल में रहता है। वृहत्तर भारत के पश्चिमोत्तर स्थित प्रसिद्ध शिक्षाकेंद्र तक्षशिला को याद करें। इसका इतिहास पुराणों तक जाता है। कहते हैं कि भरत, जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा, अपने पुत्र तक्ष के लिए यह नगर बसाया था। तक्षशिला गांधार देश की राजधानी थी और करीब डेढ़ हजार वर्ष पहले तक वहाँ आबादी थी। तक्षशिला के अवशेष आज के रावलपिण्डी के इर्दगिर्द बिखरे हुए हैं। चाणक्य यहीं पढ़ाते थे और चंद्रगुप्त यहीं पढ़े थे।
खास बात यह कि लकड़ी के काटे और तराशे जा चुके सुडौल टुकड़े के लिए फ़ारसी में तख़्तः शब्द बना है जिसे हिन्दी में तखता या तखती कहते हैं। मद्दाह साहब के उर्दू हिन्दी कोश के अनुसार इसका अर्थ है लकड़ी का लम्बा,चौड़ा और थोड़ा मोटा टुकड़ा, जहाज़ के फ़र्श का हर टुकड़ा जो लकड़ी का हो, काग़ज़ की शीट, लकड़ी का वह पटरा जिस पर मुरदा नहलाया जाता है। यह मूल रूप से तक्ष ही है। बाद में लकड़ी से बनी चौकी, पलंग और बादशाह के आसन के अर्थ में फारसी उर्दू में तख़्त शब्द चल पड़ा। बड़ा, ज्येष्ठ के अर्थ में भी तख्त का प्रयोग होता है। अब तो तख़्त का अर्थ ही हुकुमत हो गया है। तख्त से जुड़े कई पद हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे तख़्तनशीं या तख़्तेशाही यानी बादशाह के बैठने का राजसिंहासन। यही भाव तख्ते-ताऊस में साफ़ नुमांया हो रहा है जिसे शाहजहाँ ने बनवाया था। इसी कड़ी में आता हैं तख़्तोताज जिसका अर्थ है शासनसूत्र, राज्यभार, हुकुमत का इंतजाम या तख़्तेसुलेमानी जैसे शब्द। जाहिर है दक्ष-तक्ष से तख़्त तक इस शब्द के रूप बदले मगर अर्थ में ज्यादा बदलाव नहीं आया।

car_clipart_taxi... टैक्सी taxi किसी ज़माने में टैक्सीमीटर कार हुआ करती थी अर्थात ऐसी सवारी गाड़ी जिसमें बैठने के बाद मनचाहे गंतव्य का भाड़ा अपने आप मीटर के ज़रिये पता चल जाए। इसकी शुरुआत जर्मनी में 1890 के आसपास मानी जाती है।...

गौरतलब है कि तक्ष, दक्ष से जुड़े सभी शब्दों में काम करना प्रमुख है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है हाथों का प्रयोग। दक्ष में दाहिने हाथ का भाव निहित है। ज़ाहिर है बाँए की तुलना में दायाँ अधिक कुशल होता है सो कुशल के अर्थ में दक्ष शब्द रूढ़ हो गया। दक्ष का अगला रूप तक्ष हुआ जिसमें कुशल कारीगर, कलाकार की अर्थवत्ता निहित है। यह परिवर्तन भारोपीय भाषा परिवार के नक्शे पर पूर्व से पश्चिम तक सभी भाषाओं में हुआ। संस्कृत में हाथ के लिए हस्त शब्द है। बरास्ता अवेस्ता, इसका फ़ारसी रूप होता है दस्त। दस्ताना इसी कड़ी में आता है। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार पूर्ववैदिक किसी मूल मूल भाषा में इन दोनों का रूप था धस्त। अवेस्ता में धस्त से ह का लोप होकर दस्त शेष रहा और संस्कृत में द का लोप होकर हस्तः बचा। इसमें मूल धातु दस् है। इससे ही दक्ष जैसी क्रिया भी जन्मी। उनके अनुसार अंग्रेजी की टेक take क्रिया का रिश्ता भी इससे ही है। टेक take  यानी लेना। लेने का काम हाथों से ही होता है। दक्ष से बनी दक्षिणा का एक लक्षण कर का भी है। इसी तरह टेक क्रिया से ही टैक्स tax यानी कर जुड़ा है। जिसे लिया जाए वही है कर। हिन्दी का कर भी इसी लिए टैक्स है क्योंकि इसका जन्म भी संस्कृत धातु कृ से हुआ है जिसमें करने का भाव शामिल है। जाहिर है लेना भी एक क्रिया ही है और देना भी। कर चुकाने के लिए कार्य करना पड़ता है जो हाथों से ही होता है। हाथ के लिए कर शब्द भी इसी मूल से निकला है।
यूँ अंग्रेजी के टैक्स का रिश्ता डगलस हार्पर की एटिमऑनलाईन के अनुसार टैक्स का रिश्ता भारोपीय धातु tag- से है जिसमें छूने या हाथों में थामने, संभालने का अर्थ निहित है। गौर करें यहाँ भी हाथ या करने की क्रिया प्रभावी हो रही है। वैसे यह कोश अंग्रेजी की टेक क्रिया की व्युत्पत्ति को अज्ञात भी बताता है। जो भी हो, डॉ शर्मा इस दिशा में ठोस संकते तो करते ही हैं। दुनियाभर में सवारी गाड़ी के रूप में मशहूर टैक्सी का रिश्ता भी इसी शृंखला से जुड़ा है। टैक्सी taxi किसी ज़माने में टैक्सीमीटर कार हुआ करती थी अर्थात ऐसी सवारी गाड़ी जिसमें बैठने के बाद मनचाहे गंतव्य का भाड़ा अपने आप मीटर के ज़रिये पता चल जाए। इसकी शुरुआत जर्मनी में 1890 के आसपास मानी जाती है। अंग्रेजी का टैक्स बना है लैटिन के टैक्सेयर taxare से जिसमें छूने, पकड़ने, थामने का भाव है। मूल रूप से इसका अर्थ था कर लगाना या कर लेना।  बात चाहे टैक्सी चलाने की हो या टैक्स वसूलने की, हर काम में दक्षता ज़रूरी है। टैक्स वसूलने में जहाँ खासी समझ की ज़रूरत होती है वहीं टैक्स चुकाना भी समझदारी का ही काम है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, January 14, 2011

फ़रमान सुनें या प्रमाण मानें

civil-court--pr.jpg
हि न्दी में सैकड़ों बरसों से अरबी-फ़ारसी मूल के हजारों शब्दों की आमदरफ़्त होती रही है। रोजमर्रा की बोलचाल में इनमें से कितने ही लफ़्ज़ विविध भावों की अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक हो चुके हैं। अरबी भाषा भारोपीय भाषा परिवार से जुदा है और सेमिटिक भाषा परिवार की है जबकि फ़ारसी इंडो-ईरानी परिवार की भाषा है जिसमें द्रविड़ भाषाओं को छोड़कर अधिकांश भारतीय भाषाएं शामिल हैं। सामान्यतौर पर किसी से कुछ कहने का आग्रह करने के लिए फ़रमाना शब्द की मुहावरेदार और आदरयुक्त अभिव्यक्ति लोगों को पसंद आती है। कहिए के बजाय फ़रमाइये का शिष्टाचार सभी को अच्छा लगता है। फ़रमाना शब्द हिन्दी में फ़ारसी से आए उन सैकड़ों शब्दों में शुमार है जो हिन्दी की ज़रूरत बन चुके हैं। फ़रमाना का एक रूप फ़र्माना भी है। मराठी में यही रूप चलता है। फ़रमाना बना है फ़ारसी के फ़र्माँ (फ़रमान) से जिसका अर्थ है राजाज्ञा, हुक़ुम, आज्ञापत्र, शासक का आदेश आदि। फ़रमान में निहित भावों पर गौर करें तो पता चलता है कि फ़रमाना शब्द में महज़ कहिए की अर्थवत्ता नहीं है बल्कि इसका मूल अर्थ भी ‘आदेश करिए’ ही है। बाद में शिष्टाचार की शब्दावली के तहत इसमें ‘कहिए’ की अर्थवत्ता भी समा गई। इसमें मूल भाव ‘जो हुक़्म मेरे आक़ा’ वाला ही है।

फ़रमान शब्द बहुत पुराना है और इसकी रिश्तेदारी संस्कृत के प्रमाणम् से है। संस्कृत में एक धातु है मा जिसमें सीमांकन, नापतौल, तुलना करना आदि भाव हैं। इससे ही बना है माप शब्द। किसी वस्तु के समतुल्य या उसका मान बढ़ाने के लिए प्रायः उपमा शब्द का प्रयोग किया जाता हैं। यह इसी कड़ी का शब्द है। इसी तरह प्रति उपसर्ग लगने से मूर्ति के अर्थ वाला प्रतिमा शब्द बना। प्रतिमा का मतलब ही सादृश्य, तुलनीय, समरूप होता है। दिलचस्प बात यह कि फारसी का पैमाँ, पैमाना या पैमाइश शब्द भी इसी मूल से जन्मा है। गौरतलब है कि संस्कृत 'प्रति' उपसर्ग के मुकाबले में ज़ेन्द उपसर्ग है 'पैति' । पैति+मा = पैमाँ और यह बराबर है हमारे प्रतिमान के । इस तरह प्रतिमान के समतुल्य है फ़ारसी का पैमाँ या पैमान । मा में प्र उपसर्ग लगने से बनता है प्रमा, आप्टे कोश में जिसका अर्थ है दिया है प्रतिबोध, प्रत्यक्षज्ञान, यथार्थ जानकारी आदि। किसी वस्तु का आकार, लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई आदि की जानकारी ही प्रत्यक्षज्ञान कहलाती है। प्रत्यक्षं किं प्रमाणम् ।  प्र+मा के साथ जब ल्युट् प्रत्यय लगता है तो बनता है प्रमाणम् जिसमें लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, आकार, विस्तार जैसे भाव शामिल हैं। इसका अगला भाव विस्तार है साक्ष्य, सबूत, शहादत आदि। प्रमाण शब्द इसी कड़ी का है। प्रमाणम् का एक अन्य है अधिकारी, आदेशकर्ता, निर्णयकर्ता आदि। सभी आयामों के साथ प्रत्यक्ष ज्ञान में सत्य और यथार्थ का भाव है। अपने मूल रूप में आदेश या आज्ञा यथार्थ की स्वीकारोक्ति या हकीक़त को मंजूर करना है सो प्रमाण का एक अन्य अर्थ आज्ञा भी हुआ, मगर प्रमाणपत्र का प्रचलित अर्थ सर्टिफ़िकेट अर्थात वह दस्तावेज़ जिससे कोई बात सिद्ध होती हो, कोई तथ्य सत्यापित होता हो।
भाषा विज्ञानियों ने इसी प्रमाण से फ़रमान का विकास माना है। इंडो-ईरानी परिवार की एक अन्य सदस्य भाषा है जेंद-अवेस्ता जिससे संस्कृत का बहनापा है। संस्कृत का प्रमाणम् जेंद में फ्रमान के रूप में उभरा जिसमें आदेश, विधान,
documents"फ़ारसी के फ़रमान की रिश्तेदारी चिट्ठी, आज्ञापत्र की अर्थवत्ता रखनेवाले परवाना शब्द से भी है जो हिन्दी-मराठी में खूब प्रचलित है"
नियम या अनुज्ञा जैसे भाव हैं। इसका पह्लवी और पारसी रूप हुआ फ़्रमाना जो फ़ारसी में आकर फ़र्माँ (फ़रमान) हो गया। गौर करें है जेंद का फ्रा = प्र और संस्कृत के मा = मान पर। ये एक ही हैं। पह्लवी में प्रधानमंत्री के लिए वूजुर्ग फ्रामादार (wuzurg framādār) शब्द मिलता है। संस्कृत में भी प्रमाणपुरुष उस व्यक्ति को कहते हैं जो सर्वमान्य हो,  जिसे पंच मानने को सब तैयार हों, जो सत्यवादी हो और विश्वसनीय हो। ज़ाहिर है ऐसा व्यक्ति ही न्याय कर सकता है।  फ़ारसी के फ़रमान की रिश्तेदारी चिट्ठी, आज्ञापत्र की अर्थवत्ता रखनेवाले परवाना शब्द से भी है जो हिन्दी-मराठी में खूब प्रचलित है। इजाज़त के अर्थ में परवानगी शब्द भी जाना-पहचाना है। फ़ारसी में फ़रमान-बर-दार शब्द भी चलता है मगर प्रचलित है फ़र्माँबरदार अर्थात आज्ञाकारी, ताबेदार, चाकर आदि। फ़र्मांबरदारी यानी आज्ञापालन करना, स्वामीभक्ति आदि। फ़र्माँगुजार या फ़र्मांरवाँ का अर्थ है शासक, हाकिम या बादशाह। फ़र्मांगुज़ारी में रहना यानी किसी की चाकरी या शासन में रहना। किसी किस्म की माँग या तलबी के संदर्भ में भी फ़र्माईश या फ़रमाईश शब्द हिन्दीवालों की ज़बान पर चढ़ा रहता है। यह भी इसी मूल से निकला है। फरमाईशी यानी जिसकी फ़रमाईश की गई हो। जॉर्जियाई में भी इस मूल से बना है पारमानी जिसका अर्थ है आज्ञापत्र, परमिट या लाईसेंस। आर्मीनियाई में फ्र से प का लोप हो गया और बचा रह गया ह्र, इससे बना ह्रामन जिसमें आदेश का भाव है।
मा में निहित पैमाईश के भावों पर कुछ और गौर करें। अंग्रेजी में मेट्रिक्स का अर्थ होता है मापना। यह बना है भारोपीय धातु मे me से जिसके लिए संस्कृत मे मा धातु है। इन दोनों मूल धातुओं में नाप, माप, गणना आदि भाव हैं। अंग्रेजी के मेट्रिक्स का रिश्ता अंतरिक्ष की परिमाप और उसके विस्तार से भी जुड़ता है। यानी बात खगोलपिंडों तक पहुंचती है। भारतीय परम्परा में मा धातु की अर्थवत्ता भी व्यापक है। मा धातु में चमक, प्रकाश का भाव है जो स्पष्ट होता है चन्द्रमा से। प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ तो उसने इनमें दिलचस्पी लेनी शुरू की। स्पष्ट तो नहीं, मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए मा शब्द रहा होगा। मा के अंदर चन्द्रमा की कलाओं के लिए घटने-बढ़ने का भाव भी अर्थात उसकी परिमाप भी शामिल है। यूं चंद् धातु में भी चमक का भाव है और इससे ही चन्द्रमा शब्द बना है किन्तु चन्द् शब्द को विद्वानों ने बाद का विकास माना है। गौर करे कि फारसी का माह, माहताब, मेहताब, महिना शब्दों में मा ही झांक रहा है जो चमक और माप दोनों से संबंधित है क्योंकि उसका रिश्ता मूलतः चान्द से जुड़ रहा है जो घटता बढ़ता रहता है। और इसकी गतियों से ही काल यानी माह का निर्धारण होता है। अंग्रेजी के मंथ के पीछे भी यही मा है और इस मंथ के पीछे अंग्रेजी का मून moon है। रिश्तेदारी साफ है। माप-जोख सबसे पहले अगर हमने सीखी तो धरती और चांद से ही।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, January 12, 2011

दक्षिणापथ की प्रदक्षिणा

4306402370_e862354ab5पिछली कड़ी-हाथों की कुशलता यानी दक्षता

द क्ष में भी चतुर, योग्य, कुशल, निपुण या सक्षम का भाव है। दक्ष एक पौराणिक चरित्र भी हैं जिन्हें दक्ष प्रजापति भी कहा जाता है। ये ब्रह्मा के दस पुत्रों में एक थे। इनका जन्म ब्रह्मा के दाहिने अंगुठे से हुआ था। दक्ष को मानवसमाज के पितृपरक कुलों का प्रधान माना जाता है। इसकी पुत्री सती थी जिसका विवाह शिव से हुआ था। इसका एक रूप दाहिना या दायाँ भी है। स्पष्ट है कि दायाँ हाथ ही सर्वाधिक कुशल और कार्यक्षम होता है। दक्ष से दाहिना बनने का क्रम कुछ यूँ रहा- दक्षिण > दक्खिन > दहिन > दाहिना जैसे रूप सामने आए। बाद में दाहिना > दाह्याँ > दायाँ जैसे रूप भी बने। दक्षिण का देशी रूप दखिन बनता है। सिंधी में इसे डखिणु कहते हैं और कानड़ी में इसका रूप टेंकण बनता है। दक्षिण के दक्कन-दख्खन और अंग्रेजी के डेक्कन जैसे रूपान्तर भी हिन्दी में प्रचलित हैं। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में संस्कृत दक्ष के समतुल्य dek धातु तलाशी गई है जिसमें सामर्थ्य और क्षमता का भाव है मगर मूल भाव है दायाँ हाथ। इसका एक रूप अवेस्ता में दह्स बना है जिसमें दायाँ का भाव है, ग्रीक में यह डेज़ है तो लात्वियाई में डेक्स dex, लिथुआनानी में यह डेस्जीन deszine स्लाव में यह डेस्नू desneu है और गोथिक में taihswa है। कुशलता, प्रवीणता या निपुणता के अर्थ में अंग्रेजी का डेक्स्टेरिटी शब्द भी इसी मूल से जन्मा है।
आपटेकोश के मुताबिक दक्ष में इसमें ईमानदार, खरा, निष्कपट और शिष्ट शालीन जैसे भाव भी हैं। दक्ष से बने दक्षिण में भी चतुर, योग्य, कुशल, निपुण या सक्षम का भाव है। दक्षिण से ही बना है दक्षिणा जिसमें दक्षिण दिशा का भाव है। दक्षिणा का प्रचलित अर्थ है ब्राह्मणों को दी गई भेंट उपहार आदि है। इसमें दान, शुल्क, पारिश्रमिक आदि भी समाहित हैं। आज के दौर में रिश्वत को भी दक्षिणा कहा जाता है। भारत के दक्षिणी प्रदेशों को दक्षिणापथ कहा जाता है। प्रजापति दक्ष की पुत्री का नाम भी दक्षिणा है और दान की बछिया को भी दक्षिणा कहते हैं। अच्छी दुधारू गाय भी दक्षिणा है और दक्षिण दिशा भी दक्षिणा है। दक्षिण में प्र उपसर्ग लगने से बनता है प्रदक्षिण जिसमें दक्षिण की ओर रखा हुआ या दाईं ओर घूमनेवाला, सम्मानित और शृद्धालु का भाव है। दक्षिणम् में जाना, बाईं और से दाईं ओर गमन करने का भाप प्रदक्षिण में निहित है। आपटे कोश के अनुसार दक्ष से ही दाक्षायणी भी बना है। इसका अर्थ है 27 नक्षत्रों के मण्डल का कोई एक नक्षत्र। दाक्षायणी पार्वती का भी एक नाम है। 27 नक्षत दक्ष की पुत्रियों के प्रतीक हैं। रेवती नक्षत्र को भी दाक्षायणी कहते हैं। दाक्षिणात्य का अर्थ है दक्षिण दिशा या दक्षिण देश का।
आमतौर पर प्रदक्षिणा का अर्थ होता है किसी मंदिर या प्रतिमा के चारों और घूमना या परिक्रमा करना। मूलतः यह शब्द बना है संस्कृत के दक्षिण शब्द से जिसका अर्थ होता है योग्य, कुशल, निपुण, दायां या दक्षिणी। इसमें प्र उपसर्ग लगने से बना प्रदक्षिणा जिसका मतलब हुआ दाहिनी ओर स्थित या दाईं ओर घूमना। दिलचस्प बात यह कि प्रदक्षिणा की धार्मिक-- दार्शनिक व्याख्या ज़रूर हिन्दूधर्म शास्त्र में मिलती है मगर प्रदक्षिणा की परिपाटी कमोबेश हर धर्म में है। बौद्ध स्तूपों, चैत्यालयों, पगोडाओं में प्रदक्षिणापथ होते हैं। जैन मंदिरों में भी ये होते हैं। हज के दौरान काबा के पत्थर के चारों ओर संभवत दुनिया का सबसे बड़ा हूजूम जो परिक्रमा कर रहा होता है उसे क्या कहेंगे ? इस्लामी चिन्तन के दायरे में Tawaaf तवाफ का महत्व है जिसका रिश्ता सेमिटिक धातु ताफा से है। तवाफ़ यानी प्रदक्षिणा, परिक्रमा। इसमें किसी HAJJ-19_Kaaba_1532277iबिन्दु से शुरू कर फिर उसी स्थान पर लौटने का भाव है। यह क्रिया बारम्बार दोहराई जाती है। इसके पीछे चेतना को एकाग्र कर ज्ञान प्राप्ति की सोच है। दरअसल प्रदक्षिणा चिन्तन का स्थूल रूप है और आत्ममंथन सूक्ष्म रूप। प्रदक्षिणा के जरिये एकाग्र होने की प्रक्रिया सम्पन्न होती है और आत्ममंथन से ज्ञान रूपी सार प्राप्त होता है। तेज हवा जब भी चलती है, वह भंवर बनाती है। जल या वायु के तेज प्रवाह में ऐसा होता है। चक्रवाती हवा के इस चरित्र को देखते हुए विद्वान तूफान शब्द का रिश्ता सेमिटिक धातु ताफा tafa से जोड़ते हैं जिसमें घूमने, मुड़ने, चक्कर लगाने का भाव है। टाईफ़ून के संदर्भ में भी इसे देखा जा सकता है।
भारत में प्रदक्षिणा की परिपाटी वैदिककाल से चली आ रही है । आर्यों में यज्ञ की परम्परा थी । यज्ञोपरांत दक्षिणास्वरूप दुधारू गायों को दान करने की परम्परा थी। ऐसा माना जाता है कि ये गाएं यज्ञस्थल पर वेदी के दक्षिण से उत्तर की ओर लाई जाती थीं इस तरह करीब करीब वेदी की परिक्रमा हो जाती थी जिसके लिए प्रदक्षिणा शब्द प्रचलित हो गया। यह भी माना जाता है कि प्राचीन भारतीयों ने सूर्य के निरंतर उदित और अस्त होने के क्रम के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए अग्निवेदी की परिक्रमा शुरू की होगी । डॉ राजबली पांडेय हिन्दू धर्मकोश में शतपथ ब्राह्मण का हवाला देते हुए एक प्रदक्षिणा मंत्र का उल्लेख करते हैं जिसमें कहा गया है– ‘सूर्य के समान यह हमारा पवित्र कार्य पूर्ण हो। ’ मूलतः भाव यही था कि जिस तरह सूर्यनारायण पूर्व में उदित होकर अपने नित्यक्रम पर चल पड़ते हैं और दक्षिणमार्ग से होते हुए पश्चिम दिशा में निर्विघ्न अस्ताचलगामी होते हैं उसी तरह मांगलिक विधान के तौर पर आसानी से धार्मिक कार्यों के संपादन हेतु प्रदक्षिणाकर्म का विधान रचा गया। प्रदक्षिणा बाद में हिन्दू समाज में धार्मिक क्रिया बन गई। धर्मग्रन्थों में इसे षोड्षोपचार पूजन की अनिवार्य विधि माना गया है। यज्ञ-हवन आदि के अलावा प्रतिमाओं के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए भी बाईं ओर से दाईं ओर (इसे दक्षिण से उत्तर भी कह सकते परिक्रमा शुरु हो गई। बाद में तो मंदिरों में इस क्रिया के लिए विशेष तौर पर प्रदक्षिणापथ बनने लगे। अगली कड़ी-टैक्सी की तकनीक, टैक्स की दक्षता में समाप्त.
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, January 10, 2011

‘चिरंजीव’ की ‘चिता’ से रिश्तेदारी

41918962v1_480x480_Front

हमारे यहाँ अपने से छोटों को आशीर्वचन के रूप में विजयी भव, यशस्वी भव, चिरंजीव भव कहने की परिपाटी रही है जिसमें जीतने, प्रसिद्ध होने और दीर्घजीवी होने का भाव छुपा है। इससे ज्यादा और क्या आशीर्वचन हो सकते हैं? चिरंजीव एक नाम भी है। मराठी समेत दक्षिण भारतीय भाषाओं में पुत्र संतान का नाम लोग चिरंजीव या चिरंजीवी रखते हैं। संस्कृत में इसका शुद्ध रूप है चिरञ्जीव जिसका अर्थ भी लम्बी उम्र या दीर्घायु वाला ही होता है। यह बना है चिरम्+जीव में संस्कृत का अच् प्रत्यय लगने से। संस्कृत की चिर धातु में दीर्घ, दीर्घकाल तक रहनेवाला, दीर्घकाल से चला आ रहा, पुरातन, चिरन्तन जैसे भाव निहित हैं। चिर बना है चि धातु से। चि मे समूहवाचक भाव हैं। मूलतः इसका मतलब होता है चुनना, बीनना, इकट्ठा करना आदि। जाहिर है चुनी, बीनी और एकत्रित वस्तुएँ कहीं तो रखी जाएँगी, सो इन क्रियाओं का परिणाम है ढेर लगाना, अंबार लगाना आदि। स्थूल रूप में इन सभी के आकार पर ध्यान दें। इकाई की तुलना में समूह बड़ा होता है, इसीलिए अंबार या ढेर निश्चित ही दीर्घ होता है। लंबाई, चौडाई और ऊँचाई में। इसे दीर्घ कह सकते हैं। इसके बाद ही चि में फलने-फूलने, बढ़ने और समृद्ध होने का भाव उपजता है। समृद्धि और विकास किसी भी रूप में हो सकता है जिसमें भौतिक वस्तुओं की मात्रा से लेकर काल और आयु तक आ जाती है। चिरंजीव का भाववाचक अर्थ पुत्र भी होता है और मराठी में पुत्र को चिरंजीव कहने की परम्परा है जिसमें संतान के दीर्घजीवी होने के गर्हित अर्थ साथ ही अपनी वंश परम्परा को लम्बे समय तक कायम रखनेवाले से परिचित कराने का भाव है। पुत्र का परिचय कराते वक्त यही कहा जाता है- ये हमारे चिरंजीव हैं। भाव होता है मेरे वंश को आगे ले जानेवाले। आमतौर पर चिरंजीव में आशीर्वाद छुपा है अर्थात चिरकाल तक जीवित रहो! स्वाभाविक रूप में अपने अंश के रूप में पुरुषवादी समाज में पुत्र के चिरजीवी होने की कामना रही और इसीलिए संज्ञा-नाम के रूप में चिरंजीव का अर्थ पुत्र भी हुआ।
लम्बी उम्रवाले व्युक्ति को हिन्दी में दीर्घायु या दीर्घजीवी कहते हैं। दीर्घकाय, दीर्घजीवी या दीर्घायु जैसे शब्दों में दीर्घ प्रमुख है। हिन्दी में दीर्घ deergh का अर्थ होता है लंबा, दूर तक पहुंचनेवाला, ऊंचा, उन्नत आदि। इस तरह देखें तो दीर्घकाय का अर्थ हुआ लंबा व्यक्ति मगर दीर्घकाय शब्द का अभिप्राय आमतौर पर विशालकाय के अर्थ में ही लगाया जाता है। दरअसल जब किसी आकार के साथ दीर्घ शब्द का विशेषण की तरह प्रयोग होता है तब लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई के आयाम भी उसमें जड़ जाते हैं, इस तरह दीर्घाकार, दीर्घकाय जैसे शब्दों में बड़ा अथवा विशाल का भाव आ जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति को दूरदर्शी कहा जाता है। संस्कृत में इसके लिए दीर्घदर्शी शब्द भी है यानी दूर तक देखनेवाला। लंबी आयु के लिए दीर्घजीवी शब्द प्रचलित है। संस्कारी हिन्दी में बालकनी या गैलरी के लिए दीर्घा शब्द प्रचलित है। वैसे इसके लिए गवाक्ष, बारजा या बालाख़ाना जैसे शब्द आमतौर पर ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। दीर्घा इसी कड़ी से जुड़ा शब्द है जिसका मूल अर्थ है ऊंचाई की ओर जाता लम्बा रास्ता। दर्शकदीर्घा या कलादीर्घा जैसे शब्दों से समझा जा सकता है कि दीर्घ में निहित ऊंचाई का भाव कहाँ से आ रहा है। संस्कृत में दीर्घा लम्बी-बड़ी झील को और दीर्घिका छोटे तालाब को कहते हैं।
भाषाविज्ञानियों नें संस्कृत के दीर्घ शब्द की रिश्तेदारी प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु dlonghos में खोजी है। अंग्रेजी का लाँग long शब्द भी इससे ही बना है जिसका अर्थ भी लंबा या दीर्घ ही होता है। गौरतलब है कि संस्कृत दीर्घ शब्द ने ही बरास्ता अवेस्ता, ईरानी परिवार की भाषाओं में जाकर दराग, दिरंग होते हुए फारसी के दराज़ शब्द का रूप लिया।
dah... चिता ही नहीं, चिन्ता के मूल में भी यही चि है। कहावत है कि चिंता चिता समाना। जिस तरह से घुन अनाज को पोला कर देता है, दीमक वृक्ष को खोखला कर देती है उसी तरह चिन्ता शरीर को धीरे-धीरे क्षीण करती जाती है जिसकी चरम परिणति मृत्यु है...
फारसी के दराज़ का अर्थ होता है लंबा। गौरतलब है कि भारोपीय भाषाओं मे र-ल और क-ग-घ जैसे वर्णों में आपस में तब्दीली होती है। फारसी का दराज़ शब्द उम्रदराज़ के रूप में हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ होता है लंबी आयु वाला अर्थात बूढ़ा, वृद्ध, बुजुर्ग।
प्रारम्भ में ही अन्त भी छुपा है। जो जन्मा है, उसे जाना भी होगा। चिरंजीव के जन्मसूत्र जिस चि धातु में छुपे हैं उसी से जन्मा है हिन्दी का चिता शब्द भी जिसका रिश्ता जन्म की समाप्ति से जुड़ता है। चिता ही नहीं, चिन्ता के मूल में भी यही चि है। कहावत है कि चिंता चिता समाना। जिस तरह से घुन अनाज को पोला कर देता है, दीमक वृक्ष को खोखला कर देती है उसी तरह चिन्ता शरीर को धीरे-धीरे क्षीण करती जाती है जिसकी चरम परिणति मृत्यु है अर्थात् चिन्ता का शीघ्र समाधान न मिले तो शरीर को चिता मिल सकती है। यहां सिर्फ चिंता और चिता का मेल सिर्फ कहावत के स्तर पर नहीं है बल्कि ये दोनों शब्द सचमुच संबंधी भी हैं। चिता अर्थात दाह संस्कार के लिए चुनकर रखी रखी गई लकड़ियों का ढेर। चिता बना है चित शब्द से जिसके मूल में चि धातु है और उसमें निहित सारे भाव चित में हैं अर्थात बीना हुआ, संग्रह किया हुआ, जमा किया हुआ, अंबार लगाया हुआ और जमाया हुआ आदि।
चित से ही बना है चित्यम् जिसका मतलब होता है दाह संस्कार करने का स्थान। गौर करें की बौद्ध और जैन देवालयों को चैत्य, चैत्यालय भी कहा जाता है। यह चैत्य भी इससे ही बना है। बौद्ध महास्थविरों के अवशेष इन चैत्यों में रखे जाने की परंपरा रही है। बाद में इन्हीं के इर्द-गिर्द विहार भी बनते चले गए। चैत्य मूल रूप से समाधि या स्मारक ही रहे हैं मगर बाद में देवालय के अर्थ में पहचाने जाने लगे। चि में निहित चुनने की क्रिया पर अगर गौर करें तो पाएंगे की चुनना, बीनना, संग्रह करना, जमाना आदि सभी क्रियाएं देखने से जुड़ी हुई हैं। बिना देखे-भाले किसी भी किस्म का चुनाव संभव नहीं। अर्थात चुनने से ही ज्ञानबोध होता है और बिना ज्ञानबोध के चुनाव असंभव है-दोनों में अंतर्संबंध गहरा है, सो चि से ही बना चित्त् जिसमें जानना, समझना, चौकस होना, ज्ञानबोध आदि अर्थ समाहित हैं। हिन्दी का चित्त भी यही सारे अर्थ प्रकट करता है जिसमें देखना, विचार करना, मनन करना भी शामिल है। आमतौर पर चिन्ता का मतलब फिक्र, ध्यान, परवाह आदि माना जाता है। यह बना है चिन्त् से जिसके व्यापक अर्थ हैं और इसी परिवार का शब्द है जिसमें सोच-विचार, चिन्तन मनन आदि बातें शामिल है।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, January 8, 2011

नाजाइज़ थी जज़िया की इजाज़त

deser

अरबी मूल का इजाज़त शब्द अनुमति, आज्ञा अथवा परवानगी के अर्थ में खूब प्रचलित है। इसके अतिरिक्त इसमें आदेश, निर्देश या हुक्म का भाव भी शामिल है। इजाज़त बना है अरबी की ख्यात धातु जज़ा से जिसके एकाधिक सेमिटिक रूप हैं और जिसकी अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। जज़ा से अरबी भाषा में कई शब्द बने हैं जिनमें से अनेक बरास्ता फ़ारसी ज़बान होते हुए हिन्दी समेत भारत की कई बोलियों-भाषाओं में भी खूब प्रचलित हैं। जज़ा की सेमिटिक धातु है gwz जिसमें गुज़रना, निकल जाना जैसे भाव हैं। गौरतलब है ज्यादातर प्राचीन भाषा समूहों के शब्दों का निर्माण कुछ सीमित क्रियाओं की वजह से ही हुआ है जो व्यापार-व्यवसाय और विपणन संबंधी थी जिनमें पशुपालन से लेकर देशाटन, पर्यटन और भ्रमण जैसी क्रियाएं आ जाती हैं। इसके अलावा धार्मिक क्रियाएं, आवास-निवास और युद्ध भावना से जुड़ी शब्दावली से भी भाषाएं समृद्ध हुईं। जज़ा की अर्थवत्ता का विकास भी इसी तरह हुआ है। गुज़रना, निकल जाना जैसे भावों से ज़ाहिर होता है कि किसी ज़माने में प्राचीन अरब के घुमंतू बेदुइन समाज की घुमक्कड़ी के विभिन्न आयामों से इसका विकास हुआ होगा। गुज़र जाना और निकल जाना जैसे भाव व्यापारिक काफ़िलों से लेकर सामान्य कबीलों के आवागमन से जुड़ा है। एक कबीला जब दूसरे की अमलदारी से गुज़रता था तो वहाँ से होकर जाने की एवज़ में सौजन्यतावश कुछ भेंट स्थानीय ज़मींदार को देने का रिवाज़ था। बाद में यह सौजन्यव्यवहार सरकारी नीति बन गया। अब कुछ शुल्क या कर चुकाना पड़ता था। कहीं यह जबरी था, तो कहीं यह स्वाभाविक रिवाज़। निश्चित ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते लोगों में वस्तुओं का आदान-प्रदान होता ही होगा। कबीलाई समाज में जब राज्यसत्ता के गुण विकसित हुए तब इस निर्बाध आवागमन के लिए अनुमति या आज्ञा जैसा अनुशासन विकसित हुआ होगा। जज़ा से तभी इजाज़त जैसा शब्द जन्मा होगा। मूल रूप में जज़ा से अरबी में इजाज़ा (ह) बना जिसने उर्दू-हिन्दी में इजाज़त का रूप ले लिया जबकि फ़ारसी में यह एजाज़त और तुर्की में इसाजेत हुआ। समझ सकते हैं कि यहाँ आकर जज़ा में क्षतिपूर्ति, बदले की राशि या एवजी भुगतान जैसे भाव विकसित हुए।
एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हुए निश्चित ही घुमंतु समाजों में अपनी अपनी अमलदारियाँ कायम करने का सिलसिला भी रहा। प्रवासी मन एक सीमा के बाद निवासी होना चाहता है, सो अपनी अमलदारियों से गुज़रने पर उन्होंने टैक्स भी लगाया और इन इलाकों से गुज़रते दूसरे समाजों के लिए पासपोर्ट या आज्ञापत्र जैसी व्यवस्था भी लागू कर दी। जज़ा से बने इजाज़त लफ़्ज़ से यह स्पष्ट है। यह भी ज़ाहिर है कि अब तक बिना किसी रोक-टोक वहाँ से गुज़रते समाजों को यह नागवार लगता होगा और वे जबर्दस्ती वहाँ दाखिल होकर, बिना महसूल चुकाए गुज़रने की चेष्टा करते होंगे। अरबी में इसके लिए एक शब्द है तजावुज़, जो हिन्दी में अप्रचलित है। तजावुज़ यानी अपनी हद से आगे बढ़ना, सीमोल्लंघन करना, अपने अधिकारक्षेत्र से बाहर जाकर काम करना, अतिक्रमण करना, नाफ़रमानी करना या हुक़्मउदूली करना जैसे भाव इसमें शामिल हैं।
तजावुज़ की कड़ी का ही शब्द है तज्वीज़ या तजवीज़ जो हिन्दी में प्रचलित है और आमतौर पर इसमें सलाह, तरकीब, विचार, युक्ति, प्रस्ताव या जुगत जैसे भाव शामिल हैं और आमतौर पर हिन्दी में यह शब्द यही सीमित अर्थछायाएं प्रकट करता है। मूल रूप से तजवीज़ और तजावुज़ एक ही हैं, बस दोनों में भावों की तीव्रता का फ़र्क़ है। यूँ कहें कि तजवीज़ दरअसल तजावुज़ से पहले की अवस्था है। तज्वीज़ में योजना, मंसूबा, प्रयत्न, कोशिश या फ़ैसला जैसे भाव हैं जो तजावुज़ में निहित भावों या क्रियाओं की पूर्वावस्था है। किसी क्षेत्र का अतिक्रमण करने से पहले की योजना या चिंतन को ही प्राचीनकाल में तज्वीज़ कहा गया। वृहत् हिन्दी कोश में तज्वीज़-तजवीज़ का अर्थ युक्ति, विचार, तरकीब के
jizसिद्धांतः जज़िया की उगाही की रकम धर्मार्थ कार्यों में ख़र्च की जाती थी या फ़ौजी अभियानों में इसका इस्तेमाल होता था। ध्यान रहे, इस्लाम का विस्तार भी किन्हीं राज्यसत्ताओं के लिए एक किस्म का फ़ौजी अभियान ही था जिसकी आड़ में देश की बहुसंख्यक जाति से इस्लामी शासकों नें खूब दौलत बटोरी।
अलावा योजना, आक्रमण या मंसूबा भी बताया गया है। वैध के संदर्भ में हिन्दी में अरबी मूल के जाइज़ (जायज़) jaiz शब्द भी प्रचलित है। उचित, योग्य के संदर्भ में भी इसका प्रयोग होता है। अरबी में तो नहीं, मगर फ़ारसी में आने के बाद ना उपसर्ग लगाकर फ़ारसवालों ने अवैध, अनैतिक के अर्थ में इससे नाजाइज़ (नाजायज़) शब्द बना लिया। यह शब्द भी जज़ा की कतार में खड़ा है। जो कुछ भी इजाज़तशुदा है, यानी जिसकी अनुमति ली जा चुकी है, वह सब वैध या जाइज़ है, बाकी नाजाइज़। अवैध, अनैतिक, ग़लत, पाप, अपराध जैसे तमाम अर्थविस्तार इसके दायरे में आ जाते हैं। परख, निरीक्षण या हिसाब रखने के संदर्भ में जायज़ा शब्द भी हिन्दी के सर्वाधिक प्रचलित शब्दों में शुमार है जो इसी शृंखला से जुड़ा है। अरबी में इसका शुद्धरूप जाइजः jaiza है।
इस्लामी दौर में हिन्दुओं पर लगाए गए जज़िया कर के बारे में इतिहास की क़िताबों में खूब उल्लेख आता है जिसका मूल अरबी रूप जिज़्या है। इस्लामी शासकों की पक्षपातपूर्ण कार्रवाइयों की मिसाल के तौर पर इसका ज़िक्र होता है। जज़िया एक क़िस्म की ज्यादती थी। संदर्भों में उल्लेख है कि इस्लामी शासकों ने तीन से बारह रुपए सालाना तक जज़िया टैक्स वसूला था। जज़िया भी जज़ा से ही बना है। जज़िया को आमतौर पर इस्लामी व्यवस्था माना जाता है पर मेरा अनुमान है कि यह इस्लाम से पूर्व से अरब के कबाइली समाज में प्रचलित रहा है और कबीलों के आवागमन और घुमक्कड़ी संबंधी पूर्वोल्लिखित परिस्थितियों में ही इसका जन्म हुआ। इसकी पुष्टि होती है गैब्रिएल सामां लिखित द आरमेइक लैग्वेज ऑफ द कुरान से जिसमें वे इस्लाम के ख्यात व्याख्याकार विलियम मोंटगोमेरी वाट के हवाले से बताते हैं कि निश्चित ही इस्लामपूर्व के कबीलाई समाज में  एक ख़ास इंतजाम के तहत एक ताकतवर जाति के लोग अपने पड़ोसी कमज़ोर क़बीलों की सुरक्षा के बदले उनसे कुछ टैक्स वसूलते थे, जिसे जिज़्या कहते थे। मोंटगुमरी यह भी कहते हैं कि क़रार अगर बीच में ही खत्म हो जाता, तब वसूल की गई राशि लौटा भी दी जाती थी।
जज़िया का ज़िक़्र दरअसल आज जिस रूप में होता है, वह इस्लाम के जन्म के बाद का है। इसका कर या शुल्क वाला स्वरूप और ताक़तवर द्वारा कमज़ोर को सुरक्षा देने का भाव तो बना रहा, बस मज़हब इसमें जुड़ गया। जो ग़ैरइस्लामी क़बीले, इस्लामी शासन के तहत रहते, जज़िया उनकी सुरक्षा की गारंटी था, जिसके बदले उन्हें सालाना टैक्स देना पड़ता था। पहले अरबों के इस क़ानून का शिकार बने यहूदी और ईसाई। बाद में भारत आने के बाद हिन्दुओं पर इसकी खूब आज़माईश हुई। सिद्धांतः जज़िया की उगाही की रक़म धर्मार्थ कार्यों में ख़र्च की जाती थी या फ़ौजी अभियानों में इसका इस्तेमाल होता था। ध्यान रहे, इस्लाम का विस्तार भी किन्हीं राज्यसत्ताओं के लिए एक किस्म का फ़ौजी अभियान ही था जिसकी आड़ में देश की बहुसंख्यक जाति से इस्लामी शासकों नें खूब दौलत बटोरी। इस धर्म-कर की वसूली सरकारी सख्ती से होती हुई स्थानीय स्तर पर दुर्दान्त ज्यादती में तब्दील हो जाती थी।  जज़िया जैसा कर निश्चित ही अपने पुराने रूप में इजाज़ा यानी अनुज्ञा, आज्ञाशुल्क का ही एक रूप रहा होगा जो बाद में धर्म-कर जैसी भद्दी और विभेदकारी शक्ल में उभरा। पर इस पूरे मामले का जायज़ा लिया जाए तो इतना तो साफ़ है कि जज़िया की इजाज़त किसी ज़माने में नाजाइज़ नहीं थी, मगर धर्म-कर के रूप में इसकी वसूली की तज्वीज़ से इस्लामी शासक खूब फले-फूले।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, January 2, 2011

अजीबोग़रीब में अजीब और ग़रीब की तलाश

quark-strange

वि लक्षणता और विचित्रता के भावों को उजागर करनेवाला अजीब शब्द हिन्दी में बहुत लोकप्रिय है। यह सेमिटिक मूल की अरबी भाषा से हिन्दी में दाखिल हुआ है। अजीब आदमी, अजीब जगह, अजीब चीज़ और अजीब बात जैसे पदों से ज़ाहिर होता है कि दुनियाभर की विचित्रताएं इस अजीब की दायरे में आती हैं। अजीब का ही एक रूप है अजब जो अरबी का ही है और इसमें भी आश्चर्यजनक, विचित्र या अद्भुत जैसे भाव इसमें समाहित हैं। अजब के साथ गजब ( ग़ज़ब )के मेल से उर्दू-हिन्दी का एक लोकप्रिय पद अजब-गजब बनता है। विचित्र वस्तु के लिए अजूबा शब्द प्रचलित है जिसका मूल रूप है अजूबः। अजीब, अजूबा, अजब जैसे शब्दों की कड़ी में ही आता है अजायब जैसा शब्द। यह अजीब का बहुवचन है और इसका शुद्ध रूप अजाइब है मगर हिन्दी के प्रभाव में अब इसका अजायब रूप ज्यादा प्रचलित है। संग्रहालय या म्यूज़ियम को हिन्दी में अजायबघर ही कहा जाता है। हालाँकि हर संग्रहालय को अजायबघर नहीं कहा जा सकता क्योंकि अजायबघर वह जगह है जहाँ विचित्र वस्तुएं प्रदर्शित हैं जबकि संग्रहालय किन्हीं मूल्यवान, प्राचीन और कलात्मक वस्तुओं का संग्रह होता है। इसके लिए अजायबख़ाना शब्द भी चलता रहा है। इसी तरह का एक अन्य शब्द है अजीबोग़रीब जो हिन्दी में सर्वाधिक प्रचलित शब्दयुग्मों में शुमार है।
अजीबोग़रीब अर्थात आश्चर्यजनक या अति विलक्षण। यहाँ अजीब में निहित भाव तो समझ में आता है मगर ग़रीब का आमतौर पर पल्ले नहीं पड़ता। हिन्दी में ग़रीब शब्द का अर्थ सामान्य तौर पर निर्धन होता है। सबसे पहले बात अजीब की। अजब या अजीब बने है सेमिटिक धातु अ-ज-ब a-j-b से जिसमें विचित्र का भाव है अर्थात जो सामान्य न हो। कोई भी चीज़ असामान्य इसलिए होती है क्योंकि उसके लक्षण सामान्य से अलग होते हैं। इसलिए हिन्दी में ऐसी बातों के लिए विलक्षण शब्द का प्रयोग होता है। सो विचित्र, विलक्षण, बेमिसाल, अनोखी, कौतुकी, अचरजपूर्ण और अनुपम वस्तु को अजीब या अजूबा कहकर नवाज़ा जाता है। अजब के कई रूपान्तर हुए हैं जैसे अजरबैजानी में यह आसेब है। अजब के इस रूप को फ़ारसी में भी स्थान मिला जहाँ से यह उर्दू में भी चला आया। फ़ारसी में आसेब का अर्थ हुआ प्रेतबाधा, जिन-परी या कोई बड़ा खतरा या अनिष्ट की आशंका। इसका बहुवचन असाइब होता है। हालाँकि फ़ारसी में अजब और अजीब रूप भी सुरक्षित हैं। इंडो-ईरानी मूल के सुपरलेटिव ग्रेड के प्रसिद्ध तर-तम प्रत्ययों में से फ़ारसी में तर का प्रयोग जस का तस होता है जबकि तम का रूपांतर तरीन में हो जाता है। जैसे बेहतर और बेहतरीन। इसी तरह अजीब के साथ जुड़ कर अजीबतर और अजीबतरीन जैसे शब्द बनते हैं जिनके मायने बहुत विचित्र और विचित्रतम होंगे।
गरीब मूलतः सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है और इसके विविध रूपांतर अरबी, हिब्रू आरमेइक आदि भाषाओं में हैं। यह जानना दिलचस्प है कि निर्धन और विपन्न जैसे अर्थों में प्रयोग होने वाले इस शब्द का मूल अर्थ कुछ और था। भाषाविज्ञानियों के मुताबिक अपने सेमिटिक मूल में ग़-र-ब gh-r-b धातु में अस्त होने, वंचित होने का भाव था। इसकी पुष्टि होती है इसके प्राचीन हिब्रू रूप गर्ब Gh-Rb से जिसमें मूलतः अंधकार, कालापन, पश्चिम का व्यक्ति या शाम का भाव है। अरब के पश्चिम में स्थित अफ्रीका की मूल जनजाति नीग्रो कहलाती है जो श्यामवर्णी होते हैं। इन्हें हब्शी भी कहा जाता है। गौरतलब है हब्शी और नीग्रो दोनों ही शब्दों के मूल में भी काले रंग का भाव ही है। इस तरह एक और व्युत्पत्तिमूलक साक्ष्य सामने आता है।
ctsalsa.aiअजीब-अजब की तरह ही ग़ज़ब भी इस्तेमाल होता है जिसमें विचित्र या विलक्षणता का भाव है। हिन्दी शब्दकोशों में हालाँकि ग़ज़ब के अर्थ में क्रोध या कहर जैसे भावों का उल्लेख ही प्रमुख रूप में है मगर वहाँ आश्चर्य का पर्याय भी मौजूद है।
प्राचीनकाल से ही अफ्रीका के हब्शी अरब में गुलामों की हैसियत से खरीदा-बेचा जाता था। गर्ब शब्द में इन्ही नीग्रो का अभिप्राय है। ये गुलाम मालिकों से सिर्फ भोजन और वस्त्र ही पाते थे, जाहिर है इन्हें गरीब अर्थात पश्चिम से आया हुआ विपन्न कहा गया। gh-r-b में निहित अजनबी, दूरागत अथवा परदेसी के भाव पर गौर करें। प्राचीनकाल में यात्राएं पैदल चलकर तय होती थी और बेहद कष्टप्रद होती थीं। राहगीर चोर-उचक्कों और बटमारों की ज्यादती का शिकार भी होते थे। परदेश से आया यात्री आमतौर पर थका हारा, फटेहाल और पस्त होता था। गरीब शब्द की अर्थवत्ता विपन्न और वंचित के अर्थ में यहां समझी जा सकती है। गुरबा शब्द भी इसी मूल से आ रहा है जिसका अर्थ है वह व्यक्ति जिसे देशनिकाला दिया गया हो, जिसे खदेड़ा जा चुका हो। प्राचीनकाल में विजित राज्यों से पराजित व्यवस्था के विश्वासपात्र लोगों के समूहों को देशनिकाला दिया जाता था। यह आप्रवासन स्वैच्छिक भी होता था और राज्यादेश से भी होता था। जाहिर है जड़ों से उखड़े लोग दीन हीन अवस्था में जब कहीं शरणागत होते थे तो वे गरीब-गुरबा कहलाते थे। गरीब में विपन्न और वंचित की अर्थवत्ता इसी तरह स्थापित हुई होगी।
गौरतलब है कि अरबी, फारसी और उर्दू में पश्चिम दिशा को मग़रिब maghrib कहते हैं जो इसी मूल से आ रहा है और इसका मतलब है पश्चिम दिशा। उत्तर पश्चिमी अफ्रीका के छोर पर स्थित एक देश का नाम है मोरक्को जो मग़रिब से ही बना है। गौरतलब है कि मोरक्को के उत्तर में यूरोप के स्पेन और पुर्तगाल जैसे देश हैं। मोरक्को Morocco पर स्पेन की संस्कृति का काफी प्रभाव है। मोरक्को का प्राचीन नाम था अल मम्लाकाह मग़रिबिया अर्थात पश्चिमी गणराज्य। गौर करें, रोज़गार की खातिर एक स्थान से दूसरे स्थान को शुरू से ही मानव समूहों का आप्रवासन चलता रहा है। जो दूर चला गया वह ग़रीब यानी जिसने कमाई की खातिर अपनी मूल भूमि छोड़ दी हो, वह है ग़रीब। या वह ग़रीब है जो दूर देश से रोज़गार की खातिर कहीं आ बसा हो। निर्धन अर्थात जिसके पास धन न हो। इसी तर्ज पर ग़रीब वह जिससे समृद्धि दूर जा चुकी हो। मूलतः परदेशी, यात्री, यायावर, घुमक्कड़ ही ग़रीब की प्राचीन अर्थवत्ता में शामिल थे। इस तरह ग़रीब के मूलार्थ को देखें तो ग़रीब का अर्थ होता है दूर देश का। ज़ाहिर है जो चीज़ दूर की है उसमें अनेक विलक्षणताएँ होंगी। इस तरह अजीब और ग़रीब शब्द में अर्थात्मक समानता के आधार पर जो शब्दयुग्म बना वह था अजीबोग़रीब अर्थात ऐसा कुछ, जो ज्ञात दूसरी चीज़ों में न हो। ऐसी विलक्षणताएँ जिनसे पहले कभी साबका न पड़ा हो। अजब-गजब का मामला भी कुछ ऐसा ही है। गजब का शुद्ध अरबी उच्चारण है ग़स्ज़ब। इसका तुर्की रूप है गजप हो जाता है, उज्जबेकी में यह ग़ज़ब है और स्वाहिली में ग़दबू है।
यह आश्चर्यजनक बात है कि अपने मूल में ग़ज़ब की जो अर्थवत्ता है, हिन्दी में उसकी सिर्फ़ अर्थछाया ही लोकप्रिय हुई, मूलार्थ नहीं। ग़ज़ब का मतलब है क्रोध, गुस्ता, कोप, कहर, दैवी आपदा, खुदाई कहर आदि। जबकि हिन्दी में इन अर्थों में ग़ज़ब का प्रयोग कोई नहीं करता। अजीब-अजब की तरह ही ग़ज़ब भी इस्तेमाल होता है जिसमें विचित्र या विलक्षणता का भाव है। हिन्दी शब्दकोशों में हालाँकि ग़ज़ब के अर्थ में क्रोध या कहर जैसे भावों का उल्लेख ही प्रमुख रूप में है मगर वहाँ आश्चर्य का पर्याय भी मौजूद है। रामचन्द्र वर्म्मा के प्रामाणिक हिन्दी कोश में इसका अर्थ कोप, अन्धेर, अन्याय के साथ विलक्षणता भी बताया गया है वहीं बृहत हिन्दी शब्दकोश में, अद्भुत, कमाल का, असाधारण या बेहद जैसे पर्याय भी बताए गए हैं। मूलार्थ यहाँ भी अति क्रोध या प्रकोप ही है। स्पष्ट है कि कहर या क्रोध जैसे भावों में जो “अति” है, उसमें आश्चर्य तत्व है और हिन्दी नें उसी को ग्रहण किया। इसीलिए अजब-गजब जैसा मुहावरा यहाँ इतना प्रचलित है जिसमें बहुत कमाल का, विलक्षण और मनोरंजक या आश्चर्यजनक और असाधारण जैसे भाव उद्घाटित होते हैं। यूँ ग़ज़ब ढाना, ग़ज़ब टूटना या ग़ज़ब पड़ना जैसे मुहावरों में दैवी प्रकोप, खुदाई कहर या अचानक विपत्ति जैसे भाव ही प्रकट होते हैं और इनका प्रयोग बोलचाल में खूब होता है। हैरतअंगेज या हैरतनाक की तरह ही ग़ज़बनाक शब्द भी बनता है। अरबी में जल्लाद को मीर ऐ ग़ज़ब कहा जाता है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, January 1, 2011

छह साल से लिया है शब्दों से पंगा

baljeet-basi_thumb6_thumb... सफ़र के पाठक बलजीत बासी को सिर्फ़ एक साथी के तौर पर जानते हैं। बासी जी मूलतः पंजाबी के कोशकार हैं। पंजाब विश्वविद्यालय के अंतर्गत पंजाबी-अंग्रेजी कोश की एक बड़ी परियोजना से दो दशकों तक जुड़े रहे। ज़ाहिर है शब्द व्युत्पत्ति में उनकी गहन रुचि है।बाद में वह प्रोजेक्ट पूरा हो जाने पर वे अमेरिका के मिशिगन स्टेट में जा बसे। अब कभी कभार ही इधर आना होता है। वहाँ भी वे अपना शौक बरक़रार रखे हैं। अमेरिका में खासी तादाद में पंजाबीभाषी बसे हैं और इसीलिए वहाँ कई अख़बार, मैग़ज़ीन आदि इस भाषा में निकलते हैं। इनमें से एक है शिकागो, न्यूयॉर्क और सैनफ्रान्सिस्को से प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक पंजाब टाइम्स, जिसमें वे नियमित स्तम्भ लिखते हैं। बासी जी ने इसके ताज़ा अंक में सफ़र के पुस्तकाकार आने के संदर्भ में एक परिचयात्मक आलेख लिखा है जिसका गुरुमुखी से देवनागरी में किया मशीनी अनुवाद खुद उन्होंने हमें भेजा है। उन्होंने ताक़ीद किया है कि इसमें से हम जो चाहें काट सकते हैं, सिवाय उन अल्फ़ाज़ के जो उन्होंने हमारी तारीफ़ में कहे हैं। हम पूरा आलेख दो किस्तों में छाप रहे हैं। आप समझ ही गए होंगे क्यों। अब सेल्फ प्रमोशन और मार्केटिंग का ज़माना है, सो हम भी पूरी बेशर्मी से अपने ही ब्लॉग पर मियाँ मिट्ठू बनने की हिमाक़त दिखा रहे हैं। पिछली कड़ी आपने पढ़ी-अमेरिकी पंजाबी पत्रिका में शब्दों का सफ़र अब अगली कड़ी पेशे ख़िदमत है।

शब्दों का मुसाफ़िर-2/बलजीत बासी
जीव-विकास सिद्धांत के अनुसार आदिकाल में सारी मानवजाति की एक ही भाषा होनी चाहिए। निरुक्त विषय ही ऐसा है, इसका साधक एक समय-स्थान पर स्थिर हो गया, समझो गया। वडनेरकर जाति का ब्राह्मण है और उसका मानना है कि ब्राह्मणों का असली काम ज्ञान ढूँढना और आम लोगों में बाँटना है। वह रात एक बजे ड्यूटी से फ़ारिग होते सीधे घर पहुंचता है जहाँ मेज़ पर खुले दो दरजन कोश और ढेर सारी और पुस्तकें उसका इन्तज़ार रही होती हैं। वह पाँच बजे तक लिखता है और फिर सफ़र की ताज़ा कड़ी ब्लॉग के हवाले करता है। फिर दस-ग्यारह बजे उठकर पोस्टिंग की कमियाँ दूर करता है। बस, इस के बाद घंटा डेढ़ घंटा और सो कर परिवार के साथ खाना खाता और फिर दफ़्तर दौड़ जाता है। टुकड़ों में बँटी नींद कभी पूरी नहीं होती। 'शहर सूता, ब्रह्म जागे' वाली नाथों-जोगियों वाली कहावत उस पर लागू होती है।
वडनेरकर ने शब्दों का यह पंगा कोई छह साल से लिया हुआ है जब से दैनिक भास्कर में उस का यह कालम लगातार छप रहा है। उस का कहना है-
" शौक तो पच्चीस साल पुराना है। अपने करम ही हमें मारते हैं, उन्हें ही भुगतना है। बस, गलत नहीं कर रहा, ये सुकून है। जो लिया-सीखा, उसे सबको लौटाना भी चाहिए, इसीलिए इतनी मेहनत। बदले माहौल में पहाड़ पर जाकर सन्यासी तो बन नहीं सकता। धन-सपत्ति है नहीं जो उसके जरिये लोगों का भला कर सकेूं। जन्म से ब्राह्मण, कर्म से ब्राह्मण....यही कर सकता हूँ"
शब्दों को ही परनाये इस शख्स ने दोस्तों-मित्रों को मिलने-जुलने और ज़िंदगी के ओर झमेलों से एक तरह सन्यास लिया हुआ है। उस के इस जुनून बारे में किसी ने कटाक्ष किया था कि 26 नवंबर, 2008 को बम्बई में दहशतगर्दों के हमले दौरान जब सभी भारत में हाहाकार मच मच गई थी तब भी उसने मेज़ से उठकर अपना चिट्ठा लिखना न छोड़ा। वह त्रिकाल और समूचे ब्रह्माण्ड के दर्शन शब्दों से ही कर लेता है। अपनी भाषा के प्रति इतनी लगन और प्रतिबद्धता कम ही देखने को मिलती है। शब्द-निरुक्ति का ऐसा शैदायी मुझे अपने पूर्व सहकर्मी जी.एस. रयाल में देखने को मिला था, जिसने इस काम में मेरी भी रुचि जगाई थी। रयाल साहब का अधिक ज्ञान कोशों तक ही सीमित थी जब कि वडनेरकर ने इसको मौलिक अध्ययन के साथ समृद्ध बनाया है। कई बार तो इस तरह लगता है कि एक ही शब्द को गहराई में समझने के लिए उसे कई किताबें और संदर्भ टटोलने पड़े होंगे।
पंजाब के शहर कसूर के नाम बारे प्रचलित धारणा है कि यह राम के बेटे कुछ से बना है। punjab timesपरन्तु वडनेरकर की दलील है कि इसका शुरू अरबी का धातू कस्र है, जिस का मतलब काटना, छिलना तराशना होता है, इसी से विकसित ढिंढोरे अर्थ खुंटे बनाने की तरफ चले गया है। यह बात मानने योग्यहै, कसूर में 12 बड़े गढ़ हैं जो यहाँ के शासकों ने अफगान हमलों से रोकनो के लिए बनाऐ। इतिहास में और भी कई कसूर आते हैं। सिक्खों को यह जानके अचंभा होगा कि जिस कारसेवा को वह अपने धर्म की विशेषता समझते हैं, वह करसेवा के रूप में महाराष्ट्र के मन्दिरों में पुराने समय से चल रही है। कारसेवा से भाव कारजसेवा या सरोवर में से कअर (अरबी शब्द, भाव कीचड़) निकालने की सेवा नहीं जैसा कि कोशकर्ता बताते हैं, बल्कि हाथों (कर = हाथ) की सेवा है। शब्दों के अतीत से यह बात भली भाँति दृढ़ हो जाती है कि शब्द सही मायनों में मानव जाति की एकता उजागर करते हैं। इन की पेशकदमी के आगे देश, धर्म, भाषा की हदे रुकावट नहीं। वडनेरकर के चिट्ठों में असंख्य मिसालें मौजूद हैं जो शब्दों की यायावरी सिफ़त और उनकी गहराई बताती हैं। मुझे यह लिखने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि मैं अपने लेखों में उस की लिखतें से भी सहायता लेता हूँ।
यह लेख लिखने का संयोग इस लिए बना क्योंकि पढ़ने वालों की सुविधा के लिए वडनेरकर ने बहुत से आलेखों को संकलित करके पुस्तक रूप में प्रकाशित कर दिया है। उस की यह प्राप्ति सिर्फ़ हिंदी के लिए ही लाभपरक नहीं बल्कि भारत की सभी हिंद-आर्यायी भाषायों के लिए है क्योंकि प्रत्येक की प्राथमिक शब्दावली एक है। वैसे भी उसके लेखों में जगह जगह पर कई ठुक्कदार, आम पंजाबी शब्दों की भी व्याख्या मिलती है। भारत में अंग्रेज़ विद्वान मोनियर विलियमज़ ने संस्कृत शब्दों का एक विस्तृत निरुक्त तैयार किया था परन्तु हमारे किसी देसी विद्वान ने इस तरफ़ ध्यान कम ही ध्यान दिया है। पंजाबी में तो बहुत ही मामूली काम हुआ है। वडनेरकर के इस ग्रंथ में कोई 1500 शब्दों की निरुक्ति उपलब्ध हैं। उस की योजना दस खण्डों में दस हज़ार शब्दों की व्युत्पत्ति और विवेचना की है जिस के लिए दो खंड अभी तैयार पड़े हैं। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की कीमत 600 रुपए होने के बावजूद विमोचन समारोह के दौरान रखी सभी किताबें हाथों-हाथ बिक गईं।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 31, 2010

अमेरिकी पंजाबी पत्रिका में शब्दों का सफ़र

baljeet-basi_thumb6... सफ़र के पाठक बलजीत बासी को सिर्फ़ एक साथी के तौर पर जानते हैं। बासी जी मूलतः पंजाबी के कोशकार हैं। पंजाब विश्वविद्यालय के अंतर्गत पंजाबी अंग्रेजी कोश की एक बड़ी परियोजना से दो दशकों तक जुड़े रहे। ज़ाहिर है शब्द व्युत्पत्ति में उनकी गहन रुचि है।बाद में वह प्रोजेक्ट पूरा हो जाने पर वे अमेरिका के मिशिगन स्टेट में जा बसे। अब कभी कभार ही इधर आना होता है। वहाँ भी वे अपना शौक बरक़रार रखे हैं। अमेरिका में खासी तादाद में पंजाबीभाषी बसे हैं और इसीलिए वहाँ कई अख़बार, मैग़ज़ीन आदि इस भाषा में निकलते हैं। इनमें से एक है शिकागो, न्यूयॉर्क और सैनफ्रान्सिस्को से प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक पंजाब टाइम्स, जिसमें वे नियमित स्तम्भ लिखते हैं। बासी जी ने इसके ताज़ा अंक में सफ़र के पुस्तकाकार आने के संदर्भ में एक परिचयात्मक आलेख लिखा है जिसका गुरुमुखी से देवनागरी में किया मशीनी अनुवाद खुद उन्होंने हमें भेजा है। उन्होंने ताक़ीद किया है कि इसमें से हम जो चाहें काट सकते हैं, सिवाय उन अल्फ़ाज़ के जो उन्होंने हमारी तारीफ़ में कहे हैं। हम पूरा आलेख दो किस्तों में छाप रहे हैं। आप समझ ही गए होंगे क्यों। अब सेल्फ प्रमोशन और मार्केटिंग का ज़माना है, सो हम भी पूरी बेशर्मी से अपने ही ब्लॉग पर मियाँ मिट्ठू बनने की हिमाक़त दिखा रहे हैं।

शब्दों का मुसाफ़िर-1/-बलजीत बासी
व ह बुनियादी तौर पर हिंदी का पत्रकार है। पिछले पच्चीस वर्षों से प्रिंट और टीवी के साथ जुड़ा हुआ है। जन्म से मराठीभाषी है, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रहता है, ननिहाल हरिद्वार में हैं। बचपन में कुछ अर्सा पंजाब के होशियारपुर जिले के टांडा कस्बे में रहकर यहाँ के राजमा और चना-सरसों के साग का स्वाद चख चुका है। हरिद्वार में उसके ननिहाल घर के पड़ोस में गुरुद्वारा होता था, जहाँ से बचपन में  गुरबानी के कीर्तन का रस उसके कानों में दिन रात घुलता  रहता थी। वह हिंदी अख़बार दैनिक  भास्कर के भोपाल एडीशन में न्यज़ एडिटर के तौर पर काम कर रहा है,  परन्तु शब्दों की तितलियाँ पकड़ना उसका चस्का है। शब्दों की निरुक्ति दर्शाता शब्दावली नाम का उसका चिट्ठा  ( हिंदी वाले ब्लाग को चिट्ठा कहते हैं ) लगभग हर रोज़ अपडेट होता है, जिसके पाठकों की संख्या एक हज़ार पार कर चुकी है। 15000 के आसपास हिंदी के ब्लॉगों में से पाठकों की तादाद के पक्ष से उसका नंबर दूसरे स्थान पर है। यह एक चमत्कार ही है कि निपट  शब्दों के आसपास घूमते एक ब्लॉग के इतने सारे रसिया हैं।
पंजाबी के किसी मासिक त्रैमासिक की इतनी संख्या नहीं है जितने पाठक रोज़ाना इस ब्लॉग पर आते हैं। इतना ही बस नहीं, कई बड़े हिन्दी अख़बार, ब्लॉग तथा वेबसाइटें उसके आलेखों को लगातार प्रकाशित करते रहते हैं। हर रोज़ बेसब्री के साथ सफ़र की नई पोस्ट का इंतजार करनेवाले उसके पाठकों में हिंदी के साहित्यकार, भाषाविज्ञानी, प्राध्यापक, कंप्यूटर विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी शामिल हैं। उसने अपने विशाल ज्ञान, तार्किक विवेचना और क़िस्सागो शैली के साथ पाठकों के पल्ले यह बात डाल दी है कि सामान्य शब्दों के आवरण नीचे हमारी संस्कृति, इतिहास और पुरातत्व आदि का कितना कुछ छिपा पड़ा है। इस प्रतिभाशाली शब्दार्थी का नाम है अजित वडनेरकर। क़रीब दो साल पहले मुझे किसी लेख के लिए साग-सब्जी के चित्र की ज़रूरत थी। चित्र ढूँढने के लिए मैं ने गुग्गल बाण छोड़ दिया और नतीजे में अजित वडनेरकर के ब्लॉग का हवाला मेरे सामने आ खड़ा हुआ। तब हिंदी मुझसे झोली झोली ही पढ़ी जाती थी परन्तु उसकी लेखनी इतनी रोचक, जानकारीपूर्ण और तार्किक थी कि मुझे पता ही न लगा, कब हिंदी मेरे लिए एकदम सरल-सहज हो गई।punjab-times8 और तो और, मैं ने उसकी पोस्टों पर टिप्पणियाँ देनीं शुरू कर दीं। अजित भाई ने गंभीरता के साथ मेरा नोटिस लेना शुरू कर दिया। कभी कभी हमारे में नोक-झोंक भी होने लगी। वह मेरे से नाराज़ हो जाता और झीकता - “ मैं हड़बडी में रहता हूँ, ध्यान के साथ नहीं पढ़ता” वगैरह वगैरह। उस की बात अक्सर ठीक होती परन्तु मैं ने भी शब्दों पर दो दशक से ज्यादा वक्त लगाया है। वह मेरी टिप्पणियों का विस्तृत जवाब देता -ईमेल के द्वारा, निजी तौर पर भी और ब्लाग के द्वारा भी। कोश महकमों के लंबे तजुर्बो ने मुझे सिखाया था कि शब्दों के अर्थ को बहुत सावधानी के साथ खोजना चाहिए। गाँव देहात की गलियों, बोलियों में टहलते डोलते शब्दों का बाहरी चोला चाहे देशी हो, उनकी आत्मा अंतरराष्ट्रीय होती है। इन के मर्म तक पहुँचने के लिए अंतरराष्ट्रीय दृष्टि अपेक्षित है। वडनेरकर कई बारी मेरी बात मानकर अपने लेख का संशोधन कर लेता। परन्तु मुझे भी बहुत बार उलाहने झेलने पड़े। आखिरकार हमारे तेज़-तुर्श और नोक-झोक वाले रिश्तों में मधुरता आ ही गई।
वडनेरकर की शब्द निभाने की ख़ूबसूरती इस बात में है कि वह निरुक्ति सुलझाने के लिए शब्द के मूल में गहरा उतर जाता है। उस का शब्द-ज्ञान सीमित नहीं बल्कि विस्तृत अध्ययन से उपजा है जिस में वेद, शास्त्र, पुराण और विश्व भर का किताबी घसमाण शामिल है। बहुत से भाषाविज्ञानी विराट जीवन से निखुट्टे शब्द जाल में ही घुसे रहते हैं, जिससे भाषा विज्ञान संबंधी लेखन खुश्क और नीरस जान पड़ता है। सुलझे हुए वडनेरकर की शैली बोझिल नहीं बल्कि सधी हुई, प्रौढ़, दुनियादार और अक्सर उदात्त है, जिस में से एक निराली विधा उदयमान हो रही प्रतीत होती है। वह भारत की तकरीबन सभी, ख़ास तौर पर उत्तरी भाषाओ की निराली रूह का वाकिफ है। मेरे देखते-देखते ही वह कहीं का कहीं पहुँच गया है ; अब तो दुनिया भर की बोलियों को सहज भाव से ही अपने मूल सफ़र के कलेवर में ले लेता है। लगातार गतिशील शब्दों के सफ़र में अब वह ग़ैर-भारोपीय भाषाओं की भारोपीय भाषाओँ के साथ साझेदारी भी प्रमाणित करने लगा है।
 -जारी

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, December 28, 2010

जिन्न का जनाज़ा और जीनियस

abook-002_thumb1_thumb6दिल्ली के प्रगति मैदान में शनिवार से पुस्तक मेला शुरू हो चुका है। सफ़र के जो पाठक इस मौके पर वहाँ जाने की सोच रहे हैं, वे कृपया राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर ज़रूर जाएं और शब्दों का सफ़र के प्रकाशित क़िताबी रूप को भी ज़रूर देखें। हो सके तो ख़रीदें भी।
aladdin-wallpaper-aladdin-6615033-1024-768
भूत वह नहीं है जो आमतौर पर समझा जाता है। हिन्दी में भूत का आम अर्थ है प्रेत, पिशाच, मृतात्मा, अतृप्त आत्मा, पारलौकिक शक्ति आदि। हिन्दी मे एक अन्य शब्द भी चलता है जिन्न जिसका अर्थ भी भूत-प्रेत, पिशाच या अदृष्य आत्मा होता है। ऐसा माना जाता है कि सत्कर्म करनेवाले मनुष्य को मृत्यु के उपरान्त मोक्ष प्राप्त हो जाता है मगर पापी मनुष्य की आत्मा मायाजाल से मुक्त नहीं हो पाती और संसार चक्र में ही भटकती रहती है जिन्हें मोटे तौर पर भूत, पिशाच, प्रेत या जिन्न कहा जाता है। जिन्न मूल रूप से सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है और बरास्ता अरब-फ़ारसी यह हिन्दी में दाखिल हुआ। जिन्न बना है j-n-n या g-n-h से जिसमें छिपना, ढकना, गुप्त, अदृष्य होने जैसे भाव है। इसके साथ ही इसमें आवरण या खाल का भाव भी है। इस धातु से कई सेमिटिक परिवार की भाषाओं में बहुत से शब्द बने हैं। गौरतलब है कि सेमिटिक परिवार में मूलरूप से ज वर्ण ग में बदलता है। फ़ारसी-उर्दू-हिन्दी में जिसे हम जमाल उच्चारते हैं वह दरअसल अरबी में गमाल है सो जिन्न के बारे में बात करते हुए हम इसके j-n-n या g-n-h दोनों रूपों को ध्यान में रखें। j-n-n या g-n-h हालाँकि सेमिटिक धातु है मगर कहीं न कहीं इसका रिश्ता भारोपीय भाषा परिवार से भी जुड़ता है।
जनाज़ा हिन्दी का जाना-पहचाना और खूब इस्तेमाल होने वाला लफ़्ज़ है। मूल रूप में यह जनाजः है। विसर्ग का रूपान्तर अक्सर आ की मात्रा में होता है अतः हिन्दी उर्दू में यह जनाजा हो जाता है। इसका एक अन्य रूप जिनाजः भी है जिससे इसकी जिन्न से रिश्तेदारी प्रकट होती है। गौर करें j-n-n धातु में निहित भावों पर जिसमें ढकने, अदृष्य होने या आवरण का भाव है। जनाज़ा का अर्थ होता है कफ़न में लिपटा शव या कपड़े में लिपटी लाश। उस ताबूत को भी जनाज़ा कहते हैं जिसमें रखकर शव को दफ़नाने ले जाया जाता है। आवरण का भाव यहाँ स्पष्ट हो रहा है। अक्सर हिन्दी क्षेत्रों में जनाज़ा का अर्थ शवयात्रा से लगाया जाता है। जनाज़ा निकलना यानी शवयात्रा। दरहक़ीक़त इसमें शव को कब्रस्तान ले जाने का भाव है यानी कफ़न या ताबूत में बंद शव को दफ़न करने के लिए ले जाने की क्रिया। इसी तरह j-n-n से बने जिन्न के पीछे जो धार्मिक भाव है उसके अनुसार जिन्न वह प्राणी है जिसका जन्म अग्नि से होता है और जो अदृष्य है। अरबी पौराणिक कथाओं के अनुसार यह देवदूतों या शैतानों से निचले क्रम की आत्माएं होती हैं जो आग या हवा से जन्म लेती हैं और इन्सानी रूप ले सकती हैं। इसके बावजूद ये हैं अलौकिक ही और इन्हें मूलतः मनुष्य की शरीर से निकली अनिष्टकारी शक्ति या आत्मा के रूप में ही देखा जाता है। अदृष्य होने के भाव पर गौर करें। वैसे आत्मा के शरीर रूपी आवरण में ढके होने से भी इसके धातु आधार की पुष्टि होती है। अरबी में इसके जिन्न, जिन्नी या जिन रूप भी प्रचलित हैं। जिन का बहुवचन जिन्न या जिन्नात होता है। भूत-प्रेतों से सम्बन्धित के लिए जिन्नाती शब्द है और जिन्नी का अर्थ है भूत-प्रेतों को वश में रखनेवाला। जनाज़ा शब्द कई भाषाओं में है जैसे इंडोनेशियाई में यह जेनाज़ाह है तो स्वाहिली में जेनेजा, तुर्की में सेनेज़े है। जिन्न अब अंग्रेजी में भी जिनी के रूप में है।
अरब समाज में जिन्नों को प्रेरक आत्माओं के तौर पर भी देखा जाता है और माना जाता है कि कवि-कलाकारों से अपूर्व कार्य कराने में जिन्नी ताक़तों का हाथ होता है। अलिफ़लैला की कथाओं के जरिए जिन्नों को अरबी लोककथाओं का हिस्सा बनने का मौका मिला और फ़ारस से लेकर अरब और सीरिया तक के लोकसाहित्य में जिन्न विशिष्ट पात्रों के रूप में रूबरू
Genius... अवतारी पुरुष का रिश्ता लोक और परलोक दोनों से होता है इसलिए उसमें असामान्य शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं जिन्हें दैवीय शक्ति कहते हैं। किसी समस्या का निदान दरअसल कठिनाई से आवरण का हटना ही है। बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा से समाज को संकटों से उबारते रहे हैं। इनकी बुद्धि से हल हुए कार्यों को लोग चमत्कार समझते थे। ...
होते हैं। अलादीन के पास जो चिराग़ था, अगर उसमें जिन्न बंद न होता तो दुनिया आनेवाली पीढ़ियों में जिन्न एक गै़बी दुनिया के एक दिलचस्प क़िरदार के तौर पर इतना मक़बूल हरगिज़ न हुआ होता।  हिन्दी में भूत चढ़ना का अर्थ भूताविष्ट होना होता है। इसमें बुरी आत्मा से ग्रस्त होना भी शामिल है और अतिमानवीय ऊर्जा से किसी काम में जुटना भी है। भूत की तरह काम करना का अर्थ ही सामान्य व्यक्ति से ज्यादा काम करनेवाला होता है। निश्चित ही कलाकार की कला ही उसे सामान्य से अलग करती है। अगर विशिष्ट कर्म को जिन्नों या भूतों की देन मान लिया गया तो आश्चर्य क्या? यूँ भी मनुष्य की इच्छा अतिमानवीय कार्य करने की रही है और इसी वजह से वह तंत्र मंत्र के जरिए भूत-पिशाच सिद्धि के जतन करता है। क़िस्से कहानियों में प्रतापी सम्राटों नें अतींद्रिय शक्तियों के लिए शिव की सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। शिव को भूतनाथ इसीलिए कहते हैं क्योंकि वे स्थूल और सूक्ष्म जगत के स्वामी है। मनुष्य स्थूल जगत का जीव है जबकि आत्माएँ सूक्ष्म जगत के जीव हैं।
अंग्रेजी का एक शब्द है जीनियस जिसका अर्थ है किसी कार्य में प्रवीण, अत्यधिक प्रतिभावान, कुशाग्र, तीक्ष्ण बुद्धिवाला वगैरह। इस जीनियस का रिश्ता भी जिन्न से जुड़ता है। अंग्रजी का जीनियस मूलतः भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और लैटिन के genius से बना है जिसमें एक ऐसी अलौकिक आत्मा का भाव है जो सर्वव्यापी, सर्वज्ञ है। इसमें संरक्षक, ईश्वर, विधाता आदि का भाव है। इसी अर्थ में कालांतर में ईश्वरीय गुणों से युक्त व्यक्ति को अवतारी पुरुष कहा जाने लगा। अवतारी पुरुष का रिश्ता लोक और परलोक दोनों से होता है इसलिए उसमें असामान्य शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं जिन्हें दैवीय शक्ति कहते हैं। किसी समस्या का निदान दरअसल कठिनाई से आवरण का हटना ही है। बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा से समाज को संकटों से उबारते रहे हैं। इनकी बुद्धि से हल हुए कार्यों को लोग चमत्कार समझते थे। आमतौर पर हवा से कुछ पैदा करना ही सबसे बड़ा चमत्कार रहा है। इसे ही ग़ैबी या दैवी ताक़त कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल किन्हीं कलाबाजोयों के ज़रिए चतुर लोग बाद में करने लगे। ज्ञान, बुद्धि और बल के जरिए ही व्यक्ति किसी समूह में नेतृत्व प्राप्त करता है। जीनियस की अर्थवत्ता पहले इसी रूप में थी। बाद में सर्वज्ञ अथवा कुशाग्र के रूप में इसके मायने सिमट गए।
भारोपीय मूल धातु gen से बना है जीनियस जिसमें पैदा करने, होने, उत्पन्न करने का भाव है। जीनियस में यही पैदा करने का भाव पहले था। एक ऐसा व्यक्ति जो नैसर्गिक प्रतिभा का धनी हो। यानी जो किसी भी समस्या का हल ढूंढ निकाले। इस gen का रिश्ता ही संस्कृत धातु जन् से जुड़ता है। जिन्न में जिस तरह अदृष्य होने का भाव प्रमुख है, वही बात कुछ अलग ढंग से शून्य से कुछ उत्पन्न करने में, पैदा होने में, जन्म लेने में नज़र आती है। देवनागरी के ज वर्ण में उत्पन्न, वंशज, अवतीर्ण या पैदा होने का भाव है। संस्कृत की जन् धातु में पैदा होना, उत्पन्न होना, उगना, उठना, फूटना, होना, बनना, निर्माण-सृजन ( जन्म के संबंध में ), रचा जाना, परिणत होना जैसे अर्थ छुपे हैं। जन् से ही बना है जीव अर्थात प्राणी। जीव वह है जिसका जन्म हुआ है। जन् धातु रूप का ही रूपांतर अवेस्ता में ज़ात होता है। हिन्दी का जन, जनता जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। अंग्रेजी के जेनरेशन, जेनरेटर, जेनरिक जैसे शब्दों समेत यूरोपीय भाषाओं की शब्दावली को इस धातु ने समृद्ध किया है। हिन्दी का जीवन और फारसी का ज़िंदगी इसी शृंखला में हैं। अरबी-फारसी में महिला के लिए एक अन्य शब्द है ज़न जिसकी रिश्तेदारी इंडो-ईरानी भाषा परिवार के जन् शब्द से है जिसमें जन्म देने का भाव है। ज़नानी या ज़नान जैसे रूप भी प्रचलित हैं। संस्कृत में उत्पन्न करने, उत्पादन करने के अर्थ में जन् धातु है। इससे बना है जनिः, जनिका, जनी जैसे शब्द जिनका मतलब होता है स्त्री, माता, पत्नी। जिससे हिन्दी-उर्दू के जन्म, जननि, जान, जन्तु जैसे अनेक शब्द बने हैं। जन् में उगने, उत्पन्न होने के भाव पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि उगना या उत्पन्न होना अपने आप में किसी छाया, पृष्ठभूमि या आंतरिकता से बाहर आना है।  
अगली कड़ी-मजनूँ की औलाद और दीवाना 
-जारी
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


Blog Widget by LinkWithin