Wednesday, October 7, 2009

चारागर का चालचलन [हकीम-2]

CharakSanhita
जो दवा के नाम पे जहर दे, उसी चारागर की तलाश है’ बचपन से यह कव्वाली सुनते आ रहे हैं। बरसों तक इसमें आए चारागर शब्द का मतलब ही नही पता था। बाद में चिकित्सक, हकीम या डॉक्टर के बतौर इसका मतलब पता चला। शब्दों के सफर में निकले तब जान पाए कि चारागर का रिश्ता किस तरह इलाज करनेवाले से जुड़ता है।

पिछली कड़ी-अल्लाह की हिक्मत और हुक्मरान [हकीम-2]

चा  रागर शब्द यूं तो फारसी ज़बान से हिन्दी में आया है मगर यह मूलतः इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और इसका रिश्ता संस्कृत-अवेस्ता से है। संस्कृत में एक धातु है चर् जिसमें घूमना-फिरना, गति, चलना, चक्कर काटना, भ्रमण करना आदि भाव हैं। यूं चर् धातु में विभिन्न तरह के दैनन्दिन क्रियाकलाप शामिल हैं जिनमें एक भोजन करना भी इसका अर्थ है। आपटे कोश में इस धातु का परम अर्थ दिया है वह है चलते जाना, जीना, किसी न किसी अवस्था में विद्यमान रहना। यही बात प्रसिद्ध उक्ति चरैवेति-चरैवेति के दार्शनिक अर्थों में भी समायी है। अरब के हकीम  शब्द की तरह ही चारागर शब्द भी ज्ञानपरम्परा से अपनी अर्थवत्ता ग्रहण करता है, मगर ज़रा दूसरे ढंग से। हकीम शब्द बना है सेमिटिक धातु ह-क-म (हा-काफ-मीम) से। इस धातु में बुद्धिमान होना, जानकार होना, ज्ञान और अपने आसपास की जानकारी होने का भाव है।

kerela_ayurveda गौर करें चर् धातु का ही अगला रूप चल् है जिसमे हिलना, गति करना, कांपना, धड़कना, सैर करना जैसे भाव हैं। हिन्दी का चल, चलना, चलित, चालित जैसे शब्द इससे ही बने हैं। पहाड़ स्थिर होते हैं, कभी चलते नहीं इसलिए चल् में उपसर्ग लगने से मनुष्य ने पर्वत के लिए अचल शब्द बना लिया जिसका लाक्षणिक अर्थ हुआ जो अडिग रहे, टस से मस न हो। चलते-चलते एक लीक बन जाती है। यही चलन है अर्थात ढंग, रीत। प्रचलन भी इससे ही बना है जिसका मतलब भी परम्परा ही है। मार्ग से भटकना अथवा गलत राह पर चलना ही विचलन है। चर् धातु के घूमने फिरने के अर्थों से ही बना है विचरण। घुमक्कड़ी और पर्यटन का ज्ञान से गहरा रिश्ता है। यायावरी अर्थात अर्थात विचरण से जिसने जैसा ज्ञान अर्जित किया वही उसका चरित्र बना। इसमें व्यभि लगने से बना व्यभिचार अर्थात गलत राह पर चलना, कपटपूर्ण व्यवहार, विश्वासघात आदि।  आचरण शब्द भी इसी मूल से आ रहा है। चल् से बने चलन से हिन्दुस्तानी में एक मुहावरा बना चाल-चलन जिसे किसी व्यक्ति के मूल्यांकन का आधार माना जाता है। दरअसल यही चरित्र है। जीवनी, इतिहास और साहस कथाओं के लिए चरित शब्द भी इसी मूल से निकला है जैसे दशकुमारचरित, रामचरितमानस आदि।

नुष्य के लिए घूमना सिर्फ आहार की खोज नहीं था बल्कि उसके भीतर दुनिया को जानने-समझने की सहज जिज्ञासा थी। जिज्ञासा यानी मानसिक भूख। प्राचीन मानव स्वभाव से घुमक्कड़ था। यायावर प्रकृति ने ही मनुष्य को विचारशील बनाया। उससे नई नई खोज करवाई। चर् धातु में वि उपसर्ग लगने से ही बना है है विचार जिसमें सोच, ज्ञान, विमर्श, बातचीत जैसे भाव शामिल हैं। विचार का अर्थ उपाय भी होता है। घुमक्कड़ी वही नही है जो बाहर होती है। एक यात्रा मन की होती है जिसे चिंतन कहते हैं। चिंतन-मनन के दौरान ही विचार उत्पन्न होते हैं। चर् से ही बना है विचरण जिसमें गति का भाव है। स्पष्ट है कि मन की गति ही विचारों को जन्म देती है। पशुओं की आहार समस्या का निदान चारा है। मनुष्य की मानसिक खुराक विचार है। फारसी में चारा शब्द में उपाय की अर्थवत्ता समा गई। प्रकृति ने सभी जीवधारियों को पैदा किया। जीव के जन्म के साथ ही गति, हलचल जुड़ी है। आहार जुटाने के लिए प्रत्येक जीवधारी अनादिकाल से ही नानाविध जतन करता आ रहा है। कारोबारे-दुनिया की सभी क्रियाएं मूलतः आहार जुटाने की कोशिश ही है।

चरणवंदना क्यों...हिन्दी में चरणवंदना की अर्थवत्ता अब बदल गई है और इसका अर्थ चापलूसी से लगाया जाता है। 1216721627lakshmi_padukaवैसे चरणस्पर्श की परम्परा के पीछे गहरी सोच छुपी है। चरण शब्द बना है संस्कृत के चरणः से जिसका जन्म हुआ है चर् धातु से। इसका अर्थ है चलना, भ्रमण करना, अभ्यास करना आदि। एक अन्य अर्थ भी है – सृष्टि की समस्त रचना। इसी से बना है चरण जिसका मतलब है पैर यानी जो चलते-फिरते हैं, भ्रमण करते हैं। गौरतलब है कि प्राचीनकाल में ज्ञानार्जन का बड़ा ज़रिया देशाटन भी था। चूंकि घूमें-फिरे बिना दुनिया की जानकारी हासिल करना असंभव था इसलिए जो जितना बड़ा घुमक्कड़, उतना बड़ा ज्ञानी। चूंकि पैरों से चलकर ही मनुष्य ने ज्ञानार्जन किया है इसीलिए प्रतीकस्वरूप उन्हे स्पर्श कर उस व्यक्ति के अनुभवों को मान्यता प्रदान करने का भाव महत्वपूर्ण है। घूमने फिरने पुराने जमाने में राजाओं के संदेश लाने ले जाने का काम करनेवाले दूतों को भी चर या चारण कहते थे । राजस्थान की एक जाति का नाम भी इसी आधार पर पड़ा है।

कम से कम कहावतों-मुहावरों में तो यही सच है। चर् धातु में गति और हलचल के भाव को मनुष्य द्वारा रोजीरोटी जुटाने प्रयास के तौर पर ही देखना चाहिए। चारा शब्द को आमतौर पर पशुआहार के रूप में देखा जाता है जो इसी मूल से जन्मा है। गौर करें मवेशी चलते-चलते घास खाते हैं इसीलिए चरना में घास खाने का भाव ही निहित है। चरागाह या चारागाह शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं।
किन्हीं समस्याओं के निदान के लिए विचार-विमर्श एक अनिवार्य प्रक्रिया है। अर्थात वैचारिक आदान-प्रदान जो दरअसल यात्रा है, विचरण है। प्राचीनकाल में किसी रोग का इलाज करना दरअसल उपाय तलाशना ही था। रोग समस्या है और चारा इलाज। अर्थात जो महानुभाव चारा यानी निदान प्रदान करे, वह चारागर है। इसीलिए इलाज के अर्थ में चारागरी शब्द प्रचलित हुआ। जब किसी समस्या का कोई हल या इलाज न निकले तब क्या होता है सिवाय इसके कि आप असहाय महसूस करें सो चारा में अरबी-फारसी का ला उपसर्ग लगने से लाचार, लाचारी जैसे शब्द बने। इन्ही हालात को बयां करने के लिए अरबी का बे उपसर्ग लगने से बने बेचारा, बेचारगी जैसे शब्द। हिन्दी में इनके बिचारा, बिचारी जैसे रूप भी प्रचलित हैं। देहात में किसी बच्चे को अगर कोई बिचारा कह दे तो उसके माता-पिता बुरा मान जाते हैं। जाहिर है बिचारा को अनाथ के अर्थ मे देखा जाता है।
र् धातु से संस्कृत में एक शब्द बना है चर्या जिसका अर्थ गतिविधि, घूमना-फिरना ही है मगर देखभाल करने का भाव शामिल हो गया है। दिनचर्या का मतलब हुआ दिनभर के क्रियाकलाप। प्राचीनकाल में इस खाते में ज्यादातर घुमक्कड़ी ही आती थी। इसमें परि उपसर्ग लगने से बना है परिचर्या यानी देखभाल करना। गौर करें इसमें मूलतः घूमफिर कर देखभाल करने का भाव शामिल है। इससे ही बने परिचर शब्द में यह भाव और भी स्पष्ट हो रहा है जिसका अर्थ सेवा-टहल करनेवाला ही होता है। अनुचर का मतलब हुआ पीछे चलनेवाला अर्थात सहायक, टहलुआ।  इलाज के अर्थ में हिन्दी में उपचार शब्द प्रचलित है। यह भी चर् धातु में उप उपसर्ग लगने से बना है। उपचार में फारसी के चारा शब्द का अर्थ स्पष्ट है। चर् शब्द में उपाय, इलाज जैसे शब्दों की पूर्णता सिद्ध होती है आयुर्वेद के महान महर्षि चरक के नाम से जो इसी धातु से बना है। चरक भारतीय ओषधि विज्ञान के प्रणेता माने जाते हैं। चरक संहिता भारतीय शैली की वैद्यक परम्परा का विलक्षण ग्रन्थ माना जाता है। ये ईसा की पहली सदी में हुए थे। चरक संहिता में विभिन्न रोगों का उपचार बताया गया है। यूं चरकः का अर्थ होता है दूत, रमता जोगी अथवा परिव्राजक। गौर करें, परिव्राजक का अर्थ होता है जिसने घर त्याग दिया हो। व्रज् धातु में जाना, गमन करना का भाव है।

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15 कमेंट्स:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

फालोवर की जगह टहलुआ कहा जाए तो कैसा लगेगा . आप हिंदी के परिचर हो और हम आपके अनुचर

अजय कुमार झा said...

इसका मतलब हम सबके अनुचर हो रहे हैं ब्लोग्गिंग में...ये बढिया है अजित जी फ़ौलोवर से तो ..शब्द संपदा हमारी भी बढ रही है आपको पढ पढ के..

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

महत्वपूर्ण कड़ी है यह। विचार का चारा पसंद आया। बेचारा बुद्धिजीवी!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

वडनेकर जी!
हन भी तो चारागर की ही तलाश में थे।
अहोभाग्य कि आपने ये इस तलाश को खंगाल दिया।

डा० अमर कुमार said...


तँत्रोक्त मँत्रों में भी बीज रूप से ’ च ’ को सतत स्फुरण एवँ परिचालन के सँदर्भ में प्रयोग किया गया है ।
आपका आलेख रोमाँचित कर देता है ।

kshama said...

एक' चारागर' की तलाश थी...मिल गया...

eSwami said...

आज वाली पोस्ट के कुछ हिस्से हजम नही हुए.

चरणस्पर्श करने का कारण जो मुझे पता है वो यह धारणा की आध्यात्मिक ऊर्जा पैर के अंगूठों से बहती/निकलती है अत: उन्हे छूने वाला स्वयं पर आध्यात्मिक शक्तिपात/आशीर्वाद दिये जाने की प्रार्थना कर रहा होता है. इसका ज्ञान से अधिक आशीर्वाद पाने से संबंध है.

भगवान विष्णू के पैरों की पूजा भी इसी लिये की जाती है की वे मूल रचनाकार हैं, जिनकी इच्छा से सब जन्मा, अत: आध्यात्मिक ऊर्जा के स्त्रोत हैं.

शोभना चौरे said...

घुमक्कड़ी वही नही है जो बाहर होती है। एक यात्रा मन की होती है जिसे चिंतन कहते हैं। चिंतन-मनन के दौरान ही विचार उत्पन्न होते है
चारागर का सफर तो ज्ञानवर्धक है ही |कितु मुझे इन पंक्तियों ने आकर्षित किया |
आभार

अजित वडनेरकर said...

@ईस्वामी
स्वामीजी, जब ईश्वर का आविष्कार हो चुका था। महिमामंडन भी हो चुका था, क्या उस वक्त पैर छूने की परम्परा शुरू हुई? याद रखें जिस इतिहास की आप बात कर रहे हैं उस दौर में मानव ने हर नजर से तरक्की हासिल कर ली थी जबकि शब्दों का सफर मानव की विकास यात्रा के साथ चलता है। समाज की सोच के साथ शब्दों का बर्ताव बदलता है औऱ वह नए रूप में ढलता है।

ईश्वर तो कहीं चलते-फिरते नहीं, फिर उनके पैरों की धुलाई क्यों होती है? पैर सिर्फ इसलिए धोए जाते हैं क्योंकि उन पर धुलिकण लग जाते हैं।
मनुष्य ने ईश्वर को खुद से अलग भी माना मगर उसे हमेशा मानवीकृत संस्कारो में ढाला। आस्था, श्रद्धा के आईने में देखें तब चरणामृत का अर्थ कुछ निकलता है वर्ना क्या सामान्य मनुष्य के पादप्रक्षालन वाला पानी क्या चरणामृत कहे जाने और पीने योग्य है? मनुष्य पानी से नहाता है और ईश्वर को हम दूध, घी से नहलाते हैं। साफ-सुथरे ईश्वर के शरीर पर लगा दूध-घी व्यर्थ क्यों जाए, सो चरणामृत बन गया। क्या कोई भी सामान्य व्यक्ति इन पदार्थों से नहाकर स्वस्थ रह सकता है? आस्था ही ईश्वर के साथ वही सारे संस्कार कराती है, सामान्य मनुष्य जिन्हें नित्य करता है मगर आडम्बर और तामझाम के साथ नहीं।

विष्णु, अंगूठा, ऊर्जा ये सब बहुत बाद के दौर की बातें हैं। यूं आप भी धारणा शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। मैने भी विवेचना का प्रयास ही किया है।

sthaan-naam said...

ajit bhai
main apki post mein dekhta hun ki kisi shabda ke kisi auchuye pahalu ko khojun par mujhe nirasha hath lagti hai.
rakesh narayan dwivedi

अशोक कुमार पाण्डेय said...

charan sparsh का कोई sambandh kahiin chaturvarn vyavastha से तो nahii है?
charan से shoodra janme...isliye pair हुआ sharii का shoodra..और samman के लिए hamane आपके charan choye..yaani sabase ''adham'' chiiz..
मुझे kisii ने bataayaa ही था और usake बाद से choonaa chulana दोनों बंद....( bhashaa का यह रूप aapake bakse की kirpa से)

गिरिजेश राव said...

माठा में से 'रहिए' गायब !
अरे, चारागर का अर्थ तो बता देते !!
..शब्द तो बहुत हो गए अब वाक्यों की ओर भी दृष्टि डालें। ब्लॉगजगत को आप विविध लेखन से भी समृद्ध कर सकते हैं। सप्ताह में एक दिन ही सही या हर पूर्णमासी - कुछ ललित लिखिए न।

अभिषेक ओझा said...

चारा का भी नया मतलब पता चला !

अजित वडनेरकर said...

क्या कह रहे हैं गिरिजेश भाई,
चारागर से ही तो शुरू हुई है ये पोस्ट। ......अर्थात जो महानुभाव चारा यानि निदान प्रदान करें वे चारागर हैं। इसीलिए इलाज के अर्थ में चारागरी प्रचलित हुआ...
इन पंक्तियों पर से आप शायद सरपट गुजर गए।
आपका जो सुझाव है, उसके बारे में मैं खुद कई बार सोचता हूं। कई फुटकर विषय होते हैं जिनपर विचार आते हैं। मगर शब्दों का सफर दरअसल एक मुहिम जैसा है। मैं दस हजार आम बोलचाल के हिन्दी शब्दों के कोश पर काम कर रहा हूं। अगर इससे भटक गया तो इस काम में वक्त लग जाएगा। फिलहाल एक सूत्री कार्यक्रम की तरह इसी में जुटे रहना चाहता हूं। यूं भी कई नावों की सवारी मैं नहीं कर सकता।
स्नेह बनाए रखें।

गिरिजेश राव said...

मन्दमति 'चारागर' पर से भैंसवार की माफिक सामने देखते ही गुजर गया था। शुरुआत में ही नहीं देखा, अरे सामने ही तो था - चारागर माने हकीम।

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