Wednesday, March 31, 2010

[नामपुराण-6]नेहरू, झुमरीतलैया, कोतवाल, नैनीताल

...आबादी के साथ नहर शब्द तो नहीं जुड़ा मगर नहर किनारे रहने की वजह से एक कश्मीरी पंडित परिवार की पहचान नेहरू हो गई...
लस्रोतों के किनारे धर्म-संस्कृति का भी विकास हुआ। जल से जुड़ी पुण्य की अवधारणा ने ऋषि-मुनियों को भी नदी तट पर वास करने का अवसर दिया। सन्यासी परिव्राजक हमेशा गमनशील रहते थे। बारिश के मौसम में मार्ग अवरुद्ध होने से चातुर्मास की परम्परा विकसित हुई। तब वे सुरम्य स्थलों पर चार माह का विश्राम करते। उस स्थल को धीरे धीरे तीर्थ के रूप में ख्याति मिलने लगती थी। स्वतंत्र पहचान वाले कई नगरों की पहचान इसी तरह मे तीर्थ के रूप में बनी। नदी तट के अलाव विभिन्न सरोवरों के आसपास भी बस्तियां बसीं। भारत में कई बस्तियों के नामों के साथ सर शब्द होता है जिसका अभिप्राय सरोवर ही है जैसे रावतसर, रिवालसर, परबतसर, अमृतसर, घड़सीसर आदि। इसी तरह सरोवर के लिए तालाब, तलैया, ताल जैसे शब्द भी हैं। नैनीताल, भीमताल, मल्लीताल  जैसी आबादियों के नाम तालों को नाम पर ही पड़े हैं। ताल का एक रूप तलैया भी है। ताल शब्द से बने तालाब में बड़े जलाशय का भाव है। इसके साथ प्रायः छोटा या बड़ा विशेषण भी लगाया जाता है। पर विशेषण के चक्कर में ज्यादा पड़े बिना समाज ने छोटे तालाब के लिए तलैया शब्द बना लिया। अब तलैया के किनारे की आबादी के साथ भला यह नाम कैसे नहीं जुड़ता? झारखण्ड का झुमरीतलैया और भोपाल का तलैया मोहल्ला इसकी मिसाल हैं। 

हिन्दी में नाल शब्द का अर्थ है पोला संकरा स्थान। राजस्थानी में दर्रा के अर्थ में नाल शब्द भी चलता है। जलवहन प्रणाली का प्राचीन रूप नाली है। आमतौर पर घरेलु जलनिकास मार्ग को नाली कहते हैं। नाली का बड़ा रूप नाल या नाला होता है। नाला अपने आप में राह या रास्ता भी है। हाड़ौती, मेवाड़ और मारवाड़ के बीच ऐसे कई नाल मौजूद हैं site-of-e copyजैसे देसुरी की नाल, हाथी गुड़ा की नाल, भानपुरा की नाल आदि। नाल का एक रूप नाड़, नाड़ा या नड़ भी है। जोधपुर के एक मौहल्ले का नाम है रातानाड़ा।  नाल दरअसल नहर ही है। आबादी के साथ नहर शब्द तो नहीं जुड़ा मगर कश्मीर का एक पंडित परिवार की पहचान नहर के किनारे रहने की वजह से नेहरू हो गई। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पुरखों का नेहरू उपनाम इसी वजह से पड़ा था। हिन्दी का अपना सा हो गया नहर शब्द मूल रूप से सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है और मूलतः हिब्रू भाषा का शब्द है जहां से यह अरबी में गया और फिर फारसी से होते हुए भारतीय भाषाओं में दाखिल हुआ। हिब्रू व अरबी में नहर की धातु है नह्र यानी n-h-r जिसमें धारा, प्रवाह,  चमक, दिन जैसे कई भाव समाए हैं। हिब्रू में नहर के मायने होते हैं नदी, प्रवाह, उजाला। गौरतलब है प्रवाह, गतिवाचक शब्द है। रफ्तार में निमिष भर देखने का जो भाव है वह चमक से जुड़ रहा है। अरबी में भी नहर का अर्थ नदी, जलस्रोत, जलप्रवाह है। अरब, इराक में नहर का रिश्ता नदी से ही जोड़ा जाता है। वहां की नदियों के साथ नहर शब्द आमतौर पर जुड़ता है जैसे नहरुल अलमास या नहरुल सलाम यानी दजला नदी। 
हाड़ों के निचले हिस्सों में उच्चतम उभारों वाले मैदानी क्षेत्रों को पठार कहते हैं। पठार ऐसे मैदानी क्षेत्र होते हैं जो मध्य में उभार लिए होते हैं और किन्हीं दिशाओं में ढलुआं आकार होता है। ऐसे पठारी क्षेत्र उपजाऊ और बंजर दोनों ही तरह के होते हैं। देश का दक्षिणी हिस्सा दक्षिण का पठार कहलाता है। मालवा का पठार भी प्रसिद्ध है। इसी तरह तिब्बत और मंगोलिया के पठार भी मशहूर हैं। उत्तरी भारत में पठारी विशेषण वाले कई गांव हैं जैसे पठारी मोहल्ला, पठारी खुर्द, पठारी कलां, पठारी ददरिया और पठारी आदि। वृहत हिन्दी कोश में पठार की व्युत्पत्ति पृष्ठाधार (पृष्ठ + आधार) बताई गई है जबकि हिन्दी शब्दसागर में इसकी व्युत्पत्ति पाषाण से बताई गई है। गौरतलब है कि कोट का अर्थ किला, पहाड़, पर्वत, परिधि, घिरा हुआ स्थान आदि होता है। कोट बना है कुटः से जिसमें छप्पर, पहाड़ (कंदरा), जैसे अर्थ समाहित हो गए । इसके अन्य कई रूप भी हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे कुटीर, कुटिया, कुटिरम्। विशाल वृक्षों के तने में बने खोखले कक्ष के लिए कोटरम् शब्द भी इससे ही बना है जो हिन्दी में कोटर के रूप में प्रचलित है। बाद में भवनों, संस्थाओं के नाम के साथ कुटीर, कुटी जैसे शब्द जोड़ने की परम्परा विकसित हुई जैसे रामकुटी, शिवकुटी, पर्णकुटी,  रामदासी कुटिया, चेतनदेव कुटिया, प्रेम कुटीर आदि। किलों के लिए कोट शब्द इसलिए प्रचिलित हुआ क्योंकि इन्हें पहाड़ों पर बनाया जाता था ताकि शत्रु वहां तक आसानी से न पहुंच सके। बाद में मैदानों में भी किले बनें और इन्हें पहाड़ की तरह दुर्भेध्य बनाने के लिए इनकी दीवारों को बहुत ऊंचा और मज़बूत बनाया जाता था। स्पष्ट है कि कोट शब्द में पहाड़ की मजबूती निहित है। आज के कई प्रसिद्ध शहरों मसलन राजकोट, सियालकोट, पठानकोट, कोटा, कोट्टायम आदि शहरों में यही कोट झांक रहा है। कहने की ज़रूरत नहीं कि इन शहरों के नामकरण के पीछे किसी न किसी दुर्ग अथवा किले की उपस्थिति बोल रही है। इसी से बना है परकोटा शब्द जिसका मतलब आमतौर पर चहारदीवारी या किले की प्राचीर होता है। 

कोतवाल शब्द बना है कोटपाल से। संस्कृत में कोट का अर्थ होता है दुर्ग, किला या फोर्ट। प्राचीनकाल में किसी भी राज्य का प्रमुख सामरिक-प्रशासनिक केंद्र पहाडी टीले पर ऊंची दीवारों से घिरे स्थान पर होता था। अमूमन यह स्थान राजधानी के भीतर या बाहर होता था। मुख्य आबादी की बसाहट इसके आसपास होती थी। किले के प्रभारी अधिकारी के लिए कोटपाल शब्द प्रचलित हुआ फारसी में इसके समकक्ष किलेदार शब्द है। कोटपाल के जिम्मे किले की रक्षा के साथ-साथ वहां रहनेवाले सरकारी अमले और अन्य लोगों देखरेख का काम भी होता था। किले या शहर की चहारदीवारी के लिए परकोटा शब्द भी इसी मूल का है जो कोट में परि उपसर्ग लगाने से बना है। परि का अर्थ होता है चारों ओर से। इस तरह अर्थ भी घिरा हुआ या सुरक्षित स्थान हुआ। सर राल्फ लिली टर्नर के शब्दकोश में भी कोटपाल (कोतवाल) शब्द का अर्थ किलेदार यानी commander of a fort ही बताया गया है। कोटपाल का प्राकृत रूप कोट्टवाल हुआ जिससे कोटवार और कोतवाल जैसे रूप बने। किसी ज़माने में कोतवाल के पास पुलिस के साथ साथ मजिस्ट्रेट के अधिकार भी होते थे। दिलचस्प बात यह है कि एक ही मूल से बने कोतवाल और कोटवार जैसे शब्दों में कोटपाल से कोतवाल बनने के बावजूद इस नाम के साथ रसूख बना रहा जबकि कोटवार की इतनी अवनति हुई कि यह पुलिस-प्रशासनिक व्यवस्था के सबसे निचले पायदान का कर्मचारी बनकर रह गया। ग्रामीण क्षेत्र में वनवासी क्षत्रिय जातियों में पुश्तैनी रूप से ग्रामरक्षा की जिम्मेदारी संभालने के चलते कोटवार पद अब कोटवार जाति में तब्दील हो गया है। उधर कोतवाल की जगह कोतवाली का अस्तित्व तो अब भी कायम है मगर कोतवाल पद, पुलिस अधीक्षक के भारीभरकम ओहदे में बदल गया है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी ब्राह्मण वर्ग में कोतवाल उपनाम होता है। पहले यह शासकों द्वारा दी जानेवाली उपाधि थी जो बाद में उनकी पहचान बन गई। कोतवाल शब्द अपने संस्कृत मूल से उठ कर फारसी में भी दाखिल हुआ।

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Tuesday, March 30, 2010

आरामशीन से चरस, रहंट, घट्टी तक

TEE2123

नाज पीसने की चक्की को घट्टी भी कहा जाता है। यह बना है संस्कृत के अरघट्ट से जिसका मतलब भी घूमना, चक्कर लगाना, गोल पहिया आदि है। अरघट्ट बना है अरः+घट्टकः से। अरः का अर्थ है नुकीले दांतोवाला पहिया। अरः बना है धातु से जिसमें घूमना, परिक्रमा, चक्रण, जाना, आना जैसे भाव हैं। देवनागरी का अक्षर दरअसल संस्कृत भाषा का एक मूल शब्द भी है जिसका अर्थ है जाना, पाना। जाहिर है किसी मार्ग पर चलकर कुछ पाने का भाव इसमें समाहित है। जाने-पाने में कर्म या प्रयास का भाव निहित है। की महिमा से कई इंडो यूरोपीय भाषाओं जैसे हिन्दी, उर्दू, फारसी अंग्रेजी, जर्मन वगैरह में दर्जनों ऐसे शब्दों का निर्माण हुआ जिन्हें बोलचाल की भाषा में रोजाना इस्तेमाल किया जाता है। हिन्दी का रीति या रीत शब्द इससे ही निकला है। का जाना और पाना अर्थ इसके ऋत् यानी रीति रूप में और भी साफ हो जाता है अर्थात् उचित राह जाना और सही रीति से कुछ पाना। का प्रतिरूप नजर आता है अंग्रेजी के राइट ( सही-उचित) और जर्मन राख्त (राईट)में।
किसी यंत्र के चक्कों में बनें दांतों पर गौर करें। संस्कृत में इसके लिए ही अरः शब्द है। इन दांतों में फंसी शृंखला घूमते हुए चक्के या गरारी की परिधि में एक के बाद एक परिक्रमा करती है। इस गरारी से बने एक उपकरण का नाम ही रहंट है। अरघट्ट का घट्ट बना है घट् धातु से जिसमें एक करने, मिलाने, संचित करने, टिकने का भाव है। कूप या कुएं में जल संचित होता है, टिकता है, आश्रय पाता है इस तरह घट्ट में कूप का का भाव है सार्थक है। हिन्दी का रहंट शब्द भी इससे ही निकला है। इस तरह अरघट्ट का अर्थ हुआ कुएं से पानी उलीचनेवाला यंत्र जिसमें बड़ा दांतेदार पहिया लगा लगा होता है जिसके प्रत्येक अर यानी दांतों से अटक कर कई सारी बाल्टियां निरंतर नीचे से पानी ऊपर लाती रहती हैं। अरघट्ट> अरहट्ट> और इसकी अगली कड़ी बना रहंट। अरघट्ट का ही एक रूप गरारी भी है जो इसी मूल से उपजा है। अरघट्ट का वर्णविपर्यय होने से बना गरारी।  अरघट्ट> गरह्ट्ट> गरट्ट> गरारी।  इसी तरह लोहे या लकड़ी को काटनेवाले दांतेदार यंत्र के लिए आरी नाम भी इसी अरः से आ रहा है। अरघट्ट से अर् का लोप होने से अनाज पीसने की चक्की के रूप में घट्टी शब्द बना। घट्टी एक यंत्र ही है। इसी तरह हिन्दी का आरा और अंग्रेजी की मशीन को जोड़ कर  आरामशीन एक नया शब्द हिन्दी को मिल गया। भाषा ऐसे ही विकसित होती है। स्लेट को गीले कपड़े यानी पानीपोते से पोछने के बाद सुखाने के लिए क्या बोलते थे, याद hemp करें-सूख सूख पट्टी, चंदनघट्टी!!!  मुझे आजतक इसका अर्थ समझ में नहीं आया और इसे मैं एक लयात्मक मगर अर्थहीन शिशु-पद ही समझता हूं।
हंट के लिए एक अन्य शब्द प्रचलित है चरस या चड़स। आज गांव गांव में पम्प प्रचलित हैं जो बिजली की मोटर के जरिये चलते हैं और पलभर में पातालपानी को उलीचने लगते हैं। चड़स मे दरअसल यंत्र का भाव न होकर चमड़े की उस थैली का संकेत है जिसमें एक साथ तीस चालीस लीटर पानी भरने की क्षमता होती है। कुएं की चरखी में लगी रस्सी से बंधी चमड़े की एक थैली को चड़स या चरस कहते हैं जिसके मुंह पर बंधी रस्सी का दूसरा छोर दो बैलों के जुए से बंधा होता है। बैलों द्वारा खींचे जाने पर यह थैली ऊपर आती है और पानी को खेत तक जाने वाली नाली में उलीच देती है। चरस शब्द दरअसल हिन्दी में फारसी से आया है। इंडो-ईरानी मूल के इस शब्द की रिश्तेदारी संस्कृत के चर्मन् से है जो बना है संस्कृत धातु चर् से। चर् में मूलतः हिलने-डुलने, गति करने, मैदानों में हरी घास चरने का भाव है। इससे ही बना है चर जिसका अर्थ है चलनेवाला अर्थात पशु। दिशाहीन भटकनेवाले को पशु की संज्ञा दी जाती है। पशु की खाल के लिए भी इसी चर् धातु से ही चर्मन् शब्द बना। इसका हिन्दी रूप चमड़ा है। चर्मन् का फारसी रूप चर्बः होता है। शास्त्रीय फारसी में चर्बः का रूप चर्म ही है जिसका अर्थ चमड़ा ही होता है।
र्मन् में दरअसल न सिर्फ त्वचा बल्कि उसके नीचे स्थित वसायुक्त मांस का भाव है। चर्बः या चरबी में मूलतः वसा का ही भाव है इसीलिए मोटापे के अर्थ में चरबी चढ़ना मुहावरा प्रसिद्ध है। फारसी, उर्दू में चर्बः का अर्थ महीन झिल्ली, काग़ज़, खाल, परत आदि भी होता है। संस्कृत, अवेस्ता और फारसी में प-फ-ब शब्द आपस में बदलते हैं। इसी चर्बः या चर्मन् का रूपांतर चरस है जिसका अर्थ चमड़े की थैली के रूप में रहंट की डोलची के तौर पर समझा जा सकता है। चरस का एक और अर्थ है एक नशीली वनस्पति। दरअसल भांग की ही एक किस्म जो अफ़गानिस्तान ईरान में पाई जाती है, जिसे चरस कहते हैं। दरअसल चमड़े अर्थात चरस से बने दस्तानों की मदद से इस नशीली वनस्पति की पत्तियों को रगड़ कर उसका चिकना सत्व एकत्रित किया जाता है। इस प्रक्रिया की वजह से गांजा-भांग की श्रेणी वाले इस नशीले पदार्थ के लिए चरस नाम मशहूर हुआ।

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Sunday, March 28, 2010

[नाम पुराण-5] सावधानी हटी, दुर्घटना घटी

पिछली कड़ियां-A.[नामपुराण-1]B.[नामपुराण-2]c.[नामपुराण-3] d [नाम पुराण-4]

...घाट या घाटी से जुड़े कई स्थान नाम हमारे आसपास मौजूद हैं जैसे उत्तराखण्ड में फूलों की घाटी या राजस्थान में हल्दी घाटी...
बा दल या मेघ के लिए घटा शब्द भी प्रचलित है। शृंगार गीतों में घटा, काली घटा शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। यहां भी मिलन का भाव ही है। दरअसल आसमान में उभरते बादलों के रूपाकार जब उमड़ते-घुमड़ते एक दूसरे में समाहित होते हैं, सम्मिलित होते हैं तब ऐसे मेघ-समूह को घटा कहते हैं। बादल के इकलौते टुकड़े को घटा नहीं कहा जा सकता बल्कि बादलों का समूह, समुच्चय ही घटा कहलाता है। आकाश में बादलों की सघन अवस्थिति को घटाटोप कहा जाता है। यह घटाटोप तब मुहावरे की अर्थवत्ता धारण करता है जब चारों ओर से आती मुश्किलों-परेशानियों का उल्लेख करने के लिए इसका इस्तेमाल होता है। समुच्चय, इकट्ठा या एकत्रीकरण के लिए बोलचाल का शब्द जमघट है जो इसी मूल से आ रहा है। घटा के साथ जमा होने का भाव जमघट में स्पष्ट है। घटाटोप आसमान में होती है और जमघट आसमान के साथ जमीन पर भी होता है।
टना शब्द पर भी गौर कर लें। घटना का मूल अर्थ है कुछ होना, क्रिया, प्रयत्न, मिलाना, एक करना, किसी स्थान पर कुछ साकार करना आदि सब कुछ घटना के दायरे में आता है। प्रयत्न क्या है? इच्छाशक्ति को क्रिया से एकाकार करना ही प्रयास या कोशिश है। घटना या दुर्घटना शब्द भी हिन्दी के सर्वाधिक व्यवहृत शब्द हैं जो घटनम् से बने हैं। घटना व्यष्टि के समष्टि में बदलने की क्रिया भी है। जन्म एक घटना है और मृत्यु भी। मगर अकाल मृत्यु दुर्घटना है। काल, समय, पदार्थ, जीव आदि के संयोग अथवा दुर्योग को घटना या दुर्घटना कहते हैं। आमतौर पर सड़कों पर दो या दो से अधिक वाहनों के आपस में टकराने के संदर्भ में दुर्घटना शब्द का प्रयोग होता है। टकराने की क्रिया एक दूसरे में समाना ही है। घटना में निहित मिलने, एकाकार Vally-Of-Flowers-2 होने का भाव तब अधिक स्पष्ट होता है जब घटनम् में वि उसर्ग लगता है जिसमें अनस्तित्व का भाव है। विघटन यानी टूटना, दरकना, दोफाड़ होना। किसी समुच्चय का बंटवारा होना। एक विरोधाभास देखिए। घटना में निहित मिलाना, एक करना जैसे भावों पर दुर्घटना के सन्दर्भ में गौर करें। भिड़ंत दुर्घटना है। दो चीजों इतनी तेजी से टकराती हैं कि मिलन के फौरन बाद उनमें विघटन हो जाता है अर्थात वे क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसमें एक सूफियाना किस्म की नसीहत भी छुपी है। अगर किसी मेल-जोल में बहुत तेजी है तब सावधानी ज़रूरी है क्योंकि शायद यह अलगाव की निशानी भी हो सकती है। असंयत, अव्यावहारिक गति से बढ़ते रिश्तों का हश्र टूटना-बिखरना ही होता है।  सड़कों पर सरकारी नसीहत भी लिखी मिलती है-सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। सम्मिलन, प्रयत्न, क्रिया अथवा घटना को करानेवाला कारक ही घटक कहलाता है।
घाट सिर्फ मनुष्यों के नहाने का स्थान भर नहीं थे बल्कि वे नौकाओं का आश्रय स्थल भी थे। घट्टः में समाया आश्रय का भाव दिलचस्प है। इससे बने घाटी शब्द पर गौर करें। घाटी यानी ढलान। दो पर्वत श्रेणियों के बीच का संकरा मार्ग या रास्ता भी घाटी कहलाता है और दोनों पर्वतों की ढलानें भी घाटी कहलाती हैं। ढलान शब्द में स्थिरता नहीं बल्कि गति निहित है जो ऊंचाई से नीचाई की दिशा में होती है। दोनों ओर की ढलानों के शून्य बिंदु पर गति को विराम मिलता है। यही घाट है अर्थात आश्रय यहीं है। घट् धातु में निहित मिलन, जोड़ जैसे भाव इस संधिस्थल अर्थात घाट की सही व्याख्या है।  घाटी में द्वार या दर्रे का भाव तो निहित है। घाट या घाटी से जुड़े कई स्थान नाम हमारे आसपास मौजूद है। उत्तराखण्ड में फूलों की घाटी, गोविंद घाट, भैरों घाटी, राजस्थान के अरावली क्षेत्र में दमारू घाटी, हल्दीघाटी आदि। घाटी पाकिस्तान के स्वात क्षेत्र में बिहा घाटी है। विश्वविख्यात सिन्धु घाटी की सभ्यता भी विशाल पुरातात्विक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। भारतीय प्रायद्वीप के पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्र को पूर्वीघाट और पश्चिमी घाट कहते हैं। घाट से ही घाटा जैसा स्थानवाची शब्द भी बना है जैसे देवारी का घाटा, चीरवा का घाटा, झाड़ोल घाटा आदि। घोड़ाघाटी और घाटौली जैसे स्थान भी इसी कड़ी में आते हैं।
घाट का एक अर्थ चुंगी चौकी भी होता है। प्रायः दर्रा दो राज्यों या राजस्व क्षेत्रों की सीमा भी तय करता रहा है जहां से आवागमन पर शुल्क लगता है। घाट पर तैनात कर वसूलने वाले कार्मिक को घटपालः कहा जाता था जो बाद में घटवाल या घटवार के रूप में देशी बोलियों में इस्तेमाल होने लगा। आमतौर पर वनवासी क्षत्रिय समाज के लोगों को ही घाटपालः की जिम्मेदारी दी जाती थी। घटवार एक जातीय उपनाम भी है जो प्रायः वनवासी क्षत्रियों में होता है। -जारी

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[नामपुराण-4] एक घटिया सी शब्द-चर्चा…

पिछली कड़ियां-A.[नामपुराण-1]B.[नामपुराण-2]c.Ghatam[नामपुराण-3]

दी-तटीय बस्तियों के साथ घाट शब्द का प्रयोग भी बहुधा मिलता है। ये घाट सिर्फ स्नान घाट नहीं थे बल्कि इनका अर्थ भी समृद्ध व्यापारिक केंद्र से ही था। हिन्दी मे प्रचलित घाट ghat की तुलना भारोपीय भाषा परिवार की पोस्ट जर्मनिक धातु गातां gatan, जिसमें खुला रास्ता, मार्ग या दर्रा का भाव है और प्राचीन नॉर्डिक, फ्रिशियन, और ड्यूश भाषाओं में gat धातु से की जा सकती है जिसमें मौद्रिक लेनदेन के अर्थ में खुलने का भाव है यानी टिकटों की बिक्री से होने वाली आय का संग्रहण करना। गौर करें घाट का एक अर्थ चुंगी चौकी भी होता है।  पुराने ज़माने में जहां पत्तन समुद्रपारीय व्यापार के बड़े केंद्र होते थे वहीं नदियों के जरिये होने वाले व्यापारिक केंद्रों के लिए अक्सर घाट शब्द का प्रयोग होता था। यूं सामान्यतौर पर अब घाट का अर्थ नदी तट पर स्थित वह स्थान होता है जहां से पानी भरा जाता है और स्नानकर्म किया जाता है। घाट शब्द की अर्थवत्ता व्यापक है। यह बना है संस्कृत के घट्टः से जिसमें आश्रय, पत्तन, बंदरगाह समेत नहाने की जगह का भाव शामिल है। गौर करें हिन्दी के घट या घटम् का अर्थ होता है कलश जिसमें पानी आश्रय पाता है। घट में समष्टि और समुच्चय का भाव है। नदी तट की प्राचीन बस्तियों के साथ जुड़े घाट शब्दों पर गौर करें मसलन-ग्वारीघाट, बुदनीघाट, बेलाघाट, कालीघाट जिनमें स्नान का भाव न होकर व्यापारिक पत्तन होने का भाव अधिक है। घाट की महिमा अपरम्पार है। यह पनघट है, जमघट है, मरघट है। सभी अवस्थाओं में यह तीर्थ है, पूज्य है और पावन है।  घट में जैसे दार्शनिक भाव निहित हैं, वैसे मानवनिर्मित किसी अन्य पदार्थ में देखने को नहीं मिलते। घट ही कण है, घट ही क्षण है, घट ही जन-मन-गण है

ट की महिमा मुझे हमेशा सुहाती है। घट से जुड़ी एक लोकप्रिय उक्ति है- घाट घाट का पानी पीना। इसमें मूलतः व्यक्ति के अनुभवों को मान्यता दी गई है। चरण छूने की परम्परा का इसी अनुभव से रिश्ता है। गौरतलब है कि प्राचीन समाज में सूचना व ज्ञानार्जन के आज जैसे साधन नहीं थे जिनकी वजह से घर बैठे हर तरह की जानकारियां मिल जाती हैं। ज्ञानार्जन का जरिया सिर्फ पर्यटन, देशाटन, घुमक्कड़ी और यायावरी था। गुरुओं के सानिध्य के अतिरिक्त सुदूर प्रांतरों में पदयात्रा कर ही मनुष्य ज्ञानार्जन कर पाता था। जो जितना घुमक्कड़, उतना बड़ा ज्ञानी। आवारगी में जब इल्म की खुश्बू आ जाए तो इनसान ऐसा फ़कीर बन जाता है जिसे सूफी कहते हैं। सो चरण स्पर्श के पीछे व्यक्ति के उन अनुभवों  को मान्यता देने का भाव था जिनमें ठौर ठौर का स्पंदन अनुभव की रज बनकर लिपटा है। उसी चरण रज को अपने मस्तक पर लगा कर लाभान्वित होने की पवित्र पावन परिपाटी भारतीय संस्कृति में चली आ रही है। अनुभवी के चरणों की रज को अपने मस्तक से लगाने के पीछे उस घुमक्कड़ को परिव्राजक-ऋषि की श्रेणी में रखने का भाव भी है। पुराने जमाने की चालू भाषा में घुमक्कड़ी को मुसाफिरी कहा जाता था। मुसाफिर बना है सफ़र से। सूफ़ी की असली पहचान Burning Ghat, Benaresउसके सफ़र में होने से है। सफ़र और सूफ़ी एक ही मूल से निकले हैं। चरैवेति चरैवेती…यही कहता है भारतीय दर्शन भी। बाट में घाट तो आएंगे, जहां सुस्ताना है, सांस लेनी है, मन को थोड़ा और थिर करना है, पर रुकना नहीं है। घाट रोकता नहीं, आगे की बाट दिखाता है। घाट से जो बंध जाए वो कैसा सूफ़ी, कैसा जतरू, कैसा जोगी?
रअसल घाट के अर्थ में घट्टः और कलश के अर्थ वाले घटम् शब्द का निर्माण हुआ है संस्कृत धातु घट् से जिसकी बहुआयामी अर्थवत्ता ने रोजमर्रा के शब्दों की एक भरीपूरी शृंखला बनाई है जैसे घट, घटम, घाट, घाटा, घाटोल, घटिया, घटी, घटना आदि। और तो और बादल के अर्थ में घटा शब्द भी इसी मूल से निकला है। घट् में प्रयत्न, व्यस्तता, कर्म करना, होना जैसे भाव हैं। इसका सबसे महत्वपूर्ण भाव है एकत्र होना या मिलाना जिसमें उपरोक्त सभी शब्दों की व्याख्या के सूत्र छिपे हैं। गौर करें घाटी या घाट की प्रकृति या रचना पर। घाट वही है जहां दो पर्वतों की ढलान सम पर मिलती है। घाट का अर्थ किनारे से पानी में उतरती हुई सीढ़ियां है। मिलन यहां भी है। नुकसान के अर्थ में घाटा शब्द भी इसी शृंखला से जुड़ा है। ढलान में सतह से निरंतर घटती दूरी का भाव ही कमी का संकेत है। घाटा यानी कमी। नुकसान का अर्थ भी मुनाफे में कमी ही होता है। निकृष्ट, नीच, कमतर, निम्न, ओछा, गौण या तुच्छ जैसे अर्थों में घटिया शब्द रोजमर्रा की हिन्दी का लोकप्रिय शब्द है। घटिया माल, घटिया व्यवस्था, घटिया सरकार, घटिया शहर, घटिया मोहल्ला, घटिया लोग, घटिया आदमी, घटिया औरत...गरज ये कि जो कुछ भी निकृष्ट के दायरे में आता है, उसे घटिया की व्यंजना दी जाती है। हां, घटिया अर्थव्यवस्था और घाटे की अर्थव्यवस्था में बहुत अंतर है। घटिया अर्थव्यवस्था निकृष्ट मौद्रिक प्रबंधन दर्शाती है जबकि घाटे की अर्थव्यवस्था कुशल वित्त प्रबंधन दिखाती है। घटिया में मूलतः गुणवत्ता में कमी का ही भाव है, जबकि घाटा एक परिस्थिति है जो स्वाभाविक भी हो सकती है और चतुराई से निर्मित भी,  सो घाटा शब्द पर हमेशा सावधानी से विचार करना चाहिए।  ऊंचाई से नीचाई पर आने में सम करने का जो भाव है उसका नकारात्मक पक्ष घाटा, घटिया जैसे शब्दों में उभरता है।
ट के साथ सम्मिलन का भाव पनघट शब्द से भी सिद्ध होता है। मनुष्य के जीवन में लगाव का, जुड़ाव का, मिलन का गुण जिन दो तत्वो से है वे हैं प्रेम और जल। पनघट दरअसल समाज का ऐसा ही मिलन स्थल है। प्रेम-रस का प्राप्ति स्थल। रस यानी पानी। इसीलिए जहां सबको जीवन रस मिलता है, वही पनघट है। सब एक ही घट से उपजे हैं और सबको एक घाट ही जाना है। सो घाट तो मिलन का प्रतीक है। एक घाट के वासी हैं सब…गौर करें, समाज से पनघट संस्कृति खत्म हुई, सो प्रेम भी बिला गया। जीवन-रस अब बोतलबंद मिनरल वाटर है और प्रेमघट रीता है। पनघट में जहां संयोग का भाव है वहीं मरघट में वियोग, विरक्ति का भाव है। मरघट में भी मिलन तत्व निहित है किन्तु पारलौकिक अर्थ में। परमतत्व में विलीन होने का भाव मरघट से जुड़ा है, जिसकी लौकिक अभिव्यक्ति मृत्यु है। संयोग का लौकिक प्रतीक पनघट है जिसकी तुलना सृष्टि के सभी रूपों से की जाती है। पनघट शरीर है और तमाम इन्द्रियां भवसागर में अपनी तृष्णा मिटाने के लिए यहां एक साथ होती हैं, मिलन करती हैं। किन्तु पनघट तो सिर्फ ठौर है, परमधाम नहीं। वहां तक पहुंचने की राह तो मरघट से होकर ही जाती है। दार्शनिक अर्थों में पदार्थ, जीव, काया और सृष्टि अर्थात व्यष्टि से समष्टि तक सब कुछ घट में  व्याप्त है। घट प्रतीक है ब्रह्म का। यह पनघट में भी व्यक्त है और मरघट में भी। पनघट तो अब रहे नहीं, सो मरघट भी डराते हैं।  -जारी
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Saturday, March 27, 2010

दिल्ली के लिए चालान कटा [बकलमखुद-131]

…वह चुनाव हम लोग जीत गए। किसान नेता रामेश्वर प्रसाद भारत के नक्सली आंदोलन के पहले सांसद बन गए। लेकिन इसकी खुशी काउंटिंग हॉल से बाहर निकलते ही काफूर हो गई, जब पता चला कि बिहटा में तीस से ज्यादा पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की निर्मम हत्या कर दी गई है और उनकी लाशें पास की नहर में दूर तक उतरा रही हैं। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स chandu_thumb[8] से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 131 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का ग्यारहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
य योजना के मुताबिक जनमत के लिए पहले दो हफ्तों में चुनावी कवरेज पूरा करके मुझे आरा में ही रुक जाना था। वहां पार्टी सेक्रेटरी दीना जी थे, जिनके बारे में दो साल पहले मैंने बम की शिक्षा शीर्षक से एक पोस्ट लिखी थी। एक ऐसे हंसमुख, जिंदादिल योद्धा, जिनकी छाप मन से कभी नहीं जाएगी। विभाजन के समय पूर्वी बंगाल से आकर इस तरफ बसे एक बड़े जमींदार परिवार के दीना जी का असली नाम अरूप पॉल था। नक्सल आंदोलन के शुरुआती दौर में ही इसके साथ उनका जुड़ाव बना था और कॉमरेड विनोद मिश्र के अंगरक्षक के रूप में वे सत्तर के दशक में चीन हो आए थे। भोजपुर में एक दशक से ज्यादा समय तक अंडरग्राउंड रहने के बाद उन्होंने चुनावी दौर में ही खुले में काम करना शुरू किया था, लेकिन बोली-बानी के रचाव और जिले के चप्पे-चप्पे तक उनकी पहुंच के चलते आम लोग उनको किसी ठेठ भोजपुरिया की तरह ही जानने लगे थे।
बिना किसी विचार-विमर्श के दीना जी ने आरा शहर में चुनाव प्रचार के नए रूपों की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी और मतदान संपन्न होने के बाद काउंटिंग हॉल में रह कर काउंटिंग का काम देखने का भी। इलाहाबाद में मेरी छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि शायद उनके इस फैसले की वजह रही हो। लेकिन चुनाव नतीजे आते, इसके पहले ही एक बहुत ही भयानक घटना भोजपुर में घटित हो गई। सोन नदी के किनारे तरारी ब्लॉक के बिहटा गांव में स्थानीय भूस्वामियों का वहां के मजदूरों के साथ काफी समय से विवाद चल रहा था। इसका एक जातिगत पक्ष भी था। ब्लॉक प्रमुख ज्वाला सिंह के नेतृत्व में गांव के राजपूतों की तरफ से यह नियम बनाया गया कि पिछड़ी और दलित जातियों के टोलों में बाहर से जो भी रिश्तेदार आएंगे, उनका नाम-पता उन्हें एक रजिस्टर में दर्ज करना होगा। कहा गया कि गांव में नक्सलियों की आवक रोकने के लिए ऐसा करना जरूरी है।
ह तनाव चुनाव के दिन गैर-क्षत्रिय मतदाताओं को बूथों से भगाने और फिर प्रतिक्रिया में मारपीट के रूप में जाहिर हुआ। इसका अंत यह हुआ कि पास के ही एक गांव में मौजूद लिबरेशन के एक सशस्त्र दस्ते ने दिन में ही निकलकर मारपीट कर रहे लोगों पर फायर झोंक दिया, जिसमें तीन-चार लोगों की मौत हो गई। आरा में हम लोगों को इस घटना  की सूचना थी और पार्टी ने आसपास के गांवों में अपने समर्थकों को जवाबी हमले से सजग रहने को भी कह दिया था। लेकिन भोजपुर में इससे पहले राजनीतिक घटनाक्रम में सामूहिक जनसंहार की कोई घटना नहीं हुई थी, लिहाजा पार्टी portraitस्थिति की गंभीरता का सही अनुमान नहीं लगा सकी। काउंटिंग हॉल में मेरी ड्यूटी लगने के बाद दो दिन और एक रात तो मुझे देश-दुनिया का कुछ पता नहीं रहा। वह चुनाव हम लोग जीत गए। किसान नेता रामेश्वर प्रसाद भारत के नक्सली आंदोलन के पहले सांसद बन गए। लेकिन इसकी खुशी काउंटिंग हॉल से बाहर निकलते ही काफूर हो गई, जब पता चला कि बिहटा में तीस से ज्यादा पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की निर्मम हत्या कर दी गई है और उनकी लाशें पास की नहर में दूर तक उतरा रही हैं।
नमत में अपने रुटीन पर वापस लौट आने के बाद भी जाती तौर पर मेरे कई महीने भोजपुर और उसमें भी बिहटा के इर्दगिर्द घूमते-टहलते बीते। इस बीच विष्णु राजगढ़िया को दिल्ली से रिपोर्टिंग और वहां राजनीतिक कामकाज में रामेश्वर जी की मदद की भूमिका दी गई। इससे जनमत में मैनपॉवर थोड़ा कम हो गया और टीम के भीतर जिस एक व्यक्ति से मेरा कोऑर्डिनेशन सबसे अच्छा था, उसकी कमी भी मुझे बहुत खली। विष्णु खुद में वन मैन आर्मी किस्म के इंसान हैं और जब वे आसपास होते हैं तो जिंदगी काफी हल्की लगने लगती है। लेकिन सिर्फ छह महीने में यह नई व्यवस्था भी गड़बड़ाने लगी। शायद दिल्ली में विष्णु की राजनीतिक व्यस्तताएं काफी बढ़ गई थीं और जनमत में उनका आउटपुट संतोषजनक नहीं रह गया था। नतीजा यह हुआ कि 1990 का जून आते-आते उन्हें पटना रवानगी का हुक्म हुआ और उनकी जगह पर दिल्ली के लिए मेरा चालान काट दिया गया।
दिल्ली आने से मेरा कोई विरोध नहीं था। बल्कि यह सोचकर अच्छा ही लगा कि सोच-समझ को नए धरातल पर ले जाने में शायद इससे कुछ मदद मिले। लेकिन भोजपुर ने कोई एक ऐसी लुत्ती मन में लगा दी थी कि महानगर के अकेलेपन के साथ तालमेल बिठाना कुछ ज्यादा ही मुश्किल लग रहा था। यहां बतौर सांसद रामेश्वर जी को मिले फ्लैट 40, मीनाबाग के ही एक कमरे से दीपंकर भट्टाचार्य (अभी सीपीआईएमएल के महासचिव) लिबरेशन निकालते थे, आशुतोष उपाध्याय (अभी हिंदुस्तान में असिस्टेंट एडिटर और बुग्याल ब्लॉग के कर्ताधर्ता) इस काम में उन्हें सहयोग देते थे और शाहिद अख्तर (फिलहाल पीटीआई भाषा के वरिष्ठ पत्रकार) रामेश्वर जी के संसदीय सहायक की भूमिका निभाते थे। यहां गणेशन जी (असली नाम कॉमरेड श्रीनिवासन) भी थे, जो नक्सल आंदोलन की शुरुआत से ही इसकी अगुआ पांत में थे और तमिलनाडु के संगठन में कुछ समस्या पैदा हो जाने के बाद से पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे थे। यहां वैचारिक एकता के बावजूद भावना के स्तर पर सभी की अलग-अलग दुनिया थी और जनमत के काम में मैं यहां बिल्कुल तनहा था। लेकिन संयोग से यही वह नाटकीय समय था जब 40, मीनाबाग के बमुश्किल दो किलोमीटर के दायरे में अगले डेढ़ दशक के लिए भारत की राजनीति का खाका रचा जा रहा था।

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Friday, March 26, 2010

उदाहरण स्वरूप अपहरण और मनहरण

black_rose ... उदाहरणम् का अर्थ है दृष्टांत देना, वर्णन करना, परिचयात्मक गीत या कविता की पंक्तियां जैसे स्तुतिगान आदि। 

सं स्कृत की हृ धातु में ग्रहण करना, लेना, प्राप्त करना, ढोना, निकट लाना, पकड़ना, खिंचाव या आकर्षण, हरण जैसे भाव हैं। हृ धातु से बना है हृत् जिसमें यहीं भाव हैं तथा इसमें अप उपसर्ग लगने से कई अन्य शब्द भी बने हैं जैसे अपहृत, अपहरण, अपहर्ता आदि। जाहिर है लाना, पकड़ना जैसे भाव इसमें उजागर हो रहे हैं। चूंकि अप उपसर्ग में घटिया, भ्रष्ट या बुरा जैसे भाव निहित हैं इसलिए हृ में अप के प्रयोग से बने अपहृत, अपहरण, अपहर्ता जैसे शब्दों का नकारात्मक भाव ही प्रमुख है।  हिन्दी में उपसंहार या समाप्ति के अर्थ में समाहार शब्द का प्रयोग होता है। सम के साथ हृ के मेल से यह शब्द बना है। हृ में निहित लेना, खींचना, निकट लाना जैसे भावों पर गौर करें। समाप्त होने के अर्थ में किसी कार्य की क्रियाओं को सम्पन्न करने की बात उभर रही है। गौर करें मंचीय प्रस्तुति के बाद होने वाले पटाक्षेप पर। रंगमंच के दोनो पर्दे एक साथ एक दूसरे के निकट आते हैं जो पटाक्षेप अर्थात समाहार का संकेत है।

हिन्दी मेंमनुहार शब्द का दो तरह से प्रयोग होता है। मूलतः दोनों ही शब्द हृ की शृंखला से बंधे हैं। मान मनौवल, चिरौरी या खुशामद के अर्थ में मनुहार बोलचाल का सर्वाधिक प्रयुक्त देशज शब्द है। हिन्दी शब्द सागर के मुताबिक यह मान + हारना से बना है। मान अर्थात आत्मप्रतिष्टा, आदर आदि। किसी की खुशामद खुद का सम्मान भुला कर ही होती है। आत्मसम्मानी व्यक्ति कभी खुशामद नहीं करता। हालांकि खुशामद शब्द में नकारात्मक भाव है जबकि मनुहार में आत्मीय आग्रह छुपा है। फिर भी वह है खुशामद ही। मनुहार में एक पक्ष का कमजोर होना, ढीला पड़ना और अपने कार्य के लिए झुकना स्पष्ट है, जो प्रकारांतर से हार ही है। पराजय के अर्थ में हम हार शब्द का अक्सर प्रयोग करते हैं। हार बना है संस्कृत हारि शब्द से जिसके मूल में हृ धातु ही है जिसमें ले जाने, हरण करने का भाव है। हृत् शब्द का अर्थ होता है जिसका सब कुछ छीन लिया गया हो जाहिर है छिनने में ही हार है। विजय का छिनना हार है, आजादी का छिनना हार है, आत्मगौरव का पास न रहना हार है और खुद की रक्षा न कर पाना अर्थात अपहृत हो जाता भी हार है। हारना दिल का भी होता है तभी नायिका अपने प्रेमी से कहती है-मैं हारि सैंयां…। हारि में शरणागति है।  हृ से ही बना है हृदय जिसमें सब कुछ समाहित होता है। हृदय में ही खिंचाव अर्थात आकर्षण है। दुनिया के कार्य-व्यापार से उपजे भाव हृदय में समाहित हो जाते हैं। मनोहारि का jjjjएक अर्थ इसीलिए आकर्षक, मोहक भी होता है जिसे मनहरण भी कहते हैं। मनोहर भी इसी कतार में है अर्थात जो मन को हर ले, उसे साथ ले जाए। मनुहार का दूसरा अर्थ इसी मनोहर या मनोहारि से मनोहारि > मनुहारी > मनुहार के क्रम में जुड़ता है।
स शृंखला का एक और महत्वपूर्ण शब्द है उदाहरण। मिसाल, बानगी या नमूना के अर्थ में अक्सर उदाहरण का खूब प्रयोग होता है। उदाहरण, सौदाहरण या उदाहरण स्वरूप जैसे शब्द रोज बोलने-पढने में आते हैं। उदाहरण बना है उदाहरणम् से जो उद्+आ+हृ के मेल से बना है। उदाहरणम् का अर्थ है दृष्टांत देना, वर्णन करना, परिचयात्मक गीत या कविता की पंक्तियां जैसे स्तुतिगान आदि। संस्कृत की उद् धातु में ऊपर उठने, नीचे से ऊपर आने का भाव है। इस तरह उद् + हृ का जो अर्थ निकलता, वह है किसी बात को सामने लाना, भीतर की चीज सामने लाना। उदाहरण या मिसाल दरअसल बहुत से तथ्यों में से चुनकर ऊपर लाया गया कोई एक तथ्य ही होता है जो दृष्टान्त कहलाता है।
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Thursday, March 25, 2010

[नामपुराण-3] हरिद्वार, दिल्लीगेट और हाथीपोल

पिछली कड़ियां-A.[नामपुराण-1]B.[नामपुराण-2]DSCN0514
र्वत भी मनुष्य का प्रिय आश्रय रहे हैं। पहाड़ी कंदराओं में सुरक्षित निवास तलाशने के बाद मनुष्य ने पर्वतीय घाटियों, उपत्यकाओं में बस्तियां बसाईं। पर्वत की तलहटी में स्थित समतल स्थान को उपत्यका कहते हैं जहां तक पहुंचने के रास्तों के नामों में भी पर्याप्त विविधता है जैसे-घाट, घाटी, दर्रा, नाल, फाटा, द्वार, पोल, पास आदि। इनमें पोल या फाटा जैसे शब्दों का प्रयोग मैदानी क्षेत्रों में भी द्वार के अर्थ में होता रहा है। राजस्थान में पोल शब्द खूब प्रचलित है। मूलतः इसमें द्वार का संकेत है मगर सघन बसाहट के बाद अब किसी विशेष आबादी के लिए ये नाम प्रसिद्ध हो गए हैं जैसे चांदपोल, रामपोल, हाथीपोल, बागबानों की पोल, जयपोल, लोहापोल, इमरतिया पोल, मनोहर पोल आदि। पोल का अर्थ खाली स्थान होता है। इसमें मूलतः खोखलापन या पोलापन का भाव है। शब्दकोशों के मुताबिक पोला शब्द संस्कृत की पुल् धातु से बना है जिसमें विस्तार, रिक्तता जैसे भाव हैं। पुल से ही पोला या पोल जैसे शब्द बने हैं। द्वार के साथ मार्ग के अर्थ में इसका रिश्ता संस्कृत के प्रतोली से भी जोड़ा जाता है जिसका अर्थ है नगर की मुख्य सड़क, मुख्य मार्ग आदि। हिन्दी तथा मराठी में इसका रूप होता है पावली या पओली। मराठी में जहां पावली में दहलीज, राहदरी या कदम उठाने, चलने का भाव है वहीं राजस्थानी हिन्दी में पावली (पओली) में बड़ा दरवाजा, फाटक, घर का आंगन, सहन जैसे भाव है। मुख्यरूप से द्वार चहारदीवारी से घिरा वह खाली या रिक्त स्थान होता है जहां से भीतर या बाहर को आवागमन होता है।

घाटियों तक पहुंचने का जरिया दो पहाड़ों के बीच का वह संकुचित स्थान होता है जिसे दर्रा कहते हैं। जाहिर है यह द्वार का ही  फारसी रूप है। दर्रों पर ही व्यापारिक चुंगियां भी होती थीं। हिन्दी के द्वार, अग्रेजी के डोर और फारसी के दर शब्द मूलतः एक ही परिवार के सदस्य हैं। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में द्वार शब्द के लिए मूल धातु dhwer या dhwor है। अब संस्कृत के द्वार (dwaar) शब्द से इसकी समानता पर गौर करें। प्राचीन ईरान की भाषा अवेस्ता और वेदों के भाषा मे काफी समानता है। अवेस्ता में भी द्वारम् शब्द ही चलन में था जिसने पुरानी फारसी में द्वाराया की शक्ल ले ली और फारसी तक आते आते बन गया दरः जिसका मतलब है दो पहाड़ों के बीच का रास्ता। फारसी के दरगाह या दरबान और हिन्दी के द्वारपाल, द्वारनायक अथवा द्वाराधीश, द्वारकाधीश जैसे शब्द इससे ही बने हैं। इन तमाम शब्दों के लिए a432_Stelvioसंस्कृत का शब्द है द्वार्। इसका अर्थ है फाटक, दरवाजा, उपाय या तरकीब। हिन्दी में आमतौर पर बोले जाने वाले द्वारा शब्द (इसके द्वारा, उसके द्वारा) में भी उपाय वाला भाव ही है।
गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित कृष्ण की राजधानी के द्वारवती, द्वारावती या द्वारका जैसे नाम भी समुद्री रास्ते से भारत में प्रवेश वाले भाव की वजह से ही ऱखे गए है। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार इस नगर में प्रवेश के भी कई द्वार थे इसलिए इसे द्वारवती कहा गया। कोटा झालावाड़ के बीच एक छोटा कस्बा है दरा। मूलरूप में इसका नाम दर्रा ही रहा होगा क्योंकि राजस्थान के हाड़ौती अंचल को मालवा से जोड़नेवाले एक पहाड़ी रास्ता यहीं से होकर गुजरता है। पहाड़ी बसाहटों के साथ भी द्वार शब्द जुड़ा हुआ मिलता है जैसे उत्तराखण्ड का प्रमुख कारोबारी शहर और देश का अन्यतम तीर्थ हरिद्वार। दरअसल इसके दो रूप प्रचलित हैं। उत्तराखंड में बद्रीनाथ धाम और केदारनाथ धाम हैं। बद्रीतीर्थ में भगवान विष्णु विराजते हैं जबकि केदारखंड में शिव का वास है। अब शैव इसे हर अर्थात शिव से जोड़ते हुए हरद्वार कहते हैं जिसका अर्थ है केदारखण्ड जाने का रास्ता। इसी तरह वैष्णव लोग इसे विष्णुधाम बद्रीनाथ के लिए जाने का मार्ग मानते हुए हरिद्वार कहते हैं अर्थात हरि के घर का द्वार। उत्तराखण्ड का ही एक अन्य नगर है कोटद्वार। इसी तरह द्वारकोट भी एक जगह है। व्यक्तिनाम के तौर पर हरद्वार निवासी को ठाठ से हरद्वारीलाल कहा जाता है और इस नाम के हजारों लोग होंगे, मगर कोटद्वारीलाल शायद ही कोई मिले।
द्वार के लिए अंग्रेजी में गेट gate शब्द भी प्रचलित है और हिन्दी में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है। अंग्रेजी के डोर शब्द की तुलना में गेट शब्द का उतना ही इस्तेमाल होता है जितना कि दरवाज़ा या फाटक शब्द का होता है। अंग्रेजी के gate शब्द की व्युत्पत्ति संदिग्ध है मगर भाषा विज्ञानी इसे भारोपीय भाषा परिवार का ही मानते हैं और इसकी व्युत्पत्ति पोस्ट जर्मनिक धातु गातां gatan से मानते हैं जिसमें खुले रास्ते, मार्ग या दर्रे का भाव है। इसी तरह प्राचीन नॉर्डिक, फ्रिशियन, और ड्यूश भाषाओं में gat धातु खोजी गई है जिसमें मौद्रिक लेनदेन के अर्थ में खुलने का भाव है यानी टिकटों की बिक्री से होने वाली आय का संग्रहण करना। इस तरह फाटक और गेट शब्द में अंतर्निहित मौद्रिक संदर्भ एक ही हैं। अंग्रेजों के आने से पूर्व द्वार के अर्थ वाले स्थानों के नाम के पीछे जुड़े गेट शब्द की जगह प्रत्यय के रूप में पोल या फाटक शब्द लगाया जाता था। महू में हरी फाटक और दतिया के रिछरा फाटक का नाम लिया जा सकता है। इस फाटक का ही एक रूप फाटा में नजर आता है। महाराष्ट्र में आमतौर पर ऐसे द्वारों को फाटा कहते हैं जैसे झुरली फाटा, पुरार फाटा। फाटा दक्षिण से सुदूर उत्तर तक नज़र आते हैं। उत्तराखण्ड में भी फाटा है और पाक अधिकृत कश्मीर की स्वात घाटी में भी भी फाटा है।
संस्कृत की स्फ ध्वनि में विभाजन, कंपन, आघात, फैलाव जैसे भाव जुड़ते हैं। इससे संबंधित धातु  स्फुट् में निहित विभाजन का अर्थ जुड़ता है दरवाजे के अर्थ में प्रचलित फाटक शब्द से। जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी-उर्दू-इंग्लिश कोश के अनुसार इसका संस्कृत रूप है स्फाटः+कः से जिसका अर्थ हुआ द्वार, गेट, आगम, दर्रा, दरवाज़ा आदि। जाहिर है जहां से प्रवेश होता है वह स्थान चौड़ा, फैला हुआ होता है। सामान्य दो पल्लों वाले द्वार की कल्पना करें तो सहज ही समझ में आता है कि स्फुट्  में निहित विभाजन या बांटने वाले अर्थ का फाटक के संदर्भ में क्या महत्व है। हालांकि ख्यात भाषाविद् रामचंद्र वर्मा अपनी कोशकला पुस्तक मे इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत के कपाट शब्द से बताते हैं। उनका कहना है कि कपाट का रूपांतर कपाटकः में हुआ फिर इसमें से लुप्त हुआ और पाटकः बचा जो बाद में फाटक बना। कपाट से फाटक शब्द की व्युत्पत्ति कहीं अधिक तार्किक लगती है। मध्यकाल के राजपूत राजाओं नें अपनी राजधानियों और अन्य ठिकानों पर जो किले बनवाए उनमें विभिन्न दिशाओं में खुलनेवाले रास्तों का नाम उन दिशाओं में स्थित नगरों के नाम पर रखा। जयपुर के परकोटे में कई विशिष्ट द्वार हैं जैसे-अजमेरी गेट, सांगानेरी गेट, घाटगेट आदि। आगरा के किले में दिल्लीगेट, लाहौरी गेट हैं। राजस्थान, दिल्ली, मेरठ और दर्जनों अन्य शहरों-कस्बों में ऐसे गेट हैं जिनके पीछे इतिहास और भूगोल झांक रहा है।
 -जारी
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Wednesday, March 24, 2010

किस्सा-कोताह ये कि…

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कि सी प्रसंग को विस्तार से बताने के बाद उसका सार प्रस्तुत करते हुए अक्सर कहा जाता है कि किस्सा-कोताह ये कि...इसका अभिप्राय होता है समूचे प्रकरण का निष्कर्ष सामने रखना या संक्षेप में कहानी बताना। किस्सा कोताह दरअसल अरबी और फारसी के दो शब्दों से मिलकर बना पद (टर्म) है और लालित्यपूर्ण भाषा बोलने के शौकीन इसका खूब प्रयोग करते हैं। भाषा को प्रभावी और मुहावहरेदार बनाने के लिए भी इसका प्रयोग होता है। कोताह शब्द इंडो-ईरानी मूल का है। हिन्दी में कोताह शब्द भी स्वतंत्र रूप में खूब इस्तेमाल होता है। कोताह में कमी, सूक्ष्मता या छोटेपन का भाव है। हिन्दी में इसकी आमद फारसी से हुई है। किसी काम को अपूर्ण या अधूरा छोड़ने के संदर्भ में कोताही करना, कोताही बरतना जैसे शब्दों का प्रयोग लापरवाही उजागर करने के लिए होता है।
कोताह शब्द संस्कृत के क्षुद्रकः के अवेस्ता में हुए रूपांतर कुटक(ह) से बना है। पह्लवी में इसका रूप कुडक या कुटक है और इसकी आमद अवेस्ताके कुटक(ह) से ही हुई है। संस्कृत का क्षुद्रकः बना है क्षुद् धातु से जिसमें दबाने, कुचलने , रगड़ने , पीसने आदि के भाव हैं। जाहिर है ये सभी क्रियाएं क्षीण, हीन और सूक्ष्म ही बना रही हैं। छोटा शब्द संस्कृत के क्षुद्रकः का रूप है जो क्षुद्र शब्द से बना। इसमे सूक्ष्मता, तुच्छता, निम्नता, हलकेपन आदि भाव हैं। इन्ही का अर्थविस्तार होता है ग़रीब, कृपण, कंजूस, कमीना, नीच, दुष्ट आदि के रूप में। अवधी-भोजपुरी में क्षुद्र को छुद्र भी कहा जाता है। दरअसल छोटा बनने का सफर कुछ यूं रहा होगा – क्षुद्रकः > छुद्दकअ > छोटआ > छोटा। संस्कृत क्षुद्र से फारसी में दो रूपांतर हुए। पहला इससे खुर्द बना जिसका अर्थ भी होता है छोटा, महीन आदि। खुर्दबीन, खुर्दबुर्द, खुरदुरा जैसे शब्द इसी मूल से आ रहे हैं। दूसरा रूपांतर क्षुद्रकः के अवेस्ता के कुटक(ह) से हुआ। अवेस्ता का फारसी में जाकर में storytellerबदला वर्ण का लोप हुआ और इस तरह  कमी, न्यूनता या सूक्ष्मता के अर्थ में कोताह शब्द सामने आया। कोताह का लघु रूप कोतह भी होता है। कमी के लिए कोताही शब्द भी बना। उर्दू फारसी में छोटा के अर्थ में कोताह शब्द से कई समास बनते हैं जैसे कोताह-कद (ठिंगना), कोताह-गरदन, कोतहनज़र, कोतहअंदेश (अदूरदर्शी), कोताहफहमी (कमअक्ल),कोताहदामन (संकीर्ण हृदय का) वगैरह वगैरह।
किस्सा शब्द सेमिटिक भाषा परिवार का है और अरबी से आया है। हिन्दी में इसकी आमद फारसी से हुई है। सेमिटिक धातु q-s- (क़ाफ-साद-) से इसका जन्म हुआ है जिसमें अनुसरण करना, पालन करना, पीछे चलना, ध्यान देना आदि भाव हैं। इससे बना है अरबी का क़स्सा शब्द जिसमें अनुसरण करना, पीछे चलना जैसे भाव हैं। इसी मूल से उपजा है किस्साह qissah जिसका अर्थ है कहानी, कथा, गल्प आदि। मूलतः किस्साह इस्लामी दर्शन का पारिभाषिक शब्द है जिसमें कथा-कहानी वाले मनोरंजन का भाव न होकर दृष्टांत या प्रसंग सुनाने वाले के शब्दों के पीछे चलने का भाव है। अर्थात श्रोता के लिए कहानी पर गौर करना ज़रूरी है तभी उसका निहितार्थ समझ में आएगा। गौरतलब है कि हर संस्कृति में पुराख्यानों का उद्धेश्य समाज को धर्म-नीति की शिक्षा देना रहा है। प्रवचनकर्ता का मानसिक अनुगमन कर ही मूल कथातत्व समझ में आता है जो मूलतः सीख या नसीहत ही होती है।

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Tuesday, March 23, 2010

[नामपुराण-2] सिन्धु से इंडिया और वेस्ट इंडीज़ तक

मू ल स्थान के नाम से अपने समूह की पहचान जोड़ने की प्रवृत्ति भारत के सभी समुदायों में देखी जा सकती है। खासतौर पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा बसने वाले जनसमूहों ने अपनी पहचान को क्षेत्र विशेष के साथ जोडा। राजेश खन्ना के नाम के साथ जुड़ा खन्ना khanna उपनाम दरअसल पंजाब का एक कस्बा है। इसी तरह तलवंडी, भिंडरावाला, माहिवाल, साहिवाल जैसे न जाने कितने शब्द हैं जो मूलतः स्थानों के नाम हैं मगर हम इन्हें किन्हीं व्यक्तियों के उपनाम के तौर पर जानते हैं। महाराष्ट्र के निवासियों के नाम के साथ “कर” ancient-indus-mapशब्द अक्सर जुड़ा होता है। दरअसल यह उनका जातीय परिचय नहीं बल्कि क्षेत्रीय परिचय होता है। गावस्कर gavaskar, बुधकर, वडनेरकर, मंगेशकर जैसे नामों के साथ जुड़े “कर” से अभिप्राय वहां का निवासी होना ही है। कोंकण के मंगेशिम् गांव से ताल्लुक रखनेवाले लोग मंगेशकर हो गए और गावस गांव के लोग गावसकर। महाराष्ट्र के आम्बेड से नाता रखनेवाले महार जाति के एक परिवार ने मध्यप्रदेश के महू में बसेरा किया। इस परिवार में जन्में पुत्र ने आम्बेडकर उपनाम को शोहरत दिला दी। ये थे डॉ भीमराव आम्बेडकर। बुध नामक आबादी से हटकर कहीं और जा बसे लोगों ने अपने नाम के साथ बुधकर लगाना शुरु किया और वडनेर कस्बे से निकले लोग वडनेरकर कहलाए। गौरतलब है यह ‘नेर’ संस्कृत के नगरम् का देशज रूप है। वडनेर कभी वटनगर-बड़नगर अर्थात जहां वटवृक्षों की बहुतायत हो,  रहा होगा। आज यह स्थाव बड़नेरा या वडनेरा के नाम से जाना जाता है। खुद के नाम के साथ स्थान का नाम जोड़ने से जातिभेद भी मिटता था, क्योंकि अलग अलग वर्गों के लोग जब परदेश में जा बसेंगे तब उनकी पहचान जाति नहीं, वह स्थान होगा जहां से वे आए हैं। शिक्षा के विस्तार और आप्रवासन के चलते जातिप्रथा शिथिल हुई थी। कल्पना की जा सकती है कि मुहूर्त विचार और शुभ-अशुभ जैसी सोच के चलते मध्यकालीन समाज ने अपने बौद्धिक विकास के सारे रास्ते बंद कर लिए थे। जातिवाद जैसी बुराइयां सदियों के इसी ठहरे पानी वाले कूपमंडूक समाज की देन रहीं। अब बालठाकरे अगर मुंबई में रहनेवालों की पहचान मुंबईकर से करते हैं तो बुरी बात नहीं, मगर इसे अमल में लाने के उनके तरीके की भर्त्सना की जानी चाहिए। 
नाम की वजह से उपनाम बनने के कुछ अन्य उदाहरण देखें। निरन्तर आप्रवासन के चलते स्थान आधारित पहचान को अपने मूल नाम से जोड़ने का मकसद पुरखों की भूमि या मूलस्थान के नाम को अपने परिचय से जोड़ कर स्थायी बनाना था। स्थान नाम की तरह नदियों के नाम से भी मानव समूहों की पहचान होती रही है। खास तौर पर ब्राह्मण वर्ग में यह परिपाटी अधिक रही है। गौरतलब है कि प्राचीन काल से ही दुनियाभर में जलस्रोतों के किनारे ही बसाहटों की शुरुआत हुई और फिर वहां स्थायी बस्तियां बस गईं जो कालांतर में नगरीय सभ्यता का केंद्र बनीं। सिंधु नदी के किनारे आज से चार हजार साल पहले जो समृद्ध सभ्यता विकसित हुई उसे इस महान नदी के नाम पर ही सिन्धु घाटी sindhu की सभ्यता सैंधव सभ्यता कहा Copy of collage-715691 जाता है। भारतवर्ष में निवास करनेवाले सभी लोग हिन्दू कहलाते हैं। हिन्दू शब्द का उद्गम सिन्धु से ही हुआ है। हिन्दू नाम से जुड़ी कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनकी नकारात्मक और सकारात्मक व्याख्या की जाती है। इस बारे में विस्तार से यहां लिखना अभीष्ठ नहीं है क्योंकि इस पर पर्याप्त सामग्री मौजूद है। किन्तु यह निर्विवाद है कि किसी जमाने में हिन्दू शब्द जाति बोधक नहीं, बल्कि स्थानवाची था। आज भी हिन्दू और हिन्दुस्तान से स्थान का बोध पहले होता है न कि धर्म या जाति का। सैंधवजनों का मूल स्थान ही हिन्दुस्तान है। ग्रीक भाषा में सिन्धु को इंडस कहा गया। इंडियन, इंडियाना जैसे शब्दों के मूल में सिन्धु ही है। दिलचस्प यह भी कि भारत की खोज के नाम पर शुरु हुए अभियान का हासिल था आज की महाशक्ति अमेरिका। कुछ देशोवाले पूर्वी द्वीपसमूह को वेस्ट इंडीज नाम मिला जिसके मूल में यही इंडिया india यानी सिन्धु है। पौराणिक चरित्रों राजा दुष्यंत और शकुंतला के  पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत हुआ। भरत bharat की संतति या भारत से जुड़ा हुआ व्यक्ति ही भारतीय कहलाता है। मूलनाम से जुड़ी यह पहचान कितनी महत्वपूर्ण है, इसे जानने के लिए कभी पाकिस्तानी दूरदर्शन या रेडियो प्रसारण सुनें। दुनियाभर में भारत को इंडिया कहा जाता है, मगर पाक संचार माध्यमों में भारत के उल्लेख से बहुत सुकून मिलता है। ध्यान रहे, भरत शब्द उसी भृ धातु से बना है जिसमें भरण-पोषण का भाव है। जाहिर है राजा ही प्रजा का भरणपोषण करता है। भरथः का अर्थ है प्रभुसत्ता प्राप्त राजा। भाषाविज्ञानियों के अनुसार संस्कृत के भ्रातृ bhratri, फारसी के बिरादर bradar और अंग्रेजी के ब्रदर जैसे भाईचारा साबित करनेवाले शब्दों के मूल में भी यही भृ धातु है। माना जा सकता है कि सदियों पहले भरतभूमि पर जन्मे जैन और बौद्ध धर्म के प्रचारकों ने तब के ज्ञात संसार में विश्वबंधुत्व का प्रसार करने की ऊर्जा, अर्थ और प्रेरणा इसी शब्द से ग्रहण की होगी।

भारत में ब्राह्मणों की अनेक शाखाएं नदियों के नाम पर हैं। नदियों को अक्सर सीमा रेखा भी माना जाता रहा है। विद्याध्ययन या विद्याप्रसार के लिए जब ब्राह्मण वर्ग के लोगों का आप्रवासन हुआ तब अपनी विशिष्ट भौगोलिक पहचान को उन्होंने अपने नाम से जोड़ा या परदेश के लोगों नें उनकी शिनाख्त उनके मूलस्थान के आधार पर की।  जैसे सरयू नदी के आधार पर ब्राह्मणों का एक वर्ग सरयूपारीण या सरयूपारीय ब्राह्मण कहलाता है। नर्मदा घाटी और वहां के विशाल उपजाऊ क्षेत्र में निवास करनेवाले ब्राह्मणों को नार्मदीय ब्राह्मण कहा जाता है। गंगा के नाम से गांगेय शब्द चला। प्राचीन सरस्वती नदी के नाम पर सारस्वत ब्राह्मणों की पहचान बनी। प्राचीनकाल में स्थल मार्ग की तुलना में जलमार्ग आवागमन और व्यापार का बड़ा जरिया था। नदियों के किनारे नगरों के बसने का क्रम शुरु हुआ। नदियां ही परिवहन का प्रमुख जरिया थीं। नदी किनारे बड़े नगर इसलिए बसे क्योंकि वहां बड़े घाट विकसित हुए जो व्यापार का केंद्र थे। इन्हें पत्तन, पट्टण कहा जाता था। देशभर में कई ऐसे नगर हैं जिनके साथ पट्टन शब्द लगता है जैसे विशाखापट्टन, मछलीपट्टन, मद्रासपट्टिनम्, प्रभासपट्टन। पट्टन का ही एक रूप पाटण हुआ। देश में पाटण नाम की भी कई बस्तियां हैं जैसे झालरा पाटन, फूटी पाटन, पाटन आदि। जाहिर है कभी ये नदी आधारित व्यापार के बड़े केंद्र रहे होंगे। -जारी
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Monday, March 22, 2010

ये भी फासिस्ट, वो भी फासिस्ट

a-villani-benito-mussolini फासिज्म चाहे आज सर्वमान्य राजनीतिक सिद्धांत न हो मगर इसका प्रेत अभी भी विभिन्न अतिवादी, चरमपंथी और उग्र विचारधाराओं में नज़र आता है। राजनीतिक शब्द के रूप में इसे स्थापित करने का श्रेय इटली के तानाशाह बैनिटो मुसोलिनी को जाता है। 
फा सिज्म शब्द दुनियाभर की भाषाओं में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली राजनीतिक शब्दावली की चर्चित टर्म है। हिन्दी में इसका रूप फासीवाद है। हालांकि अंग्रेजी, इतालवी में इसका उच्चारण फैशिज़म होता है मगर हिन्दी में फासिज्म उच्चारण प्रचलित है।  फासीवादी विचारधारा को माननेवाला फासिस्ट कहलाता है। राजनीतिक दायरों में फासिस्ट कहलाने से लोग बचते हैं। आज की राजनीति में फासिस्ट या फासिज्म शब्द के साथ मनमाना बर्ताव होता है। अतिवादी विचारधारा से जुड़े लोग एक दूसरे को फासिस्ट कह कर गरियाते हैं। खुद को नायक समझनेवाला कभी नहीं चाहेगा कि उसे खलनायक की तरह देखा जाए। धर्म और नैतिकता की दुनिया में तो हमेशा नायक सत्य की तरह एक ही होता है और पूरी प्रखरता से उभरता है, मगर राजनीति के मैदान में सभी खिलाड़ी खुद को नायक समझते हैं। नायक और नेता का अर्थ यूं तो एक ही है अर्थात समूह का नेतृत्व करना, उसे राह दिखाना, मगर नेता शब्द ने अपनी अर्थवत्ता खो दी है। अब नेता का अर्थ जबर्दस्ती खुद को समूह पर थोपनेवाला, बाहुबली, दबंग आदि हो गया है। नेतागीरी शब्द की नकारात्मक अर्थवत्ता से यह स्पष्ट हो रहा है। इसके बावजूद ये सभी लोग समाज में स्वीकार्य होने के लिए पहले खुद को नेताजी कहलवाते हैं, फिर नायक होने की चाह पालने लगते हैं, मगर जनसंचार माध्यमों के जरिये आज सबकी असली तस्वीर दुनिया के सामने किसी न किसी रूप में आ ही जाती है।
यूरोप की राजनीति में फासिज्म fascism शब्द का प्रयोग प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ज्यादा सुनाई पड़ने लगा। यह इतालवी भाषा से जन्मा है। फासिज्म लैटिन भाषा के फैसेस या फासिस fasces शब्द से बना है। फैसेस दरअसल एक प्राचीन रोमन प्रतीक है जिसमें कटी हुई लकड़ियों के बंडल के साथ एक कुल्हाडी होती है। दरअसल यह सर्वाधिकार का प्रतीक था। रोमन परम्परा के मुताबिक प्राचीनकाल में रोमन लोग इंसाफ के लिए अदालत जाते समय अपने साथ लकड़ियों का छोटा बंडल और कुल्हाड़ी साथ रखते थे। एक साथ बंधी हुई कटी टहनियां दरअसल दंडविधान का प्रतीक थीं और कुल्हाड़ी न्याय के अधिकार का प्रतीक। इसका निहितार्थ था शिरच्छेद अर्थात सजा के बतौर कलम किया Fasces हुआ सिर। राजनीतिक विचार के रूप में बाद में इन प्रतीकों की व्याख्या कुछ और हो गई। लकड़ी का बंडल बाद में संगठन, शक्ति, एकता जैसे भावों से व्याख्यायित किया जाने लगा और राजनीतिक उद्धेश्य के लिए संगठित समूह के तौर पर इसका अर्थ निकाला जाने लगा। इतालवी भाषा में फासी शब्द फाशी की तरह उच्चरित होता है।
राजनीतिक शब्द के रूप में इसे स्थापित करने का श्रेय इटली के तानाशाह बैनिटो मुसोलिनी को जाता है। मुसोलिनी ने इटली में “राज्य के सर्वाधिकार” की जो शासन प्रणाली चलाई उसे ही फासिज्म कहा गया। मुसोलिनी ने 1915 में फासिस्ट नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। फासिज्म की कई तरह से व्याख्या की जाती है। इसे बड़ी आसानी से साम्यवाद या समाजवाद के विरुद्ध पैदा आंदोलन समझा जाता है। हालांकि मूल रूप में यह साम्राज्यवाद, बाजारवाद, उदारतावाद जैसी प्रवृत्तियों के खिलाफ था। यह विरोधाभास है कि इनमें से कई बुराइयां खुद फासिज्म के साथ जुड़ गई। विभिन्न विकृतियों के चलते फासिज्म कभी एक स्वस्थ और मज़बूत राजनीतिक विचार नहीं बन सका। बाद में पूंजीपतियों के एजेंटों, दलालों और गुंडों को फासिस्ट कहा जाने लगा था। आजादी से पहले भारत में कांग्रेसी नेता  अपने समान ही स्वतंत्रता संघर्ष कर रहे उग्र विचारधारा वाले क्रान्तिकारी नेताओं जैसे भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद को फासिस्ट कहते थे।प्रसिद्ध क्रान्तिकारी, लेखक मन्मथनाथ गुप्त ने अपने संस्मरणों में एकाधिक बार इसका उल्लेख किया है। फासिस्ट शब्द को दिलचस्प ढंग से परिभाषित करते हुए गुप्तजी लिखते हैं कि जब पूंजीवाद लोकतंत्र के जरिये अपना मतलब सिद्ध करने में असमर्थ हो जाता है, तो वह अपने उग्र नंगे रूप में यानी फासिस्ट रूप में प्रकट होता है। फासिज्म के साथ उलटबांसियां हैं। इसके साथ साम्यवादी विचारधारा के विरोध की बात जुड़ी है। जवाहरलाल नेहरू वामपंथियों को फासिस्ट कह कर गरियाते थे और अब वामपंथी, हिन्दू (अतिवादी) विचारधारा से जुड़े लोगों को फासिस्ट कहते हैं। जो भी हो, यह तय है कि शुरू से ही किसी भी किस्म की चरमपंथी या अतिवादी विचाराधारा को फासिज्म के दायरे में समझा जाता रहा है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर में फासीवादी ताकतों की भूमिका के मद्देनजर इसकी एक खास तस्वीर बनी। यह एक सिद्धांतहीन विचारधारा है। इसकी कोई सर्वस्वीकार्य कार्यप्रणाली नहीं है। मूलतः किसी न किसी तरह सत्ता और शक्ति हथियाना इसका लक्ष्य होता है। सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट जैसे आदिम और प्रकृतिसिद्ध नीति का ये समर्थन करते हैं अर्थात शक्तिशाली निर्बलों पर शासन करते हैं। दृढ़ता, आक्रामकता और साहस (प्रकारांतर से बलप्रयोग) जैसे प्रबोधनों से ये अपने वर्ग के लोगों को उत्साहित करते हैं और सीमित सफलता अर्जित करते हैं। शांति, सौहार्द, लोकतंत्र, उदारता, नैतिकता जैसे गुणों को इस विचारधारा के तहत अपने लक्ष्य से भटकानेवाले तत्व के रूप में देखा जाता है। फासिज्म चाहे आज सर्वमान्य राजनीतिक सिद्धांत न हो मगर इसका प्रेत अभी भी विभिन्न अतिवादी, चरमपंथी और उग्र विचारधाराओं में नज़र आता है।

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Sunday, March 21, 2010

[नामपुराण-1] नाम में क्या रखा है…

श्रय का निर्माण होने के बाद उसका नामकरण करने की परिपाटी भी प्राचीनकाल से ही चली आ h1रही है। यह आश्रय चाहे राष्ट्र हो प्रांत हो, नगर हो अथवा ग्राम, हर आश्रय का एक नाम ज़रूर होता है। हर काल में लोगों ने अपने निवास-ठिकाने बदले हैं और नई स्थिति में उनका नया नाम भी रख दिया गया। यह प्रक्रिया राष्ट्रों के नाम बदलने से लेकर मकानों के नाम बदलने तक जारी रहती है। नामकरण के पीछे जो सहज प्रवृत्ति काम करती है वह होती है स्व अर्थात निजता की स्थापना। विभिन्न परिस्थितियों में इस निजता के आयाम भी अलग अलग होते हैं। जैसे जाति, धर्म, रंग, क्षेत्र, बोली अथवा अन्य कोई विशिष्ट पहचान चिह्न जो समूह या व्यक्ति की निजता से जुड़ता हो। जाति-धर्म के आधार पर मानव-समूहों की पहचान सरनेम या उपनाम के जरिये सामने आती है।

दुनियाभर की विभिन्न संस्कृतियों में स्थान के नाम से अपनी पहचान को जोड़ कर चलने की परम्परा रही है। इसे शायरों के नाम से आसानी से समझा जा सकता है। शायर अक्सर एक तख़ल्लुस लगाते हैं जैसे फिराक़ गोरखपुरी साहब का  असली नाम रघुपतिसहाय था। इसी तरह प्रसिद्ध शायर शीन काफ़ निज़ाम का असली असली नाम है शिवकिशन कल्ला और उनका ताल्लुक राजस्थान के प्रसिद्ध पुष्करणा ब्राह्मण समुदाय से है। एक शायर का नज़रिया जाति या सम्प्रदाय से ऊपर होता है। तख़ल्लुस के साथ एक खास बात उस शायर के मिजाज़ को समझने की भी होती है। शायर का स्वभाव, जीवन-दर्शन जैसा होगा, वह उसी किस्म का तख़ल्लुस रखेगा।
प्रसिद्ध रूसी जनकवि रसूल हमजातोव के पिता का नाम था हमज़ात त्सादासा। गौरतलब है रसूल पूर्वी सोवियत संघ से अलग हुए के दागिस्तान गणतंत्र के निवासी थे। उनके गांव का नाम था त्सादा इसीलिए उनके पिता हमज़ात त्सादासा कहलाए। दुनियाभर में पिता का नाम पुत्र के नाम से जोड़ने की परम्परा है सो हमज़ात के बेटे रसूल का नाम हुआ रसूल हमज़ातोव यानी हमज़ात का बेटा रसूल। असदुल्ला खां गालिब, मीर तकी मीर, मोमिन, शेख इब्राहीम ज़ौक़, मिर्जा हादी रुस्वा जैसे नामों के पीछे जुड़ी पहचान ही उनका तख़ल्लुस रहा है। तख़ल्लुस दरअसल शायर अपने मिजाज की पहचान करते हुए रखते थे। इससे अलग अधिकांश शायरों में तखल्लुस के साथ मूलस्थान का नाम जोड़ने की परम्परा ज्यादा रही है जैसे अदम गोंडवी, वसीम बरेलवी, हसरत जयपुरी, क़ैफ़ भोपाली, राहत इंदौरी, शकील बदायूंनी आदि। इस परम्परा का उत्कर्ष वाराणसी के पास मछली शहर से जुड़े शायर सलाम साहब के पूरे नाम में नजर आता है। वे फख्र से अपना नाम सलाम मछलीशहरी लिखते थे। शायराना तबीयत का कोई व्यक्ति शायद अटपटा सा मछलीशहरी उपनाम न रखना चाहे।-जारी
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Saturday, March 20, 2010

गुंडे का इंटरव्यू और दंगे की एक शाम [बकलमखुद-130]

 

… बाद में पता चला, शेरशाह सूरी की स्मृतियों से जुड़े शहर के कई ऐतिहासिक स्मारक उस दिन की दंगाई आग में स्वाहा हो गए और शहर के सीमावर्ती इलाकों पर नजर गड़ाए लोगों ने मुस्लिम परिवारों के वहां से हटते ही उनपर कब्जा कर लिया। …

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे  अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, chandu_thumb[8] जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते  वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 130वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का आठवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।

क्टूबर-नवंबर 1989 में आम चुनावों के लिए माहौल बनना शुरू हुआ। आईपीएफ ने पहली बार इस चुनाव में पूरी ताकत से उतरने का फैसला किया था। पार्टी ढांचे की ओर से जनमत को फीडबैक यह मिला कि पत्रिका के सारे वितरक चुनाव अभियान में जुटे होंगे लिहाजा इस दौरान न तो पत्रिका बिक पाएगी और न वसूली हो पाएगी। जनमत संपादक मंडल के सामने भी यह सवाल था कि पार्टी की इतनी बड़ी पहलकदमी में अपनी तरफ से वह क्या योगदान करे। लिहाजा फैसला हुआ कि दो महीने के लिए पत्रिका का प्रकाशन स्थगित कर दिया जाए और इस बीच टेब्लॉयड साइज में चार पन्नों का अखबार निकाला जाए, जो हो तो प्रचार सामग्री लेकिन इतनी प्रोपगंडा नुमा न हो कि आम पाठक उसे हाथ भी न लगाना चाहें। इस रणनीति के तहत पूरी टीम तितर-बितर कर दी गई। रामजी राय की देखरेख में प्रदीप झा और संतलाल को अखबार छापने की जिम्मेदारी मिली। महेश्वर और इरफान एक प्रचार फिल्म बनाने में जुटे। विष्णु राजगढ़िया को जहानाबाद, पटना और नालंदा के चुनाव क्षेत्रों को कवर करने भेजा गया और मुझे पुराने शाहाबाद जिले के चार संसदीय क्षेत्रों आरा, विक्रमगंज, सासाराम और बक्सर का चुनाव देखने के लिए कहा गया। इस फैसले की विचारधारा और राजनीति चाहे जितनी भी मजबूत रही हो, लेकिन इसके बाद चीजों को पटरी पर लाने में काफी समय लगा। खासकर इसके करीब डेढ़ साल बाद जब साप्ताहिक रूप में पत्रिका का प्रकाशन बंद करने का फैसला हुआ तो लगा कि इसमें कुछ न कुछ भूमिका 1989 के चुनावों में टीम बिखेरने की भी जरूर रही होगी।
बिहार की जमीनी राजनीति या रीयल पोलिटिक किस चिड़िया का नाम है, इसका अंदाजा मुझे पहली बार इस चुनावी सक्रियता के दौरान ही लगा। इसकी शुरुआत मैंने एक बौद्धिक रिपोर्टर के रूप में की थी, लेकिन इसका अंत होते-होते मैं बाकायदा एक जमीनी कायर्कर्ता बन चुका था। आरा में अपनी रिहाइश के दूसरे-तीसरे दिन ही मुझे विश्वनाथ यादव का इंटरव्यू करना पड़ा, जो शहर का एक माना हुआ गुंडा था और कई तरह की आपराधिक गतिविधियों में लिप्त था। आईपीएफ का प्रभाव नक्सल आंदोलन का मूल आधार समझे जाने वाले दलितों में था और मध्यवर्ती जातियों में कोइरी बिरादरी का भी उसे अच्छा समर्थन प्राप्त था। चुनाव में जीत-हार यादवों के एक हिस्से के समर्थन पर निर्भर करती थी, लिहाजा पार्टी हर कीमत पर उन्हें पटाने में जुटी थी। विश्वनाथ यादव से नजदीकी इसी रणनीति का एक हिस्सा थी। वह बाकायदा एक गुंडा है, इसका कोई अंदाजा मुझे नहीं था। अपनी समझ से चुनाव से जुड़े काफी आसान सवाल मैंने उससे पूछे, लेकिन यह अनुभव उसके लिए इतना विचित्र था कि उससे कुछ बोलते नहीं बना। यह जानकारी मुझे बहुत बाद में हुई कि आरा में उस चुनाव के दौरान कैसे-कैसे लोग के साथ मैंने इतनी आस्था से काम किया था। शराब की दुकान चलाने वाले, सिनेमा का टिकट ब्लैक करने वाले, तिनतसवा खेलाने वाले, ट्रेन से सामान उठाकर भाग जाने वाले, रंगदारी टैक्स वसूलने वाले। ऐसे-ऐसे लोग, जिन्हें लाइन पर लाने या पार्टी से बाहर करने में मात्र डेढ़ साल बाद मेरे पसीने छूट गए। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आरा शहर में वह चुनाव एक जन आंदोलन था। हिंदू और
hindu-rioter-of-gujarat सिर पर गेरुआ बंडाना बांधे कुछ लोग किनारे के मुस्लिम मुहल्लों में घुस गए। फिर भीड़ के बीच से रास्ता बनाकर एक आदमी को कंधे पर उठाए कुछ लोग चिल्लाते हुए दौड़े कि मुसलमानों ने इस आदमी को बम मार दिया है।
मुसलमान मेहनतकश वर्गों की ऐसी संघर्षशील एकता और ऐसी एकजुट राजनीतिक चेतना, जिसका जिक्र उत्तर भारत में मुझे देखने को दूर, कभी कहीं सुनने या पढ़ने तक को नहीं मिला। इसका असर आरा शहर पर भी पड़ा। बिहार और पूरे देश में माहौल बहुत ही खराब होने के बावजूद मैंने इस शहर में करीब दो महीने की अपनी उस रिहाइश में कोई सांप्रदायिक नारा तक लगते नहीं सुना।
सांप्रदायिकता की दृष्टि से भी 1989 के उन अंतिम महीनों का कोई जोड़ खोजना मुश्किल है। आजाद भारत के इतिहास का वह अकेला दौर है, जब कांग्रेस और बीजेपी लगभग बराबरी की ताकत से हिंदू वोटों के लिए लड़ रही थीं और इसके लिए किसी भी हद तक जाने में उन्हें कोई गुरेज नहीं था। सरकारी मशीनरी के फासिज्म की हद तक सांप्रदायिक हो जाने का जो मामला पिछले कुछ सालों से गुजरात में देखा जा रहा है, उससे कहीं बुरा हाल इसका मैंने बिहार में, खासकर इसके सासाराम शहर में देखा है। चुनावी माहौल में एक दिन खबर फैली कि शहर के फलां मठ पर एक बहुत बड़ा हिंदू जमावड़ा होने वाला है। मैंने देखा तो नहीं लेकिन सुनने में आया कि पूड़ियों के लिए रात से ही कई कड़ाह चढ़े और उनसे सुबह तक पूड़ियां निकलती रहीं। हमारा चुनाव कार्यालय शहर के मुस्लिम इलाके में था। दोपहर में पार्टी की प्रचार जीप शहर में- दंगाइयों होशियार आईपीएफ है तैयार- जैसे नारे लगाती निकली। जीप में पीछे मैं भी बैठा हुआ था...और अचानक चारो तरफ से हम विराट हिंदू जुलूस से घिर गए। गनीमत थी कि शहर में ज्यादातर लोगों को आईपीएफ के बारे में कुछ खास मालूम नहीं था। हमने माइक बंद किया, चुपचाप जीप से उतरे और किनारे खड़े हो गए। जुलूस मुस्लिम इलाके में पहुंच कर आराम से खड़ा हो गया और खुलेआम हाथों में कट्टा-चाकू लिए, सिर पर गेरुआ बंडाना बांधे कुछ लोग किनारे के मुस्लिम मुहल्लों में घुस गए। फिर भीड़ के बीच से रास्ता बनाकर एक आदमी को कंधे पर उठाए कुछ लोग चिल्लाते हुए दौड़े कि मुसलमानों ने इस आदमी को बम मार दिया है। उस पर उड़ेला गया डिब्बा भर लाल रंग कुछ ज्यादा ही लाली फैलाए हुए था। फिर दुकानें लूटने का सिलसिला शुरू हुआ। बेखटके शटर तोड़-तोड़ कर लोग टीवी, रेडियो, घड़ियां वगैरह ले जा रहे थे। जीप किसी तरह मोड़ कर गलियों-गलियों निकलने में हमें एक घंटा लग गया। लेकिन अपने चुनाव कार्यालय हम फिर भी नहीं पहुंच सकते थे। चिंता थी कि शाहनवाज जी और दूसरे मुस्लिम साथी वहां किस हाल में होंगे।
मुझे तो सासाराम के रास्ते भी नहीं पता थे। मैं वहां गया ही पहली बार था। रजाई की दुकान करने वाले एक साथी के पीछे-पीछे हम किसी तरह वहां पहुंचे तो दफ्तर का माहौल भी सांप्रदायिक होने के करीब था। कुछ समर्थक जोर-शोर से यह चर्चा कर रहे थे कि भला मुसलमानों को जुलूस पर बम मारने की क्या जरूरत थी। शाहनवाज जी स्थानीय वकील थे और दबंग पठान बिरादरी से आते थे। आईपीएफ से उनका संपर्क पिछले दो-तीन महीनों का ही था। उनके साथ दो-तीन और मुस्लिम समर्थक भी थे। हमने अलग से उनसे बात की तो उन्होंने कहा कि घर की कोई चिंता नहीं है, क्योंकि वह ज्यादा भीतर पड़ता है। किसी तरह बाहर-बाहर ही पड़ोस के किसी मुस्लिम गांव में निकल जाएं तो मामला निपट जाएगा। हम लोगों ने ऐसा ही किया। सारे मुस्लिम साथी बीच में बैठे। बाकी लोग जीप में किनारे-किनारे लद गए और इर्द-गिर्द उठ रहे शोर के बीच किसी तरह शाम के झुटपुटे में हम शहर से बाहर निकल गए। दूर जाने पर जगह-जगह से उठता घना, काला ऊंचा धुआं शहर में जारी विनाश की कमेंट्री करता लगा। बाद में पता चला, शेरशाह सूरी की स्मृतियों से जुड़े शहर के कई ऐतिहासिक स्मारक उस दिन की दंगाई आग में स्वाहा हो गए और शहर के सीमावर्ती इलाकों पर नजर गड़ाए लोगों ने मुस्लिम परिवारों के वहां से हटते ही उनपर कब्जा कर लिया।

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